28.3.10

पानी की मार



बचपन में
जब जाता था परीक्षा देने या
जब जाते थे पिताजी घर के बाहर दूर किसी काम से
तो माँ
झट से रख देतीं थीं दरवाजे पर दो भरी बाल्टियाँ
कहती थीं-
शुभ होगा।
आज
जब निकलना चाहता हूँ घर के बाहर
तो पत्नी
झट से रख देती है दरवाजे पर दो खाली बाल्टियाँ
इस अनुरोध के साथ
कि पहले ले आइए पड़ोस से दो बाल्टी पानी़, प्लीज....
घर में एक बूंद नहीं है पीने के लिए।
पहले
पिताजी डांटते थे
कि बिना स्नान-ध्यान किए
सुबह-सुबह खाली मस्तक बाहर जा रहे हो
अपना तो जीवन चौपट कर ही रहे हो
क्यों दूसरों का भाग्य भी बिगाड़ते हो ?
मैं डरते-डरते पूछता-
दूसरों का कैसे पिताजी !

वो समझाते-
बिना हाथ में झाड़ू लिए जमादार या
बिना मस्तक पर चंदन लगाए ब्राम्हण का बच्चा
सुबह-सुबह दिख जाए तो भारी अशुभ होता है
क्योंकि ब्राम्हण का कर्म है
सुबह-सुबह उठकर स्नान-ध्यान करना
जमादार का कर्म है- झाड़ू लगाना
जो ऐसा नहीं करते वो कर्महीन हैं
और कर्महीन का दर्शन भी अशुभ होता है।
आज
जब मेरा बेटा
मेरे द्वारा मुश्किल से लाए पानी की बाल्टी को खाली करना चाहता है
तो डांटता हूँ--
रोज नहाना जरूरी है क्या ?
घर में पीने के लिए पानी नहीं है और लाट साहब चले स्नान करने!
अकेले में सोचता हूँ

कैसे बदल जाते हैं संस्कार
जब पड़ती है पानी की मार !

आज
घर से बाहर निकलते ही
दिखते हैं जगह-जगह
कूड़े के ढेर, खाली बाल्टियाँ
मगर नहीं दिखते कभी
ब्राम्हण के बच्चे।

तो क्या सर्वत्र अशुभ ही अशुभ?
कर्महीन तो कोई नहीं दिखता!

दिखाई देती है -
भागम भाग
पीछे छूटने का भय, आगे निकलने की होड़!
लोगों की आंखों मे नहीं दिखाई देती
करूणा की बूंद
दिखती है-
तो सिर्फ एक गहरी प्यास।

बेमानी लगती हैं सागर छलकाती मस्त निगाहों की बातें
लगता है कि
धीरे-धीरे
लोग होते जा रहे हैं
बे-पानी
धीरे-धीरे
गिरता जा रहा है
धरती का जलस्तर।

21.3.10

एक हिंदी गज़ल



क्या तेरा क्या मेरा पगले
चार दिनों का फेरा पगले

छोरी-छोरा छुट जाएंगे
उठ जाएगा डेरा पगले

पत्थर का दिल क्यों रखता है
तन माटी का ढेरा पगले

बिन दीपक ना मिट पाएगा
अंधियारे का घेरा पगले

सूरज सा चमका है जग में
जिसने तन मन पेरा पगले

मूरख क्यों करता गुरुआई
एक गुरु सब चेरा पगले



14.3.10

तू है कौन, कौन हैं तेरे

आज रविवार है. कविता पोस्ट करने का दिन. मार्च ..वित्तीय वर्ष का अंतिम महिना, बच्चों की परीक्षा और उसपर चैत की मस्ती. अपने 'नववर्ष' के आगमन की आहट भी पुलकित कर दे रही है मन को. माँ दुर्गा की पूजा, नवरात्री का मेला और नव दिन का व्रत. गेहूँ की लहलहाती सुनहरी फसलें, आम के बौर में दिखते छोटे-छोटे टिकोरे और...और भी बहुत कुछ जो इस वक्त याद नहीं आ रहा. एक यह नववर्ष है और एक वो ...हाड़ कंपा देने वाली ठंड वाला...! अरे, अपने देश के लोगों ने अपने मौसम के खूबसूरत पलों को नववर्ष और त्योहारों के लिए चुना, अंग्रेजों ने अपने मौसम के अनुसार. हम उनकी नक़ल करने के चक्कर में अपनी अच्छाईयों, अपने आनंद और अपने नववर्ष को क्यों भूलें..!

आज मन कुछ आध्यात्मिक हो रहा है . मैंने भी नवगीत की तर्ज पर एक भजन लिखा है जिसे आज पोस्ट करता हूँ . आपकी प्रतिक्रिया मुझे राह दिखाती है . प्रस्तुत है भजन ......


तू है कौन, कौन हैं तेरे



ताल-तलैया पी कर जागा
नदी मिली सागर भी मांगा
इतनी प्यास कहाँ से पाई
हिम से क्यों मरूथल तक भागा

क्यों खुद को ही, रोज छले रे
तू है कौन, कौन हैं तेरे

सपनों को अपनों ने लूटा
एक खिलौना था जो टूटा
छोड़ यहीं सब झोला-झंखड़
चल निर्जन में यह जग झूठा

भज ले राम, राम हैं तेरे
तू है कौन कौन हैं तेरे

घट पानी का पनघट ढूँढ़े
भरे लबालब मद में डूबे
सर चढ़ कर जब लगे डोलने
ठोकर खाए खट से फूटे

जो संभले वो पार लगे रे
तू है कौन कौन हैं तेरे।

7.3.10

भवानी दीदी



एक थी भवानी दीदी
कहते थे जिसे सभी
पगली !

सुबह-सबेरे
बरामदे में बैठकर
बीनती थी कंकड़
फेंकती थी चावल
गाती थी गीत
"आ चरी आ.... फुर्र उड़ी जा"!

चीखते-चिल्लाते आती थी माँ....

"पगली, यह क्या कर रही है !
सारा चांवल चिड़ियों को ही खिला देगी क्या ?"

ताली पीट-पीट खिलखिलाती थी वह

वैसे ही जैसे
खुशी में पंख फड़फड़ाती है
गौरैया

देखो-देखो
सब मेरे पास बैठी थीं
वह भी...वह भी...वह भी
यहाँ....यहाँ...यहाँ

दिखाती थी वह
माँ को
घर का कोना-कोना
फिर पैर पटक
रूठ जाती सहसा
आपने सब भगा दिया !

उसकी रसीली आँखें
बुदबुदाते होंठ
बिखरे बाल
भूखे-प्यासे पंछी की तरह चहचहाने लगते.

माँ देखती तो बस देखती रह जाती....

दीदी की पुतलियों में 'चाँद'
गालों में 'सूरज'
होठों में 'गुलाब'
और कमर तक झूलते
'काले बादल'

देखते ही देखते
माँ के पलकों की कोरों में सिमटकर
सूप के शेष बचे चावंल में ढरक कर
विलीन हो जाती
'भवानी दीदी'.

तीस साल बाद....
माँ की इच्छा पर
जाते हुए उसके गाँव
उसकी ससुराल
उसके घर
कदम दर कदम
याद आती गयी
बचपन की याद
और भवानी दीदी.

वह दिखी
आँगन में बैठी
बच्चों के साथ खेलती
बुदबुदाती
बड़बड़ाती
वैसी ही
पगली की पगली.

मैं उसके समीप बैठ गया
पूछा...
पहचाना मुझे !
जोर-जोर से चीखा...
"आ चरी आ..फुर्र उड़ी जा.."

वह चिहुंक कर खड़ी हो गई !
घूरती रही देर तक
मैं भी देखता रहा उसे
अपलक!

पुतलियाँ
अंधियारी सुरंग
गालों में
मरुस्थली झुर्रियाँ
होंठ
सिगरेट की जली राख
बाल
जेठ की दुपहरिया में उड़ते छोटे-छोटे बादल

मैंने सिहर कर
ओढ़ा दिया उसपर
माँ का भेजा हुआ 'प्यार'

वह फुदकने लगी सहसा
आँगन-आँगन

वैसे ही जैसे
फुदकती थी कभी
बरामदे में गौरैया
और
भवानी दीदी.

( चित्र गूगल से साभार)

28.2.10

छाना राजा...

सभी को होली के शुभ अवसर पर भांग की ठंडाई, एक बीड़ा मस्त बनारसी मगही पान और ढेरों शुभकामनाएँ
मेरी कामना है कि आप सपरिवार होली की मस्ती में यूँ डूब जाएँ कि आस पास की लहरों को भी पता न चले.



छाना राजा...

काहे हौआ हक्का-बक्का !
छाना राजा भांग-मुनक्का !

पेट्रोल, डीजल, दाल, बढ़े दs
चीनी कs भी दाम बढ़े दs
आपन शेयर मस्त चढ़ल हौ
आपस में सबके झगड़े दs

देखा तेंदुलकर कs छक्का
काहे हौआ हक्का-बक्का !

रमुआं चीख रहल खोली में
आग लगे ऐसन होली में
कहाँ से लाई ओजिया-गोजिया
प्राण निकस गयल रोटी में

निर्धन कs नियति में धक्का
काहे हौआ हक्का-बक्का !

भ्रष्टाचार बढ़ल, बढ़े दs
शिष्टाचार मिटल, मिटे दs
बीच बजरिया नामी नेता
छमियाँ के रगड़े, रगड़े दs

घड़ा पाप कs फूटी पक्का
काहे हौआ हक्का-बक्का !

21.2.10

फागुन का त्यौहार

फागु का त्यौहा
जले होलिका भेदभाव की, आपस में हो प्यार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार
हो जाएँ सब प्रेम दीवाने
दिल में जागें गीत पुराने
गलियों में सतरंगी चेहरे
ढूँढ रहे हों मीत पुराने
अधरों में हो गीत फागुनी, वीणा की झंकार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार
बर्गर, पीजा, कोक के आगे
दूध, दही, मक्खन को खाये !
कान्हां की बंसी फीकी है
राधा को मोबाइल भाये !
इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार
अपने सोए भाग जगाएँ
दुश्मन को भी गले लगाएँ
जहाँ भड़कती नफ़रत-ज्वाला
वहीं प्रेम का दीप जलाएँ
भंग-रंग पर कभी चढ़े ना, महंगाई की मार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार.

14.2.10

भांग में बहुत मजा हौ



महाशिवरात्रि के दिन 'बाबा' का दर्शन कर लौट रहा था. सुबह से बारिश हो रही थी और पूरी तरह भींग चुका था. गोदौलिया चौराहे पर एक मित्र मिल गया. वह जानता था कि मैं कविता लिखता हूँ और शतरंज भी खेलता हूँ. वह मुझसे भांग और ठंडाई पीने का अनुरोध करने लगा. मैं घबड़ा गया. बोला, " यह तो संभव ही नहीं है. भांग मुझे सूट नहीं करता." वह नहीं माना, मुझे जबरदस्ती ठंडाई की दुकान पर ले गया. भांग खिलाई, ठंडाई पिलाया और जो कहा वह हू-ब-हू यहाँ लिख रहा हूँ. आशा है आपको मजा आयेगा, बनारस की मस्ती और काशिका बोली से रू-ब-रू होने का अवसर मिलेगा. प्रस्तुत है कविता - भांग में बहुत मजा हौ. आप चाहें तो भांग छानकर भी 'वेलेंटाइन' का मजा ले सकते हैं.


भांग में बहुत मजा हौ




भांग छान के जब लिखबा तs लिखबा ऊँची चीज

जबरी खिलाइब भांग रजा तू हौवा ऊँची चीज

सुतबा तs सुतले रह जइबा उठबा तs नचबा राजा

उड़बा नील गगन में जा के परियन से मिलबा राजा



भांग में बहुत मजा हौ.



खेलबा जब शतरंज तs चलबा घोड़ा साढ़े तीन

हार के पाकिस्तानी भगलन अब पटकाई चीन

तोहरे मन शहनाई बाजी भौजी के लागी बीन

देर रात तक खेलबा तs पटकाई खाली टीन



भांग में बहुत मजा हौ.



लइकन के महतारी तोड़ी तू उनके पुचकरबs

उठा के गोदी बहुत प्यार से उनसे जब ई पुछबs

केकर बेतवा हौवा बोला पापा क कि अम्मा कs

तोहार नाम केहू ना लेई बोलिहैं खाली अम्मा कs



भांग में बहुत मजा हौ. ..