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28.8.18

हे कृष्ण!

कभी
बीनता था झाँवाँ 
रेल पटरियों के किनारे
सजाता था पहाड़ 
मनाता था
कृष्ण जन्माष्टमी
आज
बैठा हूँ ट्रेन में
देख रहा हूँ
गिट्टी गिट्टी
रेल की पटरियाँ
न बचपन
न साथी,
न भाप के ईंजन
न कोयला,
न झाँवाँ
न पहले जैसा मन।

दौड़ती भागती
बिछी बिछाई पटरी पर
चल रही है 
अपनी गाड़ी।

हे कृष्ण!
इस बार आना तो
आने से पहले
दे जाना
थोड़े बुरादे
थोड़े इरादे
थोड़े खिलौने
छोटा सा पहाड़ 
और...
थोड़ा सा बचपन।
....

15.8.17

सृजन और संहार का मौसम

सच है
यह मौसम
सृजन और संहार का है।

खूब बारिश होती है
इस मौसम में
लहलहाने लगते हैं
सूखे/बंजर खेत
धरती में
अवतरित होते हैं
झिंगुर/मेंढक/मच्छर और..
न जाने कितने
कीट,पतंगे!

आंवला या कदम्ब के नीचे
बैठ कर देखो
हवा चली नहीं कि
टप-टप
शाख से झरते हैं
नन्हे-मुन्ने
फल।

सब
तुम्हारी तरह
नहीं कर पाते
यमुना पार
डूब जाते हैं
बीच मझदार

सच है
असफल हो जाते हैं
सभी
मानवीय प्रयास
जब
फटते हैं बादल
आती है
बाढ़।

सच है
यह मौसम
सृजन और संहार का है।

फिर?
काहे को बने हो देवता?

कान्हा! जाओ!!
अभी पैदा हुए हो
अपनी जान बचाओ
खूब रासलीला करो
मारोगे कंस को?
जीवित रहे
तो हम भी
बजा देंगे
ताली।
........

29.8.16

जन्माष्टमी

हे कृष्ण!

इस बार भी
जिन्हे जन्माष्टमी का मजा लेना था
खूब लिया
झांकी सजाई तुम्हारी
गाई रासलीला भी
जिन्हे बाढ़-बारिश में परेशान होना था
खूब हुए
बच्चा भी जन्मा
नदी पार करते
नाव में
करते रहे क्रंदन
बचा लो अब हमे ईश्वर!

कंस
दिखाई नहीं दिया
मगर
सुनाई देता रहा
अट्टाहास

एक होता तो
दिखाई देता शायद
सभी के
अपने-अपने कृष्ण
सभी के
अपने-अपने कंस।