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7.1.17

लोहे का घर-24

लोहे के घर की खिड़की से झाँक रहा हूँ मैं और घर में घुसने का प्रयास कर रहा है कोहरा। आजकल रोज के यात्रियों के समय से नहीं आती ट्रेन, ट्रेन के समय से चलना पड़ता है यात्रियों को। लेट है अपनी फोट्टीडाउन, दस बजे के बाद आयेगी। भोर में आने वाली किसान सुबह 7 बजे के आस-पास चली। कोई नहाकर आया है, कोई बिना नहाये। किसी को चाय मिल गई , कोई-कोई भाग्यशाली है जो नाश्ता भी कर चुका है। सभी के झोले में है टिफिन और पानी।
सभी के चेहरे पर ट्रेन पकड़ पाने की खुशी है। कोई अभागा भगा-भागा प्लेटफॉर्म से फोन कर रहा है। साथी संवेदना प्रकट कर रहे हैं-आप चूक गए, जाइये! बस से आइये। चौड़ी करण के कारण सड़क मार्ग धूल और जाम से भरा है, उप्पर से 61/. रूपये का अतिरिक्त खर्च। ट्रेन छूटने की पीड़ा वही समझ सकता है जिसकी ट्रेन कभी छुटी हो। जाके पैर न पड़ी बिवाई, ऊ का जाने पीर पराई!
जिसने ट्रेन पकड़ लिया वे अपने को परम् सौभाग्यशाली समझ रहे हैं। कोई अख़बार पढ़ रहा है, कोई मोबाइल चला रहा है और कोई खाली बर्थ ढूँढ कर अधूरी नींद पूरी कर रहा है। नोट बंदी पर चर्चा करते-करते बोर हो चुके लगता है। मोबाइल बैंकिंग के डाउनलोड किये गये नये-नये एप दिखाये जा रहे हैं एक दुसरे को। वेतन निकालने और खर्च करने के तरीके ढूंढे जा रहे हैं। वक्त के साथ खुद को अपडेट करने में लगे है लोग। एक दुसरे से पूछ कर सीख रहे हैं जीने के तरीके। सुबह-सुबह दाने-पानी की तलाश में भागते पंछियों की तरह चहक रहे हैं रोज के यात्री।
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ठंड बहुत बढ़ गई है। रोज के यात्री जैकेट, टोपी, मफ़लर पहने चहक रहे हैं। अंतरिक्ष यात्री लग रहे हैं सभी लोहे के घर में। आज कोहरा नहीं है लेकिन चल रही है शीतलहरी। रोज के यात्रियों के अपने-अपने ग्रुप हैं। कहीं चल रही है चर्चा, कहीं खुल गई है तास की गड्डी, कहीं खुल चुका है टिफिन, कोई पढ़ रहा है अखबार तो कोई मशगूल है मोबाइल में।
एक ने उछलकर सभी को वीडियो दिखया जिसमें जयमाल के समय खुल जाता है दूल्हे का पजामा और हँसने लगती है सबके साथ दुल्हन भी। हँसी या गम इसी को कहते हैं, जो फ़ूटकर निकल जाये। रोकना चाहो मगर रुके ही न। न माने कोई बंधन। वैसे ही दुःख छाती पीटने या संसद में कोहराम मचाने से व्यक्त नहीं होता। अच्छे दिन के नारों से नहीं आते अच्छे दिन। ये तो महसूस होता है खुद ब खुद। हल्ला मचाकर किसी को एहसास नहीं दिला सकते कि अच्छे या बुरे दिन आ गये।
लगभग सही समय से ही चल रही है अपनी #ट्रेन। धूप नहीं निकली है लेकिन कोहरा भी नहीं है। लोहे के घर की खिड़की से दिख रहे हैं हरे अरहर और पीले सरसों के खेत। आसमान के श्वेत रंग को मिलाकर देखो तो याद आता है अपना #तिरंगा । बीच-बीच में बरगद की लम्बी झूलती जड़ें, पगडंडियों पर चलते स्कूल जाते बच्चे, अलाव जला कर आग तापते लोग और खेतों में अपनी मिट्टी से प्यार करते ग्रामीण। कर्मशील मनुष्यों का दर्शन बड़ा शुभ होता है। अकर्मण्य नहीं दिखते, लोहे के घर से।
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ट्रेन लेट हो तो मुसीबत, राइट हो तो और भी मुसीबत! आज फोट्टीनाइन बहुत दिनों के बाद राइट टाइम आई और छूट भी गई। बहुत से रोज के यात्रियों की ट्रेन छूट गई। वे घर से ये मान कर चले थे कि नेट में भले राइट टाइम दिखा रहा हो पर आयेगी थोड़ी न!
अविश्वास लोगों में बढ़ता जा रहा है। शादी की पार्टी हो, समारोह हो या फिर लैला के वादे हों निर्धारित समय से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। इधर ट्रेन और नोट बंदी के बाद बन-बिगड़ रहे नये नियमों से भी लोग सशंकित हुए हैं। आम आदमी के पास 2000 का नया नोट आया नहीं कि जल्दी से भजाने की जुगत में लग जाता है। कहीं यह भी बंद न हो जाय! अब ऐसे माहौल में किसी का ईमानदार निकल जाना, किसी का वादा निभाना या किसी ट्रेन का सही समय पर छूट जाना सरासर धोखा है। आम आदमी पर यह ईमानदारी भी गाज बनकर गिर रही है।
इस ईमानदार धोखाधड़ी करने वालों में हमारे प्रधान मंत्री जी नोटबंदी करके सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुए। समूचा विपक्ष नाराज है-ये तो बहुत बड़ा धोखा है! चुनाव सर पर है और इतना बड़ा धोखा!!! अब सबने मिलकर प्रचारित करना शुरू किया, यह तो गरीबों के साथ धोखा है। गरीबों को परेशानी हो भी रही है। बड़े लोगों की चोर-बाजारी पकड़ में भी आ रही है। चोर नये-नये पैतरे खोज रहे है, सरकार नये-नये नीयम बना रही है।
इस नूरा कुश्ती में जो सबसे ज्यादा परेशान है वो है आम आदमी। पहले उसे लगा कि डकैती डालकर जो धनवान बने थे उनके नोट बेकार हो गए। बहुत खुश हुए कि घंटों लाइन में लगे हैं तो क्या, चोरवे तो बरबाद हुए! अब नाराज है -हमारे लिए नोट नहीं लेकिन चोरों को लाखों के नए नोट! जइसे नोट बंद कर मोदी जी अपनी पीठ थपथपा कर, तालियाँ बजवाकर राजनीति करने लगे वइसे पूरा विपक्ष नोटबंदी की परेशानियां गिना कर उन्हें झूठा साबित करने में जुट गए। जइसे किसी दफ्तर में आ टपके किसी ईमानदार अधिकारी को उनके मातहत ही कोसने लगते हैं, वइसे जिनके बल पर नोटबंदी का फैसला किया, वे ही उनको गलत साबित करने में जुट गये!
अब तो माहौल यह हो गया है कि जिसके साथ जो भी बुरा होता है इल्जाम झट से मोदी जी के सर फोड़ देता है। आर बी आई नीयम बदले, इल्जाम मोदी पर। कहीं कोई किसी अव्यवस्था का शिकार हो, इल्जाम मोदी पर। हद तो तब हो गई जब सही समय पर जाने से यात्रियों की ट्रेन छूटी, इल्जाम मोदी पर! कोई कह रहा था-मोदिया ट्रेन छुड़ा देहलस!!! सरकार, पार्टी सब हल्के, अच्छे-बुरे सभी के लिये जिम्मेदार-मोदी जी।
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इधर दून के आने का एनाउंसमेंट शुरू हुआ , उधर भण्डारी स्टेशन पर नशे में झूमते, सबका मालिक एक....नशेमन तेरे लिये...! गाते, नाचते अर्धविक्षिप्त शराबी के कदम ठिठके। यात्रियों का रेला एक प्लेटफॉर्म से दूसरे की ओर भागने लगा। शराबी के इर्द-गिर्द गोल गोलइया में बड़ी देर से मजमा लगाये हंस रहे रोज के यात्रियों ने नशेड़ी को छोड़ अपनी-अपनी पोजीशन ले ली।
बहुत भीड़ है आज ट्रेन में। इस बोगी से उस बोगी टहलते-टहलते आखिर ऊपर चढ़ कर बैठने भर की जगह मिल गई है। दून से आ रहे कोलकोता जाने वाले यात्रियों की भीड़ है। लगता है जैसे बंगाल के किसी घर में बैठे हैं। आज बंगाली हो गई है लोहे के घर की यह बोगी। गोरूम, एक्टो, चहार घण्टा लेट, एक टका जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं। नीचे बैठे परिवार ने झाल-मुड़ी बनाई। नाक की नोक पर चश्मा अटकाये सुफेद मूँछ वाले टकले प्रौढ़ ने बड़े सलीके से प्याज और टमाटर काटकर पॉलीथीन में रखे लाई- चने में मिलाया। सामने बैठी महिला ने मुझे छोड़ सबको अखबार के टुकड़ों पर निकाल-निकाल कर दिया। मैं भी उधर से मुँह मोड़ जेब से निकाल कर चीनिया बादाम फोड़ने और छिलकों को छोटी पॉलीथीन में रखने लगा।
कोहरे की वजह से धीमे चल रही हैं सभी ट्रेनें। 'सौ दिन चले अढ़ाई कोस' वाली हालत है। दोपहर में आने वाली ट्रेन शाम को मिल रही है, शाम वाली सुबह। नीचे बैठे मूंछों वाले टकले ने एक मोटी किताब खोल ली है। चश्मा नाक के नोक से पीछे आ गया है। पता नहीं कौन सी पुस्तक पढ़ रहे हैं! मेरे बैग में भी वेतन निर्धारण के शासनादेश वाली एक किताब है लेकिन मैं उसे पढ़ना नहीं चाहता। सिन्दबाद की साहसिक यात्राओं वाली पुस्तक के अलावा दूसरी पुस्तक पढ़ने का मन नहीं है। क्या जमाना था जब यात्रा में निकलने वाला युवा, बूढ़ा होने के बाद घर लौटता था! ऐसी पुस्तकें पढ़ी जांय तो ट्रेन का लेट होना कभी न खले। मैं तो कहता हूँ प्रभु जी को सभी यात्रियों में यह पुस्तक मुफ्त बंटवानी चाहिये और कान में तेल डाल कर सो जाना चाहिये।
पीछे बैठे यात्री बतियाने के मूड में हैं। राम मंदिर, आरक्षण, नोट बंदी सभी मुद्दों पर बहसियाने के बाद अब किसी फिल्म की चर्चा कर रहे हैं। फालतू मुद्दों में आम आदमी कितना उलझे! थक हार कर साहित्य, संगीत, भजन या प्रकृति की शरण में जाना ही पड़ता है। बच्चे अपने में मस्त हैं। उनका पेट भरा लगता है। कभी ऊपर चढ़ रहे हैं, कभी नीचे उतर रहे हैं। बंद हैं लोहे के घर की खिड़कियाँ। बाहर चल रही है शिमला से आयी बर्फिली हवा। नीचे बैठे सुफेद मूँछ वाले की मोबाइल घनघना रही है। टोपी हटाकर, अपने चाँद को पूरा हिलाते हुए उसने फोन उठाया और जोर से बोला..हैलो...!
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आज पाटलीपुत्र में भीड़ नहीं है मगर एक बेंगाली परिवार आज भी है। दादी और पोती में खूब बातें हो रही हैं। इतने जल्दी-जल्दी बोल रहीं हैं दोनों कि बात समझ में नहीं आ रही।
मेरे न चाहने के बाद भी यादव जी ऊपर चले गये! मैंने कहा -इतनी जल्दी! तो चिढ़कर बोले-'तोहें साथे लेकर जाइब हो, अभहिन सूते जात हई।' यादव जी की पलकें बंद हैं। ऊपर के बर्थ पर लेटकर पटरियों की खटर-पटर सुनने में अधिक मजा आता होगा।
खाना-खाना चिल्लाते हुए चार आदमी खाने की ट्रंक पकड़े गुजर गये। वे खाना-खाना चीख रहे थे, मुझे 'राम नाम सत्य है' सुनाई दे रहा था। हरा मटर बेचने वाले पीछे-पीछे मसाले की दुर्गन्ध फैलाते हुए गुजर गये। जैसे 'राम नाम सत्य है' के पीछे अगरबत्ती सुलगाये लोग! अब माहौल में मरघटी सन्नाटा पसर गया है। यादव जी की पलकें पहले की तरह बंद हैं लेकिन अब उन्होंने दाहिने हाथ से पकड़ लिया है बर्थ की रेलिंग। ऊपर गये जरूर हैं मगर और ऊपर नहीं जाना चाहते। मुझे साथ लेकर जाने का संकल्प दृढ है शायद!
मरघटी माहौल के बीच अपने आप थोड़ी उठ गई है लोहे के घर की खिड़की। सुरसुर-सुरसुर मेरे जिस्म से छू छू जाती है बर्फिली हवा। मैं सिहर-सिहर मजा ले रहा हूँ ठंडी हवा का।
कहीं रुक गई है अपनी ट्रेन। यादव जी भूत की तरह मेरे सामने टपक कर पूछ रहे हैं-कहाँ पँहुचल पाँड़े? कुछ और जग कर बड़बड़ाने लगे-अभहिंन ले त बढ़िया लियायल, अब का हो गयल! अब बेचैनी से सुर्ती रगड़ रहे हैं। पता नहीं कहाँ जाने की जल्दी है! इस घर में इतने लोग, उस घर में एक अदद पत्नी और 1-2 बच्चे! वहाँ पहुँच कर वहीं रह पायें ऐसा भी नहीं। फिर सुबह उठकर आना है इसी घर में! क्या जाहिलाना प्रश्न है-कहाँ पहुँचल पाँड़े? हमको कहना पड़ा-चुप मारे रहा, हमें लिखे द। पहुँच जाई त तोहें साथे लेके चलब। तू भले उप्पर अकेले चला जा, हम तोहें बिना लेहले न उतरब।
एक ट्रेन सरसरा के गुजरी है अभी। एक ताजा हवा चली है अभी। चलकर शिवपुर के आउटर में खड़ी है अपनी भी #ट्रेन। मंजिल पास जान उठकर बड़बड़ाने लगे हैं सभी यात्री। उनके शोर से जाना, बहुत से बेंगाली हैं इस बोगी में! जब तक लोग बोलते नहीं तब तक समझ में नहीं आती उनकी भाषा। एक और ट्रेन गुजर गई। कुछ ज्यादा इतमिनान से खड़ी है अपनी ट्रेन। लिखना बंद कर बंगाली समझने का प्रयास करता हूँ। सुनने में बड़ी मीठी लगती है बंगाली।
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मोबाइल में गाना बजा रहा है-चार दिनों का खेल हो रब्बा लंबी..जुदाई..। बांसुरी में इसकी धुन खूब बजती है। जाड़े में लोहे के घर की शाम रंग-बिरंगी होती है। कहीं मनहूसियत से भरी तो कहीं आनंद दायक। एक ही बोगी में अलग-अलग ग्रुप। कोई अपने में सिकुड़े-सिकुड़े, गुमसुम तो कोई हँसी-मजाक, हल्ला-गुल्ला करते हुए। मेरे अगल-बगल गाल में हाथ रख कर कहाँ पहुँचे?, रुक गई, चल दी, पीछे वाली क्रास न कर जाए! ऐसी ही मनहूसियत की बातें करने वाले लोग हैं। बगल में शोर गुल है। लगातार गाना बज रहा है-चला जाता हूँ, किसी की धुन में, धड़कते दिल के तराने लिये...।
आज कितनो की फूटी किस्मत का लाभ हमें मिला। डाइवर्टेड ट्रेन समय से मिल गई और अब लगता है 9 बजे तक घर पहुँच जायेंगे। लोग बता रहे हैं-अभी शिवपुर में खड़ी है। यहॉं से चले तो बात बने। चल दी! पता नहीं जल्दी घर पहुँच कर ही क्या खजाना लूट लेंगे! 
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सफ़र में ख़ुद को झोंक कर देखो, रास्ते और सवारियाँ दोनों मिल ही जाती हैं। किसी की लेट, किसी की राइट टाइम हो जाती है। किसी की राइट भी छूट जाती है।
आज शाम जौनपुर में फरक्का मिली। जफराबाद में छूटे/छठे रोज के यात्रियों को अपने बोगी में बिठाकर कुछ देर आराम करने के बाद पटरी पर दौड़ने लगी। अब हवा से बातें कर रह रही है।
जहाँ-जहाँ से यह गुजरती होगी, पूस की शाम चैन से सो रही ठंडी पटरियों में ग़ज़ब की गर्मी आ जाती होगी! #ट्रेन हवा से कहती होगी-देखा! कितना गरम कर दिया न! पटरियों को। हवा कहती होगी-चुप रह लालमुँही! इंजन के बल पर इतना न अकड़! पटरियाँ न होतीं तो तू एक कदम चल न पाती। पटरियों से उतर कर दिखा! ट्रेन हँसते-हँसते धीमी हो रही है। कह रही शायद-अकेले किसी का कभी कोई वजूद नहीं होता। अकेले किसी का होना या न होना बेमानी है। पटरियाँ न होतीं तो हम ही क्यों होते? हम न होते तो पटरियाँ ही क्यों होती? तू भी तो धरती के दम पर इतना इतरा रही है हवा! चाँद पर क्यों नहीं बहती? सूरज से क्यों नहीं बतियाती?
लोहे के घर में मैं जहाँ बैठा हूँ कोई किसी से बात नहीं कर रहा। सभी मेरी तरह मोबाइल में भिड़े हुए हैं। मैं लिख रहा हूँ, वे देख/सुन रहे हैं। दोनों कानों में तार फंसाकर, गरदन झुका कर तल्लीन हैं, भीडियो/ फिल्म देखने या गाना सुनने में। मेरे बगल में एक बेंगाली वृद्धा का तकिया, ओढ़ना पड़ा है। वृद्धा अपने बुढऊ और दूसरे बेंगाली परिचितों के साथ पीछे वाली सीट पर बैठ कर बतिया रही हैं और लाई खाने के लिए सीमेंट के पुरानी बोरी से बरतन-भांडा निकाल रही है। उसने एक भगोना निकाला, बुढऊ ने बुढ़िया के हाथ से पकड़ कर बगोने में दाने भरे और अब बुढ़िया स्टील की थाली निकाल रही हैं। साथ बैठे बेंगाली लगातार कुछ न कुछ चपड़-चपड़ बतियाते जा रहे हैं। यादव जी ऊपर से टपक कर, कहाँ पहुँचल पाण्डे? पूछ चुके हैं। मैं उनसे कह चुका हूँ-चुप मारे रहा! तोहें साथे ले के उतरब।
शायद शिवपुर आ रहा है। यहां से उनका घर पास पड़ता है। ट्रेन हवा से बातें करने के बाद अब अब धीमे-धीमे सरक रही है। अंडा चावल बेचने वाला "बोलिये! खाना-खाना" चीखते हुये गुजरा है। अब रुक ही गई शिवपुर स्टेशन पर। कुछ लोग अब ट्रेन के लेट होने का समय गिना-गिना कर इसे कोसना शुरू कर चुके हैं। यहॉं तो स्टापेज नहीं है! यहाँ क्यों रुक गई! कोई बता रहा है कि फलाँ ट्रेन इतने घण्टे लेट है और फलाँ इतने घण्टे। फरक्का के लेट होने पर हक्का-बक्का होने वाले यह जानकर संतोष कर रहे हैं कि सभी ट्रेनें लेट चल रही है।
ट्रेन इतमिनान से खड़ी हो लम्बी साँसें ले रही है-कोसो-कोसो और गाली दो नाशुक्रों! यह कभी नहीं कहेंगे कि सकुशल यहां तक ले आई और किसी को एक खरोंच तक नहीं लगी इस जाड़े/कोहरे में! दूसरे का लेट होना खूब दिखता है, अपने क्या सही रहते हो हमेशा? साढ़े चार घण्टे लेट हुई तो क्या अधिक पैसे ले लिये तुमसे?
यह तो अच्छा है कि ट्रेन की बातें सिर्फ मैं ही सुन पाता हूँ वरना बवाल हो जाता।
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लोहे के घर में बैठ कर बंद खिड़कियों के शीशे से कोहरे में डूबे वृक्षों, कंकरीट के मकानों, झुग्गी-झोपड़ियों और सरसों-अरहर के खेतों को तेजी से नाचते हुए पीछे भागते देखना भी अलग किसिम का आनंद है। पटरी पर हवा से बातें कर रही है वरूणा और इसकी बोगी में बैठ कर मन से बातें कर रहा हूँ मैं।
हमारे आदरणीय प्रधान मंत्री जी भी मन की बात करते हैं। वे राष्ट्र के प्रधान मंत्री हैं तो उन्हें अपने मन की नहीं जन- जन के मन की बात करनी पड़ती है। हम इस मामले में खुशनसीब हैं कि अपने मन की बात खुल कर कर सकते हैं। वे नहीं बैठ सकते मेरी तरह अकेले लोहे के घर में। नहीं सोच सकते अपना दुःख दर्द। मुझे तो लगता है कि उनका मन कहीं गुम हो चुका होगा अब तक। रूठ गया होगा-जाओ! कभी उतरोगे कुर्सी से और लोगे सामाजिक जीवन से सन्यास तो आएंगे फिर तुम्हारे पास। अभी तो उन्हें वही करना है जिससे राष्ट्र का भला हो, वही उपाय सोचना है जिससे विरोड़ियों को जवाब दिया जा सके और वही करना है जो देश हित में जन सेवक कार्यक्रम तय करें।
मन की बात बताना और मन की करना दोनों में बड़ा फर्क होता है। बताते समय हम अच्छा-अच्छा बताते हैं लेकिन करते समय गन्दा-गन्दा भी कर जाते हैं। बताते समय जो गंदा किया उसे गोल कर जाते हैं, जो अच्छा किया वही बताते हैं।
समाज के सभ्य होने की पहली शर्त ही गन्दा छुपाना और अच्छा दिखाना से हुई! जैसे ही मानव को सभ्य होने का थोड़ा ज्ञान हुआ उसने सबसे पहले अपने अंगों को गुप्त रखना शुरू कर दिया। कपड़े पहनना शुरू किया। नँगा रहना शर्म की बात हो गई। धीरे-धीरे सभ्य और सभ्य होता गया। अब तो खुले में शौच करना भी असभ्यता की निशानी है। गन्दगी छुपाना और स्वच्छ दिखना सभ्य समाज की शर्त है। यही कारण है कि हम जब किसी से मन की बात करते हैं तो अच्छा-अच्छा, साफ-सुथरा ही दिखने और बताने का प्रयास करते हैं। गन्दा करने में संकोच नहीं करते मगर जब कोई आपकी गन्दगी दिखा कर आपको नँगा कर देता है तो मारे शर्म के पानी-पानी हो जाते हैं।
सन्नाटा है लोहे के घर में। मेरे सामने बैठे मेरे मित्र के अलावा इस बोगी में दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता। मैं मन की बात लिख रहा हूं, मित्र मन का करते हुए मोबाइल में भीडियो देख रहे हैं। करने को तो मैं भी मन का ही कर रहा हूँ लेकिन मन की बात लिखकर सार्वजनिक भी कर रहा हूँ। बड़ा महीन अंतर है मन की इस बात में।
#ट्रेन अब जौनपुर पहुँच रही है। लिखना बंद करना पड़ेगा और सबको शुभ प्रभात बोलना पड़ेगा। मैंने आज की सुबह का भरपूर आनंद लिया। वो सब आनंद आप तक पहुंचे। सुबह के साथ आपका दिन भी शुभ हो।
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20.11.16

नोट बंदी से निकले दोहे


उजला काला हो गया, बंद हुआ जब नोट.
झटके में जाहिर हुआ, सबके मन का खोट..


चलते-चलते रुक गया, अचल हुआ धन खान.
हाय! अचल धन पर गड़ा, मोदी जी का ध्यान..


जोर-जोर से हो रहा, चोर-चोर का शोर.
कोई काजल चोर है, कोई अँखिए चोर..


लोभ लपक बच्चा बढ़े, बूढ़ा पकड़े मोह।
निरवंशी घातक बड़ा, व्यापे लोभ न मोह।।

दो पैग ने भुला दिया, मोदी जी का चोट.
चिल्लर-चिल्लर हो गया, दो हजार का नोट..


बिटिया की शादी पड़ी, सब प्रमाण तू ले.
ले! शादी का कार्ड ले, नयकी नोटिया दे..


चीर-फाड़ का दर्द है, अपनी आँखें मींच.
देख न अँधियारा सदा, उगता सूरज खींच..


सेवा बदले कर रहे, सोच-सोच कर चोट.
फिर जग में जाहिर हुआ, वाम सोच में खोट..


राजा चलनी तेज कर, ले ले सबकी वाह!
गेहूँ साथै घुन पिसे, मुख से निकसे आह!

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लोहे का घर-22 (नोट बंदी)

नोट बंदी के फैसले के बाद लोहे के घर में बदहवास 500 के पुराने नोट लिये यात्री अब नहीं दिखते। 8 तारीख के बाद तो यह स्थिति थी कि लालच देकर यात्री भिखारी/वेंडरों से छुट्टा मांग रहे थे। एक भिखारी ने तो झटक ही दिया था-हमको बेवकूफ समझे हो क्या?
अब लोग सिर्फ तारीफ करते हुए ही मिलते हैं। बस जरा सा छेड़ दो। बस इतना कहो कि मोदी ने सब सत्यानाश कर दिया। फिर देखो! कैसे लोग आपको समझना शुरू करते हैं। केजरीवाल की तरह कह कर देखो-बहुत बड़ा घोटाला है! सब आप पर टूट पड़ेंगे। कम नोट मिलने से लोग परेशान हैं लेकिन फिर भी गजब का संतोष और खुशी झलकती है चेहरे से। स्लीपर बोगी में चढ़ने वाले ये वो लोग हैं जिन्होंने परेशानी के सिवा कुछ नहीं पाया लेकिन खुश हैं कि जिन्होंने गलत ढंग से बोरियाँ भरी हैं वे मारे गये।
प्रधान मंत्री जी ने बहुत बड़ा ख़्वाब दिखया है लेकिन लोगों को भयंकर कष्ट का भी सामना करना पड़ रहा है। राजनैतिक दलों द्वारा सहयोग के स्थान पर अपनी पूरी ताकत विरोध में झोंक दी है। कुछ चैनल नकारात्मक खबरें अधिक परोस रहे हैं। सबकी मंशा यही लगती है कि आम आदमी तकलीफों से झुंझलाकर बगावत कर दे। समर्थन के स्थान पर विरोध करना शुरू कर दे। फैसला वापस लेना पड़े। दूसरी तरफ फैसला वापस लेने का मतलब मोदी जी का राजनैतिक सन्यास। फैसला वापस लेने का मतलब है लोगों के ख्वाबो का टूटना। जब ख़्वाब टूटते हैं तो दिल भी टूटते हैं। टूटे आदमियों की आँखों में नये ख़्वाब नहीं तैरते। कुल मिलाकर भारत एक कुरुखेत्र के मैदान में खड़ा है। जारी है संघर्ष। देखें..आम आदमी बच पाता है या ...मोदी जी के साथ आम आदमी भी टूट जाता है। अभी तो दांव पर आम आदमी ही लगा है। एक लाइन याद आ रही है...
जितने ऊँचे ख़्वाब दिखाओगे राजा, उतनी गहरी चोट लगेगी सीने में।
हमारी इच्छा है कि सत्ता हारे या विपक्ष आम आदमी टूटने न पाये। आखिर सभी आम आदमी के लिए ही तो परेशान हैं।
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भंडारी स्टेटशन पर #एटीएम आज भी चालू था। मात्र 10-12 लोग खड़े थे। अपनी #ट्रेन एक घण्टे लेट थी। समय ही समय था। मैंने सोचा आराम से 2000/- निकाल सकता हूँ। तभी याद आया...मैंने कल ही #जीन्यूज की रिपोर्टिंग देखी थी जिसमें एक गरीब चौकीदार गुल्लक फोड़कर निकाले 3000/-में से फुटकर 1500/-रुपये जिसमें 100,50,20,10 के नोट थे बैंक में जा कर इसलिए जमा कर देता है कि दुसरे जरूरत मंदों को मिल जाय।
मेरे मन में भी ख्याल आया... मुझे पैसे की अभी कोई ख़ास आवश्यकता तो है नहीं, क्यों निकाला जाए? मैंने लाइन लगाने का विचार त्याग दिया। दस रुपये का चीनीयाँ बादाम खरीदा और फोड़-फोड़ कर खाते हुये लोगों को पैसा निकालते और खुश होकर लौटते देखने लगा।
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मुझे नहीं लगता कि जितने पुराने नोट थे उतने ही नये नोट न छपे होने से भयभीत होने की जरूरत है। सभी नोट एक साथ प्रचलन में नहीं होते। प्रचलन में जितनी आवश्यकता होती है उतने छप चुके हैं। नोट कम देने का उद्देश्य भी यही लगता है कि लोग आवश्यकता के अनुरूप निकालें और बिना भय के खर्च करें। पूरे नोट छप जाते, ए टी एम सभी दुरुस्त हो जाते तब नोट बदलने की सोचते तो तब तक गोपनीयता भी नहीं रहती। 2000 के नोट छप रहे हैं यह जानकारी तो अखबार को हो ही गई थी। पुराने नोट बेकार हो जाएंगे यह भी जान जाते तो नोट बदलने का उद्देश्य कभी सफल न होता। मुझे तो जो प्रक्रिया सरकार ने अपनाई है वही बेस्ट विकल्प लगता है।
जनता को तकलीफ तो होनी ही थी। तकलीफ कम होती अगर सभी एक स्वर से साथ देते और इस पर राजनीति न होती। जितना विपक्ष राजनीति करता रहा, उतना ही मोदी जी आक्रामक होते गये। यह उनका अंदाज है जिसे आप जो नाम दें लेकिन शतरंज का खिलाड़ी होने के नाते मैं जानता हूँ कि अटैक इज द बेस्ट डिफेन्स।
एक चूक मुझे जो लगती है वह है समय का चुनाव। समय चुनते वक्त चार राज्यों में होने वाले चुनाव का नहीं, शादियों के मौसम और बोआई का ध्यान रखा जाना चाहिये था। एक महीने बाद या दो महीने पहले का समय अधिक उपयुक्त होता। विपक्ष को सरकार से यह प्रश्न पूछना चाहिए न कि विरोध के लिए विरोध करना चाहिए।
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#ट्रेन में फिर नोट बंदी की चर्चा। सुनते-सुनते कान पक गये। लोग बता रहे हैं किस नेता को नींद नहीं नहीं आ रही। किसने किस विभाग में कितना दबाव बनाया नोट बदलने के लिये। कौन नेता जोकरी कर रहा है, कौन हुकुर-हुकुर रो रहा है। लोग यह भी बता रहे हैं अब बैंक, एटीएम की लाइन बहुत कम रह गई। बहुत उत्साह है लोगों में। तरह-तरह के लोग तरह की बातें। इनको सुन कर किसी का नाम नहीं लिया जा सकता। कोई प्रमाण नहीं अपने पास। आम आदमी कह रहे है नेता रो रहे, उधर संसद में नेता कह रहे आम आदमी मर रहा। ये लोग पक्का झूठ बोल रहे होंगे। सही तो संसद में नेता लोग बोल रहे होंगे। बहुत कन्फ्यूजन है। सब #भक्त लग रहे हैं! लगता है ट्रेन से उतर कर दिया लेकर ढूंढना पड़ेगा विरोधियों को। जनता का दर्द जानने के लिए #ndtv देखना पड़ेगा या केजरी वाल जी का भाषण सुनना पड़ेगा। सबसे बड़ा, हिटलर और आतंकवादी जानने के लिये कांग्रेस के नेताओं को सुनना पड़ेगा। ये #लोहेकेघर के यात्री तो सभी #मोदी भक्त लगते हैं।

19.4.16

लोहे का घर-१३


भंडारी स्टेशन में बाहर शांति भीतर गोदिया की बोगी में वेंडरों का कलरव गूँज रहा है। यात्री‪#‎ट्रेन‬ चलने की प्रतीक्षा में हैं। ठीक 8.15 बजे और गोदिया ने लम्बे हार्न के साथ प्लेटफॉर्म छोड़ दिया। स्पीड बढ़ रही है धीरे-धीरे। बाहर अँधेरा है और अपने कोच में हल्की रोशनी। इसी धुंधलकी रोशनी में एक युवक अखबार पढ़ रहा है, दूसरा मेरी तरह मोबाइल चला रहा है और एक प्रौढ़ महिला जो शायद इन युवकों की माँ हैं, बगल में बैठी इधर-उधर सतर्क नजरों से देख रही हैं।
गोमती के ऊपर से गाड़ी गुजर रही है। एक अलग ही शोर उठा और शांत हो गया। अजीब सी खामोशी है, अजीब सा सन्नाटा है। ट्रेन में प्राण नहीं है लेकिन कई प्राणियों को लिये चलती रहती है रात दिन। प्राणी न हों तो ट्रेन न चले। यात्री ही प्राण हैं ट्रेन के। यात्रियों की जान है ट्रेन। दोनों एक दुसरे के पूरक हैं। दोनों एक दूसरे के सहारे चल रहे हैं। पटरी पर चलती है ट्रेन तो पटरी पर चलती है लाखों की जिंदगी। लोग पति पत्नी को एक दूसरे का पूरक मानते हैं। यात्री और ट्रेन भी एक दूसरे के पूरक हैं। यात्रियों की तरह कितनी पत्नियाँ पति रूपी ट्रेन की गोदी में बैठकर पूरा जीवन काट देती हैं! जैसे लोहे का यह घर दौड़ते-भागते उफ़! नहीं करता वैसेे कितने ही पति हैं जो अपने जीवन साथी को लिए भागते रहते हैं! गरीब, मध्यम वर्गीय, अमीर सभी प्रकार के यात्री। जनरल, स्लीपर, एसी सभी प्रकार की बोगियां। लोहे के एक घर में कितने प्रकार के कमरे! मनुष्यों में कितने प्रकार के लोग! यह ट्रेन है या जीवन की कोई अबूझ पहेली। परत दर परत उधेड़ते जाओ पर कभी पूरी नहीं खुलती। एक ऐसी किताब जिसके पन्ने पलटते-पलटते पाठक थक जांय लेकिन किताब कभी पूरी न हो।

50 डाउन में भीड़ है। शाम का समय है। सूरज डूब चुका है मगर अँधेरा नहीं हुआ। खेतों में दिख रहे हैं गेहूँ के गठ्ठर। कहीं-कहीं चल रहे हैं थ्रेसर भी। जुगाली करते चौपाये भी दिख रहे हैं। कोई स्टेशन करीब आ रहा है। धीरे-धीरे रुक रही है ‪#‎ट्रेन‬। अमृतसर से काशी जा रहे यात्रियों में मंजिल तक पहुँचने की बेचैनी है। घड़ी देख एक दूसरे को दे रहे हैं आश्वासन। बच्चे पूछ रहे हैं-हम कब उतरेंगे? भीड़ भाड़ वाले स्लीपर डब्बे में बैठ पूरी दोपहरी काटने के बाद मंजिल पर पहुँचने की बेताबी समझी जा सकती है।
पश्चिम में फ़ैल रहे अँधेरे के पार दूर क्षितिज में बुझ रही सुनहरी रौशनी की आभा चमक रही है। घरों में जलने लगी हैं बत्तियाँ। रोशन हो चुका है लोहे का घर भी। धीरे-धीरे घने अँधेरे में खो रहे हैं खेत। सूर्योदय की लालिमा की तरह लम्बी नहीं होती गोधुली की बेला। पंछी-पंछी चहक-चहक कर मौन! गाँव के सीने को चीरती शहर-शहर रुकती भागती रहती है ट्रेन। प्लेटफॉर्म पास आते ही कितना चीखने लगती है ! गाँव की झोपड़ी झुग्गी को देखने के बाद शहर की रौशनी में चौंधिया जाती होंगी इसकी आँखे।
दस साल की एक बच्ची खड़ी हो गई है। पापा समझा रहे हैं-बस 10 मिनट में आ रहा है बनारस। फिर अपनी सीट पर बैठ गई। पापा फिर समझा रहे हैं-शिवपुर आ गया अब अगला स्टेशन बनारस ही है। पैक हो चुके हैं सामान। बस अब आ जाय मंजिल तो चैन मिले. लो! बज गया हारन, अब तो आ ही गया समझो बनारस। दूर के यात्रियों को मंजिल के करीब आ कर कितनी खुशी मिलती है! इसी स्टेशन पर हम रोज चढ़ते, रोज उतरते हैं मगर कोई खुशी नहीं!!! खुशी के लिए करनी पड़ती है लम्बी यात्रा, सहना पड़ता है बड़ा दुःख। जितनी छोटी यात्रा उतनी छोटी खुशी।

आज कोटा-पटना मिली भंडारी स्टेशन पर। फिफ्टी डाउन आगे है। बनारस तक नॉन स्टॉप है अपनी ‪#‎ट्रेन‬। फिफ्टी को रुक-रुक कर चलना है। मैं चाहता हूँ वो किसी स्टेशन पर खड़ी मिले और मैं हाथ हिला कर टा टा करूँ। वो मुझे देख कर जल भुन जाये और कहे-बड़े आये हैं‪#‎कोटापटना‬ वाले ऊँह!
तुम तो नहीं मिली किसी स्टेशन पर खड़ी, ट्रेन ही सही। जिंदगी में ऐसा होता नहीं है। जिस स्टेशन पर जो मिलती है उसी से अगले पड़ाव तक पहुंचता है यात्री। भाग्यशाली होते हैं वे जिनकी सीटें पहले से आरक्षित होती हैं। एक खूबसूरत लड़की बैठी है साइड अपर बर्थ पर। एक हाथ से पलट रही है पत्रिका के पन्ने दूसरे हाथ से सटाये हुए है दाहिने कान में मोबाइल। न पत्रिका पढ़ रही है न मोबाइल से बात ही कर रही है। मेरी इच्छा है कि उसके मोबाइल से यह गीत बजे-होठों पे हंसी, सीने में तूफ़ान सा क्यों है। इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है! कुछ इच्छाएं ऐसी होती हैं जो पूरी नहीं होती। अब वो अपनी पलकें बन्द कर लेट गई है। उसके सीने से लग कर चैन से सो रही है पत्रिका।

5.2.16

लोहे के घर से-10


आज सभी ‪#‎ट्रेनें‬ दगा दे गईं। अपनी भी, पराई भी। हे प्रभु! ये हो क्या रहा है!!! 49अप और दून, किसान सभी डाउन ट्रेनें कैंसिल। अपन को तो 60 किमी जाना है, बस पकड़ लिया मगर जिसे लम्बी यात्रा करनी हो, उनका क्या हाल हुआ होगा! कोई खूब बढ़िया मुहूर्त निकाल कर शादी की बरात ले कर जा रहा हो और पता चला कि ट्रेन ही कैंसिल हो गई! अब इतनी जल्दी दूसरी में रिजर्वेशन भी कैसे मिल पायेगा? बिचारा कुंआरा रह जाएगा। उधर कन्या पक्ष वालों की चेहरे की हवाइयाँ उड़ेंगी सो अलग। इस राज में तो शादी के कार्ड में छपाना चाहिए-तिथि और समय ट्रेन दर्शन से परिवर्तित हो सकते हैं।
लोग ये भी कर सकती हैं कि नकली बराती ले कर आएं। दूल्हे-दुल्हन के पुतले बनाकर शादी के मण्डप में बिठा दिये जांय। विवाह हो जाय फिर जब प्रभु की कृपा हो, दूसरी ट्रेन में रिजर्वेशन मिले तो दूल्हा आ कर दुल्हन से कोर्ट में रजिस्ट्रेशन करा कर, मंदिर में जयमाल डालकर शादी का सर्टिफिकेट और दुल्हन को साथ लिवा ले जाय!
‪#‎लोहेकेघर‬ की खिड़की से धूप नहाये सरसों के फूलों को देखते हुये यह गीत दिमाग में कौंधता है पर मारे संकोच बाहर नहीं निकलता-गड्डी चली रे छलांगा मार दी, मैंनू तेरी याद आई...
आज सही समय चल रही है ‪#‎ट्रेन‬। बाबतपुर स्टेशन करीब आ रहा है। खेतों की पगडंडियों पर दिख रहे हैं स्कूल जाते बच्चे। एक माल गाड़ी हारन बजाती गुजर रही है। उसके जाते ही फिर से चल दी अपनी रुकी ट्रेन। चाय वाला चाय-चाय चीख रहा है। सर्वेश भाई वाट्सऐप पर आये भारत और इण्डिया का फर्क बताती कोई कविता पढ़ कर सूना रहे हैं। मैं कान से सुन कुछ रहा हूँ, आँख से देख कुछ रहा हूँ मगर उँगलियों से लिख वही रहा हूँ जो सोच रहा हूँ।
मन कितना चंचल होता है! छन छन छितराता जाता है। बड़े जतन से एक चित्त होता फिर अगले ही पल भटक जाता है। पिण्डरा हाल्ट में लाल-पीली साड़ी धोती पहने, चबूतरे पर बैठी, धूप सेंकती महिलाओं पर नजर ठहर सी गई मगर अगले ही पल #ट्रेन चल दी। खुशियों वाले पल कितने छणिक होते हैं न?
ट्रेन और सरसों के खेतों के बीच फिर आई पतली सड़क। तीन बच्चियाँ धीरे-धीरे आपस में बातें करतीं जा रही हैं स्कूल। उड़ने से पहले ठुमक-ठुमक फुदक रही हैं चिड़ियाँ खेत की मेढ़ पर। बाबतपुर से आगे सूखे खेत फिर अरहर और पीले सरसों के बड़े-बड़े खेत।
जफराबाद के बाद 50 डाउन बड़े रंग में चलती है। लगता है आज सही समय पर पहुंचा कर ही मानेगी। बड़ी तेज़ रफ़्तार है इसकी। जलाल गंज का पुल काँप चुका। स्टेशन करीब आ रहा है। खालिसपुर से पहले नहीं रुकेगी यह ‪#‎ट्रेन‬। जितनी भी तेज चले बनारस पहुँचने का समय है 6.55 है। इससे पहले तो पहुँचने से रही। मनमर्जी नहीं कर सकती। घर कभी मनमर्जी नहीं करता, मनमर्जी तो घर में रहने वाले ही करते हैं।
इस ‪#‎लोहेकेघर‬ में भाँति-भांति के यात्री सफ़र करते हैं। हम जहां बैठ जाते हैं, उसी को दुनियाँ समझ लेते हैं। आसपास के गुमसुम चेहरों को देख यह नहीं समझ बैठना चाहिये कि सभी तंग हाल हैं। जाति-धर्म के लफ़ड़े यहां नहीं हैं मगर अनजान यात्रियों से सावधान रहने वाली बात घुट्टी में समाई हुई लगती है। यात्रा में कब कोई चूना लगाकर उतर जाय, कहा नहीं जा सकता। जीवन यात्रा में कभी न कभी विश्वास सभी करते हैं, कभी न कभी धोखा सभी खाते हैं। कोई बचपन में, कोई जवानी में और कोई जीवन के आख़िरी पड़ाव पर। इसी ठोकर से उपजा होगा ज्ञान। अनजान यात्री से सावधान! मगर सोचिये विश्वास न हो तो दोस्ती कैसे हो? दोस्ती न हो तो जीवन साथी कैसे बनें? साथी न हो तो संसार कैसे चले?
मूँगफली वाला गया है। इससे पहले मीठा केक बेचती मंहिला गई थी। चाय वाला भी आकर अभी-अभी गया है। सिर्फ एक यात्री ने एक पुड़िया मूँगफली खरीदी। मूँगफली खाने में कोई खतरा नहीं है। फोड़ो, छीलो, देखो फिर खा लो। मगर जीवन में हर समय इतनी सुरक्षित खरीददारी कहाँ हो पाती है!
बाबतपुर स्टेशन आ गया। हवाई अड्डे की बिजलियाँ अँधेरे में खूबसूरत लग रही हैं। एक अनजान यात्री बगल में आ कर बैठ गया। सर गन्जा है। काली फ्रेम का चश्मा, फुल काली स्वेटर पहने है मगर सफेद दाढ़ी बढी हुई है। अविश्वास करने का कोई कारण समझ में नहीं आता। आम आदमी लगता है। गाड़ी चली तो उसके चेहरे पर सन्तोष के भाव जगे। आम आदमी किसी अनजान यात्री का का क्या बिगाड़ सकता है भला! जब भी बिगाड़ेगा किसी अपने का ही बिगाड़ेगा। किसी अपने से कमजोर को ही धोखा देगा।
ट्रेन अब शिवपुर पहुँचने वाली है। शिवपुर से बनारस कैन्ट की दूरी मुश्किल से 3 से 5 किमी होगी मगर इसके पास अभी पूरे 50 मिनट हैं। यह या तो शिवपुर में आराम करेगी या कैन्ट के आउटर पर। तेज चलने वाले मंजिल के करीब आ कर हाँफने लगते हैं। कभी-कभी सो भी जाते हैं। इसी स्वभाव के चलते कछुये से हार गया होगा खरगोश! समय से पहले मंजिल नहीं मिलती। न तेज दौड़ने से न आलस करने से मंजिल तक पहुंचा जा सकता है। यह शरीर भी हाड़ मांस का बना एक घर है जिसमे आत्मा रहती है। मन बेचैन इसे कभी तेज चाल से हांकता है और कभी अपाहिज होने पर कोसता है। घर को दुरुस्त रखने पर तभी मजबूर होता है जब बीमार पड़ जाता है।
ट्रेन शिवपुर आ कर इत्मीनान से खड़ी हो गई। अब यात्रियों की बेचैनी देखते ही बनेगी। दस मिनट बाद वे इसे कोसना शुरू कर देंगे बगैर यह जाने कि अभी इसके छूटने का समय नहीं हुआ! निर्धारित समय के हिसाब से बिफोर आई है। रोज के यात्री जानते हैं। कुछ उतर कर प्लेटफॉर्म पर घूमने चले गये। कुछ आपस में मुखर हो घर के काम को याद करने लगे। किसी को तिलक में जाना है तो किसी को अपना जैकेट पॉलिश कराने देना है। पत्नी की फरमाइश कोई बता नहीं रहा। सब पुरुषार्थ वाले काम ही साझा कर रहे हैं। जो चढ़ते ही निढाल हो कर ऊपर बर्थ पर चढ़कर सो गए थे वे बनारस पास आ गया जानकर उठ बैठे हैं। घर जा कर इन्हें अधिक तरोताज रहना होगा। थका-मांदा कहलाया जाना इनको पसन्द नहीं होगा।
बाहर अंधेरा है। बिजली नहीं है। छोटे-मोटे स्टेशन पर बिजली होना कौन जरूरी है! छोटे अँधेरे में रहेंगे तभी तो बड़े रौशन होंगे!!! अतिरिक्त ऊर्जा क्या आसमान से टपकती है?
चलने का निर्धारित समय पूरा हो चुका मगर ट्रेन कुछ ज्यादा इत्मिनान से खड़ी है। लोगों ने अब इसे कोसना शुरू कर दिया है। अभी तक की इसकी वफाई, बेवफाई में बदल गई। जीवन में भी यही होता है। आप लाख अच्छा काम करो मगर एक गलती सब किये धरे पर पानी फेर सकती है।

इसके रहते कोई नया विचार आने से रहा। एक बार इसकी कहानी क्या लिखी थी फेसबुक में कि अब लिखना दूभर कर दिया। पढ़कर थोड़ा शांत हुआ। गुमसुम बैठा है।
देर शाम जब दफ्तर से चले तो गोदिया के अलावा और किसी ‪#‎ट्रेन‬ की उम्मीद न थी। भंडारी पहुंचे तो भोला दिख गया। बोला-'कोटा-पटना आ रही है!' सुखद आश्चर्य हुआ। किसी के 8 घण्टे लेट होने का दुःख मेरे लिये सुख में बदल गया। ऐसे ही मेरा दुःख भी किसी को सुख पहुंचाता होगा! और भी 50 डाउन के छूटे हुए रोज के यात्री मिले। आज सही समय पर निकल गई। वे फिफ्टी के सही समय पर आ जाने से दुखी थे। मैं कोटा-पटना के लेट होने से दुखी यात्रियों के बीच सुखी हूँ। सुख-दुःख भी क्या चीज है!
मुझे बिठाने के बाद ट्रेन मस्त चाल से चल रही है। रास्ते में आने वाले पुल असहाय आशिक की तरह झटके खा रहे हैं! पूरी बोगी खाली-खाली है। ऐसा लग रहा है जिन्होंने इसके बर्थ में पट्टा लिखवाया था वे ही रह गये बाकी इसकी बेवफाई सहन न कर पाने के कारण रास्ते में ही इसे छोड़कर उतर चले गये। किसी के साथ पट्टा लिखवाने में कई लफ़ड़े हैं। उसकी वफाई से खुशी और बेवफाई से दुखी होना होता है। लेकिन लम्बी यात्रा बिना रिजर्वेशन कराये कहाँ हो पाती है!
रोज के यात्रियों को बहुत दिनों के बाद लेट कर जाने का मौक़ा मिला है। अधिकतर आराम कर रहे हैं। कोई-कोई मोबाइल में फ़िल्म भी देख रहे हैं। अँधेरे में डूबे किसी छोटे स्टेशन पर ट्रेन धीमी हो कर फिर चल दी। बनारस तक यह नान स्टॉप ट्रेन है। इसकी छोटे स्टेशन पर धीमी होने की अदा से कितनों की जान चली जाती होगी! कितने मजनू तो दौड़ कर चढ़ने के चक्कर में पटरी पर आ जाते हैं! दुसरे दिन अखबार में मोटी हेड लाइन के साथ अंग-भंग तस्वीर छपती है-'ट्रेन भी नहीं मिली, जिंदगी भी चली गई।' कंकरीट के घर के लिये लोहे के घर से मुहब्बत की बहुत बड़ी सजा मिलती है। ट्रेन चीख-चीख कर सावधान करती है कि जब मैं खड़ी रहूँ तभी चढ़ा-उतरा करो मगर रोज के यात्री जुए में बंधे बैल की तरह ऑफिस से छूटते ही जल्दी से घर पहुँच जाना चाहते हैं और गलती कर बैठते हैं। कई बार तो मैं भी उतरा हूँ धीमी होती चलती ट्रेन से और उतरने के बाद यह ख़याल आया है कि नहीं उतरना चाहिये। 
आज 49अप कैंसिल है। रोज के अधिकांश यात्री बस में बैठे हैं। बस में इतनी भीड़ कि बैठने के लिये भी सीट नहीं। खड़े-खड़े लगभग पूरी यात्रा हो गई। मैंने खड़े रहने के इतने लाभ बताये कि जलाल गंज आते-आते अशोक जी उठकर खड़े हो गये और मुझे बिठा कर बोले-बैठकर बोलिये! मैं बोला-वाह! खड़े रहने के बाद बैठने में तो और भी आनंद है!!!
बस में ड्राइवर की सीट के पीछे टीन का बैग टँगा है। इस पर लिखा है-यात्रा दर्पण! मैंने कंडक्टर से पूछा-इसका क्या मतलब? वो बोला-पढ़िये! फिर अपने बोला-अरे! जो पढ़ना है उसी के ऊपर लगा दिया है!!!
जनहित में जारी शासनादेश का कितनी ख़ूबसूरती से पालन किया गया है!

अखिरकार गोदिया की बोगी में नीचे की दो खाली बर्थ मिल ही गई। एक में Ajay Srivastava लेट गये दुसरे में हम। इससे पहले भी दूसरी बोगी में दो बर्थ मिली थी। क्या टाँगे फैलाकर, खिड़की के शीशे गिराकर लेटे थे हम लोग! तभी आ गया था एक परिवार। पूरी 6 बर्थ हमारी है कहते हुये और हम मायूस से जूते के फीते बांधकर बड़े बेआबरू होकर उस कूपे से निकले थे। जिंदगी हमेशा सरल नहीं होती लेकिन ऐसा भी नहीं कि प्रयास करो और सफलता न मिले। दूसरी खाली बर्थ मिल ही गई। अब तो अजय जी के खर्राटे भी सुनाई पड़ रहे हैं! मौका मिलते ही आदमी क्या बेपरवाह हो जाता है!
पटरियों पर रेंगते इस लोहे के घर में सभी यात्री अपनी-अपनी बर्थ पर सो रहे हैं। हार्न बजाती‪#‎ट्रेन‬ की स्पीड अब तेज़ हो चुकी है। बन्द खिड़कियों से भी ठंडी हवा आती तो है! धरती भी क्या तेज-तेज घूमती है जब तूफ़ान तूफ़ान आता है? नहीं, विज्ञान इसका कोई और ही कारण बताता है।
शोर बता रहा है कि जलालगंज का पुल आ गया। पटरियों की खटर-पटर बता रही है कि स्टेशन भी गुजर गया। Sanjay Singh का फोन आया था-हम बनारस पहुँच गये पैसिंजर से। जल्दी चले थे तो जल्दी पहुंचे, हम भी पहुँच ही जायेंगे। जीवन के सफर में ये मुकाम भी आता है जब कोई जल्दी पहुँचने से खुश या देर से घर पहुँचने पर दुखी नहीं होता। पहुँचने पर भोजन मिल ही जाता है फिर काहे की हाय-हाय, काहे कि किच-किच! चलते-फिरते घर में सभी शराफत से लेटे तो हैं।
ट्रेन इत्मिनान से खड़ी हो गई है! अजय जी की नींद टूट गई है। शाल से गरदन निकालकर पूछ रहे हैं-कहाँ खड़ी कर दिया हो? अब हम का बतायें! ट्रेन हमेशा निर्धारित समय और स्थान पर थोड़ी न खड़ी होती है। ई कोई यूरोप है जो लेट होने पर पैसिंजर को हर्जाना देना पड़ेगा! भारतीय रेल है, अधिक देर सोने देने का अधिक किराया नहीं मांगती यही क्या कम है? और भी सोये दिख रहे यात्री जाग कर अपनी-अपनी गाथा सुनाने और एक दूसरे को ढांढस बंधाने में जुटे हैं-'कोई क्रासिंग होगी।' कितने ‪#‎सहिष्णु‬ हैं हम!
हारन बजा। सभी खुश हो गये। चुप भी हो गये! लगता है खड़े घर में इन्हें नींद न आने और आपस में बोलते रहने की बीमारी है!!! घर के रफ़्तार पकड़ते ही सब खामोश हो गये। गाड़ी जब तक पटरी पर चलती रहती है जिंदगी सुकून से कटती है। विश्वास रहता है कि मंजिल आ ही जायेगी। ढलती शाम में यात्री अक्सर यह भूल जाते हैं कि मंजिल तो आएगी मगर सुबह उठकर फिर सफर में चलना है, दूसरी ट्रेन पकड़नी है। पड़ाव को मंजिल समझने का लुत्फ़ कोई छोड़ना नहीं चाहता।
smile emoticon

31.1.16

लोहे के घर से-9


आज फिफ्टी डाउन कैंसिल है और किसान लेट। ‪#‎ट्रेन‬ के पड़ाव तक जाने का मन ही नहीं किया। बस स्टेशन से बस पकड़ा और चल दिये। खचाखच भरी है बस लेकिन अजीब सी मुरदैनी छाई है! कुछ लोग यहाँ भी खड़े हैं। Sanjay Singh दौड़ कर चढ़ गये वरना हम भी शामिल होते खड़े यात्रियों में। जब से चले हैं तब से थरथरा रहे हैं। बिना भूकम्प आये हिल रहे हैं। लिखना दुश्वार है। जलाल गंज पुल के ऊपर से मस्तानी चाल में चलती थी ट्रेन तो पुल किसी आशिक की तरह थरथराता था। यहां तो पुल हाथी की तरह शांत खड़ा है बस चूहे की तरह उछल रहा है!
मजा नहीं आता बस की यात्रा में। बस में चलते हुये लगता है कि यात्रा कर रहे हैं। लोहे के घर का एहसास नहीं होता। एक घण्टे की यात्रा में चार जगह तो रुकती है बस। कुछ रुकते हैं, कुछ चढ़ते हैं, कंडक्टर चीखता है-टिकट-टिकट। फिर कुछ देर बाद चीखता है-पैसे बाकी हैं तो लीजिये। मतलब कुल मिलाकर एक उबाऊ यात्रा का माहौल। ट्रेन में लगता है जैसे घर में बैठकर मित्रों से गप्प लड़ा रहे हैं। कभी मूँगफली खा रहे हैं, कभी चाय पी रहे हैं तो कभी तास खेल रहे हैं। बस मंजिल तक पहुँचने की मजबूरी है तो ट्रेन सफ़र का आनन्द।


आज अमृतसर-हावड़ा एक्स्प्रेस ‪#‎ट्रेन‬ 50 डाउन में काफी भीड़ थी। बोगी-बोगी बैठने के लिए सीट तलाशते थक गए। भीड़ का कारण पंजाबी तीर्थ यात्रियों का प्रकाशोत्सव मनाने के लिए पटना साहिब जाना था। मुश्किल से जालंधर से पटना जा रहे एक पंजाबी परिवार से दया प्राप्त करने में सफल रहा। बैठने पर पता चला इससे पहले एक यू पी के सज्जन को अपनी सीट पर बिठाने का उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा। उसने जाते-जाते उनके साथ बदतमीजी की थी। मुझे अपनी बातों से उन्हें संतुष्ट करने में कुछ वक्त लगा कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते। मुझसे मिलकर वे संतुष्ट और प्रसन्न दिख रहे थे। काशी और गंगा के बारे में वे मेरे मुख से बहुत कुछ जान चुके तो मैंने गुरु गोविंद सिंह के बारे में पूछा। उन्होने बस इतना बताया कि उनका जन्म पटना में हुआ था और तो अथाह सागर है! फिर मैंने गूगल महाराज की शरण में जाना उचित समझा।
गूगल महाराज से जाना कि गुरु गोविंद सिंह का बचपन का नाम गोविंद राय था। बैसाखी वाले दिन गोविंद राय से गुरु गोविंद सिंह बन गए थे। खालसा पंथ की स्थापना की। सिखों के 10वें गुरु थे। गुरु गोविंद सिंह जहां विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में ५२ कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे।
वाकई अथाह सागर है गुरु गोविंद सिंह जी का परिचय। वे मुझे कितना बताते! हरिमन्दिरजी पटना साहिब में 349वां प्रकाशोत्सव धूम-धाम से मनाया जा रहा है। शेष जानकारी और अपना अनुभव आप भी बांटें तो आनंद आए।
बारिश हुई, ठण्ड बढ़ी, ट्रेन‬ कैंसिल
यात्री परेशान
किसानो के चेहरे की 
लौटी मुस्कान

धुले-धुले
खिले-खिले
अरहर और सरसों
तुम मिलो आज
न कल, न परसों

भूल गया
शेखर एक जीवनी
याद है-
बाड़े पर पोस्ते
खेत फुली कुसुम्मी
पीली चोली वाली री!
दे जा एक चुम्मी।
‪#‎टाटा‬ पर बैठकर टाटा करते चले गये कई रोज के यात्री। ‪#‎49अप‬ भी आ गई। थोड़ी विलम्ब से आई और देर से खड़ी है। बनारस पहुँच कर जोर की अंगड़ाइयाँ ले रही होगी और प्रधान मंत्री जी के शहर को छोड़ने का मन नहीं कर रहा होगा। लगता है मेरी बात सुन कर शर्मा गई, चली हंस की चाल!
टाटा वही ‪#‎ट्रेन‬ है जिससे कटकर लगभग 6 माह पहले अपने एक साथी की मृत्यु हो गई थी। टाटा जौनपुर में नहीं रुकती, बनारस के बाद अगला पड़ाव फैजाबाद है। साथी जफराबाद स्टेशन पर जब ट्रेन धीमी होती है, दौड़कर आउटर पर ही उतर जाते हैं। जिनकी मृत्यु हुई थी वे जफराबाद स्टेशन के आउटर पर उतरने के लिए निचले पाँवदान पर खड़े थे, इतने में प्लेटफॉर्म आ गया और एक पैर उसी में फँसकर उलझ गया था। दुर्घटना में प्लेटफॉर्म से रगड़कर सीने की हड्डियाँ भी टूट गईं थीं और उनकी दुखद मृत्यु हो गई थी।
इस घटना के बाद कई सप्ताह तक लोग टाटा से नहीं गए। स्टेशन पहुँचने पर घर से फोन आते थे-टाटा से तो नहीं गए? और लोगों को सफाई देनी होती थी- नहीं, टाटा से नहीं गए। लगता है लोग उस घटना को धीरे-धीरे भूल चुके हैं और फिर टाटा से जाने वालों की संख्या बढ़ रही है। अभी भी बहुत से यात्री टाटा से नहीं जाते और थोड़े देर से ही सही, सुरक्षित यात्रा करना चाहते हैं। ऐसे यात्रियों की संख्या अधिक है।
कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है। लोग कनटोप, मफलर ओढ़े भारी जैकेट की बाहों से उँगलियाँ बाहर निकाले अखबार पढ़ रहे हैं या मोबाइल चला रहे हैं। पीछे की सीट से 'आत्महत्या पर राजनीति' प्रकरण पर चल रही बहस के कुछ शब्द सुनाई पड़ रहे हैं। लोहे के घर की शीशे वाली खिड़कियाँ बन्द हैं। अरहर और सरसों के खेत के साथ गोहरी पाथती ग्रामीण महिलाएं भी दिख रही हैं। सुंदरता श्रम का उपहार है। यह विडम्बना है कि मालिक मस्त, श्रमिक लाचार है। छोटे-छोटे छोकरे कम कपड़ों में मूँगफली, हरे मटर का बोझ उठाये बोगियों में घूम रहे हैं। कई ऐसे होंगे जो श्रम न करें तो घर का चूल्हा न जले।
ट्रेन की रफ़्तार सुस्त है। कोई चीख रहा है-ड्राइवर झंडू है! कुछ देर ट्रेन की चाल और ऑफिस के लिए हो रही देर पर चर्चा हुई। कोई अखबार की संपादकीय पढ़कर बोले-सिंधु घाटी की सभ्यता के समय भी हर घर में शौचालय था! अब बातें प्रधानमन्त्री स्वच्छता अभियान की ओर मुड़ गईं। श्रमजीवी अवसर पाते ही बुद्धिजीवियों की तरह बातें करते हैं। बातें करना, बातें बनाना, बहस करना कितना आसान है! गढ़े मुर्दे उखाड़ना, हत्या-आत्महत्या पर राजनीति करना कितना आसान है, देश का वास्तव में विकास करना कितना कठिन!

आज ठंडी हवा कह रही है-हट जा! मेरे सामने न आ। छुप जा! प्लेटफॉर्म पर मत टहल। ‪#‎ट्रेन‬आएगी तो खिड़की के शीशे बन्द कर बैठ जाना किसी बोगी में।
ट्रेन की प्रतीक्षा लम्बी हो तो ये बात मौजूँ है-मैं ये सोच के दिल बहला रहा हूँ, वो अब चल चुकी है, वो अब आ रही है!
पहले जमाने में प्रेमियों की हालत कालीदास सरीखी थी। मेघ को दूत बनाकर या चाँद के सहारे अपना दुखड़ा रो लेते थे। अब तो नेट है। मगर हाय! नेट भी अपनी बात पर टिका नहीं रहता। धीरे-धीरे समय बढ़ाता है।
पता नहीं कहाँ अटक गई अपनी वाली! देखें कब आती है और कब सीटी बजाते हुये कहती है-आजा मेरी बोगी में बैठ जा।

‪#‎ट्रेन‬ आई। उछलती-कूदती। ऐसे आई जैसे कमाल कर दी हो! लेट से आने की ज़रा भी शर्मिंदगी नहीं। 'बैठना हो तो जल्दी से बैठो वरना मैं चली! मेरे चाहने वाले एक तुम ही नहीं!!!' वाला भाव। मरता क्या न करता। जब घर की बेवफाई सहनी पड़ती है, ये तो ...लोहे की है। बैठ गया चुपचाप।
सामने लोअर बर्थ पर एक महिला कम्बल ओढ़े लेटी हुई हैं। उसके अपर बर्थ पर कनटोप, मफलर बांधे सर झुकाये एक आदमी बैठा है। उसकी मुड़ी किसी गुड्डे की तरह ऊपर-नीचे हिल रही है। उसके बगल में एक युवा 'हरा मटर' बड़े चाव से खा रहा है। मेरे सामने एक मैडम बैठी हैं। बगल में संजय जी बड़ी तेज़ आवाज में मोबाइल बजा रहे हैं-सलामे इश्क,मेरी जां, ज़रा कुबूल कर लो। तुम हमसे प्यार करने की ज़रा सी भूल कर लो.....! कोई उनका बाजा नहीं सुन रहा। सर्वेश भाई अपनी ट्रेन पर चढ़ने की बहादुरी बतिया रहे हैं। गाना एक तरफ, बातें दुसरी तरफ। बन्द लोहे के घर की खिड़कियों से आती ठंडी हवा से एहसास हो रहा है कि आज गलत जगह बैठ गये।
बार-बार चेन पुलिंग हो रही है। हर टेसन पर रुक रही है ट्रेन। साथी परेशान हैं कि यही हाल रहा तो किसान इसे ओवर टेक कर लेगी। सरकार के पास इस बिन बात की चेन पुलिंग का कोई इलाज नहीं है। सिवाय यह कहने के कि यह विरोधी दल की साजिश है। ये चाहते ही नहीं कि देश विकास मार्ग पर तेजी से आगे बढे!
अब ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ी है। लगता है पहुँच ही जायेगी कैन्ट स्टेशन। यहीं से कल चलने वाली है ‪#‎महामनाएक्सप्रेस‬ । आदरणीय प्रधान मंत्री जी का बनारस की जनता को नई सौगात। यह ट्रेन बनारस से दिल्ली जायेगी। सुना है कल सुबह 11 बजे प्रधान मंत्री जी अपने हाथों इसका उदघाटन करेंगे। सोचता हूँ कल उसी ट्रेन में बैठा जाये। दिल्ली दूर है मगर जौनपुर तक जाने में क्या हर्ज है?

अधिक देर होने की संभावना से ‪#‎महामनाएक्सप्रेस‬ से जाने का विचार त्यागना पड़ा। ‪#‎49अप‬आज एकदम राइट टाइम पर आई और छूट भी गई। लगता है आज बनारस से छूटने वाली सभी ‪#‎ट्रेनों‬ पर अधिकारियों की पैनी नज़र है। यही दृष्टि रोज मिले तो अपना भी आना-जाना सुगम हो जाय!
ट्रेन छूटी तो यार्ड में महामना एक्सप्रेस का इंजन सज्ज होता दिखा। थोड़ी देर बाद उसके डिब्बे भी दिखे। फूल-मालाओं से सजे डिब्बों को पुराना इंजन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म की ओर ले जा रहा था। एक और लोहे के नये घर का आज गृह प्रवेश है। भारतीय जनता के मुखिया आदरणीय प्रधान मंत्री जी का संकेत पा कर यात्रा प्रारम्भ करेगी। कल से भारतीय जनता इसके संकेतों की प्रतीक्षा करेगी। ‪#‎काशी‬ के लिये आज खुशी का दिन है और सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि ‪#‎महामना‬ के नाम से एक ट्रेन भारत की राजधानी तक चलेगी।
50डाउन कैंसिल है। लेट फरक्का मिली भंडारी स्टेशन पर। आई तो मन प्रसन्न हो गया, रुकी तो रुकी रही। मैंने पूछा-'चलती क्यों नहीं?' गुस्से से बोली-'आगे 'माल'है और जफराबाद तक सिंगल पटरी। मैं क्या करूँ?' मैं चुप हो गया। सरकार 'माल' पर ज्यादा ध्यान देती है। अर्थ व्यवस्था टंच होनी चाहिये। समाजवादी रेल मंत्री जी के समय से सरकारें माल गाड़ी पर मेहरबान हैं। सिंगल को डबल पटरी में बदलने की खबरें भी आ रही हैं। ठीक है, माल कमाओ और माल को डबल पटरी बनाने में खर्च करो। पटरियों के अगल-बगल सिर्फ चूना मत लगाओ।
‪#‎ट्रेन‬ चल दी। जफराबाद पहुँच रही है। यहां और साथी चढ़ेंगे। ट्रेन में भीड़ है, इस बोगी में भी झांकेंगे। अपन को तो सीट मिल ही गई है, उनकी वे जाने। सामने लोवर बर्थ पर एक आदमी मफलर ओढ़े, चश्मा पहने, पूरी तरह झुक कर डायरी के पन्ने पलट रहे हैं। डायरी में आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी कुछ अनसुलझी पहेली होगी जिसे वे खाली वक्त में मौक़ा मिलते ही सुलझा लेना चाहते हैं। डूबे हुये हैं बड़ी देर से। मैं उनकी कोई मदद नहीं कर सकता। अपनी पहेली सभी को खुद ही सुलझानी पड़ती है।
ट्रेन अब जलालगंज पुल को थरथरा कर आगे बढ़ रही है। यह पुल भी कितना बेबस, कितना असहाय है! अब वो आदमी गायब हो गया! मेरा ध्यान पुल के कांपने पर गया और वो आदमी इसी बीच अपनी डायरी के साथ कहीं गुम!!! शायद उसे जलाल गंज स्टेशन पर उतरना था। ट्रेन स्टेशन पर खड़ी है।
50 डाउन आज कैंसिल है। जौनपुर सिटी से सद्भावना पकड़ने के चक्कर में आये तो बेगमपुरा मिल गई। सिटी में इसका स्टापेज नहीं है मगर रुक गई तो सभी चढ़ गए। सभी चढ़े तो हम भी चढ़ गये। कोई एसी में चढ़ा, कोई स्लीपर में। हमारे सामने जनरल बोगी थी हम जनरल में चढ़ गये।
एक फ़ौजी को नया रंगरूट मिल गया है। लगातार उसे समझाये जा रहे हैं। मैंने सोचा कुछ फ़ौज के टिप्स देंगे लेकिन वो तमाम हितोपदेश दिये जा रहे हैं! अगला भक्त की तरह सुन रहा है।
‪#‎ट्रेन‬ ज़फराबाद में भी रुकी। किसी ने चेन पुल्लिंग किया है। सिटी में रुकी थी तो अच्छा लगा था, जफराबाद में रुकना कुछ जमा नहीं। दूसरे यात्रियों को दोनों बार रुकना बुरा लगा होगा। ऐसा ही है। गलत काम अपने हित में हो तो बुरा नहीं लगता, दूसरा हित साध रहा तो बुरा लगता है! गलत काम न रुकने के पीछे हमारा यही स्वार्थ है।
अब ट्रेन अपनी रफ़्तार में चल रही है। यात्री सभी गुमसुम हैं। जम्मू से बनारस तक चलती है बेगमपुरा। बनारस आते-आते थक चुके होंगे। इनकी बातों से पता चल रहा है कि इस साल वहां अभी बर्फ नहीं पड़ी। सुबह-शाम ठण्ड बहुत है। पुल के थरथराने की आवाज़ आ रही है। जलालगंज आ रहा है। यह ट्रेन सीधे बनारस ही रुकेगी। आगे कहीं गरमा गरम बहस हो रही है।
फिर चेन पुलिंग हुई! बाबतपुर स्टेशन है। धरती वीरों से खाली नहीं। ट्रेन में बहस सुनो, उपदेश सुनो तो लगता है सभी कितने भले लोग हैं! चेन पुलिंग करने वाले आसमान से तो आ नहीं रहे! इसी ट्रेन में चल रहे होंगे या इसी ट्रेन से उतरे होंगे!!!
गणतन्त्र की पूर्व संध्या पर सबको बधाई दिया जाय और अपनी बातों को यहीं विराम दिया जाय। तमाम चेन पुंलिंग के बाद भी ट्रेन अपनी मंजिल तक पहुँचती ही है। रुकते-चलते अपना देश भी एक दिन विकसित राष्ट्र हो ही जाएगा। आप सभी को गणतंत्र दिवस की बहुत बधाई। .....जय हिन्द।
कितना कठिन है
हमारे लिये
जाड़े में
सुबह उठकर
गणतंत्र दिवस मनाने
झण्डा फहराने
घर से निकलना!

और भी कठिन
जब ऑफिस दूर हो
और..
मुँह अँधेरे
छोड़ना पड़े
गर्म बिस्तर।

कितना सरल है
देश के वीर सैनिकों के लिये
हिमालय की बर्फिली पहाड़ियों में
अपनी जान पर खेलकर
सीमाओं की रक्षा करना!
और भी सरल
जब ऊँची पहाड़ियों तक पहुँचने का 
कोई मार्ग ना हो।

कठिन लगने लगे
हमारी तरह 
उनको भी
सीमाओं की रक्षा करना
तो चाह कर भी
नहीं फहरा पायेंगे हम
तिरंगा।
......................

कोहरे को चीरती भाग रही थी 'किसान'। अब दिख रही है अरहर, सरसों के फूलों पर खिली-खिली धूप। धूप, अरहर और सरसों के इन फूलों से तिरंगे रंग में रंगी है पूर्वांचल की धरती। घूम रहे हैं पटरी पर लोहे के पहिये, दौड़ रहा है लोहे का घर। मन में, प्रकृति में, स्कूलों और सरकारी भवनों में हर तरफ गणतंत्र दिवस का उल्लास देखते ही बनता है।
सरकारी मशीनरी के अलावा सभी धार्मिक स्थल भी इससे जुड़ जाते तो आजादी और गणतंत्र दिवस समारोहों की क्या धूम होती! सुबह ईद, दिन होली, शाम क्रिसमस और रात दिवाली होती!!! जैसे ईद और होली की बधाई देते हैं, आपस में तपाक से गले मिलते हैं वैसे ही बधाइयाँ देते आजादी की, लोकतन्त्र की। झिलमिल झालरों से, दीपों से सजे होते सभी घर। नये वस्त्रों में घूम रहे होते देश के सभी बच्चे। पूरब, पश्चिम, उत्तर, दख्खिन चारों दिशाओं में मची होती धूम।

‪#‎ट्रेन‬ भाग रही है अपनी रफ़्तार से। उम्मीद है पहुँचा देगी समय से। छंट रहा है कोहरा। फ़ैल रहा है उजाला। सोचता हूँ खेतों में काम कर रही महिलाओ, मिट्टी ढो कर ले जाते ट्रैक्टर, भेड़ चराते चरवाहे, चाय-मटर बेचते हरकारों, मजूरी पर निकले कामगारों या रिक्शा खींचते किसी गरीब को रोककर मैं उसे गणतंत्र दिवस की बधाई दूँ तो मुझे पागल न समझ ले! छोड़िये! ये काम नहीं करता। आपको देता हूँ और आप मुझे दीजिये-गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत बधाई। ....जय हिन्द।