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18.6.19

गर्मी का ताण्डव

इतने तनाव में क्यों हो? धूप में पैदल चलकर आ रहे हो? 
नहीं भाई, समाचार देख कर आ रहा हूँ। 
अरे! रे! रे! इतना जुलुम क्यों किया अपने ऊपर? जेठ की दोपहरी में दस किमी पैदल चलना मंजूर, समाचार देखना नामंजूर। 
क्या बताएं यार! आज छुट्टी थी, कोई काम भी नहीं था, बाहर धूप थी, सोचा समाचार ही देख लें...
बस यहीं चूक कर गए। 
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धूप के कई साइड इफेक्ट हैं। धूप में चलना पड़े तभी समस्या होगी यह जरूरी नहीं। धूप में न चल पाना और घर में ही फँसे रह जाना भी मुसीबत का कारण बन सकता है। ऐसे वक्त समस्याएँ आपको निर्बल जान, आप पर आक्रमण कर सकती हैं। गरमी भेष बदल कर तांडव करती है!

सारा दिन घर में हो, कोई ढंग का काम नहीं किए! कम से कम बाथरूम ही साफ़ कर लिया होता!!!

इतने मैले कपड़े खूँटी में टँगे हैं, इनको ही धो लिया होता।वाशिंग मशीन में ये अपने से उड़ कर तो जाएंगे नहीं। शर्ट के कॉलर, पैंट की मोहरी..सब वाशिंग अपने से साफ नहीं करती जनाब! थोड़े हाथ भी चलाने पड़ते हैं।

छुट्टी में ए.सी.की जाली नहीं साफ़ करेंगे तब कब करेंगे?
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बनारस की गलियों में यह समस्या नहीं है कि गरमी प्रचण्ड है तो घर से बाहर कैसे निकलें? एक गमछा लपेटो, एक कंधे पर रखो और निकल कर बैठ जाओ पास के किसी पान/चाय की अड़ी पर। अरबपति भी छेदहा बनियाइन पहने, पान घुलाए बैठे दिख जाते हैं। बहरी अलंग गांवों में रहने वाले भी पूर्वजों के पुण्य प्रताप से लगाए किसी घने बरगद/नीम/आम के नीचे खटिया बिछा कर बेना डुलाते, बेल फोड़ते/घोलते, खैनी रगड़ते दिन काट लेते हैं। समस्या शहरी कॉलोनी में रहने वालों के लिए है। गरमी उनके सर पर चौतरफा तांडव करती है। ए.सी. कमरे से निकल कर मॉल में घुस सकते हैं लेकिन कितने दिन? अधिकतर तो दिखावटी रईस हैं! एक दिन के बाद दूसरे दिन से ही बजट गड़बड़ाने लगता है। भरे बाजार, बिगड़ता EMI नजर आने लगता है। पड़ोसी को कार निकालते देख चिढ़ने/खीझने लगते हैं। मुँह से बिगड़े बोल निकलने लगते हैं... बहुते गरमी चढ़ल हौ! जल्दिए दख्खिन में मिल जाई। अब इस वाक्य में गरमी का अर्थ सुरुज नारायण के धूप से नहीं, पैसे की प्रचुर मात्रा से है। 'दख्खिन में मिलना' एक अश्लील गाली है जिसे बनारसी ही समझ सकते हैं और दूसरे जो नहीं समझते, न ही समझें तो अच्छा है। बनारसी समझें तो कोई हर्ज भी नहीं, वे रोज ऐसी गाली देते/लेते रहते हैं। 
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एक दिन मैं, जेठ दुपहरिया के मध्यान में, सर पर गमछा लपेटे, हेलमेट पहने, ट्रेन पकड़ने, तारकोल की सड़क पर, बाइक चलाते हुए, अपनी धुन में, चला जा रहा था। बगल से चाँद खोपड़ी वाला, एक प्रौढ़, स्कूटी से गुजरा! मैं कभी अपना गमछा/हेलमेट सही करता, कभी उस चन्डुल को हैरत से देखता। तीखी सूर्य किरणों का ताप इतना ज्यादा था कि मेरे चप्पल से बाहर निकलती उँगलियाँ भी झुलस जाना चाहती थीं। यह शक्श कैसे इस धूप में सही सलामत, नङ्गे सर, स्कूटी चला रहा है! जैसे सूर्य की रोशनी पा, पूनम का चाँद चमकता है, वैसे ही उसकी दिव्य खोपड़ी दिनमान की आभा से देदीप्यमान थी। मन किया पूछ लूँ..भाई साहब! आपको गर्मी नहीं लग रही? 

तभी उसने स्कूटी साइड में करी, पिच्च से पान थूका और फोन में गरजने लगा..खोपड़ी धूप से भन्ना गयल हौ भो#ड़ी के! तू हउआ कहाँ?...

उसने आगे भी कुछ सांस्कृतिक शब्दों का प्रयोग किया होगा लेकिन मैं जल्दी में था और निकल लेने में ही अपनी भलाई समझी। सोचा..मैं भी कितना मूर्ख हूँ! बाल-बाल बचा। सूरज की गरमी उसके सर पर तांडव कर रही थी और मैं आग में घी डालने जा रहा था! 
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3.3.19

पड़ोसी

जीजा और साले ने मिलकर शहर से दूर, एक सुनसान इलाके में, मकान बनाने की इच्छा से, तीन बिस्वे का एक प्लॉट खरीदा। मिलकर खरीदने के पीछे कई कारण थे। पहला कारण तो यह कि दोनो की हैसियत इतनी अच्छी नहीं थी कि अकेले पूरे प्लॉट का दाम चुका सकें। दूसरा कारण यह कि सुनसान इलाके में दो परिवार साथ होंगे तो दोनो को अच्छा पड़ोसी मिल जाएगा। प्लॉट खरीदते समय दोनो के मन में अच्छे पड़ोसी मिलने पर होने वाले फायदों के लड्डू फूट रहे थे।

किसी को कहीं जाना होगा तो चाभियों का गुच्छा पड़ोस में उछाल कर चल देंगे। कभी कोई मेहमान आ गया और उसी समय घर में दूध खतम हो गया तो पड़ोस से मांग कर चाय बना लेंगे। रात के समय कोई बीमार हो गया तो दो परिवार मिल कर अस्पताल पहुँचा देंगे। दो परिवारों को साथ देखकर दूसरे पड़ोसियों को भी आँखें दिखाने की हिम्मत नहीं होगी। अच्छा पड़ोसी भाग्य से मिलता है। दुष्ट मिल गया तो जीवन नरक हो जाता है। सामने पंडित जी के बगल का प्लॉट जब से एक मुसलमान ने खरीदा है, पंडित जी की नींद उड़ी हुई है। कह रहे थे..मियाँ बकरा काटेगा और खा कर, हड्डी मेरे घर के सामने फेंकेगा! अब तो जीवन नरक हो गया। इसलिए अच्छा है कि हम लोग साथ-साथ मकान बनाकर रहें। इन्हीं सब अच्छे पड़ोसी के उच्च विचारों और दुष्ट पड़ोसी के भय का गान करते हुए, आर्थिक मजबूरी के कारण दोनो ने मिलकर तीन बिस्वे के प्लॉट को आधा-आधा अपने अपने नाम रजिस्ट्री करा कर, चारों ओर से घेरवाकर, अगल-बगल दो गेट लगवा दिए। बाहर से देखने में दो प्लॉट और भीतर से एक। 

प्लॉट खरीदे कई वर्ष बीत गए। प्लॉट खरीदते समय लिए गए कर्ज भी चुकता हो गए और दोनो के पास कुछ पैसे भी जमा हो गए। दोनो किराए के मकान में रहते और अपने घर का स्वप्न देखते। दोनो बैंक और एल आई सी से हाउसिंग लोन लेने के सभी तरीके खंगाल चुके थे। इन्तजार था तो बस इतना कि अगला मकान बना कर रहने लगे तो हम भी शुरू करें। पहल कोई नहीं करना चाहता था। दोनो पहले आप, पहले आप कहते हुए एक दूसरे को मकान बनाने के लिए उकसाते रहते। 

दोनो गुणा गणित लगाते। मकान बनवाने के लिए सबसे पहले पानी चाहिए। पानी के लिए बोरिंग कराना होगा। एक लाख के आस पास तो बोरिंग में ही लग जाएंगे। अगला बोरिंग कराए तो अपना यह पैसा शुद्ध रूप से अभी तो बच ही जाएगा! मकान बनने के बाद धीरे धीरे अपनी भी बोरिंग करा लेंगे। अगला मकान बनाकर रहने लगेगा तो हम उसी के घर में रह कर अपना भी मकान बना लेंगे! दोनो निम्न आय के साझीदार, अपनी अपनी आर्थिक मजबूरियों के कारण, छोटे-छोटे क्षुद्र स्वार्थ पालते और मकान बनाने के स्वप्न देखते। 

जब आप अपने मित्र से या रिश्तेदार से छोटे-छोटे लाभों के लिए चालाकियाँ करते हैं तो आपकी हर चालाकी अगला भी खूब समझ रहा होता है। आपके सम्मान में या रिश्ते के संकोच में आपके मुख पर भले कुछ न कहे, मन ही मन गुस्से से तड़फ रहा होता है। मकान बनने और अच्छा पड़ोसी बनने से पहले ही दोनो के मन में कई गाँठें पड़ती चली गईं। जीजा को कोसते हुए, आखिर में हार कर साले साहब ने मकान बनवाना शुरू किया और कुछ ही महीने बाद, देखा देखी जीजा जी ने भी मकान बनवा लिया। दोनो के मन में जो आग लगी थी उसमें घी का काम किया दोनो मकानों के बीच में उठने वाली अलगौजी की ऊँची दीवार ने! एक ने छः फुट ऊँची करी तो दूसरे ने आठ फुट। जितनी गहरी नींव धँसी हो सीने में, उतनी ऊँची उठ जाती हैं दीवारें।  रही सही कसर दूसरे पड़ोसियों ने पूरी कर दी। अच्छे पड़ोसी बनने का स्वप्न धरा का धरा रह गया। दोनो अच्छे रिश्तेदार भी न रहे। वैसे ही एक दूसरे के दुश्मन हो गए जैसे बंटवारे के बाद दो भाई, भारत और पाकिस्तान बन जाते हैं। यह तो अच्छा हुआ कि मरने मारने से पहले दोनो को रोजी रोटी के चक्कर मे अलग-अलग शहरों में बसना पड़ा और कालांतर में दोनो को अपनी भूल का एहसास हो गया। रहीम दास लाख कहें लेकिन सुनता कौन है?

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। 
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।।

झगड़े में दोष किसका? जाति? धर्म? यहाँ तो न जाति अलग थी और न धर्म ही अलग था! दोनो के बीच रोटी-बेटी का नाता था। क्या हम स्वयं खुद के दुश्मन नहीं हैं? क्या कभी हमने अपनी हानी उठाकर दूसरों का हित करने की कोशिश की है? दूसरों को कब दो पड़ोसियों की मित्रता सुहाती है? वे तो हमेशा इसी ताक में रहेंगे कि दोनो भाई आपस में झगड़ते रहें जिससे हमारा लाभ हो। पड़ोसी के कुत्ते जब आप पर भौंकते हैं तो आपको बुरा लगता है। तो क्या जब आपके कुत्ते पड़ोसी पर भौंकते हैं तो वहाँ फूलों की बरसात होती है? क्या अच्छा पड़ोसी होना किसी एक की ही जिम्मेदारी है? 
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21.1.19

खिचड़ी


हमारे देश मे दरवाजा बंद करना कभी सुहागरात की निशानी होती थी, अब स्वच्छता अभियान की पहचान है। इसके लिए आदरणीय अमित सर और दूरदर्शन के शुक्रगुजार हैं। खाना खाते समय टी वी खोलकर दूरदर्शन का समाचार देखने वालों के सामने कभी-कभी बड़ी असहज स्थिति आ जाती है। इधर एक कौर मुँह में डाला नहीं कि अमित जी चीखते हुए चले आते हैं..

झाड़ी के पीछे, पेड़ के नीचे, दबा के आजू, पटरी के बाजू, करते हो तुम पेट हल्का, ना शौचालय, ना है नलका। फैल गई बीमारी चारों ओर, इसीलिए बॉस! शट द डोर!!  दरवाजा बंद करो..दरवाजा बंद। दरवाजा बंद तो बीमारी बन्द। साथ साथ लोटा/बोतल लेकर खेत मे शौच के लिए जा रहे एक-एक व्यक्ति को बुलाकर शौचालय में भेजते हैं और दरवाजा बंद करते हैं।

यह सब देखकर कल सुबह आप फिर खेत मे निपटने जाते हैं या शौचालय में जाकर दरवाजा बंद करते हैं यह तो बाद की बात है फिलवक्त या तो खाना बंद कीजिए या टी.वी बन्द। 

एक जमाना था जब मध्यम वर्गीय परिवार में, घर के किसी सदस्य ने भी, कई बार दरवाजा बंद किया तो बाकी सदस्य यह मान लेते थे कि आज खाने में मूंग के दाल की पतली खिचड़ी ही मिलेगी। अब परिवार हम दो, हमारे दो तक सीमित हुआ।आर्थिक जीवन स्तर में सुधार आया तो यह हुआ कि जो बार-बार दरवाजा बंद करता है, खिचड़ी वही खाए। बाकी लोग क्यों कष्ट सहें?  

आम आदमी के स्टेटस के साथ, खिचड़ी का भी स्तर सुधर गया। अब खिचड़ी मूंग के दाल वाली, पतली न होकर, तरह तरह के मेवा मसाले वाली पकवान हो गई! कई परिवारों में तो हर शनिवार को खिचड़ी ही बनती है। मकर संक्रांति के दिन बनने वाली उड़द की काली दाल वाली खिचड़ी का तो कहना ही क्या! इसे तो इसके यारों के साथ खाया जाता है। लोकोक्ति भी प्रसिद्ध है.. दही, पापड़, घी, अचार, खिचड़ी के हैं चार यार। 

खिचड़ी भारतीय जीवन में रचा बसा वह पकवान है जिसने कई सामाजिक, राजनैतिक मुहावरे दिए। जब कोई गृहणी खाना देने में देर कर रही हो तो पतिदेव झट से तंज कसते हैं.. बीरबल की खिचड़ी बन रही है! भले उन्हें इसका ज्ञान न हो कि वे जिस बीरबल की खिचड़ी का नाम ले रहे हैं वह खिचड़ी बीरबल ने राजा अकबर को सबक सिखाने के लिए पकाई थी। हुआ यह था कि गरीब गंगाराम दस स्वर्ण मुद्रा के लालच में रात भर ठंडे पानी में खड़ा रहा और राजा ने यह कहकर ईनाम देने से इनकार कर दिया कि उसे दूर जल रहे दिए से गर्मी मिल रही थी! बीरबल ने भी अपने भोजन की हाँडी आग से काफी ऊँचाई पर टांग दी और यह कहा कि जब दिए से गंगाराम को गर्मी मिल सकती है तो आग से ऊँची रखी हाँडी को क्यों नहीं मिलेगी? जब खिचड़ी पकेगी तब दरबार मे आएंगे। अकबर को गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गरीब गंगाराम को दस स्वर्ण मुद्राएँ देना स्वीकार किया। तभी से बीरबल की खिचड़ी वाला मुहावरा चलन में आ गया। अब भोजन मिलने में देर हो तो बजाय तंज कसने के पतियों को यह समझना चाहिए कि जरूर उन्होंने अपनी श्रीमती जी से किया कोई वादा पूरा नहीं किया है जिससे खाना देर से पक रहा है। :)

भारत की राजनीति में भी जब किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता और कई पार्टियाँ मिल कर सरकार बनाती हैं तो अखबार वाले झट से यह हेड लाइन लगा देते हैं.. किसी दल को बहुमत नहीं, अब बनेगी खिचड़ी सरकार! मतलब जब देश के विकास का दरवाजा बार-बार बन्द होने लगता है, देश का हाजमा खराब हो जाता है, तब उसे खिचड़ी सरकार से काम चलाना पड़ता है। देश में जब खिचड़ी सरकार बनती है तो उसके चारों यार खूब रँगबाजी करते हैं। काली उड़द की खिचड़ी में दही, पापड़, घी, अचार रंग जमाते हैं तो खिचड़ी सरकार में सरकार नेपथ्य में चली जाती है, यार मौज उड़ाने लगते हैं! देश में पूर्ण बहुमत की सरकार है तो समझना चाहिए कि देश का स्वास्थ्य अच्छा है। खिचड़ी सरकार है मतलब देश बीमार चल रहा है। पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए चाहे जितनी बड़ी हाँडी चढ़ाकर मनो खिचड़ी पकाओ लेकिन यह नौबत न आने दो कि देश को खिचड़ी सरकार मिले। देश अब फिर बीमार हुआ तो स्वस्थ होने में वर्षों लग जाएंगे।
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28.10.18

पटाखे

जिसे देखते ही पूरे शरीर मे उत्तेजना बढ़ जाती है उस माल का नाम पटाखा माल है। जो आँच दिखाते ही धड़ाम से फूट जाय, जिसके फूटने पर आपका मन आंनद से भर जय तो समझो वही पटाखा माल है। आँच दिखाते-दिखाते आपकी पूरी बत्ती जल जाय और धड़ाम की आवाज भी कानों में न सुनाई पड़े तो समझो वो पटाखा नहीं, फुस्सी माल है। पटाखा देखने और पाने के लिए बाजार में घूमना पड़ता है। माल ही माल को खींचता है। इसलिए पटाखा प्राप्त करने के लिए जेब में माल लेकर बाजार में घूमना पड़ता है। अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण पटाखे मॉल में नहीं बिकते, तंग गलियों में या सड़कों के किनारे पटरी पर सज्ज होकर बिकने के लिए आते हैं। पटाखे खरीदते समय अपनी जेब के साथ अपनी उम्र और क्षमता का भी ध्यान रखना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि पटाखा खरिदा आपने, घर लेकर गए और छुड़ाने के लिए मोहल्ले के लड़कों को बुलाना पड़ा!

हर चीज का एक समय होता है। उम्र के किसी पड़ाव पर जो चीज अच्छी लगती है, समय बीत जाने के बाद वही चीज बेकार लगने लगती है। पटाखों का भी यही हाल है। चुटपुटिया छुड़ाते समय काँपने वाली उँगलियाँ आड़ू बम के धमाकों से भी संतुष्ट नहीं होती। किशोर से जवान हुए तो चाहते हैं कि आड़ू बम में आग लगाने से पहले उसे किसी पुराने टीन के कनस्टर से ढक दिया जाय ताकि धमाके के साथ टीन के परखच्चे उड़ जांय! तंग गलियों के छत पर खड़े होकर, बम को हाथ से पकड़ कर, सुतली में आग लगाकर, नीचे फेंकने में जो मजा है वह बुढ्ढों की तरह पुराने अखबार के ऊपर बम रखकर, अखबार में आग लगाकर, कान में उँगलियाँ घुसेड़ कर, चार हाथ पीछे भागने में कहाँ! 

जैसे पटाखे छुड़ाने में आनन्द की एक उम्र होती है वैसे ही पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी त्योहारों में प्रदूषण की चिंता करने का शुभ मुहूरत होता है। धर्मनिरपेक्ष समय मे फैलने वाले प्रदूषणों पर पर्यावरण की चिंता का असर नक्कार खाने में तूती की आवाज की तरह सुनी, अनसुनी रह जाती है इसलिए त्योहारों के समय आवाज बुलंद करनी चाहिए। भले रोज मुर्गा उड़ाते हों लेकिन जब बकरीद का समय आये तो बकरों की कुर्बानी पर टेसुए बहाना सबसे मुफीद होता है। भले एक पौधा न रोपे हों, होली में होलिका दहन के लिए सजाए वृक्षों की डाल पर छाती फाड़ने में चैन आता है। यह और कुछ नहीं, दूसरे के फटे में उँगली करने का हम भारतीयों का पुराना स्वभाव है। स्वच्छता के नाम पर अपना कूड़ा या चूहेदानी में फंसा चूहा जब तक पड़ोसी के दरवाजे पर छोड़ नहीं आते हमारी आत्मा को सुकून नहीं मिलता।

सुंदर लाल बहुगुणा गंगा पर टिहरी बांध का विरोध करते रहे, कोई फर्क नहीं पड़ा। सरकारें गंगा पर बांध भी बनाती रही और सफाई के नाम पर गंगा में हाथ भी धोती रही। न बाँध रुका, न गंगा का पानी ही साफ हुआ। गंगा को मुक्त कर दो तो गंगा की धार स्वयं अपनी सफाई के साथ आपके पाप भी बहा ले जाने में समर्थ है। हम व्यवस्था पर व्यंग्य क्या खाक करेंगे? व्यवस्था सदैव हमारा ही मजाक उड़ाती रहती है और हम सब चुपचाप सहने के आदी हो चुके हैं। जान्ह्वी स्वयं मुक्तिदायिनी, पाप हारिणी हैं और हम उस पर बांध बांध कर उसी की सफाई करने में लगे हैं! गंगा में बांध बांधने से प्रदूषण नहीं होता, दिवाली में पटाखे छुड़ाने से प्रदूषण फैलता है।  

सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना कि दो घण्टे पटाखे छुड़ाने से इतना प्रदूषण नहीं होगा कि समाज सहन न कर सके। हम पूछते हैं कि आज के मंहगाई के जमाने में किस आम आदमी की इतनी हैसियत है कि वह दो घण्टे से ज्यादा पटाखे छुड़ा सके? हमने तो अपने जुनूनी समय मे भी एकाध घण्टे से ज्यादा पटाखे नहीं छुड़ाए! हां, पहले लोग 'मजा लेना है जीने का तो कम कम, धीरे धीरे पी' वाले अंदाज में रुक रुक कर पटाखे छुड़ाते थे, अब वही पटाखे दो घण्टे में ही सारे छुड़ा दिए जाएंगे। पहले मुकाबला चलता था। पड़ोस के भोनू की रॉकेट हवा में उड़ी तो ध्यान से देखा जाता था कि वह कितना ऊपर उड़ा और हवा में कितनी जोर से फटा! फिर उसके मुकाबले अपना दो आवाजा छोड़ा जाता। नीचे भोनू के कान के पर्दे भी फटें और दूर ऊपर जा कर इतनी जोर से फटे की नीचे भोनू की छाती फटी की फटी रह जाय।  

हिन्दुओं की बात करते हो तो हिंदुओं के पटाखे छुड़ाने का एक निर्धारित समय होता है। बदमाश लौंडों की बात छोड़ दो तो लक्ष्मी पूजा समाप्त होने से पहले हिन्दू स्वयं धमाके नहीं चाहते। डरते हैं कि कहीं शोर शराबे से उल्लू डर कर भाग न जांय। वे तभी पटाखे छुड़ाते हैं जब आरती समाप्त होने के बाद दिए भी जला कर खाली हो चुके होते हैं। धनी माने जाने वाले परिवारों के लिए भी पटाखे छुड़ाने के लिए दो घंटे बहुत हैं। अब समय में लफड़ा हो सकता है। पण्डित जी यदि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित समय शाम आठ बजे से पहले पूजा समाप्त कर दें तब तो ठीक लेकिन यदि पूजा कराते कराते रात के दस बजा दिए तो गए पटाखे पानी में! गुस्से में पटाखे यदि पण्डित जी के सर पर फूटे तो और भी लंबे समय के लिए जेल जाना पड़ सकता है। माननीय न्यायालय के इस आदेश से प्रदूषण कितना कम होगा यह तो कह नहीं सकते लेकिन इतना तय है कि पटाखे छुड़ाने वाले घर के गैंग का ध्यान हर समय लक्ष्मी जी के बजाय घड़ी पर ही टिका रहेगा।

16.9.17

रेलगाड़ी

रेलगाड़ी में बैठ कर रेलगाड़ी पर व्यंग्य लिखने का मजा ही कुछ और है। बन्दा जिस थाली में खायेगा उसी में तो छेद कर पायेगा। दूसरा कोई अपनी थाली क्यों दे भला? पुराने देखेगा और नया बनाकर सबको दिखायेगा। ट्रेन में चलने वाले ही ट्रेन को समझ सकते हैं। हवा में उड़ने वाले जमीनी हकीकत से कहाँ रू-ब-रू हो पाते हैं!

हमारे लिए तो रेलगाड़ी #ट्रेन नहीं, लोहे का घर है। एक ऐसा घर जिसमें सभी प्रकार के कमरे हैं। गरीबों के लिए, अमीरों के लिए और मध्यमवर्गीय के लिए अलग-अलग कमरे हैं। जैसी भारत की अर्थव्यवस्था वैसे रेलगाड़ी में कमरे । सभी धर्म और जातियों के लोग अपने मन की कलुषता छुपा कर, एक दूसरे से मुस्कुरा कर बातें करते पाये जाते हैं। एक ऐसा घर जहाँ भारत बसता है।

डबल बेड नहीं होता लोहे के घर में। लोअर, मिडिल और अपर बर्थ होते हैं। लोअर बर्थ ही दिन में गप्प लड़ाने वालों की अड़ी, रात में सिंगल बेड बन जाती है। जब तक जगे हो चाहे जितना चोंच लड़ाओ, रात में सिंगल ही रहो। सिंगल ही ठीक है, बेड डबल हुआ तो बवाल हो जाएगा।

मैं चाऊ-माऊ, जापान या यूरोप की बात तो नहीं जानता मगर भारतीय रेल धैर्य और साहस की कभी खत्म न होने वाली स्थाई पाठशाला है। भारतीय रेल में अधिक सफर करने वाला सहनशीलता के मामले में #गांधीवादी हो जाता है। कोई एक गाल में थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल झट आगे करने को तैयार! पहली बार रेलगाड़ी में सफर करने वाला व्यक्ति अव्यवस्था को देख भगत सिंह भले हो जाय, रोज-रोज सफर करने वाला गाँधी जी के बन्दर की तरह बुरा न देखो, बुरा न बोलो, बुरा न करो बड़बड़ाने लगता है।

इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि सहनशीलता की शिक्षा महात्मा गाँधी को दक्षिण अफ्रीका में रेलगाड़ी के सफर के दौरान मिली हो! क्या जाने उस समय दक्षिण अफ्रीका की रेलगाड़ी आज के भारतीय रेल की तरह प्रगति के पथ पर दौड़ती रही हो!

जैसे हर सफल पुरुष के पीछे कोई स्त्री होती है वैसे ही हर लेट ट्रेन के आगे एक मालगाड़ी होती है। लोग नाहक रेलगाड़ी को गाली देते हैं जबकि  रेलगाड़ी के लेट होने, हवा से बातें करने या पटरियों से उतर जाने के पीछे खुद रेलगाड़ी का कोई दोष नहीं होता। हानी, लाभ, जीवन, मरण सब ऊपर वाले की मर्जी पर होता है। इस सत्य को जान कर भी जो ट्रेन को गाली देते हैं उनको नादान ही समझना चाहिए।

जिसे हम अंग्रेजों का गिफ्ट मानते हैं वह भारतीय रेल अंग्रेजों द्वारा देश का माल लूटने की योजना का परिणाम हो सकती है। पहले मालगाड़ी बनाया फिर मालगाड़ी के लिए बनी पटरियों पर रेल दौड़ा दी। अब अंग्रेजों को क्या पता था कि आगे चलकर देश को आजाद कराने में और आगे विभाजन के समय भी रेलगाड़ी का खूब प्रयोग होगा!

दूसरे देशों में रेल भले पटरी पर चलती हो, भारतीय रेल हमेशा प्रगति के पथ पर दौड़ती है। प्रगती का पथ आप जानते हैं काटों भरा होता है। शायद यही कारण है कि अंग्रेजों द्वारा बनाई सभी सिंगल ट्रैक को हम आज तक डबल ट्रैक में नहीं बदल पाए।

बनी बनाई पटरी छोड़, निरन्तर प्रगति के पथ पर दौड़ रही है भारतीय रेलगाड़ी। पितर पक्ष में भले होरी अपने झोपड़ी के लिए गढ्ढा नहीं खोद सकता, #बुलेट_ट्रेन की नींव पड़ गई! यह भारतीय रेल द्वारा अंध विश्वास को ठेंगा दिखाना है। लगे हाथों यह भी सिद्ध हुआ कि अच्छा काम करने का कोई शुभ मुहूर्त नहीं होता। गलत काम करने के लिए भले ज्योतिष/वकील से सलाह ले लो, सही काम करने के लिए सिर्फ नेक इरादा और साहस की आवश्यकता होती है।

जितनी बार आप रेलगाड़ी में सफर करेंगे, उतनी बार आपको कोई नया दर्शन प्राप्त होगा। आपको सिर्फ गाँधी जी या मोदी जी जैसी दूर दृष्टि और अदम्य साहस दिखाते  हुए रेलगाड़ी में सफर करना है। सफ़र नहीं कर सकते तो स्टेशन में चाय ही बेचिए, दिव्य दृष्टि होगी तो फर्श से अर्श तक पहुंचते देर नहीं लगेगी। सफर कर रहे हैं और किसी टी टी ने आपको रेल से धकेल दिया तो समझो पूरा कल्याण ही हो गया। बिना सफर किये शीघ्र मंजिल पाना है तो रेल में नहीं, पटरी पर बैठने की आवश्यकता है।

रेलगाड़ी और जीवन में गहरा साम्य है। खिड़कियों से बाहर झांको तो बदलते मौसम का एहसास होता है। मंजिल से पहले कई स्टेशन आते/जाते हैं। मंजिल के करीब जा कर एहसास होता है कि वो बचपन था, वो जवानी और यह बुढापा है। सबसे दुखदाई तो मंजिल के करीब पहुँच कर आउटर में खड़ा होना होता है। रेलगाड़ी के सफर में आउटर अंतिम पड़ाव होता है। कई यात्री तो आउटर में ट्रेन को छोड़कर ऐसे चल देते हैं, जैसे कोमा में गये जिस्म को छोड़कर उनकी आत्माएँ। कई मंजिल की प्रतीक्षा में बेचैन हो जाते हैं और कई सफर के हर पल का आनन्द उठाते हैं। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप जीवन की इस रेलगाड़ी को कैसे जीते हैं।

22.8.17

भागे रे! #हवा खराब हौ!!!

कर्फ्यू वाले दिनों में बनारस की गलियाँ आबाद, गंगा के घाट गुलजार हो जाते । इधर कर्फ्यू लगने की घोषणा हुई, उधर बच्चे बूढ़े सभी अपने-अपने घरों से निकल कर गली के चबूतरे पर हवा का रुख भांपने के लिए इकठ्ठे हो जाते। बुजुर्ग लड़कों को धमकाते..अरे! आगे मत जाये!!
बनारस की गलियों में लड़कों को गली में निकलने से कौन रोक सकता था भला! घर के दरवाजे पर बाबूजी खड़े हों तो बंदरों की तरह छत डाक कर पड़ोसी के दरवाजे से निकल जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। लड़के गली के उस मोड़ तक पहुंच जाते जहाँ सड़क शुरू होती और पुलिस का पहरा चकाचक होता। जब पुलिस गली में लड़कों को दौड़ाती तो लड़के भाग खड़े होते। भागते हुए कोई दिख जाता तो जोर से चीखतेे...भाग @सड़ी के! हवा खराब हौ!!! मुसीबत के समय ही यह ज्ञान होता है कि हवा भी खराब होती है!
मास्टर साहब से पूछा..गुरुजी! हवा बहती है कि बहता है? गुरुजी भोजपुरी बेल्ट के थे, हँस कर बोले..हवा न बहती है न बहता है, हवा त बहेला! मुझे लगा वाकई हवा बड़ी खतरनाक चीज है। धीरे-धीरे ज्ञान हुआ हवा में ऑक्सीजन भी होता है, कार्बन भी। जहरीली भी होती है, प्राणदायी भी। एक कविता पढ़ी थी अपने पाठ्यपुस्तक में जिसमें हवा सूरज से भिड़ जाती है और एक राह चलते पथिक की शामत आ जाती है। यह कवि की निच्छल भावना थी। हर आदमी कवि नहीं होता और हर आदमी साधारण पथिक भी नहीं होता जिसे धूप और हवा अपनी उँगलियों पर नचाती हैं। धरती में ऐसे भी आदमी हैं जो धूप और हवा दोनो को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेते हैं!
दूसरों की हवा खराब करना और अपनी बनाना राजनीति का मूल मंत्र है। राजनीतिज्ञ से बड़ा कोई देशभक्त नहीं होता क्योंकि देशभक्ति से बड़ी कोई राजनीति नहीं होती। हवा बनाने से बनती है, बिगाड़ने से बिगड़ती है। विपक्ष प्रायः सरकार के हर निर्णय में कमी ढूँढ लेता है और सरकार अपने हर निर्णय को सही ठहराती है। सरकार का हर निर्णय सही और विपक्ष की हर आलोचना राजनीति से प्रेरित मानी जाती है। हवा का रुख भांप कर निर्णय इस प्रकार से लेना कि भले देश का आर्थिक नुकसान हो, उसके वोटर प्रसन्न रहें तो ऐसे निर्णय को राजनैतिक हवाबाजी कहते हैं।
दूसरों की हवा खराब करने और अपनी बनाने का खेल छोटे स्तर से अंतर्राष्टीय मंच तक चलता रहता है। विपक्ष की हवा खराब कर सत्ता हासिल करने के बाद राष्ट्राध्यक्ष की कोशिश होती है कि अंतर्राष्टीय स्तर पर दुश्मन देश की हवा खराब की जाये और मित्र देश की हवा बनाई जाये।
इस वक्त भारत में विपक्ष की और अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की हवा खराब है। तीन तलाक के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आने के बाद देश के महिलाओं के पक्ष में हवा बन गई है। अमेरिकी  राष्ट्रपति की ताजा विदेश नीति के कारण तो पाकिस्तान की हवा गुम हो गई लगती है। चीन हवा का रुख मोड़ना चाहता है। यही हाल रहा तो एक दिन आतंकवादी भागते हुए चिल्लाते मिलेंगे...भागे रे! हवा खराब हौ।

13.8.17

छेड़छाड़

शायद ही कोई पुरुष हो जिसने किसी को छेड़ा न हो। शायद ही कोई महिला हो जो किसी से छिड़ी न हो। किशोरावस्था के साथ छेड़छाड़ युग धर्म की तरह जीवन को रसीला/नशीला बनाता है। छेड़छाड़ करने वाले लेखक ही आगे चलकर व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यश प्राप्त करने के बाद भी व्यंग्यकार बाहर से जितने शरीफ भीतर से उतने बड़े छेडू किसिम के होते हैं। बाहर दाल नहीं गलती तो घर में अपनी घरानी को ही छेड़ते पाये जाते है। बात गलत लग रही हो तो बड़े-बड़े व्यंग्यकारों की हास्य के नाम पर परोसी गई व्यंग्य कविताएँ ही पढ़ लीजिये। कितने चुभते तीर छोड़े हैं इन्होंने अपनी पत्नियों पर! क्या किसी स्त्री को अपनी तुलना प्रेस वाली स्त्री से करते सुन अच्छा लगा होगा? बिजली के करेंट से तुलना करते अच्छा लगा होगा? शरीर की बनावट, मोटापा..बाप रे बाप! क्या-क्या नहीं लिखा इन व्यंग्यकारों ने! बाहर हिम्मत नहीं पड़ी तो घर में ही चढ़ाई कर ली।

महिलाएं भी अब आगे बढ़ कर व्यंग्य लिख रही हैं। कब तक छिड़ती रहतीं? उनका दर्द क्या पुरुष की कलम लिखती? महिलायें अब पलटवार कर रही हैं। वह कवि सम्मेलन सुपर हिट होता है जिसमें कोई महिला कवयित्री मंच पर खड़े होकर खुले आम मर्दों को छेड़ देती है! जिस कवि सम्मेलन में देर तक छेड़छाड़ चलती रहती है, वहाँ से दर्शक उठने का नाम ही नहीं लेते। ये शब्दों के खिलाड़ी होते हैं। लपेट कर कुछ भी कह दें, क्षम्य होता है। एंटी रोमियों के दस्ते तो नौसिखियों पर कहर ढाते हैं। पके पकाये तो छेड़छाड़ के बाद सम्मानित होते हैं।

जिंदगी के कई रंग हैं। छेड़छाड़ पर शुरू भले हो जाय, खत्म नहीं होती। जब खुद कुरुक्षेत्र में खड़ा होना पड़ता है तो हाथ-पैर फूल जाते हैं। आटे-दाल का भाव मालूम पड़ता है। कौन है अपना, कौन पराया तजबीजते-तजबीजते कृष्ण याद आने लगते हैं। कृष्ण की बांसुरी नहीं, गीता याद आती है। उपदेश सुनाई पड़ता है..हानी, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश हरि हाथ!

जीवन की विद्रूपताओं की समझ, सामाजिक और राष्ट्रीय चिंतन की ओर कब धकेल देती है पता ही नहीं चलता। मन का आक्रोश कागज में उतरने लगता है। छेड़छाड़ करने वाला, व्यंग्यकार भी बन जाता है।

छेड़छाड़ करने वाला वक्त के साथ कैसे तो बदलता जाता है! हर चीज जो उसके पहुँच से दूर होती है ढूँढ-ढूँढ कर तीर चलाता है। ना मिलने पर तंज कसता है, मिलने पर यशगान भी करता है। हारता है तो अपना गुस्सा घर पर उतारता है, जीतता है तो आरती भी उतारता है। कोई-कोई कर्म योगी हो सकता है, कितने तो भोगी बन जाते हैं। छेड़छाड़ वह गुण है जो गोपाल को #कृष्ण, लोभी को #आशाराम बना देता है।