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1.5.20

मजदूर एकता एक भद्दा मजाक है।

हम
नारे लगाते रहे..
'कर्मचारी एकता जिंदाबाद'
'इंकलाब जिंदाबाद'
'दुनियाँ के मजदूरों एक हो'

वे समझाते रहे...
तुम हिन्दू हो
मुस्लिम हो
अगड़े हो
पिछड़े हो
दलित हो
अतिदलित हो...।

हम चीखते..
हम मजदूर हैं!
वे कहते...
हां, हां,
हम तुम्हारे सेवक हैं!!!

उनमें
सेवक बनने
और सच्चा, सबसे अच्छा,
दिखने की होड़ लग गई

वे रोटी फेंकते
हम
खाने के साथ साथ
गिनते भी...
किसे अधिक मिला, किसे कम!

अब हम
सिर्फ मजदूर नहीं हैं
हिन्दू हैं
मुस्लिम हैं
अगड़े हैं
पिछड़े हैं
दलित हैं
अतिदलित हैं और
मजदूर एकता!
एक भद्दा मजाक है।

13.9.16

कुम्हार


कुल्हड़ हैं,
पुरुवे हैं,
दिये भी हैं
लोग
मिट्टी से
जुड़े भी हैं

अभी है
बनारस की मस्ती
अभी है
कुम्हारों की बस्ती.

श्रम कठिन,
सिमटता बाजार है
गरदन में
लटकती तलवार है
फैलते शहर,
सिमटते खेत,
गायब हो रही मिट्टी
मिट्टी ही
कच्चा माल है
अब इनका
बुरा हाल है
यही
विश्वकर्मा हैं,
यही
मजदूर हैं
सुख-सुविधाओं  से
कोसों दूर हैं

मेरे सामने
इक दरकता पुल है,
आ रही
अंधी गाड़ी है
और
कुछ कर न पाने की
लाचारी है.

अभी तो...
कुल्हड़ हैं,
पुरुवे हैं,
दिये भी हैं
लोग
मिट्टी से
जुड़े भी हैं.
....................