मिर्जा की बात सुनकर मैं सकपका गया-'का मिर्जा! हम तोहके बनारसी ठग लगत हई?' मिर्जा बोले-'त का तोहरे कपारे पे लिखल हौ कि तू बड़का ईमानदार हउआ?' फिर हिन्दी में समझाने लगे-'ये लोग नागपुर से आए सीधे-सादे तीर्थयात्री हैं। इन्होने सुन रख्खा होगा कि बनारसी ठग होते हैं। इसलिए ये अपना सामान कहीं रखना नहीं चाहते होंगे। सभी साथ होंगे तो कोई समान ले नहीं पाएगा। इसलिए ये घूमते हुए भी सामान सर पर ढो रहे हैं।'
मिर्जा की बात मेरे समझ में आ गई लेकिन नजर इनके सामानों पर ठहर गई! हँसते हुये बोला-गठरी में बहुत माल हौ का मिर्जा? मिर्जा ने ठहाका लगाया-'नीयत खराब हो गयल बाबा! गेट पर समान रख्खे बदे 10 रूपिया जेकरे पल्ले ना हौ, ऊ का माल धरी हो? चला! चाय पियावा बहुत मगजमारी क लेहला।'
और हम हंसते हुए माटी के कुल्हड़ में जाड़े की धूप पीने लगे।