16.9.12
14.9.12
हे असीम ! सीमा में रहो न।
घोटाले
की खबर पढ़कर लोग तिलमिलाते हैं। चीखते हैं, “इतना बड़ा घोटाला ! यह तो बहुत
ज्यादा है।“
आतंकवादी
को फाँसी न मिलने पर लोग तिलमिलाते हैं, “देश के दुश्मन को भी फाँसी पर नहीं चढ़ा सकते! यह तो हद है।“
महंगाई
बढ़ने पर लोग तिलमिलाते हैं, “इस सरकार ने तो मार ही डाला। इतनी महंगाई ! अब तो जीना
दूभर है।”
मजे की
बात यह कि कार्टून देखकर भी लोग तिलमिलाते हैं ! अभिव्यक्ति की सीमा तय करते हैं। आरोप लगाते हैं, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल! यह तो
देश के साथ गद्दारी है !“
मेरी समझ
में यह नहीं आता कि जब एक सीमा तक सब कुछ बर्दाश्त कर सकती है भारत की सहिष्णु
जनता तो सरकार, विपक्ष और कार्टूनिस्ट सभी अपनी-अपनी सीमा में क्यों नहीं रहते !
न तुम देश
भक्षक न हम देशद्रोही। तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय। J
..........................................
9.9.12
सूर्यास्त के बाद
आज की शाम
उमस भरी शाम
सूर्य
अस्त होने की तैयारी में
बादलों का कोई नामो निशान नहीं
शांत था तालाब का पानी
ठहरी-ठहरी पत्तियाँ
दमसाधे कर रही थीं
सूर्य के डूब जाने की
प्रतीक्षा
देखते ही देखते
डूब गया सूरज
उड़ चले
बगुले
पंछी तलाशने लगे
अपने-अपने
घोंसले
मगर यह क्या!
अचानक से आने लगी
उत्तर दिशा से
काले बादलों की सेना
देखते ही देखते
छा गये
काले बादल
लहलहाने लगे
धान के खेत
पूरब से पश्चिम तक
उमड़-घुमड़
छा गये
काले बादल
होने लगा
घनघोर अंधेरा
मैने कहा
भागोssss
........................
6.9.12
गर्भ का आशय
कभी मंदिर-मस्जिद
कभी आरक्षण
पर
चोंच
लड़ाते रहिए
वे चैन
से
करते
रहेंगे गोलमाल
छेड़छाड़,
बलात्कार, भ्रूण हत्या के बाद
ताजा
समाचार यह
कि वे
लूट लेते
हैं
गर्भाशय
भी !
गरीबों
के लिए आई योजना
तीस हजार
तक के ऑपरेशन का खर्च उठायेगी बीमा कम्पनियाँ
खबर है
लोभियों
ने उठाया योजना का भरपूर लाभ
निकाल दिये
हजारों
महिलाओं के
गर्भाशय !
हैरानी यह
नहीं है कि वे लोभी हैं
दुःख है
तो यह
कि वे
नहीं जानते
गर्भ का
आशय
और राहत
यह
कि अभी
हैं
ईमानदार
अधिकारी।
.............
इस समाचार को पढ़कर ....
बिहार में घात और घपले का सियाह कारनामा
4.9.12
2.9.12
पाप नहीं कटता
बचपन से सुनता आया हूँ कि गंगा में डुबकी लगाने से समस्त पाप कट जाते
हैं। पंचकोसी की परिक्रमा करने से पाप कट जाते हैं। काशी के मणिकर्णिका घाट में
अंतिम क्रिया संपन्न हो तो मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं सिर्फ राम
का नाम लेने से ही पाप कट जाता है! फिर सोचता हूँ कि यदि इतनी आसानी से पाप काटा जा सकता
है तो पाप करने में हर्ज ही क्या है ? जमकर पाप किया जाय और
जब गठरी बड़ी हो जाय तो गंगा में डुबकी लगा ली जाय। ‘हर गंगे’ कहने से पाप तो कट ही जायेगा। मुझे लगता है पाप कटाने की यह अवधारणा ही
गलत है। यह सोच ही भयंकर है। मंदिरों में कुछ तो बड़ी श्रद्धा से धन्यवाद का भाव
लेकर जाते हैं मगर अधिकांश मनोकामनाओं का अंबार लेकर पुन्य की झोली भरने या फिर पापों
की गठरी खाली करने जाते हैं। भीढ़ लगी रहती है मंदिरों में पाप कटाने वालों की।
धार्मिक अनुष्ठानों के द्वारा पाप कटाया जाता है। इसे प्रायश्चित करना कहते हैं।
क्या यह संभव है?
मुझे लगता है पाप इतनी आसानी से काटा या कटाया नहीं जा सकता। जैसा पाप
करेंगे वैसी सजा जरूर मिलती है। पाप के बीज अंकुरित होते हैं, बड़े होते हैं और फल
बनकर फूटते हैं। फल तो चखना ही पड़ता है। आप चखें, आपके बच्चे चखें या पूरा समाज
चखे। यह हो सकता है कि आपने पाप किया, घर में बीज अंकुरित होने के लिए छोड़कर धरती
से कूच कर गये, पुत्रों ने अपने पुन्य कर्मों के द्वारा अंकुरित हो रहे बीजों को
वहीं नष्ट कर दिया। या यह भी हो सकता है कि पुत्रों ने उसमें और खाद पानी दे दिया,
पाप का बीज धीरे-धीरे घने वृक्ष में परिवर्तित हो गया। पुत्र की जिंदगी भी
जैसे-तैसे कट गयी लेकिन जब पौत्र की बारी आयी तब तक पाप के वृक्ष ने फल गिराने
प्रारंभ कर दिये। समाज ने देखा कि मासूम बच्चे ने कोई पाप नहीं किया लेकिन बहुत
कष्ट उठा रहा है। पंडित जी ने झट से निष्कर्ष दे दिया....”यह सब पूर्व जन्म के पापों
का फल है!” जबकि ये पाप उसके पूर्व जन्मों के नहीं उसके
दद्दू के थे। पुत्र या पौत्र तो मात्र उदाहरण के तौर पर कहा जा रहा है। यह बात
समाज के दृष्टि से सोचिए, राष्ट्र या संसार के पटल पर रख कर
सोचिए तो और भी स्पष्ट होती नज़र आयेगी। समाज में कोई एक पाप करता है और फल सभी को
भोगने पड़ते हैं। कोई एक पुन्य करता है आनंद का अहसास सभी को होता है।
विश्व पटल पर सोचें तो हमारे सामने पाप पुन्य के कई उदाहरण मिल
जायेंगे जिसमे एक के पाप कर्मों की सजा अनेको ने पाई है या इससे उलट एक के पुन्य
कर्मों का फल सभी ने चखा है। बिजली, रेल, हवाई जहाज और भी असंख्य वैज्ञानिक
आविष्कार किसी एक राष्ट्र के किसी एक वैज्ञानिक ने किये मगर उसका आनंद समस्त विश्व
ले रहा है। हिरोशिमा और नागासाकी में परणाणु बम अमेरिका ने गिराये। फल लाखों निर्दोष
जनता को भोगना पड़ा लेकिन क्या अमेरिका इस कलंक से कभी मुक्त हो पाया ? क्या कभी मुक्त हो पायेगा ? जितना बड़ा पाप, उतना
बड़ा कलंक। जितना बड़ा पाप, उतना बड़ी सजा। पाप इतनी आसानी से काटा ही
नहीं जा सकता। हाँ, आप सच्चे मन से अच्छे हो जांय तो यह हो सकता है कि आपकी पाप
करने की प्रवृत्ति सुधर जाय। आपका हृदय परिवर्तित हो जाय। आपने जो पाप किये हैं वो
यदि छोटे हैं तो हो सकता है आप जीवन के शेष वर्षों में अपने सतकर्मों से उसे वहीं
नष्ट कर दें। घर, समाज या राष्ट्र स्तर पर किसी निर्दोष को उसका फल चखने के लिए
बाध्य न होना पड़े। इस अंश तक तो माना जा सकता है कि पाप कट गया। लेकिन यह तो
हर्गिज नहीं हो सकता कि पाप किया, गंगा में डुबकी लगायी, समझा की पाप धुल गया है
फिर अपने पाप कर्मों पर लगे रहे। यदि ऐसा करते हैं तो पाप धुलता नहीं, पाप के बीज
और तेजी से अंकुरित होते है। एक न एक दिन तो उसका फल भोगना ही पड़ेगा।
गंगा मे ऐसे पाप जरूर धुले जा सकते हैं जो पाप हैं ही नहीं। पंडित जी
ने कहा यह पाप है और आपने मान लिया कि अनर्थ हो गया! झट से गंगा जी में कूद पड़े और निर्मल होकर बाहर निकल
आये। जैसे किसी दीन हीन को कष्ट में देखकर आपने उसकी मदद करी और पंडित जी ने कहा..”पापी! तुमने मलेच्छ को छू लिया? तुमने भयंकर पाप किया है!” और आप गंगा में डुबकी
मार कर पवित्र हो गये। ऐसे मूर्खता पूर्ण पाप ही ऐसे मूर्खतापूर्ण पुन्य कर्मों के
द्वारा धोये या साफ किये जा सकते हैं।
कई बार तो समाज में यह भी देखने को मिलता है कि जो पुन्य है उसी को हम
पाप मानकर जीते चले जाते हैं। पंचायत ने कहा और मान लिया कि यह पाप है। पंडित जी
ने कहा और हमने मान लिया कि यह पाप है। जबकि होता यह है कि वही वास्तविक पुन्य
कर्म होते हैं जो ईश्वर ने आप से अनजाने में करा दिये। ईश्वर की कृपा कि किसी
सुंदर युवक को किसी विधवा से प्रेम हो गया। दोनो ने विवाह करने का निश्चय किया मगर
पंचायत ने कहा..”यह तो घोर पाप है!” ईश्वर की कृपा कि किसी नीच जाति
की युवती को सुंदर ब्राह्मण कुमार से प्रेम हो गया। दोनो ने विवाह का निश्चय किया
मगर समाज ने कहा..”घोर पाप है!” किसी
विवाहिता स्त्री ने लगातार दूसरी बार सुंदर कन्या को जन्म दिया, पूरे घर वाले रोने
लगे कि यह तो किसी भयंकर पाप का परिणाम है! पंचायत द्वारा या पंडित जी द्वारा पाप माने
जाने वाले कई मानवीय पुन्य कर्मों का प्रायश्चित उनके ही द्वारा बताये गये धार्मिक
अनुष्ठानों के द्वारा सामाजिक भयवश करते हुए कितने ही परिवार पूरी जिंदगी बिता
देते हैं और ईश्वर के आगे दुखड़ा रोते रहते हैं कि हे ईश्वर ! हमे सुखी रख्खो, हम बहुत कष्ट में हैं।
मैने अभी कुछ दिन पहले अंतर्जाल में, (वीरू भाई के ब्लॉग में) पढ़ा था
कि वहां अमरीका में लोग कुत्ते को घुमाने के लिए ले जाते हैं तो साथ में पॉलिथीन भी लिये रहते
हैं। कुत्ते ने विष्ठा किया तो तुरंत पॉलिथीन में उठाकर रख लेते हैं और घर लौटकर
उसे डस्टबीन में डाल देते हैं। वे अपनी गंदगी समाज को देना नहीं चाहते। हम ठीक
इससे उल्टा करते हैं। अपना घर साफ करते हैं और गंदगी घर के बाहर फेंक आते हैं। हम
गंगा से अपेक्षा करते हैं कि वे हमारे सभी पाप काट दें मगर गंगा को मैली करने का
कोई अवसर नहीं चूकते। सोचिए, हम पुन्यात्माओं की यह कितनी असभ्य सामाजिक सोच है।
हमारी सोच ऐसी, हमारे कर्म ऐसे और हम बड़े पुन्यात्मा, धार्मिक बने ऐंठते रहते
हैं संसार में। पाप पर पाप करते चले जा रहे हैं और गोते मारकर धोते चले आ रहे
हैं। हमको किसी से डरने की क्या जरूरत ? हमारे पास गंगा है पाप धोने के लिए और मणिकर्णिका की ‘स्वर्ग उड़ान पट्टिका’ में मोक्ष का आरक्षण तो हमने
करा ही लिया है। J
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जनसत्ता में प्रकाशित। दिनांकः 24-09-2012
जनसत्ता में प्रकाशित। दिनांकः 24-09-2012
28.8.12
मछली
सुना था
एक मछली
करती है
पूरे तालाब को गंदा
देखा
एक मछली
साफ कर रही थी
पूरे तालाब की
गंदगी
और भी होंगी
मछलियाँ
और भी होंगे
तालाब
प्रदूषित नहीं होगा अगर
तालाब का पानी
नहीं मरेंगी मछलियाँ
इनके जीते जी
बनी रहेगी
तालाब की
खूबसूरती
मर गईं
तो नहीं बैठ पाओगे तुम
तालाब के किनारे
सुकून-औ-चैन से।
.....................
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