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28.9.23

दोस्ती

एक जिस्म में मजदूर और कवि दोनो साथ-साथ रहते। काम से लौटकर मजदूर घर आता, रोटी खाते-खाते उसे नींद आने लगती। कवि, मजदूर के बल पर दुनियाँ देखा करता। मजदूर की दर्द भरी दासतां सुनकर, नई कहानियाँ लिखा करता, घर आते ही दोनो साथ खाने पर बैठ जाते। इधर मजदूर का पेट भरता, उधर कवि की कविता की भूख जाग जाती! मजदूर पेट भर खा कर चैन की नींद सोना चाहता लेकिन कविता की भूख का मारा कवि उल्लू की तरह जाग कर मजदूर से अपनी नई कविता सुनने और आज के काम का दर्द बयान करने को कहता।


अमां यार! अभी तो बारह भी नहीं बजा, सुन लो! बड़ी अच्छी कविता है। मजदूर का बस चलता तो कवि की गरदन दबा देता लेकिन बिचारा क्या करता? अपनी गरदन कैसे दबाता? आखिर दोनो एक ही जिस्म में रहते थे।

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22.4.23

सोने के सिक्के

जहां वह खड़ा था वहां दूर-दूर तक, जिधर निगाह जाती, मिट्टी गीली थी। हल्की-फुल्की जमीन धंस भी रही थी लेकिन कहीं दलदल नहीं दिखा। आराम-आराम से धंसते-उठते चल पा रहा था। एक नया अनुभव था, रोमांच हो रहा था! जब चलना प्रारंभ किया, शुरू शुरू में डर लगने लगा लेकिन अब कोई भय नहीं था, उल्टे मजा आ रहा था।


एक स्थान पर मिट्टी से सने कुछ सिक्के दिखाई दिए, लपक कर उठा लिया और रूमाल निकाल कर मिट्टी पोंछने लगा। मिट्टी गीली थी, सिक्के जल्दी ही चमकने लगे। सिक्के देखकर मन ही मन खुशी से चीख पड़ा,"अरे! ये तो सोने के हैं!!!" 


लालची मनुष्य! इतने से संतुष्ट नहीं हुआ। चारों तरफ निगाह दौड़ाने लगा, 'शायद कहीं कुछ और हों!' चलते-चलते आखिर एक स्थान पर कुछ सिक्के और मिल गए, वे भी सोने के थे!! अब लालच और बढ़ गया। अनुमान लगाने लगा, 'यह पूरा इलाका ही सोने के सिक्कों से भरा होगा, मिट्टी गीली है इसलिए नहीं दिख रहा!"


अब वह चलते-चलते, सिक्के बीनते-बीनते पूरी तरह थककर चूर हो चुका था। उसके दोनो जेब सोने के सिक्कों से भर चुके थे। गीली मिट्टी की कोई सीमा नहीं दिख रही थी! अभी भी जहां तक दृष्टि जाती, मिट्टी ही मिट्टी! अब तो उसे यह भी याद नहीं रहा कि उसने कहां से चलना शुरू किया था? पलटकर पीछे देखता, दाएं देखता, बाएं देखता, जिधर देखता गीली/ धंसती मिट्टी ही मिट्टी! 


धंसते-उठते पैरों ने अब चलने से इनकार करना शुरू कर दिया था। जब थोड़ा रुकता, थोड़ा और धंसने लगता, जल्दी से वापस पैर खींच कर भागने लगता, अब रोमांच, लालच सब खतम हो चुका था। मेहनत से बीने सिक्के भी बोझ लगने लगे थे! अब उसे सिर्फ भूख और जान बचाने की चिंता थी। 


सोने के सिक्के हाथों से छूटकर वापस मिट्टी में मिलने लगे! सिक्के क्या, अब तो वह भी मिट्टी में धंसने लगा!!तभी अचानक चमत्कार हुआ। लंबी गरदन, बड़ी चोंच और पूरी तरह मिट्टी से सने 8 पैरों वाला एक पंछी सामने आया और पूछने लगा, "सोना चाहिए या अभी और जीना चाहते हो?" रोते हुए उसके मुख से एक ही वाक्य निकला, "मुझे बचाओ! लंबी गरदन वाले पंछी ने दया दिखाई, उसे अपनी चोंच से पकड़ कर पीठ में बिठाया और पलक झपकते ही उड़ चला। 


आदमी की नींद खुली तो उसने अपने आपको गंगा किनारे गीली मिट्टी में पड़ा पाया। यहां सोने के सिक्के नहीं थे लेकिन सामने रेत पर ककड़ी/खरबूजे/ तरबूजे बिखरे पड़े थे जो सोने के सिक्कों से अधिक अच्छे लग रहे थे और यहां की मिट्टी भी नहीं धंस रही थी! सामने मेहनती पुरुष और महिलाएं खेतों में काम कर रही थीं। 

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3.12.22

तस्वीर

    शाम का समय था, श्मशान घाट में एक चिता जल रही थी। चिते के पास लगभग 70 वर्षीय बुजुर्ग के सिवा दूर-दूर तक कोई न था। कृषकाय बुजुर्ग, दोनों हाथों से अपने पिचके  गालों को दबाए, फटी आँखों से जलती चिता को, एक टक देख रहे थे। पूछने पर पता चला जिसकी चिता जल रही है, वह और कोई नहीं, उसकी पत्नी थीं। पूरा दृश्य अपनी कहानी खुद कह रहा था, कुछ कहने/बताने की जरूरत न थी। चिता की आँच में चुपचाप दर्द और प्यार की एक सरिता बह रही थी। 

     बहुत चाहा, एक तस्वीर खींच लूँ, किसी उपन्यास पर भारी पड़ेगी यह तस्वीर। हाय! सोचता ही रह गया, देखता ही रह गया। खयालों में ऐसा खोया कि होश तब आया जब सब कुछ ठंडा पड़ चुका था। चिता ठंडी पड़ चुकी थी, वृद्ध जा चुके थे, बस एक वाक्य शेष था, 'राम नाम सत्य है।'

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5.11.22

कच्छा बनियाइन

 
भोर के अजोर से पहले दौड़ रहे प्रातः भ्रमण करने वालों की भीड़ में एक 'कच्छा बनियाइन' वाला भी था। मैंने पूछा,"कौन हो? कहाँ रहते हो?"

वह बोला,"यही तो मैं जानना चाहता हूँ, ये मॉर्निंग वाकर्स कौन हैं? कहाँ रहते हैं? कब आते हैं? और कब वापस जाते हैं? अच्छा बताइए! आप कहाँ रहते हैं?|

मैं थोड़ा डर गया। कहीं सही में यह  कच्छा बनियाइन गिरोह का सदस्य तो नहीं! 

मैन हिम्मत करके पूछा,"जानकर क्या करोगे भाई? 

उसने हँसते हुए कहा, "आराम रहेगा, धंधा बढ़िया चलेगा।"
 
मैं और डर गया, "धंधा!!! करते क्या हो?"

उधर रेलवे क्रासिंग के पार रहता हूँ। वो सामने मकान है न? उसी के बगल में जाना है। घर में कोई पुरुष नहीं है। अकेली महिला है। सोचा, वहीं हाथ साफ़ करूँ! उनके टँकी में पानी नहीं चढ़ रहा। सुबह-सुबह पानी न मिले तो पखाना/नहाना भी रुक सकता है। क्या करूँ! अपना धंधा ही ऐसा है। घबराइए नहीं भाई साहेब! मैं प्लम्बर हूँ। 
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3.11.22

डेंगू 2

एक डेंगू मच्छर बहुत परेशान था। सार्वजनिक शौचालयों में साफ सफाई के लिए तेजाब का छिड़काव हो रहा था। अपनी जान बचाने के लिए उसे बगल की गली के किनारे धरे एक प्लास्टिक के डिब्बे के साफ पानी की शरण लेनी पड़ी। 


मनुष्यों का खून मिलने की संभावना यहाँ भी थी। सभी भद्र पुरुष मूत्र त्याग करने के लिए शौचालयों में जाना पसंद नहीं करते। उनका मानना है कि सार्वजनिक शौचालयों में बहुत गंदगी/मच्छर रहते हैं। वे गली के किनारे किसी ऐसे साफ जगह की तलाश करते हैं जो सार्वजनिक शौचालयों से साफ हो। डेंगू मच्छर ऐसे ही किसी भद्र पुरुष की तलाश में था लेकिन यहाँ अब तक जितने भी आए सब जीन्स का पैंट और मोजा-जूता पहने हुए आए। उनके मुँह खुले थे लेकिन डेंगू मच्छर, चेहरे की ऊँचाई तक नहीं पहुँच पा रहा था।


कैसे काटूँ? यह सोच ही रहा था, एक भद्रपुरुष दिख गया लेकिन यह भी मोटे जीन्स का पैंट, मोजा-जूता और तो और हाथों में दस्ताने भी पहने हुए था। इस बार मच्छर से सहन नहीं हुआ! भद्र पुरूष ने जैसे ही पेशाब करना शुरू किया उसने हिम्मत कर के, उसी स्थान को लक्ष्य बनाकर काट ही लिया! मनुष्य को थोड़ी चुभन हुई लेकिन बिना कुछ समझे, चेन बन्द कर, खुजाता हुआ आगे बढ़ गया। इस तरह डेंगू मच्छर की प्यास बुझी। 

...@देवेन्द्र पाण्डेय।

डेंगू

भोला को डेंगू हुआ। ठीक भी हो गया लेकिन यह पता नहीं चला कि आखिर डेंगू का मच्छर था तो कहाँ था? दफ्तर में खोज हुई, घर में खोज हुई लेकिन कहीं भी डेंगू मच्छर के संकेत नहीं मिले। कुछ दिन बाद उसके साथ, एक ही कमरे में काम करने वाले सहकर्मी की पत्नी को भी डेंगू हो गया! अब साथियों के मन में नई शंका ने जन्म लिया। मच्छर उसके घर में था तो भोला को डेंगू क्यों हो गया!!! ☺️

6.10.22

दड़बा


एक दड़बा था जिसमें निर्धारित संख्या में कबूतर रोज आते/जाते थे। कबूतर न सफेद थे न काले, श्वेत से श्याम होने की प्रक्रिया में मानवीय रंग में पूरी तरह रंग चुके थे। कबूतरों के दड़बे में आने का समय तो निर्धारित था मगर जाने का कोई निश्चित समय नहीं था। दड़बे में रोज आना और अनिश्चित समय तक खुद को गुलाम बना लेना कबूतरों की मजबूरी थी।  उनको अपने और अपने बच्चों के लिए दाना-पानी यहीं से मिलता था। 


यूँ तो देश के कानून ने आने के साथ जाने का समय भी निर्धारित कर रखा था लेकिन जिस शहर के मकान में वह दड़बा था उस जिले में राजा ने कबूतरों को नियंत्रित करने और देश हित के कार्यों के लिए जिस बहेलिए की तैनाती कर रखी थी उसे देर शाम तक कबूतरों के पर कतरते रहने में बड़ा मजा आता था। इसका मानना था कि पर कतरना छोड़ दें तो बदमाश कबूतर हवा में उड़ कर बेअन्दाज हो जाएंगे!  


कबूतर भी जुल्म सहने के आदी हो चुके थे। बहेलिए जब किसी एक कबूतर को हांक लगाता, सभी हँसते हुए आपस में गुटर गूँ करते...'आज तो इसके पर इतने काटे जाएंगे कि फिर कभी उड़ने का नाम ही नहीं लेगा!' थोड़ी देर में पर कटा कबूतर तमतमाया, रुआंसा चेहरा लिए गधे की तरह रेंगते हुए  साथियों के बीच आता और मालिक को जी भर कर कोसता। यह साथी कबूतरों के लिए सबसे आनन्द के पल होते मगर परोक्ष में ऐसा प्रदर्शित करते कि उन्हें भी बेहद कष्ट है!


ऐसा नहीं कि बहेलिया सभी के प्रति आक्रामक था। दड़बे में झांकने वाले कौओं, गिलहरियों, लोमड़ियों, चूहे-बिल्लियों, भेड़ियों या शेर को देखकर गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर था। किसी को डाँटता, किसी को पुचकारता और किसी किसी के आगे तो पूरा दड़बा ही खोल कर समर्पित हो जाता!


एक दिन उद्यान से भटक कर अपने घोसले को ढूँढता, उड़ता-उड़ता एक नया कबूतर दड़बे में आ फँसा! नए कबूतर को देख बहेलिए की बाँछें खिल गईं..'यह तो तगड़ा है! अधिक काम करेगा।' जैसा कि बहेलिए की आदत होती है वे अपने जाल में फँसे नए कबूतरों का तत्काल पर कतर कर खूब दाना चुगाते हैं ताकि वे नए दड़बे को पहचान लें और इसे ही अपना घर समझें। वह भी नए कबूतर पर मेहरबान हो गया। पुराने कबूतर का चारा भी नए कबूतर को मिलने लगा। साथी कबूतर शंका कि नजरों से गुटर गूँ करने लगे..'कहीं मेरा भी चारा यही न हड़प ले!'


नया कबूतर जवान तो न था लेकिन खूब हृष्ट-पुष्ट था।दड़बे में जिस स्थान को उसने बैठने के लिए चुना वह एक युवा कबूतर का ठिकाना था। संयोग से जब नया कबूतर उद्यान से उड़कर आया, वह एक लंबी उड़ान पर था। लम्बी उड़ान से लौट कर जब युवा कबूतर दड़बे में वापस आया  तो उसने अपने स्थान पर नए कबूतर को बैठा हुआ पाया! आते ही उसने नए पर गहरी चोंच मारी। बड़ा है तो क्या ? मेरे स्थान पर बैठेगा? झगड़ा बढ़ता इससे पहले ही साथियों ने बीच बचाव किया और मामला रफा-दफा हो गया। सब समझ चुके थे कि अब यह भी हमारी तरह रोज यहीं रहेगा। नया कबूतर, जो पहले दड़बे में आ कर खूब खुश था, जल्दी ही समझ गया कि मैं गलत जगह आ फँसा हूँ। यह तो एक कैद खाना है! बात-बात में बड़बड़ाता..कहाँ फँसायो राम! अब देश कैसे चलेगा!!!


बहेलिए ने कबूतरों की पल-पल की गतिविधियों की जानकारी के लिए एक #काका_कौआ पाल रखा था। काका कौआ भी मानवीय रंग-ढंग में रंगे कबूतरों के बीच रहते-रहते अपनी धवलता खो कर काला हो चुका था। यूँ तो वह दड़बे की देखभाल के लिए नियुक्त प्रधान सेवक था लेकिन अपने मालिक का आशीर्वाद पा कर हँसमुख और मेहनती होने के साथ-साथ बड़बोला भी हो चुका था। कभी-कभी उसकी बातें कबूतरों को जहर की तरह लगतीं। शायद यही कारण था कि जब काम लेना होता तो सभी कबूतर उसे #काका बुलाते और जब कोसना होता #कौआ कहते! उसका काम था मालिक के आदेश पर कबूतर को दड़बे से निकाल कर उन तक पहुंचाना। जब तक कबूतर ठुनकते, मुनकते हुए मालिक के कमरे तक स्वयं चलकर न पहुँच जाते वह लगातार चीखता-चिल्लाता रहता। न उठने पर हड़काता और मालिक से शिकायत करने की धमकी देता। मरता क्या न करता! काका कौआ को 'कौआ कहीं का!' कहते हुए कबूतर दड़बे से निकल कर मालिक के दड़बे तक जाते। काका कौआ उन्हें हँसते हुए जाते देखता और पीछे से कोई तंज कसते हुए खिलखिलाने लगता। मालिक ने पर नहीं कतरे, सिर्फ धमकी दे कर छोड़ दिया तो वह उड़कर काका को ढूंगता हुआ वापस दड़बे में घुस कर, साथियों के ताल से ताल मिलाकर गुटर गूँ करने लगता।


जैसे सरकारी सेवा में काम करने की एक निश्चित उम्र हुआ करती है वैसे ही यहाँ के कबूतर भी एक उम्र के बाद मुक्त कर दिए जाते थे। उस दिन एक बूढ़े हो चले कबूतर की विदाई थी। साथियों ने धूमधाम से विदाई समारोह मनाया।  विदाई के समय बहेलिए ने भी उसकी लंबी सेवा की सराहना तो खूब करी लेकिन उसके जाने के बाद उसकी गलतियों के दंड स्वरूप उसके द्वारा सेवा काल में बचाए अन्न की गठरी का कुछ भाग जब्त कर लिया और दूसरे कबूतरों से उसके घर खबर भिजवा कर आतंकित करता रहा कि क्यों न तुम्हारे अपराधों के लिए तुम्हें एक काली कोठरी में बंद कर दिया जाय? यह सब देख दड़बे के कबूतर दिन-दिन और भी भयाक्रांत रहने लगे।


सुबह से दड़बे में गुटर-गूँ, गुटर गूँ का स्वर मुखर है। आज सभी कबूतर बहुत खुश हैं। दशहरे की लम्बी छुट्टी हो रही है। सभी को छुट्टी से पहले दाने की मोटी गठरी मिलने वाली है। उद्यान वाले ने तो छुट्टियों में परिवार सहित लम्बी उड़ान पर जाने का निश्चय कर लिया है। दूसरा कबूतर भी दूसरे राज्य में अपने पुराने मित्रों से मिलने जा रहा है। अधिकांश का कहना है हम तो त्योहार अपनी कबूतरी और बच्चों के साथ मनाएंगे। सभी के अपने-अपने हौसले, अपने-अपने सपने हैं। आजादी कितनी प्यारी होती है! 

(काल्पनिक कथा)

29.5.22

आधी रोटी चोर!

बनारस की एक गली में चीखते-चिल्लाते लड़कों का एक झुण्ड करीब आ रहा था। आगे-आगे एक विक्षिप्त बुढ़िया भागे जा रही थी। लड़के पास आते तो वह जमीन से उठाकर झुण्ड की ओर एक पत्थर फेंकती, लड़के बचते हुए जोर से चीखते...आधी रोटी चोर!!! 
गली से गुजर रहा कोई आदमी लड़कों को डांट कर भगाता, "क्यों परेशान कर हो?" लड़के इधर-उधर गली में बिखर जाते। बुढ़िया संभलती, आदमी को हाथ जोड़ती (शायद शुक्रिया अदा करने का उसका यही अंदाज हो), वहीं एक चबूतरे में थक कर बैठ जाती। पोटली से रोटी निकालकर खाती। ऐसा महीने में कई बार होता! 
एक दिन मैने एक सरदार से पूछ ही लिया, "कौन है यह?"
सरदार बोला, "पागल है, इसका कोई नहीं है। वर्षों पहले गंगा घाट में कहीं से आ गई थी। जब आई थी, जवान थी। पूछने पर कुछ नहीं बता पायी। गली/घाट में कहीं पड़ी रहती। घरों में बरतन साफकर कर अपना गुजारा करती। एक बार गर्भवती हुई! लोगों ने इसको खूब गालियाँ दी। बुरा/भला सब कहा। कोई इसे घर में बुलाने को तैयार नहीं हुआ। गोद में एक बच्चा भी आ गया लेकिन टिका नहीं। बच्चा मर गया तब इसका मानसिक संतुलन और भी बिगड़ गया। लड़के यह सब नहीं जानते, इसको परेशान करने में उनको मजा मिलता है। समय बीतता गया, ऐसे ही मांगते-खाते बूढ़ी हो गई। आप परेशान मत होइए, ऐसे ही मर जाएगी एक दिन।
मैं दुखी होकर घाट की सीढ़ियाँ उतरने लगा। तट पर घण्टों बैठा माँ गंगा से एक प्रश्न पूछता रहा..परेशान होने के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? ऐसा लगा जैसे माँ मुझ पर ही हँस रही हों! कह रही हों,"तुम जानो, तुम्हारा समाज जाने, मुझे  क्यों माँ कहते हो? लड़की की यह हालत क्यों है? इसका उत्तर तो तुम्हें ही देना होगा।
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25.5.22

साधू

एक बार यमराज को कुम्भ मेले में त्रिवेणी दर्शन का मोह जगा। प्रयागराज में गंगा नदी के तट पर एक कुटिया बनाकर रहने लगे। बगल की कुटिया में एक स्वनामधन्य, पहुँचे हुए साधू रहते थे। एक दिन स्नान करते वक्त यमराज जी से पूछ बैठे...

क्या नाम?

यमराज!

साधू नाराज हो गए, क्रोध से बोले, "मूर्ख! मुझसे मजाक करता है!!!" यमराज जी ने विनम्रता पूर्वक कहा, "नहीं महाराज, मजाक क्यों करूँगा? मैं यमराज हूँ, कुम्भ में गंगा स्नान की इच्छा हुई तो साधूभेष बनाकर चला आया।" साधू और भी नाराज, "यमराज हो तो अपना असली रूप दिखाओ।"

'नहीं महाराज। असलीरूप तो तभी दिखाऊंगा जब आपको ले जाना होगा। प्रतीक्षा कीजिए, अभी आपका समय नहीं आया है, समय आने पर देख लीजिएगा।'

अब साधू को चैन कहाँ! परोक्ष में एक ही शब्द जोर से बोले,'मूर्ख!' और चुप लगाकर चले गए लेकिन भीतर तक क्रोध से काँप गए।

उन्हें यकीन ही नहीं था कि यमराज ऐसा भी हो सकता है। अपने चेलों को भेजकर तरह-तरह से यमराज को परेशान करने लगे। इधर यमराज का मन धार्मिकता में पूरी तरह से डूबा हुआ था। गमछा गायब हो जाए, मेहनत से बनाया खाना गायब हो जाय, आँख खुलने पर कुटिया गन्दगी से भरी पड़ी हो, कोई फर्क नहीं। कुटिया की सफाई करते, स्नान करते, ध्यान लगाते और खाना न मिलने पर भूखे ही सो जाते। 

उधर साधू ने समझा कि अब तो बुद्धि सही हो गई होगी, एक दिन फिर पूछा, "क्या नाम है तुम्हारा, अब तो अपना असली नाम बता दो?
सुनकर यमराज मुस्कुरा दिए, "जब हम तुमको लेने आएंगे तभी याद होगा कि हम कौन हैं, उससे पहले न स्मरण रहेगा न विश्वास होगा। जो दिन बचे हैं, अनासक्त हो, प्रभु भजन में बिताओ। मुझे तो तुम भी साधू भेषधारी सांसारिक प्राणी लगते हो।"

अब साधू गुस्से से पागल हो गया। इसी पागलपन में भाँग के साथ ढेर सारा धतूरा पीसकर निगल गया। ऐसा बीमार पड़ा कि चेलों ने बहुत इलाज करवाया लेकिन डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। मृत्यु निकट आई तो उसे लेने यमराज द्वार पर आए। यमराज को देखकर साधू के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान खिल गई, कांपते हुए अपने चेलों से कहने लगा," देखो!यमराज ऐसा होता है, वह दुष्ट कह रहा था, हम यमराज हैं। जाओ! बगल की कुटिया से उसे पकड़ कर ले आओ।" यमराज से बोला, "महाराज! मैं चलने को तैयार हूं लेकिन उसे भी साथ ले चलिए।" 

चेलों ने बगल की कुटिया छान मारी, अपने को यमराज कहने वाले साधू का कहीं पता नहीं था। खाली हाथ लौटकर बोले," महाराज! वहाँ तो कोई नहीं है!!! इतने में यमराज हँसकर बोले, 'मैं यहाँ हूँ महाराज, आपके कारण मुझे साधू भेष का त्याग करना पड़ा और कुंभ का आनन्द भी नहीं ले पाया। चलिए, चला जाय। सुना था, आप त्रिकालदर्शी हैं, इसीलिए आप से झूठ नहीं बोल पाया।" 

सुनते ही साधू के प्राण निकल गए, यमराज भी कुटिया से गायब हो गया, चेलों को कुछ भी समझ में नहीं आया। न उन्होंने यमराज को देखा न यमराज से हुई अपने 'साधू महाराज' की बात सुनी। उन्हें बस यह लगा कि हमारे 'महाराज' के मरने में, बगल वाले कुटिया में रहने वाले 'साधू' का कोई हाथ है। 
....@देवेन्द्र पाण्डेय।

19.5.22

घड़ा

पीपल के पेड़ पर माटी के कलश लटके होते हैं। माना जाता है कि मरने के बाद आदमी 12 दिनों तक प्रेत योनि में भटकता है, तेरहवें दिन श्राद्ध हो जाने के बाद वह पितरों की श्रेणी में शामिल हो जाता है। 12 दिनों तक मृत आत्माओं को पानी देने के लिए माटी के कलश, पीपल के शाखों पर बांध देते हैं और मृतात्मा के लिए पुत्र/वारिश रोज सुबह/शाम घट में जल भरता रहता है। 


हम काशी की गलियों में बसे एक मोहल्ले ब्रह्माघाट में रहते थे। घाट से गंगा की सीढ़ियाँ उतरते समय बायीं तरफ आज भी पीपल का एक विशाल वृक्ष है जिसमें माटी के घट लटके होते हैं। हम लड़के, किशोरावस्था में घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते/उतरते बड़े ध्यान से इन घटों को देखते रहते थे। कोई कहता,"पीपल का पेड़ है, इसमें भूत रहते हैं।" हम शुरू से ही भूत/प्रेत पर विश्वास नहीं करते थे तो इन तर्कों को शुरू से खारिज कर देते थे। बात ही बात में किसी ने बाजी लगा दी,"रात को 12 बजे यहाँ आकर दिखाओ तो माने कि भूत नहीं होते!" हम कहाँ हारने वाले थे! उत्साह में बोल दिए,"आएंगे क्या, एक घट भी उतार लाएँगे, तुम लोगों को विश्वास हो जाय कि हम आए थे। तुम लोग दूर चबूतरे पर बैठे रहना।" 


वो किशोरावस्था की शैतानियों के दिन थे। बात आई/गई हो गई लेकिन जब भी मित्रों को मौका मिलता, चिढ़ाने से नहीं चूकते,"पाण्डेय! घण्टा कब उतारोगे?" हम सुनकर कट के रह जाते और मौके की तलाश करते। एक दिन मौका मिल ही गया।


गलियों में 'नूतन बालक समिति' की ओर से 'गणेश विद्या मंदिर' स्कूल (जो ब्रह्माघाट से थोड़ी दूर घासी टोला मुहल्ले में स्थित था) और मोहल्ले के ही एक विशाल भवन जो 'आंग्रे का बाड़ा'  के नाम से प्रसिद्ध था, में धूमधाम से गणेश जी की प्रतिमा स्थापित होती और कई दिनों तक भांति-भांति के सांस्कृतिक समारोह आयोजित होते थे। इन्ही समारोहों में एक दिन बड़े पर्दे पर फिल्म भी दिखाई जाती। हम किशोर, भले दूसरे आयोजनों में न जांय, फिल्म देखने जरूर जाते।  


उस दिन आंग्रे के बाड़े में शाम को एक फ़िल्म दिखलाई जाने वाली थी। उन दिनों जब टीवी नहीं थी, हम किशोरों के लिए यह एक बहुत बड़ा आयोजन था। वह कौन सी फ़िल्म थी, याद नहीं लेकिन फ़िल्म थी, यही बहुत था। सभी मित्र फिल्म देखने के लिए जमा हुए थे और घरों से भी गणेशजी के नाम पर समारोह में जाने की पूरी छूट थी। 


फिल्म रात 12 बजे के आसपास समाप्त हुई और हम शोर करते हुए घर जाने के लिए बाहर चबूतरे पर जमा हुए। तभी मैने मौका ताड़ा और घोषणा कर दी, "हम पीपल के पेड़ से घण्ट उतारने जा रहे हैं, तुम लोग यहीं बैठो, 5 मिनट में आ रहे हैं।" सभी मित्र अवाक हो, मेरा चेहरा देखने लगे! और चीखने लगे,"पागल हो गए हो क्या? पीपल के पेड़ पर भूत रहते हैं।" मैने हँसते हुए कहा, "कोई भूत नहीं रहता, चिंता मत करो, अभी आ रहे हैं।"


हम दौड़ते हुए घाट की सीढ़ियाँ उतर गए। पीपल के पेंड़ के पास पहुँचकर, ठिठक कर खड़े हो गए। घट तो बहुत ऊँचाई पर हैं, कैसे उतारें? सोचते-सोचते कोई उपाय नजर नहीं आया। घट वाकई मेरी ऊँचाई से बहुत ऊपर थे! आस पास कोई नहीं था, जो मदद करे। कोई होता भी तो ऐसे कामों में क्यों मदद करता? मारकर भगा देता। तभी नीचे जड़ों के पास एक खाली घड़ा दिखाई दिया! मुझे मन माँगी मुराद मिल गई। घड़ा उठाया और भाग कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। चबूतरे के पास पहुँचे तो यह क्या! मेरे सभी मित्र कहाँ गए? मैं घड़ा वहीं चबूतरे पर रखकर आवाज जोर-जोर से आवाजें लगाने लगा, "कहाँ हो? देखो! घड़ा ले आए। कोई है?" हारकर वहीं चबूतरे पर बैठ गए। सोचने लगे, "सभी डरपोक हैं, चलो!  घड़ा घर ले चलते हैं, कल दिखाएंगे।" घड़ा उठाने के लिए ज्यों ही मुड़े, वहाँ कोई घड़ा नहीं था! डर के मारे मेरी घिघ्घी बंध गई। अरे! यहीं तो रक्खा था, घड़ा कहाँ गया?



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14.5.22

इत्र की शीशियाँ

वर्षों पहले की बात है। तब टीवी, मोबाइल नहीं था, भारत को आजाद हुए दो दशक ही बीते थे। चेतगंज में घर था, कोई रिक्शा नहीं मिला तो हम दो भाई बनारस कैंट स्टेशन से इंग्लिशिया लाइन की तरफ पैदल ही जा रहे थे। रात के 11 बज चुके थे। खुशगवार बसन्त का मौसम था। रात होने के कारण सड़क पर भीड़ कम थी। चलते-चलते आगे दूसरी पटरी पर एक पुलिया दिखी। पुलिया पर एक आदमी झक्क सुफेद कुर्ता पैजामा पहने हुए बैठा था। सर पर सुफेद टोपी, पांवों में नक्काशीदार चप्पल। उसने हमे जाते हुए देखा तो इशारे से अपनी ओर बुलाया...


इतनी रात को कहाँ जा रहे हो? 

घर जा रहे हैं। 

पैदल क्यों जा रहे हो?

क्या करते, कोई रिक्शा ही नहीं मिला?

रिक्शा तुम्हारे पीछे ही तो खड़ा है! जाओ, बैठ जाओ।

हम लोग अवाक हो कर देखने लगे, एक रिक्शा पीछे ही खड़ा था और बैठने का इशारा भी कर रहा था!

हम पलटकर रिक्शे पर बैठने जाने लगे तो उस आदमी ने कहा..

सुनो! तुम्हारी जेब में इत्र की शीशियाँ हैं, निकालो, लगाया जाय।

हम दोनो आश्चर्य से एक दूसरे का मुँह देखने लगे! इसे कैसे पता चला कि हमारे पास इत्र की शीशियाँ हैं? खैर...एक छोटी शीशी निकाली और उसे दे दिया। उसने बड़े प्रेम से अपने हाथ- मुँह में लगाया और खूब तारीफ करी। हम रिक्शे पर बैठकर पुलिया पर बैठे हुए आदमी को देखने लगे तो आदमी गायब! अब उसी आदमी के बारे में सोचने लगे। दिमाग में यही प्रश्न गूंज रहा था...वह आदमी कहाँ गया? उसे कैसे पता चला कि जेब में इत्र  की शीशियाँ हैं? इतने में रिक्शा चेतगंज आ गया।


रात के 12 बज रहे थे। रिक्शे से उतरने के बाद रिक्शेवाले को देने के लिए फुटकर पैसे नहीं थे तो सोचा एक बीड़ा पान जमाया जाय, फुटकर भी हो जाएगा। वहीं एक पान की दुकान खुली थी। हम दोनों ने एक-एक बीड़ा पान जमाया और रिक्शेवाले को पैसा देने के लिए पलटे तो देखते क्या हैं कि रिक्शावाला गायब! दूर-दूर तक देखे तो रिक्शेवाला कहीं नजर नहीं आया।


हम आश्चर्य करते हुए घर जाने के लिए गली में मुड़े तो अँधरे में एक चबूतरे पर सुफेद कुर्ते-पैजामे वाला वही आदमी बैठा हुआ था। हमें देखते ही चहका..अमा यार! बड़ी जल्दी आ गए!!! तुम्हारे जेब में तो इत्र की और भी शीशियाँ हैं, एक और देना जरा। हम स्तब्ध हो उसे देखने लगे, उसके बगल में एक सफेद घोड़ा भी खड़ा था।

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7.5.22

हाथ

 एक दिन दाएं हाथ ने चुपके से एक मुसीबत के मारे की मदद कर दी। बाएं हाथ को पता चल गया लेकिन कुछ न बोला। एक दिन बाएं हाथ ने भी एक मुसीबत के मारे की मदद कर दी। दाएं को भी पता चल गया लेकिन कुछ न बोला। दुर्भाग्य से दोनो हाथों का मालिक मुसीबत में पड़ गया। उसने ईश्वर से प्रार्थना करी... हे प्रभु! मुझे ठीक कर दो। ईश्वर ने उसकी पुकार झट से सुन ली। उसने दोनो हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दिया। इस बार दोनो हाथ एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

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2.6.21

तीन तोते


बहुत दिनों बाद शहर घूम कर लौटे थे तीन तोते। सभी ने अपना-अपना हाल सुनाया। एक नए कहा....


मैं जिस घर की छत पर बैठा था, वहाँ एक पिंजड़ा देखा

जिसमें हमारा एक भाई कैद था।


मुझे देख, पिंजड़े की दीवारों में चोंच मारने और फड़फड़ाने लगा। मुझे लगा वह आजादी के लिए तड़प रहा है। मुझे दया आई, हाल पूछा तो जानते हो उसने क्या कहा? 


शेष दोनो तोते अचरज से पूछ बैठे...क्या कहा? क्या कहा?


वह बड़े शान से मनुष्यों की बोली बोलने लगा...


"गोपी कृष्ण कहो बेटू, गोपी कृष्ण!"


और? और क्या कहा?


उसे अपने ज्ञान का बड़ा घमंड था। कह रहा था...


सुने? हम मनुष्यों की बोली बोल सकते हैं....

"गोपी कृष्ण कहो बेटू, गोपी कृष्ण।"


मैने पूछा...इसका क्या अर्थ हुआ? तो कहने लगा...


अर्थ तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन यह बड़े कमाल की बात है! मैं जब यह बोलता हूँ, घर का मालिक खुश हो कर मुझे हरे चने खिलाता है! मेरी बड़ी इज्जत करता है।


मैन पूछा...

तुम्हें पिंजड़े में कैद कर के रखा है, इसकी कोई तकलीफ नहीं है?


वह बोला..शुरू-शुरू में तकलीफ हुई थी लेकिन अब मजा आ रहा है। आजकल मैं कुछ नया सीख रहा हूँ। जब कोई घर में आता है जोर से बोलता हूँ..जय श्री राम! वह मुझे आँखें फाड़कर देखता है और धीरे से बोलता है.. जय श्री राम। मालिक और खुश होता है।


मैने गुस्से से पिजड़े का दरवाजा खोल दिया और बोला..

चल, भाग चल। वह नहीं माना। कहने लगा...अब मैं नहीं उड़ सकता। मुझमें अब श्रम करके खाने की शक्ति नहीं बची। तुम्हें भी आना है तो आओ, मालिक सब सिखा देगा। 


मैं डर के मारे उड़ कर भाग आया।


दूसरे ने अपना हाल सुनाया....


शहर में मैं जिस घर की छत पर बैठा था वहाँ भी एक पिंजड़ा था। उसमें एक मैना कैद थी। उसका भी यही हाल था। मैने कहा..उड़ चलो। यह तो कैद है।


उसने आश्चर्य से पूछा...कैद! कैद क्या होता है? जो मालिक कहे करते जाओ, खाते जाओ, गाते जाओ, इसी में आनन्द है।


मैं भी उड़ कर भाग आया।


तीसरा तोता बोला...


मैं एक घर में गया जहाँ एक कमरे में मनुष्यों के बहुत से बच्चे थे। एक आदमी कुछ बोलता, सभी बच्चे वही बोलते। जैसा तुम लोगों ने पिंजड़े के तोते और मैना की बात की वैसे ही वह आदमी, अपने बच्चों को कुछ रटा रहा था। 


मेरी समझ में यह नहीं आता कि क्यों मनुष्य सभी को पकड़ कर अपने जैसा बनाना चाहते हैं? सभी को स्वतंत्र होकर, अपने दिमाग से जीने/सोचने क्यों नहीं देते? भोजन के बदले पशु, पक्षी तो क्या, अपने बच्चों को भी, अपना गुलाम बनाना चाहते हैं? मुझे तो शक होता है... क्या धरती में, एक भी मनुष्य, मानसिक रूप से स्वतंत्र है?

 चित्र... Rashmi Ravija

29.5.21

सेवानिवृत्ति के दिन

मॉर्निंग वॉक के समय लॉन में शर्मा जी मिल गए। घूम घाम कर लौटे थे और बेंच पर, मुँह लटकाकर  विश्राम कर रहे थे। मैने पूछा...मुँह क्यों लटकाए हैं शर्मा जी? आपके तो तीन-तीन बेटे हैं, क्या हुआ?

बड़ा लड़का बहुत दुःखी रहता है। जब देखो तब पैसे मांगता रहता है। 

अच्छा! दूसरा वाला?

वह भी दुखी रहता है लेकिन कभी किसी से कुछ नहीं मांगता। स्वाभिमानी है। जितना कमाता है, उतने में ही गुजारा करता है।

गनीमत है और तीसरा? वो तो कमाने के लिए अमेरिका गया था न?

हाँ, वह बहुत खुश है। बचपन से बहुत तेज था। हर सप्ताह वीकेंड पर पत्नी के साथ पार्टी करता है, नई-नई जगह घूमने जाता है और फेसबुक, इंस्टाग्राम में खूबसूरत तस्वीरें पोस्ट करता है। 

तब तो खूब डॉलर भेजता होगा?

नहीं, कभी एक पैसा नहीं भेजा। मैने मांगा भी नहीं। कल  शाम ही तो उसका फोन आया था। पूछ रहा था, "पिताजी! आप रिटायर्ड हो जाएंगे तो ग्रेच्युटी, भविष्य निधि और सब मिलाकर कुल कितना मिल जाएगा? सोच रहा हूँ यहाँ एक मकान खरीद लूँ और आपको भी यहीं बुला लूँ। रिटायर्ड होने में अभी कितने दिन हैं?"

अरे!!!

कल बैंक गया था। मैनेजर कह रहा था, "आपने बेटे को अमेरिका पढ़ाने के लिए घर की जमानत पर जो एजूकेशन लोन लिया था, बढ़कर 50 लाख से ऊपर हो चुका है। कम से कम हर महीने ब्याज तो चुकाते रहिए। रिटायर्ड होने में अभी कितने दिन हैं?"

15.4.21

तोते

मार्निंग वॉक में शाख से झूलते कई आजाद तोते दिखे।मैंने कहा..बोलो! जय श्री राम। तोते इस शाख से उस शाख पर झूलते और मुझे देख कहते- 'टें' 'टें'।

मैं फिर बोला-गोपी कृष्ण कहो बेटू, गोपी कृष्ण।

तोते बोले- टें..टें।

अच्छा बोलो...जय भीम।

तोते बोले-टें..टें।

मैने सोचा, ये मेधावी छात्र होंगे।

मैंने कहा-बोलो! आजादी। छीन के लेंगे आजादी!!! भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह।

तोते इस बार गुस्से से चीखते हुए उड़ गए- टें.. टें..टें.. टें..

मुझे एक बात समझ में आ गई. तोते यदि वास्तव में आजाद हों तो बस अपनी ही जुबान बोलते हैं। जय श्री राम, जय भीम या आजादी-आजादी बोलने वाले तोते तो वे होते हैं जिन्हें पढ़ाया/रटाया जाता है।

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नींद से जगाने का अपराध

एक गाँव था। गाँव का मुखिया बड़ा जालिम था। रोज की तरह एक दिन मुर्गे ने बांग दी। बांग सुनकर एक कवि की नींद खुल गई। नींद खुली तो कवि ने लिखी कविता। कवि की कविता सुनकर पूरा गाँव नींद से जागने लगा। गाँव को जागता देखकर मुखिया की नींद उड़ गई। भोले भाले लोगों को नींद से जगाने के अपराध में गाँव मे पंचायत बुलाई गई। कवि, एक तो आदमी, ऊपर से समझदार! झट से पाला बदला। मुखिया की तारीफ में भक्ति के गीत गाए। मुर्गे ने अपना स्वभाव नहीं बदला, मारा गया।

आज भी, स्वभाव न बदलने के कारण, नींद से जगाने के अपराध में, मारे जाते हैं मुर्गे, सम्मानित होते हैं कवि।

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17.3.21

मालिक भेड़ बकरी का सदियों से कसाई है।

भेड़ों का मालिक अक्सर अपनी भेड़ों को लेकर उस कसाई के पास जाता जो बकरे काट रहे होते..देखा! इनका मालिक कितना निर्दयी है!!! घास-फूस के बदले अपने ही प्यारे-प्यारे पालतू जानवरों को काट कर बेच देता है। भेड़ें भीतर तक सहम जातीं..आप कितने अच्छे हैं! हम अभी उन मूर्ख बकरों को अपनी मित्रता सूची से डिलीट करते हैं जो इस कसाई को ही अपना मालिक समझते हैं।

बकरों का मालिक भी ठीक यही काम करता। वह भी अपने बकरों को भेड़ों के मालिक की झलक दिखलाता और कहता...देखा! इनका मालिक कितना निर्दयी है!!! घास-फूस के बदले अपने ही प्यारे-प्यारे पालतू जानवरों की खाल उधेड़ देता है। बकरे भीतर तक सहम जाते..आप कितने अच्छे हैं! हम अभी उन मूर्ख भेड़ों को अपनी मित्रता सूची से डिलीट करते हैं जो इस कसाई को ही अपना मालिक समझते हैं।

बड़े त्योहारों के पास आने तक भेड़ों की मित्रता सूची से बकरे और बकरों की मित्रता सूची से भेड़ गायब होने लगते। दोनो अपने-अपने खाली समय में एक दूसरे पर तंज कसते, एक दूसरे को धिक्कारते और अपने मालिक की शान में कसीदे पढ़ते।

बात एक देश के कुछ जानवरों तक सीमित हो तो कुछ गनीमत थी। बात लोकतंत्र के बड़े त्योहारों तक पहुँच गई। धीरे-धीरे यह रोग, राष्ट्रीय से अंतराष्ट्रीय, चौपायों से दो पायों तक फैलता चला गया और दुनियाँ, जहन्नुम बन गई।

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6.5.18

अभागन की शादी

किशन लाल परेशान थे। हों भी क्यों न? बेटी जवान हो चुकी और अभी तक शादी के लिए योग्य तो क्या अयोग्य वर भी नहीं मिला! बेटी पढ़ी लिखी, खूबसूरत थी मगर हाय! दोनों पैरों से अपाहिज ही बड़ी हुई थी अभागन। लड़के की तलाश में रिश्तेदारों, परिचितों के दरवाजे-दरवाजे माथा टेकते कई दिन बीत चुके थे। आज का मोबाइल और नेट का जमाना होता तो शायद इतना व्यर्थ न दौड़ना पड़ता। सब इनकार ऑन लाइन ही मिल जाता। कोई सकारता तो चल जाते उसके घर।

सब ओर से निराश हो अपने गांव लौट जाने की सोच रहे थे किशन लाल। भोर का समय था और राधे चाय वाले ने पहली केतली धरी ही थी आंच पर। भट्टी से अभी धुंआ निकल रहा था। चाय देखी तो पीने की चाह में रुक गए। जय रम्मी के बाद राधे ने बेंच पर बैठने का इशारा क्या किया, थच्च से बैठ कर अपना दुखड़ा रोने लगे। चाय पीते-पीते जैसे ही उन्होंने अपना वाक्य पूरा किया…अब कौन करेगा अभागन से शादी? वहीं पास खड़ा हो, नीम के दातून से दांत रगड़ रहा एक युवक पास आया और झुक कर चरण छूने के बाद बोला.. बाऊजी! मैं करूंगा आपकी बेटी से शादी! मैं बहुत देर से आपकी बातें सुन रहा हूं। आप ही के जाति बिरादरी का हूं। आपको अपने गांव में कोई परेशानी नहीं होगी। सेना में सैनिक हूं। आज ही डयूटी ज्वाइन करने का आदेश है। इसलिए अभी तो नहीं लेकिन आज से 6 माह बाद इस तारीख को मैं अपने पूरे परिवार और मित्रों के साथ आपके घर आऊंगा। आप शादी की तैयारी शुरू कीजिए! इतना कह कर उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना लड़का मोटर सायकिल स्टार्ट कर वहां से चला गया।

किशन लाल को लगा किसी ने उसके साथ बड़ा भद्दा मजाक किया है! मैं ही पागल हूं जो हर जगह अपना दुखड़ा सुनाता रहता हूं। राधे चाय वाले ने किशन लाल को समझाने का खूब प्रयास किया कि मैं लड़के को जानता हूं। पास ही के गांव का है। सेना में मेजर है, कहा है तो आएगा लेकिन किशन लाल को यकीन नहीं हुआ। बिना लड़की देखे, मेरे बारे में जाने, दहेज की बात किए कैसे कोई अपाहिज लड़की से शादी करने को तैयार हो जाएगा? लड़के ने मेरे साथ बड़ा भद्दा मजाक किया है। रोते कोसते किशन लाल चाय की दुकान से भारी मन लिए बड़बड़ाते लौट गए.. लड़के ने मेरे साथ...।

अपने गांव/घर आ कर भी किशन लाल कई दिनों तक बेसूध से घूमते नजर आते। अब इत्ती बेइज्जती की बात किससे कहें? क्या विश्वास करें और क्या तैयारी करें? बिटिया तो पहले से ही कहती है कि उसे किसी से शादी नहीं करनी। मास्टरनी बन जाऊंगी और ढेर सारे बच्चों को पढ़ाऊंगी।

कहे भी तो किससे कहे? अंत में कई दिनों बात उनके मन का लावा शर्मा नाऊ के पीढ़े पर बैठे दाढ़ी बनाते समय निकल ही गया! सब बात बता कर किशन लाल बोले... यह यकीन करने की बात है? छोरे ने मेरे साथ बड़ा भद्दा मज़ाक किया है। शर्मा नाऊ ने हंसते हुए कहा.. क्या जाने तुम पर भगवान को दया आ गई हो और भेज दिया हो किसी को तुम्हारी भलाई करने! तारीख याद रखियो, कहीं सच में आ गया तो का करोगे? वैसे लड़का देखने में कैसा था? किशन लाल को लगा शर्मा भी मेरा मजाक उड़ा रहा है। है ही ऐसी बात कि सभी मजाक उड़ाएंगे। इत्ते दिनों से दिल में जब्त था, नाहक मुख से फिसल गया।

इधर शर्मा नाऊ को अपने ग्राहकों को सुनाने के लिए नया मसाला मिल गया! धीरे धीरे कुछ ही दिनों में किशन लाल की छोड़, पूरा गांव जान गया कि किशन लाल के घर फलां दिवस बारात आने वाली है।

निर्धारित तिथि पर सच में आ गई बारात! गांव में हल्ला मच गया..बारात आ गई, किशन लाल के घर बारात आ गई। पगला सो चुका होगा खा पी कर। उसे जगाओ। बिटिया को सजाओ। शादी का मंडप तैयार करो। आग लगाओ, भट्टी सुलगाओ और देखते ही देखते पूरे गांव ने बारात को हाथों हाथ ले लिया। मंडप सजा, पण्डित आए.. बारात किशन लाल के घर तक तभी पहुंच पाई जब सारी तैयारी पूरी हो गई।

वर्षों बाद लड़के के गांव के पास राधे चाय की दुकान पर चर्चा होती है...

इस गांव में जब पहली बार आईं, वैशाखी पर आईं । अब तो आप देख ही रहे थे, कैसे आराम से कार चला कर जा रही थीं प्रिंसिपल मैडम? पीछे वाली सीट पर उनके दो बेटे थे और बगल में मेजर साहब। कित्ते सुंदर बच्चे थे न?

2.2.14

तोता और मैना


एक मैना पिंजड़े के तोते से बहुत प्यार करती थी। अकेले में पिंजड़े के ऊपर बैठकर ढेरों बातें करती। तोता मैना पर रंग जमाने के लिए मनुष्यों की बोली बोलता—जै श्री राम! जै श्री राम!’ मैना न समझती, न बोल पाती। तोते से मतलब पूछती। तोता कहता--‘मैं क्या जानूँ ? यह तो आदमी की बोली है, आदमी जाने। मेरे मालिक ने जैसा सिखाया वैसा मैने सीख लिया।

कई वर्षों तक मैना नहीं आई। तोता मैना की याद में बहुत दुःखी रहता था। एक दिन तोते की खुशी का ठिकाना न रहा। मैना पहले की तरह उड़ती हुई आई और पिंजड़े के ऊपर बैठ गई। तोते ने मैना पर भाव जमाने के लिए बोलना शुरू किया-नमो..नमो। इस बार मैना को आश्चर्य नहीं हुआ। वह भी कई वर्षों तक एक पंडित जी की कैद में रहकर आई थी। वहाँ एक दूसरा तोता था। जिसे पंडित जी बोलना सिखाते थे। उसने भी तोते पर रंग जमाने के लिए बोलना शुरू किया- गोपी कृष्ण कहो बेटू..गोपी कृष्ण। तोते को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने भी इसका मतलब पूछा। मैना ने उत्तर दिया-मैं क्या जानूँ? यह भी आदमी की बोली है। इनकी बोली एक जैसी थोड़ी न होती है! जैसे आदमी वैसी बोली।

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27.1.14

सूरदास

वे दोनो आँखों से अंधे थे। लोग उन्हें सूरदास कहते थे। उनका कोई माई-बाप नहीं था। वे गाँव के स्कूल में रहते थे। गाँव वालों पर पूर्णतया आश्रित थे। उनकी शादी नहीं हुई थी मगर ज़वानी के दिनो में उनकी दिली ख्वाहिश थी कि कोई जीवन साथी मिले तो जीवन कट जाय। एक बार गाँव के लड़कों ने शरारत की। एक लड़के को पायल-धोती पहनाकर उनके पास ले गये। इधर लड़का पैर पटक कर छम-छम पायल बजाता उधर सूरदास का दिल बल्ले-बल्ले हो जाता। लड़कों ने सूरदास के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। अंधे को क्या चाहिए, दो आँखें! सूरदास तुरंत राजी हो गये।

बकायदा शादी की तारीख तय की गई और शुभ मुहरत तय कर, बाजे वालों को बुलाकर बाजा बजाया जाने लगा। सूरदास को गधे पर बिठाकर लड़के ले चले बारात। आगे-आगे बाजा, बीच में लड़कों का हुड़दंग और गाँव के लोगों का हुज़ूम। जो भी सुनता कौतूहल वश देखने चला आता और असलियत जानने पर मफलर में मुँह दबाकर मुश्किल से अपनी हँसी रोक पाता।

खबर प्रधान तक पहुँची। वे भागे-भागे आये और लगे लड़कों को जोर-जोर से डांटने। जैसे शेर के आने पर गीदड़ भाग जाते हैं वैसे ही प्रधान के आने पर लड़के भाग खड़े हुए। सूरदास गधे पर बैठे के बैठे रह गये। बहुत दिनो तक गाँव में सूरदास की शादी की चर्चा चलती रही। लड़के कहते-"हम तो आपकी शादी करा ही देते मगर क्या करें? ई प्रधान जो बीच में आ गये। उनसे किसी की खुशी देखी नहीं जाती।" सूरदास प्रारंभ से ही सब समझ रहे थे। मुस्कुराकर बोले-"शादी करने का तो हमारा भी मन नहीं था वो तो तुम लोगों का मन रखने के लिए हमने हाँ कह दिया था। एक अकेले का जीवन तो चलता नहीं पत्नी का पेट कौन भरेगा भला!"

नोट: पिछली पोस्ट में भी आपने सूरदास के बारे में यहाँ पढ़ा था।

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