26.9.18

लोहे का घर-49

तेरा घर
खूब बड़ा होगा,
मेरा घर
खूब लंबा है।

तेरे घर की खिड़की का
आकार बड़ा होगा,
मेरे घर की खिड़की का
आकाश बड़ा है।

तेरे दृश्यों की 
इक सीमा होगी
मेरे दृश्य
पल-पल बदलते रहते हैं।

तेरा घर
थिर, जड़ सा
मेरा घर
नित चंचल, चेतन है।

मेरे घर में
अंधे, लूले, लंगड़े
भिखारी रहते हैं
छोटे-छोटे
व्योपारी रहते हैं
हर साइज के बच्चे,
स्त्री, पुरुष,
हिजड़े भी रहते हैं।

तेरा घर
पटरी से उतरता भी होगा
मेरा घर हरदम
पटरी पर चलता है
तेरे घर में
तेरा परिवार ही 
रहता होगा
मेरे घर में
पूरा भारत रहता है।
........

21.9.18

बेटियों को पढ़ाने से पहले...


बेटियों को पढ़ाने से पहले
सोच लो तुम
पढ़ गयीं तो
ज्ञान की बातें करेंगी रोज तुमसे
सुन सकोगे?

सूर्य को देवता कहते हो तुम तो
आग का गोला कहेंगी!
मान लोगे? 

चांद को देवता कहते हो तुम तो
धरती का पुछल्ला कहेंगी!
मान लोगे?

तुम कहोगे
हम सवर्ण!
ढूंढकर पात्र को ही
दान देंगे!
वे कहेंगी
आदमी तो आदमी है
क्या है हिन्दू, क्या है मुस्लिम
शूद्र औ ब्राह्मणों में फ़र्क क्या है?
मान लोगे?

भारत का संविधान
हमने भी पढ़ा है
दान का अधिकार तुमको
किसने दिया है?
क्या तुम्हारी संपत्ति हैं हम?
मान लोगे?

हो गई शादी तो पति की
हर बात को स्वीकार वे कैसे करेंगी?
व्रत धरो, पूजा करो,
हम परमेश्वर! मालिक तुम्हारे!
क्या सहज ही मान लेंगी?
या कहेंगी..
मूर्ख हो तुम!
हक यह तुमको किसने दिया है?
मित्र बन कर रह सको तो रह लो वरना
तलाक देती हूं तुम्हें,
राह कोई और देखो!
साथ फिर भी बेटियों का
दे सकोगे?

बेटियों को पढ़ाने से पहले
मजबूत कर लो अपना कलेजा
खोल लो
आंखें भी अपनी
सोच लो
जान जाएंगी बड़ी होकर
बेटियां
सत्य क्या, अधिकार क्या है!

बेटियों को पढ़ाने से पहले
धर्म और जाति की
दीवारें गिरा दो
पीढ़ियों से आ रही
कुरीतियां मिटा दो
आदमी को बाटने वाले सभी
नारे मिटा दो

छूटते ही कैद से
क्या रुकेंगी?
पंख उनको मिल गए तो
क्या थमेंगी?
नई हवा में झुलस कर
जब गिरेंगी
दर्द उनका फिर भला
कैसे सहोगे?

बेटियों को पढ़ाने से पहले
सोच लो तुम
ज्ञान की बातें करेंगी रोज तुमसे
सुन सकोगे?
.............


29.8.18

परिंदे

दिन के शोर में
गुम हो गए
भोर के प्रश्न
अपने-अपने
घोसलों से निकल
फुदकते रहे
परिंदे।

शाम की शिकायत
सुनते सुनते
रात बहरी हो गई
बोलते-बोलते
गहरी नींद सो गए
थके-मांदे
परिंदे।

परिंदों में
काले भी थे
सफेद भी
कबूतर भी थे
गिद्ध भी
लेकिन
सब में एक समानता थी
सभी परिंदे थे
और..
सभी के प्रश्न/
सभी की शिकायतें
सिर्फ पेट भर
भोजन के लिए थीं।
......

28.8.18

हे कृष्ण!

कभी
बीनता था झाँवाँ 
रेल पटरियों के किनारे
सजाता था पहाड़ 
मनाता था
कृष्ण जन्माष्टमी
आज
बैठा हूँ ट्रेन में
देख रहा हूँ
गिट्टी गिट्टी
रेल की पटरियाँ
न बचपन
न साथी,
न भाप के ईंजन
न कोयला,
न झाँवाँ
न पहले जैसा मन।

दौड़ती भागती
बिछी बिछाई पटरी पर
चल रही है 
अपनी गाड़ी।

हे कृष्ण!
इस बार आना तो
आने से पहले
दे जाना
थोड़े बुरादे
थोड़े इरादे
थोड़े खिलौने
छोटा सा पहाड़ 
और...
थोड़ा सा बचपन।
....

27.8.18

लोहे का घर - 48 (यम की आहट)

वे पतंजलि आश्रम हरिद्वार से अपने घर आरा लौट रहे थे। लगभग मेरी ही उम्र के थे लेकिन बीमारी ने उन्हें जीर्ण शीर्ण बना दिया था।  पेशाब की थैली में कैंसर था। कमर में दर्द था, अधिक देर तक बैठ नहीं पाते थे। बात करते करते बताने लगे कि तीन महीने पहले हम भी आपकी तरह ही स्वस्थ थे! शुरू शुरू में पेशाब में जलन होती थी लेकिन ध्यान नहीं दिया। दूध पीते, मंठा खाते लेकिन आराम नहीं हुआ। जांच कराए तो कैंसर निकला। दवाई खा रहे हैं। बेटा नहीं माना तो हरिद्वार चले गए। एक माह की दवाई लिए हैं। फायदा होगा तो फिर जाएंगे। पतंजलि आश्रम में तीन दिन रहना, खाना बिल्कुल मुफ्त। खाना बढ़िया मिलता है। सिर्फ दवाई का पैसा देना पड़ा। शुरू में लापरवाही किए वरना  तबियत इतनी जल्दी इतनी खराब नहीं होती।  

मैंने उन्हें अपनी एक कविता सुनाई। जिसका आशय भाव यह था कि यमराज एक झटके में किसी को नहीं ले जाता।  आने से पहले कई बार चेतावनी देता है। पहले बालों की कालिमा, आंखों की रोशनी, दांतों की शक्ति छीन लेता है फिर भी न संभले तभी लेे जाता है। हम अक्सर लापरवाही करते हैं। 

वे उठ कर बैठ गए। सही कह रहे हैं। यही बात हमारे आरा जिले के ओझा जी गा कर सुनाते हैं..

अंखिया के जोत नरमाइल हो, पाकल कपरा के बार
जिंदगी के जेल से बुझाता अब, बेल हाइहें हमार।

मैंने उन्हें आश्वासन दिया..दवाई करेंगे तो ठीक हो जाएंगे। 
ओझा जी गायक हैं। किसी का लिखा गाते होंगे। जिसने भी लिखा उनको नमन। उन्होंने भी वही बात कही जो मैं सुना रहा था। 

सफ़र में अनजान व्यक्तियों से दिल के तार कभी यूं भी जुड़ जाते हैं।

25.8.18

लोहे का घर -47(एक प्रेम कथा)

फिफ्टी डाउन अपने सही समय पर चल रही थी। हम जहां बैठे थे वहीं एक युवा परिवार सफ़र कर रहा था। बीमार सी दिखने वाली पत्नी, तीन छोटे-छोटे मैले कुचैले वस्त्र पहने बच्चों को बमुश्किल संभाल पा रही थी। हर साल प्रकाशित होने कैलेंडर की तरह तीनों आपस में एक-एक वर्ष से बड़े छोटे होंगे। गोदी का बच्चा मां का दूध पी रहा था और बड़ी दो बेटियां बारी-बारी से खिड़की झांक रही थीं। हालांकि गोदी वाले बच्चे के सर के बाल भी लड़कियों की तरह बड़े-बड़े थे तो हमें लगा वह भी लड़की है! तभी  मेरे बगल में बैठे उनके जनक ने हंसते हुए गर्व से कहा..यह लरका है। मुंडन कराने जा रहे हैं बक्सर। देवी को बकरा चढ़ाएंगे। उधर ऐसी मानता है।

मैंने उसका उत्साह बढ़ाया..कोई बात नहीं जी! आपकी कहानी भी मेरी तरह है। पुत्र की कामना में कितने लोग पांच छः लड़कियां पैदा करते हैं, आपको तो भगवान ने दो के बाद ही पुत्र दे दिया। हमारी भी दो लड़कियां ऐसे ही एक के बाद एक हुईं। सब भगवान की कृपा है। हां, तीसरा बच्चा हमें पॉच साल बाद हुआ लेकिन यहां आपने थोड़ी जल्दी कर दी। आगे क्या इरादा है? 

वो खुलकर हंसने लगा। अब हमारे बीच से अपरिचितों वाला शील संकोच गायब हो चुका था। उसने अपनी राम कहानी सुनानी शुरु की और मैं दम साधे सुनता रहा.. 

मेरा नाम अजय है। भभुआ, बिहार का रहने वाला हूं। लुधियाना में सिलाई का काम करता था। साल २०१० की बात है। घर में शादी तय हो गई थी। पन्द्रह दिन बाद शादी/गौना था। मैं अपनी शादी के लिए घर जाने की तैयारी में था कि सिलाई के काम से हिमाचल जाना पड़ गया। लौटकर आया तो वहीं बुरी तरह फंस गया। 

अरे! क्या हुआ?

मेरे जिगरी दोस्त ने दगा दे दिया जी। मेरे नाम से एक सरदार जी से पचास हजार कर्जा ले लिया और सब पैसा लेकर फरार हो गया। मेरी मोटर सायकिल भी ले गया। लौटकर लुधियाना आया तो सब कुछ लुट चुका था। सरदार जी ने मुझे पाया और मैं फंस गया। 

शादी करने घर नहीं गए?

कैसे जाता? वो तो सरदार जी का भला हो कि उसने काम करने दिया और पैसा चुकाने का मौका दे दिया। 

फिर शादी ?

शादी टूट गई जी। पिताजी को शादी के लिए लिया पैसा भी लौटाना पड़ा। जब मैं घर गया ही नहीं, कोई खबर ही नहीं दिया तो घर वाले क्या करते? मेरे कठिन वक़्त में इसने (पत्नी को दिखाकर) बड़ा सहारा दिया!!!

तो! आप लोगों ने लव मैरेज की है? कितना पढ़े हैं आप लोग?

मैं तो अनपढ़ हूं जी, ये बी. ए. पास है!

अब चौंकने की बारी मेरी थी। इसीलिए इनका ये हाल किया आपने? एक के बाद एक तीन बच्चे! शरीर देख रहे हैं? फिर मैंने पत्नी की ओर रुख किया..और आपने क्या देख कर इनसे शादी की? 

बस हो गया जी। ये हमारी दुकान में आती थीं, धीरे धीरे हो गया। मैंने इनके खाने में कोई कमी नहीं करी। पूछिए इनसे.. मांस, मछली..जो यह कहे लाया कि नहीं? खाती ही नहीं है तो क्या करें? पत्नी भी अब खुल कर बतियाने लगी थीं.. दिमागी टेंशन से। इनको क्रोध बहुत आता है। अजय हंसकर कहने लगा.. क्रोध क्यों आता है, किस बात पर आता है? पूछिए ? खाना ही नहीं खाती। 

अब घर जा रहे हैं? घर वालों ने स्वीकार कर लिया? 

शुरु शुरु में तो बहुत दिक्कत हुई। घर से भी गए, ससुराल से भी गए। न इनका कोई, न मेरा। लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो गया। बक्सर में इनके पिताजी ने एक घर दिया है, वहीं जा रहे हैं। बकरा चढ़ाना है, लड़के का मुंडन है। अपने घर वालों को भी वहीं बुलाएंगे। काम मिला तो लुधियाना से कपड़ा लाकर वहीं सिलाई करेंगे। नहीं मिला तो फिर लुधियाना चले जाएंगे।

मुझे किसी से उसकी जाति पूछना असभ्यता लगती है, इसीलिए नहीं पूछा। बस इतना ही कहा..सब ठीक हो गया, अब धीरे धीरे और अच्छा होगा। आप बस एक काम करना। इनकी हालत देख रहे हो न? अब बच्चे पैदा मत करना। जितनी जल्दी हो, अपनी नसबंदी करा लो। अब अगर बच्चा हुआ तो यह नहीं बचेंगी। फिर तुम्हारे इन बच्चों का क्या होगा? स्वस्थ रहीं तो पढ़ी लिखी हैं, सभी बच्चों को पढ़ाकर बड़ा आदमी बना देगी। 

उसने मुझे दिल से आश्वासन दिया.. अबकी जाड़े में जरूर करा लुंगा।

मैंने भी उन्हें दिल से आशीर्वाद दिया.. ईश्वर तुम लोगों को सदा खुश रखे। 

मन तो कर रहा था इनका साथ न छूटे लेकिन #ट्रेन बनारस पहुंचने वाली थी, मुझे उतरना था। मैंने उन्हें फिर एक बार भरपूर निगाहों से देखा और हाथ हिलाकर अपनी राह पकड़ ली।

24.8.18

सत्ता

चांद
दिन में
सूरज से
कोई प्रश्न नहीं करता
जानता है
सही वह
जिसके पास है
सत्ता।

सूरज
रात में 
चांद पर रोशनी लुटा कर 
मौन हो जाता है
जानता है
सही वह
जिसके पास है
सत्ता।

आम आदमी 
चिड़ियों की तरह
चहचहाता है..
वो देखो
चांद डूबा,
वो देखो
सूर्य निकला!
वो देखो
सूर्य डूबा,
वो देखो
चांद निकला!
......