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20.8.20

नुक़्ता

नुक़्ता हिन्दी का आधुनिक चलन है। रामचंद्र शुक्ल और हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जैसे आचार्य बग़ैर नुक़्ता लगाये अग्रणी विद्वान बन गये। लेकिन हिन्दी मीडिया में अब नुक़्ता का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले अरबी-फ़ारसी शब्दों में पाँच अक्षर (क़, ख़, ग़, ज़ और फ़) ऐसे हैं जिनमें नुक़्ता लगता है। जब नुक़्ता मुझे ज्यादा सताने लगा तो मैंने मिर्ज़ा एबी बेग़ की शागिर्दी में नुक़्ता वाले लोकप्रिय शब्दों की लिस्ट तैयार की। आजकल उर्दू-उर्दू का माहौल देखते हुए लगा कि मुझे वह लिस्ट यहाँ शेयर करनी चाहिए ताकि उसका लाभ ज्यादा लोगों तक पहुंचे और उसे और बढ़ाया भी जा सके। अगर कुछ भूल-चूक हो तो उसे सुधारा भी जा सकेगा। मैंने यह लिस्ट वर्णानुक्रम के अनुसार से बनायी थी ताकि शब्दों को खोजना आसान रहे। इस कड़ी में आज पेश है 'अ' से शुरू होने वाले प्रचलित शब्द जिनमें नुक़्ते का प्रयोग होता है- 

अफ़सोस
अफ़सर
अफ़वाह
अफ़साना
अज़ीम
अर्ज़ी
आवाज़
आज़माइश
औज़ार
आज़ाद/आज़ादी
अंदाज़
अख़बार
आफ़त
आदमख़ोर
आतिशबाज़ी
अज़ीज़(प्रिय)
अक़्लमंद
आशिक़
आफ़त
अग़वा
अर्ज़ (अर्ज़ किया है)
अरज़ (कपड़े का माप)
.........

इ से शुरू होने वाले नुक़्ता वाले प्रचलित शब्द।

इक़रार
इजाज़त
इंतज़ार
इज़हार
इज़्ज़त
इज़ाफ़ा
इज़्ज़त
इल्ज़ाम
इत्तिफ़ाक़
इंतज़ाम
 इश्क़

क से शुरू होने वाले नुक़्ता वाले प्रचलित शब्द। अ, इ और ए से शुरू होने वाले ऐसे शब्दों के लिए पीछे की पोस्ट देखें। जो शब्द लिस्ट में नहीं हैं उनपर नुक़्ता लगाने से पहले किसी उर्दू-दाँ से पूछ कर ही नुक़्ता लगाएँ। ये क में नुक़्ता वाले शब्द नहीं हैं। ये वो हिन्दी शब्द हैं जो क से शुरू होते हैं और उनमें नुक़्ता वाले वर्ण (क़, ख़, ग़, ज़ और फ़) आते हैं, जैसे कमज़ोर में ज़ पर नुक्ता है लेकिन क पर नहीं।

क़द
क़दम
क़ालीन
क़ाज़ी
क़ायदा
क़मीज़
क़ब्ज़ा
कमज़ोर
काग़ज़
काफ़ी
क़ायम
क़ानून
क़ानूनी
क़ैद
क़ैदी
क़ुर्क़ी
क़रीब
क़ब्र
क़ुरान
क़यामत
क़ाबिल
क़र्ज़
क़िस्म
क़सम
क़ैंची
क़िस्मत
क़ुदरत
क़ौम
क़रीब
क़स्बा
क़ुबूल
कफ़न
क़तार
क़रार
क़द्र
क़िस्म
क़ीमत
क़ुर्बानी
क़ुली
क़िस्त
किफ़ायत
क़िला
क़त्ल
कारख़ाना
क़ाबू
क़लम
क़िल्लत
क़लंदर
क़लई
क़ाफ़िला
क़ब्ज़
क़िस्सा
क़साई
क़सीदा
क़सर
क़ंदील
क़बीला

ख से शुरू होने वाले नुक़्ता वाले प्रचलित शब्द। अ, इ, ए और क से शुरू होने वाले ऐसे शब्दों के लिए पीछे की पोस्ट देखें। जो शब्द लिस्ट में नहीं हैं उनपर नुक़्ता लगाने से पहले किसी उर्दू-दाँ से पूछ कर ही नुक़्ता लगाएँ। ये ख में नुक़्ता वाले शब्द नहीं हैं। ये वो हिन्दी शब्द हैं जो ख से शुरू होते हैं और उनमें नुक़्ता वाले वर्ण (क़, ख़, ग़, ज़ और फ़) आते हैं।

ख़ुद्दार 
ख़ामोश
ख़रगोश
ख़ंजर
ख़ैरियत
ख़्वाब
ख़ुमार
ख़ाली
ख़यानत
ख़तरनाक
ख़ुलासा
ख़त्म
ख़ादिम
ख़लल
ख़िदमत
ख़ामी
ख़ाक
ख़रीदार
ख़स्ता 
ख़राब
ख़मियाज़ा
 ख़ानदान
 ख़ज़ाना
ख़याल
ख़बर
ख़त
ख़ुराफ़ात
ख़ुदग़रज़
 ख़ून
ख़ुदा
ख़ास
ख़ज़ांची
ख़ारिज
ख़ानाबदोश
ख़ानदान
ख़ामोश
ख़ुद
ख़ुश
ख़ून
ख़ूबसूरत
ख़्वाहिश 
ख़तरनाक
ख़राबी
 ख़रीद
ख़र्च
ख़ातिर
ख़ौफ़
 ख़त्म
ख़ास
ख़बर
ख़िलाफ़
 ख़ान (कोयेले वाली खान में ख में नुक़्ता नहीं होता।)
ख़र्च
ख़ुराक
ख़ेमा
ख़ार
 ख़ंदक़
ख़लिश 
ख़ाविंद
ख़िताब
ख़ता
ख़्वाजा
ख़ुशामद
ख़राश
ख़रबूज़ा
ख़ब्त 
ख़र्राटा
ग से शुरू होने वाले नुक़्ता वाले प्रचलित शब्द। अ, इ, ए, क और ख से शुरू होने वाले ऐसे शब्दों के लिए पीछे की पोस्ट देखें। जो शब्द लिस्ट में नहीं हैं उनपर नुक़्ता लगाने से पहले किसी उर्दू-दाँ से पूछ कर ही नुक़्ता लगाएँ। ये केवल ग में नुक़्ता वाले शब्द नहीं हैं। ये वो हिन्दी शब्द हैं जो ग से शुरू होते हैं और उनमें नुक़्ता वाले वर्ण (क़, ख़, ग़, ज़ और फ़) आते हैं।

ग़ैर 
ग़म
 ग़लत
 ग़ुरूर
 गुज़र
 ग़फ़लत
 ग़ज़ब
 ग़मगीन
 ग़ुबार
 ग़लीचा
 ग़रीब
  ग़ैर-क़ानूनी
 ग़ौर
 ग़ुस्सा
 ग़द्दार
 ग़नीमत
 ग़फ़लत
 ग़म
 ग़रज़मंद
 ग़लतफ़हमी
 ग़ुलामी
  ग़ौर
 ग़ज़ल
 गुज़ारिश
 गुलज़ार 
गिरफ़्तार 
ग़ायब
ग़बन
ग़ुंडा
ग़ुसल
ग़श
ग़दर
ग़र्क़
ग़ोता/ग़ोताख़ोर
ग़िलाफ़
 ग़ल्ला(अनाज)
गुफ़्तगू

त और द से शुरू होने वाले नुक़्ता वाले प्रचलित शब्द। अ, इ, ए, क, ख और ग से शुरू होने वाले ऐसे शब्दों के लिए पीछे की पोस्ट देखें। जो शब्द लिस्ट में नहीं हैं उनपर नुक़्ता लगाने से पहले किसी उर्दू-दाँ से पूछ कर ही नुक़्ता लगाएँ। ये वो हिन्दी शब्द हैं जो त और द से शुरू होते हैं और उनमें नुक़्ता वाले वर्ण (क़, ख़, ग़, ज़ और फ़) आते हैं।

तरीक़ा 
तफ़तीश
 ताज़िया
तूफ़ान
ताज़ा
तमीज़
तराज़ू 
तर्ज़
तक़ाज़ा
ताक़त
तहज़ीब
तख़्त 
तनख़्वाह
 तारीख़
 तरक़्क़ी
 तक़दीर
 तहख़ाना
 तेज़ी
दाग़
 दरवाज़ा
 दाख़िल
 दग़ा
 दिमाग़
 दस्तख़त
 दरख़्वास्त 
दमख़म
 दस्तावेज़
 दिक़्क़त
 दराज़ 

ज से शुरू होने वाले नुक़्ता वाले प्रचलित शब्द। अ, इ, ए, क, ख, ग, त और द से शुरू होने वाले ऐसे शब्दों के लिए पीछे की पोस्ट देखें। जो शब्द लिस्ट में नहीं हैं उनपर नुक़्ता लगाने से पहले किसी उर्दू-दाँ से पूछ कर ही नुक़्ता लगाएँ। ये वो हिन्दी शब्द हैं जो 'ज' से शुरू होते हैं और उनमें नुक़्ता वाले वर्ण (क़, ख़, ग़, ज़ और फ़) आते हैं।

ज़ुल्म 
ज़ालिम
 ज़बरदस्त
 ज़ाहिर
 ज़हर
 ज़ंजीर
जज़ीरा
 ज़मीर
 ज़माना
 ज़मानत
ज़ख़्मी 
ज़रा
 ज़ोर
 ज़िला 
ज़िम्मेदार
 जायज़ा
 जालसाज़ी
 ज़ाहिर
 ज़िंदगी
 ज़िक्र
जहाज़
 ज़ाहिर
 ज़मीन
 ज़ेवरात
 ज़िद
 जांबाज़
 ज़रूरत
 ज़मीन
 ज़्यादा
 ज़रिए
जल्दबाज़ी
 ज़रा
जहाज़
ज़ेवरात
 ज़ोर
 जज़्बा 
ज़रूरी
 ज़ायक़ा
 जलील (श्रेष्ठ)
ज़लील (निकृष्ट)

न, ब और प से शुरू होने वाले नुक़्ता वाले प्रचलित शब्द। अ, इ, ए, क, ख, ग, त, द और ज से शुरू होने वाले ऐसे शब्दों के लिए पीछे की पोस्ट देखें। जो शब्द लिस्ट में नहीं हैं उनपर नुक़्ता लगाने से पहले किसी उर्दू-दाँ से पूछ कर ही नुक़्ता लगाएँ। ये वो हिन्दी शब्द हैं जो 'न, ब और प' से शुरू होते हैं और उनमें नुक़्ता वाले वर्ण (क़, ख़, ग़, ज़ और फ़) आते हैं।

नज़रिया 
नाजायज़
 नज़ारा
 नज़र
 नब्ज़ 
नारेबाज़ी 
नफ़रत
नक़ली
 नक़द
 नज़ाकत
 नक़ल
 नाबालिग़
 नमाज़
 नामज़द
 नाज़ुक
 नाराज़
 नग़मा
 नुक़सान
 नामज़द

बाक़ी
 बाग़
 बर्ख़ास्त 
बुख़ार
बाज़ू
 बेदख़ल
 बेगम (पत्नी)
 बेग़म (जिसे ग़म न हो)
 बग़ीचा
 बुज़ुर्ग
 बुज़दिल 
बेग़रज़
 बाज़ीगर
 बरक़रार
 बेक़ाबू
 बाक़ी 
बाक़ायदा
 बरख़ास्त
 बग़ल
 बग़ावत
बग़ैर
 बाग़ी
 बालिग़
 बुज़दिल
 बक़ाया
 बेक़रार
 बाज़ार 

परवाज़
 पाकीज़ा
 पैग़ाम
 पुख़्ता

म से शुरू होने वाले नुक़्ता वाले प्रचलित शब्द। अ, इ, ए, क, ख, ग, त, द, ज, न, ब और प से शुरू होने वाले ऐसे शब्दों के लिए पीछे की पोस्ट देखें। जो शब्द लिस्ट में नहीं हैं उनपर नुक़्ता लगाने से पहले किसी उर्दू-दाँ से पूछ कर ही नुक़्ता लगाएँ। ये वो हिन्दी शब्द हैं जो 'म' से शुरू होते हैं और उनमें नुक़्ता वाले वर्ण (क़, ख़, ग़, ज़ और फ़) आते 

माफ़िया
मुख़तलिफ
मुख़ालिफ़
मुआवज़ा
महज़
मुनाफ़ा
मुल्ज़िम
माफ़ी 
मक़बरा
मुक़द्दमा
मंज़िल
 मज़बूत
मज़ार
मंज़ूर
मज़हब
मरीज़
मर्ज़ी
मिज़ाज
मुताबिक़
मक़ाम/मुक़ाम
मुलाक़ात
मशक़्क़त
मक़सद
 मेज़
मुआवज़ा
 मुनाफ़ा
मज़ा
मंज़िल
मज़दूर
मज़बूत
मज़ार
मज़ाक़
मंज़ूर
मुक़ाबला
मरीज़
मंज़र
मुख़ालफ़त
मौक़ा

य, र, ल, स और श से शुरू होने वाले नुक़्ता वाले प्रचलित शब्द। अ, इ, ए, क, ख, ग, त, द, ज, न, ब, प और म से शुरू होने वाले ऐसे शब्दों के लिए पीछे की पोस्ट देखें। जो शब्द लिस्ट में नहीं हैं उनपर नुक़्ता लगाने से पहले किसी उर्दू-दाँ से पूछ कर ही नुक़्ता लगाएँ। 

यक़ीन
रोज़ा
रोज़ाना
रमज़ान
रक़म
रूख़्सत
रोज़
रेज़गारी
रोज़गार
 राज़ी
 राहज़नी
रुख़
रौनक़
रफ़्तार
रक़म
राज़
रज़ामंदी
रोज़ा
लज़ीज़
लिफ़ाफ़ा
सब्ज़ी 
साज़
 सु्र्ख़ियां
सख़्त
सु्र्ख़ियां
 सुराग़
सिफ़ारिश
सबक़
सज़ा
सलीक़ा
सफ़र
 साफ़
शोरो-ग़ुल
 शनाख़्त
शरीफ़
 शराफ़त
 शौक़
 शक़

मैंने नुक़्ता वाले शब्दों की पूरी सूची अपने वॉल पर शेयर कर दी है। पिछले पोस्ट पर जाकर उन्हें देखा जा सकता है। पूरी सूची शेयर कर देने के बाद यह कहना जरूरी हो गया है कि जिन पाँच अक्षरों (क़, ख़, ग़, ज़ और फ़) पर नुक़्ता लगता है उनमें से पहले तीन का सटीक उच्चारण करने में इस देश के बड़े उर्दू-दाँ की ज़बान भी हलक में फँसने लगती है क्योंकि इन तीनों के स्वर गले से निकालने होते हैं। एक बड़े काबिल सीनियर ने मुझसे कहा था कि ज़ और फ़ के उच्चारण पर ध्यान दो बाक़ी को इग्नोर करो। हक़ीक़त यही है कि उर्दू-हिन्दी वाले भले ही लिखते वक़्त नुक़्ता लगा दें लेकिन वो ज़ और फ़ के अलावा बाक़ी अक्षरों को नुक़्ते के साथ बोल नहीं पाते। जैसे वक़्त, नुक़्ता, हक़ीक़त बोलना हिंदुस्तानियों के लिए टेढ़ी खीर है। अरब ही इन्हें सही से बोल पाते हैं। इसलिए मेरी राय में हमें नुक्ता लगाते समय भी केवल ज़ और फ़ पर नुक़्ता लगाना चाहिए क्योंकि इनका ही हम उच्चारण कर पाते हैं। मेरे ख्याल से लिखते समय क़, ख़ और ग़ में नुक़्ता लगाना बौद्धिक दिखावा भर है। कल और परसों मैं वर्णानुक्रम वाली सूची से केवल ज़ और फ़ वाले शब्द छाँट कर शेयर करूँगा। ताकि आप सब भी क़, ख़ और ग़ को भुला कर ज़ और फ़ पर ध्यान दे सकें।

कुछ लोगों की अक़्ल में ही नुक़्ता लगा होता है। सनद रहे, मैं उनकी अक्ल से नुक्ता नहीं हटाना चाहता। इसके दो कारण हैं। एक यह कि यह उनकी फैक्ट्री सेटिंग हैं। दूसरा यह कि अरबी-फ़ारसी वर्णमाला के हिसाब से उनकी अक्ल में सही जगह नुक्ता लगा है। यह अलग बात है कि मैं बस हिन्दी भाषा और समाज को ज़हन में रखते हुए ही ये बातें रख रहा हूँ। नीचे मैं उन प्रचलित हिन्दी शब्दों की लिस्ट दे रहा हूँ जिनमें नुक्ता वाले ज़ और फ़ आते हैं। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ज़ और फ़ का नुक्ता इसलिए भी ज़्यादा ज़ोर पकड़ रहा है क्योंकि ये दोनों ध्वनियाँ इंग्लिश वर्णमाला में भी हैं। क़, ख़ और ग़ की ध्वनियाँ इंग्लिश में नहीं हैं इसलिए कॉर्पोरेट मीडिया में भी ज़ और फ़ को लेकर टोकने वाले ही ज़्यादा मिलेंगे। बीबीसी हिन्दी में मैं जब भी फिल्म बोलता था तो एक मित्र टोक देते थे कि रंगनाथ जी फ़िल्म। उन जैसे सहृदयों की मदद से मेरे कुछ फ़ और ज़ सही हो पाये। मेरे ख्याल से जो साथी क़, ख़ और ग़ के चक्कर में पड़ना चाहें शौक से पड़ें लेकिन पहले चरण में ज़ और फ़ पर काम कर लें। इन दो को दुरुस्त करके ९० प्रतिशत पेशेवर दिक्कतों से पार पाया जा सकता है। बाकी इल्म और हुनर की कोई आखिरी सीमा नहीं होती, जिसे जहाँ तक जाना हो जा सकता है।

रोज़ा
रोज़ाना
रमज़ान
रोज़
रेज़गारी
रोज़गार
राज़ी
राहज़नी
रफ़्तार
राज़
रज़ामंदी
रोज़ा
लज़ीज़
लिफ़ाफ़ा
सब्ज़ी 
साज़
सिफ़ारिश
सज़ा
सफ़र
साफ़
शरीफ़
शराफ़त
माफ़िया
मुख़तलिफ
मुख़ालिफ़
मुआवज़ा
महज़
मुनाफ़ा
मुल्ज़िम
माफ़ी 
मंज़िल
 मज़बूत
मज़ार
मंज़ूर
मज़हब
मरीज़
मर्ज़ी
मिज़ाज
 मेज़
मुआवज़ा
 मुनाफ़ा
मज़ा
मंज़िल
मज़दूर
मज़बूत
मज़ार
मज़ाक़
मंज़ूर
मरीज़
मंज़र
मुख़ालफ़त
नज़रिया 
नाजायज़
 नज़ारा
 नज़र
 नब्ज़ 
नारेबाज़ी 
नफ़रत
 नज़ाकत
 नमाज़
 नामज़द
 नाज़ुक
 नाराज़
नामज़द
बाज़ू
 बुज़ुर्ग
 बुज़दिल 
बेग़रज़
 बाज़ीगर
 बुज़दिल
 बाज़ार 
परवाज़
 पाकीज़ा
ज़ुल्म 
ज़ालिम
 ज़बरदस्त
 ज़ाहिर
 ज़हर
 ज़ंजीर
जज़ीरा
 ज़मीर
 ज़माना
 ज़मानत
ज़ख़्मी 
ज़रा
 ज़ोर
 ज़िला 
ज़िम्मेदार
 जायज़ा
 जालसाज़ी
 ज़ाहिर
 ज़िंदगी
 ज़िक्र
जहाज़
 ज़ाहिर
 ज़मीन
 ज़ेवरात
 ज़िद
 जांबाज़
 ज़रूरत
 ज़मीन
 ज़्यादा
 ज़रिए
जल्दबाज़ी
 ज़रा
 ज़ोर
 जज़्बा 
ज़रूरी
 ज़ायक़ा
 जलील (श्रेष्ठ)
ज़लील (निकृष्ट) 
तफ़तीश
 ताज़िया
तूफ़ान
ताज़ा
तमीज़
तराज़ू 
तर्ज़
तक़ाज़ा
तहज़ीब
तेज़ी
दरवाज़ा
दस्तावेज़
दराज़
गुज़र
ग़फ़लत
ग़ज़ब
ग़फ़लत
ग़रज़मंद
ग़लतफ़हमी
ग़ज़ल
गुज़ारिश
गुलज़ार 
गिरफ़्तार
ग़िलाफ़
गुफ़्तगू
ख़मियाज़ा
ख़ज़ाना
ख़ुराफ़ात
ख़ुदग़रज़
ख़ज़ांची 
ख़ौफ़
ख़िलाफ़
क़ाज़ी
क़मीज़
क़ब्ज़ा
कमज़ोर
काग़ज़
काफ़ी
क़र्ज़
कफ़न
किफ़ायत
क़ाफ़िला
क़ब्ज़
इजाज़त
इंतज़ार
इज़हार
इज़्ज़त
इज़ाफ़ा
इल्ज़ाम
इत्तिफ़ाक़
इंतज़ाम
इफ़्तार
एतराज़
एज़ाज़ (किसी के सम्मान में)
एजाज़ (बुलंदी)
अफ़सोस
अफ़सर
अफ़वाह
अफ़साना
अज़ीम
अर्ज़ी
आवाज़
आज़माइश
औज़ार
आज़ाद/आज़ादी
अंदाज़
आफ़त
आदमख़ोर
आतिशबाज़ी
अज़ीज़(प्रिय)
आफ़त
अर्ज़ (अर्ज़ किया है)
अरज़ (कपड़े का माप)
ऑफ़िस

लेखक श्री रंगनाथ सिंह।

9.4.19

कबूतर और सरकारी कार्यालय

खिड़की के रास्ते
कमरे में
आ ही जाते हैं
कबूतर
मैने इन्हें कई बार कहा..
कहाँ तुम शांति के प्रतीक,
कहाँ यह सरकारी कार्यालय!
यहाँ मत आओ।

तुम चाहे 
जितने भी निर्बल वर्ग के हो,
इसमें तुम्हारा 
कोई स्थान नहीं!
प्राकृतिक संसाधनों पर
हम मनुष्यों का 
हो चुका है 
सम्पूर्ण कब्जा,
आरक्षण के साथ
हो चुका है
दाने-दाने का
बंटवारा,
तुम्हारा कोई बिल
बकाया हो ही नहीं सकता
यहाँ मत आओ।

यह सरकारी कार्यालय है
यहाँ
पर कतरने के 
मौजूद हैं
सभी सामान
छत पर टँगा हुआ पँखा,
तुम्हें दिखाई नहीं देता?
आवाजें
तुम्हें
भयभीत नहीं करतीं?
जा सकती है जान भी,
यहाँ मत आओ।

इन फाइलों में
चोंच गड़ा-गड़ा कर
पस्त हो जाते हैं मनुष्य भी
तुम्हारी क्या औकात?
तुम्हारी तो
निकल जाती है बीट भी!
यहाँ मत आओ।

दाना चुगे बिना.
व्यर्थ में,
कितने मरे?
इसका कोई आंकड़ा
किसी फ़ाइल में
मौजूद नहीं है
बस इतना जानता हूँ
शायद
असहाय मनुष्यों को भी
कार्यालय की 
सीढ़ियाँ चढ़ते देख
कबूतर 
अपने पँखों पर इतराते/
ललच जाते हैं!
खिड़की के रास्ते
कमरे में
आ ही जाते हैं।
...............

2.8.18

फेसबुक में पुस्तक चर्चा -2

Nivedita Srivastava
जिक्र जब किताबों का हो रहा हो ,तब मेरा मन इतना चलायमान हो उठता है कि लगता है इस किताब के बारे में बोलूँ तब तक दूसरी किताबें दस्तक देने लगती हैं जैसे मेरे बारे में क्यों न बोला ... 😊 ऐसी परिस्थिति में मैं #अमृताप्रीतम की तरफ खिसक लेती हूँ ... अमृता जी की कविताएं हो या उपन्यास दोनों बिना कुछ अतिरिक्त बोले मन को बांध लेते हैं ....
आज मैं अमृता प्रीतम जी के उपन्यास #उनचास #दिन की बात करूँगी ..... इस उपन्यास को सबसे पहले मैंने तब पढ़ा था, जब मैं इंटर में थी । ये उपन्यास और इसके पात्र करीम ,संजय और मीता ने मेरे जेहन पर कब्जा कर लिया था .... कभी कभी एक पागल सी ख्वाहिश भी जागती थी करीम ऐसा कोई दोस्त होता जो संजय के जैसा भगवान से भी लड़ जाता मेरे लिये ! कथानक संजय की बेहोशी की हालत में उनचास दिनों में घूमता है । संजय का पागलपन मीता के लिये ,जो बहिश्त की हूरों में भी मीता को ही तलाशता है और दूसरी तरफ करीम का पागलपन है जिसका विश्वास है कि उनचास दिनों के बाद रूह दूसरा जिस्म पा जाती है । 

बड़े छोटे छोटे मासूम से लम्हे भी हैं - करीम की पत्नी पेड़ काटने की बात कर के उसके मन मे संशय बीजती है ,तभी उसकी बेटी शीरीं फूलों के पौधे लिये सामने आ जाती है ,एक नई उम्मीद की तरह ! इंद्रधनुषी झूले पर झूलती मीता , सात आसमान की परतों से अपने यार को वापस खींच लाने की कोशिश में डायरी लिखता करीम .... सब पर भारी पड़ता है करीम का अपनी बेटी शीरीं से कहना कि तू तो मेरे जैसी ही है .... सब एक पेंटिंग की तरह सामने आ जाते हैं । 
अमृता जी की लेखनी के हम से दीवाने उनके उपन्यास में भी कविता पा जाते हैं 😊
दूसरी लेखिका की बात करूँ तो #प्रभा #खेतान जी का नाम लूंगी .... #छिन्नमस्ता है इनके उपन्यास का नाम ।इसमें एक बेबस सी लड़की किस तरह परिस्थितियों के सामने कुचली जाती रही ,पर जब उसका आत्मविश्वास जागता है तो एकदम से ही परिस्थितियाँ बदल जाती हैं । डगमगाते मन को एक साहस देती ढांढस बंधाता है इसका कथानक । 
Nivedita Srivastava
है कि मैं किधर किताबों की भीड़ में गुम हूँ 😄 .... और हाँ बुक फेयर में ही मैं अपना पर्स ले जाना कभी नहीं भूलती ,सिर्फ इसलिए कि जितना समय अमित जी का इंतजार करने में लगेगा उतनी देर में तो और भी किताबें खोज लूंगी 😇
आज बचपन की एक घटना शेयर करूँगी ... 
मम्मी कभी भी पुराने पेपर बेचती नहीं थीं कि इसका कोई मोल हो ही नहीं सकता ,पर पापा की ट्रांसफर वाली सर्विस की वजह से सब नहीं रखा जा सकता था ,तो वो रददीवाले को ऐसे ही पेपर दे देती थीं । एक बार वो पुराने पेपर निकाल रहीं थीं कि पापा आ गए और अचानक से ही उनकी निगाह उसके बोरे पर पड़ गयी । उन्होंने उसमें से एक किताब निकलवाई जो फ़टी हुई थी । रददीवाला चौंक गया ,"बाबूजी ई त फटी ह " पापा ने कहा "कोई बात नहीं ,ये मुझे चाहिये " और उन्होंने उसको रुपये दिये । मैं शायद 7 या 8 कक्षा में रही होउंगी ।उन्होंने मुझको वो किताब दी और कहा ," इसको ध्यान से पढ़ो और जहाँ के पन्ने गायब हैं या फ़टे हुए हैं ,उनको तुम अपने मन से लिखो ये सोच कर कि वहाँ क्या हो सकता है ।" एकबार को तो भाई और मैं चकरा गये कि ये क्या हुआ । खैर मैंने उनके कहे अनुसार कोशिश की ,अब उस समय मैं क्या लिख पायी होउंगी याद नहीं है। इस काम के इनाम के तौर पर मुझको उस किताब की नई प्रति मिली .... किताब का नाम था "गोदान" 😊 बाद में मैंने पापा से पूछा कि इतने महान लेखक की किताब के गायब अंश मुझसे क्यों लिखवाए । पापा का जवाब मुझे आज भी याद है ,उन्होंने कहा ,"किसी के नाम से प्रभावित हुए बिना पढ़ो तो तुम उसको ज्यादा अच्छे से समझोगी ।" मैंने उनकी इस बात की गाँठ बांध ली और नए पुराने हर लेखक को समभाव से सादर पढा । 
आज प्रेमचंद जी के जन्मदिन पर उनको नमन करते हुए इस संस्मरण को जी रही हूँ ।
आज की पोस्ट लम्बी हो गयी ,तो पसंदीदा किताबों के बारे में बिना कुछ लिखे ही नाम बताती हूँ .... 
#इसमतचुगताई जी की काग़ज़ी हैं पैरहन
#प्रतिभाराय जी की कोणार्क
#शंकर #मोकाशी #पुणेकर जी की अवधेश्वरी 
आज अपने जिन साथियों से उन की पसन्द जानना चाहूँगी वो हैं - प्रियंका गुप्ता ,Shekhar Suman ,Sunita Raman,Sudha Chaudhary 🤗🤗🤗
मेरी प्रिय पुस्तक श्रृंखला में आज मैं प्रतिभा रॉय का "द्रौपदी" उपन्यास लायी हूँ. लेखिका ने उपन्यास में द्रौपदी की अंतर्वेदना, उसकी चाहत, उसकी सोच को दृष्टि दी है. द्रौपदी के माध्यम से उस समय को चरितार्थ किया है जहाँ स्त्री सिर्फ वस्तु बना दी जाती है.....द्रौपदी क्या सोचती थी ये जानना बेहद जरूरी है. लेकिन अक्सर उसे ही उपेक्षित रखा गया. आखिर कैसे पितृ सत्ता द्रौपदी यानि स्त्री के दृष्टिकोण को परिलक्षित करती और फिर वो समाज द्वारा स्वीकार्य हो जाता , ऐसे में उनका वर्चस्व, उसका सिंहासन न हिल जाता? लेखिका ने सम्पूर्ण स्त्री विमर्श को आधार बनाया है. एक सोचने को विवश करता उपन्यास संग्रहणीय है.
वहीँ शिवाजी सावंत द्वारा लिखित "मृत्युंजय" कर्ण के दृष्टिकोण को व्याख्यायित करने का प्रयास है. वैसे भी महाभारत में हर किसी का एक अपना दृष्टिकोण था. हर कोई अपने नज़रिए से उस समय को देख रहा था और अपना पक्ष तय कर रहा था. ऐसे में कर्ण ने भी अपने नज़रिए से अपना दृष्टिकोण तय किया लेकिन क्यों उसका उत्तर इस उपन्यास में मिलता है. लेखक ने यहाँ कर्ण के मन में किस पात्र के लिए क्या क्या भावनाएं थीं, उनका विस्तृत वर्णन किया है जो जरूरी भी है. हम किसी भी घटना को एक ही नज़रिए से नहीं देख सकते. सबके नज़रिए को समझने की कोशिश करनी चाहिए शायद तब सही अन्वेषण कर सकें.
मेरी प्रिय पुस्तक श्रृंखला में आज मैं लायी हूँ डॉ मिनाक्षी स्वामी जी द्वारा लिखित उपन्यास "भूभल". 
उपन्यास स्त्री विमर्श का जीता जागता उदाहरण है. स्त्री फिर वो किसी भी तबके की हो, किसी भी पद पर हो, किसी भी जाति की हो, वो है सिर्फ स्त्री ही यानि एक देह भर........पितृ सत्ता की निगाह में, हमारे समाज की निगाह में, फिर वो मीडिया हो, पुलिस हो या कानून व्यवस्था......दोषी पुरुष दोषी होने पर भी दोषी नहीं लेकिन स्त्री जो पीड़ित है वो ही दोषी फिर वो जज ही क्यों न हो ........क्या ये तथ्य विचारणीय नहीं कि आज हमारा समाज , हमारी सोच किस दिशा की ओर अग्रसित है ? बलात्कार शब्द ही तोड़ने को काफी होता है एक स्त्री को उस पर बाकी सारी तोहमतें न केवल उसे बल्कि उसके परिवार को भी तोड़ देती हैं लेकिन जरूरत है इसी सोच से आज़ादी पाने की और उस दिशा में कदम उठाने की ......देखा जाए तो कहाँ फर्क आया है आज भी समाज में और कितना? आज तो बलात्कार करने की इन्तहा हो गयी.......जागरूकता के बाद तो और ज्यादा अति हो रही है आखिर क्यों? शायद यही वो प्रश्न है जिस पर ध्यान देने की सबसे ज्यादा जरूरत है ........चाहे जितने आन्दोलन कर लो, कानून बना लो जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी कुछ नहीं होगा मानो यही लेखिका का इस उपन्यास में आह्वान है .....बहुत से प्रश्न पीछे छोड़ता है उपन्यास और पढने पर लगता है अरे यही तो हो रहा है आस पास .



"मेरी प्रिय पुस्तक" श्रृंखला के तहत अलग अलग टैग लाइन्स के साथ फेसबुक के तमाम मित्रों की सक्रियता और जोश देखकर अब विश्वास हो चला है कि फेसबुक पर कितना भी समय हल्की फुल्की बातों में बिता लिया जाय किन्तु यहाँ सार्थक परिचर्चा करने वाले असंख्य प्रबुद्ध लोग मौजूद हैं। Manish Vaidya जी द्वारा प्रस्तावित इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में जिन लोगों ने प्रत्यक्ष भूमिका का निर्वाह किया है, उन्हें हार्दिक धन्यवाद। आप लोगों ने सिद्ध किया है कि इस मंच की उपयोगिता केवल अपनी अपनी उपलब्धियाँ गिनाने तक ही सीमित नहीं है।

आप सभी की तरह मैं भी हर रोज थोड़ा बहुत सहयोग इस श्रृंखला को देने की कोशिश कर रहा हूँ।

आज ऐसी दो पुस्तकों के आवरण जो भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं। इन दो विशिष्ट कृतियों के नाम हैं- * माटी मटाल * एवं 
* मृत्युंजय *

उड़िया भाषा के गौरव ग्रंथ के रूप में समादृत "माटी मटाल" वस्तुतः भारतीय भाषाओं के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। छह सौ से अधिक पृष्ठों में समाये "माटी मटाल" की कथा भारतीय जीवन विशेषकर ग्राम्य जीवन और संस्कृति की अद्वितीय दास्तान है। मूल कथा के बाद इस उपन्यास का सबसे सबल पक्ष इसका अनुवाद है। शंकरलाल पुरोहित साहब ने इस उपन्यास का ऐसा अद्भुत भावानुवाद किया है कि पढ़ते समय कहीं से यह अनुभव होता ही नहीं कि यह अनुवाद है। इस तरह की महाकाव्यात्मक कृतियों के अनुवाद में अनुवादक की भूमिका अतिशय महत्वपूर्ण होती है। यदि अनूदित करने वाला रचनाकार भावानुवाद करने की बजाय शब्दानुवाद में उलझा तो उच्चकोटि की किताब भी बेअसर साबित हो सकती है।
1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में असम की भूमिका पर आधारित "मृत्युंजय" असमिया भाषा के कालजयी उपन्यासों में अग्रगण्य है।
पराधीन भारत के उस दौर में असम के सामान्य जनमानस, उनके आक्रोश और विद्रोह की यादगार छवियाँ इस उपन्यास में दर्ज हैं।
गोसाईं जैसा अहिंसावादी व्यक्ति आजादी की दुर्निवार चाह में हिंसात्मक आन्दोलन की तरफ़ मुड़ जाता है। असम के तात्कालिक समाज , मानव स्वभाव की विभिन्न छवियों, आंदोलनकर्ताओं के आंतरिक एवं बाह्य संघर्ष, योजनाओं के निर्माण और निर्वाह की मुख्य कथा के समानांतर नायिका के कोमल मानवीय पक्ष की सहज प्रस्तुति उपन्यास को एक अलग कद और सर्जनात्मक ऊँचाई पर ले जाती है। डॉ कृष्ण प्रसाद सिंह मागध द्वारा अनूदित इस उपन्यास में मुख्य चरित्रों के मध्य प्रेम की ऐसी मर्यादित धारा बहती है जहाँ एक न होने की कसक है तो पारस्परिक मोह और आदर भी है।

30.7.18

फेसबुक में पुस्तक चर्चा (1)

फेसबुक में पढ़ाकू मित्रों द्वारा अपनी पढ़ी हुई पुस्तकों की चर्चा करते हुए नित्य पोस्ट डाली जा रही हैं. उनकी पोस्ट को यहाँ इस उद्देश्य से कॉपी पेस्ट किया जा रहा है ताकि  सनद रहे और वक्त पर काम आये . फेसबुक की पोस्ट अक्सर गायब हो जाती हैं.

(1) वंदना अवस्थी दुबे
दीप सक्सेना जी ने मुझे टोका भी कि तुम पढ़ती भी हो या बिना पढ़े हर दूसरे दिन किताब जमा करा जाती हो? मन किया था किताब ज़ोर से उनकी टेबल पर पटकूं, और कहूँ कि पूछिये इसके अंदर का कोई भी प्रसंग! हुंह! लेकिन ऐसा कर नहीं पाई 😞तो इसी दौरान मुझे लाइब्रेरी में मिली प्रथम प्रतिश्रुति। ये आशापूर्णा देवी का ज्ञानपीठ से सम्मानित उपन्यास है। इस उपन्यास को शुरू करने के बाद, बन्द करके रखने का मन नहीं होता था। लगता था, कितनी जल्दी पढ़ने बैठूँ। इसके आगे के भी दो सीक्वल उपन्यास हैं, बकुलकथा और सुवर्णलता। लेकिन प्रथम प्रतिश्रुति की सत्यवती तो जैसे किसी को टिकने ही नहीं दे रही थी। उस काल में आठ साल की बच्ची का विद्रोह!! असल में यही है नारी मुक्ति आंदोलन, जिसकी अलख, उस वक़्त आशापूर्णा जी ने सत्यवती के ज़रिए जगाई। ये मेरा प्रिय उपन्यास है। 
दूसरे नम्बर पर मेरा पसन्दीदा उपन्यास है, अभिमन्यु अनत का लिखा "लाल पसीना"! अभिमन्यु अनत मॉरीशस के लेखक हैं। लेकिन इस उपन्यास में उन्होंने भारतीय मजदूरों की व्यथा को जिस तरह लिखा है, उससे ऐसे लगता है जैसे उन्होंने खुद इस तक़लीफ़ को जिया हो। लाल पसीना उन भारतीय मजदूरों की दास्तान है जिन्हें फ्रांसीसी और ब्रिटिश ताक़तें, सोना मिलने का लालच दे के अपने साथ मॉरीशस ले गए और फिर उनसे ताउम्र न केवल हाड़तोड़ मेहनत करवाते रहे, बल्कि दिल दहलाने वाली सज़ाएं भी देते रहे। मेरा आग्रह है, कि जिन्होंने ये उन्यास नहीं पढ़े हैं, वे इन्हें ज़रूर पढ़ें। 

मम्मी कहती थीं कि -"अव्वल तो हमारे घर में चोर आएगा नहीं और अगर आया तो माथा पीट लेगा चारों ओर केवल किताबें देख के।" 
तो किताबों से उठने वाली गन्ध, कब खुशबू बन गयी पता ही न चला। बस इन्हीं दिनों पढ़ी विमल मित्र की "बेग़म मेरी विश्वास" और विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की "आदर्श हिन्दू होटल" कभी न भूलने वाली पुस्तकें हैं।
बेग़म मेरी विश्वास (बिस्वास) 1700 पृष्ठों का वृहद ऐतिहासिक उपन्यास है। भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के कालखंड पर आधारित एक वृहत महागाथा जो हमें सन् 1757 प्लासी के युद्ध के बीच लाकर खड़ा कर देती है। 
‘बेगम मेरी विश्वास’ मी मराली विश्वास गाँव-देहात की एक गरीब लड़की है लेकिन तात्कालिक घटनाओं के चलते भारत के इतिहास को बदलने में प्रमुख भूमिका निभाती है। घटना चक्र कुछ ऐसा चलता है कि यही मराली विश्वास, सिराजुद्दौला के हरम में पहुँचकर मरियम बेगम हो जाती हैं और बाद में क्लाइव के पास पहुँच कर बन जाती है मेरी। हिन्दू, मुसलमान और ईसाई तीन विभिन्न धर्मों के संगम की प्रतीक बन जाती है एक मामूली सी लड़की। 
दो इतिहास पुरुष सिराजुद्दौला और क्लाइव के बीच थी एक नायिका मराली यानी बेगम मेरी विश्वास, दोनों शत्रुओं का समान रूप से विश्वास जीतने वाली। 
सिराजुद्दौला, क्लाइव और मराली तीनों के माध्यम से दो शती पूर्व के बंगाल के इतिहास में दर्ज घटनाएँ अपने आप आँखों के सामने बिखर जाती हैं। 
विमल मित्र जादुई लेखक हैं। उनकी लेखनी गज़ब का तिलिस्म गढ़ती है।आमतौर पर वे कुछ न कुछ रहस्य, अपने उपन्यास में ज़रूर इस्तेमाल करते हैं और पाठक उनके द्वारा रचे गए रहस्य को तब तक नहीं जान पाता, जब तक कि वे खुद न बता दें। ये उपन्यास लाइब्रेरी में उपलब्ध होगा ही, खोज खाज के पढो बन्धुओ 😊
दूसरी पुस्तक है विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की "आदर्श हिन्दू होटल" ये इतना स्वादिष्ट उपन्यास है कि क्या कहूँ! मैंने तीन बार पढा है और जब भी पढ़ा, भूख अपने चरम पर पहुंची ही 😋 पूरी कहानी एक ग़रीब रसोइये, हजारी पंडित, होटल मालिक बेसु चक्रवर्ती और होटल की नौकरानी पद्दो के चारों और घूमती है। कैसे हजारी होटल की बदमाशियों को बर्दाश्त करते करते खुद का स्ट्रीट होटल खोल लेता है, और किस तरह ईमानदारी से आगे तक ले जाती है। जहां भी मिले, पढ़ें ज़रूर। 

पटना में हमारा मकान बड़ा हुआ करता था, बाद में बँटवारे और आस-पास बड़े और ऊँचे मकानों के बन जाने के कारण हमारा मकान छोटा होता गया. फिर धीरे धीरे खिड़कियों ने भी अपनी आँखें मूँद लीं. लेकिन हमारा दो मंज़िला पुराना मकान आज भी हवा महल की तरह पहली और दूसरी मंज़िल तक खिड़कियों से भरा पड़ा है. चौंकने की बात नहीं, एक पुरानी कहावत है कि बिना किताबों का घर, बिना खिड़कियों के मकान की तरह होता है. आज वहाँ और यहाँ मेरे पास इतनी किताबें हैं कि अपने आप में एक पूरी लाइब्रेरी है हमारा घर.
वंदना जिज्जी ने एक ऐसे धर्म संकट में डाल दिया कि क्या कहूँ, किसका नाम लूँ और किसका ज़िक्र करूँ. अलग अलग विषयों पर इतनी सारी पुस्तकें हैं कि धारावाहिक वर्णन करूँ तब जाकर बात पूरी होगी. फिर भी जिस पुस्तक का ज़िक्र मैं करना चाह्ता हूँ वो है पर्ल एस. बक का उपन्यास Come My Beloved. भारत में आई ईसाई मिशनरी और एक परिवार की लड़की का भारतीय युवक से प्रेम, परिवार का विरोध और लड़की का भारत छोड़ना. और क्लाइमैक्स आशा से परे, चौंका देने वाला. यह उपन्यास दुबारा मुझे कहीं नहीं मिला. बिटिया ने पिछले साल PDF दिया.
एक ऐसा ही उपन्यास है चेम्मीन, तकषि शिवशंकर पिळ्ळै का मलयाळम उपन्यास. एक ऐसी प्रेमकथा जिसका रिव्यू नहीं लिखा जा सकता. कयोंकि वो सिर्फ महसूसने की चीज़ है. और लगभग उनके सभी मलयाळ्म उपन्यास, ज़मीन से जुड़े और दिल के करीब. इनके अलावा फ़णीश्वर नाथ रेणु का मैला आँचल, डॉ. राही मासूम रज़ा का आधा गाँव, दिनकर की रश्मिरथी, बच्चन जी की आत्मकथा शृंखला, श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी और आदमी का ज़हर, विमल मित्र के सभी बांग्ला उपन्यासों का जादू. कुछ और उपन्यासों के नाम लूँ तो John Grisham का The Brethren, रवि सुब्रमनियन का If God was a Banker, शिवाजी सावंत का मृत्युंजय, विष्णु सखाराम खाण्डेकर का ययाति, अमृतलाल नागर का खंजन नयन, गुलज़ार साहब की पंद्रह पाँच पचहत्तर, पाओलो कोएल्हो की एलेवेन मिनट्स…
कितने नाम गिनाऊँ. यहाँ एक बार जो दाख़िल हो जाए कोई तो एक नया संसार सामने होता है.

किताबों की कीड़ा हमारे अंदर अब चौथी पीढ़ी तक पहुँच चुका है. मेरे दादा जी से यह पिता जी तक और फिर हम भाई बहन से हमारे बच्चों तक. अभी ज़िक्र दादा जी का. उनकी चार प्रिय पुस्तकें थीं और उन्होंने इन्हें इतनी बार पढ़ा सुना था कि उन्हें ज़ुबानी याद थीं ये किताबें –
1. वयम् रक्षाम: - आचार्य चतुरसेन
2. वैशाली की नगरवधु - आचार्य चतुरसेन
3. मृत्युंजय – शिवाजी सावंत
4. रश्मिरथी – दिनकर
मृत्युंजय और रश्मिरथी उन्हें कर्ण के चित्रण के कारण पसंद थी. रश्मिरथी तो वो मुझे सस्वर पढ़ने को कहते थे और जब मैं पढ़ता तो विभोर हो जाते थे और कई मार्मिक स्थलों पर उनके आँखों से गंगा जमुना बहने लगती थीं. वयम् रक्षाम: और वैशाली की नगरवधु उन्हें तथ्यात्मक विश्लेषण और भाषा के कारण पसंद थीं. इन दिनों पौराणिक पात्रों को लेकर काल्पनिक उपन्यास लिखने की बड़ी ज़बर्दस्त होड़ लगी है. किंतु वयम् रक्षाम: आज भी अपनी एक अलग पहचान रखता है.

मृत्युंजय लगभग दो तीन दशक के बाद मैंने हाल में पढ़ना शुरू किया. लेकिन अब यह पुस्तक मुझे पसंद नहीं आई. घटनाओं को मेलोड्रैमेटिक बनाने की पूरी कोशिश गयी है और लिखते समय ऐसा लगता है कि पात्रों को आगे की घटनाओं का पहले से पता है. हर घटना भविष्य की किसी घटना को प्रेडिक्ट करती सी प्रतीत होती है. फिर भी यह उपन्यास मेरा प्रिय उपन्यास है. दादा जी साहित्यिक व्यक्ति नहीं थे, लेकिन एक बहुत ही सीरियस पाठक थे और उनके नोट्स अपने आप में किसी समीक्षा से कम नहीं होते थे.
Smita Tewari is feeling creative at Iti Mankapur.
37 minsMankapur
मेरी प्रिय किताबों में मनु शर्मा जी की "कृष्ण की आत्मकथा" जो कि आठ भागों में है भी शामिल है..... भाषा शैली,घटनाएं, सबसे बढकर पुस्तक का कलेवर ही बेहद शानदार है.......इंसान बाध्य हो जाय पढने के लिए सचमुच 😊😊😊😊
1-नारद की भविष्यवाणी
2-दुरभि संधि
3-द्वारका की स्थापना
4-लाक्षाग्रह
5-खांडव वन
6-राजसूय यज्ञ
7-संघर्ष
8- प्रलय..
पढते समय जैसे उसी समय में जीने लगते हैं...कई दिनों तक उसी भाव में डूबते उतराते 😊😊😊 महसूस करते हुए...

#आओ#पुस्तक #श्रृंखला#बनाएं
मैं क्यों पढ़ती हूँ ?? ....या बिना पढ़े क्यों नहीं रह पाती हूँ??..या हर समय क्यों पढ़ती रहती हूँ ??........... ये मेरे लिए बहुत विकट प्रश्न है..........मैं कुछ भी पढ़ सकती हूँ.....अगर पढने के लिए कुछ नहीं है तो पंचांग और रेलवे टाइम टेबल से लेकर फ़ोन डाइरेक्टरी तक ....झाडू लगते वक़्त कूड़े में पड़े चिरकुट तक सब कुछ पढ़ लेती हूँ......और मजे की बात है सबमे कुछ न कुछ अच्छा मिल ही जाता है....
मम्मी के नहीं रहने पर जो उनके लिए पूजा इत्यादि हुई थी....उस वक़्त पूजा के लिए कपूर जिस पुडिया में लपेट कर लाया गया था......वो पुडिया संयोग वश मैंने ही खोली........और आदतन उसमे .....लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ पढने का लोभ ......नहीं संवरण कर पाई.....और मुझे देख कर बड़ी ही हैरत और दुःख हुआ...कि वे पंक्तियाँ किसी ...बच्चे ने अपनी माँ के लिए लिखी थी...........शायद किसी डायरी का पन्ना था वो.......उस माँ के लिए जो शायद घर छोड़ के चली गई थी या दुनिया छोड़ के ........ये साफ़ नहीं था...पर उस बच्चे का पूरा दुःख बयां हो रहा था........वो पृष्ठ आज भी मेरे पास सुरक्षित है........हम सभी मम्मी के लिए दुखित थे......उसमे उस पृष्ठ ने जैसे मरहम का काम किया.......
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मुझे किताबों से अच्छा कोई गिफ्ट नहीं लगता ........आज ही नहीं बचपन से ही किताबो के प्रति जो मेरा प्रेम भाव बना हुआ है..........(बेशक कोर्स की किताबों को छोड़ कर ) वो आज भी वैसे ही बरकरार है......किताबों को देख कर ............मैं खुद को रोक ही नहीं पाती..............अगर मुझसे पूछा जाये .............जीवन में सबसे सुखद क्षण कौन से होंगे आपके लिए.?? .......तो मैं यही कहूँगी.....छुट्टी का दिन......साफ़ स्वच्छ बिस्तर......हाथ में चाय से भरा मेरा मनपसंद बड़ा मग ...जो मेरे बेटे Chitrarth Tewariने मुझे गिफ्ट किया है......(जिस पर लिखा है ..यू आर द बेस्ट मदर .).......और मेरे मनपसंद साहित्यकार.........(जिनकी लिस्ट बहुत लम्बी है ) की खूब बढ़िया किताब... ......नहाने धोने और खाने की कोई जल्दी नहीं........ इस से ज्यादा बढ़िया दिन मेरे लिए और कोई नहीं हो सकता ...........
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मेरी अब तक की पढी हुई किताबों में शिवानी की लगभग सभी रचनाएं.... विष्णु प्रभाकर की"आवारा मसीहा" नागर जी की "नाच्यो बहुत गोपाल", "खंजन नयन", शिवाजी सावंत की "मृत्युंजय" विमल मित्र की "सुरसतिया",खरीदी कौड़ियों के मोल", "इकाई दहाई सैकड़ा"," साहब बीवी और गुलाम ", अखिलन की" "चित्रप्रिया" आशापूर्णा देवी की " प्रथम प्रतिश्रुति "मैत्रेयी पुष्पा दी की" चाक", "इदन्नमम""गुडिया भीतर गुडिया"अमृता प्रीतम की सारी रचनाएं, इस्मत चुगताई और मंटो की कई किताबें,, मन्नू भंडारी की "आपका बंटी ".निर्मल वर्मा की" एक चिथडा सुख" और धर्मवीर भारती की " गुनाहों का देवता" याद आ रही है.....वैसे तो अनगिनत हैं कितनों का नाम लूं😊😊