28.9.23

लोहे का घर 73

कलकत्ता से वापसी यात्रा में भी हम भाग्यशाली हैं। राजधानी एक्सप्रेस में दोनो लोअर बर्थ मिली है फर्क सिर्फ इतना है कि आमने-सामने न होकर एक साइड लोअर बर्थ है दूसरी लोअर। श्रीमती जी साइड लोअर बर्थ में कब्जा जमाए 3 घण्टे से लगातार फोन में बहन, बेटियों से बातें कर रही हैं, बातें, ढेर सारी बातें....।

हम सुकून से फेसबुक चला रहे हैं, सामने लोअर बर्थ पर व्यवसायी दिख रहे, मेरी तरह वृद्ध होने जा रहे एक युवा, आराम कर रहे हैं। सामने के अपर या साइड अपर बर्थ खाली है। शांत और मनहूस वातावरण में कुछ भद्र सज्जनों के कारण जो मोबाइल जोर-जोर से सुनना पसंद करते हैं, कुछ आवाजें आ रही हैं, शेष सब शांति है। आस पास की शांति भंग करने में भद्र लोगों का बड़ा योगदान होता है। ये सोचते हैं कि हम मजा ले रहे हैं तो सभी मजा लें। इसमें इनकी कोई बदनियति नहीं है, बल्कि परोपकार की भावना है। अब यह अलग बात है कि हमारे जैसे कुछ बेचैन आत्मा को उनका यह प्रेम नहीं समझ आता, शोर करने वालों को ही अभद्र! बेवकूफ! असामाजिक! जाने क्या-क्या बोलते रहते हैं!!!


प्रेम से लिख रहे थे, खाना आ गया। खाना ठंडा न हो, खाने लगे। खाते-खाते धनबाद आ गया। धनबाद से बहुत यात्री चढ़े। छोटे बच्चे, गोदी में रोता बच्चा लिए महिला, बुजुर्ग और युवा भी। हमारे कूपे में तीनों अपर सीट भर गई। हमने जल्दी-जल्दी खाना समाप्त किया और हाथ धोकर, पान घुलाकर बैठ गए। अभी लोग सामान और सीट मिला ही रहे हैं, खूब शोर हो रहा है, गोदी का बच्चा अभी माँ का दूध पीकर खेल रहा है। बगल के कूपे में भी इनके साथ की फौज है। ये लोग भी खाना-खाना कर रहे हैं, ऊपर बैठी महिला बच्चे को गोद में लिए खाना भी खा रही है। कुल मिलाकर स्लीपर बोगी की तरह चहकने लगा यह डिब्बा!


ट्रेन पूरी स्पीड से चल रही है, अगला स्टेशन गया है। गया के बाद अपना स्टेशन पंडित दीन दयाल... मुगलसराय है। इसके मुगलसराय पहुंचने का समय रात्रि 1.15 है। हमको मुगलसराय उतरना है। आज घर पहुंचकर ही सोना नसीब होगा। सब सही रहा तो भोर से पहले घर पहुंच जाएंगे। गलती से सो गए तो दिल्ली पहुंच जाएंगे! दिमाग कह रहा है, अभी सोना नहीं है। शरीर कह रहा है, सो जाओ, अजीब मुसीबत है।


आइसक्रीम आ गया! पहले बताया होता होता तो पान नहीं जमाते, दोनो मेरे प्रिय हैं, कैसे छोड़ दें? पान थूककर आइसक्रीम खा लिया, अब दूसरा पान नहीं है। सुख भी मुसीबत ले कर आती है। एक से अधिक सुख, एक साथ मिल जाय तो क्या छोड़ें, क्या पकड़ें वाले उहापोह में आदमी पड़ जाता है।


मेरे अपर बर्थ वाली महिला अब सुकून से है। बच्चा सो गया है, अब वह भी सोने की तैयारी कर रही है। लोहे के घर में दृश्य तेजी से बदलते हैं। बाहर अंधकार है, खिड़कियों के पर्दे बंद हैं, भीतर रोशनी है लेकिन भीतर के नजारे भी तेजी से बदल रहे हैं। महिला का बच्चा सो चुका है, वह भी अब लेट कर मेरी तरह मोबाइल निकाल चुकी हैं। सामने बैठे यात्री भी मोबाइल चला रहे हैं, सामने साइड लोअर बर्थ में अपनी श्रीमती जी भी चश्मा चढ़ा कर मोबाइल चला रही हैं। आज के जीवन में दो ही सच्चे मित्र बचे हैं, एक मोबाइल दूसरा चश्मा, शेष तो झूठा है यह संसार।

........

लोहे का घर 72

सेवानिवृत्ति के बाद कुछ दिनों के लिए लोहे का घर छूटा तो इसका मतलब यह थोड़ी न है कि शरीर सलामत हो, जीवन शेष हो फिर भी इसका साथ छूट जाय! मुझे तो ट्रेन पकड़ने का बहाना मिलना चाहिए। अमृतसर हावड़ा एक्सप्रेस 50टी डाउन में कई बार बैठे लेकिन कभी हावड़ा जाने का अवसर नहीं मिला। भालो-आछे, भालो-आछे कहते हुए जौनपुर से चढ़े और बनारस उतर गए। अब फिफ्टी डाउन बंद हो चुकी है, उसे कोरोना निगल गया। (कोरोना काल में जो बंद हुई कि हमेशा के लिए बंद हो गई।) अब हावड़ा जाने के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पड़े तो यह विकल्प अच्छा लगा। आठ घण्टे में, होटल चेक इन के समय लगभग 10 बजे यह हावड़ा पहुंचा देगी।


राजधानी हावड़ा एक्सप्रेस में सुफेद चादर ओढ़कर लेटे हैं। पंडित दीन दयाल..... मुगलसराय से रात 2 बजे चढ़े हैं। सुबह के 6 बज चुके हैं, ट्रेन 509 किमी चलकर, धनबाद से पहले, पारसनाथ स्टेशन पर 2 मिनट रुककर चल चुकी है। जिस प्लेटफार्म में रुकी थी, सन्नाटा फैला था। अपनी बोगी में भी बहुत से बर्थ खाली हैं। कुल मिलाकर सन्नाटे का साम्राज्य है। सामने के लोअर बर्थ में श्रीमती जी और इधर के लोअर बर्थ में हम, ऊपर 2 और सामने 2 और बर्थ हैं, शेष पर्दे में डूबा हुआ। श्रीमती जी खर्राटे भर रही हैं और हमको नींद नहीं आ रही। वैसे भी यह मेरा साइकिल चलाने का समय है। ठीक इस समय नमो घाट, बनारस में भजन चल रहा होगा।


राजधानी एक्सप्रेस में रईसी से यात्रा कर रहे हैं लेकिन ट्रेन भारत के मेहनतकश मजदूरों, किसानों के इलाकों से गुजर रही है। बंद शीशे की खिड़की से बाहर झाँकता हूँ तो दूर दूर तक फैले वृक्षों के जंगल, खेत और हरे भरे मैदान दिख रहे हैं। कभी जब छोटे प्लेटफार्म से कूदती /फादती भागती है अपनी राजधानी तो दूर खेतों में उग आई चिमनियां/ कुछ पक्के मकान दिख जाते हैं। अपनी ट्रेन बोल भी रही है, "हम कुछ ही मिनटों में धनबाद पहुंचने वाले हैं!" मतलब बिहार से हम कोयले के खदानों वाले राज्य झारखण्ड आ गए।


धनबाद हम पहले भी आए हैं। बिटिया ने इसी शहर से MBA किया था। उसके प्रवेश से लेकर एग्जाम पास करके निकलने तक कई बार आना हुआ। एक बार तो वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई थी और हॉस्पीटल में एडमिट करने के बाद उसकी सहेलियों ने फोन किया था, हम भागे-भागे आए थे। तब आजकी तरह राजधानी नहीं पकड़ते थे, लुधियाना धनबाद, किसान एक्सप्रेस पकड़ते थे जो शाम को बनारस से चलती और सुबह में धनबाद पहुँचाती थी।


ट्रेन खूब स्पीड में चल रही है। एक चायवाला आया। पहले तो हमने लोकल ट्रेन का चायवाला समझकर मना कर दिया लेकिन श्रीमती जी के कहने पर बुलाया तो पता चला यह राजधानी एक्सप्रेस की मुफ्त सर्विस है, जिसका पैसा टिकट में लिया जा चुका है! एक ट्रे में दो कप गरम पानी, चाय /दूध /शुगर के छोटे-छोटे पैकेट/सबको अच्छे से मिलाने के लिए सीक और दो बिस्कुट भी! चाय पीने के बाद समझ में आया कि अपन लोकल ट्रेन में चलने वाला रोज का यात्री, रइसों के इन चोचलों को इतनी जल्दी कैसे समझ ले? हमको जब भी अकेले सफर करना पड़ा, हम यही सोचते कि कम पैसे में कैसे जांय? जब परिवार के साथ चले तो यह सोचते कि कम से कम कष्ट में कैसे ले जांय? मेरी ही नहीं शायद सभी मध्यम वर्गीय अकेले गृहस्थी चलाने वाले की यही सोच होती होगी। हम एक महीने की MST बनाते थे तो जितनी भी लेट हो, ट्रेन ही पकड़ते थे, 73 रूपया अतिरिक्त देकर बस से आना गवारा नहीं होता था।


कभी राजधानी एक्सप्रेस के कारण अपनी पैसिंजर किनारे लगा दी जाती और 30-30 मिनट रोक दी जाती तो मन ही मन राजधानी एक्सप्रेस को खूब कोसते, "कहाँ से आ गई यह इस समय!" आज इसी राजधानी एक्सप्रेस से सफर कर रहे हैं जिसके आसनसोल स्टेशन आने की घोषणा हो रही है अब अगला ठहराव हावड़ा ही है।

.......

दोस्ती

एक जिस्म में मजदूर और कवि दोनो साथ-साथ रहते। काम से लौटकर मजदूर घर आता, रोटी खाते-खाते उसे नींद आने लगती। कवि, मजदूर के बल पर दुनियाँ देखा करता। मजदूर की दर्द भरी दासतां सुनकर, नई कहानियाँ लिखा करता, घर आते ही दोनो साथ खाने पर बैठ जाते। इधर मजदूर का पेट भरता, उधर कवि की कविता की भूख जाग जाती! मजदूर पेट भर खा कर चैन की नींद सोना चाहता लेकिन कविता की भूख का मारा कवि उल्लू की तरह जाग कर मजदूर से अपनी नई कविता सुनने और आज के काम का दर्द बयान करने को कहता।


अमां यार! अभी तो बारह भी नहीं बजा, सुन लो! बड़ी अच्छी कविता है। मजदूर का बस चलता तो कवि की गरदन दबा देता लेकिन बिचारा क्या करता? अपनी गरदन कैसे दबाता? आखिर दोनो एक ही जिस्म में रहते थे।

.........

10.9.23

बनारसनामा

8 सितम्बर, 2123 को श्री कन्हैया लाल गुप्त स्मृति भवन, रथयात्रा, वाराणसी में स्वर्गीय घनश्याम गुप्त जी की 82वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर पर काशिका बोली में रचित उनकी छान्दसिक कृति 'बनारसनामा' का भव्य लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर गुरुदेव श्री जितेन्द्र नाथ मिश्र सहित बनारस के कई साहित्यकार, वरिष्ठ पत्रकार और गुप्त जी के परिवार के सदस्य उपस्थित थे। वरिष्ठ गीतकार श्री सुरेन्द्र वाजपेयी जी ने सभा का कुशल संचालन किया।

'बनारस नामा' का प्रकाशन अभिनयम प्रकाशन, वाराणसी द्वारा किया गया है। पुस्तक पृष्ठ, छपाई, और ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध है। मूलतः काशिका बोली में प्रकाशित इस कृति को पढ़कर बनारस के इतिहास को समझा जा सकता है। सरसरी तौर पर देखने मात्र से यह समझा जा सकता है कि पुस्तक काफी समृद्ध है और इसमें में तत्कालीन बनारस को जिया गया है।  लेखक बनारस के प्रसिद्ध मिष्टान्न भण्डार 'मधुर जलपान' के मालिक थे, इन दो पंक्तियों में उन्होंने बनारस की जो उपमा दी है, वह मुग्ध करने वाली है....

काशी कs दिल बहुत बड़ा हौ, इहाँ हौ पूरी दुनिया।

लगेला जैसे रस में डूबल इक दोनिया में बुनिया।।

कोई काम जब टल जाता है तो उसे हमेशा के लिए भुला दिए जाने की पूरी संभावना रहती है लेकिन मृत्यु के 23 वें वर्ष में उनकी पुस्तक का लोकार्पण यह बताता है कि यह बनारस के साहित्य प्रेमियों की और उनके परिवार की कितनी दबी इच्छा थी जो अब तक जीवित थी! पुस्तक घनश्याम गुप्त जी को विनम्र श्रद्धांजलि तो है ही, उनके प्रेमियों में मनुष्यता के जिन्दा रहने का प्रमाण भी है।


19.8.23

चार

घूमते-घूमते एक घने नीम के वृक्ष के नीचे पहुँचा। वैसे तो मैं जंगल में ही था और आसपास कई घने वृक्ष थे लेकिन यह थोड़ा अलग था। किसी ने शाखों को काट छांट कर बकायदा सीढ़ी का आकार दिया था, इससे ऊपर चढ़ना बहुत आसान था। मैं भी अपनी मानसिक उलझन में था, चढ़ता चला गया और ऊपर एक चौड़े शाख पर आराम से बैठकर सुस्ताने लगा। सफर कितना भी आसान हो, चढ़ाई तो चढ़ाई होती है।


बैठकर आसपास के दृष्यों का आनंद ले ही रहा था कि एक युवा कुल्हाड़ी लेकर धड़ल्ले से चढ़ता चला आया और सामने की शाख पर खड़े हो मुझे घूरने लगा! मैने भी उसे ध्यान से देखा।  हृष्ट पुष्ट, गेहूआं रंग, स्वस्थ शरीर, अवस्था 25-30 वर्ष। एक और खास बात थी, उसके हाथ, पैर, और सर में भी जगह-जगह गंदे कपड़े लपेटे हुए थे, कपड़ों में खून के धब्बे लगे थे और वह दर्द से कराह भी रहा था!

मैं कौतूहल से एक टक उसी को देखने लगा। उससे बड़ा नमूना मैने जिंदगी में कभी नहीं देखा था। उसे देख लग रहा था जैसे कालीदास का पुनर्जन्म हो गया है। इसने भी डाल के आगे की तरफ खड़े हो कर कुल्हाड़ी चलानी शुरू करी और हर वार पर जोर से चिल्लाता, "चार!" मुझसे रहा न गया, बोल पड़ा, 'पागल हो चुके हो क्या?' शाख कटेगी तो गिरोगे नहीं?

वह मेरी बात सुनकर जोर से ठहाके लगाने लगा, "जानता था, तुमसे बर्दाश्त नहीं होगा और ज्ञान बाँटने चले आओगे। मैं क्या बोल रहा हूँ इस पर भी ध्यान दो और उसने कुल्हाड़ी चलाते हुए चीखा..."चार!"

शाख कटकर गिरने ही वाली थी, इसी रफ्तार से कुल्हाड़ी चलाता रहा तो अगले दो, तीन वार में यह व्यक्ति शाख के साथ जमीन पर होगा! मैने घबड़ाकर कहा, "ठीक है, काट लेना, आत्महत्या करने का मन है तो तुम्हें कौन रोक सकता है? लेकिन मरने से पहले मेरी जिज्ञासा तो शांत कर दो, कृपया मुझे बताओ कि ऐसा क्यों कर रहे हो और यह "चार-चार" क्या बोले जा रहे हो?"

मेरे विनम्र आग्रह से वह थोड़ा प्रभावित हुआ और शाख काटना छोड़, धच्च से उसी डाल पर बैठ गया और ठहाके लगाते हुए बोलना शुरू किया, "चार -चार का मतलब यह चौथी बार है! वह देखो, तीन शाख काट कर पहले ही गिरा चुका हूँ! इन कपड़ों में जो खून लगा है, मेरे ही हैं और तुम मुझी को समझा रहे हो कि गिर जाओगे? मैं जानता हूँ, तुम अब और परेशान हो चुके होगे, पूछोगे, ऐसा क्यों कर रहे हो? हा हा हा हा... तुम भी करो तो तुम्हें भी इसके आनंद का ज्ञान होगा! जिस डाल पर बैठो, उसी को काटो और धड़ाम से गिर जाओ! जितनी चोट लगेगी, जितना दर्द होगा, उतना आनंद आएगा!

क्या बकते हो! इससे तो जान भी जा सकती है!!! तीन बार भाग्यशाली रहे तो जरूरी थोड़ी न है कि चौथी बार भी बच जाओगे?

हा हा हा हा... मर जाएंगे इससे ज्यादा कुछ नहीं न होगा? जब तक जिन्दा रहेंगे दर्द का आनंद लेंगे। होशोहवाश में अपनी डाल काटने का आनंद ही कुछ और है, कम से कम इसमें पता तो रहता है, गिरेंगे और चोट लगेगी। आजकल जिसे देखो वही अपने पैरों में कुल्हाड़ी चला रहा है, जिस डाल में बैठा है उसी को काट रहा है, गिरता है तो चिल्लाता है, धोखा -धोखा! मैं तो पूरे होश में काट रहा हूँ। चोट भी मुझे ही लगेगी, दर्द भी मुझे ही होगा, उनकी तरह शैतान तो नहीं हूँ न जो पूरा जंगल काट रहे हैं? तुम बताओ, क्या अब किसी नदी का जल पी सकते हो? हवा, पानी सब प्रदूषित हो चुका है, क्या यह जिस डाल में बैठे हैं उसे काटना नहीं हुआ? तुम जंगल में क्यों भटक रहे हो? अपने पैरों में कुल्हाड़ी तो तुमने भी मारी है, गिरे तो तुम भी हो, जंगल में नहीं गिरे तो घर में ही गिरे होगे? धोखा तो तुमने भी खाया है, तुम्हारा दर्द तुम्हें जीने नहीं दे रहा इसलिए जंगल में भटक रहे हो। मैं पूरे होश में यह काम कर रहा हूँ, कोई धोखा नहीं, आनंद ही आनंद। मैं मर गया तो यह कुल्हाड़ी तुम उठा लेना, मैं तो चला डाल काटने, "चार!"
....@देवेन्द्र पाण्डेय।

16.8.23

काव्य गोष्ठी

कल 15 अगस्त का दिन अत्यधिक व्यस्तता का रहा। सुबह 5 बजे घर से निकला तो रात 10 बजे वापस लौट पाया। सुबह नमो घाट और कुष्ठ आश्रम से लौटने के बाद दिन में राजकीय लाइब्रेरी ( एल टी कॉलेज, कचहरी) में भाई श्री कंचन सिंह परिहार जी और श्री प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी के कुशल संचालन में शानदार काव्य गोष्ठी सम्पन्न हुई जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि श्री महेन्द्र अलंकार जी ने किया। साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ठ योगदान के लिए 5 प्रतिभाओं को कर्मवीर पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया।

शाम को श्री अख़लाक़ 'भारतीय', श्री अलोक सिंह 'बेताब' एवं श्री विकास पाण्डेय 'विदिप्त' के कुशल संचालन में बरेका वाराणसी के सभागार में एक भव्य काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता कविताम्बरा के सम्पादक एवं वरिष्ठ कवि श्री मधुकर मिश्र जी ने किया।

वरिष्ठ गीतकार/गजलकार डॉ शरद श्रीवास्तव, श्री सुरेन्द्र मिश्र, श्री कुंवर सिंह कुंवर एवं श्री शमीम गाजीपुरी के साथ हमको भी दोनो काव्य गोष्ठीयों में भाग लेने का सौभाग्य मिला।

कल का दिन यादगार बनाने के लिए सभी साथियों का आभार।
















यूट्यूब लिंक....

https://youtu.be/u70PefZpzuo

23.5.23

सूरजमुखी के तोते

वैसे तो अमेरिका का देशज फूल है सूर्यमुखी का फूल लेकिन अब बहुत से देशों में पाया जाता है। अपने नाम को सार्थक करता हुआ यह हमेशा सूरज की ओर झुका-झुका, सूरज को देख, खिला-खिला दिखता है। इसके बीज तोतों को बेहद प्रिय हैं। इन्हीं बीजों को खाने के लिए ये प्रायः फूलों पर मंडराते दिख जाते हैं। 

धमेख स्तूप पार्क, सारनाथ के एक छोटे से जमीन के टुकड़े में इनके पौधे लगे हैं। प्रातः भ्रमण के समय, सूर्योदय के साथ इन पर मंडराते तोते दिखने लगते हैं। ये तोते घने नीम के वृक्षों के खोह में कहीं घोंसला बनाकर रहते हैं लेकिन सूर्योदय के साथ कभी स्तूप के ऊपर, कभी फूलों के ऊपर मंडराते दिख जाते हैं। प्रातः भ्रमण करते समय सूर्यमुखी के फूलों पर मंडराते तोतों को देखकर मुझे सरकारी कार्यालयों में बाबुओं के इर्द गिर्द चक्कर लगाने वाले लोग याद आ जाते हैं। अब ये तोते याद आए तो उल्लू  भी याद आने लगे!

सरकारी कार्यालयों में कई प्रकार के बाबू पाए जाते हैं। कुछ तो सूरजमुखी के फूलों की तरह खिले-खिले दिखते हैं। सूर्यमुखी के फूल तो सूरज की ओर झुके चले जाते हैं, ये अधिकारी को देख उनकी ओर खिंचे चले जाते हैं! अधिकारी के कमरों से निकलने के बाद ये और भी खिले-खिले नजर आते हैं! दूसरे प्रकार के वे होते हैं जिनको अधिकारी आते ही घंटी बजाकर अपने कमरे में बुलाता है और उन पर दिन भर के  काम का बोझा लाद देता है या पिछले बताए गए काम के बारे में पूछता है और काम को ठीक से न करने के लिए डांट पिलाता है। ये दुखियारे तो उल्लू की तरह अधिकारी के कमरे से बुझे-बुझे निकलते हैं। सूरज निकलने के बाद जैसे उल्लू बुझा-बुझा रहता है वैसे ही कुछ बाबू अधिकारी को देख मुर्झा जाते हैं।

हमारा ध्यान अभी उल्लुओं पर नहीं, सूर्यमुखी के फूलों की तरफ़ है। खिले-खिले फूलों की तरह खिले-खिले सरकारी बाबू सबको अच्छे लगते हैं। जैसे सूर्यमुखी के फूलों के बीज के लिए  सुबह-सुबह फूलों पर तोते मंडराने लगते हैं वैसे ही ऑफिस खुलते ही कुछ बाबुओं के इर्द गिर्द लोग जमा होना शुरू हो जाते हैं! जैसे कुछ बाबू सूर्यमुखी के फूलों की तरह खिले-खिले दिखते हैं वैसे ही इनके इर्द गिर्द मंडराने वाले लोग भी तोतों की तरह टांय-टांय करते रहते हैं। इन बाबुओं के पास भी सूर्यमुखी के बीजों की तरह कुछ चुंबकीय आकर्षण होता होगा जिसकी तलाश में ये लोग ऑफिस खुलते ही इनकी ओर मंडराने लगते हैं। 

उल्लुओं के पास कम लोग ही जाना पसंद करते हैं। सूर्योदय के साथ जैसे उल्लू बुझे-बुझे रहते हैं, अधिकारी के कमरे से निकलने के बाद कुछ बाबू एकदम से दुखी-दुखी दिखते हैं। अब जो पहले से मुरझाया हो, उसके पास कौन जाना चाहेगा? रात में उल्लू सुखी रहता है लेकिन दिन में किसी के आने की आहट से भी बेचैन हो जाता है। इसीलिए कुछ उल्लू रात में काम करते हैं, शायद इसी से खुश होकर लक्ष्मी ने इनको अपना वाहन बना रखा है। जिस पर लक्ष्मी की कृपा हो उस पर अधिकारी की शेर गुर्राहट का क्या भय!

सूरज का उगना, सूरजमुखी के फूलों का सूर्य की ओर आकर्षित होना, तोतों का बीजों के लोभ में सूर्यमुखी के फूलों के इर्द गिर्द मंडराना और बीज की तलाश में आए तोतों से अपना जिस्म नुचवाना, उल्लुओं का अंधेरे में देखना, दिन में अंधे होकर लक्ष्मी की आराधना करना शास्वत सत्य है। कार्यालय में कार्य करने की प्रवृत्ति, संसाधन बदल सकते हैं लेकिन उल्लू और सूरजमुखी के फूल तो हमेशा पाए जाएंगे। जब तक सूरजमुखी के फूल हैं, सूरजमुखी पर मंडराने वाले तोते भी दिखते रहेंगे। 

सूरजमुखी के फूलों को समझना चाहिए कि तोते उनके पास सिर्फ इसलिए आते हैं कि उन्हें उनसे नहीं, उनके बीजों से प्रेम है। बीजों का खत्म होना मतलब समूल नष्ट हो जाना। अधिकारियों को देखकर खिलें मगर हमेशा यह याद रहे कि ये तोते उनके मित्र नहीं हैं।

https://youtu.be/Olkq4om9un8