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7.1.26

गुजरात यात्रा

..........दिनांक: 17-12-2025 की सुबह.....

लम्बी यात्रा की ट्रेन है, लगभग 3000 किमी, गोहाटी से ओखा। हम इसमे बनारस से चढ़े हैं, द्वारिका पहुँचना है।  सारनाथ के एक दर्जन मन से युवा बने हुए मित्रों के साथ हम भी युवा बन, स्लीपर में चढ़े हैं। इतनी लम्बी यात्रा स्लीपर में करने के लिए तन भी जवान और बलिष्ट होना चाहिए। जाड़े में ठंड से बचने के उपाय तो कर लिए, चादर, स्लिपिंग बैग, तकिया रख लिए, लोअर बर्थ है लेकिन भीड़ का क्या करें? 

भारतीय रेल के दावों के विपरीत जनरल टिकट के यात्री वेटिंग के नाम पर पूरी बोगी में भीड़ की संख्या में घुस आए हैं। कल 10 बजे दिन से शुरू हुई यात्रा आज सुबह के 7 बजने वाले हैँ कोटा से आगे रतलाम आने वाला है लेकिन भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही। 


एक दर्जन साथी हैं लेकिन सभी अलग-अलग बोगी में हैं। गनीमत है कि मेरे सामने लोअर बर्थ में एक सत्तर वर्षीय युवा हैं जो सुबह से 3 बार इस भीड़ में रास्ता बनाकर बाथरूम जा चुके। हर बार लौट कर बड़बड़ाते हैं, "अब कब्बो स्लीपर में यात्रा न करब, बाथरूम जाये में आफत हौ!" 


इस भीड़ में भी चाय बेचने वाले वेंडर रास्ता बनाते हुए चाय बेच रहे हैं, "चाय ले लो भाई चाय, गरम चाय!" क्या मजाल की थोड़ी भी गरम चाय रास्ते में पसरे यात्रियों पर गिरे! सब कुछ संभालना और संतुलन बनाकर चाय बेच देना, बड़ी बात है। ऐसे ही नहीं कोई चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन गया, विलक्षण प्रतिभा रही होगी। भयंकर भीड़ का सामना करना, चाय-चाय चीखते हुए संतुलन बनाकर चाय बेचना, पैसा लेना और साथी वेंडरों से प्रतिस्पधा करते हुए आगे बढ़ना मजाक नहीं है। भारत में ही संभव है। ट्रम्प भले गाल बजाएँ, अमेरिका ऐसा प्रतिभावान नेता विश्व को दे ही नहीं सकता।

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वडोदरा जंक्शन से लगभग 10 km दूर है छायापुरी स्टेशन। साहित्यकार बहन छाया शुक्ला  को स्टेशन के बारे में वाट्सएप से जानकारी दी। मैने पहली बार नाम सुना तो थोड़ा आश्चर्य हुआ कि बहन के नाम का स्टेशन भी है!

नडियाद रेलवे स्टेशन में जब गाड़ी रुकी तो इसके उटपटांग नाम ने आकर्षित किया। गूगल सर्च किया तो पता चला यह सरदार बल्ल्भ भाई पटेल का जन्म स्थान है। इसके अलावा यहाँ संतराम मन्दिर, माई मन्दिर, स्वामी नारायण मन्दिर और दूसरे भी दर्शनीय स्थान हैं।


दिन के 12.40 हो चुके। अब अगला स्टेशन अहमदाबाद है। जाड़ा कहीं उड़ चुका है। प्रचंड धूप है। लोहे के घर की खिड़की से सूर्य की किरणे प्रवेश कर रही हैं। इनर, स्वेटर, जैकेट सब उतर कर झोले में पैक हो चुका। शर्ट पहनना मजबूरी है। लोहे का घर नीजी नहीं एक सार्वजनिक घर है, यहाँ की अपनी मर्यादा है।


एक पतली नदी पार किया ट्रेन ने। नदी किनारे लकड़ी जल रही थी और कुछ लोग जमा थे। कुछ पक रहा था। मतलब बहरी अलंग का आनंद लेने वाले बनारस में ही नहीं गुजरात में भी हैं। जाड़े की हालत यह है कि यहाँ ट्रेन में वेंडर चिल्ला-चिल्ला कर ठंडा-ठंडा अमूल लस्सी बेच रहे हैं! ट्रेन अहमदाबाद से 15 km पहले देर से रुकी है। अभी निर्धारित समय से बिफोर है शायद इसलिए सिगनल नहीं मिला होगा। 

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अहमदाबाद से आगे विरामगाम स्टेशन अहमदाबाद जिले में स्थित एक कस्बा है। यह तीन तरफ झीलों से घिरा हुआ है। गंगा सागर, धुनियाँ और मुनसर। गूगल में तीनों झीलों के इतिहास के साथ वर्णन मिल जाएंगे। रोचक ऐतिहासिक जानकारियों के अतिरिक्त यह भी पता चला कि धीरू भाई और भाजपा नेता हार्दिक पटेल यहाँ से जुड़े हुए हैं।


आगे सुरेन्द्र नगर रेलवे स्टेशन है जो राजकोट डिवीजन के अंतर्गत आता है। सुरेंद्रनगर का पुराना नाम मुख्य रूप से वाधवान (Wadhwan) था, जिसे पहले वर्धमानपुरी भी कहा जाता था, और यह क्षेत्र झालावाड़ के नाम से भी जाना जाता था; आजादी के बाद, 1947 में तत्कालीन शासक महाराजा सुरेंद्र सिंह जी के सम्मान में इसका नाम बदलकर सुरेंद्रनगर कर दिया गया। 


राजकोट


राजकोट गुजरात का एक प्रमुख नगर है। यह सौराष्ट्र क्षेत्र के बीच में है और राजकोट ज़िले का मुख्यालय भी है। आजी नदी राजकोट के बीच से बहती है और इसे दो भागों में विभाजित करती है। यह जसदण के समीप पहाड़ों में उत्पन्न होती है और 164 किलोमीटर (102 मील) बहकर जामनगर के समीप कच्छ की खाड़ी में बह जाती है। यहाँ रामकृष्ण आश्रम, रानी लक्ष्मीबाई सर्कल, वॉटसन संग्रहालय, शॉपिंग मॉल आदि दर्शनीय स्थल हैं। प्राचीन सभ्यता और आज़ादी की लड़ाई से राजकोट का बहुत नजदीकी संबंध रहा है। राजकोट का सोनी बाज़ार गुजरात में स्थित सोने का सबसे बड़ा बाज़ार है। 'राजकोट छोटे ट्रैक्टरों की जन्मस्थली है।'


राजकोट के रास्ते में जगह जगह पनचक्की दिखाई दे रही थी। अब ट्रेन आगे बढ़ी जाम नगर की ओर। सूर्यास्त हो चुका और बाहर अँधेरा हो चुका। आगे द्वारिका के मार्ग में यह ट्रेन समुन्द्र के किनारे-किनारे चलेगी। अँधेरा हो चुका इसलिए कुछ दिखना असम्भव लगता है।

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दिनांक: 18-12-2025

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देर शाम लगभग 10 बजे द्वारिका पहुँचे। सभी अच्छे भवन, धर्मशालाएं बुक थीं। एक हॉल जैसा बड़ा कमरा 3000/- प्रति रात की दर से मिल गया जिसमें 8 बेड और 4 अतिरिक्त बिस्तर लगे थे और दो बाथरूम थे। न ठण्डी न गर्मी, मौसम सुहाना था। कमरे में 4 सीलिंग फैन लटके थे, जिसकी हवा पर्याप्त थी। सफर के थके सभी कुछ खा कर गहरी नींद सो गए।


सुबह नहा धो कर 20/-प्रति व्यक्ति देकर दो ऑटो से द्वारिकाधीश मन्दिर से सटे गोमती तट पर पहुँचे तो सूर्योदय हो चुका था। जल छिड़काव कर गोमती में स्नान कर लेने का पुण्य भाव लिए हमने द्वारिका दर्शन के लिए निःशुल्क सरकारी सुविधा का उपयोग करते हुए अपनी मोबाइलें जमा करा दी और मन्दिर द्वार से प्रवेश करते हुए पंक्ति बद्ध खड़े हो गए। 


एक लम्बी लाइन के बाद मन्दिर का भव्य दर्शन प्राप्त हुआ। मन्दिर के भीतर पर्दे में द्वारिकाधीश विराजमान थे। बीच-बीच में पर्दा हटता और भक्त दर्शन पा मुग्ध हो जाते। भीतर द्वारिकाधीश का श्रृंगार चल रहा था। मूर्ति में कलात्मक ढंग से चंदन लगाए जा रहे थे। हमको पंक्ति में खड़े-खड़े ही चंदन और मुकुट श्रृंगार देखने का सुख मिला। 

द्वारिकाधीश के दिव्य दर्शन के बाद बाहर निकले तो छोटी बड़ी कई प्रतिमाओं के दर्शन हुए जिनमे देव भिन्न रूपों में सज्ज थे। वहाँ से 56 सीढ़ी उतरकर उसी घाट पर बाहर निकले जहाँ दर्शन के गोमती स्नान किया था।


अपनी-अपनी मोबाइल लेने के बाद सभी बनारसी भक्त एक गुजराती रेस्टोरेंट में जुट कर अपने मन के अनुसार नाश्ता करने लगे। पोहा, जिलेबी, ढोकला, उपमा से लेकर समोसा और कचौरी का भी इंतजाम था। मात्र 700/-में सभी 12 साथियों का भरपूर नाश्ता हो गया। नाश्ते का बाद कुछ लोगों का मन का रूम में जाकर आराम करने का, अधिक लोगों का मन द्वारिका से दूर-दूर स्थिति मंदिरों के दर्शन करने का था। सबका कहना था दूर का काम आज ही निपटा लिया जाय, हालांकि हमारे पास द्वारिका घूमने के लिए 2 रात और 2 दिन थे। 


हमने 300/-प्रति ऑटो की दर से दो ऑटो तय किया जो हम 12 सदस्यों को शाम तक द्वारिका दर्शन कराने वाला था। ऑटो वाले ने सबसे पहले हम लोगों को भड़केश्वर महादेव का दर्शन कराया। जो समुन्द्र तट पर स्थिति एक सुन्दर शिव मन्दिर है। वहाँ एक स्थान पर लिखा था, 'सन सेट प्वाइंट' मैने ऑटो वाले भाई से कहा भी, "यहाँ तुमको शाम को लाना था।" उसने ठीठाई से जवाब दिया, "आप शाम को भी आ जाना।" भड़केश्वर महादेव से रुक्मिणी देवी मन्दिर दर्शन करते हुए पहुँचे शिवराजपुर बीच। शिवराजपुर बीच में हमने नौका विहार किया। गोवा, केरल, तमिलनाडु, जगन्नाथ पूरी समुन्द्र बीच तो बहुत घूमे लेकिन समुन्द्र में छोटा ही सही मोटर बोट से घूमने का पहला अनुभव रहा। हर कांड का पहला अनुभव प्यारा और यादगार होता है, यह भी आनंद दायक रहा।


शिवराजपुर बीच से हम नागेश्वर महादेव दर्शन करने गए। नागेश्वर द्वारिका-गुजरात में स्थिति प्रसिद्ध शिवमन्दिर है जिसे ज्योतिर्लिंग की मान्यता मिली हुई है। नागेश्वर शिव मन्दिर से सटा शिव की एक विशाल प्रतिमा है।  मन्दिर में प्रवेश के लिए लम्बी लाइन है लेकिन मोबाइल पर प्रतिबंध नहीं है। केवल दर्शन करते वक्त, मुख्य शिवलिंग के सामने मोबाइल अपने जेब में रखना पड़ता है। शिवलिंग के अलावा अंदर मंदिर परिसर में शिव, पार्वती, नन्दी की झरना युक्त प्रतिमा है। देवी शक्ति और शनिदेव के मन्दिर हैं। कुछ नाग नागिन की प्रतिमाएं भी हैं। नागेश्वर महादेव में भगवान शंकर का नाग रूप में और देवी पार्वती का नागिन रूप में पूजा होती है। नाग-नागिन का जोड़ा भी चढ़ाया जाता है।


नागेश्वर महादेव से भेंट द्वारिका के रस्ते में सुदर्शन बृज मिला। सुदर्शन सेतु (Sudarshan Setu) भारत का सबसे लंबा केबल-आधारित पुल है, जो गुजरात में ओखा मुख्य भूमि को भेंट द्वारका द्वीप से जोड़ता है। इस पर भगवद गीता के श्लोक और भगवान कृष्ण की छवियां भी हैं।


गुजरात में द्वारका के पास अरब सागर में स्थित एक द्वीप है, जो भगवान कृष्ण का निवास स्थान माना जाता है और पौराणिक कथाओं के अनुसार यहीं पर श्री कृष्ण और उनके मित्र सुदामा की भेंट हुई थी, इसलिए इसे 'भेंट' द्वारका कहते हैं, जहाँ कृष्ण-सुदामा की मूर्तियों वाला मंदिर प्रमुख है और इसे सुदामा द्वारा लाए गए चावल के उपहार के कारण महत्व दिया जाता है। संक्षेप में, भेंट द्वारका एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है जहाँ भक्त भगवान कृष्ण के साथ सुदामा की मित्रता और उनके मिलन की याद में आते हैं, और यह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व का केंद्र है।  भेंट द्वारिका में मोबाइल पहले ही रखवा ली जाती है।  भगवान कृष्ण के विभिन्न सुन्दर मूर्तियों का दर्शन करते हुए हम आगे बढ़ते हैं। भीड़ वाली लाइन होती है लेकिन दर्शन आराम से हो जाते हैं। 

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18 दिसम्बर को ही हमने लगभग पूरी द्वारिका घूम ली। दूसरे दिन यानि आज 19 दिसम्बर के लिए कुछ शेष न रहा। ट्रेन भी शाम 8.50 की थी। ओखा वेरावल एक्सप्रेस से जाना था सोमनाथ। सोमनाथ से सबसे निकट का स्टेशन है वेरावल। आराम-आराम से उठते, नश्ता/भोजन करते हमने दिन के 2 बजा दिए।  होटल मालिक दो बार चेक आउट टाइम याद दिलाकर गया तब हमने रूम छोड़ा। यहाँ से स्टेशन मात्र 500 मीटर की दूरी पर था लेकिन धूप तेज था तो कुछ ने ऑटो पकड़ लिया कुछ ने हिम्मत नहीं छोड़ा और पैदल ही स्टेशन पहुँच गए। स्टेशन के प्रतीक्षालय का हमने भरपूर उपयोग किया और अपनी गलतियाँ गिनाते रहे, "जब आज इतना समय था तो एक ही दिन द्वारका घूमने की कल क्या जरूरत थी? कल होटल था, दर्शन के बाद, खाना खा कर आराम से सोते और आज शाम तक द्वारका घूम कर स्टेशन आ जाते!"  ऐसे ही कमियाँ गिनाते, लाभ गुनगुनाते, शाम हो गई और मित्र शाम के नश्ता/ भोजन पैक कराने की बात करने लगे।


ट्रेन सही समय पर, पूरी भीड़ लेकर आईं। चढ़ने में थोड़ी दिक्क़त हुई लेकिन अपने बर्थ पर पहुँचने के बाद कोई परेशानी नहीं। इस बार बर्थ भी आराम दायक थे। 6 एक कूपे में, 6 दूसरे कूपे में। मतलब सभी 12 लोग एक ही बोगी में क्रम से बैठे थे। 


हमको छोड़ सभी आनंद में थे। हमारे साथ समस्या यह थी कि बनारस से चलने से पहले सर्दी जुखाम से पीड़ित थे, धीरे-धीरे ठीक हो रहे थे। यात्रा के भय ने दवाई ले ली, जुखाम तो ठीक हो गया, खांसी बढ़ गई। पूरी रात खाँसते बीतती, दिन घूमते। द्वारिका पहुँचने के साथ जो खाँसी चिपक गई कि आज तक उतरी नहीं। हमारी खाँसी से सभी परेशान हुए, इसका मुझे हमेशा अफ़सोस रहेगा।


अपनी ट्रेन 20 दिसम्बर भोर में ही वेरावल पहुँच गई। यहाँ सोमनाथ दर्शन करने के बाद सड़क मार्ग से दिउ जाने की योजना थी। यहाँ भी दो ऑटो वाले से बात तय हो गई। उससे प्रति ऑटो 1500/-की दर से त्रिवेणी संगम में स्नान कराकर, सोमनाथ के सभी प्रमुख मन्दिरों में दर्शन कराकर सोमनाथ मन्दिर में छोड़ देने की बात तय हो गई। सूर्योदय के समय हम त्रिवेणी संगम तट पर थे, जहाँ ऊपर सुलभ शौचालय बने हुए थे। 


सोमनाथ का त्रिवेणी संगम गुजरात में हिरण, कपिला और पौराणिक सरस्वती नदियों का पवित्र मिलन स्थल है, जहाँ ये नदियाँ अरब सागर में मिलती हैं; यह स्थान भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ स्नान से पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति की मान्यता है। 


हम बनारसियों को सुलभ शौचालय के बाद सूर्योदय के समय संगम तट पर स्नान का अवसर बड़ा ही मनोनुकूल था। 

सभी ने बड़े चाव से तैराकी के हाथ दिखाते हुए संगम स्नान किया और नए वस्त्र धारण कर सोमनाथ घूमने के लिए जल्दी-जल्दी सज्ज हो गए। हमने भी खाँसी भूल संगम स्नान किया और जय सोमनाथ के नारे लगाए।


ऑटो वाले ने हमको नदी किनारे, राधा कृष्ण मन्दिर, बलदेव जी मन्दिर, लक्ष्मी नारायण मन्दिर, श्रीकृष्ण की चरण पादुका, कामनाथ महादेव, राम मन्दिर, श्री कृष्ण का बाल रूप मन्दिर, तालाब आदि रमणीक स्थलों के दर्शन कराए। एक महादेव मन्दिर में वृद्ध माताएं भजन-कीर्तन भी करती दिखीं। दोनो हाथों से झाँझ बजाते हुए गुजराती में भजन गुनगुना रही थीं।


इसके बाद ऑटो वाले ने हमको एक अनोखा नजारा दिखाया जहाँ समुन्द्र के किनारे कुछ दूरी पर दो शिवलिंग स्थापित थे और समुन्द्र की अपार जलराशि शिवलिंग का अनवरत जलाभिषेक कर रही थी। 

इन वीशिष्ट मंदिरों के दर्शन कराने के बाद ऑटो वाले ने अपने वादे अनुसार हमको सोमनाथ मन्दिर के द्वार के पास छोड़ दिया। 


हमने यहाँ भी मितव्ययता का सहारा लिया। सामान, मोबाइल जमा करने के खर्च को भी साफ बचा ले गए। दो मित्रों के भरोसे सब सामान और मोबाइल छोड़ शेष 10 ने मन्दिर में प्रवेश किया। सोमनाथ भव्य मन्दिर का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ। मोबाइल नहीं था, इसलिए फोटोग्राफी नहीं हुई। यहाँ भव्य शिवलिंग का दर्शन करने के बाद बगल में पुराना सोमनाथ मन्दिर है। वहाँ भी लम्बी लाइन लगाकर दर्शन हुआ। यहाँ मोबाइल ले जाना प्रतिबंधित नहीं था लेकिन हम मोबाइल बाहर ही छोड़ आए थे। हाँ, दर्शन करने जाते हुए का एक वीडियो एक पंजाबी परिवार से बनवा कर अपने मोबाइल पर मंगवाने में सफलता मिल गई। हमने उनका बहुत आभार व्यक्त किया।


सोमनाथ मन्दिर में दोपहर 11 से 3 बजे तकप्रसाद वितरण का समय होता है। शाम को पुनः 7 बजे काउंटर खुलता है।प्रसाद के नाम पर भर पूर निःशुल्क भोजन बँटता है। एक आदमी गया, पर्ची कटाई, थाली मिल गई। थाली में 2 रोटी, दो प्रकार की सब्जी, दाल, हलुआ, अचार सब कुछ। एक थाली से पेट न भरे तो पुनः थाली आगे कर और ले लीजिए। जब आपका पेट भर जाय, थाली रखकर पानी पी लीजिए। हाथ धो कर एक दान काउंटर पर सवेच्छा से 100/-, 200/-, 500/- दान कर आइए। पैसा न हो तो इसकी भी जरूरत नहीं। हम सभी ने प्रसाद लिया और सवेच्छा से दान भी किया। एक नया अनुभव हुआ। जब तक हम सामान तक पहुँचते, वहाँ रुके दो साथी, दूसरे आए साथियों को सामान दिखाकर दर्शन करने जा चुके थे। कुल मिलाकर भोजन गर्म, सादा, शाकाहारी था। वितरण और सफाई की व्यवस्था बढ़िया थी। इतनी बड़ी संख्या को रोज भोजन कराना भी बड़ी बात है। 


जब सभी साथी आ गए तो हमने यहाँ से दिउ जाने के लिए 2000/- प्रति कार, दो कार बुक कर ली। प्रत्येक में एक आगे, 3 बीच में, 2 पीछे कुल 6 यात्री आराम से बैठ सकते थे। सोमनाथ से दिउ की दूरी 90 km है। शनिवार, रविवार होने के दिउ में कमरा थोड़ा महंगा मिला। 1500/- की दर से डबल बेड कमरे लेकर 2 रात दिउ में आराम किया गया। गुजरात में शराब प्रतिबंधित है, दिउ में केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण, खुली छूट के साथ बहुत सस्ती भी है। शराब के शौकीन गुजरात भ्रमण के बाद दिउ जरूर जाना चाहते हैं। दिउ में 2 बीच प्रसिद्ध हैं, घोघला बीच और नागोवा बीच।

घोघला बीच लम्बे चौड़े बलूई मार्ग के लिए और नागोवा बीच तैराकी के लिए जाना जाता है। 

क्रमशः

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(20-12-2025)


शाम 4 बजे तक हम लोग दिउ बस स्टैंड के पास ही एक होटल में कमरे लेकर व्यवस्थित हो चुके थे। 2 घण्टे आराम करने के बाद पास के घोघला बीच में अपनी शाम कटी। शाम की सुनहरी किरणों, समुन्द्र की लहरों और बीच घूमने आए दूसरे पर्यटकों ने बढ़िया समा बाँधा वरना बीच कोई बहुत खूबसूरत नहीं लगा। मन साफ हुआ, नीयत साफ हुई। पास के शराब की दुकान से सबने मन मुताबिक खरीददारी कर ली और कमरे में लौटकर शुरू हो गए। रात के भोजन के लिए दूर नहीं जाना पड़ा, जहाँ रुके थे, सामने ही सब इंतजाम था। पीते-पीते ही यह तय हुआ कि कल सुबह गंगेश्वर महादेव मन्दिर चलना है।


सुबह नहा धोकर दो ऑटो से हम गंगेश्वर महादेव पहुँच गए। विशाल गेट के भीतर प्रवेश किए तो सामने मन्दिर का निर्माण कार्य चल रहा था। बाएं समुन्द्र तट के पास एक संकरा मार्ग था जहाँ से होकर मन्दिर प्रवेश के लिए नीचे सीढ़ियां उतरनी थी। नीचे गुफा में गणेश जी के साथ 3,4 शिवलिंग विराजमान थे। भक्त श्रद्धा से जलाभिषेक कर रहे थे। बगल में अपार समुन्द्र की लहरें किलोल कर रही थीं। समुन्द्र की अपार जलराशि में सूर्यदेव की किरणे चमचमा रही थीं। भक्ति और श्रद्धा का माहौल था। दर्शन कर बाहर निकलकर हम एक स्थान पर एकत्रित हुए और हर हर महादेव का उदघोष किए। सभी का मन आनंद से भरा हुआ था।


गंगेश्वर महादेव दर्शन के बाद कमरे में आते ही सब गिरगिट की तरह रंग बदल चुके थे। भक्ति का नशा उतर चुका था, मदिरा का नशा चढ़ने लगा था। सब ऐसे पीने में जुट गए जैसे पीने के लिए आज का ही दिन अंतिम दिन है। कल लौट जाना है और गुजरात की सीमा में प्रवेश करते ही शराब प्रतिबंधित है, पीने क्या, चखने भी नहीं मिलेगा। गनीमत यह थी कि दिन में इतना नहीं पिया कि शाम को चल ही न सकें। शाम को सभी नागोवा बीच चलने के लिए तैयार थे।


नागोवा बीच में उतरते ही चौराहे पर एक महिला की मूर्ति ने स्वागत किया। हम महिला के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए बीच तट तक पहुँच गए। बीच खूबसूरत था। नहाने वालों के लिए स्वर्ग था, भीड़ जुटी थी। तट पर कई प्रकार की कलाएं दिख रही थीं। एक परिवार रेती पर विशाल शिवलिंग बना रहा था। स्कूल से बीच घूमने आई छात्राओं का दल पंक्तिबद्ध हो चला जा रहा था। लहरों में बहुत सी नावें कालाबाजी करती हुई इधर से उधर दौड़ रही थीं। नहाने वाले कई प्रकार से नहा रहे थे। सभी प्रकार की लीलाओं को देखते हुए तट पर चलते-चलते हम दूसरे छोर तक पहुँच गए जहाँ दो टापू नुमा पहाड़ी दिखलाई पड़ रही थी। दो में से एक टापू पर हम चढ़ गए और वहाँ से नागोवा बीच का वीडियो बनाने लगे। वहाँ से दूसरे टापू का और समुन्द्र का नजारा कुछ अलग दिख रहा था। अपने यहाँ के झाँवा पत्थर की तरह, कुछ खोखले हो रहे पत्थर भी दिखे। चलते-चलते साथी सब छूट गए, हम अकेले रह गए। वहाँ से उसी रास्ते से साथियों की खोज में लौटते हुए एक गाय दिखी जिसे लोग प्रेम से भुट्टा जैसा कुछ खिला रहे थे। सभी साथी उसी स्थान पर मिल गए जहाँ से हमने बीच में प्रवेश किया था।


देर शाम रूम में लौटते ही वही महाभारत फिर शुरू हो गई। सबको अपनी बोतल खतम करनी थी, किसी के पास बोतल लेकर जाने की हिम्मत नहीं थी क्योंकि आते समय सबने चेकपोस्ट का नजारा अपनी आँखों से देखा था। सब जानते थे, सस्ते के चक़्कर में बोतल रखना महँगा सौदा है। 


दूसरे दिन नाश्ते के बाद हमने फिर दो गाड़ी ले लिया और सीधे सोमनाथ मन्दिर का रुख किया। शाम को मन्दिर के पास सामान रखकर फिर वही कहानी दोहराई गई। कुछ लोग सामान देखने लगे, कुछ फिर दर्शन करने चले गए और कुछ इधर-उधर घूमने लगे। हम मन्दिर के सामने समुन्द्र तट और मन्दिर का नजारा लेते हुए वीडियो बनाने में व्यस्त रहे।


सोमनाथ के वेरावल स्टेशन से रात की ट्रेन पकड़ कर हम लोग सुबह गुजरात की राजधानी गांधीनगर पहुँच गए जो साबरमती के तट पर बसा हुआ एक सुनियोजित नगर है। यहाँ से लगभग 30km दूर अहमदाबाद है जहाँ से शाम को 10 साथियों को उज्जैन के लिए और हमको एक साथी के साथ बनारस के लिए ट्रेन पकड़नी थी। 


गाँधी नगर में भी हमने गाँधी वादी तरीके से स्नान ध्यान का स्थान ढूंढ लिया और नहा धो कर भूखे पेट अक्षरधाम मन्दिर जाने की लाइन में लग गए। सुबह 10 बजे जब मन्दिर का गेट खुला तो साथियों के साथ भीतर प्रवेश करने वाले हम पहले भक्त थे। भव्य अक्षरधाम मन्दिर का दिव्य दर्शन हुआ। 


गांधीनगर का अक्षरधाम मंदिर स्वामीनारायण संप्रदाय को समर्पित एक भव्य आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परिसर है, जो अपनी अद्भुत गुलाबी पत्थर की नक्काशी और लोहे के बिना बनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ भगवान स्वामीनारायण की प्रतिमा के साथ कई प्रदर्शनियाँ, जल शो और बगीचे हैं। यह मंदिर भक्ति, शिक्षा और संस्कृति का संगम है। लोहे का इस्तेमाल न होना मन्दिर का प्रमुख आकर्षण है। दर्शन के बाद हमने वहीं भोजन की पंजाबी थाली का आनंद लिया और  हल्की खरीददारी के साथ वापस लौट आए। 


सभी के दर्शन करते-करते दिन के 1 बज गए। मन्दिर के पास से ही बस पकड़कर हम शाम होने से पहले अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पहुँच गए। अहमदाबाद घूमने के लिए बहुत समय था लेकिन शरीर में ताकत शेष नहीं थी। अब जैसे तैसे समय काटना था और ट्रेन पकड़नी थी। शाम को 10 साथी उज्जैन जाने वाली ट्रेन में चले गए और हम अहमदाबाद की प्रसिद्ध फाफड़ा जिलेबी की तलाश में भटकते रहे। स्टेशन से चलकर 2 km पैदल घूम लिए लेकिन फाफड़ा जिलेबी नहीं मिली। बड़ी मुश्किल से एक जिलेबी की दुकान मिली जहाँ कुछ ग्राहक जूटे थे लेकिन दुकानदार ने खुद कहा, "यह फाफड़ा जिलेबी नहीं है, आपको उधर 4 km जाना होगा।" जिलेबी का स्वाद भी कुछ खास नहीं था। अब स्टेशन में एक साथी को सामान के साथ अकेला छोड़ अधिक देर तक बाहर घूमना ठीक नहीं था तो हम वैसे ही स्टेशन लौट आए। 


रात में 11 बजे अपनी ट्रेन साबरमती एक्सप्रेस प्लेटफार्म नम्बर 6 पर आई तो यात्रियों की भीड़ से पूरा प्लेटफार्म भरा हुआ था। उसी भीड़ में रास्ता बनाते हुए जब हमने आमने सामने की अपनी लोअर बर्थ पर कब्जा जमाया, ट्रेन चल दी। ट्रेन चलने के साथ सभी समस्या का समाधान अपने आप हो गया।  सभी सह यात्री गुजराती और एक कम्पनी के कर्मचारी थे जो अयोध्या, काशी दर्शन के लिए निकले थे। उनके साथ दो दिन का सफर कैसे कट गया पता ही नहीं चला। अहमदाबाद की फाफड़ा जिलेबी तो नहीं मिली लेकिन उदार यात्रियों के टिफिन बॉक्स से गुजरात की बनी कई प्रकार की मिठाईयों का स्वाद जरूर मिला।

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1.7.18

ब्लॉगरों साथ एक काल्पनिक रेल यात्रा

सुपर फास्ट #ट्रेन की ए सी बोगी है। कहां से चली? कहां जाएगी? कुछ नहीं पता। बस इतना पता है कि लगातार चल रही है। स्टेशन आते हैं, यात्री चढ़ते/उतरते हैं, ट्रेन चलती रहती है लगातार। 

अपनी बर्थ साइड अपर है। यहां से सातों बर्थ पर बैठे यात्रियों की कारगुज़ारियों का नजारा लिया जा सकता है। सुबह के आठ बज रहे हैं। सामने के दोनों मिडिल बर्थ को गिराकर दो दो महिलाएं सामने सामने बैठी, अपने अपने मोबाइल पर कुछ लिख पढ़ रही हैं। एक छोटी बच्ची चारों के सामने कभी योगा करती है, कभी अपनी नानी के कहने पर कोई गीत गाने लगती है। मैं गहरी नींद में सोया था लेकिन बच्ची की खटर पटर से अपनी नींद उचट गई है और उंनीदी पलकों से लिखने का प्रयास कर रहा हूं। मेरे सामने के दोनो अपर और नीचे के एक साइड लोअर बर्थ पर तीन पुरुष यात्री सफेद चादर ओढ़े खर्राटे भर रह रहे हैं। 

चारों महिलाएं आपस में बातें कर रही हैं...

ये पुरुष सोते ही खर्राटे भरने लगते हैं! 
और जगते हैं तो मानते भी नहीं।
जब कुछ लिखने का मन करती हूं, खर्राटों से ध्यान भटक जाता है। /
एक बढ़िया कविता है, सुनोगी?
तीनों महिलाएं चहकने लगीं.. सुनाइए! सुनाइए न दीदी!!!

कविता का शीर्षक है.. #अनकही
वह कहता था, 
वह सुनती थी,
जारी था
कहने, सुनने का खेल
......
अरे! यह कविता तो मैंने पढ़ी है। Sharad Kokas की कविता है। 
मैंने भी पढ़ी है, वाकई बहुत अच्छी कविता है।
सदियों से महिलाओं पर हो रहे शोषण को कितने सरल शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है!
अंत में कवि ने क्या कमाल किया है..
उसके हाथ कभी नहीं लगी वह पर्ची 
जिसमें लिखा था..कहो!

सही बात है।
फेसबुक के अपने मित्र सूची में कई अच्छे लेखक हैं न?
तुम अभी क्या पढ़ रही हो?
मैं तो #लोहेकाघर पढ़ रही हूं.. #मायरा! गिर जाओगी। चलो बैठो शांति से। हो गया योगा। ट्रेन में शीर्षासन नहीं करते।

मयरा! लोहे का घर! शरद काेकास!!! अब मेरी नींद पूरी तरह उचट चुकी थी। अचकचा कर उठ कर बैठ गया। नीचे बैठी चारों महिलाओं को आंखें फाड़ कर देखने लगा..अर्चना चावजी, वंदना अवस्थी दुबे, Rashmi Prabha दी, Usha Kiran ओह! माई गॉड! ये क्या देख रहा हूं मैं!!!

वो दाएं ऊपर बर्थ पर नाक पर चश्मा चढ़ाए, सीने में खुली किताब धरे, खर्राटे भर रहे सलिल भैय्या! बाएं Taau Rampuria!! ये नीचे किसका झोला टंगा है? इसमें तो किताबें ही किताबें रखी हैं! ये किसके मुखड़े पर मूर्खता का सौन्दर्य बिखरा पड़ा है? कहीं ये अपने अनूप शुक्ल तो नहीं! हां, हां वही हैं कितने जोरदार खर्राटे! क्या मैं ब्लॉगरों की किसी बारात में सफ़र कर रहा हूं? 

उस तरफ, रामचरित्र मानस के कथाकार DrArvind Mishra जी एक झौआ आम की टोकरी खोले किसे आम पकड़ा रहे हैं? इधर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी दोनों हाथों से आम चूस कर गुठली खिड़की से बाहर फेंकते उधर मिश्रा जी दूसरा आम लिए तैयार..यह और मीठा है! सिद्धार्थ सर मना कर रहे हैं.. अरे नहीं, बहुत हो गया। 

उनके सामने, बगल के साइड लोअर पर गले में कैमरा लटकाए टी एस दराल जी किसकी फोटू खींच रहे हैं? उधर वो कौन बोल रहा है...एक लाइन लिख दिया, पोस्ट कर लेने दो। जानते हो? मैं एक लाइन ही लिखता हूं। संतोष त्रिवेदी की तरह बड़े बड़े पोस्ट नहीं लिखता। ये तो Ali सा हैं! Rajesh Utsahi जी भी उनके हां में हां मिला रहे हैं.. मैं भी लघुकथा लिखता हूं। आजकल चौपाल लगाता हूं। कविता भी लिखता हूं तो छोटी छोटी। 

ये कौन सी ट्रेन है? कहां से चला हूं? कहां जा रहा हूं? यह कौन सा स्टेशन है? ये कौन दो आदमी चढ़े हैं? एक के हाथ में कार्टून के कैनवास, दूसरे के हाथ में कैमरा! ये तो Kajal Kumar और सफेद घर के मालिक Satish Pancham लगते हैं! ये हो क्या रहा है? ट्रेन चल चुकी।  वो कौन दौड़ा भागा चला अा रहा है! ये तो मैराथन Satish Saxena लगते हैं। ये हो क्या रहा है!!! कोई बताएगा मुझे? ये हम कहां जा रहे हैं?

19.11.17

लोहे का घर-30

सुबह का समय है, लोहे के घर की खिड़की है और सामने हरे-भरे खेतों में दूर दूर तक फैली जाड़े की धूप। #ट्रेन छोटे छोटे स्टेशनों पर रुकती है, अपनी वाली की प्रतीक्षा में खड़े लोग दिखते हैं फिर ट्रेन चल देती है। लगभग हम उम्र पॉच बच्चों के साथ बैठी एक देहातन देर तक याद आती है। लगता है कि कुछ जिंदगियां बड़ी देसी टाइप की होती हैं। जाड़े में मां के साथ बच्चों के झुण्ड गली-गली दिख ही जाते हैं।
लोहे के घर में रोज के यात्री किसी विषय पर बहस कर रहे हैं और बाहर सामने की पटरी से एक डाउन ट्रेन हारन बजाती गुजर रही है। इंजन के शोर के बाद अपनी गाड़ी की खटर-पटर अच्छी लग रही है। बड़े शोर के बाद छोरा शोर अच्छा लगता है। पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी।
खेतों में धान की कटाई जोरों पर है। दूर दूर तक फैले कटे धान क ढेर और अधकटी फसलों पर सूर्य की किरणें धमाल मचा रही हैं। इन्हें देख-देख परिंदों के साथ-साथ हम भी खुश हैं लेकिन किसान और उसका परिवार चिंतित। तैयार फसल को ठिकाने लगाने की कड़ी मेहनत से जूझ रहा किसान प्रसन्न कब होता है, हम क्या जाने! हमने कभी खेती तो करी नहीं। हमने तो बस लहलहाती फसलों की फोटोग्राफी का आंनद लिया है। जाके पैर न पड़ी बिवाई, ऊ का जने पीर पराई!
आम का एक बाग गुजरा है। एक पुल पर चढ़ रही है ट्रेन। शांति से सो रही थी नदी। कम पानी की वजह से बीच में उभर आए रेत पर बैठ मस्ती कर रहे थे गांव के लड़के। एक नाव खड़ी थी किनारे। किनारे-किनारे नदी पर तैर रही घने वृक्षों की परछाइयां नदी को और भी मैली दिखा रही हैं।

आज सुरुज नरायण आदमियों की करनी से चित्त हो गए दिखते हैं। लोहे के घर की खिड़की से दिखने वाले खेतों में न धूप है न किरणें। ऐसा लगता है कि दोनो बहने डर गई हैं। आकाश में बादल नहीं हैं फिर भी उतर नहीं पा रहीं धरती पर।

अभी शाम के साढ़े पाँच बजा चाहते हैं लेकिन धुंध इतनी है कि लगता है शाम ढल गई। लोहे के घर की खिड़की से धुंध में डूबे खेत दिख रहे हैं। झुग्गी-झोपड़ी और दूर खेतों के बीच उग आए कंकरीट के घरों में जल चुके हैं बल्ब। साथी कह रहे हैं यह कोहरा नहीं, धुंध है। कोहरा होता तो हवा में दिसम्बर वाली ठंडी होती।
जाड़े के मौसम में जब घने कोहरे के कारण ट्रेने अत्यधिक लेट हो जाती हैं, तो एक दिन पहले वाली या सुबह वाली #ट्रेन अकस्मात नेट में अवतरित हो जाती है। यही हाल आज का है। अपनी रोज की सभी ट्रेने अत्यधिक लेट हैं, भोर में आने वाली बरेली एक्सप्रेस शाम को मिल गई।
अब खेत अंधकार में डूब चुके हैं। घर के भीतर रौशनी है। बोगी में भीड़ कम है। ज्यादातर रोज के यात्री ही दिखलाई पड़ रहे हैं। कोई ऊँघ रहा है, कोई मोबाइल चला रहा है। घर के बाहर चारों तरफ उजाला फैला हो, घर भले अंधेरे में डूबा रहे, कोई बात नहीं। मन में उजाला हो, आँखें भले अंधकार में डूबी रहें, क्या फ़र्क पड़ता है! यहाँ स्थिति थोड़ी विपरीत है। घर में उजाला है और बाहर अँधेरा। मन में निराशा है और आँखें उजाले में डूबी हुई।
शोर भी सुनाई पड़ रहा है। उस तरफ बैठे साथी देश की चिंता में हैं। देश की चिंता में शोर होना स्वाभाविक है। मीडिया भी टी.वी. चैनलों में विद्वानों को बुलाकर देश की चिंता करती है। खूब शोर होता है फिर सभी हँसते हुए घर जाते हैं। उस तरफ बैठे यात्री भी अब खिलखिला कर हँस रहे हैं। लगता है देश की चिंता कर चुके।
आज मिली लेट ट्रेन अभी तक बढ़िया चल रही है। 

आज पाँच बजे के आसपास जौनपुर से बनारस जाने वाली चार चार ट्रेने हैं। जो मर्जी वो पकड़ो। खुदा जब देता है, छप्पर फाड़ के देता है। यह अलग बात है कि कोई कल वाली है, कोई आज सुबह वाली। मजे की बात यह है कि रोज के यात्री रेल मंत्री को धन्यवाद दे रहे हैं। घंटों लेट यात्री जितना रेलवे को कोस रहे होंगे उससे ज्यादा तो अपने समय पर ट्रेन पकड़ पाने के लिए धन्यवाद मिल रहा है!
यह कोलकोता जम्मूतवी सियालदह एक्सप्रेस है। रात 12 बजे के आसपास जौनपुर से जाती है। अभी शाम 5.15 में चली है। रेल पटरी पर एक के पीछे दूसरी लगी हैं। एक्सप्रेस ट्रेन हर स्टेशन पर पैसिंजर की तरह रुक रही है। आगे प्लेटफॉर्म खाली ही नहीं है तो पीछे वाली आगे कैसे बढ़ेगी?
बोगी में अंधेरा था। दूसरे यात्रियों ने बताया कि कल से अँधेरा है। रोज के यात्रियों ने रॉड घुमाया तो सब रॉड जल गये। अब उजाला हो गया। अब सभी अपनी अपनी बीमारी के हिसाब से अपने अपने धंधे में लग गए। कोई बर्थ खाली देखकर लेट गये, कोई मोबाइल में पुराना क्रिकेट मैच/वीडियो देख रहे हैं, कुछ देश की चिंता कर रहे हैं, कुछ तास खेल रहे हैं और हम लोहे के घर की कहानी।
ट्रेन रुक रही है, चल रही है। लोग खुश हो रहे हैं, दुखी हो रहे हैं। पटरी पर चल रही है सभी की गाड़ी।

शाम ढल चुकी है। लोहे के घर में वेंडर भेज और नानभेज खाने का आर्डर ले रहे हैं। दो पीस मच्छी और भात 140 रुपये में। मछली रोहू बता रहा है। मेरे साथ मालदा तक जाने वाले लड़के बैठे हैं। खूब पूछताछ के बाद भी यह कहकर नहीं लिए कि महंगा है। पता नहीं सही रेट क्या है!
यह दिल्ली से मालदा जाने वाली फरक्का है। इसमें बंगाली अधिक हैं। मोबाइल में गाने भी बंगाली बज रहे हैं। मालदा कब पहुँचेगी पूछने पर एक लड़का कहता है ..पता नहीं। मुझे लगा मेरा प्रश्न ही वाहियात था। भारतीय रेल कब कहाँ पहुँचेगी यह भी पूछने की बात है! जब मिल जाय तब चढ़ लो, जब पहुँच जाओ उतर लो। झोले में दाना-पानी, गुण-भुजा बांध लो। मोबाइल चार्ज करने की व्यवस्था टंच रहे फिर क्या चिंता? गाते-बजाते पहुँच ही जाओगे। महंगा माछी-भात कितनी बार खाओगे? दो-दिन का सफर तीन दिन में क्या हर्ज है? रेलवे कोई एक्स्ट्रा किराया थोड़ी न लेती है!
वेण्डर भी कई प्रकार के आते हैं। अंडा-चावल, सब्जी- चावल वाले खाना, खाना, खाना.....चीखते आ/जा रहे हैं। इतने खिलाने वाले हैं फिर #ट्रेन लेट होने की क्या चिंता।

आपको पता है, मुझे पता है लेकिन क्या सभी बच्चों को पता है कि आज उनका दिन है? स्कूल जाने वाले बच्चे गहरी सांस लेंगे टेबल या बेंच पर अपने बस्ते का भारी बोझ पटक कर तब शायद उन्हें बता देंगे गुरुजी कि आज बाल दिवस है। सुनकर वे खुश होंगे और चाचा नेहरूको मिस करेंगे या फिर जल्दी-जल्दी याद करेंगे चाचा की जीवनी! क्या सभी बच्चे जा पाते हैं स्कूल?
लोहेकेघर में एक बच्चा पैर छू कर भीख मांग रहा है। न उसे पता है कि आज बाल दिवस है न उसे जिसने डाँट कर भगा दिया बच्चे को!
पटरी पटरी प्लास्टिक के टुकड़े बीन कर सीमेंट के खाली झोले में भरने वाले बच्चों को भी नहीं पता कि आज बाल दिवस है।
पानी की बोतल बेचने के लिए चलती ट्रेन से कूद कर उस पटरी पर खड़ी ट्रेन पर चढ़ने वाले बच्चे को भी नहीं पता।
देव दीपावली के मेले में जब चारों ओर घाटों पर जल रहे थे दिए कुछ बच्चे बेच रहे गुब्बारे! आज क्या वे मना रहे होंगे बाल दिवस?
आज सुबह चाय की दुकान पर गिलास धो रहे बच्चे को तो पक्का नहीं पता था।
माँ के साथ महुए के पत्तों की गठरी सम्भाले रेल की पटरी पार करते बच्चों को भी नहीं पता।
और तो और मुझे ही कहाँ पता था? वो तो फेसबुक में नेहरू-एडविना के प्रेम प्रंसग पर परसाईं का लेख पढ़ा तो याद आया कि आज बाल दिवस है!

चीटियों की तरह एक के पीछे दूसरी पंक्ति बद्ध हो, खरगोश की तरह टेसन-टेसन फुदकती चल रही हैं सभी ट्रेनें। सुपर फास्ट पैसिंजर को क्रॉस नही कर सकती क्योंकि हर टेसन के मेन लाइन पर खड़ी है मालगाड़ी। किसे पता था कि समाजवाद ऐसे भी लाया जा सकता है!

जौनपुर सीटी स्टेशन पर रोज के यात्रियों का उत्साह देखते ही बनता है..बेगम पूरा आ गई! बेगम पूरा आ गई! का शोर गूंजा और जम्मूतवी से चलकर बनारस जाने वाली ट्रेन जो दिन में ११ बजे के आसपास आती है, शाम ६.४५ में सीटी स्टेशन आ गई। सुल्तानपुर से बहुत जल्दी आ गई थी शायद इसलिए चलकर जफराबाद में इत्मीनान से रुकी है। अगल-बगल दो ट्रेनें खड़ी हैं। बाईं तरफ अप वाली पटरी पर सुबह आने वाली दून और दाईं तरफ गाजीपुर जाने वाली पैसिंजर। अपनी वाली बनारस तक नॉन स्टॉप है। सभी की देखा देखी यह भी रुक गई या और कोई कारण भगवान जाने!
#ट्रेन अब हवा से बातें कर रही है। अनावश्यक खड़ी ट्रेन जितनी बुरी लगती है, हवा से बातें करती उतनी ही हसीन। अब बड़ी प्यारी लग रही है अपनी बेगमपुरा।
गाड़ी रुक जाए तो बड़ी तकलीफ होती है, पटरी पर चलती रहे तो जीवन में आंनद रहता है। गाड़ी जब तक चलती रहती है लोहे के घर के सभी सदस्य अपनी-अपनी मस्ती में रहते हैं। निश्चिंत भाव से कोई मोबाइल में वीडियो देख रहा होता है, कोई राजनैतिक बहस में शामिल हो, देश की चिंता करने लगता है, कोई बैठे-बैठे ऊंघने/सोने लगता है। और तो और बेचन आत्मा भी चिंता छोड़ गीत गाने लगता है!
गाड़ी भले पटरी पर हो, अनावश्यक रुक जाए तो बड़े से बड़े धैर्यवान के भी धैर्य का बांध टूट जाता है। बेचैन हो खिड़की/दरवाजे से सिगनल झांकने लगता है। गाड़ी फिर पटरी पर चल पड़ती है, फिर खुश हो जाता है।
भारतीय रेल अपने देशवासियों को धैर्यवान बनाती है। जीवन जीने का फलसफा सिखाती है। रेलवे दर्शन को भी दर्शन शास्त्र में शामिल कर विश्वविद्यालयों में शोधपत्र लिखवाया जाय तो जीवन जीने के कई नए विचार प्रकाशित हों।
घर के लोग अभी फ़िर दुखी हुए हैं। किसी ने चेन पुलिंग करी है। चेन खींचने वाला बन्दा पटरी के उस पार भागा जा रहा है। अंधेरे में कोई उल्लू चीख रहा है... अपना उल्लू सीधा, भाड़ में जाए जनता!

लोहे के घर की बायीं तरफ वाली खिड़की के पास बैठ बनारस से जौनपुर की यात्रा में ट्रेन जब भुतहे बंगलों से आगे निकल आउटर पार होती है तब दिखती है 39 जी टी सी..गोरखा रेजीमेंट की लंबी बाउंड्री और बाउन्ड्री के भीतर दूर दूर तक फैले बबूल के जंगल। धीमी होती है #ट्रेनकी रफ्तार और देर तक दिखते हैं बबूल के जंगल। शायद सुरक्षा की दृष्टि से लगाये गए होंगे कि न आ पाए कोई, सैनिक छावनी तक।
सोचता हूँ काश ये जंगल बबूल के न होते! नीम, बरगद या पीपल के होते तो कितना अच्छा होता! बबूल के काँटे न होते, शांति की शीतल छांव होती। क्या जरूरी है सुरक्षा के लिए बबूल की बाड़? शहर के मध्य है यह जंगल। आम आदमी वैसे भी ऊँची बाउन्ड्री के भीतर नहीं घुस सकते। हाय! शायद जरूरी होता है सैनिकों के युद्धाभ्यास के लिए कंटीला वातावरण।
सोचता हूँ...देस ही न होते, सैनिक ही न होते, बबूल ही न होता तो कितना अच्छा होता!

मात्र 31.24 घण्टे लेट है कोटा पटना। कल सुबह आनी थी, आज शाम को जौनपुर के भंडारी स्टेशन पर 10 मिनट से खड़ी है। हम इस उम्मीद से बैठे हैं कि खड़ी है तो चलेगी भी। आखिर चलने के लिए ही तो आई है! जनरल में भीड़ है लेकिन स्लीपर की बोगियाँ खाली-खाली हैं। स्लीपर वाले आधे यात्री उतर कर भाग गये लगते हैं। उनके पास सड़क से जाने का पैसा होगा। जनरल वाले कहाँ जाते। एक दूसरे से चप चपा कर बैठे हैं। जो बैठ नहीं पाए हैं वे खड़े हैं। बिना टिकट के यात्रा की सुविधा सिर्फ पैसिंजर या जनरल बोगी में ही तो मिलती है! भीड़ भाड़ वाले जनरल डिब्बों में टी टी क्यों जाएं? परेशानी के सिवा क्या मिलेगा वहाँ?
भंडारी से एक टेसन आगे जफराबाद तक सिंगल पटरी है। पटना से आने वाली कोटा पटना उधर से आ रही है। जब वह आएगी तब यह चलेगी। अपनी वाली इत्मीनान से खड़ी हो, ग्रीन सिगनल की प्रतीक्षा कर रही है। सिंगल ट्रैक में यही होता है। एक स्पेस देगा तो दूसरी को मौका मिलेगा। आजकल के बच्चे शायद इसीलिए #सिंगल रहना चाहते हैं। एक फ़िल्म आई है 'करीब करीब सिंगल' । अभी फ़िल्म नहीं देखा, पोस्टर देखा है। दो ट्रेनें अगल बगल खड़ी हैं और दोनो की खिड़कियों से हीरो हीरोइन हाथ उठाते हुए एक दुसरे को कुछ इशारे कर रहे हैं। उधर से आने वाली पटना कोटा आ गई। किसी खिड़की से हीरोइन नहीं झाँक रही। झाँकती होती तो बोल देता ..मैं भी करीब करीब सिंगल हूँ। बच्चे बड़े हो चुके। थका मांदा घर जाता हूँ, बुढ़िया भाव खाती है, भाव नहीं देती। हाय! लंबी प्रतीक्षा के बाद उधर वाली से कोई झाँकी, मेरी वाली #ट्रेन चल दी। हम फिर करीब करीब सिंगल के सिंगल रह गए।
आधे घण्टे बाद अब पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी। मेरे साथ अगल बगल सब सिंगल पुरुष ही हैं। कोई लेटा है कोई बैठा है। कोई दोनो टाँगे उठाकर ऐसे लेटा है जैसे इस आसन में घर में सोता मिल गया तो पत्नी बेलन से पीटती हो! कोई एक हाथ से सर टिकाए विष्णु भगवान के शेषनाग आसन की तरह दाएं करवट लेटा है और बाएं हाथ से मोबाइल में पुराने क्रिकेट मैच का वीडियो देख रहा है। मेरे बगल में बैठे मोटे सरदार जी सामने वाली बर्थ पर दोनों टाँगे फैलाये, दोनो हाथों से मोबाइल पकड़े कोई फिलिम देखने में लीन हैं।
भंडारी से छूटने के बाद ट्रेन करीब करीब अच्छी चली। लगता है बनारस आउटर पर जाकर ही दम तोड़ेगी। हाय! किसी ने चेन पुलिंग कर दिया। ट्रेने यूँ ही थोड़ी न लेट होती है।


लोहे का घर-29

आज छठ की भीड़ है लोहे के घर में। साइड अपर में सामानों के बीच चढ़ कर बैठ गए हैं हम। सामने एक महिला ऊपर के बर्थ पर दो बच्चों को टिफिन में रखा दाना चुगा रही हैं। चूजे कभी इधर फुदकते हैं, कभी उधर। गिरने-गिरने को होते हैं कि मां हाथ बढ़ाकर संभाल लेती हैं। बगल के बर्थ में एक लड़का घोड़ा बेच कर सो रहा है। जफराबाद में ट्रेन रुकी, ८-१० और यात्री चढ़ कर बैठने का जुगाड तलाश रहे हैं। नीचे के दोनो बर्थ पर कोहराम है। छोटे-छोटे पांच बच्चे, दो महिलाएं और चार पुरुष आपस में गड्डमगड्ड हैं। खाना बेचने वाला भी खड़ा है, यात्रियों के साथ। आवाज़ लगा रहा है-'सब्जी-भात, डिम- भात, मछछी-भात।' डिंबा से डिम बना हो शायद! अंडा को डिम बोल रहा था हाकर। कोई-कोई खरीद भी रहे हैं। जो खरीद रहे हैं वे खा भी रहे हैं। बगल वाले अपर बर्थ में एक महिला अपने बच्चे को चम्मच से अंडा-भात खिला रही है। खिलाते खिलाते मैंगो जूस बेचने वाले हाकर को रोक कर पूछ रही है-ऐ! पानी है?
एक आदमी और चढ़ कर मेरे बगल में बैठ गया है। इसे मालदा टाउन जाना है। बता रहा है कि हम छठ वाले नहीं हैं, बी एस एफ में हैं। छठ वाले वे लोग हैं। इसी भीड़ भाड़ वाले कोहराम में लोग मनोरंजन भी कर रहे हैं। नीचे एक आदमी मोबाइल में वीडियो देख रहा है। बच्चे लगातार 'चिल्ल-पों' मचाए हैं। बड़े उनको संभालने में लगे हैं। डिम-भात खाने वाले बच्चे को पानी की बोतल मिल गई है। पीने के बाद वो उसी बोतल से खेल रहा है। किसी स्टेशन पर रुक गई है ट्रेन। कुछ घबरा कर पूछ रहे हैं-बनारस कब आएगा?

बहुत काम बटोरा गया है लोहे के घर में। फोटोग्राफी किया जाय, किताब पढ़ा जाय या लिखा जाय? आज तो एक और मुसीबत आ गई। साथी ने तीन फिलिम भेज दिया मेरे मोबाइल में। गोलमाल अगेन के लालच में दो और आ गई। एक जान और कितना सारा काम!
लोहे के घर की खिड़की से सुबह फोटोग्राफी संभव है, शाम को नहीं। शाम को अभी दूर दूर तक अंधेरे में डूबा खेत और साथ साथ चलता एक टुकड़ा चांद ही नजर आ रहा है। मेरे मोबाइल कैमरे से इसकी तस्वीर नहीं ली जा सकती। दूर कंकरीट के जंगल से छिटके जुगनू की तरह टिमटिमाते बल्ब दिख रहे हैं। लोहे की अप #ट्रेन वाली पटरी पीछे भाग रही है, दूर टिमटिमाते बल्ब आगे-आगे दौड़ रहे हैं, इंजन हारन बजा रहा है और ऊपर नील गगन में टंगा-टंगा चांद साथ चल रहा है। कुल मिलाकर ऐसा लग रहा है कि धरती नाच रही है और ऊपर से चांद मजा ले रहा है!
आज भीड़ नहीं है लोहे के घर में। यह सूरत जाने वाली ट्रेन है। बिहार जाने वाली होती तो #छठकी भीड़ दिखती। बड़ा शांत वातावरण है। चांद गगन से उतर कर बगल में आ बैठता तो मामला रोमांटिक होता। पूनम का न सही, एक टुकड़ा चांद तो होता अपने पास। अभी भी ऊपर आकाश में टंगा है, वैसे का वैसा। मंजिल आएगी तो मुझे कंकरीट के अंधेरे में छोड़ गुम हो जाएगा। मन करता है चलता रहूं यूं ही, जब तक चांद साथ है।

#ट्रेन बड़ी देर से रुकी है। यह फास्ट ट्रेन है लेकिन लोग कह रहे हैं पीछे सुपर फास्ट आने वाली है, उसी को पास देगी। अच्छा है अभी #बुलेट नहीं चलती। चलती होती तो उसे भी पास देती। ताकतवर अपने से कमजोर को ऐसे ही दबाते हैं।
लोग ऊब कर अजीबोगरीब हरकत कर रहे हैं। एक सज्जन यू ट्यूब में सचिन की बैटिंग देख रहे हैं, कुछ ऊंघ रहे हैं, कुछ ट्रेन से उतरकर प्लेटफार्म पर टहल रहे हैं। एक गुट मूंगफली फोड़ चुकने के बाद इंजन की तरफ देखते हुए हाथ मल रहा है। मेरे अलावा कोई रुकने की खुशी नहीं मना रहा! सब दुखी हैं। जो मंजिल की चिंता में सफर का आंनद न ले पाएं उन्हें चलना ही नहीं चाहिए।
अंडा-चावल, सब्जी-चावल, चना, चाय बेचने वाले आ जा रहे हैं। ऐसे बोर वातावरण में इनकी बिक्री बढ़ जाती है। साहेब जब अधिक बोर होने लगते हैं तो उनकी भूख अनायास बढ़ जाती है। कुछ नहीं तो मिनरल वाटर ही खरीद लेते हैं। मजदूर बोर हो ते हैं तो सुर्ती रगड़ने लगते हैं।
सुपर फास्ट के जाने के दस मिनट बाद अपनी फास्ट भी पटरी पर दौड़ने लगी है। आकाश में टंगा कार्तिक का चांद अब आधा हो गया है। जब पूरा होगा तब दिवाली होगी अपने शहर में। इधर गंगा के घाटों पर दीप जलेंगे, उधर उस पार रेती से निकलेगा कार्तिक पूर्णिमा का चांद। देव भी आएंगे दिवाली मनाने। अभी आधा है चांद। गगन में तारे नहीं दिख रहे, अकेला है। साथ चल रहे यात्रियों की तरह अकेला।
मन करता है आधे चांद से बातें करूं। पूछूं कि टुकड़े टुकड़े पूरे होने में क्या आंनद है? धीरे-धीरे छोटे होने में कितनी तकलीफ होती है? छोड़ो! नहीं पूछता। मूर्ख कहेगा और ज्ञान बघारेगा..हम कब अधूरे हैं रे पगले? तू हमेशा देख ही नहीं पाता मुझे पूरा!
किसी ने चेन पुलिंग की है। रो रो कर रुकी है ट्रेन। अब चुप हुई। सरकार की तरह जोर से हारन बजाएगी और फिर छुक छुक करती चल देगी पटरी पर। चलती गाड़ी की चेन कोई खीच ले तो इंजन हारन बजाने के सिवा और कर भी क्या सकता है? जनता की याददाश्त बड़ी कमजोर होती है। जितनी देर तकलीफ होती है रोती/चीखती है, फिर भूल जाती है। ट्रेन फिर चल दी। लोग फिर खुश हो गए।

लोहे के घर में शाम तो होती है पर हर खिड़की को चांद नसीब नहीं होता। बाहर अंधेरा अंधेरा और अंधेरे के सिवा दूर दूर टिमटिमाते बल्ब ही दिख रहे हैं। चांद दूसरी तरफ है।
रुकी है #ट्रेन। इस स्टेशन पर रुकना नहीं चाहिए था मगर रुक गई। यही क्या कम है कि स्टेशन पर ही रुकी है? बीच जंगल में भी रुक सकती थी। उस पार प्लेटफार्म पर एक मरकरी लाइट जल रही है। जिसके प्रकाश के नीचे दो लोग इत्मीनान से बैठ कर बीड़ी सुलगा रहे हैं। शेष सब अंधकार में डूबा हुआ। छोटा स्टेशन है। छोटे स्टेशन पर ऐसा ही होता है। ट्रेन के रुकने से यहां के लोकल वेंडरों की किस्मत खुल गई है। अंडा चावल बेच रहे हैं। अभी चढ़े कुछ एक यात्री बहुत खुश हैं...आहा! रुक गई तो पकड़ लिए! भीतर बैठे जो यात्री ट्रेन के अनावश्यक रुकने से दुखी थे वे उनके चेहरे की खुशी देख रहे हैं। दुखी और सुखी की निगाहें चार हुईं। ट्रेन चल दी फिर दोनो में प्यार हो गया! अभी चढ़े यात्रियों में से एक ने कहा.. हें हे हे ..न रुकती तो कैसे पाते? मेरे मन ने कहा.. धन्य है भारतीय रेल! बहुतों को दुखी करती है तो बहुतों को खुशी भी देती है। दुखी यात्री, खुश यात्रियों की खुशी सहन नहीं कर पाते।
ट्रेन फिर रुक गई। यहां भी रुकना नहीं चाहिए था। अब हमारे साथ वे भी दुखी हैं जो पिछले स्टेशन पर ट्रेन के रुकने से चढ़ कर खुश थे! एक दो दूसरे खुशकिस्मत यात्री यहां से भी चढ़े हैं। पता नहीं यह खुशी किस चिड़िया का नाम है? अभी यहां तो अभी वहां! एक ही सफर में कितने प्रकार के लोग यात्रा करते हैं! कभी कभी तो लगता है हाड़ मांस से बना यह शरीर भी लोहे के घर के समान है और बेचैन_आत्मा एक यात्री

ट्रेन लेट है। लेट होने की वजह से हम इस ट्रेन में हैं। राइट होती तो 3.45A.M. में चली जाती। अब 6 बजे चली है तो मिल गई। यह न मिलती तो दूसरी मिलती। इसके मिलने से थोड़ा आराम हो गया। रेलवे को धन्यवाद देना तो बनता है। डायरेक्ट #बनारस पहुंचाने वाली ट्रेन है मगर पूरी उम्मीद है कि हर स्टेशन पर रुकेगी और बहुत से यात्री रेलवे को धन्यवाद देंगे।
हिजड़ों का दल घुसा है बोगी में। खूब ताली पीट पीट कर पैसे ऐंठ रहा है। हमसे नहीं मांगेगा। कहता है..'ये रोज के यात्री हैं, #स्टाफ के है!' जो मर्दानगी से पैसे न दे उसे ये अपने स्टाफ का, मतलब #हिजड़ा समझते हैं!
ट्रेन हवा से बातें कर रही है। जब मस्त चाल से चलती है तो झूला झुलाती है। प्लेटफॉर्म पर नहीं रुकती, पटरियां बदलती है, तो लोहे के घर के यात्रियों के जिस्म हिल्लम- डुल्लम होते हैं। कोई तोंदू नहीं बैठा अपने आस पास वरना ऐसे में उसकी तोंद देखने का मजा आता।
तारीफ किया तो पटरी पर रेंगने लगी ट्रेन! तारीफ पा कर कौन नहीं इतराने लगता है? एक कविता अख़बार में छपने पर नौसिखिया अपने को कवि मान लेता है, प्रशंसा पा कर भ्रष्ट अधिकारी भी खुद को विक्रमादित्य समझने लगता है, यह तो ट्रेन है। ठुनक कर रुकी, फिर इंजन ने सीटी बजाई तो साथ-साथ चल दी।
पुल से गुजरी है ट्रेन। उसके थरथराने की आवाज गूंज रही है कानों में। हमेशा की तरह शांत थी नदी। मछलियों को भी शोर शराबे की आदत पड़ चुकी है। नदी हो या व्यवस्था छोटे मोटे थरथराहटों से तनिक भी नहीं घबराती। पुल ढह जाए या ट्रेन उलट जाए तो थोड़ी देर के लिए हलचल होती है नदी में। कुछ समय बाद गाड़ी फिर पुरानी पटरी पर चलने लगती है।
ट्रेन फिर रुकी। कुछ और यात्रियों को ट्रेन में चढ़ने का अवसर मिला। #रेलवे को फिर धन्यवाद मिला। विलम्ब के लिए खेद प्रकट करने पर कितना धन्यवाद मिलता है रेलवे को! रुकी ट्रेन में #वेंडर फिर आए। ठंडा पानी, मसाला चाट, मैंगो जूस। ये मैंगोजूस जाड़े में भी बिकता रहेगा क्या? लगता है लोगों के स्वभाव में ही नहीं टेस्ट में भी बहुत फ़र्क आ गया है। जाड़े में आइस्क्रीम और चाव से खाते हैं!
मोबाइल में सेक्सी गाना बज रहा है मगर लोग उदासीन भाव से सुन रहे हैं! पहले हिरोइन के सर से जरा सा आंचल सरक जाने पर पूरा बदन थरथराने लगता था, अब रश्के कमर ..मजा आ गया... सुनकर भी उदासीन! सही कहता है हिजड़ों का दल...ये स्टाफ के लोग हैं!

3.7.17

नाता

बाहर
लाख अँधेरा हो
उजाला है
लोहे के घर में

मौन हैं
अंधेरे में डूबे हुए खेत
हलचल है
घर में

बाहर भी
श्रमिक थे, किसान थे
जब तक
सूरज था
सूरज के डूबते ही
मौन हो गये खेत

उजाले के साथ
शोर का
अँधरे के साथ
मौन का
गहरा नाता दिखता है!

मौन थे
बुद्ध भी
जब तक अँधेरा था

अँधेरा हो
तो चुप रहना चाहिये
अँधरे में
परिंदे भी
खामोश रहते हैं
मेंढक, झिंगुर के अलावा
कोई शोर नहीं करता।

बाहर का संसार

पटरी के किनारे
मालगाड़ी से
सीमेंट की बोरियाँ उतारकर
बीड़ी, खैनी के साथ
बतकही कर रहे हैं
ढेर सारे मजदूर

चीखता है
ट्रेन का इंजन
घबरा कर उड़ते हैं
खेतों में
चुग रहे पँछी
खुश होते हैं हम
लोहे के घर की खिड़की से
इन्हें देखकर!

खेतों में
जमा हो रहा है
बारिश का पानी
किसी ने करी है गुड़ाई
कहीं जमा हैं
घास
कहीं-कहीं
दिख जाते हैं
धान के बीज वाले
चौकोर टुकड़े

बाँसवारी में
लटके हुए बांस की टहनी पकड़कर
ऊपर चढ़ने का प्रयास कर रही है
एक बकरी
बगल में
आम के पेड़ पर चढ़कर
झूला झूल रही है
एक लड़की

मेढ़-मेढ़
पुराना टायर लुढ़काता
भागा जा रहा है
एक लड़का

दूर-दूर तक फैली है
बारिश के बाद की
चटक धूप
अभी कुम्हलाए नहीं हैं
नेनुआ के पीले फूल
अभी
खिलखिला कर
हंस रहा है
सूरजमुखी

खेतों के बीच से
बिछाई जा रही है
गैस की मोटी पाइप लाइन
जिसके मुँह में
ताक/झाँक रहे हैं
गदेले
विकास की अंधेरी सुरंग का रास्ता
ये क्या जाने!
इन्हें तो मजा आ रहा है
एक कदम चढ़कर घुसने
फिर धप्प से कूद कर
ताली बजाने में

पटरी पर
चल रही मेरी गाड़ी
बैठे-बैठे देख रहा हूँ
बाहर का संसार।