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थोड़ी लम्बी हो गई है। चाहता तो दो किश्तों में भी प्रकाशित कर सकता था। आप चाहें तो दो बार में पढ़ सकते हैं। पढ़ना शुरू तो कीजिए......
चार वर्षों के लिए मेरा भी बस्ती गमन (1994-1998) हुआ था। बस्ती अयोध्या से लगभग 70 किमी दूर स्थित शहर का नाम है। यहाँ पर रहने से ज्ञान हुआ कि बस्ती के संबंध में मुझसे पहले किसी बड़े लेखक ने लिख दिया है...बस्ती को बस्ती कहूँ तो का को कहूँ उजाड़ ! बड़े लेखकों में यही खराबी होती है कि वे हम जैसों के लिखने के लिए कुछ नहीं छोड़ते। मेरे में भी इस शहर के बारे में अधिक कुछ लिखने की क्षमता नहीं है सिवा इसके कि यह एक दिन के मुख्य मंत्री का शहर है। सबसे अच्छी बात तो बड़े लेखक ने लिख ही दी। छोटे शहरों की एक विशेषता होती है कि आपको कुछ ही दिनो में सभी पहचानने लगते हैं। मानना आपके आचरण पर निर्भर करता है। आचरण की सामाजिक परिभाषा आप जानते ही हैं। कवि समाजिक होना चाहता है मगर हो नहीं पाता। इस शहर में नौकरी पेशा लोगों के लिए जीवन जीना बड़ा सरल है। 4-5 किमी लम्बी एक ही सड़क में दफ्तर, बच्चों का स्कूल, अस्पताल, सब्जी, मार्केट, बैंक, डाकखाना, खेल का मैदान सभी है। एक पत्नी. दो बच्चे हों और घर में टी0वी0 न हो तो कम कमाई में भी जीवन आसानी से कट जाता है।
एक दिन कद्दू जैसे पेट वाले वरिष्ठ शर्मा जी मेरे घर पधारे और मार्निंग वॉक के असंख्य लाभ एक ही सांस में गिनाकर बोले, “पाण्डे जी, आप भी मार्निंग वॉक किया कीजिए। आपका पेट भी सीने के ऊपर फैल रहा है !” घबड़ाकर पूछा, “सीने के ऊपर फैल रहा है ! क्या मतलब ? शर्मा जी ने समझाया, “सीने के ऊपर पेट निकल जाय तो समझ जाना चाहिए कि आप के शरीर में कई रोगों का स्थाई वास हो चुका है ! हार्ट अटैक, शूगर, किडनी फेल आदि होने की प्रबल संभावना हो चुकी है।“ शर्मा जी ने इतना भयावह वर्णन किया कि मैं आतंकी विस्फोट की आशंका से ग्रस्त सिपाही की तरह भयाक्रांत हो, मोर्चे पर जाने के लिए तैयार हो गया। डरते-डरते पूछा, “कब चलना है ? शर्मा जी ने मिलेट्री कप्तान की तरह हुक्म सुना दिया, “कल सुबह ठीक चार बजे हम आपके घर आ जाएंगे, तैयार रहिएगा।
मार्निंग वॉक के नाम पर की जाने वाली निशाचरी से मैं हमेशा से चिढ़ता रहा हूँ। ये क्या कि सड़क पर घूमते आवारा कुत्तों के साथ ताल पर ताल मिलाते हुए, मुँह अंधेरे, धड़कते दिल घर से निकल पड़े। चार बजे का नाम सुनते ही मेरी रूह भीतर तक कांप गई। जैसे मेरी भर्ती कारगिल युद्ध लड़ने के लिए सेना में की जा रही हो। मैने पुरजोर विरोध किया, “अरे सुनिए, आप तो मार्निंग वॉक की बात करते-करते निशाचरी का प्रोग्राम बनाने लगे ! रात में भी कोई घूमता है ? मैं क्या रोगी-योगी हूँ ? भोगी इतनी सुबह नहीं उठ सकता ! कुत्ते ने काट लिया तो ? शर्मा जी मेरी तरफ ऐसे देखने लगे जैसे कोई नकल मार कर परीक्षा उत्तीर्ण करने वाला विद्यार्थी, फेल विद्यार्थी को हिकारत की निगाहों से देखता है। जैसे कोई रो-धो कर मिलेट्री की ट्रेनिंग ले चुका जवान नए रंगरूट को पहली बार आते देखता है। फिर समझाते हुए बोले, “पाण्डेय जी, आप तो समझते नहीं हैं। चार बजे घर से नहीं निकले तो देर हो जाएगी। पाँच बजे के बाद तो सब लौटते हुए मिलेंगे।“ मैने फिर विरोध किया, “अरे छोड़िए, सब लौटते हुए मिलें या लोटते हुए ! नाचते हुए मिलें या रोते हुए ! हमें इससे क्या ? हम तो तब चलेंगे जब प्रभात होगा।“ मगर शर्मा जी को नहीं मानना था, नहीं माने। जिद्दी बच्चों की तरह यूँ छैला गए मानो उन्हें जिस डाक्टर ने मार्निंग वॉक की सलाह दिया था, उसी ने 4 बजे का समय भी निर्धारित किया था। बोले, “देखिए आपने वादा किया है ! चलना ही पड़ेगा। चल कर तो देखिए फिर आप खुद कहेंगे कि चार बजे ही ठीक समय है।“ मरता क्या न करता ! हारकर चलने के लिए राजी हो गया । मुझे शर्मा जी ऐसे प्रतीत हुए मानो सजा सुनाने वाला जज भी यही, फाँसी पर चढ़ाने वाला जल्लाद भी यही । जाते-जाते मुझे सलाह देते गए, “एक छड़ी रख लीजिएगा !”
छड़ी क्या मैं उस घड़ी को कोसने लगा जब मैने शर्मा जी से मार्निंग वॉक पर चलने का वादा किया था। मेरे ऊपर तो मुसीबतों का पहाड़ ही टूट गया। शुक्र है कि उन दिनों ब्लॉगिंग का शौक नहीं था लेकिन देर रात तक जगना, टी0वी0 देखना या कोई किताब पढ़ना मेरी आदत रही है। अब ब्लॉगिंग ने टी0वी0 का स्थान ले लिया है। मैं कभी घड़ी देखता, कभी उस दरवाजे को देखता जिससे शर्मा जी अभी-अभी बाहर गये थे। मन ही मन खुद को कोस रहा था कि साफ मना क्यों नहीं कर दिया ! संकोची स्वभाव होने के कारण मेरे मुख से जल्दी नहीं, नहीं निकलता और अब किया भी क्या जा सकता था ! सोने से पहले जब मैने अपना फैसला श्रीमती जी को सुनाया तब उन्हें घोर आश्चर्य हुआ। वह बोलीं, “आज ज्यादा भांग छानकर तो नहीं आ गए ! तबीयत तो ठीक है !! उठेंगे कैसे ?” एक साथ इतने सारे प्रश्नों को सुनकर ऐसा लगा जैसे मिलेट्री में भरती होने से पहले साक्षात्कार शुरू हो गया हो ! बंदूक से निकली गोली और मुख से निकली बोली कभी वापस नहीं आती। अब अपनी बात से पीछे हटना मेरी शान के खिलाफ था। मैं बोला, “आप समझती क्या हैं ? मैं उठ नहीं सकता ! आप उठा के तो देखिए मैं उठ जाउंगा !!” श्रीमती जी मुझे ऐसे देख रही थीं जैसे उस पागल को जो मेरे घर कल सुबह-सुबह मुझसे पैसे मांग रहा था। फिर उन्होंने हंसते हुए कहा, “मैं क्यों उठाने लगी ? क्या मुझे भी घुमाने ले चलोगे !” मैं कभी शर्मा जी को याद करता कभी श्रीमती जी को साथ लिए अंधेरे में घूमने की कल्पना करता। झल्लाकर बोला, “आप रहने दीजिए, मैं अलार्म लगा कर सो जाउंगा।“ मैने सुबह 4 बजे का अलार्म लगाया और बिस्तर में घुस गया। मार्निंग वॉक और कुत्तों की कल्पना करते-करते गहरी नींद में सो गया।
जब मेरी नींद खुली तो पाया कि मेरी श्रीमती जी मुझे ऐसे हिला रही थीं जैसे कोई रूई धुनता हो और शर्मा जी दरवाजा ऐसे पीट रहे थे जैसे रात में उनकी बीबी कहीं भाग गई हो ! मैं हड़बड़ा कर जागृत अवस्था में आ गया। सर्वप्रथम तीव्र विद्युत प्रवाहिनी स्त्री तत्पश्चात टिकटिकाती घड़ी का दर्शन किया। घड़ी में चार बजकर पंद्रह मिनट हो रहे थे ! दरवाजे पर शर्मा जी अनवरत चीख रहे थे ! मैने उठकर ज्यों ही दरवाजा खोला शर्मा जी किसी अंतरिक्ष यात्री की तरह घर के अंदर घुसते ही गरजने लगे, “अभी तक सो रहे थे ? 15 मिनट से दरवाजा पीट रहा हूँ !” जैसे मिलेट्री का कप्तान डांटता है। उनकी दहाड़ सुनकर सुनकर सबसे पहले तो मेरा मन किया, दो झापड़ लगाकर पहले इसे घर के बाहर खदेड़ूं और पूछूं, “क्या रिश्ते में तू मेरा बाप लगता है ?” मगर क्या करता, अपनी बुलाई आफत को कातर निगाहों से देखता रहा। माफी मांगी, कुर्सी पर बिठाया और बेड रूम में जाकर घड़ी देखने लगा। तब तक मृदुभाषिणी दामिनी की तरह चमकीं, “घड़ी को क्यूँ घूर रहे हैं ? मैने ही अलार्म 6 बजे का कर दिया था ! सोचा था न बजेगा न आप उठेंगे !! चार बजे उठना हो तो कल से बाहर वाले कमरे में तकिए के नीचे अलार्म लगा कर सोइएगा और बाहर से ताला लगाकर चले जाइएगा ! मैं 6 बजे से पहले नहीं उठने वाली। अपने शर्मा जी को समझा दीजिए कि रात में ऐसे दरवाजा न पीटा करें।“ मैं सकपकाया। यह समय पत्नी से उलझने का नहीं था। एक जल्लाद पहले से ही ड्राईंगरूम में बैठा था ! दूसरे को जगाना बेवकूफी होती । जल्दी से जो मिला पहनकर बाहर निकल पड़ा। मेरे बाहर निकलते ही फटाक से दरवाजा बंद होने की आवाज सुनकर शर्मा जी मेंढक की तरह हंसते हुए बोले, “हें..हें..हें..लगता है भाभी जी नाराज हो गईं !” मैं उनके अजूबेपन को अपलक निहारता, विचारों की तंद्रा से जागता, खिसियानी हंसी हंसकर बोला, “नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।“
शर्मा जी काफी तेज चाल से चलते हुए एक बदबूदार गली में घुसे तो मुझसे न रहा गया। मैने पूछा, “ये कहाँ घुसे जा रहे हैं ? इसी को कहते हैं शुद्ध हवा ? शर्मा जी बोले, “बस जरा सिंह साहब को भी ले लूँ ! मेरे इंतजार में बैठे होंगे। एक मिनट की देर नहीं होगी। वो तो हमेशा तैयार रहते हैं।“ शर्मा जी बिना रूके, बिना घुमे, बोलते-बोलते गली में घुसते चले गए। अंधेरी तंग गलियों को पारकर वे जिस मकान के पास रूके उसके बरामदे पर एक आदमी टहल रहा था। दूर से देखने में भूत की तरह लग रहा था। हम लोगों को देखते ही दूर से हाथ हिलाया और लपककर नीचे उतर आया। आते ही उलाहना दिया, “बड़ी देर लगा दी !” मैने मन ही मन कहा, “साला.. मिलेट्री का दूसरा कप्तान ! कहीं ‘बड़ी देर हो गई’ सभी मार्निंग वॉकर्स का तकिया कलाम तो नहीं !” मैं अपराधी की तरह पीछे-पीछे चल रहा था और शर्मा जी, सिंह साहब से मेरा परिचय करा रहे थे, “आप पाण्डेय जी हैं। आज से ये भी हम लोगों के साथ चलेंगे।“ सिंह साहब ने मुझे टार्च जलाकर ऐसे देखा मानो सेना में भर्ती होने से पहले डा0 स्वास्थ्य परीक्षण कर रहा हो ! संभवतः इसी विचार से प्रेरित हो मेरी जीभ अनायास बाहर निकल गई ! सिंह साहब टार्च बंदकर हंसते हुए बोले, बड़े मजाकिया लगते हैं ! उनके हाव भाव से मुझे यकीन हो गया कि वे मन ही मन कह रहे हैं, “इस जोकर को कहाँ से पकड़ लाए !”
रास्ते भर सिंह साहब मार्निंग वॉक के लाभ एक-एक कर गिनाते चले गए और मैं अच्छे बच्चे की तरह हूँ, हाँ करता, मार्ग में दिखने वाले अजीब-अजीब नमूनों को कौतूहल भरी निगाहों से यूँ देखता रहा जैसे कोई बच्चा अपने पापा के साथ पहली बार मेला घूमने निकला हो। एक स्मार्ट बुढ्ढा, चिक्कन गंजा, हाफ पैंट और हाफ शर्ट पहन कर तेज-तेज चल रहा था। कुछ युवा दौड़ रहे थे तो कोई शर्मा जी की तरह अंतरिक्ष यात्री जैसा भेषा बनाए फुटबाल की तरह लुढ़क रहा था। शर्मा जी सबको दिखा कर मुझसे बोले, “देख रहे हैं पाण्डे जी ! (मैने सोचा कह दूं क्या मैं अंधा हूँ ? मगर चुप रहा) क्या सब लोग मूर्ख हैं ? देखिए, वो आदमी कितनी तेज चाल से चल रहा है ! चलिए उसके आगे निकलते हैं !! शर्मा जी लगभग दौड़ते हुए और हम सबको दौड़ाते हुए उसके बगल से उसे घूरकर विजयी भाव से आगे निकलने लगे तो वह आदमी जो दरअसल ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ रहा था, मार्निंग वॉकर नहीं था, हमें रोककर पूछ बैठा, “ आप लोगों को कौन सी ट्रेन पकड़नी है ?” उसके प्रश्न को सुनकर शर्मा जी हत्थे से उखड़ गए, “मैं आपको ट्रेन पकड़ने वाला दिखता हूँ ?” लगता है वो आदमी भी शर्मा जी का जोड़ीदार था। पलटकर बोला, “तो क्या चंदा की सैर पर निकले हो ? चले आते हैं सुबह-सुबह माथा खराब करने !” किसी तरह हम लोगों ने बीच बचाव किया तो मामला शांत हुआ।
हम लोग जब मैदान में पहुँचे तो वहाँ कई लोग पहले से ही गोल-गोल मैदान का चक्कर लगा रहे थे। शर्मा जी, सिंह साहब के साथ यंत्रवत तेज-तेज, गोल-गोल घूमने लगे और मैं एक जगह बैठकर वहाँ के दृष्य का मूर्खावलोकन करने लगा। पूर्व दिशा में ऊषा की किरणें आभा बिखेर रही थीं। सूर्योदय का मनोहारी दृष्य था। मैने बहुत दिनो के बाद उगते हुए सूर्य को देखा था। मेरा मन जगने के बाद पहली बार प्रसन्नता से आल्हादित हो उठा। चिड़ियों की चहचहाहट, अरूणोदय की लालिमा, हवा की सरसराहट ने न जाने मुझ पर कैसा जादू किया कि मैं भी उन्हीं लोगों की तरह गोल-गोल दौड़ने लगा ! दौड़ते-दौड़ते मेरी सांस फूलने लगी। मैं हाँफने लगा मगर देखा, शर्मा जी और सिंह साहब दौड़ते ही चले जा रहे हैं ! मारे शरम के मैं भी बिना रूके दौड़ता रहा। अनायास क्या हुआ कि मेरा सर मुझसे भी जोर-जोर घूमने लगा। मुझे लगा कि मुझे चक्कर आ रहा है ! घबड़ाहट में पसीना-पसीना हो गया और भागकर बीच मैदान में पसर गया ! यह तो नहीं पता कि मुझे नींद आ गई थी या मैं बेहोश हो गया था लेकिन जब मेरी आँखें खुलीं तो मार्निंग वॉकर्स की भीड़ मुझे घेर कर खड़ी थी ! शर्मा जी मेरे चेहरे पर पानी के छींटे डाल रहे थे। एक दिन की मार्निंग वॉकिंग ने मुझे शहर में ऐसी प्रसिद्धि दिला दी थी जो शायद शर्मा जी आज तक हासिल नहीं कर पाए होंगे।