30.4.18

लोहे का घर -42

आज बनारस से छपरा रूट वाले लोहे के घर में बैठे हैं। सद्भावना सही समय पर चल रही है। इस रूट में भीख मांगने वाले बहुत मिलते हैं। अभी औड़िहार नहीं आया और चार भिखारी एक एक कर आ चुके। एक दोनों हाथ से लूला था, दूसरा रोनी सूरत लिए लंगड़ा कर चल रहा था, तीसरा अंधा था और चौथी एक महिला थी जिसके गोद में बच्चा था। मैंने किसी को कुछ नहीं दिया। जैसे रोज रोज समाचार देख/पढ़ कर व्यक्ति कठुआ जा रहा है वैसे रोज रोज के रेल सफर ने मुझे निर्मोही बना दिया है। अंधे लूले भिखारी को देख कर भी दया नहीं आती। लगता है कोई गिरोह है जो इनसे यह काम करा रहा है।
(पांचवी अंधी प्रौढ़ भिखारिन पूरे राग से भीख मांगते हुए गुजरी। उसके साथ अल्मूनियम का कटोरा पकड़े १० वर्षीय अबोध बालिका थी।)
कल युग ने कलियुग जल्दी ला दिया। आम आदमी के लिए महानगरों में अपने भी अजनबी की तरह कन्नी काट जाते हैं, छोटे शहरों में अजनबी भी ऐसे मिलते हैं जैसे पुरानी जान पहचान हो। शायद यही कारण है कि बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहर मुझे अधिक अच्छे लगने लगे हैं। लोहे के घर में बैठते ही गाजीपुर, बलिया, छपरा के लोग बड़े प्रेम से घुलमिल जाते हैं। बोली मीठी और मीठी होती चली जाती है।
पकौड़ा स्टेशन (औड़िहार) आया और चला गया। यात्री बड़े चाव से पकौड़ी खा रहे हैं। इस ओर के यात्री भी जानते हैं कि यहां पकौड़ा मिलता है और पकौड़ी बेचने वाले भी जानते हैं कि चाहे बेसन में आटा मिलाकर खिला दो, लोग खरीदेंगे जरूर।
इधर खेतों के वही दृश्य हैं जो बनारस जौनपुर मार्ग के हैं। कहीं खेत साफ हो चुके हैं तो कहीं गेहूं के ढेर के ढेर रखे हुए हैं। कहीं कहीं कटाई भी नहीं हुई है। धूप तेज है। कभी घने वृक्ष की छांह पकड़े डोरी से बंधे चौपाए दिख जाते हैं।
इस रूट में लोकल वेंडर भी खूब चढ़ते हैं। कोई चना भूजा चटनी बेच रहा है, कोई आइस्क्रीम बेच रहा है, कोई पानी बेच रहा है तो कोई लठ्ठा नमकीन। बारी-बारी से वेंडर भांति-भांति की आवाजें निकालते हुए आ जा रहे हैं। ताली पीटने वालों का दल भी गुजर चुका। अभी तक ट्रेन किसी क्रासिंग की वजह से नहीं रुकी, चलती चली जा रही है। गाजीपुर आ गया।
एक भीड़ का छोटा सा रेला चढ़ा है। किसी के पास रिजर्व बर्थ नहीं है। सभी साधिकार एक दूसरे को घिसका कर बैठ रहे हैं। थोड़ी देर की किच किच है, कोई लफड़ा नहीं है। सभी समायोजित हो गए। घर ने नए सदस्यों को अपना लिया। कुछ देर बाद आपस में बातें होंगी। अभी चढ़ी महिला की गोदी से उतर एक बच्चा अपने पापा से उनके मोबाइल के लिए छइला रहा है। पापा से मोबाइल छीन कर उन्हीं की गोदी में बैठ गेम खेल रहा है। पापा खिसिया रहे हैं.."साला आइसन मोबाइल आ गइल बा नू...!"
गाजीपुर से चली है ट्रेन। नए वेंडर और नए गले के नए सुर... समोसा गरम ताजा गरम खाइए भाई! गरम नहीं, पैसा नहीं। चssइया! चाय चाय। चाय पियो। ओए! ककरी। दस में दू गो। अलग अलग वेंडर, अलग अलग आवाजें। इन आवाजों के बीच किसी बच्चे के रोने की आवाज। एक बात नोटिस कर रहा हूं। अभी तक कहीं से कोई राजनैतिक बहस नहीं सुनाई पड़ी। देश की चिंता में कोई दुबला नहीं हो रहा है। सभी आम आदमी हैं, अपनी अपनी चिंता में डूबे हुए। 
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एक लड़की एक रजिस्टर लेकर चल रही है लोहे के घर में। बोल रही है..."मेरे पापा को लकवा मार दिया है, सिर्फ दो चार रुपया दे दो।" और कोई दया नहीं कर रहा, मै भी नहीं।
एक महिला एक जवान लड़की के साथ चलती है। कहती है..."बिटिया की शादी करनी है, दो चार रुपया दे दो।" और कोई दया नहीं कर रहा, मै भी नहीं।
एक अंधी भिखारिन एक मासूम लड़की के साथ पूरे राग से भीख मांगते हुए जा रही है। कटोरा बिटिया के हाथ में है। कोई दया नहीं कर रहा, मैं भी नहीं।
कितना निर्दयी समय है! कोई दुखियों पर दया नहीं करता, मैं भी नहीं।
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बाप का नया चप्पल पहन कर लड़का लोहे के घर के गेट में बैठा था। कुछ देर बाद मुंह बनाकर आया..
पापा!
का है बे?

एक चप्पल गिर गया! 

तब हम का करें? नंगे पैर चलना धूप में।
मेरा नहीं, आपका।
मेरा!!! मेरा नया चप्पल पहन कर गेट में क्यों बैठा था बे? बुड़बक साला। सात सौ में खरीदे थे। अब हम इसका क्या करें?(चप्पल हाथ में उठा कर।) रुको! बताते हैं। .और लड़का दूसरी बोगी में भाग गया।
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लोहे का घर-41


फिफ्टी डाउन दो घंटे लेट है। ट्रेन हो या महबूबा, लेट होना मिलन का शुभ संकेत है। हम टाइम से पहुंच नहीं सकते, वो टाइम पर आ गई तो हमारे लिए रुक नहीं सकती। सीटी बजाएगी और चल देगी। पकड़ना, चढ़ना और बैठ कर उखड़ती सांसों को ठीक करना हमारा काम है। कुछ तो चढ़ते ही बर्थ पकड़ कर लेट जाते हैं, कुछ पकड़ कर इतने भाव विभोर हो जाते हैं कि अब जाएगी कहां!
ट्रेन हवा से बातें कर रही है। खिड़कियों से आ रहे पवन के हर झोंके में चैत की खुशबू है। लोग सफ़र में थक जाते हैं, हमें सफ़र ही तरोताज किए है। जलाल गंज पुल से गुजरते हुए एक शोर उठा और सई नदी की आवाज बन ठंडी हवा के झोंके #आई_लव_यू बोल गए। हमने मन ही मन #थैंक्स कहा और मुस्कुरा दिया।
खालिसपुर में रुक कर फिर चल दी ट्रेन। कुछ आशिक चढ़े, कुछ उतर गए। नए वेंडर फिर शोर करते हुए आने/जाने लगे। दूर जाने वाले इत्मीनान की और नजदीक के यात्री चौकन्नी नींद ले रहे हैं। आस पास का माहौल ठंडा ठंडा है। एक बच्चा अभी दौड़ कर आगे गया है और उसकी मां यशोदा मैय्या की तरह पीछे पीछे भागी हैं। कल की तरह रास लीला करता कोई किसन कन्हैया नहीं है। पंजाब से आ रही है ट्रेन मगर अपने आस पास कोई पंजाबी परिवार नहीं है।
ये चाय बेचने वाले अजीब अजीब आवाज निकाल कर लोगों को आकर्षित करने और चाय के नाम पर गरम पानी पिलाने में बड़े माहिर होते हैं! अब आप इसका कोई और मतलब न निकालें प्लीज। सच लिखना वाकई बड़ा रिश्की काम है।
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ट्रेन में चढ़ो तो खुद को रेलवे को समर्पित कर दो। टाइम टेबल पर जरा भी ध्यान न दो। कब चढ़े, कितनी दूरी है, कब पहुंचेंगे जैसे प्रश्नों को मन में आने ही न दो। ट्रेन में चढ़ते ही यूं समझ लो कि अब आप कोमा में हैं। कब निकलेंगे? यह स्टेशन मास्टर भी नहीं जानता।
आप को रोक कर माल गाड़ी को आगे बढ़ाया जा सकता है। आप प्लेटफॉर्म पर ठगे से खड़े हो, मालगाड़ी को इधर से उधर, उधर से इधर आते/जाते देखते रहो। चिठ्ठी आती है, चिठ्ठी जाती है कि तर्ज पर आप कोई पैरोडी बना कर गा सकते हैं.. मालगाड़ी आती है, मालगाड़ी जाती है, अपनी वाली की बारी कभी नहीं आती है।
मित्रों को सलाह दिया जाता है कि भारतीय रेल के समय सारिणी के भरोसे घूमने का कोई प्रोग्राम न बनाएं। यात्रा तभी करें जब कोई मज़बूरी हो। प्रोग्राम बनाना जरूरी हो तो एक ट्रेन से दूसरी ट्रेन के बीच कम से कम चौबीस घंटे का फासला बना कर सीट रिजर्व कराएं। नहीं तो पता चला जब तक आप पहुंचेंगे, तब तक लौटने वाली ट्रेन छूट चुकी होगी।
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दून में रामनवमी मना कर लौट रहे यात्रियों के कारण भीड़ अधिक है। इस भीड़ में भी चार युवक दिलचस्प ढंग से सामने साइड अपर पर बैठ कर तास खेल रहे हैं। तीन खिलाड़ी साइड अपर बर्थ पर बैठे हैं और चौथा ठीक सामने वाली अपर बर्थ के एक कोने में अपना पिछवाड़ा टिकाए, साइड अपर पर अपनी दोनों टांगे जमाए पत्ते फेंक रहा है।
मेरे बगल के साइड अपर में धोती कुर्ता पहने एक बुजुर्ग इत्मीनान से सो रहे हैं। मेरे सामने के अपर बर्थ में दूसरे धोती कुर्ता वाले बुजुर्ग सो रहे हैं। इनकी बन्द पलकों के ऊपर चश्मा चढ़ा है जो ललाट की तरफ कुछ अधिक झुका है। लंबी नाक के नीचे घनी सफेद मूछें हैं। मूंछें काली होतीं तो नत्थू लाल के जैसी होती। घुटने तक धोती है और पैर के नीचे खुले मुंह वाला फटा बैग है। फटे बैग के भीतर से कुछ कपड़े बाहर झांकना चाहते हैं। ट्रेन के बदले बस होती तो उछल कर सभी नीचे गिर जाते। लोहे के घर में आम आदमी की गाड़ी ऐसे ही पटरी पर चलती रहती है और इज्जत ढकी रहती है।
साइड अपर के नीचे लोअर बर्थ पर जिसकी बर्थ है वह लेटा हुआ है और बाकी तीन लोग जिनके पास अपनी बर्थ नहीं है, मुश्किल से बैठे हुए हैं। तीनों के हाथों में मोबाइल है और तीनों अपने अपने धंधे में लगे हुए हैं। इन्हें देख ऐसा लग रहा है जैसे तीनों बहुत पढ़ने वाले बच्चे हों और गुरु जी ने कोई कठिन होम वर्क दिया हो!
मेरे सामने खिड़की वाली बर्थ पर एक प्रौढ़ बंगाली महिला अपने मोबाइल से देख देख एक कागज पर कुछ उतार रही हैं। इससे पहले बहुत देर तक मोबाइल में किसी से बहस कर रही थीं। उनके सामने यानी मेरे बगल में एक बंगाली जोड़ा अपने चेहरे पर गंभीरता ओढ़े बैठा है। पत्नी कभी कभार मुस्कुरा कर कुछ बोलती भी है तो पति आंखों के इशारे से ऐसे घूरता है कि उसे हर समय हंसना नहीं चाहिए। यह परिवार हरिद्वार से आ रहा है और हावड़ा जा रहा है। मेरे बनारस रुक कर घूमने की सलाह पर पत्नी तो खुश होकर मुस्कुरा दी मगर पती देव ने फिर आंखें तरेरीं! ये मध्यम वर्ग के पती देव टाइप लोग जब अपनी पत्नी के साथ सफ़र करते करते हैं तो थोड़े अधिक शंकालू, थोड़े अधिक बेचैन हो जाते हैं। कुछ लोग समझते हैं कि पत्नी को अपने सर पर भारी बोझ की तरह लादे संभल संभल कर चल रहे हैं। पत्नी जरा सा मुस्कुराई तो बैलेंस बिगड़ जाएगा और गृहस्थी की गाड़ी धड़ाम से गिर जाएगी।
सामने खिड़की के पास बैठी अकेली महिला अधिक आत्म निर्भर और खुश दिखाई पड़ रही हैं। इन्होंने अब खाना मंगा लिया है और वेंडर से बहस करने के बाद पूरे एक सौ तीस रुपए का भुगतान किया है। वेंडर ने जब समझाया कि दाल भात, रोटी सब्जी के साथ दो डिम भी है तब जाकर शांत हुईं। अब सामने निकले तख्ते को खींच कर उसमे खाना खोल कर सजा लिया है और एक एक कौर इत्मीनान से खाए जा रही हैं। भोजन के बाद उन्होंने फिर लिखना शुरू किया! मैंने मोबाइल से देख कर कागज पर लिखने का कारण पूछा.. क्या आप कहीं पढ़ाती हैं? महिला ने बंगाली में उत्तर दिया.. पढ़ाती नहीं हूं, पढ़ रही हूं! मेरे पती की मृत्यु हो चुकी है। मुझे कम्प्यूटर नहीं आता। मैं यह सीख लुंगी तो नौकरी मिल जाएगी! उसने मुझसे कहा है.. कम्प्यूटर सीख कर आओ तो नौकरी दे देंगे! आह! हंसते चेहरे के पीछे जमाने का दर्द और अनवरत चल रहे संघर्ष की पूरी कहानी है!!!
ट्रेन देर से एक स्टेशन पर रुकी है। अपर बर्थ पर बुजुर्ग वैसे ही सो रहे हैं। एक ने करवट बदला है और दूसरे की धोती कुछ और खुल गई है। तास खेलने वाले लेट चुके हैं और मोबाइल हाथ में लिए होमवर्क कर रहे यात्रियों में से एक ने शायद अपना सबक पूरा कर लिया है शेष दो वैसे ही मोबाइल में भिड़े हुए हैं।
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सरसों कट चुके। खेतों में खड़े थे तो फूलों को देख मन कितना हर्षित होता था! अब उनके ठूंठ के ढेर पड़े हैं। अब गेहूं की बालियां लहलहा रही हैं। ये भी कटेंगी एक दिन। जीवन का सब सौंदर्य जीवन के साथ रीत जाता है। शेष बचता है तो राख, मिट्टी, भूसा या फिर जलावन।
सूरज ढल रहा है। रोज उगना और ढलना इसकी नियति लगती है लेकिन विज्ञान कहता है न सूरज उगता न ढलता है। यह पृथ्वी है जो सूरज के चक्कर लगाती है। दृश्य और सत्य में कितना फर्क होता है! मृत्यु एक बार आती है, मृत्यु का भय जीवन भर डराता है। जिस दुख से जीवन भर भागते फिरते हैं, वही मृत्यु दुखों से निजात दिलाती है।
लोहे के घर में सूप लेकर भीख मांगने वाली भी आई है, ताली बजाकर रंगदारी वसूलने वाले छक्के भी चढ़े हैं। एक मांगने वाला दूसरे मांगने वाले को हिकारत की नजरों से देखता है। एक ही धंधे में लगे लोगों में आपस में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा होती है फिर चाहे लोहे के घर में पैसे मांगने वाले भिखारी हों, स्वर्ग की सीढ़ी चढ़ाने वाले मन्दिर के पुजारी हों या जनता से वोट मांगने वाले नेता। सभी एक दूसरे को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए अनैतिकता के पक्ष में तर्क देते हुए दिखते हैं।
सरसों के ठूंठ को देख एक प्रश्न तो उठता है मन में..इतने हाहाकरी के बाद जी रहे जीवन का हासिल क्या है? क्यों न जब तक जीयें सरसों के फूलों की तरह हंसते रहें और जब झरें, किसी चूल्हे की आंच बने। शायद मनुष्य की किस्मत में विधाता ने यह सौभाग्य नहीं लिखा। बहुत पुण्य किया तो लोगों ने उसकी मूर्ति बना दी। मूर्तियों का हाल तो आप देख ही रहे हैं।
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अपने मार्ग की ट्रेने लेट चल रही हैं आजकल। पटरियों में विकास दौड़ रहा है। किसी स्टेशन पर कोई स्टेशन मास्टर यह बताने की स्थिति में नहीं रहता कि अमुक ट्रेन कब आएगी और कब चलेगी। पूछो तो एक ही जवाब सुनने को मिलता है... कंट्रोलर जाने। कंट्रोलर कई सौ किमी दूर बैठता है। हर स्टेशन मास्टर को अपने कमरे के बाहर लिखवा के टांग देना चाहिए कि ट्रेन कब आएगी यह ऊपर वाला जाने। हानी,लाभ,जीवन,मरण, यश, अपयश हरि हाथ।
रेलवे ने हर श्रेणी के यात्रियों के लिए बाथरूम युक्त इतना बड़ा प्रतीक्षालय क्यों बनवाया है? प्रतीक्षा करने के लिए। ट्रेनें लेट न हों तो स्टेशन और स्टेशन के बाहर पकौड़े वालों को रोजगार आखिर कैसे मिलेगा? चाय की दुकान आखिर कैसे चलेगी? रेलवे भले खुद रोजगार न दे पाए रोजगार का सृजन तो कर ही रहा है। अब तो फ्री वाई फाई की सुविधा भी उपलब्ध है। नहाइए, धोइए, चाय पीजिए, पकौड़े खाइए और आराम आराम से फिलिम देखिए। रेलवे आपकी सुविधा का कितना ख्याल रखता है। ट्रेन चौबीस घंटे लेट हो जाए मगर आपसे कोई अतिरिक्त किराया वसूल नहीं करता। समय से घर जा कर ही क्या पहाड़ धकेल लेंगे? टीवी में समाचार सुनेंगे, फेसबुक/ वाट्सएप चलाएंगे या मोबाइल में कोई गेम खेलेंगे। ये सब काम तो लोहे के घर में भी हो सकता है।
जिन्हें मोबाइल चलाने नहीं आता उनकी जिंदगी बड़ी दुखदाई है। ट्रेन लेट होने पर लोहे के घर में बैठे वृद्ध यात्री इतनी रोनी सूरत बनाकर करवटें बदलते हैं कि क्या कहें! उन्हें यह नहीं पता होता कि तीस किमी दो घंटे में आई। ये तो बस यह जानते हैं कि दिन में घर पहुंच जाना था, अब तो रात हो गई!
मेरे सामने वाली बर्थ पर दो मध्यम वर्गीय परिवार की प्रौढ़ महिलाएं सोई हुई हैं। दुबली पतली हैं तो एक ही बर्थ पर एडजस्ट हो गईं। मध्यम वर्गीय वैसे भी परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने में माहिर होते हैं। महिलाएं लेटने से पहले बैठी थीं। बैठते बैठते बोर हो गईं तो लेट गईं। लेटे लेटे गहरी नींद में चली गईं। गहरी नींद में जाने से पहले कई बार करवटें बदल रही थीं। अब फाइनली गहरी नींद में हैं। क्या आपने कभी पानी से निकली हुई दो जिंदा मछलियों को तड़फते और तड़प तड़प कर शांत होते देखा है? मुझे न जाने क्यों बीच में मछलियों के तड़पने की याद हो आई।
मेरे बगल में वृद्ध आदमी बैठे हैं। ये प्रौढ़ महिलाओं के साथ हैं। सभी वृद्ध ट्रेन की धीमी चाल की चर्चा कर रहे हैं। जाहिर है लेट होने से दुखी हैं। ये सभी लंबी टूर पर हैं। हरिद्वार से चले हैं, बनारस में रुकेंगे और गया भी जाएंगे। आसाम के सीधे साधे साहसी यात्री हैं। सिंदबाद के समय भी साहसिक यात्राएं होती थीं, आज तो भारतीय रेल और बड़े बड़े प्रतीक्षालय हैं। यात्रा करना सभी के लिए सरल हो गया है। न जाने क्यों आजकल ट्रेन में यात्रा करते समय सिंदबाद की साहसिक यात्राओं का स्मरण हो जाता है!
#ट्रेन जलाल गंज में देर से रुकी है। जौनपुर आने में जब ६ किमी रह गया था और आने का समय नेट में 5.49 दिखा रहा था मैं स्टेशन के लिए चला था। 6 किमी आने में इसे एक घंटा लगा और अब तक २० किमी 1.30 घंटे में पहुंची है। अभी ४० किमी और जाना है। इस हिसाब से ६० किमी चलने में लगभग ५ घंटे लगने वाले हैं। ऐसा नहीं कि इसी ट्रेन का यह हाल है। यह देहरादून एक्सप्रेस है। इसके आगे भी ट्रेन खड़ी है, पीछे भी ट्रेन खड़ी है। पटरियों पर ट्रेनें चीटियों की तरह पंक्तिबद्ध हो चल रही हैं। आगे वाली चींटी रुकती है तो पीछे वाली भी रुक जाती है। कब पहुंचेगी यह ऊपर वाला जाने।
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आज लोहे के घर का मौसम कम्माल का है! गोदिया में लेटा हूं, खिड़की से आ रही है शिमला की ठंडी हवा और खिडकी के बाहर चौदहवीं का चांद पूरे शबाब पर है! लेट कर खिड़की से आकाश में झांको तो दूर ऊपर अपनी समस्त चन्द्र कलाओं के साथ मुस्कुरा रहा है चांद।
अंधेरे में डूबी है पूरी बोगी। अधिक रात हो चुकी है, सभी सो रहे हैं अपनी बर्थ पर। भीतर अंधेरा है, बाहर बिखरी है चांदनी। अभी गोमती के पुल से गुजरी है ट्रेन। चांदनी में नहा रही थी नदी। एक भी लहरें नहीं उठीं। कोई तरंग भी नहीं। झिलमिल चांदनी के पद चिन्ह दिखे। मछलियां और गहरे उतर गई होंगी कहीं तलहटी में।
आहा! क्या मस्त ठंडी ठंडी हवा बह रही है। ठंडी हवा के झोंके हल्के हल्के नहीं हैं, तेज तेज हैं। झोंके कभी हल्के हो ही नहीं सकते। जो हल्के होते हैं वे झोंके नहीं हो सकते। पंकज उधास ने जो ग़ज़ल गाई, न जाने कैसे उसके झोंके हल्के हल्के थे!
चांद गुम हो गया! अभी खिड़की से बाहर झांका तो देखा ट्रेन की छत के ऊपर छुप गया। कोई सुंदरी छुप जाती हो जैसे दरवज्जे के ओट में। सुनती रहती हो पर्दे के पीछे खड़ी खड़ी सभी बातें! वैसे ही गुम हो गया चांद! पटरियों पर उछल उछल हवा से बातें कर रही है #ट्रेन। सूरज न दिखे, धूप दिखे जैसे! चांद छुप गया, चांदनी दिख रही है अभी।
किसी छोटे स्टेशन पर ट्रेन जब पटरियां बदलते हुए तेज रफ्तार से भागती है तो लगता है झूला झुला रही है। ठंडी हवा के झोंके, चौदहवीं का चांद और झूला झुलाती हुई अपनी गोदिया। मंजिल की चाह तो होती है मगर सफ़र में जो आनंद है वह मंजिल में कहां! 
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वही लोहे का घर, वही मौसम, वही बर्थ और सामने वही चौदहवीं का चांद बस समय थोड़ा पहले। आज समय थोड़ा पहले है, शायद इसीलिए चांद एकदम सामने है। इतना साफ है कि उसके दाग भी दिख रहे हैं! ठंडी हवा के झोंके आज भी हैं। आज गोदिया नहीं, कोटा पटना है लेकिन है तो लोहे का घर ही।
लेटे लेटे लोहे के घर की खिड़की से देखते रहो चांद को तो जब खिड़की का राड आ जाता है बीच में चांद दो भाग में बटा नहीं दिखता, दो हो जाता है! ऐसा लगता है जैसे दर्पण में खुद को देख रहा है!!! कभी रबड़ सा खींच कर फैल जाता है नीले आकाश में चार अंगुल लंबा, कभी छुप जाता है पल भर के लिए किसी घने वृक्ष के पीछे। ये चांद की शोख अदाएं हैं या मेरी निगाहों का भरम!
ट्रेन दौड़ रही है पटरी पर, ठंडी हवा के झोंके करा रहे हैं एहसास कि हम चल रहे हैं मगर चांद जहां का तहां! काश! हम दौड़ते न रहते पटरियों पर। पंख होते और उड़ कर पहुंच जाते चांद के पास। पोत देते चांद के धब्बों में कोई क्रीम और फिर चुपके से आ कर लेट जाते लोहे के घर के इसी बर्थ पर। तब आइने में अपनी शकल देख पूरा चक्कर में पड़ जाता चांद।
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क्षणिकाएँ

(1)

झूठ 
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दिल का
थोड़ा थोड़ा 
टूटना
मन का
थोड़ा थोड़ा 
गिरना
जिस्म को
थोड़ा थोड़ा
मारता है
लोग झूठ बोलते हैं
वो
अचानक चला गया।

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(2)

अंतिम स्टेशन
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हे ईश्वर!
रेलवे का गार्ड
हर स्टेशन पर
ट्रेन को हरी झंडी दिखाता है 
तू मुझे दिखा!
बचपन,
जवानी तो ठीक था
आगे
बुढ़ापा है।

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(३)
सत्य
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मानते, चीखते
सत्य बोल, गत्य है
घर से मरघट तक,
राम नाम सत्य है।
आदमी है मगर
भूख से नंगा है।
रात गई, बात गई।
काम है, धंधा है।
.....................
(४)
डूब गया सूरज
..…..............
खुली थी
लोहे के घर की खड़की
दूर घने वृक्षों की फुनगियों के ऊपर
गेंद की तरह उछलता
डूब रहा था
सूरज
गोमती आई
तो लगा
नहाएगा डूब कर
मगर नदी में
अपनी परछाईं देख
भाग गया!
छू भी नहीं पाए उसे
ईंट भट्टे की ऊंची चिमनी से भख-भख निकलने वाले धुएं
हल्की और हल्की होने लगी
सुनहरी छाप
मिमियाते हुए
खेत की मेड़ पर बैठे
दद्दू के पास
भाग-भाग आने लगी
बकरियां
चमक खोने लगे
गेहूं के खेत
अंधेरे की चादर ओढ़
आराम के मूड में
आने लगी धरती
लंबी होने लगी
परछाइयां
ट्रेन को देख
ठिठक कर रुक गईं
घास का बोझ सर पर लादे
पगडंडी पगडंडी जा रही
वृद्ध महिलाएं
और...
देखते ही देखते
डूब गया सूरज।
....

(5)

मुर्गा
........
मुर्गे ने बांग दी
कवि की नींद खुली
नींद खुली तो
कवि ने लिखी कविता
कविता सुनकर
सबकी नींद खुली
नींद से जागे लोगों ने
पहला काम यह किया कि
नींद से जगाने के अपराध में
पंचायत बुलाई
कवि ने पाला बदला
भक्ति के गीत गाए
मुर्गे ने
अपना स्वभाव नहीं बदला
मारा गया।
आज भी
स्वभाव न बदलने के कारण
नींद से जगाने के अपराध में
मारा जाता है
मुर्गा।
....................

27.3.18

माफ़ी

हम जब छोटे थे तो कक्षा में गुरुजी और घर में बाउजी दंडाधिकारी थे। दोनों को सम्पूर्ण दंडाधिकार प्राप्त था। स्कूल में गलती किया तो मुर्गा बने, घर में गलती किया तो थप्पड़ खाए। एक बार जो कक्षा में मुर्गा बन गया, दुबारा गलती करने का विचार भी मन में आता तो उसकी रूह कांप जाती। अच्छे अच्छे शरारती और मिजाज के टेढ़े लड़के बाबूजी के घर में आने की आहट भांप कर सीधे हो जाते थे! तब गलती करने पर माँ के आँचल के अलावा दोनो जहां में कहीं माफी नहीं मिलती थी।

अब नदी में बहुत पानी बह गया। इधर गुरुजी ने लड़के को चपत भी लगाई उधर उसका पूरा खानदान स्कूल के दरवाजे पर खड़ा मिलेगा...मेरे गधे को डंडा क्यों मारा? गुरुजी देर तक गधे के पूरे खानदान से माफी मांगते नजर आएंगे….वो क्या है कि मैंने तो इसलिए लड़के को चपत लगाई कि लड़का गलत संगति में न पड़े, पढ़ लिख ले..। तब तक गधे का बाप शेर की तरह दहाड़ेगा.. चौप! जानते नहीं हो! मैनेजर से कह कर नौकरी से निकलवा दुंगा!!! अब तदर्थ या संविदा पर नियुक्त वित्तविहीन अध्यापक के पास इतनी हिम्मत कहां!  वह तो नौकरी जाने के भय से गधे को भी बाप कहेगा। 

इधर बाबूजी ने लड़के को थप्पड़ लगाया तो लड़का जोर से चीखा... मम्मी ssss और बाबूजी की सिट्टी पिट्टी गुम!  देर तक मम्मी से सॉरी सॉरी बोलते नजर आएंगे। लड़का पापा को तिरछी निगाहों से ताकेगा..हो गया?  फिर बुलाऊं मम्मी को?  

न तो पहले घरेलू हिंसा का कानून था, न मध्यम वर्गीय घरों के लड़के अंग्रेजी कान्वेंट स्कूल में पढ़ पाते थे। वह समय अभी ज्यादा दूर नहीं गया जब माफी वही मांगता था जो गलती करता था। उसे माफी नहीं मांगनी पड़ती थी जो गलत काम करने से रोकता है। 

अब ऐसे हालात में सज्जन पुरुष माफी नहीं मांगेगा तो और क्या करेगा? अपनी यह जो पीढ़ी है न? बहुत सताई हुई पीढ़ी है। जब तक बच्चे थे स्कूल में गुरुजी और घर में बाउजी तोड़ते रहे। जब बड़े हुए तो बैल मरकहे हो गए और गधों के सींग जम गए!

नेता जी के माफी मांगने से आप अधिक उत्साहित हैं तो यह आपकी भूल है। कुछ लोग गलती इसीलिए करते हैं कि फंस गए तो माफी मांग लेंगे। हमारे देश में सज्जनों और उदार हृदय वालों की कोई कमी भी नहीं। जहां देखो, वहीं दयालू गुरु मिल जाते हैं। यदि कानून का रटा रटाया निश्चित नियम कानून न होता तो क्या पता वर्षों बाद किसी घोटाले में फंसे नेता जी को जज साहेब दया कर के छोड़ ही दें! बुड्ढा बेचारा! अब कहां जाएगा जेल!  जनता का वश चले तो शायद माफी मिल ही जाय! बड़ी दयालु और सहिष्णु है भारत की जनता। नेता जी भी जनता की इस कमजोरी को ताड़ चुके हैं। जब उन्हें टीवी में हाई लाइट होने का मन करता है तड़ से ऐसा बयान जारी करते हैं कि विरोधी गुट शोर मचाने लगता है... तुमने गलती करी, बहुत बड़ी गलती करी। हमारी मान हानी हुई। तुम्हारे खिलाफ मानहानी का मुकदमा करेंगे! पानी जहां सर के ऊपर गया, नेताजी झुककर माफी मांग लेते हैं..मेरे कहने का मतलब यह नहीं था, मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया फिर भी किसी को दुःख पहुंचा हो तो हमको माफी दई दो! 

एक झटके में सबका भला हो गया। जिसकी मान हानी हुई थी व वह अब मान लाभ की स्थिति में पहुंच गया! जो नेता जी भीड़ में गुम हो चुके थे फिर से अखबार और टी वी चैनलों पर चमकने लगे। समाचार चैनलों को अच्छी खासी टी आर पी मिल गई। देश की चिंता करने वालों को फेसबुक और वाट्स एप पर बहस का नया मुद्दा मिल गया। जुगलबंदी बना कर व्यंग्य ठेलने वालों को एक नया विषय मिल गया। एक नेता जी ने गलती क्या करी मानों देश की सोई चेतना ही जाग गई!  

अब किसी को मेरी किसी बात पर कोई ठेस पहुंची हो तो .. सॉरी! माफी मांगने का यह अंग्रेजी तरीका मुझे अतिशय प्रिय है। माफी भी मांग लो और गिल्टी फील भी न हो! और इसके बाद कोई फिर कुछ कहे तो जोर से भिड़ लो..बोला न सॉरी! अब जान लोगे क्या?

25.3.18

मेरे राम

गंगा किनारे फैले बनारस की गलियों में जिसे पक्का महाल कहते हैं, प्रायः घर घर में मन्दिर है। मेरे घर में भी मन्दिर था, मेरे मित्र के घर में भी। मेरे राम काले थे। मेरे मित्र के गोरे। मेरे काले संगमरमर से बने, मित्र के सफेद संगमरमर वाले। बचपन में जब हम दोनों में झगड़ा होता तो मित्र कहता..तेरे राम काले कलूटे! हम कहते.. तेरे राम के शरीर में तो खून ही नहीं है, इसीलिए सफेद हैं। बड़े होने पर अपने झगड़े को याद कर हम खूब हंसते।

कुछ और समझ आईं तो लगा यह झगड़ा तो बड़ा व्यापक है! कबीर के राम और तुलसी के राम में भी भेद है!!! हालांकि दोनों राम को लेकर हमारी तरह आपस में झगड़े नहीं, अपने अपने ढंग से अपने अपने राम को पूजते हुए स्वर्ग सिधार गए मगर दोनों के भक्तों में झगड़ा आज भी है। दोनो के अपने अपने राम हैं! कबीर कहते.. निर्गुण राम भजहूं रेे भाई और तुलसी कहते हैं.. भए प्रकट कृपाला, दीन दयाला..। कहें चाहे जो और जैसे कहें मगर दोनों के राम हैं कृपालु। सभी पर कृपा करने वाले हैं। दोनो के भक्त अपने अपने राम से प्रेम भी खूब करते हैं।  

कुछ दुष्ट भी हैं जो राम को नहीं, रावण को अपना भगवान मानते हैं।  रावण को भगवान मानने वाले, दक्खिन में हैं और धीरे धीरे पूरी तरह दक्खिन में मिल जाएंगे। दख्खिन में मिलने से पहले कृपालु राम उनको बुद्धि दे दें तो उनका भी भला हो जाय। 

बचपन के झगड़े मासूम होते हैं। मासूम झगड़े समझ आने पर खूब हंसाते हैं और आनन्द भी देते हैं। लेकिन समझदारों के झगड़े बड़े खतरनाक होते हैं। राजनीति से प्रेरित होते हैं। यहां प्रेम नहीं, अहंकार टकराता है। मजे की बात यह कि राम इस झगड़े में हस्तक्षेप भी नहीं करते। जैसी करनी तैसी भरनी वाले मूड में चुप हो बैठे रहते हैं।

मेरे पास दोनो राम हैं। काले भी, गोरे भी। तुलसी के भी, कबीर के भी। कबीर के राम मेरे मस्तिष्क में और तुलसी के राम मेरे हृदय में बसे हैं। आज मेरे दिल में बसे राम का जन्मदिन है। 

घर में राम मन्दिर था तो जाहिर है राम नवमी हमारे घर का वर्ष का सबसे बड़ा त्योहार होता था। पिताजी भारतीय जीवन बीमा निगम में मामूली क्लर्क की नौकरी करते थे मगर राम नवमी का उत्सव धूम धाम से मनाते। बनारस की गलियों में स्थित तीन मंजिला पुराना जरजर मकान था जिसकी गली वाली दीवाल मेरे होश संभालने के समय से ही गली की तरफ इतनी झुकी हुई थी कि बरसात के दिनों में लोग इस गली से जल्दी निकल भागना चाहते थे कि कहीं मकान भरभरा के गिर न पड़े और उसी में दब कर मर जाएं! यह अलग बात है कि राम की कृपा से पिताजी गुजर गए लेकिन मकान कभी नहीं गिरा। 

राम नवमी आने से पहले घर में हर वर्ष काम लग जाता। हमारे कंचे खेलने से छत पर बने गढ्ढे हों या बगल के मकान से सटी दीवार के छिद्र सब भर जाते। पूरे घर में नील डाल कर चूने की पोताई होती। मन्दिर के सीलन भरे दीवार चमकने लगते। भगवान राम का पूरा परिवार नए वस्त्र पहन कर सुंदर दिखता। हम बच्चों को नए कपड़े तो नहीं मिलते पर राम, लक्ष्मण, जानकी और माता दुर्गा की प्रतिमा के लिए नए कपड़े जरूर बनते। बजरंगबली केसरिया पोतकर अलग दमकते रहते। सांवरे राम को सजाने के लिए अशोक के पत्ते, फूल मालाएं और बड़ी बड़ी नई आंखें लाई जातीं। जिस मन्दिर में रोज जीरो वॉट का प्रकाश रहता उस मन्दिर में सौ वॉट के बल्ब और झालरें दम दम चम चम दमकते/चमकते रहते। ऊपर प्रसाद बनता नीचे दुर्गा सप्तशती पाठ के बाद भगवान राम की पूजा होती। इधर घड़ी की सूइयां १२ बजाती, उधर भए प्रकट कृपाला दीन दयाला...शुरू। 

हमेशा बन्द रहने वाले घर के दरवाजे भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिए जाते। दिन भर भजन कीर्तन चलता रहता। हारमोनियम, तबला, बैंजो और बांसुरी पर हर उम्र के लड़के हाथ आजमाते। देर रात तक भजन कीर्तन चलता। मजे की बात यह कि यह कहानी केवल हमारे घर की हो ऐसा नहीं है। बनारस के पक्के महाल की गलियों में कई राम मन्दिर हैं। अपने घर का प्रसाद मिलने के बाद हम बच्चे गोल बनाकर गली के सभी मंदिरों में प्रसाद पाने के लालच में घूम घूम कर दर्शन करते। दर्शन के बाद मन्दिर के पुजारी के आगे बढ़े हुए दाहिने हाथ की अंजुरी को नीचे से बाएं हाथ की अंजुरी सहारा देती। अंजुरी में एक चम्मच चरणामृत गिरता और गप्प से मुंह के अंदर। सचमुच अमृत की तरह मीठा होता था चरणामृत का स्वाद! 

मेरा भगवान राम से प्रथम मिलन कब हुआ यह मैं नहीं बता सकता। जैसे कोई बच्चा कैसे बताएगा कि उसने अपने पिताजी को कब देखा? मां को कब देखा? बड़े भाई या बड़ी बहन को कब देखा? वैसे ही मैं यह नहीं बता सकता कि भगवान राम से पहली बार कब मिला! मेरे घर ही राम मन्दिर था और राम मेरे घर के ही सदस्य थे। बिना राम को नहलाए, कपड़े पहनाए, भोजन कराए कोई घर में भोजन कर ही नहीं सकता था। अब कैसे कहें कि मन्दिर की मूर्तियां निर्जीव थीं! घर के किसी सदस्य का कोई सुख ऐसा नहीं होगा जिसमें सबसे पहले राम को भोग न लगा हो। कोई दुःख ऐसा न होगा जो राम को पता न चला हो। आंसू की बूंदें छलकी होंगी तो सबसे पहले प्रभु राम के चरणों में। माता पिता से जो बात न कह सके वो राम से कह दिया। कभी कोई गलत काम का विचार भी मन में आया तो मन में भय लगा रहा कि कोई देखे या न देखे राम तो देख ही लेंगे! उनको पता चल गया तब? कहने का मतलब यह कि मेरे राम तो मेरे जन्म से ही मुझसे जुड़े रहे। बचपन में भले हम सुंदर काण्ड से ज्यादा राम चरित्र मानस न पढ़े हों लेकिन मेरे राम तुलसी के राम से तनिक भी उन्नीस न थे। 

जैसा कि मध्यम वर्गीय परिवार में होता है कि जब परिवार बड़ा और कमाने वाला एक हो, मासिक आय निर्धारित हो तो मुखिया इतना मितव्ययी हो जाता है कि घर के सभी सदस्य उसे कंजूस समझने लगते हैं। जब तक अपने सर पर ओले नहीं पड़े पिताजी को भी सभी कंजूस ही समझते थे। मेरे घर के राम मंदिर में भी जीरो वॉट का एक ही बल्ब जलता था। सुबह की बात तो और थी। बगल में गंगाजी थीं तो गंगा स्नान करना, गंगाजल लाना, नहलाना आनन्द दायक काम था लेकिन शाम को मन्दिर में अगरबत्ती जलाने, नैवेद्य चढ़ाने और घंटा बजाने के लिए घर की सीढ़ियां उतरना बच्चे के लिए टेढ़ी खीर होती थी। मेरे राम काले संगमरमर के सांवले राम थे। अंधेरे में चमकतीं बड़ी-बड़ी आंखों को दूर से देखकर ही भय लगता था। यूं तो बड़े भाई लोग ही शाम की पूजा में जाते मगर यदि भैया कभी पढ़ रहे हों तो वे मुझे ही जाने का आदेश दे देते। यह तब की बात है जब मैंने स्कूल जाना शुरू भी नहीं किया था।

अंधेरे में घर की सीढ़ियां उतरना, राम जी के सामने खड़े होकर अगरबत्तियां जलाना, नैवेद्य चढ़ाना और घंटी बजाना बड़े साहस का कार्य हुआ करता था। बिना गए कह भी नहीं सकते थे की अगरबत्ती जला दिए! घर में जो जहां हो, घंटी की आवाज़ जरूर सुन रहा होता। घंटी की आवाज़ मतलब भोजन मिलने की सूचना। सीढ़ियां उतरते समय हर कदम उनको गरियाता और सीढ़ियां चढ़ते समय हर कदम उनको धमकाता कि आने दो पिताजी को...। मेरी राम से यारी बाद में हुई पहले तो मुझे उनसे बहुत भय लगता था।

जय राम जी की।

3.3.18

लोहे का घर-40 (बनारस से लखनऊ)

आज फिर झटके वाली बेगमपुरा में बैठा हूं। हम समझते थे जब हम डाउन होते हैं तभी झटके मारती है लेकिन ये तो अप में भी मार रही है! मतलब झटके मारना इस ट्रेन की पुरानी आदत है। कित्ती पुरानी? ठीक ठीक नहीं पता। कांग्रेस के जमाने से चली आ रही है या २-३ साल पुरानी है कुछ नहीं पता। शायद झटके मारना बेगम के जन्म का रोग हो! चाल ढाल पर मोहित हो लप्प से चढ़ गए, पता चला झटके मारती है! यह तो ट्रेन है, भगवान न करे किसी को ऐसी बेगम मिले।

आज जनरल/स्लीपर नहीं ए.सी. में बैठ कर राजधानी जा रहे हैं। घर से खा पी कर, मूड बना कर चले थे कि दिन भर मस्त सोएंगे मगर इस ट्रेन में कोई सो नहीं सकता। ज्यों झपकी लगी, त्यों झटका लगा। प्लेटफॉर्म पर आए तो एक विभागीय साथी की नजर हम पर पड़ ही गई। सशंकित हो गए कि कहीं यह ट्रांसफ़र कराने के चक्कर में राजधानी तो नहीं दौड़ रहा है! हमने कहा..आज संडे है। सुबह ए बनारस का मजा ले चुके अब सोच रहे हैैं शाम राजधानी पहुंच कर टुंडे कबाब का मजा लिया जाय। वे हंसने लगे। मेरी झूठी बात का उन्होंने यकीन नहीं किया और सच्ची बात न बताकर मैंने उन्हें संदेह के महासागर में पूरी तरह डुबो दिया।

लोहे के घर की ए.सी. बोगी में बैठ, लोगों की बातें लिखने का मूड नहीं बनता। बड़े बोर लोग यात्रा करते हैं ऐसी बोगी में। बड़े शहरों की बड़ी कालोनी टाइप के लोग। न किसी से लेना न किसी को देना। कोई वृद्ध किसी फ्लैट में अकेले रहता हो, मर जाए तो उसके बच्चों को उसकी लाश नहीं कंकाल मिले! यही हाल होता है ए सी बोगी के यात्रियों का। खाए पीए, सफेद चादर खुद ही ओढ़ कर सो गए। यहां का माहौल ही ऐसा है। हम भी यहां आ कर इन्हीं के जैसे मनहूस हो जाते हैं। अकेले हैं तो आप को पूरा सफ़र अकेले ही काट देना है। करें भी क्या मेल जोल बढ़ाकर? जहरखुरानी के शिकार हो जाएं? रेलवे भी अपरिचित यात्रियों पर विश्वास न करने की सलाह देता है। हम बनारसी गलियों के अड़ीबाज लोगों के लिए ऐसे वातावरण में बोरियत महसूस होती है। जनरल और कुछ हद तक स्लीपर बोगी में अपने मिजाज के लोग मिलते हैं। मगर सफ़र लंबा हो तो पेट बातों से तो नहीं भरता, शरीर आराम चाहता है।
फिर बड़े जोर का झटका दिया बेगमपुरा ने। ओह! बड़ी देर से खड़ी थी। हम ही गलतफहमी पाले थे कि क्या शांत वातावरण होता है ए. सी. बोगी का! चली तो झटका दिया। मतलब बेगम की बीमारी यह है कि जब भी चलना शुरू करती है जोर का झटका मारती है! झटके सह लिए तो चलिए न फिर आराम आराम से।
सूर्यास्त हो रहा है लोहे के घर में। शीशे वाली बन्द खिड़की का पर्दा हटाकर देख रहा हूं तेज हीन हो रहे सुरुजनारायन। किसी अनजान जगह पर रुकी है ट्रेन और सामने हैं सूर्यदेव। आम के कुछ पेड़ हैं, आम के पीछे सागौन पंक्तिबद्ध खड़े हैं, दूर सरसों और पास गेहूं के खेत हैं। एक कौआ उड़ते हुए, सूरज के सामने से होते हुए बाएं से दाएं गया।
झटका लगा और चल दी बेगमपुरा। फिर एक वाक्य दोहराया बेगम पूरा झटका देती है।
ठहरे हुए पानी के पोखर के किनारे एक लड़का साइकिल खड़ी कर सूरज की प्रतिछाया निहारता दिखा। हमने सूरज भी देखा, लडके को भी देखा और छाया भी देखी। सब एक पल में घटित हो गया। ट्रेन आगे बढ़ चली।
सूरज अब क्षितज के पास जरा सा ऊपर, दूर घने वृक्षों की फुनगी-फुनगी गेंद की तरह उछलते दिख रहा है। अभी प्रकाश है। सत्ता के जाने के बाद सत्ता के भय की तरह। कुछ समय बाद ढल जाएगा। उगते समय क्या रंग में था! चढ़ते चढ़ते तपने लगा। अब ढलते-ढलते निस्तेज हो चुका है। रोज पूरे जीवन का सार पढ़ाता है मगर हम धूप और अंधेरा ही पढ़ पाते हैं।
पशुओं के लिए घास के भारी ढेर सर पर लादे पगडंडी पगडंडी नंगे पांव चलती बूढ़ी दो महिलाएं ट्रेन को जाते देख जरा भी नहीं रुकीं। ट्रेन अपने रास्ते, ग्रामीण महिलाएं अपने रास्ते। निर्जीव की तरह अपने रास्ते चलते रहना दोनो की मज़बूरी।
अब सूरज नहीं दिख रहा। अंधेरा भी नहीं हुआ है। गोधूलि बेला है लेकिन न धूल है न गायों के झुंड। बल्ला लेकर भागता एक लड़का दिखा। सरसों के पीले चौकोर खेत के एक कोने पर पहरेदार की तरह खड़ा एक बूढ़ा नीम दिखा। साइकिल का टायर दौड़ाते हुए बच्चे दिखे। हम बूढ़े हो चले मगर जब तक खेत दिख रहे हैं तब तक लोहे के घर की खिड़की से ही सही अपना बचपन भी दिखता रहेगा। विचारों की श्रृंखला टूटी तो ध्यान गया, पहुँच चुके हैं लखनऊ।
.............
अब लखनऊ से वापसी है, दिन ढल चुका, अब शाम ढल रही है। शहर बदल रहे हैं। लखनऊ के बाद अब फैजाबाद बीता है। चलते- चलते ही देर हुई। लेट किसान मिली जो और लेट हो गई। बनारस पहुंचते पहुंचते आज की तारीख बदल जाएगी। कल से फिर डयूटी पर। लोहे का घर हमें छोड़ता नहीं या हम लोहे के घर को नहीं छोड़ते। लगता है दोनो इक दूजे के लिए बने हैं। बिटिया साथ में है, उसी को साक्षात्कार दिलाने गए थे लखनऊ। रोजगार पाने के लिए एक अंतहीन दौड़। अपन तो विश्वविद्यालय से निकल झट से एक खूंटे से बंध गए। बच्चों का संघर्ष कठिन है। शायद यह दौर ही कठिन है।
चार लड़कियां चढ़ी हैं फैजाबाद से। लगता है ये अभी पढ़ रही हैं। धनबाद जा रही हैं। वहां से रांची जाएंगी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी। अपने पढ़ाई की बातें खूब चहक चहक कर कर रहीं हैं। इनकी शब्दावली अपने पल्ले नहीं पड़ रही। मन कर रहा है इनकी बातों को लिखा जाय मगर ये इतनी जल्दी जल्दी बोल रही हैं कि क्या कहें! अपनी बिटिया इनकी बातों पर जरा भी कान नहीं दे रही। वो कोई फिलिम देखने में मगन है। कई दिनों बाद फुरसत और बेफिक्री के पल मिले हैं। उसी का आनन्द ले रही है।लोहे के घर की यही खास बात है। चढ़ने से पहले खूब हड़बड़ी मगर एक बार बैठ गए तो फिर जो मर्जी सो करो। मन करे बहस करो, मन करे पढ़ो, मन करे लिखो या फिर फिलिम देखो। जैसा माहौल मिले वैसा करो। अब लड़कियों ने अपना लैपटॉप निकाल लिया है। मूवी देखने के मूड में हैं। रात के दो बजा चाहते हैं. किसान पहुँच रही है बनारस।

लोहे का घर-39

उंगलियों में गुलाब पकड़े 
मीलों चले हैं 
पैदल-पैदल 
न झरी 
एक भी पंखुड़ी 
न भूले राह
मंजिल से पहले।

वेलेंटाइन के दिन भी पटरियों पर दौड़ रही हैं ट्रेनें। चउचक नियंत्रण है ऊपर वाले का। जब हरी झंडी दिखाए चलना है, जब लाल तो रुक जाना है। न आगे वाली माल को छू सकती है न पीछे वाली पैसिंजर को। दाएं बाएं से गलबहियां करना तो लाहौल बिला कूवत! क़यामत आ जाएगी। नारी भले स्वतंत्र हो जाए एक दिन, #ट्रेन नहीं हो सकती। इसकी किस्मत में चीखना, चिल्लाना और सेवा करना ही लिखा है। न छुट्टी न वेलेंटाइन।
आज शिवरात्रि है। काम के देवता कामदेव, प्रेम के देवता कृष्ण फिर शिव कौन? संहार के देवता?
प्रेम के लिए दृष्टि चाहिए। दूसरे बिदक गए शिव के गले में नाग देख कर लेकिन पार्वती ने शिव में सत्य देखा! शिवम् देखा! सुंदरम देखा। प्रेम किसी संत के उपदेश के बाद आया है क्या धरती पर? यह तो प्रत्येक प्राणी में जन्म के साथ मिलने वाला स्वभाव है। इसका कोई एक खास दिन कैसे निर्धारित हो सकता है? यह तो मौका मिलते ही हो जाने वाला प्राणियों का स्वभाव है।
बहुत से लोग बैठे हैं लोहे के घर में। बिना रुके चौबीस घंटे लोगों को अपनी मंजिल तक पहुंचाना भी तो प्रेम करना है। ट्रेन तो हर पल वेलेंटाइन मनाती है। समझने के लिए दृष्टि चाहिए।

संसार में दो तरह के लोग पाए जाते हैं एक आलोचक दूसरे प्रशंसक। आलोचक साहित्य से छिटक कर राजनीति में चले गए। प्रशंसक राजनीति से छिटक कर साहित्य में आ गए। देश में कोई घोटाला होता था तो सबसे पहले विपक्ष दुखी होता था। अब उल्टा हो गया है। घोटाले की खबर सुनते ही विपक्ष की लॉटरी खुल जाती है। उन्हें सत्ता पक्ष की आलोचना करने और अपनी राजनीति चमकाने का सुनहरा अवसर हाथ लगता है। घोटाले के बिना राजनीति बाबाजी के ठल्लू की तरह अधर में लटकती रहती है। घोटाले की खबर नियाग्रा की वह गोली है जिसके सुनने मात्र से राजनीति जवान हो जाती है।
साहित्य में रुचि रखने वाले आभासी दुनियां के रण बांकुरे छोटी छोटी पोस्ट डाल कर मोटी पुस्तक के लिए सामग्री जुटाते हैं। इस क्रम में वे दूसरों की पोस्ट भी पढ़ते हैं। अच्छे अच्छे आलोचकों को यहां प्रशंसा मोड में देखा जा सकता है। वे दूसरों की पोस्ट खूब ध्यान से मन लगाकर प्रशंसा करने की नेक नियति से पढ़ते हैं।
कुछ तो अच्छा लिखा मिल जाय जिसकी प्रशंसा की जा सके! एक लाइन ही सही। एक अच्छी लाइन मिल गई तो बढ़िया कमेंट तैयार। एक भी अच्छी लाइन न मिली तो वाह! और सुंदर जैसे शब्द न्योछावर कर आगे बढ़ जाते हैं। यूं समय बरबाद करके जो कमेंट बैक सुख मिलता है उससे उनकी लेखन क्षमता में हरास होता है या वृद्धि ये तो वही जाने लेकिन इस कमेंट कमेंट के खेल से लेखकों में व्याप्त नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक सोच विकसित होती है। राजनेता भी अब इस गुण को भांप कर अपने कार्यकर्ताओं को आभासी दुनियां में सक्रीय रहने का उपदेश देते रहते हैं। यह भी संभव है कि राजनेताओं के देखा देखी चोर डाकू भी आभासी दुनियां में संत बने घूम रहे हों! अब यह खतरा तो उठाना ही पड़ेगा। अब इसी पोस्ट को लें। मुझे पक्का विश्वास है कि इसकी भी आलोचना नहीं होगी। प्रशंसा और लाइक ही मिलेगी भले कम मिले।

भोले की आरती ख़तम हो चुकी। भण्डारी स्टेशन पर पचीस मिनट पहले ही आ कर खड़ी है गोदिया। समय होगा तभी चलेगी। लेट आने पर लेट चलती है, बिफोर आती है तो समय से चलती है। आज लोहे के घर के कोपचे में बैठे हैं। ऊपर, मिडिल और नीचे एक एक बर्थ सामने दीवार। दाएं सामने की ओर दरवाजा, बाएं खिड़की। यह कोना तो लोहे के घर का कोपभवन लगता है! लेट कर देश की चिंता करते हैं।
लाख छेद बन्द करो घर में चूहे आ ही जाते हैं। लाख नल बन्द करो कहीं न कहीं पानी टपकता ही रहता है।मच्छरदानी चाहे जितना कस कर लगाओ, सुबह एक न एक खून पी कर मोटाया मच्छर दिख ही जाता है। यही हाल अतंकवादी का है, यही हाल घोटाले का है। हम यह ठान लें कि न खाऊंगा, न खाने दुंगा तो भी एकाध चूहे फुदकते दिख ही जाते हैं। हम भले न खाएं वे तो खाने के लिए ही धरती पर अवतरित हुए हैं। अन्न न मिला तो किताब के पन्ने, कपड़े.. जो मिला वही खाने लगते हैं। एकाध चूहों के खाने से, एकाध मच्छर के खून पीने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। घर की दिनचर्या रोज की तरह चलती रहती है। आफत तो तब आती है जब दीवारें दरकने लगती हैं। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। दुर्घटना उस घर में अधिक घटती है जहां जनसंख्या अधिक और नियंत्रण करने वाला एक। संयुक्त परिवार के बड़े से घर में जहां सारा बोझ मुखिया के कन्धे पर होता था सभी सदस्य आंख बचा कर मौज उड़ाने की जुगत में रहता था और घर की चिंता का सारा बोझ घर का मुखिया ही उठाता था। ऐसे घर में चूहे भी आते, मच्छर भी होता, खटमल भी निकलते और नल की टोंटी भी खुली रह जाती।
राजशाही में राजा ही सब कुछ होता था। वह सर्वगुण सम्पन्न हुआ तो देश अच्छा चला, गुणहीन हुआ तो देश गुलाम हुआ। तानाशाह हुआ तो जनता हाहाकार करने लगी, दयालू हुआ तो जनता मौज करने लगी। राजशाही की इन्हीं कमियों ने लोकतंत्र को जन्म दिया। सत्ता के अधिकारों और दायित्वों का राज्यों, शहरों, कस्बों से लेकर गांवों तक समुचित वितरण और केंद्र का कड़ा नियंत्रण। जनता का, जनता के लिए जनता के द्वारा शासन। यह एक सुंदर और कल्याणकारी व्यवस्था है। यह व्यवस्था उस देश में अत्यधिक सफल रही जहां जनसंख्या कम और शिक्षा का प्रतिशत अधिक रहा। भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जनसंख्या भी अधिक और शिक्षा का स्तर भी दयनीय। कोढ़ में खाज राजनेताओं/धर्मोपदेशकों की कृपा से धर्म और जाति के आधार पर बंटी जनता। अब ऐसे माहौल में आतंकवादी न आएं, घोटाले न हों तो यह स्वयं में एक बड़ा चमत्कार होगा। देश की मूल समस्या जनसंख्या नियंत्रण और शत प्रतिशत साक्षरता है। इंदिरा जी ने जनसंख्या नियंत्रण को समझा तो नौकरशाही ने ऐसा दरबारी तांडव किया कि उन्हें सत्ता से ही बेदखल होना पड़ा। उन्हें भी लगा होगा कि सत्ता में बने रहना है तो इस मुद्दे को ही भूल जाओ। फिर किसी ने हिम्मत नहीं करी। मूल समस्या पर किसी का ध्यान नहीं।
गोदिया समय से बनारस पहुंच गई। देश की चिंता फ़ुरसत से मिले बेकार से किसी दूसरे समय में। आप फ़ुरसत में हों और देश की चिंता को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो स्वागत है। आम आदमी फालतू समय में ही देश की चिंता कर सकता है।

ट्रेन पटरी से चिपक कर हवा से बातें कर रही है। जगे यात्री मोबाइल से चिपक कर मजे ले रहे हैं। रात का समय है, कोई देश की चिंता नहीं कर रहा। खबरों से भागने लगे हैं लोग। क्रिकेट, संगीत, वीडियो, आभासी दुनियां की छोटी छोटी पोस्ट या फिर फिलिम। खासकर कामकाजी, मजदूर या किसान..अपने मतलब की बातें जान लिए फिर दूसरी खबरों से ऐसे भागते हैं जैसे किसी सर्प को देख लिया! जैसे कोई पागल कुत्ता काटने ही वाला हो! ख़बरें उनके लिए जिनके पास कोई काम न हो। चैनल वाले चाहें तो रायशुमारी करा लें। जिन खबरों को वे बड़े चाव से दिखाकर बहस कराते हैं उन्हें कामकाजी लोग नहीं देखना चाहते। उनके पास फालतू समय नहीं है। #ट्रेन में बैठकर फालतू समय में भी अब लोग खबरों पर बहस करने से अच्छा आंखें बन्द कर ऊंघना चाहते हैं।

निर्धारित समय पर चल रही है अपनी #फोट्टी_नाइन। भारत में #ट्रेन का निर्धारित समय पर चलना इस बात का संदेश है कि ठंडी जा चुकी है, अच्छे दिन आ चुके हैं। इस रूट पर कई दिनों से पटरियों के दोहरीकरण का काम चल रहा था जिससे निरस्त कर दी गई थीं कई ट्रेनें। अब काम पूरा होने के बाद हवा से बातें करते हुए दुगुने उत्साह से चल रही है ट्रेन।
अपने देखे रास्तों में जौनपुर सिटी से सुल्तानपुर और बलिया से वाराणसी के बीच युद्ध स्तर पर पटरियों के दोहरी करण का काम चला। एक पूरा हो गया और दूसरा भी पूरे होने के कगार पर है। इन मार्गों पर चलते हुए कई बार यह प्रश्न उठता था कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम सिंगल पटरी पर चलने के श्राप से अभिशक्त हैं! क्रासिंग शब्द सुनते-सुनते कान पक चुके। दोहरीकरण की योजनाएं पहले से बनी लेकिन काम अब जाकर पूरा हुआ। इसके लिए वर्तमान सरकार और #भारतीय_रेल की तारीफ की जानी चाहिए। ट्रेनें भले लेट चलीं लेकिन हाल के वर्षों में प्लेटफॉर्म और रेलवे ट्रैक पर खूब काम हुआ। पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह उपेक्षित भू भाग भी विकास के मार्ग पर अग्रसर है। अब उम्मीद है कि ट्रेनें निर्धारित समय पर चलेंगी और यात्रियों का कीमती समय बचेगा। लगता है ट्रेन यात्रियों के अच्छे दिन आने वाले हैं।