उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।
बड़कू क बेटवा चिल्लायल, निन्हकू चच्चा भाग जा
गरजत हौ छोटकी क माई, भयल सबेरा जाग जा
घर से निकसल, घूमे-टहरे, चिन्ता धरल कपार बा
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।
घर में बिटिया सयान हौ, बेटवा बेरोजगार हौ
सुरसा सरिस, बढ़ल महंगाई, बेईमान सरकार हौ
काटत-काटत, कटल जिंदगी, कटत न ई जंजाल बा
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।
हमके लागला दहेज में, बिक जाई सब आपन खेत
जिनगी फिसलत हौ मुठ्ठी से, जैसे गंगा जी कs रेत
मन ही मन ई सोंच रहल हौ, आयल समय अकाल बा
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।
कल कह देहलन, बड़कू हमसे, का देहला तू हमका ?
खाली आपन सुख की खातिर, पइदा कइला तू हमका !
सुन के भी ई माहुर बतिया, काहे अटकल प्रान बा!
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।
ठक-ठक, ठक-ठक, हंसल डंड़ौकी, अब त छोड़ा माया जाल
राम ही साथी, पूत न नाती, रूक के सुन लs, काल कs ताल
सिखा के उड़ना, देखा चिरई, तोड़त माया जाल बा
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।
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कठिन शब्द..
डंड़ौकी = लकड़ी की छड़ी जिसे लेकर बुजुर्ग टहलने जाते हैं। बच्चों को नींद से जगाने के लिए सोटे के रूप में भी इसका इस्तेमाल कर लेते हैं।
माहुर बतिया = जहरीली बातें।