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12.2.22

प्रेम


अँधेरी राह में

घने वृक्षों के तले

अक्षर दिखे

गुच्छ के गुच्छ!


जुगनुओं की तरह

आपस में टकराते,

बिखर जाते।


तेजी से

बन/बिगड़ रहे थे

शब्द

हो रहा था

चमत्कार!


कठिन तपस्या के बाद

बस एक शब्द समझ पाया..

प्रेम!


मुग्ध हो

खोया रहा 

रात भर

हाय!

मुँह से

बोल ही नहीं फूटे।


चाहता था, चीखना...

देखो!

प्रेम मरा नहीं है,

अँधेरे में

जुगनुओं की तरह

आज भी

टिमटिमा रहा है।

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6.2.11

करोरम किसी से करो........

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नीम बहुत उदास था
फिज़ाओं में धूल है, धुआँ है
न बावड़ी है न कुआँ है
पीपल ने कहा...
आजा मेरी गोदी में बैठ जा !

नीम हंसा...
फुनगियाँ लज़ाने लगीं
कौए ने कलाबाजी करी
वक्त ने पंख फड़फड़ाये
पीपल की गोद में
नन्हां नीम किलकारी भरने लगा

आज
नीम बड़ा हो चुका है
उसकी शाखें पीपल से भी ऊँची हैं
जड़ें एक दूजे से गुत्थमगुत्था
अब चाहकर भी दोनो को अलग नहीं किया जा सकता

उसे देख
प्रभावित होते हैं
हिंदू भी, मुसलमान भी, सिक्ख भी, इसाई भी
वे भी जो ईश्वर को मानते हैं
वे भी जो ईश्वर को नहीं मानते

मैं जब भी
उस वृक्ष के पास से गुजरता हूँ
तो लगता है इसकी शाखें बुदबुदाती रहती हैं
करोरम किसी से करो।
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