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25.1.21

वसंत

यूं ही नहीं आता वसंत

लड़नी होती है, लंबी लड़ाई

धूप को

कोहरे के साथ।


लगने लगता है

हार गया कोहरा

तभी नहीं दिखती

धूप

लगने लगता है

गई ठंडी

छाने लगता है

घना कोहरा


यूँ ही नहीं आता 

मगर तय है

कोहरे को हराकर

आता है एक दिन

वसंत।

26.1.19

बसंत

ठंड की चादर ओढ़
दाहिने हाथ की अनामिका में
अदृश्य हो जाने वाले राजकुमार की
जादुई अंगूठी पहन कर
चुपके से धरती पर आता है
बसंत
तुमको भला कैसे दिखता?

तुम
रोज की तरह
परेशान हाल
थके मांदे घर आए
तुम्हारी उनींदी पलकों पर
हसीन ख्वाब बनने की प्रतीक्षा में
चुपके से बैठा था
तुमको भला कैसे दिखता?

परेशान न हो
अभी तो
धरती की सुंदरता देख
खुद ही मगन है!
ठंड की चादर हटेगी
छुपन छुपाई खेलते-खेलते
थक कर
बैठ जाएगा एक दिन,
अपने आप
फिसल कर गिर जाएगी
उँगली से
जादुई अंगूठी

तब
दोनो हाथों से पकड़कर
जोर से चीखना..
चोर!
......

23.1.18

बसंत

ठंड की चादर ओढ़
दाहिने हाथ की अनामिका में
अदृश्य हो जाने वाले है राजकुमार की
जादुई अंगूठी पहन कर
चुपके से धरती पर आता है
बसंत
तुमको भला कैसे दिखता?

नहीं
कैलेंडर गलत थोड़ी न है
पत्रा देख कर ही हुई थी
मां शारदे की पूजा
चौराहे पर
रखी जा रही थी
होलिका
शहरों की छतों पर
पीली साड़ी पहन
सेल्फी ले रही थीं महिलाएं

तुम
रोज की तरह
परेशान हाल
थके मांदे घर आए
तुमको भला कैसे दिखता?

परेशान न हो
ठंड की चादर हटेगी
प्रहलाद के विश्वास के आगे
होलिका का घमंड
जल कर
ख़ाक हो जाएगा
अपने आप
फिसल कर गिर जाएगी
बसंत की उंगली से
जादुई अंगूठी

अभी तो
धरती की सुंदरता देख
खुद ही मगन है!
तुमको भला कैसे दिखता?
..... देवेन्द्र पाण्डेय।

1.2.17

बसंत

माचिस ढूँढ कर रखना
उजाले में
सुना है
भड़क कर जलती है
लौ
बुझने से पहले

हौसला
बचा कर रखना
अँधेरे में
यूँ ही
डराती रहती हैं
काली रातें
सुबह से पहले
सांसें
चलती रहें
ठंडी हवा में भी
सुना है
बर्फ बन
भहरा कर गिरता है
जाड़ा
बसंत से पहले।
….......................

17.1.16

बसंत की याद में


ठंडी और बसंत की
मिट्ठी नहीं होती है
लौट-लौट आती है
लौट-लौट जाती है
गंगा के लहरों में
बसंत की कोई
चिट्ठी नहीं होती है

वही साइबेरियन पंछी
वही नावें
वही यात्री
वही सहमें-सिकुड़े
बनारस के घाट

बूढ़ा पीपल
हमेशा की तरह हंस रहा है
ललिता घाट पर
दो-चार पतंग क्या फंसा लिए अपने जाल में
अपने को बड़ा
तीस मार खाँ समझता है !

ठंडी जानती है
मेरे जाने पर ही
आयेगा बसंत
फिर भी
इतनी बेकरारी क्यों है?

तू जा न,
जा!
कि आएगा  बसंत
तूने जो कलियाँ खिलाईं हैं
उन्हें चूमकर
फूल बनाने के लिए
आयेगा बसंत
........................

27.2.14

कहाँ है बसंत ?



द़फ्तर जाते हुए
रेल की पटरियों पर भागते
लोहे के घर की खिड़की से
बाहर देखता हूँ
अरहर और सरसों के खेत
पीले-पीले फूल!
क्या यही बसंत है?

भीतर
सामने बैठी
दो चोटियों वाली सांवली लड़की
दरवाजे पर खड़े
लड़कों की बातें सुनकर
लज़ाते हुए
हौले से मुस्कुरा देती है
लड़के
कूदने की हद तक
उछलते हुए
शोर मचाते हैं!
क्या यही बसंत है?

अपने वज़न से
चौगुना बोझ उठाये
भागती
लोहे के घर में चढ़कर
देर तक हाँफती
प्रौढ़ महिला को
अपनी सीट पर बिठाकर
दरवाजे पर खड़े-खड़े
सुर्ती रगड़ते
मजदूर के चेहरे को
चूमने लगती हैं
सूरज की किरणें!
क्या यही बसंत है?

अंधे भिखारी की डफ़ली पर
जल्दी-जल्दी
थिरकने लगती हैं उँगलियाँ
होठों से
कुछ और तेज़ फूटने लगते हैं
फागुन के गीत
झोली में जाता है
हथेली का सिक्का!
क्या यही बसंत है?

द़फ्तर से लौटते हुए
लोहे के घर से
मुक्ति की प्रतीक्षा में
टेसन-टेसन
अंधेरे में झाँकते
नेट पर
दूसरे शहर की
चाल जांचते
मोबाइल में
बच्चों का हालचाल लेते
पत्नी को
जल्दी आने का आश्वासन देते
मंजिल पर पहुँचते ही
अज़नबी की तरह
साथियों से बिछड़ते
हर्ष से उछलते
थके-मादे
कामगार!
क्या यही बसंत है
……………

10.2.14

दिल धक-धक करने लगा...

इस मौसम में माधुरी दीक्षित की याद आ रही है और याद आ रहा है उनका गाया सुपर हिट गीत—दिल धक-धक करने लगा...। 

मैने घर-बाहर टटोला तो पाया कि मेरा ही नहीं, सभी का दिल धक-धका रहा है। जो दफ्तर में हैं उनका भी, जो बेरोज़गार सड़क पर घूम रहे हैं उनका भी। जो पढ़ रहे हैं उनका भी, जो पढ़ा रहे हैं उनका भी। गुरूजी समझा रहे हैं-मन लगाकर पढ़ों बच्चों परीक्षा की घड़ी निकट है!’ मगर आग दोनो तरफ बराबर भड़की हुई है। गुरूजी का ध्यान अपनी अधिक आयकर कटौती पर है तो विद्यार्थियों का अपने वेलेनटाइन पर।

घर से दूर पढ़ने वाले बच्चे, काम करने वाले लोग सभी परेशान हैं। दो दिन की छुट्टी में घर जाऊँ या नहीं? घर में त्योहार मनाने के एवज में होने वाले खर्च का हिसाब-किताब लगा रहे हैं। मौज की कीमत आंकी जा रही है। त्योहारों की सनसनाहट के बीच चुनाव के बादल भी गरज़ रहे हैं। बड़ा  दिल धड़काऊ, मन भड़काऊ, पंख फड़फड़ाऊ मौमस आया है!

दो पड़ोसन आपस में बतिया रही थीं....

पहली ने कहा- सुनिये न...आपके ससुर जी तो हमेशा कहा करते थे मेरा दिल धड़क रहा है मगर कल मैने सुना आपके श्रीमान जी भी? लगता है आपके घर होली अभिये आ गई!”

दूसरी ने हाथ नचाते हुए उत्तर दिया-क्यों? श्रीमान जी का सुन लिया! टिंकू का नहीं सुना ? वह भी तो आज स्कूल से आते ही बस्ता पटक कर बड़बड़ा रहा था-मेरा दिल धड़क रहा है!’

पहली आँखें फाड़कर उछली- अच्छा! टिंकू भी..वेलेनटाइन...!!!”

तुम्हारा सर। पिताजी दिल के मरीज हैं। इनके दफ्तर में काम का बोझ है। टिंकू परीक्षा से घबड़ा रहा है। होली मेरे घर में नहीं तुम्हारे कपार चढ़कर नाच रही है।

दोनो के झगड़े को सुनकर अपना दिल तो और भी धक-धक करने लगा। :)

…………………….

26.2.12

आयो रे बसंत चहुँ ओर



धरती में पात झरे
अम्बर में धूल उड़े

अमवां में झूले लगल बौर
आयो रे बसंत चहुँ ओर.

कोयलिया 'कुहक' करे
मनवां का धीर धरे

चनवां के ताकेला चकोर
आयो रे बसंत चहुँ ओर.

कलियन में मधुप मगन
गलियन में पवन मदन

भोरिए में दुखे पोर-पोर
आयो रे बसंत चहुँ ओर.

..........................................................
इसका पॉडकास्ट सुनने के लिए यहां क्लिक करें....अर्चना जी का ब्लॉग...मेरे मन की।

9.2.12

बसंत


बहुत दिनो के बाद
सुबह-सुबह
हवा से
घर की कुण्डी खड़खड़ाई
ठंड से अकुलाये/कठुआये अज़गर की नींद टूटी
दिल ने ली अंगड़ाई
जूतों ने फीते कसे
हाथों ने
मचलकर द्वार खोले
मन में जगी
उमंग
आया क्या बसंत ?

बाहर कोई न था
मेन गेट के पास
ठंडी राख पर
हमेशा की तरह
सो रहा था
सहमा सिकुड़ा
वही
मरियल कुत्ता

बसंत की आस में बौराया
निकल पड़ा बाहर सड़क पर
जहां घूम रहे थे
स्वेटर, मफलर, शाल, जैकेट, ट्रैक-सूट
और कुछ
भागते पहिये

जूते
टहलते रहे
देर तक
झांकती रहीं
मंकी कैप में छिपी
दो आँखें
  
रास्ते में दिखे
धूल उड़ाते
मेहनती झाड़ू,
बाजार जा रही
ग्रामीण औरतों के सर पर
ताजी सब्जियों के बोझ से लदी
भारी गठरियाँ,
मैले कुचैले वस्त्रों में
दमकता चेहरा,
चमकती आँखेँ,
झिलमिलाते स्वेद कण,
शहर क्या जाने
सरसों के खेत !
नहीं दिखी एक भी
पीली चुनरी
या फिर
खेत फुल्ली
कुसुम्मी ही

नहीं दिखे
पियराकर झरे
एक भी पत्ते
पूर्ण नग्न हो
नव पल्लवों से अंकुरित/आच्छादित हो रही
शाखाएं

एक कोने
मौन खड़ा था
बूढ़ा
धूरियाया/हरियाया
पीपल

जब से सुना है
बड़े भाई सा के ऊँचे बंगले की
मोटी चहारदिवारी के भीतर
अरूणोदय के साथ
ठिठोली करते
आम्र वृक्ष की फुनगियों पर
इठलाते
बौर को देखकर
चांदनी में
रश्क करती हैं
रातरानी
दिल से
एक आह! ही निकलती है
अभी तो
वहीं कैद है
हमारा बसंत।
.........................

28.1.12

माँ सरस्वती



तूने दिया है प्यार माँ
स्वीकार कर आभार माँ

माता-पिता कोई नहीं
बस तू ही है आधार माँ

मेरा नहीं तेरा ही है
जो कुछ भी है घर-बार माँ

कोई न था बस तू ही थी
जब था बहुत लाचार माँ

आशीष दे लड़ता रहूँ
जितना भी हो अंधियार माँ

फिर फूल सरसों के खिले
आ मूर्त हो इस बार माँ

छू लूँ चरण इक बार मैं
भव से मुझे अब तार माँ

................

विशेषः बसंत पंचमी चाहे 9 फरवरी, 1962 को आये चाहे 28 जनवरी 2012 को, है तो जन्म दिन !

(चित्र गूगल से साभार)