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15.8.13

फील गुड

का 'इनरासन' भयल फील गुड ?

का पिसान, का चावल मालिक
दुन्नो नौ दू ग्यारह!
साठ रूपैय्या प्याज बिकत हौ
आलू साढ़े बारह!

इहाँ बैड-बैड हौ मालिक, नाहीँ कउनो गुड !
का 'इनरासन' भयल फील गुड ?

रोज-रोज कs रोना सुनिके 
कनवां पाक गइल !
कल पनरह अगस्त हौ जरको 
खुशिये ना भइल !

का फोकट में मिली मजूरी? तब तs वेरी गुड !
का 'इनरासन' भयल फील गुड ?

महिनन से मेहरारू बीमार हs
लइकी के पिलिया
लइका क फीस ना जुटल
कइली सब किरिया

दू जून क रोटी भारी, मिले न धेली-गुड़!
का 'इनरासन' भयल फील गुड?

का पनरह अगस्त के तोता
आजादी पा जाई ?
का चोट्टन के टिकस ना मिली
सब जेल चल जाई ?

ढेर दिल्लगी नाहीं होला, कब्बो वेरी गुड !
का 'इनरासन' भयल फील गुड?

13.8.10

आगे पंद्रह अगस्त कs लड़ाई हौ....... !

एक दिन, एक गरीब / अनपढ़ रिक्शे वाले से बातचीत के दौरान मुझे अनुभव हुआ कि यह शख्स, १५ अगस्त का शाब्दिक अर्थ आजादी ही समझता है न यह कि इस दिन देश आजाद हुआ था. वह कहता है कि आगे १५ अगस्त कs लड़ाई हौ.. तो वह यह कहना चाहता है कि आजादी के लिए संघर्ष तो आगे है. आजादी का अर्थ उसके लिए वह दिन है जब उसे भूखा न सोना पड़े, जब उसके बच्चों को शिक्षा आसानी से उपलब्ध हो, फीस-ड्रेस के लिए तड़फना न पड़े, पांच साल पहले बरसात में गिरी एक कमरे के घर वाली छत फिर से बन जाय, अपनी पत्नी को अस्पताल ले जाय तो उसका  इलाज उसके द्वारा कमाए जा सकने वाले पैसे में ही हो  जाय, उसे कभी कुत्ता काट ले तो इंजेक्शन के लिए मालिक से लिए गए ऊधार को चुकाने के एवज में, महीनों बेगार रिक्शा न चलाना पड़े, आजादी का मतलब तो वह यह समझता है कि जिस रिक्शे को वह दिनभर चलाता है उसे देर शाम मालिक को किराए के पैसे के साथ न लौटाना पड़े. प्रस्तुत है इसी सोच में डूबी एक कविता जिसे मैने काशिका बोली में लिखी है. काशिका बोली यानी काशी में बोली जाने वाली बोली. सभी को स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर ढेर सारी बधाई तथा इस ब्लॉग से स्नेह बनाए रखने के लिए आभार.


आगे पंद्रह अगस्त कs लड़ाई हौ.... !


अबहिन तs                                                                
स्कूल में
लइकन कs
नाम लिखाई हौ
फीस हौ
ड्रेस हौ
कापी-किताब हौ
पढ़ाई हौ
आगे.......
पंद्रह अगस्त कs लड़ाई हौ।


तोहरे घरे
सावन कs हरियाली होई बाबू
हमरे घरे
महंगाई कs आंधी हौ
ई देश में
सब कानून गरीबन बदे हौ
धनिक जौन करैं उहै कानून हौ
ईमानदार 
भुक्कल मरें
चोट्टन कs चांदी हौ

कहत हउआ
सगरो सावन कs हरियाली हौ ?
रिक्शा खींचत के प्रान निकसत हौ बाबूssss
देखा....
कितनी खड़ी चढ़ाई हौ !

एक्को रूपैय्या कम न लेबै भैया
आगे...
पंद्रह अगस्त कs लड़ाई हौ !