19.2.19

वीर रस क कविता

सब लिखेन
वीर रस क कविता
हमहूँ सोचे
लिख ही दें 
वीर रस क कविता

सबसे पहिले
आपन वीरत्व के जगाई
कलम में
तबे न कुछ धार देखाई?

बहुत खोजे
वीर तत्व ससुरा!
वक्त के चाकी मा पिसाय-पिसाय
पिसान अस दुबका रहा 
रसोई के टीना मा!

टीना से निकाल के
थरिया में उझील दिया
दे पानी, मार छींटा, 
जगावे के कोशिश मा
अपने आटा गीला होई गा!

बेल के लोई
आग में पकाय दिया
वीर तत्व ससुरा
आँच पे चढ़ा त
रोटी अस फूल गा!

चबाय-खाय सूत गए
भिनसहरे उठे
फिन लिखे पड़ा...
विनम्र श्रद्धांजलि!

4.2.19

महापुरुष

इसमें कोई शक नहीं कि पुरुष अपने कर्मों से महान बनता है। पुरुष से महापुरुष बनने के लिए उसे कई सत्कर्म करने पड़ते हैं। महापुरुष बनने के लिए पुरुष को सबसे बड़ा सत्कर्म तो यह करना पड़ता है कि उसे अपना पुरुष तत्व त्यागना पड़ता है। पुरुषत्व त्यागने के लिए पुरुष को स्त्री से दूर भागना पड़ता है। अपवाद को छोड़ दें तो जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने सबसे पहले अपनी स्त्री का ही त्याग किया। प्राचीन भारत में मर्यादा पुषोत्तम भगवान श्री राम से भगवान बुद्ध, तुलसी दास तक कई उदाहरण हमे मिल जाएंगे। महात्मा गाँधी ने अपनी धर्मपत्नी को नहीं छोड़ा मगर पराई पीर सुनने के चक्कर में उन्होंने भी बा के दुखों पर केवल घड़ियाली आँसू ही बहाए। वर्षों दक्षिण अफ्रीका में गिरमिटियाओं के दुखों के लिए संघर्ष किया और भारत लौट कर भी देश की आजादी की चिंता में लगे रहे, अपनी स्त्री पर ध्यान नहीं दिया। बीसवीं, इक्कीसवीं सदी में भी कुँवारे रहकर या स्त्री त्याग कर महापुरुष बनने की दौड़ में लगे पुरुषों के उदाहरण मिल जाएंगे। यह अलग बात है कि स्त्री को खुश करने के लिए पुरुष आपस मे एक सूक्त वाक्य दोहराते पाए जाते हैं... हर सफल पुरुष की सफलता के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है! 

पुरुष को महापुरुष बनने के लिए अपनी रुचि और क्षमता के हिसाब से अलग-अलग क्षेत्र का चुनाव करना पड़ता है। पहले क्षेत्र सीमित थे। धर्म, दर्शन और जन सेवा ही सर्व सुलभ क्षेत्र हुआ करते थे। विकास के साथ-साथ महापुरुष बनने के अनेकों द्वार खुलते चले गए। राजनीति, खेल, संगीत, नाटक, सिनेमा और अब तो ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक और वाट्सएप जैसे सर्वसुलभ रास्ते अपना कर भी पुरुष, महापुरुष बनने की सोच सकता है। लेकिन इन सभी सत्कर्मों में उसे स्त्री का नहीं तो स्त्री की भावनाओं का त्याग जरूर करना पड़ेगा, तभी वह महापुरुष बन सकता है।

महापुरुष बनने के लिए सबसे सटीक और बढ़िया मार्ग राजनीति है। खेल, संगीत, सिनेमा या दूसरे आभासी मार्ग पर चलकर भारत रत्न तो मिल सकता है लेकिन महापुरुष बनने के लिए उसे इसमें राजनीति का तड़का भी लगाना पड़ता है।  राजनीति में सफल होने पर पुरुष को मोक्ष प्राप्ति की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।  राजनीतिज्ञ जब तक जीवित रहता है, विरोधी उसे परम पुरुष ही प्रचारित करते हैं। मरणोंपरांत परम पुरुष को महापुरुष मान कर उसकी ख्याति से लाभान्वित होते हैं। राजनीति का उद्देश्य वैसे तो समाज और राष्ट्र की सेवा है मगर इसमें व्याप्त दलगत स्वार्थ की भावनाएं पुरुष को महापुरुष क्या, मनुष्य की श्रेणी से भी पदच्युत करा सकती है।  एक दल, दूसरे दल के महापुरुष को नीचा दिखाने और अपने दल के परम पुरुष को महा पुरुष सिद्ध करने में लगा रहता है। जैसे हम बचपन में खड़िया से खींची अपनी पाई को बड़ा सिद्ध करने के लिए दूसरे की खींची पाई को मिटा देते थे, ठीक वैसे ही राजनीतिज्ञ अपने दल के पुरुष को महान सिद्ध करने के लिए दूसरे दल के महापुरुष की गलतियाँ गिनाते पाए जाते हैं। 

वह महापुरुष भाग्यशाली होता है जिसके पास उसकी जाति का वोट बैंक तगड़ा होता है। वोट बैंक की विशालता को देख कर कोई भी दल उस महापुरुष की गलतियाँ गिनाने की हिम्मत नहीं कर पाता। इससे एक बात और समझ में आती है कि किसी पुरुष को महापुरुष बनना ही पर्याप्त नहीं होता, मरणोपरांत सदियों तक महापुरुष बने रहने के लिए अपनी जाति का प्रबल समर्थन भी चाहिए होता है। सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे भवन्तु निरामया के साथ-साथ, अपनी जाति का सबसे ज्यादा कल्याण करते हुए मोक्ष प्राप्त करना चाहिए, तभी वह मरणोपरांत भी महापुरुष बना रह सकता है। अपनी जाति को छोड़, दूसरी जातियों का कल्याण करने वाले पुरुष भी हुए, लेकिन उन्हें अब कौन याद करता है! 
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26.1.19

बसंत

ठंड की चादर ओढ़
दाहिने हाथ की अनामिका में
अदृश्य हो जाने वाले राजकुमार की
जादुई अंगूठी पहन कर
चुपके से धरती पर आता है
बसंत
तुमको भला कैसे दिखता?

तुम
रोज की तरह
परेशान हाल
थके मांदे घर आए
तुम्हारी उनींदी पलकों पर
हसीन ख्वाब बनने की प्रतीक्षा में
चुपके से बैठा था
तुमको भला कैसे दिखता?

परेशान न हो
अभी तो
धरती की सुंदरता देख
खुद ही मगन है!
ठंड की चादर हटेगी
छुपन छुपाई खेलते-खेलते
थक कर
बैठ जाएगा एक दिन,
अपने आप
फिसल कर गिर जाएगी
उँगली से
जादुई अंगूठी

तब
दोनो हाथों से पकड़कर
जोर से चीखना..
चोर!
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21.1.19

खिचड़ी


हमारे देश मे दरवाजा बंद करना कभी सुहागरात की निशानी होती थी, अब स्वच्छता अभियान की पहचान है। इसके लिए आदरणीय अमित सर और दूरदर्शन के शुक्रगुजार हैं। खाना खाते समय टी वी खोलकर दूरदर्शन का समाचार देखने वालों के सामने कभी-कभी बड़ी असहज स्थिति आ जाती है। इधर एक कौर मुँह में डाला नहीं कि अमित जी चीखते हुए चले आते हैं..

झाड़ी के पीछे, पेड़ के नीचे, दबा के आजू, पटरी के बाजू, करते हो तुम पेट हल्का, ना शौचालय, ना है नलका। फैल गई बीमारी चारों ओर, इसीलिए बॉस! शट द डोर!!  दरवाजा बंद करो..दरवाजा बंद। दरवाजा बंद तो बीमारी बन्द। साथ साथ लोटा/बोतल लेकर खेत मे शौच के लिए जा रहे एक-एक व्यक्ति को बुलाकर शौचालय में भेजते हैं और दरवाजा बंद करते हैं।

यह सब देखकर कल सुबह आप फिर खेत मे निपटने जाते हैं या शौचालय में जाकर दरवाजा बंद करते हैं यह तो बाद की बात है फिलवक्त या तो खाना बंद कीजिए या टी.वी बन्द। 

एक जमाना था जब मध्यम वर्गीय परिवार में, घर के किसी सदस्य ने भी, कई बार दरवाजा बंद किया तो बाकी सदस्य यह मान लेते थे कि आज खाने में मूंग के दाल की पतली खिचड़ी ही मिलेगी। अब परिवार हम दो, हमारे दो तक सीमित हुआ।आर्थिक जीवन स्तर में सुधार आया तो यह हुआ कि जो बार-बार दरवाजा बंद करता है, खिचड़ी वही खाए। बाकी लोग क्यों कष्ट सहें?  

आम आदमी के स्टेटस के साथ, खिचड़ी का भी स्तर सुधर गया। अब खिचड़ी मूंग के दाल वाली, पतली न होकर, तरह तरह के मेवा मसाले वाली पकवान हो गई! कई परिवारों में तो हर शनिवार को खिचड़ी ही बनती है। मकर संक्रांति के दिन बनने वाली उड़द की काली दाल वाली खिचड़ी का तो कहना ही क्या! इसे तो इसके यारों के साथ खाया जाता है। लोकोक्ति भी प्रसिद्ध है.. दही, पापड़, घी, अचार, खिचड़ी के हैं चार यार। 

खिचड़ी भारतीय जीवन में रचा बसा वह पकवान है जिसने कई सामाजिक, राजनैतिक मुहावरे दिए। जब कोई गृहणी खाना देने में देर कर रही हो तो पतिदेव झट से तंज कसते हैं.. बीरबल की खिचड़ी बन रही है! भले उन्हें इसका ज्ञान न हो कि वे जिस बीरबल की खिचड़ी का नाम ले रहे हैं वह खिचड़ी बीरबल ने राजा अकबर को सबक सिखाने के लिए पकाई थी। हुआ यह था कि गरीब गंगाराम दस स्वर्ण मुद्रा के लालच में रात भर ठंडे पानी में खड़ा रहा और राजा ने यह कहकर ईनाम देने से इनकार कर दिया कि उसे दूर जल रहे दिए से गर्मी मिल रही थी! बीरबल ने भी अपने भोजन की हाँडी आग से काफी ऊँचाई पर टांग दी और यह कहा कि जब दिए से गंगाराम को गर्मी मिल सकती है तो आग से ऊँची रखी हाँडी को क्यों नहीं मिलेगी? जब खिचड़ी पकेगी तब दरबार मे आएंगे। अकबर को गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गरीब गंगाराम को दस स्वर्ण मुद्राएँ देना स्वीकार किया। तभी से बीरबल की खिचड़ी वाला मुहावरा चलन में आ गया। अब भोजन मिलने में देर हो तो बजाय तंज कसने के पतियों को यह समझना चाहिए कि जरूर उन्होंने अपनी श्रीमती जी से किया कोई वादा पूरा नहीं किया है जिससे खाना देर से पक रहा है। :)

भारत की राजनीति में भी जब किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता और कई पार्टियाँ मिल कर सरकार बनाती हैं तो अखबार वाले झट से यह हेड लाइन लगा देते हैं.. किसी दल को बहुमत नहीं, अब बनेगी खिचड़ी सरकार! मतलब जब देश के विकास का दरवाजा बार-बार बन्द होने लगता है, देश का हाजमा खराब हो जाता है, तब उसे खिचड़ी सरकार से काम चलाना पड़ता है। देश में जब खिचड़ी सरकार बनती है तो उसके चारों यार खूब रँगबाजी करते हैं। काली उड़द की खिचड़ी में दही, पापड़, घी, अचार रंग जमाते हैं तो खिचड़ी सरकार में सरकार नेपथ्य में चली जाती है, यार मौज उड़ाने लगते हैं! देश में पूर्ण बहुमत की सरकार है तो समझना चाहिए कि देश का स्वास्थ्य अच्छा है। खिचड़ी सरकार है मतलब देश बीमार चल रहा है। पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए चाहे जितनी बड़ी हाँडी चढ़ाकर मनो खिचड़ी पकाओ लेकिन यह नौबत न आने दो कि देश को खिचड़ी सरकार मिले। देश अब फिर बीमार हुआ तो स्वस्थ होने में वर्षों लग जाएंगे।
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13.1.19

ये पतंगें

तेरी नीयत
तेरे मंझे
तू ही जाने
मैं साथ रहना चाहता हूँ
इन पतंगों के!
ये पतंगें
बादलों में
धूप लिखना चाहती हैं।

आकाश में
छाई है बदली,
हो रही है
हल्की-फुल्की
बूंदाबांदी
और फिर
बह रही
कातिल हवाएं!
प्रतिकूल हैं
रंग सारे
मगर फिर भी
ये पतंगें
बादलों को चीरकर
किरण लिखना चाहती हैं।

ये पतंगें
बादलों में
धूप लिखना चाहती हैं।

ये पतंगें
हौसलों की बातियाँ हैं,
ये पतंगें
इस धरा की थातियाँ हैं,
ये पतंगें
आग की चिंगारियाँ हैं।
चलो साथी!
साथ दें
इन पतंगों का
ये पतंगें
इस धरा में
सुबह लिखना चाहती हैं।


31.12.18

इक्कीसवीं सदी का टीन एज

अफसोस मत कर
इक्कीसवीं सदी
अभी अपने
टीन एज के
आखिरी साल में
प्रवेश कर रही है
और हम
पचपन पार हो गए!

अफसोस मत कर
चाँद पर घर बनाने और
उड़ने वाले जूते/जैकेट
खरीदने से पहले
हम स्वर्ग सिधार जाएंगे।

अफ़सोस मत कर
नहीं खत्म हुए
जम्मू कश्मीर से आतंकवादी,
संसार से परमाणु हथियार और
नहीं मिटी अपने देश से
गरीबी।

अफसोस मत कर
इक्कीसवीं सदी ने
अपने टीन एज में ही
खूब सहे हैं
जाति और साम्प्रदायिकता के दंश,
नहीं बन सका अभी तक
अयोध्या में भव्य राम मंदिर और
नहीं आया
भारत में रामराज्य।

खुश हो
कि सभी झंझावात सह कर भी
सलामत रख सके हम
खुद को,
खुश हो
कि अभीतक
गलत काम करना
निंदनीय है समाज में,
अच्छे काम की
आज भी होती है
भूरी-भूरी प्रशंसा,
खुश हो
कि स्मार्ट हो गए हम भी
इक्कीसवीं सदी में
स्मार्टफोन खरीद कर
और खुश होने की सबसे बड़ी बात यह
कि नहीं रहना पड़ा हमें
बीसवीं सदी के
टीन-एज में
जब देश गुलाम था।

भाग्यशाली हैं हम
आजाद मुल्क में पैदा हुए,
बनाते रहे
अपनी सरकार और
अक्षिसाक्षी रहे
इक्कीसवीं सदी के
टीन-एज के।
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30.12.18

जाड़े की धूप

आज मैंने भी तुमसे खूब प्यार किया
आज तुमने भी मेरा खूब साथ दिया।

छत पर चढ़ा तो झट से लिपट गई मुझसे
थोड़ा ठहरा तो जी भर के मुझे गर्म किया।

पँछी आते हैं, चुगते हैं औ चहकते भी हैं!
एक छुट्टी में, हमने भी ये महसूस किया।

पत्नी ने पाल रख्खे हैं गमलों में कई पौधे
इक गुलाब को हँसकर मैंने आदाब किया।

इस घाट से उस घाट तक चला शाम तलक
आज घण्टों माँ गङ्गा का दीदार किया।

एक कुतिया ने मढ़ी में जने थे कई पिल्ले
कुछ मूर्तियाँ थीं, झुककर, नमस्कार किया।

जाड़े की धूप! तू साए की तरह थी दिनभर
आज तुमने भी मुझसे खूब प्यार किया।
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