Showing posts with label बनारस. Show all posts
Showing posts with label बनारस. Show all posts

2.2.26

बनारस

बिछी लाशें और जलती चिताओं के ऊपर
एक पतंग उड़ रही थी,
कोई
ठुमका लगा रहा था और वह
ठुमक-ठुमक
उछल रही थी!
मणिकर्णिका घाट था वह।

बगल में
हर हर महादेव के नारे लग रहे थे
गंगा स्नान के बाद
भक्त
दर्शन के लिए जा रहे थे
विश्वनाथ धाम था वह।
मणिकर्णिका के बगल में
सिंधियाघाट 
ऊपर संकठा माता का मन्दिर 
अन्नकूट का शृंगार था वहाँ।

यह कोई
नई बात नहीं थी,
चिताएं कभी बुझती नहीं, 
पतंग रोज उड़ता है,
हर हर महादेव के नारे रोज लगते हैं
अन्नकूट न सही
माँ संकठा की आरती 
रोज होती है।

बनारस 
जितना मरना जानता है उतना जीना जानता है
उसे मालूम है,
"राम नाम सत्य है।"
........

15.11.16

देव दीपावली

दिन भर 
लाइन में खड़े होने वाले 
रात भर 
दिवाली मनाते है!
हम बनारसी हैं
तम का मातम नहीं, 
अपने अंदाज से अँधेरा 
दूर भगाते हैं।

आज निकला था
थोड़ा बड़ा होकर
हुई थी आहट उसके आने की
दिखे थे
गंगा की लहरों में
चाँदनी के पद चिन्ह!
इतने दीप जले थे गंगा के घाटों पर
कि शरमा कर चला गया
पूनम का चाँद!

और तुम 
हमारे कष्ट का मातम मनाते हो?
अन्धेरा भगाने के लिये
हम मसान में
नृत्य करना जानते हैं।

13.3.16

चौराहे का पान वाला

बड़ी-बड़ी किताबें लिखे हैं 
मगर बहुत भटके हुए हैं!
जो दायें गये
दायें के बारे में लिख पाये
बाएं गए
बाएं के बारे में लिख पाये!
चौराहे का पान वाला
बडबडाता
हंस कर पान में
चूना कम
कत्था अधिक लगाता
फिर पत्ते में चूना
सजाकर देता..
"तू अपने में जितना मन करे उतना लगा ल!"
(यह बनारसी व्यंग्य है, दिल्ली के व्यंग्यकार शायद न समझ पायें इसलिए लिखा ताकि प्रयास कर के समझ जांय)
दायें, बायें दोनों के अनुभव सुनता
मुँह में पान ठूंस
दायें के ज्ञान से बायें को गरियाता
बायें के ज्ञान से दायें को गरियाता
ज्ञानी जब तिलमिला जाता
पान थूक कुछ बोलना चाहता
चीख ही पड़ता
चौराहे का पान वाला-
इहाँ ज्ञान मत बाँटा
इहाँ सब ज्ञानी हौ!
.................

16.7.13

बनारस की कजरी

'बनारस की कजरी' अब तो लुप्त प्रायः हो गई है। सुनने का सौभाग्य तो अधिक नहीं मिला लेकिन कभी-कभी पढ़ने को मिल जाता है। कहा भी जाता है...

दसमी रामनगर की भारी
कजरी मिर्जापुर सरनाम।

वर्षा की पहली झड़ी की अर्जुन के बाणों से तुलना, कुशल गीतकार की ही कल्पना हो सकती है.....

पुरूब देस से चढ़े बदरवा, पच्छुम बरसइ जाई।
पहिल बदरवा कसि के बरसइ, जस अरजुन के बान।।

शब्द चित्रण की दृष्टि से कजरी गीतों में वर्षा का जैसा सजीव चित्रण मिलता है, श्रेष्ठ काव्य में भी वैसा मिलना कठिन है। यह किसने लिखा पता नहीं लेकिन जिसने भी लिखा वह श्रेष्ठ गीतकार रहा होगा....

छाई बदरिया नभ मंडल में, अउर रसै रस बहै बयार।
बुन्न बुन्न में अमरित टपके, भर गये ताल तलंगर नार।।
रेवां बोलत बा पोखरिन में, अउ बनवां मंह नाचइ मोर।
पिहिक पपिहरा मोर अटा पर, रतिया दिनवा करै अलोर।।

प्रकृति के साज सिंगार करने के साथ-साथ हर्षोल्लास में स्त्रियाँ भी सोलहों श्रृंगार की कल्पना में डूब जाती हैं। ग्राम्या नायिका का नख शिख वर्णन अत्यन्त सहज एवं सटीक है...

अंखिया में सोहइ जानीकर हो कजरबा
मथवा में एंगुर का दगवा अरे हो सांवरिया,
अंगिया के सोहइ पंचरंग चोलिया
ऊपरां कुसुम रंग चोली, अरे हो सांवरिया।

ऐसी नायिका मनचलों की दृष्टि से कैसे बच सकती है?  विशेषतः जब सावन का मौसम सुहाना हो। नायिका को मनचला छेड़ ही देता है और संकेत से अपने घर चलने के लिए कहता है। नायिका भी कोई छुईमुई नहीं है, तुरन्त उत्तर देती है....

तोहरे से सुंदर मोर पिया बाय,
कि नाहीं बाबू कइलेनि गवनवां
                        अरे हो सांवरिया....

मेरा गौना नहीं हुआ है, परन्तु मेरे प्रियतम तुमसे कहीं ज्यादा सुंदर हैं। मनचले ने तुरन्त पूछा, जब तेरा गौना नहीं हुआ, तूने अपने प्रियतम को देखा ही नहीं, फिर तुझे कैसे पता चला कि तेरे प्रियतम मुझसे सुंदर हैं?”  वाक् पटु नायिका ने मनचले को अपनी दृढ़ता और वाकचातुर्य से से निरूत्तर कर दिया....

सेन्हुरा बहोरत कूं चिन्हली चुटिकिया,
मउरा छोरत लाली अंखियाँ,
                      अरे हो सांवरिया....

सिंदुर दान करते समय उनके हाथ दिखलाई पड़ गये और मौर उतारते समय रतनारे मदभरे नयन।

गीतों में ऐसे अनेक भावात्मक प्रसंग आते हैं जिन्हें सुनकर रसिक श्रोता आत्मविभोर हो जाते हैं।

रिमझिम संगीत के साथ सावन आया, तन मन शीतल हो गया। नायक के आगमन से नायिका का मन जुड़ा गया, पर विरहिणी की विरह ज्वाला और भी सुलग उठी।

जिस विरहिणी का तन-मन विरह में जल रहा हो, वह चाह कर भी पाती नहीं लिख पाती। उसके विरह की पीड़ा शब्दों की सामर्थ्य से परे है। विरह की पाती के लिए उपयुक्त स्याही भी नहीं है। विरहिणी अपनी ननद से आँचल के कागज पर नीर की स्याही से पाती लिख कर देवर से भिजवाने का मार्मिक प्रार्थना करती है-

काहे क बनवउं कगदवा हो ननदी, कहेंन कइ मसिहान।
केके भेजउं कपथवा हो ननदी, लिखि चिठिया भेजि दीह्या।।
आंचल फारि कगदवा हो भउजी, नयनन कइ मसिहान।
लछिमन देवरवा कपथवा हो ननदी, लिखि चिठिया भेजि देउ।।

एक विरहणी अपने बालम को आँसू से पाती भेजती है, तो दूसरी प्रियतम की पाती की आकुल प्रतीक्षा कर रही है-

आये रे सजनवां नाहीं आये मन भवनवाँ रामा,
जोहते दुखाली दूनो अखियां रे हरी।
केहू न मिलावे उलटे मोहे समझावे रामा
दुख नाहीं बूझे प्यारी सखिया रे हरी।
केहि बिधि जायों उड़ि पिया के पायों रामा
उड़लो न जाये बिन पंखिया रे हरी।

विरह की व्यथा से खीझी और बेकल नायिका का इससे अच्छा चित्रण और क्या हो सकता है?

लोकगीतकार भले महाकवि कालिदास की कोटि के विद्वान न रहे हों, परन्तु कजरी में मेघ द्वारा संदेश भेजने की हृदय स्पर्शी अभिव्यक्ति ने कुछ अंशों में कालिदास कृत मैघदूत को भी पीछे छोड़ दिया है-

नाहीं अइलें अदरा के बदरा,
चलि गइलैं कतहू विदेसवां,
सुनु बहिनी हमार पुरवइया,
बदरा से कह तू सनेसवा,
देसवा क कटते कलेसवा,
झूलैं के देबइ तोहे बांसे क कइनियां।
सोवइ बदे ताले कै लहरिया,
चलि गइले कतहुं विदेसवां।
खाये बदे देबे तोहइ मकई क बलिया,
अचवे के भुंअरी क दुधवा,
चलि गइले कतहू विदेसवा।

भूमि पर रहनेवाली नायिका का आकाश के मेघ से क्या संबंध ? पता नहीं मेघ कब किधर मुड़ जायें, अथवा हवा दूसरी दिशा में उड़ा ले जाये और संदेश पहुँच ही न सके। अतः उक्त द्वयर्थक गीत में एक ओर कृषक का पुरवइया से समृद्धि की वर्षा करनेवाले आर्दा नक्षत्र के मेघ को आगमन संदेश देने का आग्रह है, तो दूसरी ओर आनंद, शीतलता देने वाले बालम के प्रतीक मेघ से संदेश देने का आग्रह करती हुई नायिका पुरवइया हवा से कहती है,बहिन जाकर उनसे कहना, शीघ्र आकर मेरी व्यथा दूर करें। मैं तुम्हें झूलने के लिए बांस की पतली कैनी, सोने के लिए ताल की लहरें, खाने के लिए मक्के की बालें तथा पीने के लिए भूरी भैंस का दूध दूँगी।

पिया को आना कहाँ है! वह तो परदेश में कहीं फँस गया है। वर्षा से धरती तो जुड़ा गयी, पर विरहिणी अपने आँसू की बाढ़ में ही डूबने लगती है-

अदरा से बदरवा, बदरवा से पानी,
पायी के पिआर भुंई भइली गुमानी
फुटि फुटि निकलई, सनेहिया क अंखुआ
रोइ-रोइ रोवैला बदरवा अंकसुआ।

रोइ-रोइ रोवैला का काव्य सौन्दर्य एवं ऐसी सशक्त अभिव्यक्ति अनेक पंक्तियों में भी संभव नहीं है।

काव्यात्मक चमत्कार एवं गुणों की दृष्टि से कजरी गीत अद्वितीय हैं। बिहारी ने जा तन की झाई परै, स्याम हरित दुति होय। कहकर राधाकृष्ण युगल का हृदयग्राही वर्णन किया था। कजरी में मेघ और दामिनी को राधाकृष्ण के संदर्भ में लोक गीतकार ने नये अंदाज में पेश किया है।

गोरि-गोरि बिजुली, बदरवा बा करिया,
करिया मरदवा क, गोरकी मेहरिया।
गोरकी मेहरिया बदरा के रंग
मांगि जनमे कन्हइया,
देहलें बा रधया के रंगवा बिजुरिया।

काले मेघ और गोरी बिजली को देखकर प्रतीत होता है कि साँवले पुरूष को गोरी स्त्री मिल गयी है...इन्हीं काले बादलों से रंग माँग कर कृष्ण ने जन्म लिया और राधा को दामिनी ने अपना गौर वर्ण दिया।
.......................................
...यह पोस्ट सुरेशव्रत राय( धर्मयुग, 29 जुलाई, 1973 ई.) के आलेख बनारस की कजरी का कुछ अंश जिसे सोच विचार पत्रिका, काशी अंक-चार में प्रकाशित किया गया है, से साभार।

आदरणीय गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी ने इस पोस्ट को पढ़कर बहुत अच्छा लिंक दिया...

सावन के लोकगीतों में प्रेमाख्यान। इस श्रृंखला में इनकी तीनो पोस्ट आनंद दायक हैं। यदि आप लोकगीतों में रूची रखते हों तो ये तीनो पोस्ट जरूर पढ़ें, आनंद आयेगा। लिंक यह रहा...

सावन के लोकगीतों में प्रेमाख्यान..1

सावन के लोकगीतों में प्रेमाख्यान..2 

सावन के लोकगीतों में जीवन के रंग.3

14.1.12

मकर संक्रांति

प्रस्तुत पोस्ट आनंद की यादें से उद्धरित है, उनके लिए जिन्होने इसे नहीं पढ़ा। आप सभी को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं। 


मकर संक्रांति का त्योहार ज्यों-ज्यों करीब आता त्यों-त्यों पक्के महाल के घरों की धड़कने तेज होती जातीं। बच्चे पतंग उड़ाने की चिंता में तो माता-पिता बच्चों की चिंता में दिन-दिन घुलते रहते। कमरे में लेटो तो यूँ लगता कि हम एक ऐसे ढोल में बंद हैं जिसे कई एक साथ पीट रहे हैं। अकुलाकर छत पर चढ़ो तो बच्चों की पतंग बाजी देखकर सांसें जहाँ की तहाँ थम सी जातीं। तरह-तरह की आवाजें सुनाई देतीं....अरे...मर जैबे रे.s..s..गिरल-गिरल..s..s..कटल-कटल.s..s..बड़ी नक हौ..!..आवा, पेंचा लड़ावा.....ढील दे रे.s..ढील दे.s..खींच के.s..भक्काटा हौ...। जिस दिन पिता जी की छुट्टी होती उस दिन आनंद के लिए घर पर पतंग उड़ाना संभव नहीं था। उस दिन वह श्रीकांत या दूसरे दोस्तों के घरों की शरण लेता मगर जब पिताजी नहीं होते आनंद खूब पतंग उड़ाता। हाँ, मकर संक्रांति के दिन सभी को अभय दान प्राप्त होता था। आनंद के घर की छत के ठीक पीछे दूसरे घर की ऊँची छत थी। जब कोई पतंग कट कर आती तो वहीं रह जाती। उस पतंग को लूटने के चक्कर में आनंद बंदर की तरह उस छत पर चढ़ता। जरा सा पैर फिसला नहीं कि तीन मंजिल नीचे गली में गिरने की पूरी संभावना थी। उस छत पर चढ़ते आनंद के भैया उसे देख चुके थे। सख्त आदेश था कि पतंग लूटने के चक्कर में वहाँ नहीं चढ़ना है मगर पतंग लूटने का मोह आनंद कभी नहीं छोड़ पाता। यह तो किस्मत अच्छी थी कि कभी गिरा नहीं वरना कुछ भी हो सकता था।

यूँ तो भारत के सभी प्रांतों में अलग-अलग नाम से इस त्योहार को मनाते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से स्नान-दान पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। प्रयाग का प्रसिद्ध माघ मेला भी इसी दिन से प्रारंभ होता है। सूर्य की उपासना का यह त्यौहार हमें अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने वाला त्योहार है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। दिन बड़े व रातें छोटी होती जाती हैं। माना जाता है कि भगवान भाष्कर शनि से मिलने स्वयंम् उनके घर जाते हैं। शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं इसलिए इसे मकर संक्रांति के नास से जाना जाता है। गंगा स्नान के  पश्चात खिचड़ी दान व खिचड़ी खाने का चलन है। इस दिन की (उड़द की काली दाल से बनी) खिचड़ी भी साधारण नहीं होती वरन एक विशेष पकवान, विशेष अंदाज में खाने का दिन होता है जिसे उसके यारों के साथ खाया जाता है। लोकोक्ति भी प्रसिद्ध है... खिचडी के हैं चार यार । दही, पापड़, घी, अचार।। इसलिए इसे खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। त्योहार से पूर्व ही विवाहित बेटियों के घर खिचड़ी पहुँचाने के अनिवार्य सामाजिक बंधन से भी इस पर्व के महत्व को समझा जा सकता है। इस त्योहार को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है इसलिए यह हर वर्ष 14 जनवरी के दिन ही मनाया जाता है।  

मकर संक्रांति ज्यों-ज्यों करीब आता त्यों-त्यों पतंगबाजी का शौक परवान चढ़ता। गुल्लक फूट जाते। एक-एक कर सभी बड़ों से मंझा-पतंग खरीदने के पैसे मांगे जाते। खिचड़ी से एक दिन पहले जमकर खरीददारी होती। देर शाम तक नये खरीदे गये पतंगों के कन्ने साधे जाते। थककर जब बच्चे सोते तो नींद में भी पंतगबाजी चलती रहती। दूसरी तरफ पिताजी अपनी खरीददारी में परेशान रहते। बड़ों के लिए यह पर्व जहाँ धार्मिक-सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता वहीं बच्चों के लिए इसका महत्व मात्र पतंगबाजी और तिल-गुड़ के लढ्ढू खाने तक ही सीमित था। इस दिन के लिए जहाँ पिताजी जप-तप, दान-स्नान  की तैयारी में व्यस्त रहते वहीं माता जी बच्चों के लिए तिल-गुड़ के लढ्ढू, चीनी खौलाकर उसके शीरे में मूंगफली के दाने की पट्टी बनाने में लगी रहतीं। आनंद वैसे तो नित्य गंगा स्नान करता मगर आज के दिन पतंगबाजी के चक्कर में नहाने में भी समय जाया नहीं करना चाहता था। बिना स्नान किये भोजन तो क्या एक लढ्ढू भी छूने की इजाजत नहीं थी वरना संभव था कि वह पूरे दिन बिना स्नान के ही रह जाता।

इधर सुरूज नरायण रेती पार से निकलने की तैयारी करते उधर आनंद आकाश ताक रहा  होता। उसे बस प्रतीक्षा इस बात की होती कि कहीं आकाश में एक भी पतंग उड़ते दिख जाय । सूर्य का उगना नहीं, पतंग का आकाश में दिखना मकर संक्रांति के आगाज का संकेत होता। धूप निकलने तक तो समूजा बनारस आनंद के इस महापर्व में पूरी तरह डूब चुका होता। क्या किशोर  ! क्या युवा ! सभी अपनी-अपनी पेंचें लड़ा रहे होते। हर उम्र के लिए यह त्योहार गज़ब की स्फूर्ती प्रदान करने वाला होता। वृद्ध धार्मिक क्रिया कलापों में तो किशोर पतंग बाजी में मगन रहते । सबसे दयनीय स्थिति माताओं की होती। एक ओर तो वे अपने पति देव के धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्णाहुती देतीं वहीं दूसरी ओर बच्चों की चिंता में दिन भर उनकी सासें जहाँ की तहाँ अटकी रहतीं। युवा पतंग के पेंचों के साथ-साथ दिलों के तार भी जोड़ रहे होते। जान बूझ कर दूर खड़ी षोड़शी के छत पर पतंग गिराना और न तोड़ने की मन्नत करना बड़ा ही मनोहारी दृष्य उत्पन्न करता । ऐसे दृष्यों को देखकर कहीं सांसे धौंकनी की तरह तेज-तेज चलने लगती तो कहीं लम्बी आहें बन जातीं। वे खुश किस्मत होते जो किसी बाला से पतंग की छुड़ैया भी पा जाते।  

सूर्यास्त के समय का दृष्य बड़ा ही नयनाभिराम होता। समूचा आकाश रंग-बिरंगे पतंगों से आच्छादित। जिधर देखो उधर पतंग। पतंग ही पतंग। दूर गगन में उड़ते पंछी और पतंग में भेद करना कठिन हो जाता। पंछिंयों में घर लौटने की जल्दी। पतंगों में और उड़ लेने की चाहत। लम्बी पूंछ वाली पतंग। छोटी पूंछ वाली पतंग। काली पतंग। गुलाबी पतंग। कोई पतंगबाज फंसा रहा होता पतंग से पतंग तो कोई पतंगबाज लड़ा रहा होता पतंग से पतंग । कोई कटी पतंग सहसा पा जाती सहारा। थाम लेती उसका हाथ उसके आगे-पीछे घूमती दूसरी मनचली पतंग। कोई दुष्ट ईर्ष्या वश खींच लेता उसकी टांग। शोहदे चीखते ...भक्काटा हौ.....हो जाती वह...फिर से कटी पतंग। गिरने लगती बेसहारा दो कटी पतंग। सहसा खुल जाता किसी अभागे का भाग। थाम लेता एक की डोर। खींची चली आती दूसरी भी, पहली के संग। लम्बी होने लगतीं परछाईयाँ । गुलाबी होने लगता समूचा शहर । पंछियों मे बदल जाते सभी पतंग सहसा। गूँजने लगती चहचहाहटें। छतों से उतरकर कमरों में दुबकने लगते बच्चे। चैन की सांस लेता थककर निढाल हुआ दिन। खुशी से झूमने लगता चाँद। सकुशल हैं मेरे आँखों के तारे !       
............................................................................................................................................................
री पोस्ट होने के कारण कमेंट का विकल्प बंद है। आपने अभी तक पतंग नहीं उड़ाई तो मेरी पिछली पोस्ट की कविता 'पतंग' पढ़ कर आनंद ले सकते हैं...सादर।

8.10.11

बनारसी मस्ती के बीच कवि "कौशिक" की एक ग़ज़ल


( बनारसी मस्ती के वर्णन में एक-दो शब्द बनारसी स्पेशल गाली का भी प्रयोग हुआ है। जिसके लिए मैं उन पाठकों से पूर्व क्षमा याचना करता हूँ जिन्हें खराब लगता है।  अश्लील लगता हो  तो कृपया न पढ़ें। इनके प्रयोग के बिना वर्णन अधूरा होता, मजा नहीं आता।)


जल्दी में हों तो बनारस मत आना। यह नैनीताल नहीं कि दिन में नैया पर घूमे, शाम को माल रोड पर चहलकदमी करी, थोड़ी खरीददारी करी, बीयर-सीयर पीया और होटल में जाकर, खाना खाकर, दुबक गये रजाई में। एक दिन में बनारस घूमना तो क्या ठीक से देखना भी नहीं हो पायेगा। जैसे मंदिर में इत्मिनान से जाते हैं। बाहर चप्पल उतारकर श्रद्धा से शीश झुकाते हुए प्रवेश करते हैं, शांत भाव से जुड़ते हैं भगवान से, हां...ठीक वैसे ही आना बनारस। चंचलता की पोटली अपने शहर में छोड़कर।

बनारस की नींद धीरे-धीरे खुलती है, आहिस्ता-आहिस्ता जागता है यह शहर। बड़ी सी तोंद लटकाये तेज-तेज चलने वाले किसी व्यक्ति को देखकर मत समझना कि वो किसी जल्दी में है। आगे चलकर ठहरेगा। घंटों चाय या पान की दुकान में बैठकर देश की चिंता करेगा। हर चुस्की में करेगा बात नये घोटाले की,  हर पीक थूकेगा किसी भ्रष्ट नेता का नाम लेकर। चाय वाला जल्दी से नहीं देता चाय। जानता है कि इसे चाय नहीं, चर्चा की चाह खींच लाई है। चाय तो यह घर में भी पी लेता। पान वाला जल्दी से नहीं देगा पान। मानता है कि इसे पान खाने की कोई जल्दी नहीं है। पान तो वह किसी को भेजकर भी मंगा लेता। घाट में उतरोगे तो नाव वाला आपको देखते ही समझ जायेगा कि आप किस दर्जे के हो। धनपशु हो, लोभी हो या रसिक। आप जैसे हो ठीक वैसे ही पेश आता है यह शहर। चाय की दुकान पर खड़े होकर हड़बड़ी करोगे तो दुकानदार कह देगा...आगे बढ़ा ! चला जा !! वहाँ जल्दी मिल जाई। पान वाला कह सकता है...हमरे यहां पान नाही हौ !”

लंका में सौ साल की एक बुढ़िया जिलेबी बेचती है। सभी उसे बुढ़िया दादी कहते हैं। सुबह होते ही उसकी दुकान में कचौड़ी-जिलेबी खाने वालों की भीड़ लगी रहती है। आपको बनारसी गाली सुनने का शौक हो तो चले जाइये वहाँ और बुढ़िया से बस इतना कह दीजिए...हमको जरा जल्दी चाहिए, जरूरी काम से जाना है। बुढ़िया तमतमा कर कहेगी...अचरज कs चोदल हउआ..? मेहरारू के लगे जाये कs जल्दी हौ ? इतना लोग खड़ा हउन तोहे पहिले काहे दे देई ? जा ! हमरे इहां नाहीं हौ जलेबी। लोगों को उसकी गाली सुनकर क्रोध नहीं आता, मजा आता है।  लोग जानबूझ कर उसे चिढ़ाते हैं ताकि बुढ़िया और गाली दे। गाली मानो बुढ़िया का आशीर्वाद है जिसे यहां के मौजी लोग जरूर प्राप्त करना चाहते हैं।

यहां के लोग घलुआ के बहुत शौकीन हैं। घलुआ मतलब थोड़ा और। थोड़ा और.... जो मुफ्त में मिले। सब्जी खरीदेंगे तो घलुए में धनियाँ-मिर्चा मांग लेंगे। मलैयो खरीदेंगे तो पूरा पुरूवा चट कर चुकने के बाद...थोड़ी मीठी दूध। कुछ खाने पीने की चीजों के साथ तो दुकानदार भी इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि वो बिना मांगे घलुआ दे देंगे। यह आपको जानना है कि किसके साथ घलुआ मिलेगा, किसके साथ नहीं। अब जिलेबी वाली बुढ़िया से आप घलुआ मांगेंगे तो वह आपको घलुए में ढेर सारी बनारसी गालियाँ दे देगी ! आप अभ्यस्त नहीं हैं तो बुरा मान जायेंगे।  

यहां कोई किसी की परवाह नहीं करता। कोई नहीं डरेगा आपके रूतबे से। होंगे आप लॉट गवर्नर। जहां के हैं, वहीं के बने रहिए । पान घुलाये, चबूतरे पर चुपचाप बैठा पागल सा दिखने वाला शख्स, जिसे आप बहुत देर से बौड़म समझ रहे थे, अचानक से उठकर एक झटके में आपके विद्वदापूर्ण उपदेश का तीया-पांचा कर सकता है। थोड़ी-थोड़ी दूर पर है चाय पान की अड़ी। छोटी बड़ी चर्चा के बीच बनते बिगड़ते रहते हैं शब्द। एक ही दुकान पर चाय पीते हैं प्रोफेसर, नेता, रिक्शावान, मजदूर या सरकारी बाबू। भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे के समर्थन में लम्बा भाषण देने वाले विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को बोल सकता है दुकान में काम करने वाला, मुंह लगा किशोर... (जिसे आप बबलू या किसी भी नाम से पुकार सकते हैं)....काहे न बोलबा बाऊ...! पचास हजार तनखा पावला न ! अइबे करी भाषण। दिन भर इहां भाषण देवला...कब पढ़ावला लइकन के ? ई भ्रष्टाचार नाहीं हौ ?” आस पास खड़े लोगों के ठहाकों के बीच झल्ला कर चीखता है प्रोफेसर...चुप सारे..! जा गिलास धो..। लड़का मुस्कुराता है....हमें तs चुप कराइये देबा। मगर ई मत समझ्या कि ........। गुरूजी फिर चीखते ... चुप..! अबकी बोलबे तs पटक के मारब ! (चाय वाले से) का मालिक ! एहके आज दिनभर धूप में खड़ा करा ! एकर दिमाग चढ़ गयल हौ। ढीठ नौकर हंसता, बुदबुदाते हुए भागता....”कउनो गुरू के घरे मिठाई नाहीं आयल अबकी गुरू पूर्णिमा के.....! हे देखा..पंडीजी भी आ गइलन ! बिना नहाये...कोई कहेगा....काहे ? लाल, गोल चंदन तs लगइले हौवन ! (बबलू पलट के, हाथ नचाते हुए) ..चंदन ! ई चंदन हौ ? शीशी में रोली धैइलेहौवन मेहरारू कs ! ललाट में भभूत पोत के शीशी उलट देवलन..! हो गयल स्नान ! बहुत बड़ा ढोंगी हउवन। अब्बे देखिया...अउते कहियें...नहाये में देर हो गयल। दुकानदार डांटता...कौनो दिन बहुत मरइबे अउर हम छुड़ाए न आइब। चुप रहबे कि नाहीं ?” वह देर तक चुप नहीं रह पाता। कोई न कोई छेड़ देता...का बेटा ! आज कुछ बोलत नाहीं हौए ! डंटा गइले का ? वह फिर शुरू हो जाता।

एक दिन अस्सी चौराहे पर, चाय की दुकान में, कवि कौशिक से भेट हो गई। कौशिक जी का पूरा नाम श्री रवीन्द्र उपाध्याय है। उम्र 70 के पार। सेवा निवृत्त स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी। इनको इनके पद से कोई नहीं जानता। अपनी बेहतरीन गज़लों के लिए ही जाने जाते हैं। कई गज़ल संग्रह प्रकाशित और वर्तमान में काशी के कवियों के भीष्म पितामह। इस उम्र में भी उनकी रोज की अड़ीबाजी और बनारसी मस्ती देखते ही बनती है। मैने कहा..चाय पी लीजिए गुरूजी। उन्होने इनकार कर दिया..अभी पीया हूँ..आप पी लीजिए। ऐसा कैसे हो सकता है ? एक कप तो पी ही लीजिए। मेरे जिद पर दुकानदार से कहने लगे...झांटांश..! झांटांश..!!” मैं शब्द सुनकर सकपका गया। ई का गुरूजी..? कोई नया शब्द गढ़े हैं का..? हंसते हुए बोले... यह अस्सी है। यहां रोज शब्द बनते-बिगड़ते रहते हैं। झांटांश का क्या अर्थ हुआ..? कवि बोले... किसी भी वस्तु की न्यूनतम मात्रा को झांटांश कहते हैं। मैं सुनकर धन्य हुआ। और लोग जो दुकान पर बैठे थे, इस चमत्कारिक शब्द का नया श्रोता पा बहुत खुश हुए। जहाँ 70 के पार विद्वान और सम्मानित गज़लकार तथा 100 के पार की बुढ़िया एक समान रफ्तार से फर्राटेदार गाली दे सकते हों, उस लोक का आनंद, आप ऊपर ही ऊपर बस् भीड़-भाड़ देखकर चले जायेंगे तो क्या पायेंगे ?

एक नवयुवक कवि कौशिक के पास आया और झुंझलाकर बोला..गुरूजी बहुत दिन से एक गज़ल लिखत हई..ससुरा लिखौते नाहीं हौ। भाव बनत हौ तs काफिया उड़ जात हौ, काफिया सही करत हई तs मीटर गड़बड़ा जात हौ..का करी ? कवि जी उतनी ही तेजी से उठे। अभी-अभी जमाये पान के पीक को पच्च से थूककर अपने भारी जिस्म के साथ दुकान के भीतर चबूतरे पर लद्द से बैठते हुए बोले.....

न  गाने  से, न रोने से, ग़ज़ल का जन्म होता है
सजल आँखों के कोने से, ग़ज़ल का जन्म होता है

ह्रदय तोड़े सुह्रद कोई, नयन सींचा करें  निशि-दिन
पुराना  दर्द  बोने  से,  ग़ज़ल का  जन्म होता है

न  रोगी  व्यक्त कर पाये,  न शल्यक वेदना बूझे
चिकित्सा कुछ न होने से, ग़ज़ल का जन्म होता है

सभी साधन सुलभ हों सिद्धि के, लेकिन किसी कारण
क्वचित्  असमर्थ  होने से, ग़ज़ल का जन्म होता है

न जगने से, न सोने से, न चाँदी से, न सोने से
वरन्  सर्वस्व  खोने से, ग़ज़ल का जन्म होता है

विरह के कूप में कौशिक नेह की डोर से कसकर-
कलश मन का  डुबोने से, ग़ज़ल का जन्म होता है
........................................................................

कहना न होगा कि कवि कौशिक की इस एक ग़ज़ल ने चर्चा के पूरे माहौल को देखते ही देखते फर्श से उठाकर अर्श पर पहुँचा दिया।......

( पोस्ट लम्बी हो रही है। बनारसी अनुभव और कवि कौशिक के अन्य ग़ज़लों की चर्चा फिर कभी।)