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13.5.13

स्वर्ण रेखा नदी


तेरा असली नाम क्या है,
स्वर्ण रेखा नदी?

तू उस देश में बहती है
जिस देश को कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहते थे,
उस राज्य में बहती है जिसे ‘झारखंड’ कहते हैं,
उस जिले में बहती है जिसे ‘घाटशिला’ कहते हैं।

क्या महज इसलिए ‘स्वर्ण रेखा’ कहलाई कि
पहाड़ियों के पीछे अस्त होने से पहले
सूर्य की सुनहरी किरणें
कुछ पल के लिए
खींच देती है तेरे आर-पार
एक स्वर्णिम रेखा!
या इसलिए कि
तू अपने साथ बहाकर लाई थी कभी
ताँबे और सोने के भंडार?

जाऊँगा बनारस
तो नहीं बता पाउँगा
‘माँ गंगा’ से तेरा हाल!
तेरी इतनी बुरी हालत सुनकर
दुखी होगी और
डर जायेगी बेचारी।

बहेलिए
जैसे कतरते रहते हैं
हाथ आई सुनहरी चिड़िया के पंख,
लोभी
जैसे दुहना चाहते है
आखिरी बूँद भी
वैसे ही कतरी,
चूस ली गई दिखती है तू तो!

तू अब
इतनी छिछली हो गई है
कि छोटे-मोटे पहाड़ जैसे दिखते हैं
तुझमें समाई शिलाएँ,
इतनी कमजोर हो चुकी है
कि सिर्फ एक बाँस के सहारे
कोंचते हुए
बिन चप्पू वाली नाव लेकर
आर-पार करता है
बूढ़ा माझी
और इतनी कम हो चुकी है तेरी गहराई कि
बीच धार में
पैदल ही चलकर
अपने जाल बिछाता है
मछेरा !

सोचता हूँ
बावजूद इसके
आज भी इतनी सुंदर है
तो कल कितनी सुंदर रही होगी तू!

तेरे तट पर
दूर-दूर तक बिखरी है
कोयले सी राख
ये काली है मगर कोयला नहीं है!
ये अवशेष हैं स्वर्णिम शिलाओं के
जिन्हें बड़ी सी फैक्टरी में
तोड़कर, तपाकर, निकालकर ताँबा-सोना...
फेंक दिया गया है
तेरे तट पर!

शायद
ऐसे ही पोती जाती है कालिख
सुंदरता के चेहरे पर!


नहीं
तू सिर्फ एक नदी नहीं है
कल शाम
जब डूब रहा था सूरज
खिंच गई थी
तेरे आर-पार स्वर्णिम रेखा
तो तू मुझे
‘सोने की चिड़िया’ सी दिखी!

तेरा असली नाम क्या है,
स्वर्ण रेखा नदी?
...........................

स्वर्ण रेखा नदी की शिला पर बैठते, फोटाग्राफी करते, ये भाव जगे।
दिनः 11-05-2013।
समयः जब सूरज पहाड़ियों के पीछे ढल रहा था।