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2.4.12

महामूर्ख मेला

रविवार, 1 अप्रैल 2012, अंतर्राष्ट्रीय मूर्ख दिवस के अवसर पर बनारस के राजेन्द्र प्रसाद घाट पर हमेशा की तरह इस वर्ष भी 43वें महामूर्ख मेले का आयोजन हुआ। मेले का शुभारंभ सिद्ध संचालक पंडित धर्मशील चतुर्वेदी के मंच माईक से उच्चारित चीपों-चीपों की गर्दभ ध्वनि और नगाड़े की गूँज से हुआ। जर्मनी से आईं मिस बेला ने अलबेले अंदाज में शुभकामनाएं अंग्रेजी में पढ़ीं बाद में उसका हिंदी अनुवाद भी पढ़ कर सुनाया गया। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डा0 लक्ष्मण प्रसाद दुल्हन बने ठुमकते-लजाते तो उनकी पत्नी दूल्हे के भेष में इतराते-इठलाते नजर आईं। अशुभ लग्न सावधान ! की जोरदार घोषणा के साथ अगड़म-बगड़म मंत्रोच्चारण प्रारंभ हुआ। प्रसिद्ध गीतकार पं0 श्री कृष्ण तिवारी ने मंच पर खड़े हो ऊट पटांग मंत्रोच्चार से विवाह संपन्न करावाया। हर वर्ष तो यह विवाह मंच पर पहुँचते-पहुचते  टूट जाता था लेकिन इस बार पति-पत्नी का रोल घर में ही अदल बदल हो जाने के कारण  दोनो ने हमेशा एक दूसरे का साथ निभाने का  वादा किया। इसके अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। उन्हें घर भी जाना था।

विवाह संपन्न हो चुकने के पश्चात हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसमें न जाने कहां कहां से आये अड़े-बड़े कवियों ने रात्रि 12 बजे तक खूब अंड-बंड कविता सुनाकर हजारों मूर्ख समुदाय से ठहाका लगवाकर, खिसियाये कबूतरों, गंगा में तैरती मछलियों, दूर खदेड़ दिये गये सांड़ों और भी न जाने कितने जीव जंतुओं  को चमत्कृत किया। वैसे मंच पर भी एक सांड़ विराजमान थे जिन्हें बनारस के लोग उनके अथक श्रम और अमेरिका काव्य पाठ रिटर्न होने के कारण बहुत बड़ा कवि सांड़ बनारसी मान लेते हैं। काशी के बड़े बड़े साहित्यकार, छोटका गुरू, बड़का गुरू, भवकाली गुरू, आश्वासन गुरू मेरा मतलब सभी प्रकार के बुद्धिजीवी दो पाये यहाँ उपश्थित होकर मूर्ख कहलाये जाने पर गर्व महसूस कर रहे प्रतीत हो रहे थे। वास्तव में कर रहे थे या नहीं यह तो उनकी आत्मा ही जानती है। मैने अभी तक किसी को सामने से मूर्ख कहने की हिम्मत जुटाने का प्रयोग नहीं किया है। आपने किया हो तो बता सकते हैं। इस मेले में मूर्ख कहाने में गर्व महसूस करने के पीछे वही कारण हो सकता है जिससे हमारे देश में भ्रष्टाचार पल्लवित है। अरे वही वाला भाव... जैसे सब, वैसे हम, काहे करें शरम !  कवि भी चुन चुन कर ऐसी कविताएं सुना रहे थे जो मूर्ख को भी समझ में आ जाय। यह अलग बात है कि तालियाँ मिलने पर कवि महोदय खुश हो हो कर बनारस की जनता को बुद्धिमान बताने  का कोई मौका भी नहीं छोड़ रहे थे।:) 

सभी कवियों का तो नहीं लेकिन मेले में सतना, मध्य प्रदेश से आये कवि अशोक सुन्दरानी जिनको सर्वश्रेष्ठ कवि का पुरस्कार भी मिला, उनकी कविताई की कुछ झलक यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूँ। वे सबके दिवंगत हो चुकने के बाद अंत में रात्रि 12 बजे के करीब मंच पर आये और अपनी काव्य प्रतिभा से सबको मस्त कर दिया। इससे पहले जबलपुर से पधारीं कवयित्रि अर्चना अर्चन ने बुजुर्गों को वैलिडिटी खतम, आउट गोइंग बंद कह कर मजाक उड़ाया था तो  सबसे पहले उन्होने मंच पर खड़े होते ही बनारस के बुढ्ढों की तारीफ में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिये...

जलते हुए कोयले पर बाई दवे अगर सफेद राख जमा हो जाय अर्चना तो यह भ्रम कभी मत पालना कि अंदर आग नहीं होती। 

इतना सुनना था कि पूरी भीड़ उछलकर हर हर महादेव का नारा लगाने लगी। उन्होने आगे कहा...

ये जितने बुजुर्ग तुम्हारे सामने बैठे हैं अर्चना, ये आदरणीय तो हो सकते हैं लेकिन विश्वसनीय कतई नहीं हो सकते। बनारस के बुजुर्ग यदि सिगरेट पीते हों...सिगरेट का तंबाकू खतम हो जाये तो आधे घंटे तक फिल्टर में मजा लेते हैं। इसीलिए कहता हूँ... हे अर्चना ! 

मत उलझना कभी बनारस के इन बड़े-बूढ़ों से
ये सुपारी तक फोड़ देते हैं, अपने चिकने मसूढ़ों से। 

इसके बाद उन्होने ढेर सारे चुटकुले सुना कर लोगों को मस्त कर दिया, साथ ही एक अच्छी व्यंग्य कविता भी सुनाई जिस कविता ने उन्हें मेले का सर्वश्रेष्ठ कवि बनाया। कविता का शीर्षक था 'जूता'। मैं चाहता तो था कि उसे यहाँ चलाऊँ ! मेरा मतलब है कविता लिख कर पढ़ाऊँ मगर ई डर से नहीं लिख रहे हैं कि कहीं आप हमारा ब्लगवे पढ़ना ना छोड़ दें..अपनी पढ़ा-पढ़ा कर झेलाता ही था अब दूसरों की भी लम्बी-लम्बी झोंक रहा है!:) 

मोबाइल से टेप किया हुआ पॉडकास्ट लगा रहा हूँ । कुछ चुटकुलों साथ ही 'जूते' का भी मजा लीजिए।



(चित्र जागरण याहू डाट काम से साभार। मेले के संबंध में अधिक जानकारी जागरण समाचार से  प्राप्त कर सकते हैं)



1.4.12

मूर्खता


मूर्ख भी कई प्रकार के होते हैं। घरेलू, सरकारी, बाजारी, मोहल्लाधारी, गंवई, शहरी, प्रादेशीय, राष्ट्रीय या फिर अंतर्राष्ट्रीय।  साधारण मनुष्य तो अपनी औकात झट से पहचान लेते हैं मगर कोई भी ब्लॉगर खुद को अतंराष्ट्रीय फेम से कम का नहीं समझता। यही कारण है कि अंतराष्ट्रीय मूर्ख दिवस में हमें भी अपनी मूर्खता सिद्ध करने का मन हो रहा है। जब बाबा राजनीति में टांग फंसा कर अपनी मूर्खता सिद्ध कर सकते हैं। नेता घूसखोरों के चक्कर में पूरी पार्टी को मूर्ख बना सकते हैं। अधिकारी यह जानते हुए भी कि सत्ता बदलते ही उन्हें उनके किये की सजा मिल सकती है, जनता को लूट सकते हैं। मंत्री सत्ता के मद में यह भूल सकते हैं कि उन्हें फिर जनता के बीच जाना है तो हम किसी से किस मामले में कम हैं ? आखिर हम भी तो इसी धरती के ब्लॉगर हैं !

मूर्खता सिद्ध करना कोई कठिन काम नहीं है। रात भर जाग कर, दूसरों के ब्लॉग में घूम-घूम कर बहुत सुंदर..! बहुत खूब..! वाह..! वाह..! आपकी प्रस्तुति बहुत अच्छी है। आदि लिखने से भी सभी समझ जायेंगे कि हम कितने उच्च कोटि के हैं ! मगर महामूर्ख सिद्ध करने के लिए इतना ही काफी नहीं हैJ वैसे भी हम ऐसे वैसे तो हैं नहीं, अंतर्राष्ट्रीय हैं। आखिर आज के दिन हमारी प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। हमको इतनी घटिया कविता लिख कर दिखानी है जिसे पढ़कर श्रेष्ठ कोटि के ब्लॉगरों को भी वाह! वाह! लिखने में किसी प्रकार के शर्म का एहसास ना हो। तो लिखना शुरू करता हूँ एक उच्च कोटि की घटिया कविता जिसका शीर्षक पहले ही लिख देता हूँ.. मूर्खता ! यकीन मानिए अभी तक कविता का कोई प्लॉट मेरी उल्टी खोपड़ी में नहीं आया है। बस अपनी मूर्खता पर इतना विश्वास है कि मैं मूर्खता शीर्षक से कोई मूर्खता पूर्ण कविता तो लिख ही सकता हूँJ

मूर्खता

एक तमोली ने
उगते सूरज को देखा
और देखते ही समझ गया
कि सूरज
पान खा कर निकला है !

दिन भर
इस चिंता में डूबा रहा
कि सूरज ने पान
किसकी दुकान से खरीदा होगा ?

पान के पत्ते कतरते वक्त
क्रोध में डूबा
यही भ्रम पाले रहा
कि वह
पान के पत्ते नहीं
सूरज के
पंख कतर रहा है !

उसने
जब मुझे अपना दर्द बताया
तो मुझे लगा
उसके हाथ में
कैंची नहीं, कलम है !
और वह
सूरज का नहीं
कागज पर
किसी भ्रष्ट नेता का
पंख कतर रहा है !!

कहीं वह
पिछले जनम में
कवि तो नहीं था !
आखिर इतनी मूर्खता
दूसरा
कौन कर सकता है !!
……………………………..

मैं कह रहा था न ! मैं लिख सकता हूँ ? अब तो आप मान ही गये होंगे कि इस अंतराष्ट्रीय मूर्ख दिवस में अपनी भी कोई हैसियत है