31.1.26
29.3.25
बेचैन आत्मा से...
सुबह हुई! गंगा नहायें
तुम हमें घुमाओ, हम तुम्हें घुमायें
सड़क छोड़ पगडंडी पकड़ें
जौं, गेहूँ की बाली देखें
उगता सूरज दिख जाए तो
धरती माँ की लाली देखें
दूर बह रही गंगा जी हैं
चलो नहायें, तैरें, गायें
रस्ते में कोई मिल जाए
'जै गंगा जी' कहते जायें
कर्मों की सूची लम्बी है
भरे पड़े हैं दुःख के किस्से
अंधियारी रात कटी है
नई सुबह फिर अपने हिस्से
तेरे घर में रहता हूँ मैं
तुझे घुमाना फर्ज है मेरा
मेरे कारण तू जिन्दा है
मुझे घुमाना फर्ज है तेरा
हम-तुम साथी इक दूजे के
किसको ढूढ़ें? पास बुलाएँ!
ईश्वर यहीं-कहीं रहता है
चलो, चलें! उससे मिलवायें
सुबह हुई! गंगा नहायें
तुम हमे घुमाओ, हम तुम्हें घुमायें।
.........
6.3.25
18.9.20
मदारी मुक्त बन्दर
गंगा उफान पर है
डूब चुकी हैं पंचगंगा घाट की सभी मढ़ियाँ
नहीं जा सकते
एक घाट से दूसरे घाट तक
श्रीमठ के पास
सीढ़ियों पर बैठ
जहाँ टकरा रही थीं
गंगा की लहरें
कई लोग एक साथ कर रहे थे
पितरों को तर्पण
मन्त्र पढ़ रहा था, ऊपर बैठा पण्डा
बीच-बीच में निर्देश देता..
जनेऊ
गले में माला कर लीजिए,
अपसव्य होइए!
जनेऊ
बाएँ कन्धे पर,
सव्य होइए!
जनेऊ दाएँ कन्धे पर,
राजघाट पुल की ओर अर्घ्य दीजिए,
रामनगर की ओर अर्घ्य दीजिए,
अपना गोत्र बोलिए,
पितरों को याद कीजिए....
मैं भी गया था
तर्पण देने
ढूँढ रहा था
अपने पण्डित जी को
मुझसे पहले
पण्डित जी ने मुझे देख लिया
हाथों से इशारा किया..
वहाँ बैठिए जजमान,
गंगा स्नान कीजिए,
अर्घ्य दीजिए.....
तभी एक बंदर
किसी की पोटली से
एक आलू निकालकर भागा
पण्डे ने डांटा
मगर यह वाला बन्दर
मदारी मुक्त था, स्वतन्त्र था
आलू मुँह में दबाए
चढ़ता चला गया
घाट की सीढ़ियां!
...................
26.11.14
गंगा के तट पर...
मंदिर दिखता
पुजारी दिखते
पंडे दिखते हैं
मंदिर के ऊपर फहराते
झंडे दिखते हैं
भक्तों की लाइन लगती है
गंगा के तट पर
लोटे में गंगा
काँधे पर
डंडे दिखते हैँ।
कहीं गंजेड़ी
कहीं भंगेड़ी
कहीं भिखारी
कहीं शराबी
लोभी, भूखे, भोगी दिखते
बगुले भी योगी
गंगा तट पर भाँति-भाँति के
चित्तर दिखते हैं
सभी चरित्तर मार के डुबकी
पवित्तर दिखते हैं।
कोई पूरब से आता है
कोई पश्चिम से
कोई उत्तर से आता है
कोई दक्खिन से
सब आते हैं पुन्य लूटने
कुछ आते मस्ती में
कुछ सीढ़ी पर उड़ते दिखते
कुछ डूबे कश्ती में
देसी और विदेशी
जोड़े दिखते हैं
धोबी के गदहे भी आकर
घोड़े दिखते हैं।
मिर्जा भाई दाने देते
रोज़ कबूतर को
और रामजी के दाने
कौए खाते हैं
पुन्नू साव खिला रहे हैं
आंटे की गोली
मछली उछल-उछल कर खाती
है कितनी भोली!
उसी घाट पर एक मछेरा
जाल बिछाये है
पाप पुण्य की लहरें लड़तीं
गंगा के तट पर
रोज़ चिताएँ जलती रहतीं
गंगा के तट पर।
13.5.13
स्वर्ण रेखा नदी
तू उस देश में बहती है
9.12.12
सुबहे बनारस-2
18.11.12
ये गहरी झील की नावें....
ये गहरी झील की नावें
6.11.12
चित्र पहेली
31.10.12
आकाश दीप
पास से देखने पर कुछ ऐसे दिखते हैं आकाश दीप। अभी चाँद नहीं निकला है।
यहाँ से दूसरे घाटों का नजारा लिया जाय...
यहाँ बड़ी शांति है। घाट किनारे लगी पीली मरकरी रोशनी मजा बिगाड़ दे रही है। सही रंग नहीं उभरने दे रही..
ध्यान से देखिये..चाँद इन आकाश दीपों के पीछे निकल चुका है।
एक किशोर बड़े लगन से टोकरी में एक-एक दीपक जला कर रख रहा है। ऊपर खींचते वक्त पर्याप्त सावधानी की जरूरत है नहीं तो दिया बुझ सकता है। तेल सब उसी की खोपड़ी में गिर सकता है।





















