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10.9.24

कोरोना काल

कोरोना काल, सितंबर 2020 का पहला सप्ताह कठिन मानसिक यातना वाला गुजरा था। घर से दूर रहने के कारण मैं तो बच गया था, पूरा घर कोरोना पॉजिटिव हो गया था।  सभी घर में ही आइसोलेशन में थे। पूरा घर सील था। बनारस में रहकर भी मैं घर नहीं जा सकता था। घर से थोड़ी दूर एक मित्र के घर रहकर परिवार को दवा, भोजन की व्यवस्था कर रहा था। एक सप्ताह बाद सभी के हालत में सुधार दिख रहा था, लेकिन हालत गंभीर बने हुए थे। 


15 अगस्त 2020 को नाना बना था। सभी बारी-बारी से हॉस्पिटल आ/जा रहे थे। सिजेरियन ऑपरेशन था। अस्पताल में 9 दिन रुकना पड़ा था। मेरा पुत्र जो होली से 15 अगस्त तक कभी घर से बाहर नहीं निकला, वर्क फ्रॉम होम ही करता रहा, वह भी अस्पताल गया था और 2,3 दिन जग गया। वहीं, कहीं या आने-जाने में संक्रमित हो गया। पहले तो बुखार आया, दूसरे दिन सूँघने की क्षमता खतम हो गई। डॉक्टर ने तुरंत कोरोना टेस्ट की सलाह दी। 2 दिन बाद जब तक उसका रिपोर्ट आता सभी में वही लक्षण आने लगे। 


श्रीमती जी भयंकर सावधानी रखती थीं। मैं दूसरे शहर से सप्ताह में एक या दो दिन के लिए घर आता तो मुझे अलग कमरे में कोरेन्टीन कर देतीं। बाकी सब आपस मे हिले मिले रहते थे। बीच मे एक दो सप्ताह तो घर भी नहीं जाता था कि जब वहाँ जाकर कैद ही होना है तो जाने से भी क्या फायदा! परिणाम यह हुआ कि मैं बच गया और सभी संक्रमित हो गए।  


मेरा बचना भी अच्छा रहा। मैं सबकी देख-भाल कर पा रहा था। मैं भी संक्रमित हो गया होता तो कौन मदद करता? सरकारी हॉस्पिटल के ऊपर इतना बोझ था कि वहाँ सब भगवान भरोसे था। प्राइवेट हॉस्पिटल  इतने महँगे थे कि फीस पूछ कर ही हिम्मत जवाब दे जाती थी। कुछ ईश्वर की कृपा और कुछ मित्रों की दुआएँ कि धीरे-धीरे मुसीबत टल रही थी। सबसे कष्ट में 20 दिन के बच्चे को लेकर बड़ी बिटिया थी। 


यह बीमारी जो थी, सो थी, सबको पता ही है लेकिन मेरा अनुभव यह रहा कि इसमें मानसिक संतुलन भी डगमगाने लगा था। पड़ोसी दूरी बनाकर आपका हाल पूछते थे। मुसीबत में कोई साथ नहीं देता था। कुछ तो हाल पूछते भी डरते थे ...कहीं मदद लेने घर में आ गया तो? 


आपके मित्रों/रिश्तेदारों में ही कोई आपके साथ खड़ा हो सकता था। यह बीमारी बड़ी घातक थी। सब कुछ सही रहा, ईश्वर की कृपा रही, होम आइसोलेशन में ही आप स्वस्थ हो गए तो भी आपको एक कठिन मानसिक यातना से गुजरना पड़ता था। इसलिए अच्छा यह था कि शुरू से ही पूरी सावधानी बरतते हुए अपनी शारीरिक क्षमता/सहन शक्ति में वृद्धि की जाय। कोरोना हो ही न, इसी में सबकी भलाई थी। ईश्वर से रोज प्रार्थना करता कि यह कष्ट किसी को न सहना करना पड़े।


15 सितंबर तक घर सील था, उसके बाद घुसने की सोच रहा था। यह बीस दिन के नाती के साथ बिटिया की तस्वीर है, जो कई दिनों बाद सो पाई थी, तस्वीर बेटे ने अपने मोबाइल से लिया था।


19.7.24

कोरोना काल (3)

छत 

.....

कोरोना काल में, घनी आबादी वाले इलाकों की छतों पर, थिरकते हुए उतरती थी शाम, जाने का नाम नहीं लेती। सूरज डूब जाता था, अँधेरा द्वार खटखटाता था मगर शाम थी कि दोनो हाथों से परे ढकेल देना चाहती थी, अंधेरों को। 

छत पर चढ़ा तो जाना, छतें गुलजार उन दिनों गुलजार रहती थीं। कहीं किसी छत पर, गुटर गूँ कर रहा होता नव विवाहित जोड़ा, कहीं इक दूजे को देख, इशारे करती, लजाती, खिलखिलाती किशोरियाँ, कहीं छत को ही जिम बना कर कसरत कर रहे युवा, कहीं पतंग उड़ाता किशोर, कहीं आमने सामने मुंडेर पर खड़ी, हाथ नचाकर बातें करतीं प्रौढ़ महिलाएं, कहीं छत के किसी कोने की कुर्सी पर बैठी, आसमान ताकती बुढ़िया, कहीं यशोदा की तरह अपने ललना को दौड़/पकड़ खाना खिलाती माँ और कहीं मेरी तरह चहल कदमी कर, अकेले स्वास्थ्य लाभ कर रहे प्रौढ़। 

छत पर चढ़ा तो जाना, हम प्रौढ़ हुए थे, बचपना, किशोरावस्था या जवानी सब के सब, जस के तस हैं। कहीं नहीं गए, वैसे के वैसे हैं, जैसे थे। बल्कि कुछ और निखरे-निखरे, कुछ और नए रंगों/वस्त्रों में ढले, कुछ और खूबसूरत हो चुके हैं! 

पहले, हमारे हाथों में, कहाँ होती थीं मोबाइल? कानों में कहाँ ठुंसे रहते थे ईयर फोन? एक को तड़ते हुए, दूसरे से, कहाँ कर पाते थे वीडियो चैटिंग? 

एक थोड़ी नीची छत पर वीडियो चैट करते हुए अपने में मगन टहल रही थी एक नव यौवना। उस घर से सटे दूसरे घर की, थोड़ी ऊँची छत से, उसे अपलक निहार रहे थे, कुछ युवा। जैसे चाँद बेखबर रहता है कि उसे कितने चकोर देख रहे हैं वैसे सबसे बेखबर, मोबाइल देख, कभी हँसती,कभी एक हाथ से मोबाइल पकड़े-पकड़े, दूसरे हाथ को नचाती, कभी किसी बात पर झुँझलाती, अपनी धुन में टहल रही थी चकोरों की चाँदनी।

कोरोना काल में एक तरफ सिसक रही थी जिंदगी तो दूसरी तरफ निखर रही थीं चन्द्रकलाएँ। सोचा करता था, देखें! देखते रहें, क्या-क्या रंग दिखाती है जिंदगी! 

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18.6.24

कोरोना काल (2)

एकाकी जीवन 

....................

एकाकी जीवन की शुरुआत जुलाई 2020 से हुई। जौनपुर में अलग कमरा लेकर रहने लगा। बिस्तर तो मेरे पास था ही, कमरे में चौकी, पंखा पहले से था। 2-4 दिन रिस्क लेकर होटल में खाना खाया फिर धीरे-धीरे किचन के लिए सब आवश्यक सामान खरीद लिया। गैस सिलेंडर एक सहयोगी कर्मचारी ने उपलब्ध करा दिया। खाना पकाने का थोड़ा बहुत अनुभव तो पहले से था, जब फंसता तो फेसबुक में पोस्ट डाल देता जैसे...भुजिया/सब्जी बनाते समय करेला छिलना चाहिए कि नहीं? कोरोना काल में मित्र मानो खाली ही बैठे होते, कमेंट से कई सलाह दे देते। 

एक दिन सुबह चाय बनाने के लिए एक दिन पहले शाम का रखा एक पाव दूध उबाला तो फट गया! बहुत देर तक फटे दूध को उबलते देखता रहा फिर उसमें थोड़ा गुड़ झोंक दिया। चम्मच से तब तक हिलाता रहा जब तक लाल पेड़ा नहीं बन गया। रात की दो बासी रोटियाँ के साथ गुड़ पनीर को लपेट कर खा गया। मान लेता, यह मोदी जी की सलाह पर आफत को अवसर में बदलना हुआ।

एक कमरा, एक किचन, एक बरामदा, लैट्रिन, बाथरूम और थोड़ी खाली जगह बस इतनी ही जगह थी। शाम को छत में घूम सकते थे। मेरे कमरे में बहुत शांति रहती थी। इतनी शांति साधारण मनुष्यों के लिए दुर्लभ थी। ध्वनिप्रदूषण फैलाने वाले जड़/चेतन दोनो प्रकार के यंत्र नहीं थे। मित्र सलाह देते हैं, "बीबी नहीं ला सकते लेकिन टी.वी. तो ला सकते हो? 5, 7 हजार में मिल जाएगी।"

हम सोचते, सीरियल देखना नहीं है, समाचार चैनलों के निर्धारित कार्यक्रमों को सुनने और प्रचार देखने के लिए काहे अपना पैसा खर्च करें? 

इन चैनलों के मालिक, व्यापारियों को या राजनैतिक दलों को चाहिए कि आम जनता को मुफ्त में घर-घर टीवी बांटें और अनुरोध करें कि हमने आपको टी.वी. सप्रेम भेंट किया है तो कृपया मेरा वाला समाचार चैनल जरूर देखिए! 

दूसरा कहे...अच्छा! आपके घर टी.वी. लगाने में फलाने चैनल ने बाजी मारी तो क्या, हम आपको टाटा स्काई या डिश टी.वी. का एक साल का नेटवर्क मुफ्त भेंट करते हैं। आधे समय हमारा वाला चैनल देखिएगा! 

कोई दूसरा चैनल वाला झण्डू बाम या विक्स वेपोरब इस अनुरोध के साथ दे जाय कि हमारे चैनल में शाम को "खास टाइम" या "दंगल" देखने से जो सर दर्द हो जाय तो इसका इस्तेमाल करें!

इन चैनलों को विज्ञापन देने वाले व्यापारियों को भी चाहिए कि विज्ञापन के साथ कुछ पैकेट आम जनता को भी वितरित करें।

मतलब हम पैसा खर्च कर के टी.वी. लाएं, हम नेटवर्क की फीस भरें और देखें क्या, आपका एजेंडा? क्यों भाई, कब तक मूरख बनाओगे? 

बहुत शांति रहती थी कमरे में। पड़ोस में भी शांति थी। लगता था पड़ोसी भी समाचार नहीं देखते। भले चैनल हर समय समाचार दिखाता रहता हो। सुबह काम पर जाने वाले या स्कूल जाने वाले बच्चों के माता पिता, कितनी रात तक समाचार देखेंगे?  बहुत शांति थी पास पड़ोस में भी। सीलिंग फैन की आवाज भी न आती तो पता ही नहीं चलता कि हम धरती के प्राणी हैं!

एक बार एक अधिकारी और दो कर्मचारी के कोरोना पॉजिटिव होने के कारण ऑफिस लॉक हो गया।  समय मिला तो मन मचला। बैगन, टमाटर, आलू भूनकर चोखा बनाने का मन किया। गैस चूल्हे पर रखकर भूनने वाली जाली खरीदने बाजार चले गए। जाली के साथ, एक लोहे की छोटी वाली कड़ाही भी खरीद लिए। सोचा, बारिश हुई और पकौड़ी खाने का मन किया तो फिर कड़ाही के लिए दुबारा आना होगा। 

बरतन बेचने वाली एक महिला थीं। मैने पूछा बैगन, टमाटर तो जाली में रखकर भून लेंगे लेकिन आलू कैसे भूनेंगे? उसने बढ़िया आइडिया दिया, "आलू तो बिना पानी डाले कूकर में पका सकते हैं! आलू को बिना छिले धो कर दो फाँक कर लीजिए और एक चम्मच तेल कूकर में डालकर, उस पर आलू रखकर चढ़ा दीजिए। एक सीटी में आलू पक जाएगा।"

कमरे में आकर दिन में बनारसी अंदाज में बैगन, टमाटर भूनकर, हरी मिर्च, प्याज और कच्चे सरसों के तेल के साथ खूब स्वादिष्ट चोखा बनाया। अरहर की गाढ़ी दाल को देशी घी, जीरा से छौंक दिए। दाल, चावल और चोखा। वाह! उस दिन का लंच लाजवाब था ।

एक दिन शाम को बारिश तो नहीं हुई लेकिन एक मित्र तिवारी जी आ गए।  किचन में रखी, नवकी छोटकी कड़ाही बुलाने लगी। तिवारी जी आधा प्याज और एक बैगन काटकर, दो साबूत हरी मिर्च थाल में सजा दिए। इधर बेसन घुला, उधर कड़ाही चढ़ी आँच पर। वाह! मजा आ गया। खूब स्वादिष्ट पकौड़ी और चाय। हम भी मस्त, तिवारी जी भी खुश।

बेसन ज्यादा घुल गया था तो अंत मे उसे भी कड़ाही में उड़ेल कर पका दिए। रात में बेसन की सब्जी बन कर तैयार हो गई। लेकिन अब न भूख लग रही थी न रोटी बनाने का मन ही हो रहा था। किचन को शुभरात्रि बोला और सो गया। भूख लगेगी तब देखा जाएगा। 

जिस वक्त शाम को हम मोबाइल चार्जिंग में लगाकर खाना पका रहे होते, हमारे शुभचिंतक मित्र खाना पकने की प्रतीक्षा में खुद पक रहे होते। कोई काम तो रहता नहीं, फोन मिलाकर मेरा हाल चाल पूछने लगते थे! उनसे बतियाते हुए, खाना पकाने के चक्कर में सब्जी में कभी नमक ज्यादा हो जाता था, कभी मसाला जल जाता था। मोबाइल भी ठीक से चार्ज न हो पाए। फिर यह निश्चय किया कि खाना पकाते समय मोबाइल स्विच ऑफ रखना है। अब मोबाइल भी चार्ज हो जाती, खाना भी पक जाता। बुद्धि अनुभव से ही आती है। 

एक दिन सोच रहा था, दूध पी लूँ। दूध गाय का है या भैंस का मुझे नहीं पता था। इतना जानता था कि दूध प्लास्टिक के पैकेट में था और मैने दुकानदार से सिर्फ यह पूछा था.. दूध है? पैकेट किस कम्पनी का है, पैकेट के ऊपर क्या लिखा है, कुछ नहीं पढ़ा। फाड़ा, उबाला, उबल गया तो एक कप चाय बनाया और शेष ढक कर रख दिया था। रात के बारह बजा चाहते थे , सोच रहा था, दूध पी लूँ। फ्रिज नहीं था, सुबह तक फट जाएगा, पैसा बर्बाद हो जाएगा। सोच रहा था पलकें बन्द होने, नींद के आगोश में जाने से पहले दूध पी ही लूँ।  इतना आसान भी नहीं था दूध पीना। 5 घण्टे हो चुके थे, ठंडा हो चुका था, फिर उबालना नहीं पड़ेगा क्या? उबलने का इन्तजार करना फिर ठंडे होने का इन्तजार करना, बार-बार उबालने से जो बरतन जल जाता, उसे मांज कर रखना, सब आसान था क्या? जितनी आसानी से सोच लिया..दूध पी लो, उतना सरल था क्या? सरल तब लगता है जब श्रीमती जी रख देती हैं लाकर, टेबुल पर। अकेले घर में, दूध पीना आसान था क्या?

यू ट्यूब में पनीर और शिमला मिर्च की रेसिपी देखूँ या लाइव कविता सुनूँ? बड़ी समस्या थी। वहाँ कोई टोकने/रोकने वाला नहीं था। जितनी मर्जी फेसबुक चलाऊँ या फिर मिर्जापुर पार्ट 2 देखूँ या कोई पसंद की कोई किताब पढूं लेकिन जो आलू गोभी खरीद कर लाता उसे कच्चा तो खाया नहीं जा सकता था!

दिसम्बर का महीना था, कोरोना का आतंक कम हुआ था लेकिन अकेले रहने की आदत पड़ चुकी थी। एक दिन बाहर घना कोहरा था और सुबह से लोकल फाल्ट के कारण बिजली कटी हुई थी। पड़ोसी परेशान होकर सामने बरामदे में टहल रहा था। उसका परिवार बड़ा था और कई किराएदार थे। सुबह से बड़बड़ा रहा था ... भोर में पानी नहीं चलाए, पता नहीं बिजली कब आएगी! लेकिन हम मस्त थे। हमको सिर्फ एक बाल्टी पानी चाहिए थी । स्व0 नीरज याद आ रहे थे ....जितनी भारी गठरी होगी, उतना तू हैरान रहेगा!

एक दिन सोच रहा था, सभी खिड़कियाँ/दरवाजे बन्द होने पर भी कमरे में धूल कहाँ से आ जाते हैं? मेरे कमरे में जाले बुनने के लिए मकड़ियाँ कहाँ से आती है? सफाई न करूँ तो मेरे स्वास्थ्य पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा? मटर के दाने चावल में और टमाटर दाल में डालकर पका दिया जाय तो सब्जी बनाने की क्या जरूरत है? सोच रहा था, आज इतना सोच लिया, शेष कल सोचेंगे। वास्तव में क्या होना चाहिए!

एकाकी जीवन के अनुभव ने एक ज्ञान दिया, "मन ठीक न हो तो खाना बेकार बनता है। दाल में नमक अधिक हो सकता है, सब्जी कच्ची रह सकती है, भात जल सकता है। इसलिए जब खाना खराब हो तो पत्नी पर नाराज होने के बजाय यह पता लगाने का प्रयास करो कि उसका मन दुखी क्यों हैं?"

.........

12.6.24

कोरोना काल (1)

कोरोना काल में हम रोज के यात्रियों का बनारस से जौनपुर जाना-आना असम्भव हो गया था। ट्रेने बंद हो चुकी थीं और बस भी कम ही चलती थी। कोरोना का इतना आतंक था कि मास्क और सेनिटाइजर के प्रयोग के बाद भी किसी कोरोना वाले के सम्पर्क में आ जाने का खतरा बना हुआ था। रोज के यात्रियों की संख्या 100 से अधिक ही थी। हर आदमी का जौनपुर में अलग-अलग फ्लैट लेकर रहना कठिन था लेकिन नौकरी तो करनी थी। न जौनपुर में इतने फ्लैट थे न सभी के लिए पूरे संसाधन जुटा कर अकेले रहना ही संभव था। परिणाम यह हुआ कि 5/7 की संख्या में अपने-अपने ग्रुप बनाकर लोगों ने जौनपुर में कमरा लेकर रहना शुरू किया।

हम पाँच मित्र(जिसमें सभी अधिकारी थे) को जल्दी ही एक महलनुमा घर की तीसरी मंजिल में एक बड़ा हॉल, एक बड़ा किचन, उचित दाम में किराए पर मिल गया। घर बहुत बड़ा था और जिस मंजिल में हम रहते थे, उसमें और दूसरा कोई परिवार न था। बरामदे में नहाओ, गलियारे में नाचो, छत में घूमो, कोई पूछने वाला न था। बिस्तर-चादर सब अपने-अपने घर से ले आए थे और किचन का सामान, बर्तन भी थोड़ा-थोड़ा सभी घर से ले आए थे। विकेंड में या किसी छुट्टी के एक दिन पहले हम मोटर साइकिल चला कर, कभी कार से जौनपुर-बनारस जाते-आते थे। कोरोना काल में उस समय हमे यह सबसे सुरक्षित लगा। मास्क, हेलमेट पहनने के बाद, सुनसान सड़क पर बाइक चलाना, संभावित कोरोना से बचने का सरल उपाय था। 

भोर में उठकर घूमने जाते, चाय पीने के बाद लौटकर बरामदे में मोटे पानी की धार से नहाते, मिलकर भोजन बनाते और ऑफिस जाते। ऑफिस से आने के बाद नहाना, चाय, तास और रोज एक पार्टी। शुक्र है कि कोरोना काल में बियर/शराब की दुकाने खुल गई थीं। सभी के घर वाले चिंतित रहते कि पता नहीं कैसे रहते होंगे, कैसे बनाते, खाते होंगे और हम रोज मौज उड़ा रहे थे जिसका ज्ञान घर वालों को न था। हमने एक बड़ी आपदा को अवसर में बदल दिया था। 

यह सब अधिक दिन नहीं चला। अति हर चीज की बुरी होती है। पार्टी सप्ताह/पंद्रह दिन में एक दिन ठीक होती है लेकिन यह रोज-रोज की पार्टी से मैं घबड़ाने लगा। मेरे पढ़ने, लिखने के शौक में यह बड़ी बाधा थी। रोज शाम को अकेले में मन कचोटता, यह क्या कर रहे हो? ऑफिस के पास एक कमरे का फ्लैट ढूंढने लगा। 2/3 महीने के भीतर ही मन मुताबिक एक फ्लैट मिल गया और मैं सबसे क्षमा मांगते हुए ग्रुप से अलग हो गया। धीरे-धीरे 'एकाकी जीवन' मुझे रास आने लगा।


.......

15.4.22

सोचो तो....


वे दिन भी क्या दिन थे!

हम थे, तुम थे और साफ थीं गङ्गा जी

पोतते थे जिस्म में मिट्टी, तैरते थे घण्टों और

भूख लगने पर 

खा लेते थे 

ककड़ी, हिरमाना, खरबूजा,

प्यास लगने पर

डुबकी मार के

पी लेते थे

पेट भर पानी।


वे दिन भी क्या दिन थे!

हम थे, तुम थे और बोतल का पानी नहीं था

गली के चबूतरे पर बैठा होता था प्याऊ,

घर-घर में होता था कुआँ,

गली-गली में

सरकारी नल या चापाकल।


वे दिन भी क्या दिन थे!

हम थे, तुम थे और कोरोना नहीं था।

न मुख मास्क का झंझट न सेनेटाइजेशन की चिंता

चाट लेते थे, एक दूसरे की

जूठी आइसक्रीम भी।


सोचो तो..

अचानक से नहीं आया कोरोना

पहले मैली हुईं नदियाँ,

सूख गए तालाब और कुएँ,

बोतल में बिकने लगा पानी और तब आया

कोरोना।


सोचो तो..

क्या-क्या देखेंगे आगे

अगर बचे रह गए 

हम तुम।

...........@देवेन्द्र पाण्डेय।

27.7.20

अँधेरा

लाइट चली गई है। मैं अँधरे में हूँ। ऐसा लगता है जैसे मैं ही अँधेरे में हूँ और सबके पास रोशनी है! पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा होगा! केवल मैं ही अँधेरे में हूँ! फिर सोचता हूँ... जब मैंअँधरे में हूँ तो पूरा शहर भला कैसे उजाले में होगा? जब मैं अँधेरे में हूँ तो शहर भी अँधरे में होगा, देश भी अँधेरे में होगा। लाइट का क्या है, आ जाएगी लेकिन यह जो अँधेरा है, बढ़ता जा रहा है। 

कल तक मौत अजनबी लगती थी क्योंकि अजनबियों के मरने की खबरें आ रही थीं। अब लगता है, जानी पहचानी है, क्योंकि अपनो के मरने की खबरें आ रही हैं। बढ़ती जा रही है, कोरोना से संक्रमित हुए लोगों की संख्या। पहले शहर अछूता था अब मोहल्ले भी अछूते नहीं रहे। यह कौन जानता था कि यम भैंस पर नहीं, अपनों के कंधे पर बैठकर आएगा!

वे, जिहोने खरीद लिए हैं रोशनी के चराग, उन्होंने ही, हाँ, उन्होंने ही कैद कर लिया है खुद को एक सुरक्षा चक्र में। खरीद लिए हैं डॉक्टर। खरीद लिए हैं अस्पताल। वैसे ही जैसे खरीद ली हैं.. खबरें। हम जिंदा हैं तो सिर्फ इसलिए कि व्यस्त हैं यमदूत। जिन्हें उठाना था, उठा नहीं पाते। जिनकी बारी नहीं थी, उन्हें लादे चले जा रहे हैं। हम खुश किस्मत हैं कि कहीं, कोई हमसे ज्यादा बदनसीब है। व्यस्त हैं यमराज शायद इसीलिए जीवित हैं हम भी। थक जाएं या हो जाए उनका कोटा पूरा तो शायद बच जांय हम भी, रोशनी वालों की तरह।  अभी तो मैं अँधेरे में हूँ। ऐसा लगता है जैसे मैं ही अँधेरे में हूँ और सबके पास रोशनी है!

24.5.20

बच्चे

रोटी पर बैठकर
उड़े थे
कोरोना खा गया रोटी
पैदल हो गए
सभी बच्चे

तलाश थी
ट्रेन की, बस की
कुचले गए
पटरी पर, सड़क पर

हम
धृतराष्ट्र की तरह
अंधे नहीं थे
देखते रहे दूरदर्शन
देखते-देखते
मर गए
कई बच्चे!

शहर से
पहुँचे हैं घर
बीमार हैं, लाचार हैं
जागते/सोते
देखते हैं स्वप्न...
रोटी का सहारा हो तो
उड़ चलें
फिर एक बार
यहाँ तो
डर है! नफरत है!
कैसे रहें?
..........

20.5.20

बह रही उल्टी नदी.....


तुम नदी की धार के संग हो रहे थे
फेंककर पतवार भी तुम सो रहे थे।

बह रही उल्टी नदी, अब क्या करोगे?
क्या नदी के धार में   तुम फिर बहोगे?

चढ़ नहीं सकती पहाड़ों पर नदी
है   बहुत  लाचार देखो यह सदी।

डूब जाएंगे सभी घर, खेत, आंगन
या तड़प, दम तोड़ देगी खुद अभागन!

किंतु सोचो तुम भला अब क्या करोगे?
बच गए जो भाग्य से क्या फिर बहोगे?

बहना पड़े गर धार में, इतना करो तुम
पतवार भी यूँ भूलकर मत फेंकना तुम

फिर नदी उल्टी बही तो, लड़ सकोगे
जब तलक है प्राण, आगे बढ़ सकोगे।
..............

18.5.20

दृष्टि

हम सभी को मिली है
दृष्टि संजय की!
देख सकते हैं दशा
कुरुक्षेत्र की।

धृतराष्ट्र बन पूछते
कितने मरे?
आज तक घायल हुए
कितने बताओ?

चल रहे हैं सड़क पर
मजदूर सारे
लड़ रहे हैं निहत्थे
क्रूर पल से।

ठीक है किंतु अब तुम
यह बताओ?
क्या कोई, अपना/सगा
घायल पड़ा है?

दूर है काल फिर तो
भय नहीं है
दृष्टि बदलो अब जरा
गाना सुनाओ।

12.5.20

खुश रहिए, मस्त रहिए

हँसाना पहले भी
आसान नहीं हुआ करता था
फिर भी लोग
हँसते थे, हँसाते थे।

अब तो
और भी कठिन हो गया है
दिन ब दिन
बढ़ती जा रही है
दुखियारों की संख्या
और हँसाने वाले, रोने लगे हैं
खुद ही।

फिर भी,
यह जानते हुए भी कि
कम ही होते हैं
जान से ज्यादा
चाहने वाले दुनियाँ में
जब तक
जान में जान है
खुश रहिए, मस्त रहिए
मरना तो है ही
एक दिन
नहीं आया, कोई यहाँ
अमर होकर।
...............

11.5.20

मनहूसियत

नीले आकाश में
टँगा है
गुमसुम आधा चाँद,
चिपके हैं
टिमटिमाते कुछ तारे।

धरती में
चाँद/तारों की तरह गुमसुम
खड़े हैं
कदम्ब, अशोक, आम और..
दूसरे वृक्ष

मेरे आसपास
चाँद, तारों और वृक्षों की तरह
खामोश हैं
मनुष्यों के कई घर

इन्ही घरों के बीच
एक घर की छत पर
मध्यरात्रि में
घूम रहा था
मैं भी
खामोशी से
इस उम्मीद के साथ
कि बहेगी
शीतल पुरवाई
लहराकर झूमेंगी
वृक्षों की शाखें
बादलों से करेंगे आँख मिचौली
चाँद/तारे भी

हाय!
ऐसा कुछ नहीं हुआ
थककर
आज फिर पकड़ लिया बिस्तर
खैर...
कल फिर सुबह होगी
देखेंगे..
कबतक छाई रहती है
धरा में
यह मनहूसियत!

रोटी और नींद

औरंगाबाद की घटना सुनी तो पहले लगा, कहीं चलते-चलते हारकर सामूहिक आत्महत्या तो नहीं कर लिया मजदूरों ने! फिर पता चला नहीं, थककर चूर हो गए थे और सो गए थे रेलवे ट्रैक पर। इस घटना से नींद की गहराई का पता चलता है। कितनी गहरी हो सकती है नींद! रेलवे ट्रैक पर भी आ सकती है ! मालगाड़ी की आवाज से भी नहीं टूटती। ट्रैक पर रोटियाँ बिखरीं थीं मतलब उस दिन दुर्भाग्य से पेट भर गया होगा मजदूरों का। भूखे होते तो शायद नहीं आती इतनी गहरी नींद। किसे पता था कि पेट का भरा होना भी, मौत का कारण हो सकता है!

कभी हमको भी आती थी नींद। सोए रहते थे बरामदे में और आतिशबाजी करते हुए संकरी गली से गुजर जाती थी पूरी बारात लेकिन नहीं टूटती थी नींद। वो बचपन के दिन थे। वो दिनभर खेलते रहने के बाद की थकान थी। यह दिनभर रेलवे ट्रैक पर पैदल चलने की थकान है। बहुत फर्क है दोनो थकान में लेकिन नींद में कोई फर्क नहीं। घर में सोए हो तो गली से, गुजर जाती है पूरी बारात, ट्रैक पर सोए हो तो तुम्हें चीरकर, फाड़ते हुए, गुजर सकती है मालगाड़ी।

मजदूरों की नींद नहीं टूटी लेकिन उनके मरने के बाद जाग गई सरकारें। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। अक्सर, हादसों के बाद ही, टूटती है, सरकारों की नींद। विशाखापत्तनम में जागी, औरंगाबाद में जागी और आगे न जाने कितनी बार हमको/आपको आएगी नींद और न जाने कितनी बार जागेंगी सरकारें! 

नींद बड़ी जालिम चीज है। हमारी हो, सरकारों की हो या दूसरे जिम्मेदारों की, जब-जब पेट भरेगा, आएगी जरूर। भूखे को नहीं आती। भूख, भोजन और नींद का आपस मे बड़ा गहरा गठजोड़ है। श्रमिक को थकान लगती है, भूख लगती है और रोटी मिल जाय तो नींद भी लगती है। जैसे रोटी जरूरी है, नींद भी जरूरी है। नींद न लगे तो श्रमिक नहीं कर पाता श्रम। अपने और अपने परिवार की रोटी और नींद से अधिक कुछ सोच भी नहीं पता श्रमिक। सोच ही नहीं पाता तो चाहेगा क्या! मालिक को श्रम चाहिए तो इतना तो करना पड़ेगा। श्रम के बदले, श्रमिकों के लिए रोटी और नींद की व्यवस्था तो करनी पड़ेगी।

रोटी और नींद की व्यवस्था होती तो वह घर नहीं जाता। वह अपने उसी गाँव में वापस जाना चाहता है जहाँ उसके पास काम नहीं है लेकिन उम्मीद है कि वहाँ अपने लोग हैं। आधी रोटी खा कर भी आधी रोटी खिलाएंगे। बहुत खुशी से नहीं जा रहा है घर। तुम्हारा धंधा बन्द हो गया, तुम्हें काम नहीं चाहिए तो छीन ली तुमने उसकी रोटी। दुखी होकर जा रहा है। पैदल जा रहा है। रेलवे ट्रैक पर जा रहा है। जब रोटी मिलती है तो इतनी ताकत भी नहीं बचती कि सोने के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना ढूँढ सके। जहाँ है, वहीं सो जा रहा है। सड़क है तो सड़क पर, रेलवे ट्रैक है तो रेलवे ट्रैक पर। हम उनकी तरह थके नहीं हैं, हमारा पेट भरा है और हमको बुद्धि भी आती है कि उन्हें रेलवे ट्रैक पर नहीं सोना चाहिए था। वे थके हैं, भूखे हैं तो जहाँ रोटी मिलेगी, वहीं सो जाएंगे। वे नहीं जागे लेकिन हे मालिक! अब तुम जाग जाओ। रोटी नहीं दे सकते तो सुरक्षित घर तक पहुँचाओ। मत भूलो कि कल फिर सूरज निकलेगा, कल फिर खुलेंगे कारखाने और कल फिर तुम्हें इनकी आवश्यकता पड़ेगी।
...@देवेन्द्र पाण्डेय।

9.4.20

अछूत

खबरों में सुना
एक देश में एक आदमी मर गया
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा
मरने वाला वैसे ही मरा था जैसे
मरता है कोई आदमी

कुछ दिनों बाद सुना
दूसरे देश में
एक और आदमी मर गया
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा
मरने वाला वैसे ही मरा था जैसे
मरता है कोई आदमी

कुछ दिनों बाद सुना
एक और देश में, एक और आदमी मर गया!
यह सुनकर मैं झुँझला गया
आखिर
आदमी के मरने से
यह दुनियाँ
इतनी हैरान/परेशान क्यों है?
हाइलाइट क्यों हो रही हैं
आदमी के मरने की खबरें?
आदमी तो
मरने के लिए पैदा ही होता है
कौन सी बड़ी बात हो गई जो
आदमी मर गया?

पढा तो चौंक गया..
अलग-अलग देशों में
एक ही रोग से
मर रहे हैं आदमी
और किसी देश के पास नहीं है
रोग की दवा!

तब भी मुझे
कोई फर्क नहीं पड़ा
आखिर मेरे देश में तो अबतक
कोई नहीं मरा!

आखिर
वह मनहूस दिन भी आया जब
आदमी से आदमी तक होता हुआ
रोग का वायरस
मेरे देश में आ गया!

फिर भी मैं
तनिक न घबड़ाया
मरने वाला
मेरे देश का जरूर था लेकिन
मेरे राज्य का नहीं था, मेरे शहर का नहीं था,
उससे मेरा
दूर-दूर तक
कोई रिश्ता/नाता न था,
कोई यारी/दोस्ती
नहीं थी
मरने वाला
आदमी था
फकत एक आदमी

धीरे-धीरे
रोग ने
मेरे राज्य में, मेरे शहर में
कदम बढ़ाना शुरू किया
परेशान तो तब जाकर हुआ जब
मेरे राजा ने
मेरे घर के सामने
एक लक्ष्मण रेखा खींच दी और कहा..
तुम्हें
घर में ही रहना है
यह छूत का रोग है
एक दूसरे को
छूने से ही नहीं, उसके छुए हुए को,
छूने से भी, फैलता है!

अब मैं
मरने से अधिक
इस बात से परेशान हूँ
कि गलती से कहीं
अछूत न हो जाऊँ!

वैसे तो
अस्पृश्यता के खिलाफ
बहुत बार बोला
लेकिन अछूत होना
इतना पीड़ादायक होता है
यह अब जाकर
समझ में आया।
......................

23.3.20

लोहे का घर 59

आज बन्द हो गया लोहे का घर। ऐसा दिन भी आएगा, यह किसी ट्रेन ने नहीं सोचा होगा! कई बार तुम ठहर गए, हम ठहर गए लेकिन नहीं रुकीं फोटटी नाइन, फिफ्टी डाउन, एस. जे. वी. पैसिंजर, दून, किसान, ताप्ती या बेगमपुरा। 

'चलती का नाम गाड़ी' है तो गाड़ी के रुकने का मतलब जीवन का ठहर जाना भी है। आज ठहर गया है लोहे का घर, ठहर गए हैं हम और जहाँ का तहाँ, ठहर गया है देश भी। 

एक दिन जीवन में, यम सभी के पास आता है लेकिन आने से पहले डुगडुगी बजाता है... आ रहा हूँ मैं! ऐसे सामूहिक रूप से सबकी छाती में, एक साथ मूँग दलते हुए नहीं आता। थोड़ी आँखों की रोशनी छीनता है, थोड़ी बालों की कालिमा लूटता है, दो चार दाँत तोड़ता है कहने का मतलब संभलने का पूरा मौका देता है मगर ऐसे, सभी के सर पर, एक साथ मृदंग नहीं बजाता। 

बहुरूपिया है यमराज। तरह-तरह के भेष बदल कर आता है। भैंसा वाला भेष तो सिर्फ चित्रों में देखा है। आंधी, तूफान, बादल, बिजुली, अच्छर-मच्छर बनते कई बार देखा। कभी आदमी बनकर नहीं आया था इस बार आदमी बनकर आया है। डेंगू से खतरनाक है आदमी में प्रवेश कर चुका कोरोना। पहचान में नहीं आता। मच्छर नहीं है कि फ्लीट छिड़क कर साफ कर दिया जाय, आदमी है। आदमी भाई भी है, बन्धु भी। परिवार का अंग भी, जीवन साथी भी। कैसे पहचानें कौन शत्रु है? कौन मित्र? बचें या बचाएँ? भागें तो कैसे भागें? लड़ें तो कैसे लड़ें? बस एक ही उपाय है खुद को काल न बनने दें। कोरोना को अपने भीतर प्रवेश ही न करने दें। अपने साथ साथ, परिवार और देश को भी बचाएँ। हम यह कर सकते हैं।

आज क्रोध में है लोहे का घर। बोल दिया है लोहे के घर ने..जाओ! नहीं ले जाते तुम्हें। अपने-अपने घरों में कैद हो जाओ। खुद को कोरोनटाइन करो, फिर आना। ऐसे यात्रियों की कल्पना भी नहीं की होगी लोहे के घर ने। बहुत दुखी हुआ होगा जब पता चला होगा कि आदमी में प्रवेश कर चुका है राक्षस। खुद ही मारने लगा है, एक दूसरे को।  

शुक्र है कि पटरी से उतरी नहीं है गाड़ी सिर्फ थमे हैं चक्के। हम संभले तो फिर चलने लगेगी ट्रेनें। गुलजार होगा मेरा और आपका भी, लोहे का घर।