Showing posts with label होली. Show all posts
Showing posts with label होली. Show all posts

18.3.14

रंगों का इंद्रधनुष


होली में बाबा देवर लागें। जैसे ही यह वाक्य कान में पड़ा मैं पूरी तरह ज़वान हो गया। जब बाबा देवर हो सकते हैं तो हम क्यों नहीं? हम तो अभी वैसे भी ज़वान हैं। अब समस्या यह थी कि ज़वान तो हो गये मगर ज़वानी दिखाई कहाँ जाय पुरानी बीबी को ज़वानी दिखाने से क्या लाभ ? नई मिले तो कैसे मिले ? पड़ोस में ताका-झांकी ठीक नहीं। समय भी कम था। बहुत समय तो यही समझने में चला गया कि मैं ज़वान हूँ। वैसे भी पाँच दिन की होली एक दिन में सिमट चुकी है। होली के जाते ही जवानी कहीँ चली न जाय। बुढ्ढे हो चले दोस्तों को बताया तो वे मारे खुशी के चहकने लगे। कहने लगे.. हाँ यार! कुछ हमको भी ऐसा ही महसूस हो रहा है। हम भी नई ताकत महसूस कर रहे हैं। सब भोलेनाथ की कृपा है। चलो पहले उनका आशीर्वाद ले लिया जाय। उनको थैंक्यू बोल दिया जाय। 

हम बाबा के दरबार में पहुँचे तो वहाँ भीड़ अधिक नहीं थी लेकिन आरती की तैयारी चल रही थी। शिवलिंग की सफाई हो रही थी। दर्शन हुआ मगर लिंग पकड़ने का क्या, छूने का भी अवसर नहीं मिला। पुजारियों का एकाधिकार था। दोस्त गिड़गिड़ाते रहे मगर उन्होने एक न मानी। उनसे उलझने की हिम्मत नहीं थी। गोरे-गोरे मुष्टंडे। हों भी क्यों न! हम एक बार पर भर के लिए छू कर नई उर्जा का एहसास करते हैं, वे तो हरदम उसी में डूबे रहते हैं। 

वहाँ से निकलकर दालमंडी गये। धर्म से काम की गली। जैसे विश्वनाथ गली धर्म की गली है वैसे दालमंडी कभी वेश्याओं, मुजरेवालियों के लिए जाना जाता था। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष सभी की गलियाँ चौक से होकर निकलती हैं। यह आप पर निर्भर है कि आप किस गली मुड़ना चाहते हैं। हम बाबा की कृपा से जवान हुए थे। सो उनका आशीर्वाद लेकर धर्म गली से काम गली की ओर मुड़ गये। वैसे अब यहाँ न मुजरा होता है न मुजरेवालियाँ मिलती हैं। काम गली, अर्थ गली में परिवर्तित हो चुकी है। बड़ा बाजार लगता है। सभी प्रकार के सामान उचित दाम पर मिल जाते हैं। बनारस में टोपी पहनी और अपनी दूसरे को पहनाई जाती है। हमे होली के लिए नई टोपियों की तलाश थी। 

गली में घुसते ही किशोरावस्था की नादानियाँ कौंध जाती हैं। यार दोस्त होली के दिन रंग खेलते-खेलते इस गली में घुस जाते थे। वे भी नये लौंडों को देखकर मस्त होती थीं। न वे नीचे उतरतीं न हममे सीढ़ियाँ चढ़ने की औकात थी। बस खिड़की से ही गालियों, इशारों का आदान-प्रदान होता था। जब पानी सर से ऊपर हो गुजरने लगता झट से कई खिड़कियाँ एक साथ खुलतीं और हम पर रंगों की बरसात हो जाती। हम और मस्ती में किलकते-उछलते । हम तब हटते जब खिलड़कियाँ पूरी तरह से बंद हो जातीं या फिर हमसे जोशिले ताकतवर लड़कों का बड़ा झुंड हमे वहाँ से भागने के लिए मजबूर कर देता। 

टोपियाँ लेकर गोदोलिया चौराहे से भाँग-ठंडई छानकर, मलाई रोल चाभते जब हम दशाश्वमेध घाट गये तो वहाँ का नजारा बड़ा फीका-फीका नजर आया। हम होरियाये मूड में दशाश्वमेध घाट पहुँचे थे मगर कुछ को छोड़कर बाकी गंगा आरती के बाद वाले सन्नाटे में डूबे हुए थे। दूसरे यात्री गंगा आरती के बाद लौट रहे थे। कुछ विदेशी घाट की सीढ़ियों पर रंग पोताये बैठे, बतियाते दिखे। महिलाएँ भी दिख रही थीं। हम जब छोटे थे, रंगभरी एकादशी से होली के दिन तक महिलाएँ घर से बाहर नहीं निकलती थीं। गली-गली में माहौल इतना गाली-गलौज, होली के हुड़दंग का रहता था कि वे चाहकर भी नहीं निकल पाती थीं। घर के मुखिया भी निकलने की इजाजत नहीं देते थे। अब दृष्य काफी बदल चुका है। महिलाएँ जमकर खरीददारी करती हैं, कहीं-कहीं बाहर निकलकर रंग भी खेलती हैं। 

माहौल देखकर मुझे लगा कि होली को राजनीति की नज़र लग चुकी है। टेढ़ीनीम पर भाजपाई थालियों में गुझिया, मगही पान पर मोदी के छोटे-छोटे चित्र सटाये, दुकान सजाये बैठे थे। अस्सी भी पूरी तरह राजनैतिक माहौल में डूबा हुआ था। पिछले साल की तरह होली के मूड में नहीं था। रास्ते में होलिका सजी थी। बाजार खूब सजे थे। भीड़ थी। मुझे लगा होली को सभी ने अपनी-अपनी मर्जी से बांट लिया है। कुछ बाजार ले गये हैं, कुछ राजनीतिज्ञों को चढ़ा आये हैं, कुछ आभासी दुनियाँ में सिमट गये हैं, कुछ कवि सम्मेलन के नाम पर नौटंकी कर रहे हैं और कुछ हमारे जैसे जबरी जवान बने, किसी अंग्रेज बुढ़िया के बालों जैसी टोपी लगाये गली-गली घूम रहे हैं। सात रंग अलग-अलग दिखें तो समझ में नहीं आते, मिल जायं तो इंद्रधनुष बन जाते हैं। रंगों का इंद्रधनुष मुझे तो नहीं दिखा..आपको दिखा हो तो आपको बहुत बधाई। 


 .........................

22.2.14

गाँव


एक गाँव है
जहाँ सभी की
खाट खड़ी है
इक कुआँ है
जिसमें चउचक
भांग पड़ी है
कोई बांट रहा है लड्डू
कोई खील-बतासे
और जगत पर
डटे हुए हैं
जनम-जनम के प्यासे

मैं भी यहीं खड़ा हूँ।

हाथी
चुल्लू भर पानी तो
चीँटी
मांग रही तालाब
कौए
गीता बांच के बोले
पूरा है बकवास

कृष्ण
भगवान नहीं थे!

कोई खेले
कीचड़-कीचड़
कोई गा रहा
मल्हार
फागुन के मौसम में बारिश
कैसे न हो यार ?

होलिका भीग रही है।
..................

कविता के बाद....

सारे जहाँ से अच्छा
है गाँव यह हमारा
हम चुलबुले हैं इसके
यह जान है हमारा

यहीं जमाओ डेरा-डंडा
यहीं जमाओ पाँव
इससे अच्छा इस दुनियाँ में
कहीं नहीं है गाँव

पानी मस्त है यार!
……………


10.2.14

दिल धक-धक करने लगा...

इस मौसम में माधुरी दीक्षित की याद आ रही है और याद आ रहा है उनका गाया सुपर हिट गीत—दिल धक-धक करने लगा...। 

मैने घर-बाहर टटोला तो पाया कि मेरा ही नहीं, सभी का दिल धक-धका रहा है। जो दफ्तर में हैं उनका भी, जो बेरोज़गार सड़क पर घूम रहे हैं उनका भी। जो पढ़ रहे हैं उनका भी, जो पढ़ा रहे हैं उनका भी। गुरूजी समझा रहे हैं-मन लगाकर पढ़ों बच्चों परीक्षा की घड़ी निकट है!’ मगर आग दोनो तरफ बराबर भड़की हुई है। गुरूजी का ध्यान अपनी अधिक आयकर कटौती पर है तो विद्यार्थियों का अपने वेलेनटाइन पर।

घर से दूर पढ़ने वाले बच्चे, काम करने वाले लोग सभी परेशान हैं। दो दिन की छुट्टी में घर जाऊँ या नहीं? घर में त्योहार मनाने के एवज में होने वाले खर्च का हिसाब-किताब लगा रहे हैं। मौज की कीमत आंकी जा रही है। त्योहारों की सनसनाहट के बीच चुनाव के बादल भी गरज़ रहे हैं। बड़ा  दिल धड़काऊ, मन भड़काऊ, पंख फड़फड़ाऊ मौमस आया है!

दो पड़ोसन आपस में बतिया रही थीं....

पहली ने कहा- सुनिये न...आपके ससुर जी तो हमेशा कहा करते थे मेरा दिल धड़क रहा है मगर कल मैने सुना आपके श्रीमान जी भी? लगता है आपके घर होली अभिये आ गई!”

दूसरी ने हाथ नचाते हुए उत्तर दिया-क्यों? श्रीमान जी का सुन लिया! टिंकू का नहीं सुना ? वह भी तो आज स्कूल से आते ही बस्ता पटक कर बड़बड़ा रहा था-मेरा दिल धड़क रहा है!’

पहली आँखें फाड़कर उछली- अच्छा! टिंकू भी..वेलेनटाइन...!!!”

तुम्हारा सर। पिताजी दिल के मरीज हैं। इनके दफ्तर में काम का बोझ है। टिंकू परीक्षा से घबड़ा रहा है। होली मेरे घर में नहीं तुम्हारे कपार चढ़कर नाच रही है।

दोनो के झगड़े को सुनकर अपना दिल तो और भी धक-धक करने लगा। :)

…………………….

28.3.13

कहाँ गई होली...!


बसंत आया
सरसों के फूल खिले
गेहूँ की बालियाँ लहलहाईं
झूमने लगे अरहर
सूखी सनाठी को पकड़कर
इक-दूजे से
लिपटने लगीं लताएँ
धरती माँ ने
अपने दुलारे
सबसे बूढ़े पीपल को भी
उबटन लगाकर
लौटा दिया
उसका बचपन।

हर बार की तरह
इस बार भी
पकृति ने रंग जमाया
अंकुरित होती
जवान होती
खिलती-फूलती
नाचती-गाती
नखरे दिखाती
आ गई होली।

प्रकृति के बदलते तेवर देख
मन मचला
तन बहका
पुराने वस्त्रों को
नकली रंगों से
खूब किया मैला और..
छुड़ाते रहे देर तक
पुराने चमड़े की
नई कालिख!

नए वस्त्र पहने
गुलाल लगाया
एक ढूँढो
हजार मिलते हैं
कई थे
अपने जैसे
मस्ती में डूबे
सबसे गले मिले
खूब किया बचपना
लगा कि अपनी
हो गई होली।

हाय!
हम पीपल न हुए
न लगा पाये
उसके जैसा उबटन
न लौटा पाये बचपन
न हो पाये जवान
पचपन के थे
पचपन के ही रहे
जस के तस
महंगाई से परेशान
ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीज
जवान होती बेटियों की चिंता में घुले रहने वाले
बाबूजी।
................ 

18.8.12

काहे हउआ हक्का-बक्का..!


काहे हउआ हक्का-बक्का !
छाना राजा भांग-मुनक्का !

काहे चीखत हउवा चौचक
अरबों-खरबों कs घोटाला !
चिन्नी चोर गली-गली में
केहू संसद में ना जाला ।

भ्रष्टाचार में देश धंसल हौ
का दुक्की का चौका, छक्का !

[काहे हउआ हक्का-बक्का…]

बहती गंगा मार ले डुबकी
लगा के चंदन, जै जै बोल
दीन दुखी जे मिले अकेले
छीन के गठरी, जै जै बोल

कलियुग कs अब धर्म यही हौ
नाहीं तs खइबा तू गच्चा !

[काहे हउआ हक्का-बक्का…]

चिखबा ढेर तS दंगा होई
ध्यान बटी सब चंगा होई
केहू के नाहीं हौ चिंता
माई रोई, नंगा होई।

जाति-धर्म हौ तुरूप कs पत्ता
बंट जइबा जब घूमी चक्का।

[काहे हउआ हक्का-बक्का…]

देश प्रेम कs भाव जगल हौ
मिल जुल के तब ईद मनावा
घर में ही जे भयल पराया
दउड़ के पहिले गले लगावा।

माफी मांगा कान पकड़ के
अब गलती ना होई पक्का।

[काहे हउआ हक्का-बक्का…]

जब बिल्ली कs झगड़ा होई
बंदर वाला लफड़ा होई
चोरी-चोरी चीखत रहबा
डाकू चौचक तगड़ा होई।

सांपनाथ औ नागनाथ के
उलट-पुलट फिर मनबा कक्का।

[काहे हउआ हक्का-बक्का…]

रमुआ चीख रहल खोली में
आग लगे अइसन होली में
कहाँ से लाई ओझिया गोझिया
प्राण निकस गयल रोटी में

निर्धन क नियति में धक्का
काहे हउआ हक्का बक्का!

राजनीति दलदल हौ, डूबल
देखा केकर-केकर नइया
जेल में बंद हो गयल खुद ही
भ्रष्टाचार कs बड़ा लड़इया

......................................

काशिका.. कठिन शब्द के अर्थ।


हक्का-बक्का=आश्चर्य-चकित।

मुनक्का=भांग की मीठी गोली जिसमे मेवा मिला रहता है।
गच्चा=धोखा।
तुरूप कs पत्ता=ताश के खेल में रंग का पत्ता सबसे शक्तिशाली होता है।

18.3.11

आउट...! नॉट आउट...!


आज
ऑफिस से घर लौटते वक्त
दोस्तों ने छनाई है भांग
कहते थे
भांग छान कर जब लिखबा तs लिखबा ऊँची चीज !

पिलाना चाहते थे दारू भी
पर भाग आया हूँ
नहीं ला सकता घर में
अनपेक्षित गंध !

नशे में डूबा
नेट पर पढ़ता हूँ समाचार
संसद में हंगामा
विकिलीक्स की गेंद पर जोरदार अपील
विपक्ष ने कहा
आउट !
प्रधानमंत्री ने कहा
नॉट आउट !

दूर
मन मंदिर से
पास आ रहे हैं भजन के बोल....

तू ही खिलाड़ी
अंपायर तू ही
तू है कृपानिधान
हे राम !  हे राम !

देखना चाहता हूँ
टी0वी0 पर समाचार
बच्चे कहते हैं
बोर मत कीजिए
आ रहा है
होली पर रंगारंग प्रोग्राम
क्रिकेट
और मेरा मस्त सीरियल
समाचार में क्या है ?
राष्ट्रपति ने दी है
देशवासियों को
होली की शुभकामनाएँ !

सोचता हूँ
अपना ब्लॉग ही अच्छा है
यहाँ मिल जाते हैं मुझे
अपने !

क्यों न देखूँ
यहीं कुछ
नये सपने ।

…………………………..