कभी
बीनता था झाँवाँ
रेल पटरियों के किनारे
सजाता था पहाड़
मनाता था
कृष्ण जन्माष्टमी
आज
बैठा हूँ ट्रेन में
देख रहा हूँ
गिट्टी गिट्टी
रेल की पटरियाँ
न बचपन
न साथी,
न भाप के ईंजन
न कोयला,
न झाँवाँ
न पहले जैसा मन।
दौड़ती भागती
बिछी बिछाई पटरी पर
चल रही है
अपनी गाड़ी।
हे कृष्ण!
इस बार आना तो
आने से पहले
दे जाना
थोड़े बुरादे
थोड़े इरादे
थोड़े खिलौने
छोटा सा पहाड़
और...
थोड़ा सा बचपन।
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