27.3.12

पीपल




हम भटके
बेचैनी में
तुम
ठहरे
हातिमताई।

हम सहते
कितने लफड़े
तुमने
खड़े खड़े
बदले कपड़े !
मेहरबान तुम पर रहती
हरदम  ही
धरती माई।

ना जनम लिया ना फूँका तन
वैसे का वैसा ही मन
कर डाला
फिर सुंदर तन
कहाँ से सीखी
चतुराई ?


बूढ़े हो
दद्दू से भी
दद्दू के दद्दू से भी
बच्चा बन
इठलाते हो
हमे पाठ पढ़ाते हो
अपनी चादर धोने में
हम ढोते
पूरा जीवन
खुद को निर्मल करने में
तुमको लगता
बस एक साल

सच बोलो !  
क्या पतझड़ में
नंगे होते
शरम नहीं आई ?

......................

58 comments:

  1. बढ़िया चर्चा पीपल से ....
    शुभकामनायें !

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    1. बढ़िया चर्चा 'पीपल से'.... नहीं भाई , बढ़िया चर्चा 'पीपल की'....

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  2. पीपल को नए अंदाज में पढना अच्छा लगा .

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    1. मिथिलेश भाई..पीपल को कई अंदाज में पढ़ने का मन करेगा..इसके पास जाइये तो सही:)

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  3. वाह...वाह....
    अद्भुत कल्पना शक्ति......

    बेहतरीन रचना...

    सादर
    अनु

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  4. बिना जनम लिए,
    बिना शरीर गलाए
    कपड़े नए,धुले-धुलाए !
    पीपल खड़ा यही समझाए,
    रूत आये,रूत जाए,
    वो वैसा ही रह जाए !
    ठूंठे पर खुश हो,
    तब भी जब हरियाये !

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    1. संतोष जी ,
      'पी'पल और कोपल अत्यन्त सहज घटना है आप समझते क्यों नहीं :)

      'पी' यानि कि 'पिया' के साथ पल का यही नतीज़ा सुनते आये हैं अब तक :)

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    2. चलिये यही अर्थ लें। 'पी'पल..पिया के साथ पल। क्या बेचैन रूहों को पीपल में पिया की अनुभूति होती है?

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    3. संतोष जी ने कितनी बढ़िया बात कही है...ठूंठ पर खुश हो, खुश हो तब भी जब हरियाए।

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    4. आभार देवेन्द्र भाई और अली साब का तो जवाब ही नहीं वे तो पता नहीं कहाँ से तोड़ दें ?

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  5. ठहरे हातिमताई ने अति सुन्दर कविता लिखवाई . मनभावन अंदाज में ..

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  6. बहुत खूब ... सच कहूँ तो बहुत ही भोली लगी ये रचना ... जैसे कोई बच्चा दद्दू से मनुहार कर रहा हो ... गज़ब की उड़ान है कल्पना की ...

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    1. जी..! भोलपन में ही गोल गोल प्रश्नो को बूझने का प्रयास है।

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  7. न जन्म लिया न फूंका तन,
    वैसे का वैसा ही मन...........
    सुंदर अभिव्यक्ति.......आभार.

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  8. वाह!... दद्दू जी तो साल मे एक बार नए होते हैं, आपका ब्लॉग तो लगभग हर हफ्ते नई-नई सुंदर-सुंदर पोस्ट से सज उठता है! हर हफ्ते वसंत...! मुबारक!!

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  9. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति

    कल 28/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    ... मधुर- मधुर मेरे दीपक जल ...

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  10. :-))....tukbandi bhida di hai is baar dev babu.

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    1. जी..आरोप स्वीकार है। तुकबंदी ने मूल बात का वज़न कम कर दिया है।

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  11. वाह... पीपल की सबसे अच्छी तारीफ शायद यही होगी...सुन्दर कविता... आभार

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  12. अरवीला रविकर धरे, चर्चक रूप अनूप |
    प्यार और दुत्कार से, निखरे नया स्वरूप ||

    आपकी टिप्पणियों का स्वागत है ||

    बुधवारीय चर्चा-मंच

    charchamanch.blogspot.com

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  13. ये तो जीते जी चोला बदलते हैं ।
    इन्हें शर्म कैसी ! तांक झांक करने की आदत इंसान की ही होती है ।
    बेहतरीन रचना ।

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    1. डाक्टर साहब ,
      पेड़ अधोवस्त्र , धडोवस्त्र के बजाये शिरोवस्त्र ही पहनते और बदलते हैं यानि कि वे मूलतः नंगे खड़े / गड़े रहते हैं ! उन्हें शर्म कैसी :)

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  14. पीपल के बहाने बहुत कुछ कह गए , अच्छी रचना

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  15. :) होठो पर इधर एक मुस्कान थिरक आई !

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    1. और आँखों में ?

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    2. कविता पढ़ते वक्त डा साबह वैज्ञानिक नहीं रहते। दिल से पढ़ते हैं, ओठों से मुस्कुराते हैं आखों का क्या काम:)

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  16. @ सच बोलो क्या पतझड़ में नंगे होते शरम नहीं आयी?

    पहले आती थी, अब जबसे आदमी बेशरम हो गया है हमने भी शरमाना छोड़ दिया है:) क्यूँ शरमाऊँ? मैने आज तक कोई घोटाला नहीं किया है।

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    1. पीपल को पहले भी नहीं आती रही होगी:)

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  17. bada achcha prashn kiya hai pipal se .....

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    1. जी, एक प्रयास जो सफल नहीं हो पाया।

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  18. दाद्दुओं के भी दद्दू को मेरा नमन ... :) .. bahut pyaari rachna ..

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  19. पाण्डे जी!
    हमको हमरे पटना के देवी-स्थान वाले पीपल से मिला दिया आपने..! नानागेपन में शर्म कैसी.. नागापन और अश्लील होना दोनों दो बातें हैं.. फिर काहे की शर्म!!
    बहुत सुन्दर!! छा गए आप तो, पीपल के पत्तों की तरह!!

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  20. टिप्पणी लिखी और मिटा दी ! कुछ शब्द कौंध रहे हैं जैसे चिंतन में हडबडी कविता में गडबडी !

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  21. पीपल जमीन से जुड़ा है न, इसलिये। हम सब तो कटे हुये ठूंठ हैं, चलते फ़िरते दिखते हैं लेकिन सब बेमानी है।

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  22. bahut gahan aur sarthak abhivyakti
    shubhkamnayen .

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  23. कुछ शब्द स्वीकार हैं....

    तुकबंदी
    चिंतन में हड़बड़ी
    कविता में गड़बड़ी

    कविता से कुछ बातें जो साफ नहीं हुईं जो कहना चाहता था...

    गीता में कृष्ण ने कहा है..जैसे मनुष्य पुरान वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है वैसे ही आत्मा अजर अमर है..रूग्ण शरीर को त्यागता है और पुनर्जन्म लेकर नये शरीर को धारण करता है। वैसे तो सभी जीव वस्त्र (चर्म या पत्ते)बदलते रहते हैं लेकिन पीपल जैसे पतझड़ में झर-झर झरते हैं..पूरी तरह यकबयक नंगे हो जाते हैं और फर-फर फहराने लगते हैं, वैसा दुर्लभ है। इसे देख लगता है पीपल स्वयम् एक आत्मा है जो हर वर्ष अपने पुराने पत्तों को त्यागता और नवीन को अंगीकृत करता है। क्या पीपल की शाखों का आत्मा से कोई अटूट संबंध है? क्या यही कारण है कि कहा गया है पीपल में आत्मा का वास है?

    क्या पीपल ठहरा हुआ हातिमताई है जो एक स्थान पर वर्षों खड़े हो सबका कल्याण करता रहता है?

    पतझड़ में अर्थात दुर्दिन में नंगे हो सकने की क्षमता (नंगा होने से आशय सबके सामने सच को स्वीकार कर सकने की क्षमता) हम मनुष्यों में है? पतझड़ में नंगे होते शरम नहीं आई? लिखकर इसी का संकेत देने का प्रयास किया था जिस पर जवाब चाहता था। कौशलेंद्र जी ने कहा भी लेकिन तनिक कसर रह गई, जैसे कविता में भाव स्पष्ट करने में मुझसे रह गई :)

    कवि वैज्ञानिक तथ्यों को नजरअंदाज कर भावनाओं के सहारे भी विषयों पर चिंतन करता है। अली सा कहते हैं पीपल शिरोवस्त्र ही धारण करते हैं उनके कहने का आशय यह कि आधा अंग तो जमीन के भीतर गड़ा है फिर उन्हें शर्म कैसी? अब ऐसे तर्क करेंगे तो कवि बेचारा मारा जायेगा:)

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  24. वाह, जितने कम शब्दों में जितना कुछ कह डाला है, वह सबके लिये संभव नहीं होता है।

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  25. बहुत सुंदर प्रस्तुति ... एक कविता पढ़ी थी याद नहीं किस कवि की है .... सारांश यही था कि इंसान पेड़ सेफिर से यौवन मांग रहा है तो पेड़ कहता है कि उसने ताप, सर्दी और बारिश सब सही है तुम तो कुछ सहते नहीं तो तुम पर कैसे यौवन आ सकता है .... हम प्रकृति से इतने कट गए हैं कि कुछ बर्दाश्त नहीं कर पाते ...

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    1. वाह! कितनी सुंदर बात कही है कवि ने!! पेड़ ताप, सर्दी और बारिश सब सहता है तभी तो चिर युवा बना रहता है। यह बात पीपल के यौवन प्राप्त करने पर कही जा सकती है। आभार इस सुंदर कविता के लिए। आपने पोस्ट को समृद्ध किया।

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  26. इंसान प्रकृति से कट गया है फिर उस पर दुबारा यौवन भला कैसे आए ... सुंदर प्रस्तुति

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  27. Imagination par Excellence......मज़ा आ गया !!!

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  28. नए ही अंदाज की अद्भुत कविता और नीचे सुंदर विवेचना...

    सादर।

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  29. बहुत सुन्दर.येक नया चिंतन,जैसा कभी सोचा नहीं,न कहीं और पढने को मिला.

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  30. आखिरी लाइन. बहुत सही !

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  31. पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

    .......इस उत्कृष्ट रचना के लिए ... बधाई स्वीकारें.

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  32. आखिरी वाली लाइन पढ़कर पीपल बाबा मुस्काये होंगे। :)

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  33. देवेन्द्र भाई कमाल कर दिया है आपने अपनी अद्भुत कविता से...भाई वाह...मान गए आपकी लेखनी को...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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