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9.6.15

धूप

लोहे के घर में
खिड़की से बाहर
धूप है,
प्रचण्ड धूप....

झील-झरने, ताल-तलैया, नदियाँ-समुंदर
सब मिलकर भी
नहीं बुन पा रहे
बादलों की चादर
नहीं टाँक पा रहे इंद्रधनुष
बेलगाम हो चुकी हैं
आवारा किरणें

सूखी बंजर धरती और
खेतों में उग रहे कंकरीट के मकानों के बीच
भयभीत खड़े हैं
घने वृक्ष!

नीचे
कसाई वक़्त से बेखबर
उछल रही हैं
छोटी बकरियाँ। 

11.4.15

गर्मियों के दिन

रद्दी कागज़ बेचोssss
चीखता, निकल गया रद्दी वाला
याद आने लगीं
बनारस की संकरी गलियाँ
पुराना घर

दुपहरिया में
एक गाय आकर
घुसेड़ देती थी पूरी गरदन
गली में खुलते
कमरे के दरवज्जे को धकेल कर
पी जाती थी
एक बाल्टा पानी
हँसता था
सामने
चबूतरे पर बैठा
प्याऊ!
चहकती थीं
ऊपर
बिजली के तार पर बैठीं
गौरैया!

चना जोर गरम बेचता था
लूला
कुहनी के ऊपर से ही
गायब थे उसके
दोनों हाथ
जिसमे बंधे होते थे
स्टील के बड़े-बड़े चम्मच
इन्हीं चम्मचों को पीटकर
बुलाता था ग्राहक
तौलता, बेचता था
चने

शनीवार के दिन
आते थे
शनी देव वाले बाबा
आइसक्रीम वाला
काले-काले जामुन
और भी दूसरे फेरी वाले
मगर यहाँ
कॉलोनी में
सिर्फ एक
रद्दी कागज़ बेचोssss