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28.1.23

वो फ़ोन कॉल

हमारे समय में कम्प्यूटर नहीं था, नेट नहीं था, मोबाइल नहीं थी। किसी को जरूरी समाचार देना होता तो शहर में हरकारा दौड़ाया जाता, बात दूर, दूसरे राज्य की हो तो टेलीग्राम किया जाता। घर में किसी की बीमारी की खबरें तो खत का हिस्सा भी नहीं बनती थी, साफ छुपा ली जाती। तर्क यह होता, "बिचारे को क्यों परेशान किया जाय? आकर भी क्या कर लेगा!" 


घर में कोई मर जाय तो सीधे टेलीग्राम होता....Come soon. यहाँ भी मौत की खबर छुपा ली जाती, "बिचारा, अधिक दुखी हो जाएगा तो आएगा कैसे?"


छोटे भाई का तार मिलते ही बड़े भैया परेशान हो, सपरिवार चल देते, मन ही मन सोचते,"कुछ तो जरूर गड़बड़ है, पिताजी बीमार चल रहे थे, कहीं सच में कुछ हो तो नहीं गया!"😢 

बेटा जब घर से दूर जाता तो पहुँचकर तार करता..Reached. वह समय था जब कम शब्दों में अपनी बात पहुँचानी होती थी, जितने शब्द उतना पैसा। 


आजकी तरह नेट और मोबाइल का समय नहीं था। सबसे ज्यादा मेहनत तो प्रेमियों को करनी पड़ती थी। तीन शब्द कहने में वर्षों लग जाते। एक खत भेजने और जवाब लेने में कितनी मशक्कत होती! पढ़ते समय भी लड़के/लड़कियाँ विश्वविद्यालय पहुँचकर ही मिल/बैठ कर बातें कर पाते। इंटर कॉलेज तक तो भारत पाकिस्तान की सीमा रेखा खींची होती, पूरा बंटवारा होता। कोई इधर से उधर गया तो बवाल हो गया। बादलों, चाँद तारों या फिर किताबों के माध्यम से खत पहुँचाए जाते। बहुत मुश्किल समय था। 


मध्यमवर्गीय परिवार के लिए किताबें या चलचित्र मनोरंजन का बढ़िया साधन हुआ करती थीं। इधर हीरोइन के गले से पल्लू सरका, नेपथ्य में संगीत शुरू हुआ, लड़के रोमांचित हो जाते थे। आज की तरह नग्नता आम बात नहीं हो चुकी थी। मोबाइल में नेट के माध्यम से मनचाहे दृश्य हाथों में नहीं उगते थे।


अब तो सब कुछ हाथ में है। मोबाइल से बातें हो रही हैं, वीडियो चैट हो रहा है, सब आम हो चुका है। पहले पिताजी समझाते थे, बच्चे समझते थे। अब तो पिताजी ही बच्चों से पूछते हैं, "बेटा! देखना जरा, मोबाइल को यह क्या हो गया! अभी जो फ़िल्म देख रहे थे, न जाने कहाँ गायब हो गया!!!"


मोबाइल आने से पहले रईसों के घर एक टेलीफोन हुआ करता था। भारतीय दूर संचार (BSNL) के छोटे-छोटे लाइनमैन जैसे कर्मचारियों का भी समाज में बड़ा धाक रहता था। धीरे-धीरे अड़ोस पड़ोस के घरों में भी टेलिफोन की घण्टियाँ बजने लगीं।   जिनके घर टेलीफोन लगे हों उनसे पड़ोसी बड़े आदर से बात करते और अनुरोध करते कि यदि मेरा कोई फोन आए तो बताने की कृपा करें। सार्वजनिक टेलीफोन बूथ जिसे पीसीओ कहते थे, मोहल्ले-मोहल्ले में छाने लगे और अधिक से अधिक घरों में टेलीफोन के तार दौड़ने लगे। 


मोबाइल के आने तक भी कुछ BSNL का रंग उतरा नहीं था। हर कॉल करने के पैसे लगते थे तो लोग केवल आने वाले कॉलों के लिए मोबाइल लिए घूमते। जब दूसरी प्राइवेट कम्पनियों ने सस्ते दामों में असीमित फोन कॉल और अंतरजाल का बाजार खोल दिया तब जाकर BSNL की धमक समाप्त हुई। सस्ते और सुविधा के लिए लोग निजी कम्पनियों की ओर भागने लगे। फोन आना/जाना साधारण बात हो गई।


हम जब तक कुँआरे थे, वो कॉल कभी नहीं आया जिसकी अपेक्षा शीर्षक देकर की गई है। शादी शुदा होने के बाद कई कॉल आए जिनका व्यक्तिगत जीवन में तो बड़ा महत्व था लेकिन सार्वजनिक जीवन में गंगूतेली के फोन पर आए कॉल का क्या महत्व? हम भी कोई सेलिब्रेटी होते तो गर्व से कहते, वो कॉल भी क्या कॉल था, जिसे सुनते ही हम जवान हो गए थे! अब हम जवान हुए हों या मुर्झा गए हों, किसी को क्या फरक पड़ता है। 


हाँ, एक दर्द भरी कॉल की याद आती है जब मीलों दूर से रात्रि में 3 बजे बड़े भाई साहब ने फोन करके बताया था, "माँ की तबियत अधिक खराब है, तुरंत आ जाओ।" कॉल सुनते ही अपने भेजे टेलीग्राम की तरह, हम समझ गए थे कि वर्षों पहले गुजरे पिताजी की तरह अब माँ भी इस दुनियाँ में नहीं रहीं।

...@देवेन्द्र पाण्डेय।

27.7.20

अँधेरा

लाइट चली गई है। मैं अँधरे में हूँ। ऐसा लगता है जैसे मैं ही अँधेरे में हूँ और सबके पास रोशनी है! पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा होगा! केवल मैं ही अँधेरे में हूँ! फिर सोचता हूँ... जब मैंअँधरे में हूँ तो पूरा शहर भला कैसे उजाले में होगा? जब मैं अँधेरे में हूँ तो शहर भी अँधरे में होगा, देश भी अँधेरे में होगा। लाइट का क्या है, आ जाएगी लेकिन यह जो अँधेरा है, बढ़ता जा रहा है। 

कल तक मौत अजनबी लगती थी क्योंकि अजनबियों के मरने की खबरें आ रही थीं। अब लगता है, जानी पहचानी है, क्योंकि अपनो के मरने की खबरें आ रही हैं। बढ़ती जा रही है, कोरोना से संक्रमित हुए लोगों की संख्या। पहले शहर अछूता था अब मोहल्ले भी अछूते नहीं रहे। यह कौन जानता था कि यम भैंस पर नहीं, अपनों के कंधे पर बैठकर आएगा!

वे, जिहोने खरीद लिए हैं रोशनी के चराग, उन्होंने ही, हाँ, उन्होंने ही कैद कर लिया है खुद को एक सुरक्षा चक्र में। खरीद लिए हैं डॉक्टर। खरीद लिए हैं अस्पताल। वैसे ही जैसे खरीद ली हैं.. खबरें। हम जिंदा हैं तो सिर्फ इसलिए कि व्यस्त हैं यमदूत। जिन्हें उठाना था, उठा नहीं पाते। जिनकी बारी नहीं थी, उन्हें लादे चले जा रहे हैं। हम खुश किस्मत हैं कि कहीं, कोई हमसे ज्यादा बदनसीब है। व्यस्त हैं यमराज शायद इसीलिए जीवित हैं हम भी। थक जाएं या हो जाए उनका कोटा पूरा तो शायद बच जांय हम भी, रोशनी वालों की तरह।  अभी तो मैं अँधेरे में हूँ। ऐसा लगता है जैसे मैं ही अँधेरे में हूँ और सबके पास रोशनी है!

25.7.20

बनारस में नागपंचमी

छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो। नागपंचमी के दिन, इसी नारे के शोर से, हम बच्चों की नींद टूटती। ऊँघते, आँखें मलते, घर के बरामदे में खड़े हो, नीचे झाँकते.. गली के चबूतरे पर कुछ किशोर, नाना प्रकार के नागों की तस्वीरों की दुकान सजाए बैठे हैं! मन ललचता, तब तक दूसरे बच्चों का एक झुण्ड, घर के किवाड़ खटखटाता और द्वार खुलते ही धड़धड़ा कर, घर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, ऊपर बैठके के बाहर खड़ा हो जाता! पिताजी तैयार रहते। कुछ सिक्के निकाल कर बच्चों को देते। वे पैर छू कर, पैसे मुठ्ठी में पकड़े, जोर-शोर से नीचे उतरते, चले जाते। गली में आकर फिर नारा लगाते...छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।

माँ, नाग की तस्वीरें, घर के दरवाजों पर, गाय के गोबर से चिपकातीं, नाग देवता की पूजा करतीं, खीर-पूड़ी पकातीं और हम बच्चे नहा धो कर प्रेम से खाते। 

हमारा मन भी करता था लेकिन हम ब्राह्मण के बच्चे थे। हमें नाग बेचने और घर-घर घूमकर पैसे इकठ्ठे करने का अधिकार नहीं था। यह अलग बात है कि पिताजी से नजरें बचा कर, यादवों/मल्लाहों के बच्चों के झुण्ड में शामिल हो, हमने भी नारे लगाए थे...छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।

सुबह से शाम तक बीन बजाते, सपेरे आते। उनकी पेटियों में कई प्रकार के सर्प होते। फन वाले, बिना फन वाले, काले, भूरे, गेहुएँ, एक मुँह वाले और दो मुँह वाले भी! गली के घरों से निकल, माँएं, सांपों को दूध पिलातीं, धान का लावा चढ़ातीं, पैसे चढ़ातीं। सपेरे भी खुश, माँ भी खुश और हम बच्चे भी खुश। बड़े खुशनुमा माहौल से शुरू होता था, नागपंचमी का त्योहार। 

बनारस की तंग गलियों के बीच तिराहों में, जहाँ चौड़ी जगह मिलती, जगह, जगह, महुवर खेले जाते। महुवर देखने के लिए भारी भीड़ जुटती। घरों की छतों, बरामदे की खिड़कियों यहाँ तक कि छज्जों पर खड़े होकर भी लोग महुवर देखते। 

एक मदारी एक हाथ में धरती से थोड़ी धूल उठाता और मंत्र पढ़ते हुए, होठों को हिलाते/बुदबुदाते हुए, दूसरे मदारी के चारों ओर गोल-गोल घूमता। दूसरा मदारी बड़े जोश और दर्प के साथ, दोनों गाल गुब्बारे की तरह फुलाते/पचकाते हुए, बीन बजाता। बड़े बाँके अंदाज में, घनी जटाओं को, कभी इधर, कभी उधर, दोनो कंधों पर झटकता। मंत्र पढ़ने वाला मदारी भयानक मुँह बनाए, लाल-लाल आंखों से बीन बजाने वाले को घूरता, गोल-गोल घूम कर पीछा करता और अचानक, पूरी शक्ति से, जमीन से उठाए धूल के कण दूसरे मदारी को एक हाथ लहराते हुए मारता। 

अरे! यह क्या!!! बीन बजाने वाले की बीन बजनी कैसे रुक गई? उसके मुँह से तो खून भी निकल रहा है! बीन मुँह में अटक गया है!!! निकालने का प्रयास करता है, निकाल ही नहीं पा रहा। चारों ओर गोल-गोल खड़ी भीड़ शोर मचाती..मर गयल रे! अब मर जाई। खून फेंकता हौ..!!!

यही क्रम दिनभर चलता रहता। कभी एक मदारी गिर कर तड़पता कभी दूसरा मदारी। खेल इतना जीवंत होता कि अमिताभ बच्चन या दिलीप कुमार भी फेल।  एकदम सच्चे लगते, मदारियों के घात/प्रतिघात। हम बच्चे, कभी उधर, कभी इधर, मीलों दौड़ते/भागते रहते गलियों में। कभी सुनते वहाँ का महुवर बढ़िया है, कभी सुनते वहाँ का तो और भी बढ़िया है! 

दिन ढलने के बाद भी खतम नहीं होता था बनारस में नागपंचमी का उत्सव। शाम होते-होते, जमा होने लगते थे पहलवान अखाड़ों में। बच्चों/किशोरों/युवाओं के डंबल, क्लब, जिम्नास्टिक और मलखम्भ के करतब तो होते ही,  बड़े पहलवान भी कुश्ती, जोड़ी या गदा घुमाने की प्रतियोगिताओं में भाग लेते। 

कब सुबह होती और कब शाम ढल जाती, पता ही नहीं चलता। घर से खाना खा कर निकले या दोस्तों को बुलाने गए और समझदार माताओं ने जबरी बिठाकर खाना खिला दिया तो ठीक वरना भूखे प्यासे पागलों की तरह दौड़ते/भगते कब बीत जाता, पता ही नहीं चलता था, नागपंचमी का त्योहार। 

कल रात, फेसबुक चलाते हुए किसी पोस्ट से पता चला कि आज नागपंचमी है! आज घर के बाहर, घर में भी, घोर सन्नाटा है मगर सुबह से कानों में गूँज रहा है बस एक ही नारा....छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।

14.5.20

कविता सुनाने का नशा

एक बनारसी कवि ने दो बनारसी कवियों का एक मजेदार किंतु सत्य किस्सा सुनाया। जिसे मैं अपने शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूँ। दोनो कवि मुफलिसी में जीवन गुजारते लेकिन कविता के लिए जान देते। एक दिन एक कवि ने रात्रि में 10 बजे दूसरे कवि का दरवाजा खटखटाया...

कवि जी हैं? कवि जी छंद रच रहे थे, अचकचा कर द्वार खोला तो सामने दर्पण में अपनी छवि की तरह दूसरे मित्र कवि को खड़ा पाया। चौंक कर बोले...इस समय ! यहाँ!!! आइए, आइए, भीतर आइए, बाहर क्यों खड़े हैं? 

कवि जी कमरे में घुसते ही बोले..एक नई कविता लिखी थी, सोचा सुना ही दूँ। गलत समय आ गया, आपको कोई एतराज तो नहीं? 

आतिथेय ने अतिथि से कहा..नहीं, नहीं, एतराज कैसा! आपने तो मेरी मुश्किल आसान कर दी। मैं अभी छंद पूरा करते-करते सोच रहा था.. श्रीमती जी तो कविता के नाम से चिढ़ती हैं, किसे सुनाऊँ?  तभी किस्मत से आप आ गए। शीतल जल पिलाता हूँ, आप अपनी कविता प्रारम्भ कीजिए।

अतिथि कवि प्रसन्न हो कविता सुनाने लगे और आतिथेय वाह! वाह! करने लगे। इधर कविता समाप्त हुई, उधर कवि जी के सब्र का बांध टूटा...आपने बहुत अच्छी कविता सुनाई अब मेरा छंद सुनिए। प्रशंसा से मुग्ध मेहमान जी ने कहा..हां, हां, सुनाइए। मेजबान कवि जी ने अपना ताजा छंद सुनाया और मेहमान कवि जी ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करी।

कविता सुनने सुनाने का यह दौर लम्बा चला। रात्रि के डेढ़ बजे गए। दूसरे कमरे से रह-रह कर श्रीमती जी के गुर्राने और बाउजी के नींद में खर्राने की आवाजें साफ सुनाई पड़ रही थीं। तभी मेहमान कवि जी ने डरते-डरते फरमाइश की...एक कप चाय मिल जाती तो....मजा आ जाता, नहीं? मेजबान मांग सुन, मन ही मन थर्राए..घर में न दूध न चायपत्ती। होती भी तो सर फोड़ देतीं श्रीमती जी। प्रत्यक्ष में हकलाए...हां, हां, क्यों नहीं, लेकिन श्रीमती जी तो सो चुकी लगती हैं। चलिए, बाहर चाय पिलाते हैं आपको। 

मेहमान जी बोले..रहने दीजिए, जब घर मे नहीं मिल रही तो इतनी रात में बाहर कहाँ मिलेगी? 

मेजबान कवि जी ताव खा गए..मिलेगी कैसे नहीं! आपने चाय पीने की इच्छा प्रकट की तो हम आपको चाय पिलाए बिना जाने कैसे दे सकते हैं! चलिए, घर से बाहर निकलिए तो सही।

दोनो कवि मित्र रात्रि के टेढ़ बजे सड़क की खाक छानते, चाय की दुकान ढूँढते, सुनते/सुनाते चले जा रहे थे। कहीं दुकान खुली होती तब न चाय मिलती। रथयात्रा से साजन सिनेमा हॉल तक (लगभग 2 किमी) चले आये, चाय नहीं मिली। मेहमान निराश हो बोले..मैं तो पहिले ही कह रहा था, चाय नहीं मिलेगी। मेजबान बोले..कैसे नहीं मिलेगी? चलिए, कैंट रेलवे स्टेशन तक चलते हैं, वहाँ तो रात भर दुकानें खुली रहती हैं। 

रेलवे स्टेशन लगभग 4 किमी दूर था लेकिन वे चलते रहे। आगे चौराहे पर पुलिस की जीप रात्रि गश्त में निकली थी। दरोगा जी ने देखा..दो दुबले-पतले सात जनम के भूखे युवक, बिखरे बाल, बढ़ी दाढ़ी-मूँछें, लहराते, गाते चले जा रहे हैं! रोककर पूछा...शराब पी रखी है? कहाँ जा रहे हो इतनी रात को? कवियों को गुस्सा आ गया। राष्ट्र चिंतकों का यह अपमान! घोर कलियुग है। गुर्राकर बोले..हम कवि हैं। कविता सुनाकर थक गए तो चाय पीने स्टेशन जा रहे हैं। आपको हमसे तमीज से बात करनी चाहिए। दरोगा जी को गुस्सा आ गया। सिपाहियों से कहा..पकड़कर गाड़ी में बिठाओ, दोनो को। एक रात बन्द रहेंगे हवालात में तो रात में घूमना भूल जाएंगे।

कवि विरोध करते रहे लेकिन भारत मे पुलिस से बड़ा कौन है? दोनो को गाड़ी में बिठाया और 10 किमी दूर मडुआडीह स्टेशन के पास उतारते हुए दरोगा जी बोले..कवि हो इसलिए छोड़े दे रहे हैं, कवि न होते तो जेल में बन्द कर देते। जाओ! सुबह तक चाय जरूर मिल जाएगी। पी कर ही घर जाना। 

दोनो खिसियाए, मुँह लटकाए, दरोगा जी को कोसते, घर की ओर पैदल ही चलने लगे। दोनो मित्रों को घर पहुँचने में भोर हो गया लेकिन मानना पड़ेगा कि चाय पीकर ही एक दूसरे को गुडबाय कहा।

11.5.20

रोटी और नींद

औरंगाबाद की घटना सुनी तो पहले लगा, कहीं चलते-चलते हारकर सामूहिक आत्महत्या तो नहीं कर लिया मजदूरों ने! फिर पता चला नहीं, थककर चूर हो गए थे और सो गए थे रेलवे ट्रैक पर। इस घटना से नींद की गहराई का पता चलता है। कितनी गहरी हो सकती है नींद! रेलवे ट्रैक पर भी आ सकती है ! मालगाड़ी की आवाज से भी नहीं टूटती। ट्रैक पर रोटियाँ बिखरीं थीं मतलब उस दिन दुर्भाग्य से पेट भर गया होगा मजदूरों का। भूखे होते तो शायद नहीं आती इतनी गहरी नींद। किसे पता था कि पेट का भरा होना भी, मौत का कारण हो सकता है!

कभी हमको भी आती थी नींद। सोए रहते थे बरामदे में और आतिशबाजी करते हुए संकरी गली से गुजर जाती थी पूरी बारात लेकिन नहीं टूटती थी नींद। वो बचपन के दिन थे। वो दिनभर खेलते रहने के बाद की थकान थी। यह दिनभर रेलवे ट्रैक पर पैदल चलने की थकान है। बहुत फर्क है दोनो थकान में लेकिन नींद में कोई फर्क नहीं। घर में सोए हो तो गली से, गुजर जाती है पूरी बारात, ट्रैक पर सोए हो तो तुम्हें चीरकर, फाड़ते हुए, गुजर सकती है मालगाड़ी।

मजदूरों की नींद नहीं टूटी लेकिन उनके मरने के बाद जाग गई सरकारें। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। अक्सर, हादसों के बाद ही, टूटती है, सरकारों की नींद। विशाखापत्तनम में जागी, औरंगाबाद में जागी और आगे न जाने कितनी बार हमको/आपको आएगी नींद और न जाने कितनी बार जागेंगी सरकारें! 

नींद बड़ी जालिम चीज है। हमारी हो, सरकारों की हो या दूसरे जिम्मेदारों की, जब-जब पेट भरेगा, आएगी जरूर। भूखे को नहीं आती। भूख, भोजन और नींद का आपस मे बड़ा गहरा गठजोड़ है। श्रमिक को थकान लगती है, भूख लगती है और रोटी मिल जाय तो नींद भी लगती है। जैसे रोटी जरूरी है, नींद भी जरूरी है। नींद न लगे तो श्रमिक नहीं कर पाता श्रम। अपने और अपने परिवार की रोटी और नींद से अधिक कुछ सोच भी नहीं पता श्रमिक। सोच ही नहीं पाता तो चाहेगा क्या! मालिक को श्रम चाहिए तो इतना तो करना पड़ेगा। श्रम के बदले, श्रमिकों के लिए रोटी और नींद की व्यवस्था तो करनी पड़ेगी।

रोटी और नींद की व्यवस्था होती तो वह घर नहीं जाता। वह अपने उसी गाँव में वापस जाना चाहता है जहाँ उसके पास काम नहीं है लेकिन उम्मीद है कि वहाँ अपने लोग हैं। आधी रोटी खा कर भी आधी रोटी खिलाएंगे। बहुत खुशी से नहीं जा रहा है घर। तुम्हारा धंधा बन्द हो गया, तुम्हें काम नहीं चाहिए तो छीन ली तुमने उसकी रोटी। दुखी होकर जा रहा है। पैदल जा रहा है। रेलवे ट्रैक पर जा रहा है। जब रोटी मिलती है तो इतनी ताकत भी नहीं बचती कि सोने के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना ढूँढ सके। जहाँ है, वहीं सो जा रहा है। सड़क है तो सड़क पर, रेलवे ट्रैक है तो रेलवे ट्रैक पर। हम उनकी तरह थके नहीं हैं, हमारा पेट भरा है और हमको बुद्धि भी आती है कि उन्हें रेलवे ट्रैक पर नहीं सोना चाहिए था। वे थके हैं, भूखे हैं तो जहाँ रोटी मिलेगी, वहीं सो जाएंगे। वे नहीं जागे लेकिन हे मालिक! अब तुम जाग जाओ। रोटी नहीं दे सकते तो सुरक्षित घर तक पहुँचाओ। मत भूलो कि कल फिर सूरज निकलेगा, कल फिर खुलेंगे कारखाने और कल फिर तुम्हें इनकी आवश्यकता पड़ेगी।
...@देवेन्द्र पाण्डेय।

24.3.19

काशी में मोक्ष

जब तक एक भी बनारसी में फक्कड़पन है तब तक यह वाक्य सत्य है कि बनारस में मोक्ष मिलता है। मोक्ष मतलब आवागमन से मुक्त हो जाना। लाभ/हानी से मुक्त हो जाना। जय/पराजय से मुक्त हो जाना। यश/अपयश से मुक्त हो जाना। अपने/पराए से मुक्त हो जाना। 

मुक्त होने के लिए मुक्त करना आना चाहिए। त्याग करना आना चाहिए। पत्नी का त्याग, बच्चों का त्याग, घर का त्याग, परिवार, संसार के साथ-साथ अपने आप का भी त्याग। ऐसा त्यागी जो भक्ति में लीन हो वही मुक्त हो सकता है। जो मुक्त हो गया उसे ही मोक्ष मिलता है। कबीर दास जी ने भले अपना शरीर मगहर में त्यागा हो, मोक्ष की शक्ति तो उन्हें काशी से ही मिली। तुलसी को भी मोक्ष यहीं मिला। 

मोक्ष के घाट लगने की पहली सीड़ी है.. फक्कड़पन। कहते हैं काशी फक्कड़ों का शहर है। काशी में जब तक एक भी फक्कड़ है, यह बात सत्य है कि काशी में मोक्ष मिलता है। 

भिखारियों को मोक्ष नहीं मिलता। भिखारी लाख काशी में रहें, यहीं जन्म लें, वर्षों जीवित रहें और काशी में ही मरें लेकिन उन्हें मोक्ष नहीं मिलता। भिखारियों के अलावा धूर्तों, लोभियों, पापियों, दुष्टों किसी को भी काशी में मरने से मोक्ष नहीं मिलता। ये भटकती आत्माएँ हैं, युगों-युगों तक भटकती रहेंगी।  मोक्ष फक्कड़ को मिलता है। त्यागी को मिलता है। जो भी यहाँ की फक्कड़ शैली में जी पाया उसे मोक्ष मिला। काशी आ कर मरने से नहीं, काशी के अनुरूप जीने से मोक्ष मिलता है। 

यह हो सकता है कि जो भिखारी दिखते हैं, उनमें कोई त्यागी भी हो! केवल अपने जीवन यापन के लिए ही भिक्षाटन करता हो। यह भी हो सकता है कि जिन्हें हम धूर्त, लोभी, दुष्ट समझ रहे हैं उनका उद्देश्य किसी का अहित करना न हो, वे भी फक्कड़ हों। ये सब अपवाद हो सकते हैं लेकिन एक बात तो तय है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए फक्कड़पन जरूरी है।

3.3.18

स्वेटर/जैकेट कब उतारोगे बन्धु?

तुम स्वेटर/जैकेट कब उतारोगे बन्धु? अब तो होली भी आ गई! जब तुमने दूसरों की देखा देखी पहनना शुरू किया था तब चउचक ठंड थी। अब तो धूप जलाने लगी है। बुजुर्गों की हर बात को कान नहीं देते। वे तो कहेंगे ही ...यही समय ठंड लगती है! स्वेटर पहन कर, मफलर से कान बांध कर चलो।

सरसों कटने का समय आ गया, गेहूं बड़े हो चले और अभी तक तुमने जैकेट नहीं उतारे! बसंत तुम्हारी चमड़ी को छू भी नहीं पाया क्या! होली भी स्वेटर पहन कर खेलोगे? जैसे दस्ताने उतारे, मफलर उतारे वैसे अब स्वेटर भी उतार कर धुलने को दे दो। महिलाओं से कोई सबक नहीं सीखा!

जाड़े की धूप अब प्यारी नहीं रही, जाड़ा अपनी वेलेंटाइन धूप को साथ ले गया। अब तो वेलेंटाइन के बाद की कड़क धूप तुम्हारे स्वेटर का मजाक उड़ा रही है। इसे अब एक बाल्टी पानी में डुबो दो।

तुम सब्जी खरीदने नहीं जाते! कटहर, नेनुआं और भिंडी पर तुम्हारी निगाहें नहीं पड़ीं? अभी भी गोभी, छिम्मी से चिपके हुए हो! कब तक मटर+पनीर खाओगे बन्धु? अब स्वाद बदलो, नया माल अंदर आने दो। रम का जमाना गया अब ठंड का गम भूल बीयर/व्हिस्की का मजा लो।

तुमने किसानों को नंग धड़ंग खेतों में मेहनत करते नहीं देखा? बच्चों को गंगा जी में गोता लगाते नहीं देखा? जूते मोजे उतारो, चप्पल पहनो बन्धु! बसंत तो गया, फागुन के रंग ढलो। अब स्वेटर/जैकेट उतारो बन्धु!

9.9.17

परहित सरिस धर्म नहीं भाई..

धर्म और अधर्म का अर्थ समझाते हुए तुलसी दास जी लिखते हैं...

परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।

परोपकार के बड़ा कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है।

वे यहीं नहीं रुकते। आगे जटायू सन्दर्भ में लिखते हैं..

परहित बस जिनके मन माहीं।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।

दूसरों के हित के लिए जो अपने प्राण भी निछावर कर देते हैं उनके लिए संसार में कुछ भी प्राप्य शेष नहीं रह जाता। और स्पष्ट करते हुए लिखते हैं...

संत विटप सरिता, गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।।
सन्त, वृक्ष, नदियाँ, पर्वत सभी का काम दूसरों पर परोपकार करना है। कोई अपने लिए नहीं जीता।

इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि प्रकृति का स्वभाव ही दूसरों का उपकार करना है। सूर्य, चन्द्र और धरती के समस्त पेड़-पौधे सभी दूसरों की भलाई के लिए बने हैं। स्वार्थ की भावना प्राणियों में ही दिखती है।

मैथिलीशरण गुप्त’ जी ने ठीक ही लिखा है...

“यह पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे ।
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ।”

रहीम दास जी ने लिखा...

'वो रहीम सुख होत है, उपकारी के संग
बांटने वारे को लगे, ज्यों मेहंदी के रंग।'

वृक्ष कबहूँ नहीं फल भखैं, नदी न संचै नीर
परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर !

वृक्ष कभी अपने फल नहीं खाते, नदी जल को कभी अपने लिए संचित नहीं करती, उसी प्रकार सज्जन परोपकार के लिए देह धारण करते हैं !

कबीर दास जी ने लिखा..

स्वारथ सूखा लाकड़ा, छांह बिहूना सूल।
पीपल परमारथ भजो सुख सागर का मूल।।

स्वार्थ सूखी लकड़ी की तरह छाॅंह नहीं देती और राहगीर के कष्ट का कारण है। परमार्थी पीपल वृक्ष की भाॅंति अपने छाया से राहगीरों को सुख पहुॅंचाता है।

कबीर दास जी आगे लिखते हैं..

परमारथ हरि रुप है, करो सदा मन लाये
पर उपकारी जीव जो, सबसे मिलते धाये।

परमार्थ, दूसरों की सहायता करना ईश्वर का ही स्वरुप है।इसे सदा मनोयोग पूर्वक करना चाहिये। जो दूसरों का उपकार, मदद करता है वह उस प्रभु के समान है जो सबसे दौड़कर गले मिलते है।

सन्तों, कवियों ने परमार्थ को पहचान कर सभी को इस राह चलने की सलाह दी। मनुष्यों के हृदय में उपकार की भावना न हो तो संसार में सभी का जीना कठिन हो जाएगा। स्वार्थ जितना बढ़ेगा, जीवन उतना दुरूह होता जाएगा। यही कारण है कि आज के भौतिक युग में नाना प्रकार की विलासिता की वस्तुओं का उपभोग करने में समर्थ होते हुए भी लोग नाना प्रकार की व्याधियों से जकड़े, परेशान हाल घूमते पाये जाते हैं। निजी स्वार्थ में अंधे हो धन संग्रह करके तमाम सुख देने वाले साधनों को प्राप्त करने के बावजूद भी और..और की कामना में डूबे रहते हैं। 

ताल, तलैया पी कर जागा
नदी मिली, सागर भी मांगा
इतनी प्यास कहाँ से पाई
हिम से क्यों मरुथल तक भागा?
क्यों खुद को ही रोज छले रे!
तू है कौन? कौन हैं तेरे?

स्वार्थी मनुष्यों की भूख और प्यास तब तक समाप्त नहीं होती जब तक उनके भीतर दूसरों के उपकार की भावना नहीं जगती। परमारथ का भाव मन में न हो तो दूसरों का जीवन तो नर्क बनता ही है, स्वयं स्वार्थी को भी शांति नहीं मिलती। स्वार्थियों की इसी बेचैनी का फायदा ढोंगी बाबा उठाते हैं और भांति-भांति की भ्रांतियाँ फैलाकर लोगों को लूटने और अपना साम्राज्य खड़ा कर सुख भोगने में लगे रहते हैं। 
सुख उनको भी नहीं मिलता। जब पाप का घड़ा भर जाता है तो सब झूठ सामने आ जाता है। फर्जी बाबाओं का साम्राज्य ढहते और उन्हें जेल की हवा खाते देखने के बाद भी जिनकी आँखें नहीं खुलतीं उनका तो ईश्वर ही मालिक है

20.11.16

लोहे का घर-22 (नोट बंदी)

नोट बंदी के फैसले के बाद लोहे के घर में बदहवास 500 के पुराने नोट लिये यात्री अब नहीं दिखते। 8 तारीख के बाद तो यह स्थिति थी कि लालच देकर यात्री भिखारी/वेंडरों से छुट्टा मांग रहे थे। एक भिखारी ने तो झटक ही दिया था-हमको बेवकूफ समझे हो क्या?
अब लोग सिर्फ तारीफ करते हुए ही मिलते हैं। बस जरा सा छेड़ दो। बस इतना कहो कि मोदी ने सब सत्यानाश कर दिया। फिर देखो! कैसे लोग आपको समझना शुरू करते हैं। केजरीवाल की तरह कह कर देखो-बहुत बड़ा घोटाला है! सब आप पर टूट पड़ेंगे। कम नोट मिलने से लोग परेशान हैं लेकिन फिर भी गजब का संतोष और खुशी झलकती है चेहरे से। स्लीपर बोगी में चढ़ने वाले ये वो लोग हैं जिन्होंने परेशानी के सिवा कुछ नहीं पाया लेकिन खुश हैं कि जिन्होंने गलत ढंग से बोरियाँ भरी हैं वे मारे गये।
प्रधान मंत्री जी ने बहुत बड़ा ख़्वाब दिखया है लेकिन लोगों को भयंकर कष्ट का भी सामना करना पड़ रहा है। राजनैतिक दलों द्वारा सहयोग के स्थान पर अपनी पूरी ताकत विरोध में झोंक दी है। कुछ चैनल नकारात्मक खबरें अधिक परोस रहे हैं। सबकी मंशा यही लगती है कि आम आदमी तकलीफों से झुंझलाकर बगावत कर दे। समर्थन के स्थान पर विरोध करना शुरू कर दे। फैसला वापस लेना पड़े। दूसरी तरफ फैसला वापस लेने का मतलब मोदी जी का राजनैतिक सन्यास। फैसला वापस लेने का मतलब है लोगों के ख्वाबो का टूटना। जब ख़्वाब टूटते हैं तो दिल भी टूटते हैं। टूटे आदमियों की आँखों में नये ख़्वाब नहीं तैरते। कुल मिलाकर भारत एक कुरुखेत्र के मैदान में खड़ा है। जारी है संघर्ष। देखें..आम आदमी बच पाता है या ...मोदी जी के साथ आम आदमी भी टूट जाता है। अभी तो दांव पर आम आदमी ही लगा है। एक लाइन याद आ रही है...
जितने ऊँचे ख़्वाब दिखाओगे राजा, उतनी गहरी चोट लगेगी सीने में।
हमारी इच्छा है कि सत्ता हारे या विपक्ष आम आदमी टूटने न पाये। आखिर सभी आम आदमी के लिए ही तो परेशान हैं।
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भंडारी स्टेटशन पर #एटीएम आज भी चालू था। मात्र 10-12 लोग खड़े थे। अपनी #ट्रेन एक घण्टे लेट थी। समय ही समय था। मैंने सोचा आराम से 2000/- निकाल सकता हूँ। तभी याद आया...मैंने कल ही #जीन्यूज की रिपोर्टिंग देखी थी जिसमें एक गरीब चौकीदार गुल्लक फोड़कर निकाले 3000/-में से फुटकर 1500/-रुपये जिसमें 100,50,20,10 के नोट थे बैंक में जा कर इसलिए जमा कर देता है कि दुसरे जरूरत मंदों को मिल जाय।
मेरे मन में भी ख्याल आया... मुझे पैसे की अभी कोई ख़ास आवश्यकता तो है नहीं, क्यों निकाला जाए? मैंने लाइन लगाने का विचार त्याग दिया। दस रुपये का चीनीयाँ बादाम खरीदा और फोड़-फोड़ कर खाते हुये लोगों को पैसा निकालते और खुश होकर लौटते देखने लगा।
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मुझे नहीं लगता कि जितने पुराने नोट थे उतने ही नये नोट न छपे होने से भयभीत होने की जरूरत है। सभी नोट एक साथ प्रचलन में नहीं होते। प्रचलन में जितनी आवश्यकता होती है उतने छप चुके हैं। नोट कम देने का उद्देश्य भी यही लगता है कि लोग आवश्यकता के अनुरूप निकालें और बिना भय के खर्च करें। पूरे नोट छप जाते, ए टी एम सभी दुरुस्त हो जाते तब नोट बदलने की सोचते तो तब तक गोपनीयता भी नहीं रहती। 2000 के नोट छप रहे हैं यह जानकारी तो अखबार को हो ही गई थी। पुराने नोट बेकार हो जाएंगे यह भी जान जाते तो नोट बदलने का उद्देश्य कभी सफल न होता। मुझे तो जो प्रक्रिया सरकार ने अपनाई है वही बेस्ट विकल्प लगता है।
जनता को तकलीफ तो होनी ही थी। तकलीफ कम होती अगर सभी एक स्वर से साथ देते और इस पर राजनीति न होती। जितना विपक्ष राजनीति करता रहा, उतना ही मोदी जी आक्रामक होते गये। यह उनका अंदाज है जिसे आप जो नाम दें लेकिन शतरंज का खिलाड़ी होने के नाते मैं जानता हूँ कि अटैक इज द बेस्ट डिफेन्स।
एक चूक मुझे जो लगती है वह है समय का चुनाव। समय चुनते वक्त चार राज्यों में होने वाले चुनाव का नहीं, शादियों के मौसम और बोआई का ध्यान रखा जाना चाहिये था। एक महीने बाद या दो महीने पहले का समय अधिक उपयुक्त होता। विपक्ष को सरकार से यह प्रश्न पूछना चाहिए न कि विरोध के लिए विरोध करना चाहिए।
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#ट्रेन में फिर नोट बंदी की चर्चा। सुनते-सुनते कान पक गये। लोग बता रहे हैं किस नेता को नींद नहीं नहीं आ रही। किसने किस विभाग में कितना दबाव बनाया नोट बदलने के लिये। कौन नेता जोकरी कर रहा है, कौन हुकुर-हुकुर रो रहा है। लोग यह भी बता रहे हैं अब बैंक, एटीएम की लाइन बहुत कम रह गई। बहुत उत्साह है लोगों में। तरह-तरह के लोग तरह की बातें। इनको सुन कर किसी का नाम नहीं लिया जा सकता। कोई प्रमाण नहीं अपने पास। आम आदमी कह रहे है नेता रो रहे, उधर संसद में नेता कह रहे आम आदमी मर रहा। ये लोग पक्का झूठ बोल रहे होंगे। सही तो संसद में नेता लोग बोल रहे होंगे। बहुत कन्फ्यूजन है। सब #भक्त लग रहे हैं! लगता है ट्रेन से उतर कर दिया लेकर ढूंढना पड़ेगा विरोधियों को। जनता का दर्द जानने के लिए #ndtv देखना पड़ेगा या केजरी वाल जी का भाषण सुनना पड़ेगा। सबसे बड़ा, हिटलर और आतंकवादी जानने के लिये कांग्रेस के नेताओं को सुनना पड़ेगा। ये #लोहेकेघर के यात्री तो सभी #मोदी भक्त लगते हैं।

6.11.16

भक्त और टी.वी. के समाचार चैनल

टी. वी. के समाचार चैनलों से एक निर्धारित समय में सत्य का ज्ञान क्या, देश-विदेश के सभी प्रमुख समाचारों का ज्ञान भी नहीं होता। भले ही ये चैनल निष्पक्ष होने का कितना ही दावा करें लेकिन चैनल खुलने से पहले ही हमारे दिमाग में उसके पक्ष का भान रहता है। हमें पता रहता है कि यह दक्षिण पंथी है या वाम पंथी। यह सरकार के कार्यों का गुनगान करने वाला है या हर बात का मजाक उड़ाने वाला है।
इन चैनलों के एंकर भी वाकपटु और गज़ब के अभिनेता होते हैं! ये अपने पक्ष के कुशल वैचारिक वकील होते हैं। किसी एक एंकर को आपने अलग-अलग विचारधारा वाली दोनो पार्टियों के समर्थन में खड़े नहीं देखा होगा। जबकी ऐसा संभव है कि किसी मुद्दे पर किसी पार्टी का नजरिया सही और किसी दूसरे मुद्दे पर विरोधी पार्टी का नजरिया सही रहता हो। ऐसा इसलिए होता है कि ये एंकर किसी एक पक्ष के #भक्त होते हैं। और भक्तों से निष्पक्ष होने और सत्य सुनने की उम्मीद पालना ही व्यर्थ है।
सोसल मीडिया भी इसके प्रभाव से वंचित नहीं। कोई क्रांतिवीर की जय जयकार करता है तो कोई विदूषक की विद्रूपता पर लहालोट होता है। पत्रकारिता स्वतंत्र तो है मगर निष्पक्ष प्रतीत नहीं होती। ऐसे में आम आदमी का बुरी तरह कनफ्युजिया जाना और सोचते-सोचते नरभसिया जाना संभव है।
ऐसे माहौल में कितने ही आत्मचिंतकों ने टीवी में समाचार देखना ही बंद कर दिया है! ऐसा नहीं कि वे समाचार देखना नहीं चाहते। समस्या यह है कि उनके पास उपदेश सुनने का वक्त नहीं है। अखबार भी अछूते नहीं हैं लेकिन इसमें समाचार अलग और विचारकों के विचार अलग पृष्ठ पर होते हैं। हम समाचार पढ़ कर आलेख वाले पृष्ठ पलट सकते हैं। टी.वी. के समाचार चैनल बदलो तो जहाँ जाओ वहीं खुराफात!
आप विचारों से भागना नहीं चाहते और टी.वी. देखना भी है तो ऐसे माहौल में दो विकल्प नजर आता है। पहला यह कि आप किसी से मत कहिए मगर खुद से मान लीजिए कि आप फलाने के भक्त हैं। अब अपने पक्ष वाला चैनल देखना बंद कीजिए और विपरीत विचारधारा वाले चैनल देखिए। शुरू में तो तनाव बढ़ेगा लेकिन संभव है, धीरे-धीरे तटस्थ होकर सोचना शुरु कर दें।
यदि आप भक्त नहीं हैं, दोनो प्रकार की विचारधारा को पढ़, सुन सकते हैं तो अभी आप में सत्य जान पाने की संभावना बची है। भीड़ से सटकर खड़े होने और पीछे-पीछे भागने से अच्छा भीड़ से हटकर यह जानना है कि यह भीड़ जा कहाँ रही है? क्या यही अपनी मंजिल है? क्या यह राष्ट्र हित में है? वैसे भक्त बन भीड़ में गुम हो जाना और पीछे-पीछे जयघोष करते हुए चलना सुकून भरा निर्णय है और भीड़ से हटकर खड़े होना, बेचैनी पैदा करने वाला।

जहाँ तक सरकार द्वारा किसी चैनल पर एक दिन का सांकेतिक प्रतिबंध लगाने का प्रश्न है तो मैं इसे कमजोरी भरा निर्णय मानता हूँ. विचारों पर प्रतिबन्ध लगना लोकतंत्र की आत्मा को नष्ट करना है. चैनल बंद करना तो जनता के बांये हाथ का खेल है! यदि राष्ट्र हित में जरूरी है, चैनल द्वारा राष्ट्र विरोधी हरकत की जा रही है तो जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार को दूसरे और कठोर निर्णय लेने चाहिये.

16.10.16

सुबह की बातें-2


यह धमेख स्तूप है. आज सुबह उसी के सामने लगभग २०० मीटर की दूरी पर बैठा था बेंच्च पर. सोचा एक तस्वीर खींच लूँ. खुद ही खुद की. मैंने इस खुदी को नाम दिया 'खुद्दम' अंग्रेजी वाले इसे कहते हैं ..selfie . मैं और मेरा साया, कोई दूसरा आदमी नहीं था बेंच पर. और दूसरे बहुत से साथी थे. नीम के कई घने पेंड़, इसमें दौड़ते गिल्लू, शाख पर बैठे तोते, घांस पर फुदकती मैना, पीछे डीयर पार्क में हिरण, कौए, कबूतर, मोर और भी दूसरे पंछी. साया भी तब नजर आने लगा जब सूर्यदेव निकले. उजाला न हो तो साया भी साथ नहीं होता. दौड़ने और टहलने के बाद यहाँ बैठकर आदमी और आदमी की बातों से दूर पंछियों की बातें सुनना, मृगों के साथ कौओं की शरारत देखना अच्छा लगता है.

आज जब मैं आया तो सबसे पहले मोर अपने पंख फैलाकर उड़ भागा फिर गिलहरियाँ नीम की शाख पर छिपकली की तरह सर-सर दौड़तीं पत्तों में छुप कर मुझे देखने लगीं, काले कौए ने कांव-कांव करी और तोते फुर्र से उड़ गए! आदमी कितना हेय प्राणी होता है!!! जिसे देखते ही सब भाग खड़े होते हैं. मुझे लगता है कि सब मुझे पहचानने लगे हैं. कभी निडर हो कुछ पास भी आ जाते हैं लेकिन फिर भी उनका विश्वास अर्जित नहीं कर पाया. मानव तन में तो यह आजीवन संभव नहीं लगता. बड़े भाग मानुष तन पायो! उंह! क्या भाग्य जब ये अराजनीतिक प्राणी मुझ पर विश्वास ही नहीं करते?
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धूप निकल आई है। छाँव है घने नीम के नीचे। चहुँ ओर आनंद की वर्षा का आलम है। एक तोता नीम की शाख से हवा में तैरता हुआ अनार के पौधों के बीच-बीच से निकलता हुआ फिर नीम में गुम हो गया। जाते-जाते उसने खण्डहर पर बैठी कौवी को आँख मारी या टाँय से छेड़ दिया कि साथी कौआ देर तक उसी दिसा में मुँह कर काँव-काँव करता रहा। कौए के चोंच इतनी चौडा़ई में खुलते, बंद होते कि लगा खा ही जायेगा तोते को। तोते की तरफ से फिर टाँय-टाँय की आवाज आई और कौआ पंख फैलाकर उड़ता हुआ घुस गया उसी नीम के पेंड़ पर। इधर कौवीउड़ी और हिरण के गरदन के ऊपर बैठ उसके कान में कुछ कहने लगी। हिरण ने हौले-हौले मुंडी हिलाई। कौवी संतुष्ट हो कौए की तलाश में उधर ही उड़ चली।

मार्निंग वाक करने वाले जा चुके। लाउड स्पीकर से समझ में न आने वाली भाषा में बुद्ध की स्तुती सुनाई पड़ रही है। मैं मौन रह कर बुद्ध के संदेश याद करने का प्रयास कर रहा हूँ। यहाँ, धमेख स्तूप और बुद्ध मंदिर के आस-पास सुख ही सुख है, कहीं कोई दुखी नहीं। संसार में फैला दुख मनुष्य के कर्मों का फल है। जैसे बुद्ध को सत्य का ग्यान हुआ और उन्होने संसार में आनंद की वर्षा की वैसे ही मूढ़, अभिमानी मनुष्यों के कर्मो से दुसरे निर्दोष प्राणी भी दुखी होते हैं।
कुछ पर्यटकों का झुण्ड है पार्क में। कुछ जोड़े फोटू-सोटू खिंचा रहे हैं प्रेम से। कुछ लड़के बढ़िया कैमरा ले कर फोटोग्राफी कर रहे हैं। एक लड़का दौड़ता हुआ आया और बोला-अंकल-अंकल आपकी बहुत सुंदर तस्वीर खींची है हमने। हमने उनको धन्यवाद के साथ अपना फोन नम्बर दिया। फोटो आया तो बताऊँगा उन्हें कि मैं बेचैन आत्मा हूँ। अभी नहीं बताया नहीं तो समझते अंकल बेवकूफ बना रहे हैं।

15.4.16

आस्था, ईश्वर और प्यार

बात आस्था की, विश्वास की, प्रेम की थी पत्थर को भी हमने भगवान बना दिया. बात नफ़रत की, अविश्वास की, छल की थी भगवान को भी तुमने पत्थर समझ लिया. तुम कहते हो जो मंदिर में खुद से एक दिया नहीं जला सकता वो तुम्हारे जीवन में क्या रौशनी करेगा? हम कहते हैं उसने हमें हाथ-पांव-दिमाग इसीलिये दिया कि हम संसार का अँधेरा मिटा सकें. मंदिर में दिया जला कर हम अपने मन का अँधेरा भगाते हैं और तुम समझते हो कि हम भगवान के घर को रोशनी से भर रहे हैं! हमारी इतनी क्षमता नहीं है मित्र कि हम ईश्वर को रोशनी दिखा सकें.
भगवान के पास इतनी फुर्सत नहीं कि वो सभी प्राणी के दुःख दर्द सुनता फिरे. उसने एक संसार बना दिया अब कैसे जीना है यह तुमको तय करना है. सही कहते हैं बच्चन जी.. अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ..राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला. मंदिर नहीं जाना चाहते तो मस्जिद में जाओ, गिरजाघर जाओ, गुरूद्वारे जाओ ..कहीं नहीं जाना चाहते कहीं मत जाओ..जिस रस्ते चलना चाहते हो उसी रस्ते चलो, दूसरों के रस्ते को गलत, अपने को सही समझते हो, समझो मगर किसी का उपहास मत उड़ाओ. अपने विशवास पर अडिग रहो. सुख से रहो. जीयो और जीने दो. इश्वर ने जो ब्रह्माण्ड रचा है न मित्र! उसे देखने, समझने और प्यारी प्रकृति से प्यार करने के लिए यह उम्र बहुत कम है. इसे यूँ बरबाद मत करो.
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प्यार तो जइसे धरती से गायब ही हो गया है। है तो बस अहंकार, अहंकार और अहंकार। जिसके पास जो चीज ज्यादा है उसी का अहंकार है। हसीनो को अपनी ख़ूबसूरती का, बॉडी बिल्डरों को अपने शरीर का, रईशों को अपने पैसे का अंहकार तो समझ में आता है। उनके व्यवहार से मन दुखी हो तो आप यह कह कर सन्तोष कर सकते हैं कि हे! भगवान। इन्हें बुद्धि देना। ये जानते नहीं, क्या कर रहे हैं। मगर बुद्धिजीवियों का अंहकार! इनके पास तो पहले से बुद्धि ज्यादा है! अब आप क्या करेंगे? इनके अहंकार से पीड़ित हुये तो कहीं शरण शेष है?
दायें चलने वाला बायें चलने वाले को मूरख और न जाने क्या-क्या कहता है! बायें चलने वाला दायें चलने वाले को मूरख और न जाने क्या-क्या कहता है! दोनों का सामना हो गया तो समझो बवाल हो गया। कितना अंहकार! कैसी बुद्धि? किस काम की बुद्धि? दुश्मन देश में किसी मनुष्य पर अत्याचार हो तो इनके आँखों से आँसू बहने लगते हैं, आतंकवादी को फाँसी पर चढ़ाया जाय तो मानवता के नाम पर दुखी हो जाते हैं, राष्ट्र विरोधियों को भी कष्ट हो तो इनसे सहन नहीं होता मगर अपने ही देश के सैनिकों के प्रति कोई हमदर्दी नहीं! इनके बुद्धि का पलड़ा राष्ट्र के पलड़े पर हमेशा भारी पड़ता है।
पिजड़े में कैद तोते की तरह आजादी-आजादी रटते हैं मगर पिंजड़े का दरवाजा खोल दो तो उड़ना ही नहीं जानते! कहाँ जाना है यही नहीं पता। फिर दुबक कर उसी पिंजड़े में घुस जाते हैं...आजादी-आजादी!
ओs रेs कुम्हार! 
थोड़ा 
प्यार भी तो भर 
अपने घड़े में

काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार भर दिया 
आंसूओं से तूने
पूरा घड़ा भर दिया
थोड़ी 
खुशी भी तो भर
अपने घड़े में ।

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वो कुछ नहीं करता। उसने तुम्हें बनाया, जीने योग्य सामग्री पैदा करी, जी सकने के लिए पर्याप्त बुद्धि दी और भूल गया। यह संसार जैसा है वह सब तुम्हारा किया धरा है। अपनी मूर्खता और वहशीपने के परिणाम को ईश्वर पर थोपना बन्द करो।

4.11.15

आक्रोश और बुद्धिजीवी

सभी के भीतर आक्रोश है। यह मनुष्य होने की निशानी है। आक्रोश की अभिव्यक्ति सभी अपनी-अपनी क्षमता, अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार करते हैं। कर्मचारी अपने बॉस के सामने पूंछ हिलाता है मगर जब साथियों के साथ जब चाय पी रहा होता है तो हर चुश्कि के साथ अपने बॉस के खिलाफ ज़हर उगलता रहता है। यहाँ उसकी सिर्फ जीभ हिलती है,पूँछ गायब हो जाती है। अधिकारी शासन में बैठे उच्चाधिकारियों को कोसता है तो उच्चाधिकारी भी मंत्रियों के फरमान से परेशान हो मातहतों पर आक्रोश स्थानांतरित कर रहे होते हैं। छात्र शिक्षकों का उल्टा-पुल्टा नाम धर, आपस में हंसी उड़ा कर अपना गुस्सा उतारते हैं तो शिक्षक व्यवस्था को कोसकर । कोई खुश नहीं, सभी आक्रोशित,सभी दुखी। घर में पत्नी पति से, पति पत्नी से, बच्चे पिता से तो पिता बच्चों से नाराज। परिवार नियोजन ने भाइयों-भौजाइयों, ननद-देवरानियो वाले आक्रोशित चेहरे छीन लिए हैं वरना घर की दहलीज में घुसते ही दादा-दादी की आँखों में रिश्तों की अनेकों दीवारें पहले ही दिखने लगती हैं ।

बुद्धिजीवी सदियों से आक्रोश अभिव्यक्त करते रहे हैं। इनके आक्रोश से सरकारें डरती रही हैं। जब भी अधिक खतरा हुआ इस पर सेंसर की कैंची चली है। आपातकाल लगा कर भी अभिवयक्ति को प्रतिबंधित किया गया है। आजकल वरिष्ठ, पुरस्कृत और सम्मानित साहित्यकार आक्रोश अभिव्यक्त कर रहे हैं। उनकी अभिव्यक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं है। वे चाहें तो कलम के वार से सरकार को घायल कर सकते हैं मगर उन्होने दूसरा रास्ता चुना है। वे अपना सम्मान लौटा रहे हैं! जैसे अंग्रेजी सरकार के जमाने में पुरस्कार लौटाए जा रहे थे वैसे ही आजकल पुरस्कार लौटाए जा रहे हैं!  एक ने लौटाया तो दूसरे को लगा कि हम पीछे रह गए! होड़ सी मची है।  अब पाठक परेशान! क्या करें? कोई पुरस्कार लौटाने वालों का समर्थन कर के उनको सम्मानित कर रहे हैं तो कोई सम्मानित लेखकों की पुरस्कृत पुस्तकें लौटाने में जुटे हैं! शायद उन्हें यह लग रहा है कि जैसे साहित्यकारों के सम्मान लौटाने से सरकार का अपमान हो रहा है वैसे ही पुस्तकें लौटाने से साहित्यकार का अपमान होगा! मतलब पढ़ने लिखने वाले लोगों का आत्मविश्वास डिगा सा दिखता है। उन्हें अपनी बुद्धि और कलम से इतर यह रोल जियादा प्रभावशाली लग रहा है! 

लेखकों के देखा देखी दूसरे सम्मानित कलाकार भी पुरस्कार वापस कर रहे हैं! इस वापसी अभियान को देख कभी-कभी लगता है एक ही विचार धारा के लोग देश में अधिक पुरस्कृत हुए हैं! योग्यता का चयन ज्ञान को देखकर नहीं, विचारधारा को देख कर किया गया था। शायद अब देश में दूसरी विचार धारा बह रही है जो इनका पहले की तरह सम्मान नहीं कर रही है। 

इस वापसी अभियान से परेशान सरकार परेशान न होने का दिखावा कर रही है। वह इसे विपक्ष का षड़यंत्र बताती है। वह पूछती है तब ये लोग कहाँ थे जब यह हुआ था, जब यह हुआ था और जब यह हुआ था? इन सब के बीच यदि कोई वास्तव में हैरान परेशान है तो पढ़ा-लिखा आम आदमी। वह यह नहीं समझ पा रहा है कि साहित्यकार राजनीति के शिकार हो गए हैं या साहित्य छोड़ राजनीति कर रह हैं ! रोटी, कपड़ा, मकान, बच्चों की शिक्षा, दवाई, शादी, सड़क, न्याय जैसी तमाम बुनियादी आवश्यकताओं के बीच बुद्धिजीवियों का यह आक्रोश आम आदमी के लिए समझना तो दूर पढ़ना भी मुश्किल है। फिर प्रश्न उठता है कि इस आक्रोश से फायदा किसे और नुकसान किसे उठाना पड़ रहा है? कहीं इस झगड़े से हमने देश को विदेशी बुद्धिजीवियों के सामने हास्यास्पद स्थिति में लाकर तो खड़ा नहीं कर दिया!  

2.10.15

देश ठीके चल रहल हौ बापू!

जौन हो रहल हौ तउन ठीक हो रहल हौ बापू, देश ठीके चल रहल हौ बापू। आपके लोग आजो याद करत हउअन। आजो लोग कहलन - सच बोलना अच्छी बात है। गोली आजो चलत हौ। हत्या, डकैती, बलात्कार सब चौचक हो रहल हौ मगर केहू एकर प्रशंसा नाहीं करत। अपराध करे वालन के अपराधी, आजो कहल जाला। फंसले पे जेल हो जाला। नेता लोग देश के चक्कर में आजो जेल जा रहल हउलन। पहिले आजाद कराये के आरोप में जात रहलन, अब  लूटे के आरोप में जा रहल हउअन।  

सब ठीके चलत हौ बापू। दूसरे के भ्रष्ट आचरण क निंदा आजो जोर शोर से होला। दंगा होला मगर जब थम जाला त लोग कहलन कि इंसानियत क जीत भयल!

मीडिया बहुत तेज हो गयल हौ बापू! एक घंटा में केतना बलात्कार भयल बता देला। हिंसक अउर खतरनाक टाइप क बलात्कार होला त देश में खूब विरोध होला। सरकार भी कुछ दिना बदे घबड़ा जाला कि ई का भयल! फिर मीडिया कौनो दूसर 'एक औरत कई पति' जइसन चटपटा समाचार सुनाये लगsला त सबकर ध्यान ओहर बट जाला। मीडिया एक गम देला त दूसर भुला देला। सब ठीके चलत हौ बापू।

मजदूर, किसान क आज भी बड़ा सम्मान हौ। बुद्धिजीवी श्रमजीवी के बिना कइसे जीये! मुंशी प्रेमचंद क बैलगाड़ी क ज़माना गयल मगर किसान आजो आत्महत्या करत हउअन। न इनके सम्मान में कमी आयल हौ न भुखमरी में। मजदूर के दाल पियाज भले न मिले रोटी आराम से मिल जात हौ। कौनो जुगाड़ बना के खाइये लेत हौ। देश क मजदूर ताकतवर हौ बापू! तबे न एतना काम हो रहल हौ! सब ठीक चलत हौ। ए साल पानी कम परल, कुछ किसान चिल्लात हउअन-'सूखा-सूखा' बाकि सब ठीक हौ बापू।

देश क लोग चाहे जइसन हो गयल होंय लेकिन देश में लोकतंत्र बहुत मजबूत हौ। बहुमत क सरकार बन जाला। हर पांच साल में चमत्कार हो जाला।  हारे वाला बेईमान,  जीते वाला ईमानदार हो जाला। सब ठीक चलत हौ बापू। जब ले नोट में तोहार फ़ोटू अउर दू अक्टूबर क छुट्टी मिलत रही लोग आपके याद करत रहियें। आज तोहांर अउर स्व0 लाल बहादुर शास्त्री जी क जन्म दिन भिनसहरे से मनावत हई बापू। हमार चरण-स्पर्श अउर माल्यार्पण स्वीकार करा, देश ठीके चल रहल हौ।

11.7.15

अनोखा देश


अभी थोड़ी देर के लिये झपकी लग गई थी। इतने में एक निराले देश में घूम आया। वहाँ की जनता यह जानकर हैरान रह गई कि हमारे देश मे बच्चों को पढ़ाने, परिवार के सदस्यों का इलाज कराने, शादी कराने और घर बनाने में अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं! मुझे यह जानकर हैरानी हुई क़ि वहाँ ये सभी खर्च वहां की सरकार करती है!

उस देश में सारे खर्च बैंक के माध्यम से ही किये जा सकते थे। नकदी किसे कहते हैं, वहाँ के लोग जानते ही नहीं थे। बैंक में जमा धन की भी एक निर्धारित सीमा थी। इससे अधिक धन जमा होते ही आयकर के रूप में पैसा सरकारी खजाने में अपने आप ट्रांसफर हो जाता था। वे उतने सम्मानित नागरिक कहलाते थे जितने अधिक धन सरकारी खजाने में जमा होते थे। मैंने सोचा जब अधिक आय सरकारी खजाने में ही जमा होनी है तो यहाँ के लोग अकर्मण्य होंगे लेकिन सब के सब बड़े मेहनती! होड़ लगी थी लोगों में अधिक से अधिक पैसा सरकारी खजाने में जमा कराने की!!!

दरअसल यहाँ की व्यवस्था ही ऐसी थी। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ भले एक जैसी थी मगर आदमी की प्रतिष्ठा, घर का आकार सब उसके द्वारा अर्जित ग्रेड पर निर्धारित थी। ए + वाले का बंगला, किसी राजा के महल जैसा। कार, नौकर-चाकर सब सरकारी। सामान्य मजदूरों के डी श्रेणी के घर भी अपने घर से अच्छे दिखे! मैंने सोचा तब तो यहाँ कोई आंदोलन होता ही नहीं होगा! लेकिन मैं फिर गलत था।चौराहे पर भीड़ जमा थी। लोग हवा में हाथ लहरा रहे थे।  नारे लगा रहे थे-कपड़ा पहनना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है! नारे सुनकर मेरी तो नींद ही उड़ गई। आदमी कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। 

अनोखे देश की हर बात निराली थी। मैंने एक जोड़े से पूछा तुम लोग सरे राह प्रेम प्रदर्शन करते हो, शर्म नहीं आती! सरकार कपड़े नहीं देती तो क्या नंगे-पुंगे घूमोगे? वे हंसकर कहने लगे-हम तो पूजा कर रहे थे! मैंने घृणा से कहा-छी:! यह भी कोई पूजा है? वे हँसने लगे। हाँ, भाई हाँ। हमारे देश का नाम 'प्रेम नगर', हमारे भगवान का नाम 'प्रेम' और दूसरे से प्रेम करना हमारी पूजा! उसने मुझे प्यार से देखा और मुस्कुरा कर कहा-आओ! तुम्हें पूजा करना सिखायें। मैं भाग खड़ा हुआ। मेरी नींद फिर उड़ गई।

अनोखे देश की हर बात निराली। जब मैंने जाना कि प्रेम नगर के देवता भी प्रेम, धर्म भी प्रेम और पूजा भी आपस में प्यार करना है तो मुझे वहाँ कि सामाजिक सरचना के बारे में  जानने की इच्छा हुई कि वहाँ कितनी जातियाँ, उप जातियाँ रहती हैं? मैंने एक लड़के से उसका नाम पूछा तो उसका नाम सुनकर झटका सा लगा! प्रेमानन्द, 6 फ़रवरी 1995!!! मैंने हंसकर कहा-मैंने तुम्हारी जन्म तिथि थोड़ी न पूछी है। किस जाति के हो? जाति! सुनकर वह हंसने लगा। यहाँ जाति-वाति नहीं होती। यहाँ लोगों के नाम के आगे बस जन्म तिथि लिखी जाती है। यही कारण है कि एक जैसे नाम वाले बहुत से लोग मिल जाते हैं। 

सुनकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। वाह! क्या बात है!!! न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।

7.6.14

स्नातक, च्यूतिया

अपने आपको पढ़ा-लिखा लगाने वाले एक युवक से पानवाला पूछता है-'गुरूss, ई स्नातक क मतलब का होला? उत्तर मिला-'बी.ए. यानी बैचलर ऑफ आर्ट्स यानी ग्रैजूएट।' पानवाला कहता है-'हमके ज्ञान क चोन्हा मत देखावs। हम शब्द पुछली त ओकर अर्थ बतावs। तू त भावार्थ आउर अुनुवाद बूकै लगला।' लोग परीक्षा पास कर लेहलन लेकिन अर्थ जनबैै नाहीं करतन। हमहूं का जानित एक दिन एही दुकान पर दू जने कविता बतियावत रहलन। हमहूँ के ओम्मे मजा आवे लगल त सुन लेहली। कहा त बताई?

युवक की जिज्ञासा पर पानवाला बताने लगा- 'बात ई भइल कि सामने से पाउडर लिपिस्टिक लगउले दुइठे जवान मेहरारू चलल आवत रहलिन। ऊ लोगन क लीपल पोतल चेहरा क चमक देख के एक जने कहलन-'गुरू मान ला कि ई दुन्नो कहीं हमहन से छुआ जायँ त ई लोग जौन-जौन समान पोतले हइन ऊ हमहूँ लोगन के लग जाई आउर ई लोगन के कुल चमक बिखर जाई। ई कवन सुन्दरता हौ?  हमहन के घरे एक बार नहा के निकलै लिन त जूड़ा से पानी अइसे अइसन चुवैला जइसे सावन में बरसात भइले के बाद छानी की ओरी से पानी चुवत होय। यही के कहल जाला सद्यः स्नाताSS।

यह बिना ढोंग का ढंग है जिसमें अपनी बात समझाते हुए एक ने दूसरे को बतलाया-'यही स्नाता से स्नातक बनल हौ। ऊँचा स्कूल याने हाई स्कूल ओके कहल गयल हौ जहाँ उँची-उँची बात कहै क शुरूआत होला। एकरे बाद इंटरमीडिएट ओके कहल गयल जहाँ विषय तोहरे बीच आ जाय या तोहई विषय के बीच आ जा। जेके बैचलर कहै ला ओकरे बदे स्नातक शब्द ज्यादा अच्छा बा। विषय के धारा में जे आमूलचूल डुबकी लगा ले, ऊ हौ स्नातक।' 



दूसरे ने विस्मय के साथ कहा- अच्छा ! तो स्नातक का मतलब स्नान से है? 

पहले ने कहा-आउर का? हमहूँ के ओही दिन पता चलल। होला का कि कोई के घरे गइला आउर उहाँ से बिना समझले बुझले आगे बढ़ गइला, त तू का जनबा? शब्द से चलला आउर कूद गइला वाक्य पर, आउर फिर तुरंतै भाषा में दौड़े धूपै लगला। अरे, ठहरला नाहीं, रूकला नाहीं, पुरनकन से पुछला नाहीं कि ई कइसे बनल आउर कउने-कउने अर्थ में एक प्रयोग होला, त तू कइसे जनबा? पहिले क विद्वान जौन इ सब जानें में पूरी जिन्दगी खपा देत रहलन ऊ का च्यूतिया रहलन?

दूसरे ने वर्जना की- यार गाली मत बक्का।

पहले ने स्पष्टीकरण दिया- ई गाली नाहीं हौ। एके झूठै सरीर के अंग से जोड़ के लोग गाली मानें लन। ई संस्कृत शब्द हौ 'च्युत' हो जाना या चूक जाना। जे कभी च्युत नाहीं होत ओके 'अच्युत' कहल जाला। ई परमात्मा क विशेषता हौ। लेकिन आदमी हौ त ऊ कभी कदा चुकबै करी। ओकरे एही सुभाव की तरफ इसारा करे बदे प्रेम से च्यूतिया शब्द क इस्तेमाल होए लगल।'

यह नीर क्षीर विवेक यहाँ के पानवाले का है। जिसे सुनकर का उद्गार है-'राजा, हउआ तू छँटल भयल गहरेबाज। दुनियाँ के पान खियावैला आउर दुकान पै बइठके अकेले रसपान करल करै ला।'

पान वाला कहता है-'नाहीं मालिक सब बिखरल हौ काशी में बस ध्यान देवे क जरूरत हौ।'

युवक भी कम नहीं है। वह टिप्पणी जड़ता है-'तबै राजा बड़े-बड़े से बीड़ा उठवावैला।'

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यह पोस्ट 'सोच विचार' पत्रिका में प्रकाशित श्री राजेश्वर आचार्य के आलेख 'हमारी काशी' का वह अँंश है जो मुझे अधिक अच्छा लगा और जिसे मित्रों को पढ़ाने के मोह मैं नहीं छोड़ पाया।

18.3.14

रंगों का इंद्रधनुष


होली में बाबा देवर लागें। जैसे ही यह वाक्य कान में पड़ा मैं पूरी तरह ज़वान हो गया। जब बाबा देवर हो सकते हैं तो हम क्यों नहीं? हम तो अभी वैसे भी ज़वान हैं। अब समस्या यह थी कि ज़वान तो हो गये मगर ज़वानी दिखाई कहाँ जाय पुरानी बीबी को ज़वानी दिखाने से क्या लाभ ? नई मिले तो कैसे मिले ? पड़ोस में ताका-झांकी ठीक नहीं। समय भी कम था। बहुत समय तो यही समझने में चला गया कि मैं ज़वान हूँ। वैसे भी पाँच दिन की होली एक दिन में सिमट चुकी है। होली के जाते ही जवानी कहीँ चली न जाय। बुढ्ढे हो चले दोस्तों को बताया तो वे मारे खुशी के चहकने लगे। कहने लगे.. हाँ यार! कुछ हमको भी ऐसा ही महसूस हो रहा है। हम भी नई ताकत महसूस कर रहे हैं। सब भोलेनाथ की कृपा है। चलो पहले उनका आशीर्वाद ले लिया जाय। उनको थैंक्यू बोल दिया जाय। 

हम बाबा के दरबार में पहुँचे तो वहाँ भीड़ अधिक नहीं थी लेकिन आरती की तैयारी चल रही थी। शिवलिंग की सफाई हो रही थी। दर्शन हुआ मगर लिंग पकड़ने का क्या, छूने का भी अवसर नहीं मिला। पुजारियों का एकाधिकार था। दोस्त गिड़गिड़ाते रहे मगर उन्होने एक न मानी। उनसे उलझने की हिम्मत नहीं थी। गोरे-गोरे मुष्टंडे। हों भी क्यों न! हम एक बार पर भर के लिए छू कर नई उर्जा का एहसास करते हैं, वे तो हरदम उसी में डूबे रहते हैं। 

वहाँ से निकलकर दालमंडी गये। धर्म से काम की गली। जैसे विश्वनाथ गली धर्म की गली है वैसे दालमंडी कभी वेश्याओं, मुजरेवालियों के लिए जाना जाता था। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष सभी की गलियाँ चौक से होकर निकलती हैं। यह आप पर निर्भर है कि आप किस गली मुड़ना चाहते हैं। हम बाबा की कृपा से जवान हुए थे। सो उनका आशीर्वाद लेकर धर्म गली से काम गली की ओर मुड़ गये। वैसे अब यहाँ न मुजरा होता है न मुजरेवालियाँ मिलती हैं। काम गली, अर्थ गली में परिवर्तित हो चुकी है। बड़ा बाजार लगता है। सभी प्रकार के सामान उचित दाम पर मिल जाते हैं। बनारस में टोपी पहनी और अपनी दूसरे को पहनाई जाती है। हमे होली के लिए नई टोपियों की तलाश थी। 

गली में घुसते ही किशोरावस्था की नादानियाँ कौंध जाती हैं। यार दोस्त होली के दिन रंग खेलते-खेलते इस गली में घुस जाते थे। वे भी नये लौंडों को देखकर मस्त होती थीं। न वे नीचे उतरतीं न हममे सीढ़ियाँ चढ़ने की औकात थी। बस खिड़की से ही गालियों, इशारों का आदान-प्रदान होता था। जब पानी सर से ऊपर हो गुजरने लगता झट से कई खिड़कियाँ एक साथ खुलतीं और हम पर रंगों की बरसात हो जाती। हम और मस्ती में किलकते-उछलते । हम तब हटते जब खिलड़कियाँ पूरी तरह से बंद हो जातीं या फिर हमसे जोशिले ताकतवर लड़कों का बड़ा झुंड हमे वहाँ से भागने के लिए मजबूर कर देता। 

टोपियाँ लेकर गोदोलिया चौराहे से भाँग-ठंडई छानकर, मलाई रोल चाभते जब हम दशाश्वमेध घाट गये तो वहाँ का नजारा बड़ा फीका-फीका नजर आया। हम होरियाये मूड में दशाश्वमेध घाट पहुँचे थे मगर कुछ को छोड़कर बाकी गंगा आरती के बाद वाले सन्नाटे में डूबे हुए थे। दूसरे यात्री गंगा आरती के बाद लौट रहे थे। कुछ विदेशी घाट की सीढ़ियों पर रंग पोताये बैठे, बतियाते दिखे। महिलाएँ भी दिख रही थीं। हम जब छोटे थे, रंगभरी एकादशी से होली के दिन तक महिलाएँ घर से बाहर नहीं निकलती थीं। गली-गली में माहौल इतना गाली-गलौज, होली के हुड़दंग का रहता था कि वे चाहकर भी नहीं निकल पाती थीं। घर के मुखिया भी निकलने की इजाजत नहीं देते थे। अब दृष्य काफी बदल चुका है। महिलाएँ जमकर खरीददारी करती हैं, कहीं-कहीं बाहर निकलकर रंग भी खेलती हैं। 

माहौल देखकर मुझे लगा कि होली को राजनीति की नज़र लग चुकी है। टेढ़ीनीम पर भाजपाई थालियों में गुझिया, मगही पान पर मोदी के छोटे-छोटे चित्र सटाये, दुकान सजाये बैठे थे। अस्सी भी पूरी तरह राजनैतिक माहौल में डूबा हुआ था। पिछले साल की तरह होली के मूड में नहीं था। रास्ते में होलिका सजी थी। बाजार खूब सजे थे। भीड़ थी। मुझे लगा होली को सभी ने अपनी-अपनी मर्जी से बांट लिया है। कुछ बाजार ले गये हैं, कुछ राजनीतिज्ञों को चढ़ा आये हैं, कुछ आभासी दुनियाँ में सिमट गये हैं, कुछ कवि सम्मेलन के नाम पर नौटंकी कर रहे हैं और कुछ हमारे जैसे जबरी जवान बने, किसी अंग्रेज बुढ़िया के बालों जैसी टोपी लगाये गली-गली घूम रहे हैं। सात रंग अलग-अलग दिखें तो समझ में नहीं आते, मिल जायं तो इंद्रधनुष बन जाते हैं। रंगों का इंद्रधनुष मुझे तो नहीं दिखा..आपको दिखा हो तो आपको बहुत बधाई। 


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12.2.14

लोहे के घर से...


रेल की दो पटरियों में ट्रेन नहीं, लोहे के कई घर लिये पूरा शहर दौड़ता है। पूरा शहर लोहे का बना होता है। लोहे के शहर में घर, कंकरीट के शहर में बने घरों की तरह कई प्रकार के होते हैं। एक ही शहर में महल, एक मंजिले, दो मंजिले, बहुमंजिले या कच्चे मकानों की तरह एक ही ट्रेन में ए.सी., स्लीपर और अनारक्षित डिब्बे होते हैं। किसी-किसी शहर में आज भी बाग-बगीचे, खेल के मैदान, सूखे तालाब, बहती नदी दिख जाती है! पटरियों पर भागता शहर अपनी इस कमी को खिड़कियों से बाहर झांककर पूरा कर लेता है। वैसे भी शहरों के बाग-बगीचे सब की नसीब में कहाँ होते हैं? अधिसंख्य देखते हैं मगर अखबार पढ़कर ही जान पाते हैं कि इन बगीचों में सुबह के समय ताजी हवा बहती है! 

जैसे शहर कई प्रकार के होते हैं वैसे ही ट्रेनें भी कई प्रकार की होती हैं। राजधानी, महानगरी, सुपर फॉस्ट, पैंसिंजर..। पैंसिजर ट्रेनें रूक-रूक कर चलती हैं... छुक छुक छुक छुक, छुक छुक छुक छुक.. सुपर फॉस्ट.. धक-धक धक-धक, धक-धक धक-धक । जब कोई मसला फंसता है, पैंसिजर ट्रेन सेंटिंग में डाल दी जाती हैं। एक्सप्रेस ट्रेन चीखती-चिल्लाती धड़ल्ले से गुज़र जाती है। पैसिंजर ट्रेन के यात्री कम दाम के टिकट पर ही इतने प्रसन्न रहते हैं कि घंटो के अनावश्यक ठहराव का गम भी खुशी-खुशी सह लेते हैं। यह सुख गरीबी रेखा से नीचे वाले राशन कार्ड पर मिलने वाले लाभ जैसा है। भले ही रेंग कर चले, सरकार की कृपा से जिंदगी चलती तो है! 

लोहे के सुंदर शहर में.. अच्छे घर में.. मेरा मतलब सुपर फास्ट ट्रेन की आरक्षित बोगी में चल रह रहे लोगों की जिंदगियाँ सिकुड़ी-सिकुड़ी, सहमी-सहमी होती है। अनजान यात्रियों से बातें करना मना होता है। अनारक्षित बोगी के यात्री आपस में खूब बातें करते हैं। ऐसा माहौल हमें अपने शहर में भी देखने को मिल जाता है। गलियों में बसे छोटे-छोटे घरों की खिड़कियाँ आपस में खूब आँख-मिचौली करती हैं। खूब बातें करती हैं। बिजली पानी के लिए आपस में झगड़ती हैं। एक-एक इंच का हिसाब-किताब होता है लेकिन बड़े घरों के दरवाजे पर चौकिदार होता है! दरवाजे पर रुके नहीं कि शेर जैसा कुत्ता झपटता है-भौं! 

एक बड़ा ही रोचक पहलू है। कंकरीट के शहर में तो जिस घर में रहते हैं बस वैसा ही अनुभव होता है लेकिन लोहे के घर में हमें हर प्रकार का अनुभव मिल जाता है। ईंट-पत्थर के घरों में रहने वाले लोग ही, लोहे के घर में रहने के लिए बारी-बारी से आते-जाते रहते हैं। कभी सुपर फॉस्ट ट्रेन में ए.सी. का मजा लेते हैं, कभी अनाऱक्षित बोगी का तो कभी-कभी पैसिंजर ट्रेन की जिंदगी का भी अनुभव लेते हैं। घंटों ठहरे हुए पैसिंजर ट्रेन में बैठकर, धकधका कर गुजरते ‘सुपर फॉस्ट’ को कोसते हैं मगर सुपर फॉस्ट में चढ़ते ही, ए.सी. में बैठते ही, ‘पैंसिजर’ का दर्द भूल जाते हैं। 

ए.सी. में खिड़कियाँ नहीं खुलतीं। ताजी हवा भीतर नहीं आती। न अधिक गर्मी लगती है न अधिक ठंड। धीरे से पर्दा हटाकर आप शीशे के बाहर झांक सकते हैं मगर बाहर वाले नहीं झांक सकते आपके भीतर। हम ऐसा ही जीवन पसंद करते हैं। सबके भीतर झांकने की क्षमता और अपने लिए तगड़ा सुरक्षा कवच! पैसिंजर ट्रेन में जितना आप बाहर देखते हैं, लोग उससे कहीं अधिक आपके भीतर झांक लेते हैं। ए.सी. में नहीं आता लठ्ठा-नमकीन बेचने वाला, मुंगफली या चाय बेचने वाला। यहाँ ऑर्डर लिये जाते हैं, समय पर मिल जाता है स्वादिष्ट भोजन। भोजनालय यहाँ साथ चलता है। पैसिंजर ट्रेन के यात्री कम्बल, गठरी, झोला, लकड़ी, खाने-बनाने का सामान, सब साथ लिये चलते हैं। कभी-कभी तो मोटर साइकिल भी लाद लेते हैं बोगी में! खिड़की के रॉड में सिर्फ एक पैडिल पर टंग जाती है पूरी साइकिल!

कंकरीट के शहर में आप किस घर में रहते हैं यह आपकी आर्थिक क्षमता पर निर्भर करता है। लोहे के शहर में आप किस घर में रहते हैं यह हमेशा आपकी आर्थिक क्षमता पर निर्भर नहीं करता। आप अच्छे, सुरक्षित घर में रहना चाहते हैं, पैसा भी जेब में है मगर आरक्षण नहीं मिलता। मजबूरी में वहाँ रहना पड़ता है जहाँ रहने की आपको आदत नहीं है। किस ट्रेन में सफर करते हैं? यह मंजिल की दूरी पर निर्भर करता है। महलों में रहने वाले जैसे हर किसी से बात नहीं करते वैसे ही रजधानी या सुपर फॉस्ट ट्रेनें हर प्लेटफॉर्म पर नहीं रूकतीं। मंजिल का स्टेशन आपकी आवश्यकता तय करती है। यात्रा तय करता है। सुपर फॉस्ट ट्रेन के यात्रियों को बदकिस्मती से कभी-कभी अपने गाँव भी जाना पड़ता है। पैसिंजर ट्रेनों का सहारा भी लेना पड़ता है। पैंसिजर ट्रेन ही गाँव के स्टेशन पर रूकती है। ऐसे यात्री पूरे सफ़र में नाक-भौं सिकोड़ते रहते हैं। मंजिल से इतर किसी दूसरे स्टेशन पर देर तक रूकना उन्हें गहरा आघात पहुँचाता है। यह वैसा ही है जैसे किसी राजकुमार को अपनी कार दो पल रोककर किसी रिक्शे वाले से मार्ग पूछना पड़े। वे रिक्शेवाले को ‘थैंक्यू’ कहते हैं रिक्शेवाल खुश हो जाता है। राजकुमार दुखी कि आज यह दिन भी देखना पड़ा कि एक मामूली रिक्शेवाले से मंजिल का पता पूछना पड़ा..! 

आनंद आप पर निर्भर करता है। आप मंजिल पर पहुँचकर आनंद लेते हैं या सफर को ही आनंद दायक बनाते हैं। ए.सी. में बैठकर ही आनंद ले पाते हैं या पैसिंजर ट्रेन में भी आनंद ढूँढ लेते हैं ? यदि आपको सफ़र में कष्ट और मंजिल पहुँचकर ही आनंद आता है तो यकीन मानिए कि आपको पता ही नहीं, आनंद किस चिड़िया का नाम है! क्योंकि सफ़र तो अभी भी अधूरा है..! कभी हम लोहे के घर को अपना समझ बैठते हैं, कभी पत्थर के घर को मगर ज्ञानी कहते हैं हमारा जिस्म ही मिट्टी का बना है! हम मिट्टी के घर में रहते हैं!!! 


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2.1.14

टिंबकटूं, शेखचिल्ली और चिलगोजर


तीन मित्र थे- टिंबक टूं, शेखचिल्ली और चिलगोजर। नाम से ऐतराज हो तो आप अपने सुविधानुसार दूसरे नाम भी समझ सकते हैं। मैने ये नाम इसलिए दिये कि मुझे बहुत प्रिय थे और कहीं अपने बचपन में किसी कथा-कहानी को पढ़ते हुए दिमाग में बैठ गये थे। मेरे इन पात्रों में टिंबकटूं सबसे चालाक, शेखचिल्ली सबसे मूर्ख और चिलगोजर सबसे हिम्मती था। मैने इन पात्रों को तब गढ़ा था जब मेरी दोनो बेटियाँ बहुत छोटी थीं। उन्होने बोलना सीख लिया था और तोतली जुबान में तब मुझसे लिपट जातीं जब मैं ऑफिस से घर आकर सब्जी और दूसरे घर के सामाने का झोला पटक कर चाय पीने बैठता। श्रीमती जी लम्बी सांस लेतीं और कीचन में यह कहते हुए घुस जातीं-अब आप संभालिये! मेरी मजबूरी थी कि मैं उन्हें देर तक झूठी-मुठी कहानियों में भुलाता रहता। यदि ऐसा न करता तो समय से भोजन मिलना संभव ही नहीं था। मैं शुरू करता-तीन मित्र थे..तभी कोई बोल पड़ता- आं आं पता है तिबंकतू, थेखतिल्ली औsss...तिलगोदर। आगे बताइये... :) 

तीनो में घनिष्ट मित्रता थी। कोई टोकता ..घनित माने ? मतलब.. खूब मित्रता थी। …अत्ता। तीनो तुम लोगों से अधिक बड़े नहीं थे। आठ-दस साल के होंगे। एक दिन पता है क्या हुआ! टिंबकटूं ने नदी किनारे मछली पकड़ने की योजना बनाई। सबको सूर्योदय के समय बुला लिया और बैठ गया नदी में बंसी डाल कर। छोटी बिटिया बीच में ही टोक देती.. बंती तो आप बजाते हैं न पापा ! उतते तिबंकतू मतली कैते पकल तकता है ? तब तक बड़ी समझाती- तिंबकतूं पापा की तलह बंती बदाता होगा..मतलियाँ तुनने के लिए आतीं होंगी, तिलगोदर और थेखतिल्ली दौल कल पकल लेते होंगे, है न पापा ? 

मैं माथा पीट लेता। दोनो की टोकाटेकी के कारण जो कहानी सोच रहा होता वह सब भूल जाता लेकिन प्रश्न ऐसे होते की बिना बताये आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता। मैं समझाता-वो दूसरी वाली बंसी होती है। एक लम्बी-सी डंडी होती है। जसमें एक तरफ मछली को फंसाने के लिए एक मजबूत धागा लटका होता है। जिसमें लोहे का कांटा बंधा होता है। कांटे में मछली को खाने के लिए कुछ फंसा देते हैं, जिसे चारा कहते हैं। फिर धागे को पानी में डुबो देते हैं और डंडी को पकड़ कर नदी किनारे बैठ जाते हैं। मछली चारा खाने के लिए आती है और कांटा उसके मुँह में फंस जाता है। कांटे में मछली के फंसते ही डंडी भारी लगने लगती है और किनारे बैठा शिकारी झट से धागे को ऊपर खींच लेता है। मछली फँस जाती है। समझी? दोनो बिटिया एक साथ बोल पड़तीं-तमझ गये। तिबंकतू बहुत बदमात था! मतली को खाने का लालच देकल पकल लेता था! 

मैं समझाना चाहता-हाँ बेटा। जबसे यह दुनियाँ बनी है तभी से चालाक और ताकतवर, कमजोर और सीधे लोगों को फँसाने का खेल खेलते आये हैं। यह दुनियाँ भी एक नदी की तरह है। जहाँ घाट-घाट पर बहुत से ‘टिंबकटूं’ बंसी लटाकाये बैठे हुए हैं। अपने आनंद के लिए मछली के गले में कांटा फँसाकर पकड़ना और खा जाना इनकी आदत है। सावधानी तो मछलियों को रखनी पड़ती है। लेकिन इतना ही कह पाता- जीव ही जीव का भोजन होता है। जंगल में बड़े जानवर, कमजोर को मारकर अपनी भूख मिटाते हैं। मनुष्य बुद्धिमान प्राणी है। वह शिकार भी करता है और अन्न भी उगा सकता है। बहुत से लोग ऐसे हैं जो मछली पकड़कर, इनको बेचकर ही अपना और अपने परिवार का पेट भर पाते हैं। भूख मिटाने के लिए शिकार करना उनकी मजबूरी है। सिर्फ आनंद लेने के लिए दूसरे जीवों को कष्ट देना गलत बात है। टिंबकटूं सिर्फ आनंद लेने के लिए मछली पकड़ रहा था। इसलिए तुम लोगों का कहना सही है। टिंबकटूं बदमाशी कर रहा था। 

आगे जानती हो क्या हुआ? (अब मैं जल्दी-जल्दी कहानी पूरी करना चाहता था। कीचन में पक रहे भोजन की खुशबू आने लगी थी।) एक बड़ी-सी मछली जाल में फँस गई। टिंबकटूं चीखा- भारी मछली फँसी है। पकड़ो-पकड़ो। वह चीखकर कहना चाहता था कि मछली भारी है जल्दी से डंडी पकड़ो नहीं तो मैं ही पानी में गिर जाउँगा लेकिन शेखचिल्ली तो मूर्ख था ही। उसने समझा टिंबकटूं मछली पकड़ने के लिए कह रहा है। वह खुद ही दौड़कर नदी में कूद गया मछली पकड़ने के लिए। 

दोने बेटियाँ जोर-जोर से हँसने लगतीं। छोटकी कहती-उतको तो तैलना आता है। बड़की कहती-लेकिन कपला तो भीग ही गया न! मैं कहता-फिर जानती हो क्या हुआ ? शेखचिल्ली मछली को नहीं, मछली शेखचिल्ली को पकड़कर नदी में ले जाने लगी! 

दोनो चीखतीं- धूत! धूत! 

मैं समझाता-मेरा मतलब है कि मछली इत्ती बड़ी और ताकतवर थी कि शेखचिल्ली उसे पकड़कर ला ही नहीं पा रहा था और लालच में छोड़ भी नहीं रहा था। दोनो अचरज से पूछतीं- तब का हुआ ? मैं समझाता-चिलगोजर को भूल गई? चिलगोजर ने देखा तो दौड़कर नदी में कूदा और मछली को पकड़ लिया। इतने में टिंबकटूं भी आ गया। फिर तीनो मिलकर मछली को पकड़ कर किनारे ले आये। पानी से बाहर निकलते ही मछली छटपटाने लगी। शेखचिल्ली मछली को छटपटाते देखकर बोला-लगता है मछली को ठंडी लग रही है! तभी इत्ता कांप रही है!!!  टिंबकटूं को उसकी बात सुनकर गुस्सा आ गया। वह शेखचिल्ली को मारने के लिए दौड़ा-मूर्ख! यह पानी से निकलने के कारण छटपटा रही है और तुम कह रहे हो कि इसे ठंडी लग रही है!!! चिलगोजर ताली पीट-पीट कर हँसने लगा। इत्ते में जानती हो क्या हुआ? 

दोनो आँखे फाड़कर - का हुआ? 

मछली छटपटाते-छटपटाते फिसलकर पानीं में गिर गई। मछली को पानी में गिरते तीनो ने देखा तो फिर से दौड़ पड़े पकड़ने के लिए। लेकिन जानती हो क्या हुआ? 

… का हुआ? 

मछली पानी में भाग गई! इतना सुनते ही दोनो खुशी के मारे चीखने-उछलने लगीं। हो हल्ला सुनकर बच्चों की अम्माँ कमरे में आ गईं- क्या हुआ? 

दोनो हाथ नचाकर बोलीं-मतली पानी में भाग गई! 

बहुत देर तक दोनो का नाटक चलता रहता। एक पूछती-का हुआ? दूसरी कहती-मतली पानी में भाग गई!  

मैं मनाता-हे ईश्वर! इनकी हँसी यूँ ही सलामत रहे। मछलियाँ कभी किसी लालच में न फँसें और अगर फँस भी जायें तो शिकारियों को चकमा देकर भागने में कामयाब हो जायें।

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15.10.13

त्योहार और आम आदमी

दशहरा, बकरीद या दिवाली खास आदमी धन से, आम आदमी मन से मनाते हैं। अर्थशास्त्र कहता है-पूँजी के द्वारा अर्जित किये हुए उस पैसे को धन कहते हैं जिसमें निरंतर वृद्धि होती रहती है। समाज शास्त्र कहता है-परिवार के सदस्यों की उस इच्छा को मन कहते हैं जिसकी पूर्ति लिए आम आदमी को कर्ज़ लेना पड़ता है। यही कारण है कि ये त्योहार खास के लिए खुशी, आम के लिए दुःख के कारण बनते हैं। गणित की भाषा में दोनो में एक शब्द कॉमन है-आदमी। हारता यही है, जीतता यही है। मरता यही है, मारता यही है। कलयुग में यही भक्त है, यही भगवान है।

मांसाहारी परेशान हैं। दशहरे और बकरीद ने मछलियों, मुर्गों, बकरों और भी दूसरे खाये जाने वाले जानवरों का भाव बढ़ा दिया है। शाकाहारी भी कम परेशान नहीं। टमाटर चालीस से नीचे नहीं उतर रहा, प्याज साठ पर डटा हुआ है और अब तो गोभी, नयां आलू और मटर भी बाज़ार में आ गया है। सभी त्योहार आम आदमी कर्ज़ लेकर रोते हुए मनायेगा। खास के पास धन है। सभी त्योहार हँसते हुए मनायेगा। रोते हुए मने, चाहे हँसते हुए, त्योहार आयेंगे और मनाये जाते रहेंगे। गरीब यह नहीं समझ पाते कि ये त्योहार खास के द्वारा, खास के लिए, खास के हित में बनाये गये हैं। ये व्यापारियों के लिए आते हैं। मुल्लों, पंडितों के लिए आते हैं। पूँजीपतियों के लिए आते हैं। ये त्योहार सर्वहारा वर्ग की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को बाज़ार तक ले जाने के लिए आते हैं। इन त्योहारों में गरीब के घर ढिबरी भी कर्ज़ के तेल से जलती है, बाजार लाभ से जगमगाते हैं।  

आम आदमी की परेशानी खास को समझ में नहीं आती। हँसते हुए कहता है-अब भारत में गरीब कहाँ रह गया? रिक्शा चलाने वाले के पास भी मोबाइल है! गरीब आदमी के बच्चों के पास भी लैपटॉप है। नेट पर बैठकर बड़े-बड़ों से चैट करता है! भाड़ में जाये तुम्हारा मोबाइल! भाड़ में जाय तुम्हारा यह जंजाल। तुमने मोबाइल देकर मजदूरों को और 24 घंटे का गुलाम बना दिया। रात में भी चैन से सो नहीं पाता। थका-मांदा रात मे 12 बजे घर आया है। दो रोटी खाकर गहरी नींद सोया है। तुम्हें कोई जरूरी काम याद आ जाता है और तुम उसे भोर में ही घर आने का आदेश सुना देते हो। जब मोबाइल नहीं था, रात तो उसकी अपनी थी। लोटा लेकर निपटने जाता था तो देख पाता था सूरज़ की लाली कैसी होती है! अब तो दोनो जहान से गया। मगर मजे की बात यह कि यह भी नहीं कह पाता- यह लो अपनी लकुटी कमरिया, बहुत ही नाच नचायो।

आम आदमी को तो श्रम के बदले पेट भर भोजन चाहिए। पहनने के लिए कपड़ा चाहिए। बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा चाहिए। रहने के घर चाहिए, घर में बिजली-पानी चाहिए। चलने के लिए सड़क चाहिए। बीमार पड़े तो अस्पताल चाहिए। इतना सब मिल जाय तब जाकर धन्यवाद देने के लिए भगवान चाहिए। उत्सव मनाने के लिए त्योहार चाहिए। मगर यहाँ सब उल्टा-पुल्टा हो रहा है। घर में खाने के लिए रोटी नहीं मगर त्योहार मनाना जरूरी है। पैसा नहीं है तो कर्ज़ लेकर ही सही, मनाना जरूरी है। दौड़ लगा रहे हैं मंदिरों में..हे ईश्वर! चमत्कार कर दो। भाग रहे हैं भीड़ में। भगदड़ मची तो खास एक भी नहीं, सबके सब आम ही मरे। चालाक नहीं जाते भीड़ में। कर्ज़ दे सकते हैं ब्याज़ पर। जाओ! मनाओ भगवान, मनाओ त्योहार, काटो बकरे, चढ़ाओ परसाद। तरह-तरह के ऑफर, तरह-तरह के प्रलोभन।

कहाँ जायेगा भागकर आम आदमी? कर्ज़ ले लो कर्ज़। सस्ते दर पर ले लो। सिम भराओ..बतियाओ सढ़ुआइन से। ऐ बहिनी, फोन लगाय द जरा मौसी के! दशहरा ऑफर है, दीवाली ऑफर है..ले लो, ले लो, कर्ज़ ले लो। कर्ज लेकर नई टीवी ले आओ, फ़्रिज ले आओ, जिसकी जितनी हैसियत उससे बढ़कर चीजें ले आओ। पेट्रोल भराने की ताकत नहीं, साइकिल छोड़कर मोटर साइकिल ले आओ। रखने लायक घर नहीं, कार ले आओ। शामिल हो जाओ दौड़ में। रोटी से दूर, दवा से दूर, अच्छी शिक्षा से दूर जिये जा रहे हैं झूठे भ्रम जाल में। भले छत चू रहा हो, मोबाइल भरा होना चाहिए, केबिल चालू रहना चाहिए। देखना है सीरियल...आनंदी, बिग बॉस, महाभारत। ललचते जाना है देख-देखकर तरह-तरह के विज्ञापन। सब देखकर भी सुख नहीं हैं। भरनी है आह! करना है क्रंदन। नौ दिन व्रत रखो, माई खुश होंगी तो मिल जायेगा सब कुछ। लक्ष्मी की पूजा करो, घर धन से भर जायेगा। 

उच्च शिक्षा पर खास का कब्जा है। अच्छे इलाज खास के ही वश में हैं। आम आदमी को रहना ही है भगवान भरोसे। इस जाल से निकल पाना अब तो असंभव लगता है। यह और कुछ नहीं अपराधियों, पूँजीपतियों, धर्मगुरूओं का एक सम्मिलित चमत्कार है। इस चमत्कार को नमस्कार है।
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