अपने शहर में, घने कोहरे और हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच 'वसंत पंचमी' का त्यौहार कब आया और चला गया पता ही नहीं चला. हाँ, ब्लॉग जगत में बसंत झूम कर आया. इधर ४-५ दिनों से इस शहर के मौसम में ऐसा बदलाव आया कि लगा ..यही तो है बसंत. आज मैंने भी ठान लिया कि बसंत पर कुछ लिखा जाय. २ घंटे की मेहनत के बाद जो भी बन सका उसे ज्यों का त्यों पोस्ट कर दे रहा हूँ ..अभी इस पर संपादक की नज़र भी नहीं गयी है अतः यह गुरुतर दायित्व भी मैं आप पर ही छोड़ता हूँ. प्रस्तुत है एक गीत.
आयो रे बसंत चहुँ ओर
धरती में पात झरे
अम्बर में धूल उड़े
अमवां में झूले लगल बौर
आयो रे बसंत चहुँ ओर.
कोयलिया 'कुहक' करे
मनवां का धीर धरे
चनवां के ताकेला चकोर
आयो रे बसंत चहुँ ओर.
कलियन में मधुप मगन
गलियन में पवन मदन
भोरिए में दुखे पोर-पोर
आयो रे बसंत चहुँ ओर.
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