2.1.12

घर



बड़े शहर में
सहमा सहमा
एक बड़ा  
खंडहर रहता है
एक कमरा है
उस कमरे में
प्यारा सा इक
घर रहता है।

पति देव
बड़े कर्मठी
खुशमिजाज
पत्नी रहती है
बड़ी हो चुकी
दो पुत्रियाँ
सीधा सा
बेटा रहता है।

बड़ा है कमरा
उस कमरे में
पूरब दिशा
दो चौकी रहती
पश्चिम में
बाबूजी की
हिलने वाली
खटिया रहती
उत्तर में
टीवी रहती है
दख्खिन में
चौका बर्तन है
एक कोने 
अलमारी रहती
एक कोने में
फ्रिज रहता है
कमरे में
घुसते ही दायें
लोहे का बक्सा रहता है
एक ताखे में
उस्तक पुस्तक
एक ताखे
ईश्वर रहता है।

गर्मी में
पूरा कमरा
एसी का मजा देता है
जाड़े में
एक ही हीटर
सबको गर्मी दे देता है
वर्षा में
जब छत चूता है
बिस्तर में
बल्टी आ जाती
सुनते हैं
सब सहमे सिकुड़े
टप टप टप टप
क्या गाती है !  
बाबूजी की
खटिया पर भी
एक बगोना
हंसने लगता
टीवी प्लॉस्टिक
ओढ़ चुपाता
गद्दा करवट
बदल के सोता
जाहे जिस मौसम में जाओ
घर हरदम
हंसता रहता है
उस घर का
हर इक कोना
खुश होकर
मिलता रहता है।

टीवी कहती
कथा कहानी
मोबाइल
बातें करती है
बरतन
चटपट करते रहते
बेलन भी
हंसता रहता है।

डिबिया
लढ्ढू लेकर आती
स्वच्छ गिलास
आता पानी ले
प्लेट
पकौड़ी लेकर आता
कप चमकीली
चाय गरम ले
और जब मैं
चलने लगता
पनडब्बा भी
मुस्काता है।

बड़े शहर में
सहमा सहमा
एक बड़ा  
खंडहर रहता है
एक कमरा है
उस कमरे में
प्यारा सा इक
घर रहता है।
  
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1.1.12

आग लगे ब्लॉगिंग तोहार....!



12 तक 11 था
अगले ही पल 12 था
अब 12 कहे
तेरा करूँ
दिन गिन गिन के
इंतजार
आजा प्यारे
13 हमार।

रतिया जगाये कम्पूटर हमें
भिनसहरे उठाये मोबाइल हमें
बाहर जो निकला कि घूमूं जरा
बारिष ने चौचक भिगोया हमें

सूरज दिखा ना नये साल का
समझा ना मतबल इस बवाल का
सोचा चलो अब ब्लॉगिंग करें
स्वागत करें हम नये साल का

14 भी आयेगा
15 भी आयेगा
16 भी आयेगा
एक दिन वो आयेगा
रहोगे ना तुम
और रहेंगे ना हम
दुनियाँ से मिटेगा
कभी भी ना गम
कहेंगे सभी पर चूकेंगे ना

तेरा करूँ
दिन गिन गिन के
इंतजार
आजा प्यारे
फलाने हमार।


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नये साल में बूंदा-बांदी
काटो राजा घर में चाँदी
बीबी प्यार करेगी चौचक
छोड़ो गर ब्लागिंग का चक्कर
वह तो कहती कई जनम से
तेरा करूँ....

तेरा करूँ
दिन गिन गिन के
इंतजार
आग लगे ब्लॉगिंग
तोहार।

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नमस्कार !
नये साल में मिले सभी को
प्रिय का
भरपूर प्यार
आप पहिले दिन हमको पढ़े
इसके लिए
ढेर सारा आभार
आयेंगे आपके ब्लॉग पर भी
बाहर बरसात हो रही है
अउर दफ्तर में छुट्टी है
कितना करेंगे
बीबी से प्यार !
नमस्कार।
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31.12.11

12 तक 11 होगा



12 तक 11 होगा 
अगले  पल फिर 12 होगा
एक लाभ तो  हुआ सुनिश्चित 
11 से अब 12 होगा

बड़े लोग हैं बड़े दिवाने 
रात रात भर दुआ करेंगे
इक दूजे को बड़े प्यार से
देखेंगे और छुआ करेंगे

बजा-बजा कर बम पटाखा
रात रात भर धुआँ करेंगे
दुःख देंगे धरती माता को
हमको भी सोने ना देंगे 

लगता है 
सबका सारा गम 
अब तो नौ दो ग्यारह होगा
नई सुबह की पौ फटते ही
पौ सबका अब 
बारह होगा

ले लो-ले लो 
मेरी बधाई
नींद आ गई 
सो जायेंगे
अंधियारे जो माल कटेगा
धर देना
उठकर खायेंगे

एक लाभ के स्वप्न लोक में
घूमो यारों 
तभी मजा है
एक बरष की उम्र कम हुई
सोचोगे तो 
क्या पाओगे।

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नव वर्ष मंगलमय हो।






लोकपाल की याद में.....


अस्सी में...पप्पू की अड़ी पर बैठा था। लोकपाल बिल पर बड़ी गरमा गरम बहस के बीच मैने कहा.."खौला चकाचक गुनगुना हो गया है, भारी गदा था झुनझुना हो गया है।" सभी कहने लगे..बहुत सही...आगे ? आगे घर आकर लिखा। अली सा से पूछा कि ठीक है ? वे बोले, "यहां-यहां गड़बड़ है बाकी सब ठीक है।" दूसरे वाले शेर के पहले मिसरे में खामियाँ बता कर वो बोले, "आप गज़ल लिख रहे हो, मतलब मुसीबत में हो। मैं मुसीबत मोल नहीं लेता।" मैने हामी भरी। गज़ल लिखना मतलब मुसीबत मोल लेना ही है। जो कहना चाहते हैं उसे  गज़ल में अभिव्यक्त कर पाना बड़ा ही कठिन काम है। उनके कहे अनुसार दूसरे शेर को सुधार दिया। वैसे भी समय कम मिलता है। तीन दिन बाद यह गज़ल पूरी हुई मान कर प्रकाशित कर रहा हूँ। इसमें आप भी प्रयास कर सकते हैं तो करें..और अच्छी गज़ल बन जाय। नव वर्ष 2012 में आप सभी पर ( मेरे बाद ) सरस्वती की कृपा बनी रहे। आप सभी बहुत अच्छा लिख पायें और खूब कमेंट पायें। अभी प्रस्तुत है बड़ी मेहनत से लिखी यह गज़ल ..झूठी तारीफ मत कीजियेगा । सही-सही बताइये कि कैसी है ?


खौला चकाचक गुनगुना हो गया है
भारी गदा था झुनझुना हो गया है।

मैली सही पर डुबकियाँ तो लगाओ
थैला अचानक दो गुना हो गया है।

गन्दा नहाता ही कहाँ सर्दियों में
चन्दन लगा कर चुनमुना हो गया है।

कैसी शरम किसका रहम-ओ-करम है
अपना 'सरौता' रहनुमा हो गया है।

हाकिम हमेशा जो कहे वो सही है
आदेश पढ़कर कुनमुना हो गया है।

पप्पू दुकनियाँ बड़बड़ाता बहुत है
घर में अकेले भुनभुना हो गया है।

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23.12.11

दुश्मन कहीं का..!



सुबह ने कहा..

बहुत ठंड है, सो जाओ।

दिमाग ने कहा

उठो ! ऑफिस जाओ !!

धूप ने कहा..

यूँ उंगलियाँ न रगड़ो
आओ ! मजे लो।

दिमाग ने कहा

बहुत काम है !

शाम ने कहा….

घूमो ! बाजार में बड़ी रौनक है।

दिमाग ने कहा...

घर में पत्नी है, बच्चे हैं, जल्दी घर जाओ !

रात ने कहा...

मैं तो तुम्हारी हूँ
ब्लॉग पढ़ो ! कविता लिखो।

दिमाग ने कहा...

थक चुके हो
चुपचाप सो जाओ !

हे भगवान !
तू अपना दिमाग छीन क्यों नहीं लेता !!

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17.12.11

वृक्षों की बातें



भोर की कड़ाकी ठंड में, घने कोहरे की मोटी चादर ओढ़े गहरी नींद सो रहे पीपल की नींद, नीम की सुगबुगाहट से अचकचा कर टूट गई। झुंझलाकर बोला, तुमसे लिपटे रहने का खामियाजा मुझे हमेशा भुगतना पड़ता है ! इत्ती सुबह काहे छटपटा रहे हो ?” नीम हंसा..वो देखो..! वे दोपाये मेरी कुछ पतली टहनियाँ तोड़ ले गये। देर तक चबायेंगे। पता नहीं क्या मजा मिलता है इन्हें ! पीपल ने उन्हें ध्यान से देखा और बोला, हम्म...ये हमें भी बहुत तंग करते हैं। कल एक गंजा फिर आया था मेरी शाख में मिट्टी का घड़ा बांधने । समझता है मैं घड़े से पानी पीता हूँ। तब तक आम ने जम्हाई ली...लगता है सुबह हो गई। तुम लोग इन दोपायों की छोटी मोटी हरकतों से ही झुंझला जाते हो ! ये तो रोज मेरी डालियों को काटकर ले जाते हैं। जलाकर आग पैदा करते हैं फिर घेर कर गोल-गोल बैठ जाते हैं। इसमे उनको आनंद आता है। उनकी बातें सुनकर, घने जंगली लताओं के आगोश में दुबके, पूरी तरह सूख चुके, पत्र हीन कंकाल में बदल चुके एक बूढ़े वृक्ष की रूह भीतर तक कांप गई ! उसने लताओं से फुसफुसा कर कहा...सुना तुमने..! तुम ही मेरे सहारे नहीं पल-बढ़ रहे हो। मैं भी तुम्हारे सहारे जीवित हूँ। जब तक लिपटे हो तुम मुझसे, इन दोपायों की नज़रों से दूर हूँ मैं। शाम को एक बुढ्ढा दोपाया, छोटे-छोटे बच्चों के साथ अक्सर यहां आता है। मैने सहसूस किया है कि वह मुझे देख बहुत खुश होता है और बच्चों को अपने सीने से लगा लेता है।

नीचे, पेड़ों के पत्तों से धरती पर टप टप टप टप अनवरत टपक रही ओस की बूंदों से निकलती स्वर लहरियों में डूबी एक बेचैन आत्मा, इन वृक्षों की बातों से और भी बेचैन हो, धीरे से सरक जाती है।  
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11.12.11

ओ दिसंबर !



ओ दिसंबर !
जब से तुम आये हो
नये वर्ष की, नई जनवरी
मेरे दिल में
उतर रही है।

ठंडी आई
शाल ओढ़कर
कोहरा आया
पलकों पर
छिम्मी आई
कांधे-कांधे
मूंगफली
मुठ्ठी भर-भर  
उतर रहे हैं लाल तवे से
गरम परांठे
चढ़ी भगौने
मस्त खौलती
अदरक वाली चाय।

ओ दिसम्बर !
जब से तुम आये हो
उम्मीदों की ठंडी बोरसी
अंधियारे में
सुलग रही है।

लहर-बहर हो
लहक रही है
घर के दरवज्जे पर
ललछौंही आँखों वाली कुतिया
उम्मीद से है
जनेगी
पिल्ले अनगिन
चिचियाते-पिपियाते
घूमेंगे गली-गली
भौंकेंगे
कुछ कुत्ते
नये वर्ष को
आदत से लाचार ।

ओ दिसंबर !
जब से तुम आये हो
गंठियाई मेरी रजाई
फिर धुनने को
मचल रही है।

भड़भूजे की लाल कड़ाही
दहक रही है
फर फर फर फर
फूट रही है
छोटकी जुनरी
वक्त सरकता
धीरे-धीरे
चलनी-चलनी
काले बालू से
दुःख के पल   
झर झर झरते
ज्यों चमक रही हो
श्यामलिया की
धवल दंतुरिया।

ओ दिसम्बर !
जब से तुम आये हो
इठलाती नई चुनरिया
फिर सजने को
चहक रही है।
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