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2.2.26

बनारस

बिछी लाशें और जलती चिताओं के ऊपर
एक पतंग उड़ रही थी,
कोई
ठुमका लगा रहा था और वह
ठुमक-ठुमक
उछल रही थी!
मणिकर्णिका घाट था वह।

बगल में
हर हर महादेव के नारे लग रहे थे
गंगा स्नान के बाद
भक्त
दर्शन के लिए जा रहे थे
विश्वनाथ धाम था वह।
मणिकर्णिका के बगल में
सिंधियाघाट 
ऊपर संकठा माता का मन्दिर 
अन्नकूट का शृंगार था वहाँ।

यह कोई
नई बात नहीं थी,
चिताएं कभी बुझती नहीं, 
पतंग रोज उड़ता है,
हर हर महादेव के नारे रोज लगते हैं
अन्नकूट न सही
माँ संकठा की आरती 
रोज होती है।

बनारस 
जितना मरना जानता है उतना जीना जानता है
उसे मालूम है,
"राम नाम सत्य है।"
........

18.5.23

व्यवस्था

वह बड़ा आदमी है

सबसे ऊँची मढ़ी पर बैठ 

नदी में फेंकता है

पत्थर!


कई लहरें उठती हैं

गिनता है

एक, दो...सात, आठ, नौ दस...बस्स!

पुनः प्रयास करता है,

बड़ा पत्थर फेंका जाय

और लहरें उठेंगी!!!


छोटा आदमी

छोटी मढ़ी पर बैठ

फेंकता है पत्थर

गिनता है लहरें

वह भी संतुष्ट नहीं होता

तलाशता है

और बड़ा पत्थर!


नदी किनारे

नीचे घाट पर बैठे बच्चे भी

देखते-देखते सीख जाते हैं

नदी में कंकड़ फेंकना!


पैतरे से

हाथ नचा कर

नदी में ऐसे कंकड़ चलाते हैं

कि एक कंकड़

कई-कई बार

डूबता/उछलता है!

कंकड़ के

मुकम्मल डूबने से पहले

बीच धार तक

बार-बार 

बनती ही चली जाती हैं लहरें!!!


न बड़े थकते हैं

न बच्चे रुकते हैं

बनती/बिगड़ती रहती हैं लहरें!


पीढ़ी दर पीढ़ी

खेल चलता रहता है

बस नदी

थोड़ी मैली,

थोड़ी और मैली 

होती चली जाती है।

........@देवेन्द्र पाण्डेय।

12.2.22

प्रेम


अँधेरी राह में

घने वृक्षों के तले

अक्षर दिखे

गुच्छ के गुच्छ!


जुगनुओं की तरह

आपस में टकराते,

बिखर जाते।


तेजी से

बन/बिगड़ रहे थे

शब्द

हो रहा था

चमत्कार!


कठिन तपस्या के बाद

बस एक शब्द समझ पाया..

प्रेम!


मुग्ध हो

खोया रहा 

रात भर

हाय!

मुँह से

बोल ही नहीं फूटे।


चाहता था, चीखना...

देखो!

प्रेम मरा नहीं है,

अँधेरे में

जुगनुओं की तरह

आज भी

टिमटिमा रहा है।

....................

2.12.21

कथरी

पाठकों की मांग पर, कथरी का काशिका से हिंदी में अनुवाद...


कथरी-1

..............


कैसी तबियत है माँ?

कहारिन ठीक से आपकी सेवा कर रही है न?

क्यों गुस्सा हो?

पन्द्रह दिन बाद घर आये हैं, इसलिए?

क्या बताएँ माँ,

तुम्हारी बहू की तबियत खराब थी

और..

उस शनीचर को

छोटे बेटे के स्कूल में, वो क्या कहते हैं, पैरेंट्स मीटिंग था

तुम तो जानती हैं माँ

शहर की जिंदगी कितना हलकान करती है।


आपसे तो कई बार कहे,

चलो साथ!

वहीं रहो।

आपको तो पिताजी का प्यार घेरे रहता है

वो स्वर्ग जा चुके हैं

यहाँ, कब तक उनकी प्रतीक्षा करोगी?

जल्दी नहीं आएंगे।


क्या कह रही हो माँ?

इस कथरी से जाड़ा नहीं जाता?

दूसरा खरीद दें?

आपको मोतियाबिंद हुआ है, इसीलिए दिखाई नहीं देता

लो!

कह रही हो तो नई कथरी ओढ़ा दे रहे हैं!

(पलटकर, वही रजाई फिर ओढ़ा देता है!)


माँ!

रात को नींद आया?

क्या कह रही हो?

नई कथरी खूब गरमा रही थी!

खूब नींद आया!!!

ठीक ही है माँ,

जा रहे हैं,

सभी जरूरी सामान कोठरी में रख दिए हैं,

कहरनियाँ को समझा दिए हैं,

नौकरी से छुट्टी नहीं मिलती माँ,

जाना जरूरी है।

आपका विश्वास बना रहे,

कथरी तो

जब आएंगे, बदल देंगे

चरण स्पर्श।

...........


कथरी-2

...........


स्वर्ग में मजे उड़ाओ लेकिन सुनो भगवान

उलट-पुलट पुरानी कथरी ओढ़ाता है

तुम्हारा पुत्र विद्वान!

समझता है..

माँ को मोतियाबिंद हुआ है तो

गंध भी नहीं आएगी!

भोर में ही पूछता है बेईमान,

'नींद आया माँ?'


मन ही मन हँसी का फुहारा छूटता है,

मुँह से बस इतना ही निकलता है..

हाँ बेटा,

खूब नींद आया

नई कथरी बहुत गरमा रही थी

सुनकर, खुश हो जाता है पागल


हमको कर देगा कहरनियाँ के हवाले

अपने चला जाएगा 

शहर में कमाने

पत्नी को अपने

सर पर चढ़ाता है,

बच्चों को 

स्कूल में पढ़ाता है

पन्द्रह दिनों में यहॉं आता है तो

पुरानी कथरी उलट-पुलट ओढ़ाता है

इससे भला जाड़ा जाएगा?


नहीं खरीद पा रहे हो

एक नई रजाई

तो भाड़ में जाए

ऐसी कमाई।

.................

1.6.21

तीन कुत्ते


खेल रहे थे, न सो रहे थे

एक घाट में तीन कुत्ते

आपस में अपना दुखड़ा रो रहे थे।


बीच से दाएं वाले ने कहा...

दूर-दूर तक कोई यात्री नहीं दिखता।

जो  दिख भी रहे हैं

मुँह में पट्टी बाँधे घूम रहे हैं।

ऐसा लगता है 

इन्होंने कुछ न खाने का प्रण ले लिया है!

खाएंगे नहीं तो खिलाएंगे क्या?

अपने तो मरेंगे ही

हमको भी भूखा मारेंगे।


अपनी बात समाप्त कर उसने लंबी जम्हाई ली और सोने का प्रयास करने लगा।


बीच से बाएँ वाले ने कहा...

मुझे तो ये उस बंदर की औलाद लगते हैं 

जो एक बार घाटों में घूम-घूम कर सबको समझा रहा था..

मीठा न बोल सको तो चुप रहो

बुरा मत बोलो! बुरा मत बोलो! बुरा मत बोलो!


बीच वाला अपने साथियों पर गुर्राया...

तुम सब मूर्ख हो! 

भूख अच्छे अच्छों को मक्कार बना देती है।

तुम सब 

सूँघने की शक्ति खो कर

चोर/साधु, दुखी/सुखी, अपने/पराए में भेद कर पाना,

भूल चुके हो। 

भूख ने तुम्हें

उन गुणों से ही वंचित कर दिया है

जिनके कारण

मनुष्य 

अपने भाई से अधिक 

हम पर विश्वास करता है।


मनुष्य जाति पर कोई बड़ा संकट आया है

रोटी की तलाश में, 

जान जोखिम में डालकर, 

कल मैं 

श्मशान घाट तक गया था।

वहाँ का दृश्य देखकर

मेरे आंखों में आँसू आ गए

जिधर देखो उधर लाशें जल रही थीं

अपनों को जलाने के लिए

ये दो पाए, लाइन लगाए खड़े थे

वहीं मैने सुना

जो नहीं जला पाए वे

अपनो के शव

नदी किनारे मिट्टी में गाड़ कर या 

गङ्गा में बहाकर चले गए।


मनुष्य अभी दुखी हैं

सभी प्राणियों की भलाई के लिए

मनुष्यों का प्रेम से रहना और सुखी होना आवश्यक है।

आओ!

मनुष्यों की भलाई के लिए

ईश्वर से प्रार्थना करें।


इनकी बातें सुनकर 

मेरे मन ने प्रश्न किया...

तुम्हारी मनुष्यता कब जागेगी?

क्या ये कुत्ते

भूख से मर जाएंगे?

................

30.5.21

तीन बकरियाँ



फसल कट चुकने के बाद

मालिक ने छोड़ दी

तीन बकरियाँ

खेत में

चरने के लिए


धूप में 

आगे-पीछे

देर तक चलते-चलते

न आया मुँह

किसी के

घास का एक तिनका


सबसे पीछे वाली ने

आगे चल रही दोनों बकरियों को 

उलाहना दिया..

मेरे हिस्से का भी खा लिया!

बीच वाली ने भी

स्वर में स्वर मिलाया..

मेरा भी!

आगे वाली ने माथा पीट लिया..

हाय!

जब बुरे दिन आते हैं

तो अपने भी

शक करने लगते हैं। 


अक्सर यही होता है

दूध

दुह लेने के बाद

छोड़े जाते हैं

बछड़े,

खेत काट लेने के बाद

छोड़ी जाती हैं

बकरियाँ।


अभाव में

एक दूसरे पर शक करते हुए

लड़ते/मरते रहते हैं

कमजोर प्राणी

समझ ही नहीं पाते

दूध 

कोई और दुह कर ले जाता है,

फसल

कोई और काट कर ले जाता है।

............

8.2.21

शत्रुता

मैने मांगा, 

जाड़े की धूप

उसने दिया,

घना कोहरा!


मैने पूछा,

"ठंडी कब जाएगी?"

उसने कहा,

"थोड़ी बर्फवारी होने दो।"


मैने पूछा,

"बसंत कहाँ है?"

उसने कहा,

"रुको! एक ग्लेशियर टूट जाने दो!"


मैने कहा,

"जाओ! 

तुमसे बात नहीं करते।"

उसने कहा,

"मित्र! 

तुमसे ही सीखी है यह 

शत्रुता!"

.........

गुलाब


क्या तुम्हें याद है?

पहली बार

गुलाब पकड़ते वक्त

परस्पर

छू गई थीं

हमारी उँगलियाँ

तब क्या हुआ था?

मुझे तो याद है..

गुलाब और गुलाबी हो गया था!


क्या तुम्हें याद है?

तुम्हारी जुदाई में 

कैसे रंग बदलता था गुलाब?

मुझे तो याद है

बिलकुल पीला!

और फिर

मेरे लौट जाने की बात सुनते ही

सफेद!


क्या तुम्हें याद है?

आज किस हाल में है

हमारा गुलाब?

मुझे तो याद है

बिलकुल वैसा 

जैसा पहली बार आया था 

उँगलियों में

लेकिन

मैं उसे देख नहीं सकता।☺️

.............

25.1.21

वसंत

यूं ही नहीं आता वसंत

लड़नी होती है, लंबी लड़ाई

धूप को

कोहरे के साथ।


लगने लगता है

हार गया कोहरा

तभी नहीं दिखती

धूप

लगने लगता है

गई ठंडी

छाने लगता है

घना कोहरा


यूँ ही नहीं आता 

मगर तय है

कोहरे को हराकर

आता है एक दिन

वसंत।

21.12.20

मन बहुत बेचैन मेरा

 मन बहुत बेचैन मेरा

तू मिले तो चैन आए।


तू धरा में तू गगन में

जर्रे-जर्रे में छुपा तू

है पढ़ा हमने भी लेकिन

वही दिन औ रैन आए!


मन बहुत बेचैन मेरा

तू मिले तो चैन आए।


मूर्तियाँ तेरी अनेकों

और अनगिन प्रार्थनाएँ

रूप हैं तेरे अनेकों

दे दरश! अब नैन छाए।


मन बहुत बेचैन मेरा

तू मिले तो चैन आए।


इन खिलौनों पर नज़र

मेरी कहीं टिकती नहीं है

गाँठ बाँधा है तुम्ही ने

दूसरा कैसे छुड़ाए!


मन बहुत बेचैन मेरा

तू मिले तो चैन आए।

.........................

17.12.20

चालाक चिड़ियाँ

एक चिड़िया

नींबू की डाली से उतर

मुंडेर के प्याले पर बैठ गई

इधर-उधर मुंडी हिलाई,

पूँछ उठाई

फिर गड़ा दिए चोंच प्याले में और..

उड़ गई।


हाय!

प्याले में पानी नहीं है।


यह तो वह 

देख ही रही होगी ऊपर से

फिर उसने इतनी मेहनत क्यों की?


शायद

मुझसे पानी मांगने का

उसके पास

यही आसान तरीका था!


मैने दौड़कर

प्याले में पानी भरा और छुपकर 

उसकी प्रतीक्षा करने लगा


चिड़िया फिर आई

प्याले पर बैठी,

इधर-उधर मुंडी हिलाई,

पूँछ उठाई फिर फुदककर 

कूद गई प्याली में!

फर्र-फर्र पंख फड़फड़ाती,

छींटे उड़ाती

पानी से

खेलती रही देर तक।


हांय!

प्यासी नहीं थी,

यह तो बड़ी 

चालाक निकली

नहाने लगी!!!


सावधान!

प्यासा समझकर पानी पिलाओ

तो आजकल

नहाने लगती हैं

चिड़ियाँ।

.......

20.10.20

हमारा कुछ न बिगड़ेगा

धीरे-धीरे
कम हो रहा था
नदी का पानी

नदी में
डूब कर गोता लगाने वाले हों या 
एक अंजुरी पानी निकाल कर
तृप्त हो जाने वाले,
सभी परेशान थे..
बहुत कम हो चुका है
नदी का पानी!

बात राजा तक गई
जाँच बैठी
नदी से ही पूछा गया...
पानी क्यों कम हुआ?

नदी ने 
राजा को देखा 
कुछ बोलने के लिए होंठ थरथराए पर...
सहम कर सिल गए!

राजा ने
नदी किनारे
सिपाही तैनात कर दिए
बोला..
अब देखें
कैसे कम होता है
नदी का पानी?

हाय!
नहीं रुका
पानी का घटना 
नदी 
सूखने के कगार तक पहुँच गई
एक दिन
हकीकत जानने के लिए
साधारण ग्रामीण का भेष बना कर
राजा स्वयं 
नदी के किनारे घूमने लगा

अरे! यह क्या!!!
सिपाही मेंढक को क्यों मार रहे हैं?
सुनो भैया!
आप राजा के आदमी होकर
इन निरीह मेढकों को क्यों मार रहे हो?
सिपाही बोले...
ये मेंढक
नदी का पानी पी कर भाग रहे थे!

देखो!
ये जब भी फुदकते हैं
दो बूंद पानी
झर ही जाता है!!!

राजा ने
प्रत्यक्ष देखा था
शक की कोई गुंजाइश नहीं थी
मेंढकों का अपराध 
सिद्ध हो चुका था।

सजा के तौर पर
मेंढक के पैरों में कील ठोंककर
उसका कलेजा निकाला जाना था
यह सब सुनकर
बिलों में छुपे साँप
बाहर निकल आए और..
तट किनारे खड़े
बरगदी वृक्ष की शाखों पर चढ़कर
कानों में
राजा का फैसला सुनाने लगे

खबर सुनकर
बरगद हँसने लगा...
यही होता आ रहा है सदियों से
हमारा कुछ न बिगड़ेगा
तुम सब निश्चिंत रहो।
..................

12.10.20

मुझे आकाश चाहिए

तुम

हवा, जल और धरती का प्रलोभन देते हो

इन पर तो मेरा 

जन्मसिद्ध अधिकार है!


तुमने

सजा रखे हैं 

रंग बिरंगे पिजड़े

और चाहते हो

दाना-पानी के बदले

अपने पंख 

तुम्हारे हवाले कर दूँ?


अपने सभी पिजड़े हटा दो,

मेरे पंख मुझे लौटा दो

मुझे आकाश चाहिए।

7.7.20

शुभ/अशुभ

बिल्ली ने
दो बच्चे दिए बारिश में
भगा दिया था
दिन में
फिर आकर, रो रहे हैं
रात में

खाली नहीं है शायद
किसी के घर/आँगन का कोई कोना
आ गए हैं
मेरे ही चहारदीवारी के भीतर
रो रहे हैं,
मेरे ही कपारे पर!

बिल्ली को
ऐसा क्यूँ लगता है?
कॉलोनी में
मैं ही सबसे बड़ा दयालू हूँ!

सुनता आया हूँ...
बिल्ली का रोना अशुभ होता है
रोते को चुप कराने की क्षमता न हो तो
आसान है
उसे मारकर भगा देना
लेकिन जैसे ही भगाना चाहता हूँ
पूछती हैं
अँधेरे में चमकती ऑंखें...
चली तो जाऊँ लेकिन इतना बता दो,
किसका रोना शुभ होता है?
..................…................

14.6.20

जब भी मिलता है सम्मान...

जब भी
मिलता है सम्मान
कहता
भीतर का इंसान
तूने
रूप बनाया है!
तूने
झूठ सुनाया है!
दिल में खंजर रख कर सबको
गले लगाया है।

जब भी मिलता है सम्मान.....

तेरा
होता है सब काम
बाबू
करते सभी सलाम
तूने
चाय पिलाया है
तूने
पान खिलाया है
सूटकेस में गड्डी भर-भर,
घर पहुँचाया है।

जब भी मिलता है सम्मान....

तेरा
जगमग है दिनमान
चाहे
डगमग हिंदुस्तान
मंदी में भी तेरी चउचक
चलती है दुकान!

जब भी मिलता है सम्मान....

तूने
ग़दर मचाया है
तूने
शहर जलाया है
धर्म, जाति के नाम पे सबको
खूब लड़ाया है।

जब भी मिलता है सम्मान.....
....@देवेन्द्र पाण्डेय।

28.5.20

लोहे का घर 60

लोहे के घर की खिड़की से
बगुलों को
भैंस की पीठ पर बैठ
कथा बाँचते देखा।

धूप में धरती को
गोल-गोल नाचते देखा।

घर में लोग बातें कर रहे थे...
किसने कितना खाया?
हमने तो बस फसल कटे खेत में
भैस, बकरियों को
आम आदमी के साथ भटकते देखा।

खिड़की से बाहर चिड़ियों को
दाने-दाने के लिए,
चोंच लड़ाते देखा।

सूखी लकड़ियाँ बीनती,
माँ के साथ कन्धे से कन्धा मिलाये भागती
छोरियाँ देखीं। 

गोहरी पाथती,
पशुओं को सानी-पानी देती,
घास का बोझ उठाये
खेत की मेढ़ पर
सधे कदमों से चलती
ग्रामीण महिलायें देखीं।

लोहे के घर की खिड़की से
तुमने क्या देखा यह तुम जानो, 
हमने तो
गन्दे सूअर के पीछे शोर मचा कर भागते
आदमी के बच्चे देखे।
............

24.5.20

बच्चे

रोटी पर बैठकर
उड़े थे
कोरोना खा गया रोटी
पैदल हो गए
सभी बच्चे

तलाश थी
ट्रेन की, बस की
कुचले गए
पटरी पर, सड़क पर

हम
धृतराष्ट्र की तरह
अंधे नहीं थे
देखते रहे दूरदर्शन
देखते-देखते
मर गए
कई बच्चे!

शहर से
पहुँचे हैं घर
बीमार हैं, लाचार हैं
जागते/सोते
देखते हैं स्वप्न...
रोटी का सहारा हो तो
उड़ चलें
फिर एक बार
यहाँ तो
डर है! नफरत है!
कैसे रहें?
..........

20.5.20

बह रही उल्टी नदी.....


तुम नदी की धार के संग हो रहे थे
फेंककर पतवार भी तुम सो रहे थे।

बह रही उल्टी नदी, अब क्या करोगे?
क्या नदी के धार में   तुम फिर बहोगे?

चढ़ नहीं सकती पहाड़ों पर नदी
है   बहुत  लाचार देखो यह सदी।

डूब जाएंगे सभी घर, खेत, आंगन
या तड़प, दम तोड़ देगी खुद अभागन!

किंतु सोचो तुम भला अब क्या करोगे?
बच गए जो भाग्य से क्या फिर बहोगे?

बहना पड़े गर धार में, इतना करो तुम
पतवार भी यूँ भूलकर मत फेंकना तुम

फिर नदी उल्टी बही तो, लड़ सकोगे
जब तलक है प्राण, आगे बढ़ सकोगे।
..............

18.5.20

दृष्टि

हम सभी को मिली है
दृष्टि संजय की!
देख सकते हैं दशा
कुरुक्षेत्र की।

धृतराष्ट्र बन पूछते
कितने मरे?
आज तक घायल हुए
कितने बताओ?

चल रहे हैं सड़क पर
मजदूर सारे
लड़ रहे हैं निहत्थे
क्रूर पल से।

ठीक है किंतु अब तुम
यह बताओ?
क्या कोई, अपना/सगा
घायल पड़ा है?

दूर है काल फिर तो
भय नहीं है
दृष्टि बदलो अब जरा
गाना सुनाओ।

12.5.20

खुश रहिए, मस्त रहिए

हँसाना पहले भी
आसान नहीं हुआ करता था
फिर भी लोग
हँसते थे, हँसाते थे।

अब तो
और भी कठिन हो गया है
दिन ब दिन
बढ़ती जा रही है
दुखियारों की संख्या
और हँसाने वाले, रोने लगे हैं
खुद ही।

फिर भी,
यह जानते हुए भी कि
कम ही होते हैं
जान से ज्यादा
चाहने वाले दुनियाँ में
जब तक
जान में जान है
खुश रहिए, मस्त रहिए
मरना तो है ही
एक दिन
नहीं आया, कोई यहाँ
अमर होकर।
...............