27.12.09
कमरे की खिड़कियाँ खुली रखना......
20.12.09
ये गहरी झील की नावें .......
13.12.09
"दंश"
सर जमीन पर हो पैर आसमान पर
आपका ज्यादा समय नष्ट किया अतः कविता की भूमिका में न जाते हुए प्रस्तुत है आज की कविता जिसका शीर्षक है--
"दंश"
उजा़ले में
कुतिया ने बच्चे दिए
जाड़े में
एक-दो नहीं पूरे सात
ठंड से बचाती रही वह उन्हें
पूरी रात
सबके सब सुंदर प्यारे थे
माँ की आँखों के तारे थे
सुबह तक एक खो चुका था
शायद अल्लाह का प्यारा हो चुका था
बचे छः
सह गयी वह
कष्ट दुःसह।
कोई पास से गुजरता तो गुर्राती
दिन भर यहाँ-वहाँ छुपाती
फिर आती हाड़ कंपा देने वाली काली रात
बच्चों को चिपकाती अपने स्तन से
सारी रात
उफ !
रात भर उसका रोना
मुश्किल था हमारा सोना
सुबह तक एक और खो चुका था
शायद किसी का हो चुका था
यमराज ले जाए या आदमी
बच्चे गुम हो रहे थे
कुतिया को गिनती नहीं आती
पर इतना जानती
कि बच्चे
कम हो रहे थे
कातर निगाहों से
उन्हीं से मदद की उम्मीद करती
जो अब
हल्की गुर्राहट से भी डरने लगे हैं
हाथों में डंड़ौकी ले
घरों से निकलने लगे हैं।
दिन गुजरते जाते हैं
एक-एक कर पिल्ले गुम होते जाते हैं।
एक दिन बर्तन माजने वाली बताती है-
कुतिया का सिर्फ एक पिल्ला बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा....!
मेरी पत्नी पूछती है-
पिल्ले को छोड़, तू बता
तेरा छोटू आज काम पर क्यों नहीं आया ?
वह बताती है-
उसका बाप उसे मुम्बई ले गया है
वहाँ एक बहुत बड़ा साहब रहता है
अब वह वहीं रहेगा
एक हैजा से मर गया
दूसरा अपने से भाग गया
यही बचा था
इसे भी इसका बाप ले गया
कहते-कहते उसकी आँखें डबडबा गईं।
मैने सुना
बर्तन मांजते-मांजते
बीच-बीच में बड़बड़ाती जाती है-
कुतिया का सिर्फ एक बच्चा बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा..!
मैने महसूस किया
एक वफादारी
दूसरे निर्धनता का दंश
झेल रहे हैं।
6.12.09
लिंग भेद
हमारे एक मित्र हैं यादव जी
बड़े दुःखी थे
पूछा तो बोले-
सुबह-सुबह मन हो गया कड़वा
बहू को लड़की हुई भैंस को 'पड़वा'।
मैने कहा-
अरे, यह तो पूरा मामला ही उलट गया
लगता है 'शनीचर' आपसे लिपट गया !
फिर बात बनाई
कोई बात नहीं
लड़का-लड़की एक समान होते हैं
समझो 'लक्ष्मी' आई।
सुनते ही यादव जी तड़पकर बोले-
अंधेर है अंधेर !
लड़की को लक्ष्मी कहें
तो पड़वा को क्या कहेंगे ?
कुबेर !
पंडि जी-
झूठ कब तक समझाइयेगा
हकीकत कब बताइयेगा ?
आज जब कन्या का पिता
अपनी पुत्री के लिए वर ढूंढने निकलता है
तो
वर का घर "दुकान"
वर का पिता "दुकानदार"
वर "मंहगे सामान" होते हैं
कैसे कह दूँ कि लड़का-लड़की एक समान होते हैं।
आपने जीवन भर
लड़की को लक्ष्मी
लड़के को खर्चीला बताया
मगर जब भी
अपने घर का आर्थिक-चिट्ठा बनाया
पुत्री को दायित्व व पुत्र को
संपत्ति पक्ष में ही दिखाया।
मैने कहा-
ठीक कहते हैं यादव जी
पाने की हवश और खोने के भय ने
ऐसे समाज का निर्माण कर दिया है
जहाँ-
बेटे
'पपलू' बन आते हैं जीवन में
बेटियाँ
बेड़ियाँ बन जती हैं पाँव में
भैंस को मिल जाती है जाड़े की धूप
पड़वा ठिठुरता है दिन भर छाँव में।
इक्कीसवीं सदी का भारत आज भी
बहरा है शहर में
गूँगा है गाँव में।
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पड़वा- भैंस का नर बच्चा ।
पपलू- ताश के एक खेल का सबसे कीमती पत्ता.
29.11.09
चिड़िया
आज रविवार है। कविता पोस्ट करने का दिन। पिछली कविता नारी क्रंदन को जो स्नेह मिला इसके लिए मैं सभी का आभारी हूँ। आज जो कविता पोस्ट करने जा रहा हूँ वह इसके पूर्व हिन्द युग्म में प्रकाशित हो चुकी है । इसकी आलोचना भी हुई है लेकित मुझे इतनी प्रिय है कि इसे मैं अपने ब्लाग पर प्रकाशित करने का मोह नहीं छोड़ पा रहा हूँ। मुझे लगा कि बेचैन आत्मा के जन्म के बाद मुझे पाठकों का एक नया समूह मिला है जिन्हें यह कविता अवश्य पढ़ाई जानी जानी चाहिए। प्रस्तुत है कविता जिसका शीर्षक है-चिड़िया।
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चिड़ि़या उडी
उसके पीछे दूसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे तीसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे चौथी चिड़िया उड़ी
और देखते ही देखते पूरा गांव कौआ हो गया।
कौआ करे कांव-कांव ।
जाग गया पूरा गांव ।
जाग गया तो जान गया
जान गया तो मान गया
कि जो स्थिति कल थी वह आज नहीं है
अब चिड़िया पढ़-लिख चुकी हैं
किसी के आसरे की मोहताज नहीं है ।
अब आप नहीं कैद कर सकते इन्हें किसी पिंजडे़ में
ये सीख चुकी हैं उड़ने की कला
जान चुकी हैं तोड़ना रिश्तों के जाल
अब नहीं फंसा सकता इन्हें कोई बहेलिया
प्रेम के झूठे दाने फेंक कर
ये समझ चुकी हैं बहेलिये की हर इक चाल
कैद हैं तो सिर्फ इसलिये कि प्यार करती हैं तुमसे ।
तुम इसे
इनकी नादानी समझने की भूल मत करना ।
इन्हें बढ़ने दो,
इन्हें पढ़ने दो,
इन्हें उड़ने दो,
इन्हें जानने दो हर उस बात को जिन्हें जानने का इन्हें पूरा हक़ है ।
ये जानना चाहती हैं
कि क्यों समझा जाता है इन्हें 'पराया धन' ?
क्यों होती हैं ये पिता के घर में 'मेहमान' ?
क्यों करते हैं पिता 'कन्या दान' ?
क्यों अपने ही घर की दहलीज़ पर दस्तक के लिए
मांगी जाती है 'दहेज' ?
क्यों करते हैं लोग इन्हें अपनाने से 'परहेज' ?
इन्हें जानने दो हर उस बात को
जिन्हें जानने का इन्हे पूरा हक है ।
रोकना चाहते हो,
बांधना चाहते हो,
पाना चाहते हो,
कौओं की तरह चीखना नहीं,
चिड़ियों की तरह चहचहाना चाहते हो....
तो सिर्फ एक काम करो
इन्हें प्यार करो।
इतना प्यार करो कि ये जान जायँ
कि तुम इनसे प्यार करते हो !
फिर देखना...
तुम्हारा गांव, तुम्हारा घर, तुम्हारा आंगन,
खुशियों से चहचहा उठेगा।
22.11.09
नारी क्रंदन
पिछली बार की गंभीर कविता के पश्चात इस बार मेरा मन एक हल्की-फुल्की कविता पोस्ट करने का हो रहा है। जब मैने "मेरी श्रीमती" पोस्ट की तो बहुत से पाठकों ने इस प्रकार संवेदना प्रकट किया मानों मैं कोई पत्नी शोषित पुरूष हूँ। नीलम जी तो मानों तलवार लेकर भाजने लगीं। इसी नारी-विमर्श को ही आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है हास्य-व्यंग्य विधा पर आधारित कविता - नारी क्रंदन।
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मैं 'नरक पालिका' की टोंटी
तुम मनमर्जी चल देते हो
मैं टप-टप नीर बहाती हूँ
तुम सैंया सरकारी बाबू
मैं हूँ भारत की जनता सी
तुम रोज देर से आते हो
मैं भूखी ही सो जाती हूँ
तुम अच्छे खासे नेता हो
मैं भोली-भाली वोटर हूँ
तुम झूठ बोलते रहते हो
मैं कलियों सी खिल जाती हूँ
तुम छुट्टे सांड़ बनारस के
मैं खूँटे पर की गैया हूँ
तुम हो प्रतीक आजादी के
मैं प्रश्न-चिन्ह बन जाती हूँ
जब मैं आई थी धरती पर
माँ तड़प रही थीं तानों में
इक सर्पदंश था सीने में
मैं बीन बनी थी कानों में
जब तुम आए थे धरती पर
तब गूँज रही शहनाई थी
माँ झूम रही थी खुशियों में
तुम झूल रहे थे बाहों में
जब से धरती पर हुआ जनम
खुशियाँ तेरी मेरे हैं गम
तुम दमके हो मोती बनकर
मैं छलकी हूँ आंसू बनकर
मैं अब भी अबला नारी को
लुटते जलते ही पाती हूँ
दिल नफरत से भर जाता है
बस जल-भुन कर रह जाती हूँ
अब नहीं-नहीं हे पती देव
अब आगे लक्ष्मण रेखा है
तुमने अब तक शायद केवल
बिजली गिरते ही देखा है
जो बुझ न सके इंसानों से
मैं प्रलयकारिणी दंगा हूँ
अच्छा है भ्रम बना रहे
तुम परमेश्वर मैं गंगा हूँ
15.11.09
आज वे.....
आज रविवार है और छोटे से 'ब्लाग अनुभव' के बाद मैंने यह निश्चय किया है कि मैं प्रत्येक रविवार को एक रचना पोस्ट करूँ ताकि पाठकों को भी मालूम हो कि रविवार को 'बेचैन आत्मा' अपनी 'नई बेचैनी' के साथ उपश्थित होगा।
चलते-फिरते सामान्य आदमियों से जब भय लगने लगता है तो मन करता है कि कोई बेचैन आत्मा मिले जिससे मन की बेचैनी कही जा सके, जिसके मन की बेचैनी सुनी जा सके और क्षमा करें चाहे वे खुद को किसी नाम से पुकारें मुझे तो सभी ब्लागर अपनी तरह 'बेचैन आत्मा' ही नज़र आते हैं।
आज मैं 'पिता' और 'माँ' के क्रम में उन अनाम पिताओं-माताओं की बात करना चाहता हूँ जिन्होंने मुझे तो नहीं जना लेकिन जिन्हें देखकर मेरे मन में गहरी पीड़ा होती है और उन कपूतों पर गहरा क्षोभ जिन्होंने उन्हें घर से निकाल कर एक वृद्धाश्रम के कमरे में मरने के लिए छोड़ दिया। यह कविता ऐसे ही एक वृद्धाश्रम से आकर बेचैन हुए मन की उपज है। प्रस्तुत है कविता जिसका शीर्षक है- 'आज वे' ।
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आज वे
आश्रम के कमरों में
मानवता की खूँटी से
लटके हुए हैं
ज्यों लटकते हैं घड़े
नदी तट पर
पीपल की शाख से
माटी के ।
एक दिन वे थे
जो देते गंगाजल
एक दिन ये हैं
जो मारते पत्थर
दर्द से जब तड़पते हैं
एक-दूजे से कहते हैं
अपने सिक्के ही खोटे हैं
रिश्ते
जाली के ।
थे जिनके
कई दीवाने
थे जिनके
कई अफ़साने
आज
दर-ब-दर भटकते हैं
सबकी आँखों में
खटकते हैं
अब न मय न मयखाने
होंठ प्यासे हैं
साकी के ।
धूप से बचे
छाँव में जले
कहीं ज़मी नहीं
पाँव के तले
नई हवा में
जोर इतना था
निवाले उड़ गए
थाली के ।
क्या कहें!
क्यों कहें!!
किससे कहें!!!
ज़ख्म गहरे हैं
माली के ।