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13.9.24

हे गणेश


वक्रतुंड महाकाय!

शक्ति दो

कर सकें सवारी

हम भी

चूहे पर।


चंचलता के प्रतीक

चूहे पर 

सवारी करना क्या सरल है?

सवारी क्या

इसे तो पकड़ना ही

कठिन है।


रोटी का लालच दे

कुछ समय के लिए

फंसा तो सकते हो

चूहेदानी में 

लेकिन कब तक?

क्या केवल

एक ही चूहा है 

घर में?

एक को पकड़ा और बाकी

सारी उम्र

ऊधम मचाते रहें!

दूसरे को फंसाने के लिए

पहले को 

छोड़ना ही पड़ेगा।


हत्या कर सकते हो

यह आसान है

जहर की पुड़िया खरीदी

आटे के घोल में मिलाया

और.. 

धोखे से खिला दिया!

क्या फिर 

नहीं आ जाते,

समाप्त हो जाते हैं

पूरी तरह?


चूहे को 

मोदक खिलाकर

खूब मोटाते हुए स्वतंत्र छोड़कर

बुद्धि से 

अपने वश में करके

उस पर 

आजीवन सवारी करना!

यह तो 

गणेश जी ही कर सकते हैं।


हे बुद्धि विनायक!

शक्ति दो

कर सकें सवारी 

हम भी

मन पर।

.........

19.9.12

हे गणेश !


(साक्षी विनायक)


हे गणेश!
वक्रतुंड महाकाय!
आप खूब खाते हो
आपका खाया-पीया 
दिखा देता है आपका पेट
लेकिन
हमारे आज के भगवान जो खाते हैं
उसकी तुलना में
यह तो कुछ भी नहीं है!
आज के भगवान के खाने का
नहीं है कोई 
फिक्स रेट
आपसे डबल
डबल क्या, बबल डबल खाते हैं
और खा कर
डकार भी नहीं लेते
जाने किस पेट में
छुपा जाते हैं!

हे गणेश!
ये बड़े चमत्कारी
खा कर भी बने रहते हैं
पहले की तरह भिखारी 
इन्होने क्या खाया?
जानने के लिए
जाना पड़ता है
विदेश!
गज़ब है उनका 
छद्मवेश!

हे गणेश!
क्षमा करना
आप से इनकी तुलना ठीक नहीं
मगर दिल में जो दर्द है
बिना बताये
चुप रह जाना भी ठीक नहीं।
जानता हूँ  
जब-जब टूटता है
रावण का अहंकार
बार-बार चाहता है
आपका ही आशीर्वाद
आपका ही प्यार
मगर मामूली नहीं हैं
आज के भगवान!
पहले जबरदस्ती
बन जाते थे 
नरेश!
अब तो
बन जाना चाहते हैं
परम पिता
साक्षात महेश!

हे गणेश!
क्या विडंबना है !
आपने चूहे को अपना वाहन बनाया
इन्होने आपका अनुसरण कर
पूरी जनता को ही
चूहा बना दिया !
आप चूहे बिना नहीं चल सकते
ये जनता बिना रह नहीं सकते
जैसे आपके इर्द-गिर्द रहने वाले चूहे
आपका प्रसाद पा
खूब मोटे हो जाते हैं
वैसे ही
इनके निकट रहने वाले चूहे
इनका चूरन पा
अहंकार से 
पागल हो जाते हैं
गज़ब है इनके चूरन की ताकत
खाते ही
आपको भजना छोड़
उन्हीं की शरण में चले जाते हैं।
कलियुगी भगवान को
उनके भक्त
आपसे भी ऊँचे आसन पर
ठाठ से बिठाते हैं।

हे गणेश!
आपको चाहते हैं
दीन, दुखी, लाचार
थोड़े से कवि, कलाकार
या फिर 
बालगंगाधर तिलक की तरह
जिन्हे है 
इस देश से प्यार
मगर इनको चाहता है
पूरा कालाबाजर!

हे गणेश!
जब कभी
ये आपको आगे कर
सजाते हैं
आपके पंडाल 
तो दुष्टों की तबियत
खिल जाती है
मगर अपनी आत्मा
पूरी तरह से
हिल जाती है

इनका पिछलग्गू, चूहा बनकर 
जीने से अच्छा है
आपके साथ
गंगा में डूब जाना

आए हो 
तो ले चलो न इस बार
अपने देश!

हे गणेश !
………………………