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9.5.15

अब भला क्यों सजन, धूप में!

आग लगती है ठन्डी हवा
तुम कहाँ हो? सजन, धूप में

हर तरफ बिछ रही चांदनी
चल रहा हूँ सजन, धूप में

मेरे पलकों ने बादल बुने
लो सजन ओढ़ लो, धूप में

बन के बदरी अगर तू चले
फिर घनी छाँव है, धूप में

दिन ढला, साँझ दीपक जले
अब कहाँ हो? सजन, धूप में

जाने कब से खड़ा द्वार पर
अब भला क्यों सजन, धूप में!

23.10.12

सड़क पर जिंदगी

मेरे हाथ में श्री आनंद परमानंद  जी की पुस्तक है..सड़क पर जिन्दगी। इस पुस्तक में 101 नायाब हिंदी गज़लें हैं। पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा...गद्य सी अपठित हुई हैं छंद जैसी लड़कियाँ। इस पर एक दो कमेंट आलोचना के भी आए। एक दिन परमानंद आनंद जी को अपने घर बुलाउंगा और उन्हीं से प्रतिक्रिया पूछ कर लिखूँगा। उनकी  एक गज़ल यहाँ भी लिख चुका हूँ।  आज इस पुस्तक की पहली गज़ल पढ़ाता हूँ....

सड़क पर जिंदगी है इस जगह कोई न बंधन है।
यहां छोटा-बड़ा हर आदमी, जनता है या जन है।

अवन्ती, कांची, काशी, अयोध्या और यह मथुरा,
सड़क के पांवतर उज्जैन है, अजमेर, मधुवन है।

भले हों व्यास, तुलसी दास, ये रविदास वो कबिरा,
जिसे दुनियाँ पढ़ा करती है, सड़कों का ही चिंतन है।

सड़क की धूल जब उड़ती है, तो आकाश छूती है,
सड़क की सोच ऊँची है, सड़क का एक दर्शन है।

ये बेघर और ये मजदूर, झुग्गी-झोपड़ी वाले,
समझते हैं सड़क इनका ही मालिक और मलकिन है।

ग़रीबी किस जगह जाती अगर सड़कें नहीं होतीं,
ग़रीबों का यहीं संसार है, घर-द्वार आंगन है।

ये सारा विश्व सोता है, मगर सड़कें नहीं सोतीं,
ये सबको जोहती हैं, जागतीं इनका ये जीवन है।

सड़क को छोड़ने वाला कभी घर तक नहीं पहुँचा,
ये घर तक भेजतीं सबको, यही इनका बड़प्पन है।

मेरी कविता यही सड़कें हैं, इनको रोज पढ़ता हूँ,
सड़क तुमको नमन् मेरा, तेरा सौ बार वन्दन है।
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28.1.12

माँ सरस्वती



तूने दिया है प्यार माँ
स्वीकार कर आभार माँ

माता-पिता कोई नहीं
बस तू ही है आधार माँ

मेरा नहीं तेरा ही है
जो कुछ भी है घर-बार माँ

कोई न था बस तू ही थी
जब था बहुत लाचार माँ

आशीष दे लड़ता रहूँ
जितना भी हो अंधियार माँ

फिर फूल सरसों के खिले
आ मूर्त हो इस बार माँ

छू लूँ चरण इक बार मैं
भव से मुझे अब तार माँ

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विशेषः बसंत पंचमी चाहे 9 फरवरी, 1962 को आये चाहे 28 जनवरी 2012 को, है तो जन्म दिन !

(चित्र गूगल से साभार)

31.12.11

लोकपाल की याद में.....


अस्सी में...पप्पू की अड़ी पर बैठा था। लोकपाल बिल पर बड़ी गरमा गरम बहस के बीच मैने कहा.."खौला चकाचक गुनगुना हो गया है, भारी गदा था झुनझुना हो गया है।" सभी कहने लगे..बहुत सही...आगे ? आगे घर आकर लिखा। अली सा से पूछा कि ठीक है ? वे बोले, "यहां-यहां गड़बड़ है बाकी सब ठीक है।" दूसरे वाले शेर के पहले मिसरे में खामियाँ बता कर वो बोले, "आप गज़ल लिख रहे हो, मतलब मुसीबत में हो। मैं मुसीबत मोल नहीं लेता।" मैने हामी भरी। गज़ल लिखना मतलब मुसीबत मोल लेना ही है। जो कहना चाहते हैं उसे  गज़ल में अभिव्यक्त कर पाना बड़ा ही कठिन काम है। उनके कहे अनुसार दूसरे शेर को सुधार दिया। वैसे भी समय कम मिलता है। तीन दिन बाद यह गज़ल पूरी हुई मान कर प्रकाशित कर रहा हूँ। इसमें आप भी प्रयास कर सकते हैं तो करें..और अच्छी गज़ल बन जाय। नव वर्ष 2012 में आप सभी पर ( मेरे बाद ) सरस्वती की कृपा बनी रहे। आप सभी बहुत अच्छा लिख पायें और खूब कमेंट पायें। अभी प्रस्तुत है बड़ी मेहनत से लिखी यह गज़ल ..झूठी तारीफ मत कीजियेगा । सही-सही बताइये कि कैसी है ?


खौला चकाचक गुनगुना हो गया है
भारी गदा था झुनझुना हो गया है।

मैली सही पर डुबकियाँ तो लगाओ
थैला अचानक दो गुना हो गया है।

गन्दा नहाता ही कहाँ सर्दियों में
चन्दन लगा कर चुनमुना हो गया है।

कैसी शरम किसका रहम-ओ-करम है
अपना 'सरौता' रहनुमा हो गया है।

हाकिम हमेशा जो कहे वो सही है
आदेश पढ़कर कुनमुना हो गया है।

पप्पू दुकनियाँ बड़बड़ाता बहुत है
घर में अकेले भुनभुना हो गया है।

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24.9.11

रखता हूँ अपनी जेब में अब छुपा के हाथ...


गज़ल लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। यह विधा मुझे बहुत कठिन लगती है। कभी कभार हिमाकत कर बैठता हूँ। गलतियाँ बतायेंगे तो सुधारने का प्रयास करूंगा। सुधार देंगे तो और भी अच्छी बात हो जायेगी।


गुजरे हैं फिर करीब से वो उठा के हाथ
करते थे बात देर तक जो मिला के हाथ

वादे पे उनके हमको इतना यकीन था
करते थे याद नींद में हम हिला के हाथ

उठ जाये ना भूल से फिर उनको देखकर
रखता हूँ अपनी जेब में अब छुपा के हाथ

मिल जायेगा अगर कहीं पहुँचा हुआ फकीर
पूछेंगे इसका राज तब हम दिखा के हाथ

करता हूँ अब तो दूर से सबको मैं सलाम
जब से गई है जिंदगी मुझसे छुड़ा के हाथ

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21.3.10

एक हिंदी गज़ल



क्या तेरा क्या मेरा पगले
चार दिनों का फेरा पगले

छोरी-छोरा छुट जाएंगे
उठ जाएगा डेरा पगले

पत्थर का दिल क्यों रखता है
तन माटी का ढेरा पगले

बिन दीपक ना मिट पाएगा
अंधियारे का घेरा पगले

सूरज सा चमका है जग में
जिसने तन मन पेरा पगले

मूरख क्यों करता गुरुआई
एक गुरु सब चेरा पगले