15.4.22

सोचो तो....


वे दिन भी क्या दिन थे!

हम थे, तुम थे और साफ थीं गङ्गा जी

पोतते थे जिस्म में मिट्टी, तैरते थे घण्टों और

भूख लगने पर 

खा लेते थे 

ककड़ी, हिरमाना, खरबूजा,

प्यास लगने पर

डुबकी मार के

पी लेते थे

पेट भर पानी।


वे दिन भी क्या दिन थे!

हम थे, तुम थे और बोतल का पानी नहीं था

गली के चबूतरे पर बैठा होता था प्याऊ,

घर-घर में होता था कुआँ,

गली-गली में

सरकारी नल या चापाकल।


वे दिन भी क्या दिन थे!

हम थे, तुम थे और कोरोना नहीं था।

न मुख मास्क का झंझट न सेनेटाइजेशन की चिंता

चाट लेते थे, एक दूसरे की

जूठी आइसक्रीम भी।


सोचो तो..

अचानक से नहीं आया कोरोना

पहले मैली हुईं नदियाँ,

सूख गए तालाब और कुएँ,

बोतल में बिकने लगा पानी और तब आया

कोरोना।


सोचो तो..

क्या-क्या देखेंगे आगे

अगर बचे रह गए 

हम तुम।

...........@देवेन्द्र पाण्डेय।

12.2.22

प्रेम


अँधेरी राह में

घने वृक्षों के तले

अक्षर दिखे

गुच्छ के गुच्छ!


जुगनुओं की तरह

आपस में टकराते,

बिखर जाते।


तेजी से

बन/बिगड़ रहे थे

शब्द

हो रहा था

चमत्कार!


कठिन तपस्या के बाद

बस एक शब्द समझ पाया..

प्रेम!


मुग्ध हो

खोया रहा 

रात भर

हाय!

मुँह से

बोल ही नहीं फूटे।


चाहता था, चीखना...

देखो!

प्रेम मरा नहीं है,

अँधेरे में

जुगनुओं की तरह

आज भी

टिमटिमा रहा है।

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10.2.22

बनारस की गलियाँ-12


बनारस की गलियों में तरह-तरह की शैतानियाँ देखने को मिलती थीं। एक गली के चबूतरे पर प्रौढ़ सरदार 'भइयो' बैठता था। जिस घर से सटा यह चबूतरा था उस घर में एक लड़का रहता था। लड़का थोड़ा हचक कर चलता था इसलिए लोग उसे लंगड़ कहते थे। लड़के का नाम शंकर था। उसकी दो बहनें थीं...एक सांवली और एक गोरी। उसके पिता जी काम तो बनिया का करते थे लेकिन चंदन-मंदन लगा कर खूब भक्ति भाव से रहते थे। भइयो, चबूतरे पर बैठ कर दिन के समय बड़े तरन्नुम में एक गीत गाता था...


काली माई करिया

भवानी माई गोर

शिव बाबा लंगड़

पुजारी बाबा चोर।


कहना न होगा कि उसका गाया यह गीत उनके परिवार को ज़हर की तरह चुभता। इसके कारण आये दिन झगड़ा होता रहता। शंकर चीखता..


ई का गात हउआ? तोहें शरम नाहीं लगत? 

सरदार कहता.."काहे? हम तोहे तs कुछो नाहीं कहली..! हम त भजन गात हई।"


मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि इस गाने का कोई दूसरा भी अर्थ भी हो सकता है!

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31.12.21

सुबह की बातें-9


रजाई से 

सर बाहर निकाल कर

दोनों कानों को  

बन्द खिड़की के उस पार फेंको!


कुछ सुनाई दिया? 

बारिश!

नहीं sss 

ओस की बूंदें हैं 

थाम नहीं पा रहे पत्ते

टप टप टपक रहीं हैं 

धरती पर। 


मौन 

कभी, कहीं नहीं होता

भोर में तो और भी शोर होता है!

आंखों से 

न दिखाई देने वाले जीव

कलियां, फूल, पत्ते

सभी करते हैं संघर्ष

जहां संघर्ष है

वहीं शोर है

ओस की पहली बूंद से

सूर्य की पहली किरण तक

जो मौन है

उसमे भी शोर है

सब

दिखाई नहीं देता 

सब 

सुनाई नहीं देता।


यह जो मौन का शोर है न?

बड़ा तिलस्मी है

सुनो!

पहली दफा

मधुर संगीत सुनाई देता है

आगे

तुम्हारी किस्मत!

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सुबह की बातें-8


नाच मेरी बुलबुल! तुझे पैसा मिलेगा।


इत्ते जाड़े/कोहरे में क्यों नाचें? ये चावल के दाने बहुत हैं।


आज रात को नया साल आने वाला है। खुशी मनाओ।


हाय राम! मतलब बम फोड़ोगे? शोर मचाओगे? मेरे घोसले में अभी अंडों से निकले दो बच्चे हैं।


नव वर्ष में हम बम नहीं फोड़ते हैं पगली! चिंता मत कर। मगर ये बता तुम लोगों के जीवन में नया साल कभी नहीं आता?


आता है न! साल में दो बार आता है। जब जब फसल कटती है, नया साल आता है। खूब दाने मिलते हैं खेतों में। तुम्हारी कृपा पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मगर रुको! मुझे दो पायों पर कभी भरोसा नहीं होता। बिना शोर किए ये कोई खुशी मना ही नहीं सकते। सच सच बोलो! क्या-क्या करोगे?


मुर्गा खाएंगे, शराब पीएंगे, नाचेंगे, गाएंगे, केक काटेंगे और सुबह से शाम तक सबको नए साल की शुभकामना देंगे और क्या!


बस बस बस...बिचारे मुर्गे! हमको तो नहीं खाओगे?


तुम्हारे जिस्म में मांस ही कितना है! कभी खाया तो नहीं, एक दिन चखूं क्या?


राक्षस कहीं के! तुम लोग अपनी खुशी के लिए कुछ भी कर सकते हो। तुम्हारी प्रार्थनाएं, तुम्हारी शुभकामनाएं, तुम्हारे दान/पुण्य, पूजा-पाठ, दुआ/सलाम सब एक ढोंग है। बहुरूपिए और दोहरे चरित्र वाले हो। तुम्हें जिसने अच्छा समझा, धोखा खाया। 


अरे चुप! चुप! इतना गुस्सा मत कर। हम जिसे प्यार करते हैं उसे थोड़ी न खाते हैं। नए साल का मजा ले।

बोल! हैप्पी न्यू ईयर। 


अब ज्यादा मुंह न खुलवाओ। तुम सब मतलबी और स्वार्थी हो। प्रत्येक प्राणी को सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए पालते हो। किसी को मीठी बोली के लिए, किसी को उसके मांस के लिए तो किसी को उसके दूध के लिए।  कल एक गौरैया कित्ता सच कह रही थी....


आदमी से रहना, साथी जरा संभल के। ये जिसको प्यार करते, उसपे इनके पहरे। हमको सिखा रहे हैं, गोपी कृष्ण कहना। जानते नहीं जो प्रेम के ककहरे।


और बुलबुल फुर्र से उड़ गई।


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2.12.21

कथरी

पाठकों की मांग पर, कथरी का काशिका से हिंदी में अनुवाद...


कथरी-1

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कैसी तबियत है माँ?

कहारिन ठीक से आपकी सेवा कर रही है न?

क्यों गुस्सा हो?

पन्द्रह दिन बाद घर आये हैं, इसलिए?

क्या बताएँ माँ,

तुम्हारी बहू की तबियत खराब थी

और..

उस शनीचर को

छोटे बेटे के स्कूल में, वो क्या कहते हैं, पैरेंट्स मीटिंग था

तुम तो जानती हैं माँ

शहर की जिंदगी कितना हलकान करती है।


आपसे तो कई बार कहे,

चलो साथ!

वहीं रहो।

आपको तो पिताजी का प्यार घेरे रहता है

वो स्वर्ग जा चुके हैं

यहाँ, कब तक उनकी प्रतीक्षा करोगी?

जल्दी नहीं आएंगे।


क्या कह रही हो माँ?

इस कथरी से जाड़ा नहीं जाता?

दूसरा खरीद दें?

आपको मोतियाबिंद हुआ है, इसीलिए दिखाई नहीं देता

लो!

कह रही हो तो नई कथरी ओढ़ा दे रहे हैं!

(पलटकर, वही रजाई फिर ओढ़ा देता है!)


माँ!

रात को नींद आया?

क्या कह रही हो?

नई कथरी खूब गरमा रही थी!

खूब नींद आया!!!

ठीक ही है माँ,

जा रहे हैं,

सभी जरूरी सामान कोठरी में रख दिए हैं,

कहरनियाँ को समझा दिए हैं,

नौकरी से छुट्टी नहीं मिलती माँ,

जाना जरूरी है।

आपका विश्वास बना रहे,

कथरी तो

जब आएंगे, बदल देंगे

चरण स्पर्श।

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कथरी-2

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स्वर्ग में मजे उड़ाओ लेकिन सुनो भगवान

उलट-पुलट पुरानी कथरी ओढ़ाता है

तुम्हारा पुत्र विद्वान!

समझता है..

माँ को मोतियाबिंद हुआ है तो

गंध भी नहीं आएगी!

भोर में ही पूछता है बेईमान,

'नींद आया माँ?'


मन ही मन हँसी का फुहारा छूटता है,

मुँह से बस इतना ही निकलता है..

हाँ बेटा,

खूब नींद आया

नई कथरी बहुत गरमा रही थी

सुनकर, खुश हो जाता है पागल


हमको कर देगा कहरनियाँ के हवाले

अपने चला जाएगा 

शहर में कमाने

पत्नी को अपने

सर पर चढ़ाता है,

बच्चों को 

स्कूल में पढ़ाता है

पन्द्रह दिनों में यहॉं आता है तो

पुरानी कथरी उलट-पुलट ओढ़ाता है

इससे भला जाड़ा जाएगा?


नहीं खरीद पा रहे हो

एक नई रजाई

तो भाड़ में जाए

ऐसी कमाई।

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14.11.21

बाल दिवस

आज सन्डे न होता तो स्कूल जाने वाले बच्चे अपने बस्ते का भारी बोझ पटक कर गहरी सांस लेते तब गुरुजी उन्हें बता देते कि आज बाल दिवस है।

लोहे के घर में एक बच्चा पैर छू कर भीख मांग रहा है। न उसे पता है कि आज बाल दिवस है न उसे जिसने डाँट कर भगा दिया बच्चे को! 

पटरी-पटरी प्लास्टिक के टुकड़े बीन कर सीमेंट के खाली झोले में भरने वाले बच्चों को भी नहीं पता कि आज बाल दिवस है।

पानी की बोतल बेचने के लिए चलती ट्रेन से कूद कर उस पटरी पर खड़ी ट्रेन पर चढ़ने वाले बच्चे को भी नहीं पता।

मेले में जब चारों ओर दिए जल रहे थे दिए कुछ बच्चे बेच रहे होते हैं गुब्बारे! आज क्या वे मना पाएंगे बाल दिवस?

सुबह चाय की दुकान पर गिलास धो रहे बच्चे को तो पक्का नहीं पता होगा।

माँ के साथ महुए के पत्तों की गठरी सम्भाले रेल की पटरी पार करते बच्चों को भी नहीं पता।

और तो और मुझे ही कहाँ पता था? वो तो फेसबुक में पोस्ट दिखी तो याद आया कि आज बाल दिवस है!

अब याद आ गया तो ईश्वर से प्रार्थना है कि सभी बच्चे अपना बचपन बच्चे की तरह ही जी पाएं।

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