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29.3.25

बेचैन आत्मा से...

सुबह हुई! गंगा नहायें

तुम हमें घुमाओ, हम तुम्हें घुमायें


सड़क छोड़ पगडंडी पकड़ें

जौं, गेहूँ की बाली देखें

उगता सूरज दिख जाए तो

धरती माँ की लाली देखें 


दूर बह रही गंगा जी हैं

चलो नहायें, तैरें, गायें

रस्ते में कोई मिल जाए

'जै गंगा जी' कहते जायें


कर्मों की सूची लम्बी है

भरे पड़े हैं दुःख के किस्से

अंधियारी रात कटी है

नई सुबह फिर अपने हिस्से


तेरे घर में रहता हूँ मैं

तुझे घुमाना फर्ज है मेरा

मेरे कारण तू जिन्दा है

मुझे घुमाना फर्ज है तेरा


हम-तुम साथी इक दूजे के

किसको ढूढ़ें? पास बुलाएँ!

ईश्वर यहीं-कहीं रहता है

चलो, चलें! उससे मिलवायें


सुबह हुई! गंगा नहायें

तुम हमे घुमाओ, हम तुम्हें घुमायें।

.........

18.9.20

मदारी मुक्त बन्दर

गंगा उफान पर है

डूब चुकी हैं पंचगंगा घाट की सभी मढ़ियाँ

नहीं जा सकते 

एक घाट से दूसरे घाट तक

श्रीमठ के पास

सीढ़ियों पर बैठ

जहाँ टकरा रही थीं

गंगा की लहरें

कई लोग एक साथ कर रहे थे

पितरों को तर्पण

मन्त्र पढ़ रहा था, ऊपर बैठा पण्डा

बीच-बीच में निर्देश देता..

जनेऊ

गले में माला कर लीजिए,

अपसव्य होइए!

जनेऊ

बाएँ कन्धे पर,

सव्य होइए!

जनेऊ दाएँ कन्धे पर,

राजघाट पुल की ओर अर्घ्य दीजिए,

रामनगर की ओर अर्घ्य दीजिए,

अपना गोत्र बोलिए,

पितरों को याद कीजिए....


मैं भी गया था

तर्पण देने

ढूँढ रहा था 

अपने पण्डित जी को

मुझसे पहले

पण्डित जी ने मुझे देख लिया

हाथों से इशारा किया..

वहाँ बैठिए जजमान,

गंगा स्नान कीजिए,

अर्घ्य दीजिए.....


तभी एक बंदर

किसी की पोटली से

एक आलू निकालकर भागा

पण्डे ने डांटा

मगर यह वाला बन्दर

मदारी मुक्त था, स्वतन्त्र था

आलू मुँह में दबाए

चढ़ता चला गया

घाट की सीढ़ियां!

...................

26.11.14

गंगा के तट पर...


मंदिर दिखता
पुजारी दिखते
पंडे दिखते हैं
मंदिर के ऊपर फहराते
झंडे दिखते हैं
भक्तों की लाइन लगती है
गंगा के तट पर
लोटे में गंगा
काँधे पर
डंडे दिखते हैँ।

कहीं गंजेड़ी
कहीं भंगेड़ी
कहीं भिखारी
कहीं शराबी
लोभी, भूखे, भोगी दिखते
बगुले भी योगी
गंगा तट पर भाँति-भाँति के
चित्तर दिखते हैं
सभी चरित्तर मार के डुबकी
पवित्तर दिखते हैं।

कोई पूरब से आता है
कोई पश्चिम से
कोई उत्तर से आता है
कोई दक्खिन से
सब आते हैं पुन्य लूटने
कुछ आते मस्ती में
कुछ सीढ़ी पर उड़ते दिखते
कुछ डूबे कश्ती में
देसी और विदेशी
जोड़े दिखते हैं
धोबी के गदहे भी आकर
घोड़े दिखते हैं।

मिर्जा भाई दाने देते
रोज़ कबूतर को
और रामजी के दाने
कौए खाते हैं
पुन्नू साव खिला रहे हैं
आंटे की गोली
मछली उछल-उछल कर खाती
है कितनी भोली!
उसी घाट पर एक मछेरा
जाल बिछाये है
पाप पुण्य की लहरें लड़तीं
गंगा के तट पर
रोज़ चिताएँ जलती रहतीं
गंगा के तट पर।

13.5.13

स्वर्ण रेखा नदी


तेरा असली नाम क्या है,
स्वर्ण रेखा नदी?

तू उस देश में बहती है
जिस देश को कभी सोने की चिड़िया कहते थे,
उस राज्य में बहती है जिसे झारखंड कहते हैं,
उस जिले में बहती है जिसे घाटशिला कहते हैं।

क्या महज इसलिए स्वर्ण रेखा कहलाई कि
पहाड़ियों के पीछे अस्त होने से पहले
सूर्य की सुनहरी किरणें
कुछ पल के लिए
खींच देती है तेरे आर-पार
एक स्वर्णिम रेखा!
या इसलिए कि
तू अपने साथ बहाकर लाई थी कभी
ताँबे और सोने के भंडार?

जाऊँगा बनारस
तो नहीं बता पाउँगा
माँ गंगा से तेरा हाल!
तेरी इतनी बुरी हालत सुनकर
दुखी होगी और
डर जायेगी बेचारी।

बहेलिए
जैसे कतरते रहते हैं
हाथ आई सुनहरी चिड़िया के पंख,
लोभी
जैसे दुहना चाहते है
आखिरी बूँद भी
वैसे ही कतरी,
चूस ली गई दिखती है तू तो!

तू अब
इतनी छिछली हो गई है
कि छोटे-मोटे पहाड़ जैसे दिखते हैं
तुझमें समाई शिलाएँ,
इतनी कमजोर हो चुकी है
कि सिर्फ एक बाँस के सहारे
कोंचते हुए
बिन चप्पू वाली नाव लेकर
आर-पार करता है
बूढ़ा माझी
और इतनी कम हो चुकी है तेरी गहराई कि
बीच धार में
पैदल ही चलकर
अपने जाल बिछाता है
मछेरा !

सोचता हूँ
बावजूद इसके
आज भी इतनी सुंदर है
तो कल कितनी सुंदर रही होगी तू!

तेरे तट पर
दूर-दूर तक बिखरी है
कोयले सी राख
ये काली है मगर कोयला नहीं है!
ये अवशेष हैं स्वर्णिम शिलाओं के
जिन्हें बड़ी सी फैक्टरी में
तोड़कर, तपाकर, निकालकर ताँबा-सोना...
फेंक दिया गया है
तेरे तट पर!

शायद
ऐसे ही पोती जाती है कालिख
सुंदरता के चेहरे पर!


नहीं
तू सिर्फ एक नदी नहीं है
कल शाम
जब डूब रहा था सूरज
खिंच गई थी
तेरे आर-पार स्वर्णिम रेखा
तो तू मुझे
सोने की चिड़िया सी दिखी!

तेरा असली नाम क्या है,
स्वर्ण रेखा नदी?
...........................

स्वर्ण रेखा नदी की शिला पर बैठते, फोटाग्राफी करते, ये भाव जगे।
दिनः 11-05-2013।
समयः जब सूरज पहाड़ियों के पीछे ढल रहा था।

9.12.12

सुबहे बनारस-2

ये आज सुबह की तस्वीरें हैं। गंगा जी में आजकल साइबेरियन पंछियों का जमावड़ा है। नाव में सूर्योदय के दर्शन के लिए घूमने वाले यात्रि इनके लिए कुछ दाना लिये रहते हैं। आओ-आओ की पुकार लगाते हैं। ये पंछी आवाज को पहचानने लगे हैं या दाने को ये तो वे ही जाने लेकिन सूर्योदय के समय इनको नावों के पीछे-पीछे भागते देखना बड़ा अच्छा लगता है। 



यहाँ घाट पर वृक्ष नहीं हैं। दशाश्वमेध घाट के पास गमलों में पौधे लगे हैं।




यह फोटोग्राफी का चातुर्य प्रदर्शन है। ऐसा कोई किला नहीं है घाट में।
 

बनारस में गंगा भक्ति, शिव भक्ति कोई अचरज की बात नहीं है लेकिन इस बनारसी भक्त को देखिये। ये स्नान-ध्यान के पश्चात गंगा घाट की मिट्टी से ताजे शिवलिंग की स्थापना करने के बाद सूर्योदय के समय शिव को गंगाजल चढ़ा रहे हैं! बनारस और सुबहे बनारस को आत्मसात करने के लिए समय देना होता है। तुलसी, कबीर ने यूँ ही नहीं इसे अपने हृदय में बसाया होगा!

18.11.12

ये गहरी झील की नावें....


यह पोखरा-नेपाल की झील - फेवा ताल है। इस झील में नाव चलाते हुए मैने इसकी तुलना गंगा जी से की तो इस गीत का जन्म हुआ। आप भी देखिए और गीत से जुड़ने का प्रयास कीजिए।


ये गहरी झील की नावें
नदी की धार क्या जानें !

रहती हैं ये पहरों में,
डरती हैं ये लहरों से।
उछलती हैं किनारों में,
थिरकती हैं हवाओं से।

जो आशिक हैं किनारों के
भला मझधार क्या जाने !

वो गिरना तुंग शिखरों से,
अज़ब का दौड़ मैदानी।
फ़ना होना समन्दर में,
गज़ब का प्रेम हैरानी।

ये ठहरे नीर की नावें
नदी का प्यार क्या जानें !

अगर है मौत रूकना तो,
बहना ही तो जीवन है।
यदि हों शूल भी पथ में,
चलना ही तो जीवन है।

जो डरते हैं खड़े हो कर
भला संसार क्या जाने !

ये गहरी झील की नावें
नदी की धार क्या जानें !

नोटः दोनो तस्वीरें मेरे कैमरे की हैं। ऊपर वाली अभी की, नीचे वाली पहले कभी किसी समय की।

6.11.12

चित्र पहेली



प्रश्नः- ऊपर दो चित्र हैं। दोनो चित्र लगभग एक ही स्थान पर खड़े होकर मैने दो दिन पहले खींचे हैं। क्या आप इन चित्रों को देखकर बता सकते हैं कि इन  चित्रों में घाट किनारे बैठकर ये लोग क्या कर रहे हैं?

उत्तरः-यह बनारस के घाट हैं। साधारण से दिखने वाले दृश्यों में अगर डूबा जाय तो बहुत कुछ मिल जाता है। एक ही घाट पर मात्र 10 कदम की दूरी पर दो मिजाज के लोग बैठे हैं। दोनो के धर्म अलग-अलग हैं। दोनो के कर्म भी अलग-अलग हैं। पहले चित्र में मौलाना मछलियों को आँटे की छोटी-छोटी गोलियाँ खिला रहे हैं और उनके ठीक सामने दूसरे चित्र में तीन लोग धागे में काँटा लगाकर मछलियाँ फंसा रहे हैं। मैने मौलाना से पूछा, "आप मछलियों को चारा खिला रहे हैं और आपके सामने वे लोग मछली मार रहे हैं आपको कैसा लग रहा है?" उन्होंने हंसकर कहा, "हम अपना काम कर रहे हैं, वे अपना काम कर रहे हैं, उनकी वो जाने मैं तो अपनी जानता हूँ।" मैने हंसकर कहा, "आप उनके शिकार को आँटे की गोली खिलाकर मोटा ही तो कर रहे हैं!" मौलाना हंसकर कहने लगे, "अब कोई गलत काम करे तो हम अच्छा काम करना छोड़ दें?" 

मुझे लगा मौलाना बड़ी बात कह रहे हैं। कह ही नहीं रहे हैं कर भी रहे हैं। अपने सामने ही मछली मारते लोगों को देखकर भी उन्होने मछली को आँटे की गोली खिलाना नहीं छोड़ा। 

मुझे इन घाटों पर घूमते-घूमते कभी-कभी ऐसा भी लगता है है कि तुलसी को तुलसी और कबीर को कबीर बनाने में उनकी अपनी प्रतिभा चाहे जो भी रही हो लेकिन इसमें बहुत बड़ा योगदान गंगा के इन घाटों का भी है।

31.10.12

आकाश दीप

यह पंचगंगा घाट है। गंगा, यमुना, सरस्वती, धूत पापा और किरणा इन पाँच नदियों का संगम तट। कहते हैं कभी मिलती थीं यहाँ पाँच नदियाँ..सहसा यकीन ही नहीं होता लगता है, कोरी कल्पना है। यहाँ तो अभी एक ही नदी दिखलाई पड़ती हैं..माँ गंगे। लेकिन जिस तेजी से दूसरी मौजूदा नदियाँ नालों में सिमट रही हैं उसे देखते हुए यकीन हो जाता है कि हाँ, कभी रहा होगा यह पाँच नदियों का संगम तट तभी तो लोग कहते हैं पंचगंगाघाट। 

जल रहे हैं आकाश दीप। चल रहा है भजन कीर्तन। उतर रहा हूँ घाट की सीड़ियाँ..



 पास से देखने पर कुछ ऐसे दिखते हैं आकाश दीप। अभी चाँद नहीं निकला है।

यहाँ से दूसरे घाटों का नजारा लिया जाय...



यहाँ बड़ी शांति है।  घाट किनारे लगी पीली मरकरी रोशनी मजा बिगाड़ दे रही है। सही रंग नहीं उभरने दे रही..

 ध्यान से देखिये..चाँद इन आकाश दीपों के पीछे निकल चुका है।

 एक किशोर बड़े लगन से टोकरी में एक-एक दीपक जला कर रख रहा है। ऊपर खींचते वक्त पर्याप्त सावधानी की जरूरत है नहीं तो दिया बुझ सकता है। तेल सब उसी की खोपड़ी में गिर सकता है।














देखते ही देखते चार दीपों वाली टोकरी को पहुँचा दिया आकाश तक। लीजिए बन गया अब यह आकाश दीप।चाँद अब पूरी तरह चमक रहा है।

29.10.12

अस्सी घाट, शरद पूर्णिमा और चाँदनी की पदचाप


























सभी तस्वीरें आज शाम की हैं। दूसरी तस्वीर में आकाश दीप जल रहा है। आज से तुलसी के पौधे और गंगा घाट के किनारे दीप दान प्रारंभ हो चुका है।  तीसरी तस्वीर में एक पुरानी नाव दिखाई दे रही है जिस पर आजकल चाय वाला अपनी दुकान लगाता है। अंतिम तस्वीर थोड़ी हिली न होती तो मस्त आती। इसके हिलने का अफसोस तो है लेकिन फिर भी आपको दिखाने का मोह नहीं छोड़ पा रहा हूँ। आज शरद पूर्णिमा है। खीर पक रही है। चाँदनी अपनी संपूर्ण मिठास के साथ उसकी प्रतीक्षा में है। हमारी शुभकामना यह कि आपकी खीर बिल्ली से बची रहे।