लोहे के घर में
खिड़की से बाहर
धूप है,
प्रचण्ड धूप....
झील-झरने, ताल-तलैया, नदियाँ-समुंदर
सब मिलकर भी
नहीं बुन पा रहे
बादलों की चादर
नहीं टाँक पा रहे इंद्रधनुष
बेलगाम हो चुकी हैं
आवारा किरणें
सूखी बंजर धरती और
खेतों में उग रहे कंकरीट के मकानों के बीच
भयभीत खड़े हैं
घने वृक्ष!
नीचे
कसाई वक़्त से बेखबर
उछल रही हैं
छोटी बकरियाँ।
खिड़की से बाहर
धूप है,
प्रचण्ड धूप....
झील-झरने, ताल-तलैया, नदियाँ-समुंदर
सब मिलकर भी
नहीं बुन पा रहे
बादलों की चादर
नहीं टाँक पा रहे इंद्रधनुष
बेलगाम हो चुकी हैं
आवारा किरणें
सूखी बंजर धरती और
खेतों में उग रहे कंकरीट के मकानों के बीच
भयभीत खड़े हैं
घने वृक्ष!
नीचे
कसाई वक़्त से बेखबर
उछल रही हैं
छोटी बकरियाँ।