5.2.16

लोहे के घर से-10


आज सभी ‪#‎ट्रेनें‬ दगा दे गईं। अपनी भी, पराई भी। हे प्रभु! ये हो क्या रहा है!!! 49अप और दून, किसान सभी डाउन ट्रेनें कैंसिल। अपन को तो 60 किमी जाना है, बस पकड़ लिया मगर जिसे लम्बी यात्रा करनी हो, उनका क्या हाल हुआ होगा! कोई खूब बढ़िया मुहूर्त निकाल कर शादी की बरात ले कर जा रहा हो और पता चला कि ट्रेन ही कैंसिल हो गई! अब इतनी जल्दी दूसरी में रिजर्वेशन भी कैसे मिल पायेगा? बिचारा कुंआरा रह जाएगा। उधर कन्या पक्ष वालों की चेहरे की हवाइयाँ उड़ेंगी सो अलग। इस राज में तो शादी के कार्ड में छपाना चाहिए-तिथि और समय ट्रेन दर्शन से परिवर्तित हो सकते हैं।
लोग ये भी कर सकती हैं कि नकली बराती ले कर आएं। दूल्हे-दुल्हन के पुतले बनाकर शादी के मण्डप में बिठा दिये जांय। विवाह हो जाय फिर जब प्रभु की कृपा हो, दूसरी ट्रेन में रिजर्वेशन मिले तो दूल्हा आ कर दुल्हन से कोर्ट में रजिस्ट्रेशन करा कर, मंदिर में जयमाल डालकर शादी का सर्टिफिकेट और दुल्हन को साथ लिवा ले जाय!
‪#‎लोहेकेघर‬ की खिड़की से धूप नहाये सरसों के फूलों को देखते हुये यह गीत दिमाग में कौंधता है पर मारे संकोच बाहर नहीं निकलता-गड्डी चली रे छलांगा मार दी, मैंनू तेरी याद आई...
आज सही समय चल रही है ‪#‎ट्रेन‬। बाबतपुर स्टेशन करीब आ रहा है। खेतों की पगडंडियों पर दिख रहे हैं स्कूल जाते बच्चे। एक माल गाड़ी हारन बजाती गुजर रही है। उसके जाते ही फिर से चल दी अपनी रुकी ट्रेन। चाय वाला चाय-चाय चीख रहा है। सर्वेश भाई वाट्सऐप पर आये भारत और इण्डिया का फर्क बताती कोई कविता पढ़ कर सूना रहे हैं। मैं कान से सुन कुछ रहा हूँ, आँख से देख कुछ रहा हूँ मगर उँगलियों से लिख वही रहा हूँ जो सोच रहा हूँ।
मन कितना चंचल होता है! छन छन छितराता जाता है। बड़े जतन से एक चित्त होता फिर अगले ही पल भटक जाता है। पिण्डरा हाल्ट में लाल-पीली साड़ी धोती पहने, चबूतरे पर बैठी, धूप सेंकती महिलाओं पर नजर ठहर सी गई मगर अगले ही पल #ट्रेन चल दी। खुशियों वाले पल कितने छणिक होते हैं न?
ट्रेन और सरसों के खेतों के बीच फिर आई पतली सड़क। तीन बच्चियाँ धीरे-धीरे आपस में बातें करतीं जा रही हैं स्कूल। उड़ने से पहले ठुमक-ठुमक फुदक रही हैं चिड़ियाँ खेत की मेढ़ पर। बाबतपुर से आगे सूखे खेत फिर अरहर और पीले सरसों के बड़े-बड़े खेत।
जफराबाद के बाद 50 डाउन बड़े रंग में चलती है। लगता है आज सही समय पर पहुंचा कर ही मानेगी। बड़ी तेज़ रफ़्तार है इसकी। जलाल गंज का पुल काँप चुका। स्टेशन करीब आ रहा है। खालिसपुर से पहले नहीं रुकेगी यह ‪#‎ट्रेन‬। जितनी भी तेज चले बनारस पहुँचने का समय है 6.55 है। इससे पहले तो पहुँचने से रही। मनमर्जी नहीं कर सकती। घर कभी मनमर्जी नहीं करता, मनमर्जी तो घर में रहने वाले ही करते हैं।
इस ‪#‎लोहेकेघर‬ में भाँति-भांति के यात्री सफ़र करते हैं। हम जहां बैठ जाते हैं, उसी को दुनियाँ समझ लेते हैं। आसपास के गुमसुम चेहरों को देख यह नहीं समझ बैठना चाहिये कि सभी तंग हाल हैं। जाति-धर्म के लफ़ड़े यहां नहीं हैं मगर अनजान यात्रियों से सावधान रहने वाली बात घुट्टी में समाई हुई लगती है। यात्रा में कब कोई चूना लगाकर उतर जाय, कहा नहीं जा सकता। जीवन यात्रा में कभी न कभी विश्वास सभी करते हैं, कभी न कभी धोखा सभी खाते हैं। कोई बचपन में, कोई जवानी में और कोई जीवन के आख़िरी पड़ाव पर। इसी ठोकर से उपजा होगा ज्ञान। अनजान यात्री से सावधान! मगर सोचिये विश्वास न हो तो दोस्ती कैसे हो? दोस्ती न हो तो जीवन साथी कैसे बनें? साथी न हो तो संसार कैसे चले?
मूँगफली वाला गया है। इससे पहले मीठा केक बेचती मंहिला गई थी। चाय वाला भी आकर अभी-अभी गया है। सिर्फ एक यात्री ने एक पुड़िया मूँगफली खरीदी। मूँगफली खाने में कोई खतरा नहीं है। फोड़ो, छीलो, देखो फिर खा लो। मगर जीवन में हर समय इतनी सुरक्षित खरीददारी कहाँ हो पाती है!
बाबतपुर स्टेशन आ गया। हवाई अड्डे की बिजलियाँ अँधेरे में खूबसूरत लग रही हैं। एक अनजान यात्री बगल में आ कर बैठ गया। सर गन्जा है। काली फ्रेम का चश्मा, फुल काली स्वेटर पहने है मगर सफेद दाढ़ी बढी हुई है। अविश्वास करने का कोई कारण समझ में नहीं आता। आम आदमी लगता है। गाड़ी चली तो उसके चेहरे पर सन्तोष के भाव जगे। आम आदमी किसी अनजान यात्री का का क्या बिगाड़ सकता है भला! जब भी बिगाड़ेगा किसी अपने का ही बिगाड़ेगा। किसी अपने से कमजोर को ही धोखा देगा।
ट्रेन अब शिवपुर पहुँचने वाली है। शिवपुर से बनारस कैन्ट की दूरी मुश्किल से 3 से 5 किमी होगी मगर इसके पास अभी पूरे 50 मिनट हैं। यह या तो शिवपुर में आराम करेगी या कैन्ट के आउटर पर। तेज चलने वाले मंजिल के करीब आ कर हाँफने लगते हैं। कभी-कभी सो भी जाते हैं। इसी स्वभाव के चलते कछुये से हार गया होगा खरगोश! समय से पहले मंजिल नहीं मिलती। न तेज दौड़ने से न आलस करने से मंजिल तक पहुंचा जा सकता है। यह शरीर भी हाड़ मांस का बना एक घर है जिसमे आत्मा रहती है। मन बेचैन इसे कभी तेज चाल से हांकता है और कभी अपाहिज होने पर कोसता है। घर को दुरुस्त रखने पर तभी मजबूर होता है जब बीमार पड़ जाता है।
ट्रेन शिवपुर आ कर इत्मीनान से खड़ी हो गई। अब यात्रियों की बेचैनी देखते ही बनेगी। दस मिनट बाद वे इसे कोसना शुरू कर देंगे बगैर यह जाने कि अभी इसके छूटने का समय नहीं हुआ! निर्धारित समय के हिसाब से बिफोर आई है। रोज के यात्री जानते हैं। कुछ उतर कर प्लेटफॉर्म पर घूमने चले गये। कुछ आपस में मुखर हो घर के काम को याद करने लगे। किसी को तिलक में जाना है तो किसी को अपना जैकेट पॉलिश कराने देना है। पत्नी की फरमाइश कोई बता नहीं रहा। सब पुरुषार्थ वाले काम ही साझा कर रहे हैं। जो चढ़ते ही निढाल हो कर ऊपर बर्थ पर चढ़कर सो गए थे वे बनारस पास आ गया जानकर उठ बैठे हैं। घर जा कर इन्हें अधिक तरोताज रहना होगा। थका-मांदा कहलाया जाना इनको पसन्द नहीं होगा।
बाहर अंधेरा है। बिजली नहीं है। छोटे-मोटे स्टेशन पर बिजली होना कौन जरूरी है! छोटे अँधेरे में रहेंगे तभी तो बड़े रौशन होंगे!!! अतिरिक्त ऊर्जा क्या आसमान से टपकती है?
चलने का निर्धारित समय पूरा हो चुका मगर ट्रेन कुछ ज्यादा इत्मिनान से खड़ी है। लोगों ने अब इसे कोसना शुरू कर दिया है। अभी तक की इसकी वफाई, बेवफाई में बदल गई। जीवन में भी यही होता है। आप लाख अच्छा काम करो मगर एक गलती सब किये धरे पर पानी फेर सकती है।

इसके रहते कोई नया विचार आने से रहा। एक बार इसकी कहानी क्या लिखी थी फेसबुक में कि अब लिखना दूभर कर दिया। पढ़कर थोड़ा शांत हुआ। गुमसुम बैठा है।
देर शाम जब दफ्तर से चले तो गोदिया के अलावा और किसी ‪#‎ट्रेन‬ की उम्मीद न थी। भंडारी पहुंचे तो भोला दिख गया। बोला-'कोटा-पटना आ रही है!' सुखद आश्चर्य हुआ। किसी के 8 घण्टे लेट होने का दुःख मेरे लिये सुख में बदल गया। ऐसे ही मेरा दुःख भी किसी को सुख पहुंचाता होगा! और भी 50 डाउन के छूटे हुए रोज के यात्री मिले। आज सही समय पर निकल गई। वे फिफ्टी के सही समय पर आ जाने से दुखी थे। मैं कोटा-पटना के लेट होने से दुखी यात्रियों के बीच सुखी हूँ। सुख-दुःख भी क्या चीज है!
मुझे बिठाने के बाद ट्रेन मस्त चाल से चल रही है। रास्ते में आने वाले पुल असहाय आशिक की तरह झटके खा रहे हैं! पूरी बोगी खाली-खाली है। ऐसा लग रहा है जिन्होंने इसके बर्थ में पट्टा लिखवाया था वे ही रह गये बाकी इसकी बेवफाई सहन न कर पाने के कारण रास्ते में ही इसे छोड़कर उतर चले गये। किसी के साथ पट्टा लिखवाने में कई लफ़ड़े हैं। उसकी वफाई से खुशी और बेवफाई से दुखी होना होता है। लेकिन लम्बी यात्रा बिना रिजर्वेशन कराये कहाँ हो पाती है!
रोज के यात्रियों को बहुत दिनों के बाद लेट कर जाने का मौक़ा मिला है। अधिकतर आराम कर रहे हैं। कोई-कोई मोबाइल में फ़िल्म भी देख रहे हैं। अँधेरे में डूबे किसी छोटे स्टेशन पर ट्रेन धीमी हो कर फिर चल दी। बनारस तक यह नान स्टॉप ट्रेन है। इसकी छोटे स्टेशन पर धीमी होने की अदा से कितनों की जान चली जाती होगी! कितने मजनू तो दौड़ कर चढ़ने के चक्कर में पटरी पर आ जाते हैं! दुसरे दिन अखबार में मोटी हेड लाइन के साथ अंग-भंग तस्वीर छपती है-'ट्रेन भी नहीं मिली, जिंदगी भी चली गई।' कंकरीट के घर के लिये लोहे के घर से मुहब्बत की बहुत बड़ी सजा मिलती है। ट्रेन चीख-चीख कर सावधान करती है कि जब मैं खड़ी रहूँ तभी चढ़ा-उतरा करो मगर रोज के यात्री जुए में बंधे बैल की तरह ऑफिस से छूटते ही जल्दी से घर पहुँच जाना चाहते हैं और गलती कर बैठते हैं। कई बार तो मैं भी उतरा हूँ धीमी होती चलती ट्रेन से और उतरने के बाद यह ख़याल आया है कि नहीं उतरना चाहिये। 
आज 49अप कैंसिल है। रोज के अधिकांश यात्री बस में बैठे हैं। बस में इतनी भीड़ कि बैठने के लिये भी सीट नहीं। खड़े-खड़े लगभग पूरी यात्रा हो गई। मैंने खड़े रहने के इतने लाभ बताये कि जलाल गंज आते-आते अशोक जी उठकर खड़े हो गये और मुझे बिठा कर बोले-बैठकर बोलिये! मैं बोला-वाह! खड़े रहने के बाद बैठने में तो और भी आनंद है!!!
बस में ड्राइवर की सीट के पीछे टीन का बैग टँगा है। इस पर लिखा है-यात्रा दर्पण! मैंने कंडक्टर से पूछा-इसका क्या मतलब? वो बोला-पढ़िये! फिर अपने बोला-अरे! जो पढ़ना है उसी के ऊपर लगा दिया है!!!
जनहित में जारी शासनादेश का कितनी ख़ूबसूरती से पालन किया गया है!

अखिरकार गोदिया की बोगी में नीचे की दो खाली बर्थ मिल ही गई। एक में Ajay Srivastava लेट गये दुसरे में हम। इससे पहले भी दूसरी बोगी में दो बर्थ मिली थी। क्या टाँगे फैलाकर, खिड़की के शीशे गिराकर लेटे थे हम लोग! तभी आ गया था एक परिवार। पूरी 6 बर्थ हमारी है कहते हुये और हम मायूस से जूते के फीते बांधकर बड़े बेआबरू होकर उस कूपे से निकले थे। जिंदगी हमेशा सरल नहीं होती लेकिन ऐसा भी नहीं कि प्रयास करो और सफलता न मिले। दूसरी खाली बर्थ मिल ही गई। अब तो अजय जी के खर्राटे भी सुनाई पड़ रहे हैं! मौका मिलते ही आदमी क्या बेपरवाह हो जाता है!
पटरियों पर रेंगते इस लोहे के घर में सभी यात्री अपनी-अपनी बर्थ पर सो रहे हैं। हार्न बजाती‪#‎ट्रेन‬ की स्पीड अब तेज़ हो चुकी है। बन्द खिड़कियों से भी ठंडी हवा आती तो है! धरती भी क्या तेज-तेज घूमती है जब तूफ़ान तूफ़ान आता है? नहीं, विज्ञान इसका कोई और ही कारण बताता है।
शोर बता रहा है कि जलालगंज का पुल आ गया। पटरियों की खटर-पटर बता रही है कि स्टेशन भी गुजर गया। Sanjay Singh का फोन आया था-हम बनारस पहुँच गये पैसिंजर से। जल्दी चले थे तो जल्दी पहुंचे, हम भी पहुँच ही जायेंगे। जीवन के सफर में ये मुकाम भी आता है जब कोई जल्दी पहुँचने से खुश या देर से घर पहुँचने पर दुखी नहीं होता। पहुँचने पर भोजन मिल ही जाता है फिर काहे की हाय-हाय, काहे कि किच-किच! चलते-फिरते घर में सभी शराफत से लेटे तो हैं।
ट्रेन इत्मिनान से खड़ी हो गई है! अजय जी की नींद टूट गई है। शाल से गरदन निकालकर पूछ रहे हैं-कहाँ खड़ी कर दिया हो? अब हम का बतायें! ट्रेन हमेशा निर्धारित समय और स्थान पर थोड़ी न खड़ी होती है। ई कोई यूरोप है जो लेट होने पर पैसिंजर को हर्जाना देना पड़ेगा! भारतीय रेल है, अधिक देर सोने देने का अधिक किराया नहीं मांगती यही क्या कम है? और भी सोये दिख रहे यात्री जाग कर अपनी-अपनी गाथा सुनाने और एक दूसरे को ढांढस बंधाने में जुटे हैं-'कोई क्रासिंग होगी।' कितने ‪#‎सहिष्णु‬ हैं हम!
हारन बजा। सभी खुश हो गये। चुप भी हो गये! लगता है खड़े घर में इन्हें नींद न आने और आपस में बोलते रहने की बीमारी है!!! घर के रफ़्तार पकड़ते ही सब खामोश हो गये। गाड़ी जब तक पटरी पर चलती रहती है जिंदगी सुकून से कटती है। विश्वास रहता है कि मंजिल आ ही जायेगी। ढलती शाम में यात्री अक्सर यह भूल जाते हैं कि मंजिल तो आएगी मगर सुबह उठकर फिर सफर में चलना है, दूसरी ट्रेन पकड़नी है। पड़ाव को मंजिल समझने का लुत्फ़ कोई छोड़ना नहीं चाहता।
smile emoticon

31.1.16

लोहे के घर से-9


आज फिफ्टी डाउन कैंसिल है और किसान लेट। ‪#‎ट्रेन‬ के पड़ाव तक जाने का मन ही नहीं किया। बस स्टेशन से बस पकड़ा और चल दिये। खचाखच भरी है बस लेकिन अजीब सी मुरदैनी छाई है! कुछ लोग यहाँ भी खड़े हैं। Sanjay Singh दौड़ कर चढ़ गये वरना हम भी शामिल होते खड़े यात्रियों में। जब से चले हैं तब से थरथरा रहे हैं। बिना भूकम्प आये हिल रहे हैं। लिखना दुश्वार है। जलाल गंज पुल के ऊपर से मस्तानी चाल में चलती थी ट्रेन तो पुल किसी आशिक की तरह थरथराता था। यहां तो पुल हाथी की तरह शांत खड़ा है बस चूहे की तरह उछल रहा है!
मजा नहीं आता बस की यात्रा में। बस में चलते हुये लगता है कि यात्रा कर रहे हैं। लोहे के घर का एहसास नहीं होता। एक घण्टे की यात्रा में चार जगह तो रुकती है बस। कुछ रुकते हैं, कुछ चढ़ते हैं, कंडक्टर चीखता है-टिकट-टिकट। फिर कुछ देर बाद चीखता है-पैसे बाकी हैं तो लीजिये। मतलब कुल मिलाकर एक उबाऊ यात्रा का माहौल। ट्रेन में लगता है जैसे घर में बैठकर मित्रों से गप्प लड़ा रहे हैं। कभी मूँगफली खा रहे हैं, कभी चाय पी रहे हैं तो कभी तास खेल रहे हैं। बस मंजिल तक पहुँचने की मजबूरी है तो ट्रेन सफ़र का आनन्द।


आज अमृतसर-हावड़ा एक्स्प्रेस ‪#‎ट्रेन‬ 50 डाउन में काफी भीड़ थी। बोगी-बोगी बैठने के लिए सीट तलाशते थक गए। भीड़ का कारण पंजाबी तीर्थ यात्रियों का प्रकाशोत्सव मनाने के लिए पटना साहिब जाना था। मुश्किल से जालंधर से पटना जा रहे एक पंजाबी परिवार से दया प्राप्त करने में सफल रहा। बैठने पर पता चला इससे पहले एक यू पी के सज्जन को अपनी सीट पर बिठाने का उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा। उसने जाते-जाते उनके साथ बदतमीजी की थी। मुझे अपनी बातों से उन्हें संतुष्ट करने में कुछ वक्त लगा कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते। मुझसे मिलकर वे संतुष्ट और प्रसन्न दिख रहे थे। काशी और गंगा के बारे में वे मेरे मुख से बहुत कुछ जान चुके तो मैंने गुरु गोविंद सिंह के बारे में पूछा। उन्होने बस इतना बताया कि उनका जन्म पटना में हुआ था और तो अथाह सागर है! फिर मैंने गूगल महाराज की शरण में जाना उचित समझा।
गूगल महाराज से जाना कि गुरु गोविंद सिंह का बचपन का नाम गोविंद राय था। बैसाखी वाले दिन गोविंद राय से गुरु गोविंद सिंह बन गए थे। खालसा पंथ की स्थापना की। सिखों के 10वें गुरु थे। गुरु गोविंद सिंह जहां विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में ५२ कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे।
वाकई अथाह सागर है गुरु गोविंद सिंह जी का परिचय। वे मुझे कितना बताते! हरिमन्दिरजी पटना साहिब में 349वां प्रकाशोत्सव धूम-धाम से मनाया जा रहा है। शेष जानकारी और अपना अनुभव आप भी बांटें तो आनंद आए।
बारिश हुई, ठण्ड बढ़ी, ट्रेन‬ कैंसिल
यात्री परेशान
किसानो के चेहरे की 
लौटी मुस्कान

धुले-धुले
खिले-खिले
अरहर और सरसों
तुम मिलो आज
न कल, न परसों

भूल गया
शेखर एक जीवनी
याद है-
बाड़े पर पोस्ते
खेत फुली कुसुम्मी
पीली चोली वाली री!
दे जा एक चुम्मी।
‪#‎टाटा‬ पर बैठकर टाटा करते चले गये कई रोज के यात्री। ‪#‎49अप‬ भी आ गई। थोड़ी विलम्ब से आई और देर से खड़ी है। बनारस पहुँच कर जोर की अंगड़ाइयाँ ले रही होगी और प्रधान मंत्री जी के शहर को छोड़ने का मन नहीं कर रहा होगा। लगता है मेरी बात सुन कर शर्मा गई, चली हंस की चाल!
टाटा वही ‪#‎ट्रेन‬ है जिससे कटकर लगभग 6 माह पहले अपने एक साथी की मृत्यु हो गई थी। टाटा जौनपुर में नहीं रुकती, बनारस के बाद अगला पड़ाव फैजाबाद है। साथी जफराबाद स्टेशन पर जब ट्रेन धीमी होती है, दौड़कर आउटर पर ही उतर जाते हैं। जिनकी मृत्यु हुई थी वे जफराबाद स्टेशन के आउटर पर उतरने के लिए निचले पाँवदान पर खड़े थे, इतने में प्लेटफॉर्म आ गया और एक पैर उसी में फँसकर उलझ गया था। दुर्घटना में प्लेटफॉर्म से रगड़कर सीने की हड्डियाँ भी टूट गईं थीं और उनकी दुखद मृत्यु हो गई थी।
इस घटना के बाद कई सप्ताह तक लोग टाटा से नहीं गए। स्टेशन पहुँचने पर घर से फोन आते थे-टाटा से तो नहीं गए? और लोगों को सफाई देनी होती थी- नहीं, टाटा से नहीं गए। लगता है लोग उस घटना को धीरे-धीरे भूल चुके हैं और फिर टाटा से जाने वालों की संख्या बढ़ रही है। अभी भी बहुत से यात्री टाटा से नहीं जाते और थोड़े देर से ही सही, सुरक्षित यात्रा करना चाहते हैं। ऐसे यात्रियों की संख्या अधिक है।
कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है। लोग कनटोप, मफलर ओढ़े भारी जैकेट की बाहों से उँगलियाँ बाहर निकाले अखबार पढ़ रहे हैं या मोबाइल चला रहे हैं। पीछे की सीट से 'आत्महत्या पर राजनीति' प्रकरण पर चल रही बहस के कुछ शब्द सुनाई पड़ रहे हैं। लोहे के घर की शीशे वाली खिड़कियाँ बन्द हैं। अरहर और सरसों के खेत के साथ गोहरी पाथती ग्रामीण महिलाएं भी दिख रही हैं। सुंदरता श्रम का उपहार है। यह विडम्बना है कि मालिक मस्त, श्रमिक लाचार है। छोटे-छोटे छोकरे कम कपड़ों में मूँगफली, हरे मटर का बोझ उठाये बोगियों में घूम रहे हैं। कई ऐसे होंगे जो श्रम न करें तो घर का चूल्हा न जले।
ट्रेन की रफ़्तार सुस्त है। कोई चीख रहा है-ड्राइवर झंडू है! कुछ देर ट्रेन की चाल और ऑफिस के लिए हो रही देर पर चर्चा हुई। कोई अखबार की संपादकीय पढ़कर बोले-सिंधु घाटी की सभ्यता के समय भी हर घर में शौचालय था! अब बातें प्रधानमन्त्री स्वच्छता अभियान की ओर मुड़ गईं। श्रमजीवी अवसर पाते ही बुद्धिजीवियों की तरह बातें करते हैं। बातें करना, बातें बनाना, बहस करना कितना आसान है! गढ़े मुर्दे उखाड़ना, हत्या-आत्महत्या पर राजनीति करना कितना आसान है, देश का वास्तव में विकास करना कितना कठिन!

आज ठंडी हवा कह रही है-हट जा! मेरे सामने न आ। छुप जा! प्लेटफॉर्म पर मत टहल। ‪#‎ट्रेन‬आएगी तो खिड़की के शीशे बन्द कर बैठ जाना किसी बोगी में।
ट्रेन की प्रतीक्षा लम्बी हो तो ये बात मौजूँ है-मैं ये सोच के दिल बहला रहा हूँ, वो अब चल चुकी है, वो अब आ रही है!
पहले जमाने में प्रेमियों की हालत कालीदास सरीखी थी। मेघ को दूत बनाकर या चाँद के सहारे अपना दुखड़ा रो लेते थे। अब तो नेट है। मगर हाय! नेट भी अपनी बात पर टिका नहीं रहता। धीरे-धीरे समय बढ़ाता है।
पता नहीं कहाँ अटक गई अपनी वाली! देखें कब आती है और कब सीटी बजाते हुये कहती है-आजा मेरी बोगी में बैठ जा।

‪#‎ट्रेन‬ आई। उछलती-कूदती। ऐसे आई जैसे कमाल कर दी हो! लेट से आने की ज़रा भी शर्मिंदगी नहीं। 'बैठना हो तो जल्दी से बैठो वरना मैं चली! मेरे चाहने वाले एक तुम ही नहीं!!!' वाला भाव। मरता क्या न करता। जब घर की बेवफाई सहनी पड़ती है, ये तो ...लोहे की है। बैठ गया चुपचाप।
सामने लोअर बर्थ पर एक महिला कम्बल ओढ़े लेटी हुई हैं। उसके अपर बर्थ पर कनटोप, मफलर बांधे सर झुकाये एक आदमी बैठा है। उसकी मुड़ी किसी गुड्डे की तरह ऊपर-नीचे हिल रही है। उसके बगल में एक युवा 'हरा मटर' बड़े चाव से खा रहा है। मेरे सामने एक मैडम बैठी हैं। बगल में संजय जी बड़ी तेज़ आवाज में मोबाइल बजा रहे हैं-सलामे इश्क,मेरी जां, ज़रा कुबूल कर लो। तुम हमसे प्यार करने की ज़रा सी भूल कर लो.....! कोई उनका बाजा नहीं सुन रहा। सर्वेश भाई अपनी ट्रेन पर चढ़ने की बहादुरी बतिया रहे हैं। गाना एक तरफ, बातें दुसरी तरफ। बन्द लोहे के घर की खिड़कियों से आती ठंडी हवा से एहसास हो रहा है कि आज गलत जगह बैठ गये।
बार-बार चेन पुलिंग हो रही है। हर टेसन पर रुक रही है ट्रेन। साथी परेशान हैं कि यही हाल रहा तो किसान इसे ओवर टेक कर लेगी। सरकार के पास इस बिन बात की चेन पुलिंग का कोई इलाज नहीं है। सिवाय यह कहने के कि यह विरोधी दल की साजिश है। ये चाहते ही नहीं कि देश विकास मार्ग पर तेजी से आगे बढे!
अब ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ी है। लगता है पहुँच ही जायेगी कैन्ट स्टेशन। यहीं से कल चलने वाली है ‪#‎महामनाएक्सप्रेस‬ । आदरणीय प्रधान मंत्री जी का बनारस की जनता को नई सौगात। यह ट्रेन बनारस से दिल्ली जायेगी। सुना है कल सुबह 11 बजे प्रधान मंत्री जी अपने हाथों इसका उदघाटन करेंगे। सोचता हूँ कल उसी ट्रेन में बैठा जाये। दिल्ली दूर है मगर जौनपुर तक जाने में क्या हर्ज है?

अधिक देर होने की संभावना से ‪#‎महामनाएक्सप्रेस‬ से जाने का विचार त्यागना पड़ा। ‪#‎49अप‬आज एकदम राइट टाइम पर आई और छूट भी गई। लगता है आज बनारस से छूटने वाली सभी ‪#‎ट्रेनों‬ पर अधिकारियों की पैनी नज़र है। यही दृष्टि रोज मिले तो अपना भी आना-जाना सुगम हो जाय!
ट्रेन छूटी तो यार्ड में महामना एक्सप्रेस का इंजन सज्ज होता दिखा। थोड़ी देर बाद उसके डिब्बे भी दिखे। फूल-मालाओं से सजे डिब्बों को पुराना इंजन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म की ओर ले जा रहा था। एक और लोहे के नये घर का आज गृह प्रवेश है। भारतीय जनता के मुखिया आदरणीय प्रधान मंत्री जी का संकेत पा कर यात्रा प्रारम्भ करेगी। कल से भारतीय जनता इसके संकेतों की प्रतीक्षा करेगी। ‪#‎काशी‬ के लिये आज खुशी का दिन है और सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि ‪#‎महामना‬ के नाम से एक ट्रेन भारत की राजधानी तक चलेगी।
50डाउन कैंसिल है। लेट फरक्का मिली भंडारी स्टेशन पर। आई तो मन प्रसन्न हो गया, रुकी तो रुकी रही। मैंने पूछा-'चलती क्यों नहीं?' गुस्से से बोली-'आगे 'माल'है और जफराबाद तक सिंगल पटरी। मैं क्या करूँ?' मैं चुप हो गया। सरकार 'माल' पर ज्यादा ध्यान देती है। अर्थ व्यवस्था टंच होनी चाहिये। समाजवादी रेल मंत्री जी के समय से सरकारें माल गाड़ी पर मेहरबान हैं। सिंगल को डबल पटरी में बदलने की खबरें भी आ रही हैं। ठीक है, माल कमाओ और माल को डबल पटरी बनाने में खर्च करो। पटरियों के अगल-बगल सिर्फ चूना मत लगाओ।
‪#‎ट्रेन‬ चल दी। जफराबाद पहुँच रही है। यहां और साथी चढ़ेंगे। ट्रेन में भीड़ है, इस बोगी में भी झांकेंगे। अपन को तो सीट मिल ही गई है, उनकी वे जाने। सामने लोवर बर्थ पर एक आदमी मफलर ओढ़े, चश्मा पहने, पूरी तरह झुक कर डायरी के पन्ने पलट रहे हैं। डायरी में आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी कुछ अनसुलझी पहेली होगी जिसे वे खाली वक्त में मौक़ा मिलते ही सुलझा लेना चाहते हैं। डूबे हुये हैं बड़ी देर से। मैं उनकी कोई मदद नहीं कर सकता। अपनी पहेली सभी को खुद ही सुलझानी पड़ती है।
ट्रेन अब जलालगंज पुल को थरथरा कर आगे बढ़ रही है। यह पुल भी कितना बेबस, कितना असहाय है! अब वो आदमी गायब हो गया! मेरा ध्यान पुल के कांपने पर गया और वो आदमी इसी बीच अपनी डायरी के साथ कहीं गुम!!! शायद उसे जलाल गंज स्टेशन पर उतरना था। ट्रेन स्टेशन पर खड़ी है।
50 डाउन आज कैंसिल है। जौनपुर सिटी से सद्भावना पकड़ने के चक्कर में आये तो बेगमपुरा मिल गई। सिटी में इसका स्टापेज नहीं है मगर रुक गई तो सभी चढ़ गए। सभी चढ़े तो हम भी चढ़ गये। कोई एसी में चढ़ा, कोई स्लीपर में। हमारे सामने जनरल बोगी थी हम जनरल में चढ़ गये।
एक फ़ौजी को नया रंगरूट मिल गया है। लगातार उसे समझाये जा रहे हैं। मैंने सोचा कुछ फ़ौज के टिप्स देंगे लेकिन वो तमाम हितोपदेश दिये जा रहे हैं! अगला भक्त की तरह सुन रहा है।
‪#‎ट्रेन‬ ज़फराबाद में भी रुकी। किसी ने चेन पुल्लिंग किया है। सिटी में रुकी थी तो अच्छा लगा था, जफराबाद में रुकना कुछ जमा नहीं। दूसरे यात्रियों को दोनों बार रुकना बुरा लगा होगा। ऐसा ही है। गलत काम अपने हित में हो तो बुरा नहीं लगता, दूसरा हित साध रहा तो बुरा लगता है! गलत काम न रुकने के पीछे हमारा यही स्वार्थ है।
अब ट्रेन अपनी रफ़्तार में चल रही है। यात्री सभी गुमसुम हैं। जम्मू से बनारस तक चलती है बेगमपुरा। बनारस आते-आते थक चुके होंगे। इनकी बातों से पता चल रहा है कि इस साल वहां अभी बर्फ नहीं पड़ी। सुबह-शाम ठण्ड बहुत है। पुल के थरथराने की आवाज़ आ रही है। जलालगंज आ रहा है। यह ट्रेन सीधे बनारस ही रुकेगी। आगे कहीं गरमा गरम बहस हो रही है।
फिर चेन पुलिंग हुई! बाबतपुर स्टेशन है। धरती वीरों से खाली नहीं। ट्रेन में बहस सुनो, उपदेश सुनो तो लगता है सभी कितने भले लोग हैं! चेन पुलिंग करने वाले आसमान से तो आ नहीं रहे! इसी ट्रेन में चल रहे होंगे या इसी ट्रेन से उतरे होंगे!!!
गणतन्त्र की पूर्व संध्या पर सबको बधाई दिया जाय और अपनी बातों को यहीं विराम दिया जाय। तमाम चेन पुंलिंग के बाद भी ट्रेन अपनी मंजिल तक पहुँचती ही है। रुकते-चलते अपना देश भी एक दिन विकसित राष्ट्र हो ही जाएगा। आप सभी को गणतंत्र दिवस की बहुत बधाई। .....जय हिन्द।
कितना कठिन है
हमारे लिये
जाड़े में
सुबह उठकर
गणतंत्र दिवस मनाने
झण्डा फहराने
घर से निकलना!

और भी कठिन
जब ऑफिस दूर हो
और..
मुँह अँधेरे
छोड़ना पड़े
गर्म बिस्तर।

कितना सरल है
देश के वीर सैनिकों के लिये
हिमालय की बर्फिली पहाड़ियों में
अपनी जान पर खेलकर
सीमाओं की रक्षा करना!
और भी सरल
जब ऊँची पहाड़ियों तक पहुँचने का 
कोई मार्ग ना हो।

कठिन लगने लगे
हमारी तरह 
उनको भी
सीमाओं की रक्षा करना
तो चाह कर भी
नहीं फहरा पायेंगे हम
तिरंगा।
......................

कोहरे को चीरती भाग रही थी 'किसान'। अब दिख रही है अरहर, सरसों के फूलों पर खिली-खिली धूप। धूप, अरहर और सरसों के इन फूलों से तिरंगे रंग में रंगी है पूर्वांचल की धरती। घूम रहे हैं पटरी पर लोहे के पहिये, दौड़ रहा है लोहे का घर। मन में, प्रकृति में, स्कूलों और सरकारी भवनों में हर तरफ गणतंत्र दिवस का उल्लास देखते ही बनता है।
सरकारी मशीनरी के अलावा सभी धार्मिक स्थल भी इससे जुड़ जाते तो आजादी और गणतंत्र दिवस समारोहों की क्या धूम होती! सुबह ईद, दिन होली, शाम क्रिसमस और रात दिवाली होती!!! जैसे ईद और होली की बधाई देते हैं, आपस में तपाक से गले मिलते हैं वैसे ही बधाइयाँ देते आजादी की, लोकतन्त्र की। झिलमिल झालरों से, दीपों से सजे होते सभी घर। नये वस्त्रों में घूम रहे होते देश के सभी बच्चे। पूरब, पश्चिम, उत्तर, दख्खिन चारों दिशाओं में मची होती धूम।

‪#‎ट्रेन‬ भाग रही है अपनी रफ़्तार से। उम्मीद है पहुँचा देगी समय से। छंट रहा है कोहरा। फ़ैल रहा है उजाला। सोचता हूँ खेतों में काम कर रही महिलाओ, मिट्टी ढो कर ले जाते ट्रैक्टर, भेड़ चराते चरवाहे, चाय-मटर बेचते हरकारों, मजूरी पर निकले कामगारों या रिक्शा खींचते किसी गरीब को रोककर मैं उसे गणतंत्र दिवस की बधाई दूँ तो मुझे पागल न समझ ले! छोड़िये! ये काम नहीं करता। आपको देता हूँ और आप मुझे दीजिये-गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत बधाई। ....जय हिन्द।

17.1.16

बसंत की याद में


ठंडी और बसंत की
मिट्ठी नहीं होती है
लौट-लौट आती है
लौट-लौट जाती है
गंगा के लहरों में
बसंत की कोई
चिट्ठी नहीं होती है

वही साइबेरियन पंछी
वही नावें
वही यात्री
वही सहमें-सिकुड़े
बनारस के घाट

बूढ़ा पीपल
हमेशा की तरह हंस रहा है
ललिता घाट पर
दो-चार पतंग क्या फंसा लिए अपने जाल में
अपने को बड़ा
तीस मार खाँ समझता है !

ठंडी जानती है
मेरे जाने पर ही
आयेगा बसंत
फिर भी
इतनी बेकरारी क्यों है?

तू जा न,
जा!
कि आएगा  बसंत
तूने जो कलियाँ खिलाईं हैं
उन्हें चूमकर
फूल बनाने के लिए
आयेगा बसंत
........................

10.1.16

लोहे का घर -8

ट्रेन‬ आज राइट टाइम है। रोज के यात्रियों में खुशी की लहर है। खिले-खिले मुखड़े चिड़ियों की तरह चहक रहे हैं। सरसों के फूल रोज से अच्छे लग रहे हैं। बस से जाते-जाते ऊब चुके यात्री बहुत दिनों बाद आपस में बतिया पा रहे हैं। गर्मी के मौसम में सही समय चलती ही है मगर आज यह सिद्ध हुआ कि ठंडी के दिनों में भी ट्रेन सही समय चल सकती है। एक का सही होना कितनों के लिये प्रेरणा दायक हो सकता है! यह अलग बात है कि सही चलने के लिए एक को अधिक श्रम करना पड़ता है, अधिक कष्ट उठाना पड़ता है। लगता है ट्रेन यह समझ चुकी है कि रुक-रुक कर खरगोश की तरह आराम करना और रेस हार जाने के बाद जीवन भर कछुये के ताने सुनने से अच्छा है बिना रुके चलते जाना। सभी ट्रेन से प्रेरणा लेकर अपनी चाल सही कर लेते तो अपना देश विकाससील से विकसित राष्ट्र में परिवर्तित हो जाता!
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50 डाउन के जफराबाद प्लेटफॉर्म नम्बर 1 पर आने की घोषणा हो गई। 6 बजकर 35 मिनट होने को हैं। बड़े शहर में किसी झील के किनारे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका से कह रहा होगा-'तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे, मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे।' यहाँ संजय जी अण्डा खा कर, चाय पी कर, पान घुला कर मस्त हैं।
ट्रेन आई। सभी चढ़ गये। कुछ बैठे, कुछ खड़े रह गये। जो खड़े हैं वे ऊपर जाने की तैयारी कर रहे हैं। ऊपर जन्नत नहीं, खाली बर्थ है। ऊपर जा कर गुमसुम-गुमसुम, टुकुर-टुकुर, नीचे ताक-झाँक रहे हैं। जलालगंज पुल के ऊपर से गुजरी है ट्रेन। रफ़्तार तेज़ थी। पुल आशिक की तरह थरथराया तो जरूर होगा।
ट्रेन‬ जोर-शोर से चलती जा रही है। रोज के यात्री अपने-अपने गोल से बिछड़ कर, थोडा छितरा कर बैठे हैं। जो गोलबंदी कर पाये हैं वे मुद्दे तलाश कर बहस कर रहे हैं। ताजा मुद्दा जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव परिणाम का है। मुझे देश की राजनीति में कोई रूची नहीं तो जिला पंचायत की राजनैतिक चर्चा कौन सुने? मैं तो बस इतना जनता हूँ कि हम क्या हैं! रहनुमा बदलने से भेड़ बकरियों की किस्मत नहीं बदलती। इनका जन्म ही दुहे जाने या कसाई के हाथों हलाल होने के लिये होता है। सब व्यर्थ की मैं! मैं! है। खाओ पीयो मस्त रहो। मालिक तुम्हें वक्त से पहले मरने नहीं देगा और वक्त आ ही जाय तो हलाल किये बिना छोड़ेगा नहीं। फिर किस बात के लिए मेरा-तेरा? कसाई किसी का भाई नहीं होता। हाँ, भाई कसाई हो सकता है।
कुछ पढ़े-लिखे लोग मोबाइल पर गाना सुना रहे हैं! मैं पूछूँगा-क्यों सुना रहे हो? तो कहेंगे-सुन रहे है, आप भी सुनिए! मैं कहूँगा-अच्छा नहीं लग रहा है तो लम्बा उपदेश देंगे-संगीत से प्रेम करना चाहिये। इससे स्वास्थ ठीक रहता है, दिनभर की थकान मिट जाती है! इससे अच्छा है जब उनसे निगाह मिले तो उनकी तरफ देख कर हौले से मुस्कुरा दिया जाय। वे भी खुश और अपन भी चैन से।
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50 डाउन अमृतसर हावड़ा ट्रेन‬ में आज भी भीड़ है। 72 वर्षीय महिला लाठी टेकते हुये अपना सीट तलाश रही हैं। उनका पोता टी टी से अनुरोध कर रहा है। दोनों का बर्थ दूर-दूर है। टी टी भी सम्पूर्ण मानवीय सम्वेदना प्रकट करते हुये एक एक यात्री से पूछ रहे हैं-कोई अकेले है भाई? एक ने साहिष्णुता दिखाई, बर्थ मिल गई दादी को। अब वो सुकून से हैं। इक दूजे के सहयोग से सभी एडजस्ट हो गये।
रोज के यात्री आज भी छितरा गये। जिसे जहाँ जगह मिली वहीं बैठ गया। एक चाय वाला चीख रहा है-'चाय! बोलो चाय।' मैंने बोला-चाय! वो अब चाय लेकर आ रहा है। मैंने कहा-'मुझे नहीं चाहिए।' लगता है वह नाराज हो गया। भुनभुनाते हुये जा रहा है। कहीं प्रधान मंत्री बन गया तो अपनी खैर नहीं।
सफ़ेद मटर को हरे रंग में रंग कर एक बाल्टी मटर लिए आ रहा है मटर वाला। अजीब आवाज में चीख रहा है-येssहरा बोलिये, मोटरली हरा बोलिये! मैंने बोला-मोटरली हरा! उसने सुना अनसुना कर दिया। समझदार लगता है। अइसे ही लक्ष्य पर दृढ रहा तो तरक्की करेगा। प्रधान मंत्री नहीं तो जिला मंत्री बन सकता है। बस किसी पार्टी से जुड़ जाय।
सामने एक यात्री दुसरे यात्री को आड इवेन नम्बर का कोई जोक वाला वीडियो दिखा रहा है। सीन उनकी आंखें देख रही हैं, जोक्स मुझ तक भी पहुँच रहा है। मुझे सुनकर हंसी नहीं आ रही है, वे देखकर खिलखिला रहे हैं! मतलब सीन में अधिक जान है। अब आवाजें आनी बन्द हो गईं। वे पहले की तरह शरीफ दिखने लगे।
मेरे बगल में एक वृद्ध दम्पति बैठे हैं। सुल्तानपुर बार्डर से आ रहे हैं, गंगा सागर जा रहे हैं। एक दूसरे पौढ़ व्यक्ति किसी दुसरे बर्थ से निकल कर उनके पास आये और पूछने लगे-पांडे नाहीं आयेन ? दम्पति दुखी होकर बोले-पता नाहीं कहाँ चली गयेन! हम बोले-हमहूँ पाण्डे हई दादा, मान लो पांडे आई गयेन! वे हंसकर बोले-नाहीं, ऊ 71 बरस क हयेन, काफी वृद्ध हयेन, पता नाहीं कहाँ रही गयेन।
पता चला वे 10 लोग हैं जो गंगा सागर स्नान के लिए जा रहे हैं। पहली बार जा रहे हैं। पता नहीं है कि हावड़ा से कितनी दूर है 'गंगा सागर'! बस इतना जानते हैं कि गंगा सागर वहाँ है जहाँ गंगा सागर से मिलती हैं। ईश्वर इनकी यात्रा सुखद बनाये। पुण्य का लाभ हो। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि गंगा में डुबकी लगाने से आनंद आता है, पाप नहीं कटता।
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