Showing posts with label नवगीत. Show all posts
Showing posts with label नवगीत. Show all posts

12.2.26

बसंत

आ! बसंत मंजर-सा हँसने

मेरे ताश महल में


पिछले बरस चली थी आँधी 

महल उड़ा, तिनके-सा

मैं तो खुद कुछ देख न पाया

बिखर गया मनके-सा


क्यों बिजली हर बार गिरेगी

मेरे आस महल में?


ओरे-बोरे दर्द छुपाया

आँसू कथरी-कथरी 

टांका बस पैबंद उम्र भर

भटका नगरी-नगरी


कमी नहीं कोई पाओगे

मेरे चहल-पहल में


क्या निर्धन की किस्मत में है

शीत, ताप ही सहना

क्या अमीर के कब्जे में ही

तुमको हरदम रहना


बना लिया क्या डेरा नियमित

तुमने राज महल में!

.... @देवेन्द्र पाण्डेय।

5.7.18

लगता है पानी बरसेगा...

लगता है पानी बरसेगा, बदरी छाई है।

ठहर ठहर टपके है
पानी
कभी भाप उठता
उमस भरा मौसम है,
कौआ
कांव-कांव करता
लगता है पानी बरसेगा, बिल्ली आई है।

घिर घिर आए काले बादल
मन दादुर सा उछला
उड़ उड़ जाए काले बादल
दिल विरहन सा बैठा
लगता है आंखें बरसेंगी, ठोकर खाई है।

धूप छांव की आंख मिचौली
रास नहीं आती
अपने आंगन बारिश वाली
रात नहीं आती

लगता है किस्मत ने थाली, फिर सरकाई  है। 

5.6.11

ये कोई और है.....!


प्रस्तुत है विश्व पर्यावरण दिवस को समर्पित एक नवगीत जो वर्ष 2002 में  उत्तर प्रदेश के नौ कवियों के काव्य संग्रह, काव्य स्वर में प्रकाशित है।

कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ.....                                      


कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ
बच्चों के हाथों में डोर है।

शहरों की आबादी जब बढ़ी
खेतों में पत्थर के घर उगे
कमरों में सरसों के फूल हैं
चिड़ियों को उड़ने से डर लगे।

कटने लगी आमों की डालियाँ
पिंजड़े में कोयल है मोर है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ.....]

प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैं
अम्बर को छूते मकान हैं
मिटा दे हमें जो इक पल में
ऐसे भी बनते सामान हैं।

उड़ने लगी धरती की चीटियाँ
पंखों में सासों की डोर है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ.....]

सूरज पकड़ने की कोशिश ने
इंसाँ को पागल ही कर दिया
अपनी ही मुठ्ठी को बंद कर
कहता है धूप को पकड़ लिया।

दिखने लगीं जब अपनी झुर्रियाँ
कहता है ये कोई और है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ.....]

............................................................
(चित्र गूगल से साभार)

9.12.10

मन की गाँठें खोल

..............................

खुल्लम खुल्ला बोल रे पगले
खुल्लम खुल्ला बोल ।
मन की गाँठें खोल रे पगले
मन की गाँठें खोल ।।

मैं अटका श्वेत-स्याम में
दुनियाँ रंग-बिरंगी
कठिन डगर है, साथी वैरी
चाल चलें सतरंजी

गर्जन से क्या घबड़ाना रे
ढोल-ढोल में पोल ।
मन की गाँठें खोल रे पगले
मन की गाँठें खोल ।।

काम, क्रोध, लोभ, मोह से
कभी उबर ना पाया
ओढ़ी तो थी धुली चदरिया
फूहड़, मैली पाया


खुद को धोबी बना रे पगले
सरफ ज्ञान का घोल ।
मन की गाँठें खोल रे पगले
मन की गाँठें खोल ।।

20.12.09

ये गहरी झील की नावें .......


आज रविवार है, कविता पोस्ट करने का दिन। आलोचना के प्रस्ताव में आप सभी की प्रतिक्रिया बेहद रोचक रही। यह बात सच है कि बहुत से लोग मात्र कविता का आनंद लेते हैं, कविता की समीक्षा या आलोचना करना विद्वानों का काम है। यह बात भी समझ में आ गई कि मेरी तरह बहुत से कवि भावों की अभिव्यक्ति को ही सर्वोपरी मानते हैं भाषा-व्याकरण के विद्वान नहीं हैं लेकिन यह बात भी सत्य है कि अपने को कविता जैसी लगती है वैसी ही प्रतिक्रिया होनी चाहिए। हम एक दूसरे को उनकी त्रुटियाँ का ग्यान, स्वस्थ मन से कराते रहें तो मेरी समझ से सभी का भला होगा। यह भी जरूरी नहीं कि कमियाँ बताने वाला सही ही हो. वह, उस समय उसे जैसा लगता है, वैसा लिख रहा होता है, इसमें किसी को बुरा भी नहीं मानना चाहिए। बहरहाल मेरा एक उद्देश्य आप सभी से संवाद कायम करना भी था जिसमें मैं पूर्णतया सफल हूँ तथा आपकी प्रतिक्रियाओं से अति उत्साहित भी .

आज एक गीत पोस्ट करने का मन है। मैं एक बार 'नेपाल' के खूबसूरत पहाड़ी पर्यटन स्थल 'पोखरा' गया था। वहाँ की सुंदरता ने मुझे मोहित कर दिया। सभी का वर्णन करने लगूँ तो यह पोस्ट अधिक लम्बी हो जाएगी। वहाँ हरी-भरी पहाड़ियाँ तो हैं ही कंचनजंगा की खूबसूरत हिम-श्रृंखलाओं से घिरी इस पहाड़ी घाटी में तीन खूबसूरत झीलें भी हैं। बनारस की गंगा नदी में नाव चलाने वाले बनारसी ने जब वहाँ के 'फेवा ताल' में अपनी नैया चलाई तो मन में कुछ ऐसे भाव जगे कि गीतकार न होते हुए भी इस गीत ने जन्म ले लिया। प्रस्तुत है गीत...........



ये गहरी झील की नावें....



ये गहरी झील की नावें
नदी की धार क्या जानें !

रहती हैं ये पहरों में,
डरती हैं ये लहरों से।
उछलती हैं किनारों में,
थिरकती हैं हवाओं से।

जो आशिक हैं किनारों के
भला मझधार क्या जाने !

वो गिरना तुंग शिखरों से,
अज़ब का दौड़ मैदानी।
फ़ना होना समन्दर में,
गज़ब का प्रेम हैरानी।

ये ठहरे नीर की नावें
नदी का प्यार क्या जानें !

अगर है मौत रूकना तो,
बहना ही तो जीवन है।
यदि हों शूल भी पथ में,
चलना ही तो जीवन है।

जो डरते हैं खड़े हो कर
भला संसार क्या जाने !

ये गहरी झील की नावें
नदी की धार क्या जानें !

3.11.09

मेरी श्रीमती


गंभीर कविताएँ पढ़कर भारी हुए मन को हल्का करने के लिए प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य विधा पर एक कविता जिसका शीर्षक है -मेरी श्रीमती।

----------------------------------------------------------------------------


प्रश्न-पत्र गढ़ती रहती है
वह मुझसे लड़ती रहती है।

मुन्ना क्यों कमजोर हो गया ?
शानू को कितना बुखार है ?
राशन पानी खतम हो गया
अब किसका कितना उधार है ?

दफ्तर से जब घर जाता हूँ
वह मुझको पढ़ती रहती है।

सब्जी लाए भूल गए क्या ?
चीनी लाए भूल गए क्या ?
आंटा चक्की से लाना था
खाली आए भूल गए क्या !


मुख बोफोर्स बनाकर मुझ पर
बम-गोले जड़ती रहती है।

प्रश्नों से जब घबड़ाता हूँ
कहता अभी थका-मांदा हूँ
कहती कैसे थक सकते हो
तुम नर हो, मैं ही मादा हूँ !

मुझको ही झुकना पड़ता है
वह हरदम चढ़ती रहती है।

पूरे घर की प्राण वही है
हाँ मेरी भी शान वही है
हीरो-होण्डा दिल की धड़कन
चेहरे की मुस्कान वही है

बनके सतरंगी रंगोली
आँगन में कढ़ती रहती है।

प्रश्न-पत्र गढ़ती रहती है
वह मुझसे लड़ती रहती है।