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13.1.19

ये पतंगें

तेरी नीयत
तेरे मंझे
तू ही जाने
मैं साथ रहना चाहता हूँ
इन पतंगों के!
ये पतंगें
बादलों में
धूप लिखना चाहती हैं।

आकाश में
छाई है बदली,
हो रही है
हल्की-फुल्की
बूंदाबांदी
और फिर
बह रही
कातिल हवाएं!
प्रतिकूल हैं
रंग सारे
मगर फिर भी
ये पतंगें
बादलों को चीरकर
किरण लिखना चाहती हैं।

ये पतंगें
बादलों में
धूप लिखना चाहती हैं।

ये पतंगें
हौसलों की बातियाँ हैं,
ये पतंगें
इस धरा की थातियाँ हैं,
ये पतंगें
आग की चिंगारियाँ हैं।
चलो साथी!
साथ दें
इन पतंगों का
ये पतंगें
इस धरा में
सुबह लिखना चाहती हैं।


15.1.12

बनारस की छत और पतंगबाजी














पतंग

आवा राजा चला उड़ाई पतंग ।

एक कन्ना हम साधी
एक कन्ना तू साधा
पेंचा-पेंची लड़ी अकाश में
अब तs ठंडी गयल
धूप चौचक भयल
फुलवा खिलबे करी पलाश में

काहे के हौवा तू अपने से तंग । [आवा राजा चला...]

ढीला धीरे-धीरे
खींचा धीरे-धीरे
हम तs जानीला मंझा पुरान बा
पेंचा लड़बे करी
केहू कबले डरी
काल बिछुड़ी जे अबले जुड़ान बा

भक्काटा हो जाई जिनगी कs जंग । [आवा राजा चला...]

केहू सांझी कs डोर
केहू लागेला अजोर
कलुआ चँदा से मांगे छुड़ैया
सबके मनवाँ मा चोर
कुछो चले नाहीं जोर
गुरू बूझा तनि प्रेम कs अढ़ैया

संझा के बौराई काशी कs भंग। [आवा राजा चला...]
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बाल सखा,  जिन्होने हमें पतंगबाजी का न्यौता दिया, वे तो एक कटोरा भांग छानकर टुन्न पड़े थे। छत पर चढ़ने लायक भी नहीं।




12.1.12

पतंग

कटे बांस के
दो टुकड़ों संग
बंधी हुई डोरी।

मैं पतंग हूँ
उड़ना चाहूँ
उड़ा मुझे होरी।।

अरे ! संभल के
ठुमकी ठुमकी
नील गगन आया
ढील न इतना
खींच मुझे अब
फटती है काया

शातिर दुनियाँ
छूट ना जाए
अपनी यह जोरी।

एक न मानी
पेंच लड़ाई
सौतन से तूने
कटी मैं मगर
मेरी नज़र से
तू ही लगा गिरने

लगे लूटने
कई हाथ अब
मैं तो थी कोरी।
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