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16.12.15

गौरैया


जब से 
गायब हुई हैं गौरैया
मेरे शहर के घरों ने
सुबह-शाम चहकना
रात भर
गहरी नींद सोना 
छोड़ दिया है।

देर से उठना
दिन भर
धूल-धुएँ में जीना
जाम सड़क पर
एक हाथ नचाते हुए
दूसरे हाथ से
कान दबाकर
पागलों की तरह बड़बड़ाना
रात भर 
उल्लुओं की तरह जागना
शुरू कर दिया है।

जब से 
गायब हुईं हैं गौरैया
कम हुआ है
धरती का जल स्तर
मैली हुई हैं 
नदियाँ
गायब हो चुके हैं
जलाशय
मरने लगी हैं
तालाब की मछलियाँ।

कई वर्षों बाद
दूसरे शहरों से लौटकर
अजनबी की तरह
गली-गली भटकते
दुखी हो
मित्रों से पूछते
यहाँ के पुरनिये-
यार!
कहाँ चली गई
बनारस की गौरैया ?
साइबेरियन पंछियों के सामने
मुँह दिखाने लायक नहीं रहा
अपना शहर!