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6.12.15

सुबह की बातें (गठरी वाले घुमक्कड़)


धमेख स्तूप सारनाथ वाले पार्क में प्रातः भ्रमण के समय हम हाथ फेंककर घूम रहे थे और कुछ लोग सर पर भारी बोझ लादे घूम रहे थे! मुझे आश्चर्य हुआ। एक को रोककर पूछा-भाई! आपलोग ये भारी बोझ सर पर लादे क्यों घूम रहे हैं? एक महिला ने जवाब दिया...'क्या करें? गेट पर हर एक का 10 रूपिया मांग रहा था!' मुझे लगा ये लोग तो आम आदमी से भी गरीब हैं! गरीब हो कर भी घूमने का शौक रखते हैं!!! फिर बोला-'अरे! तो सब सामान एक स्थान पर रख दीजिये। आपके साथ इतने आदमी हैं, किसी को सामान देखने के लिए लगा कर बाकी लोग आराम से घूम सकते हैं!!!' उन्होने मेरे बात सुनी अनसुनी कर दी और कन्नी काट कर आगे बढ़ गये। हमारे साथ मिर्जा भाई भी घूम रहे थे। हँसते हुए बोले- जाय दा मरदवा! ई तोहें बनारसी ठग समझत हउवन! इनके लग्गे जइबा त भागे-दौड़े लगीहें। तू इनहन का भलाई नाहीं करत हउआ, डरवावत हौआ! इनहने के अइसे मौज आवत हौ।' 

मिर्जा की बात सुनकर मैं सकपका गया-'का मिर्जा! हम तोहके बनारसी ठग लगत हई?' मिर्जा बोले-'त का तोहरे कपारे पे लिखल हौ कि तू बड़का ईमानदार हउआ?' फिर हिन्दी में समझाने लगे-'ये लोग नागपुर से आए सीधे-सादे तीर्थयात्री हैं। इन्होने सुन रख्खा होगा कि बनारसी ठग होते हैं। इसलिए ये अपना सामान कहीं रखना नहीं चाहते होंगे। सभी साथ होंगे तो कोई समान ले नहीं पाएगा। इसलिए ये घूमते हुए भी सामान सर पर ढो रहे हैं।' 

मिर्जा की बात मेरे समझ में आ गई लेकिन नजर इनके सामानों पर ठहर गई! हँसते हुये बोला-गठरी में बहुत माल हौ का मिर्जा?  मिर्जा ने ठहाका लगाया-'नीयत खराब हो गयल बाबा! गेट पर समान रख्खे बदे 10 रूपिया जेकरे पल्ले ना हौ, ऊ का माल धरी हो?  चला! चाय पियावा बहुत मगजमारी क लेहला।'

 और हम हंसते हुए माटी के कुल्हड़ में जाड़े की धूप पीने लगे।


   

10.2.14

दिल धक-धक करने लगा...

इस मौसम में माधुरी दीक्षित की याद आ रही है और याद आ रहा है उनका गाया सुपर हिट गीत—दिल धक-धक करने लगा...। 

मैने घर-बाहर टटोला तो पाया कि मेरा ही नहीं, सभी का दिल धक-धका रहा है। जो दफ्तर में हैं उनका भी, जो बेरोज़गार सड़क पर घूम रहे हैं उनका भी। जो पढ़ रहे हैं उनका भी, जो पढ़ा रहे हैं उनका भी। गुरूजी समझा रहे हैं-मन लगाकर पढ़ों बच्चों परीक्षा की घड़ी निकट है!’ मगर आग दोनो तरफ बराबर भड़की हुई है। गुरूजी का ध्यान अपनी अधिक आयकर कटौती पर है तो विद्यार्थियों का अपने वेलेनटाइन पर।

घर से दूर पढ़ने वाले बच्चे, काम करने वाले लोग सभी परेशान हैं। दो दिन की छुट्टी में घर जाऊँ या नहीं? घर में त्योहार मनाने के एवज में होने वाले खर्च का हिसाब-किताब लगा रहे हैं। मौज की कीमत आंकी जा रही है। त्योहारों की सनसनाहट के बीच चुनाव के बादल भी गरज़ रहे हैं। बड़ा  दिल धड़काऊ, मन भड़काऊ, पंख फड़फड़ाऊ मौमस आया है!

दो पड़ोसन आपस में बतिया रही थीं....

पहली ने कहा- सुनिये न...आपके ससुर जी तो हमेशा कहा करते थे मेरा दिल धड़क रहा है मगर कल मैने सुना आपके श्रीमान जी भी? लगता है आपके घर होली अभिये आ गई!”

दूसरी ने हाथ नचाते हुए उत्तर दिया-क्यों? श्रीमान जी का सुन लिया! टिंकू का नहीं सुना ? वह भी तो आज स्कूल से आते ही बस्ता पटक कर बड़बड़ा रहा था-मेरा दिल धड़क रहा है!’

पहली आँखें फाड़कर उछली- अच्छा! टिंकू भी..वेलेनटाइन...!!!”

तुम्हारा सर। पिताजी दिल के मरीज हैं। इनके दफ्तर में काम का बोझ है। टिंकू परीक्षा से घबड़ा रहा है। होली मेरे घर में नहीं तुम्हारे कपार चढ़कर नाच रही है।

दोनो के झगड़े को सुनकर अपना दिल तो और भी धक-धक करने लगा। :)

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