अँधेरी राह में
घने वृक्षों के तले
अक्षर दिखे
गुच्छ के गुच्छ!
जुगनुओं की तरह
आपस में टकराते,
बिखर जाते।
तेजी से
बन/बिगड़ रहे थे
शब्द
हो रहा था
चमत्कार!
कठिन तपस्या के बाद
बस एक शब्द समझ पाया..
प्रेम!
मुग्ध हो
खोया रहा
रात भर
हाय!
मुँह से
बोल ही नहीं फूटे।
चाहता था, चीखना...
देखो!
प्रेम मरा नहीं है,
अँधेरे में
जुगनुओं की तरह
आज भी
टिमटिमा रहा है।
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