5.7.18

लोहे का घर-46

पूरे चालीस मिनट देर से चली पैसिंजर। जैसे सुबह सुबह मछुआरे जाल फैलाकर पकड़ने लगते हैं मछलियां वैसे ही ठीक सात बजे गमछा फैलाकर पूरे मन से #तास खेलते हुए लोहे के घर के साथी पकड़ रहे हैं दहला। इन्हें #ट्रेन लेट होने की कोई फिक्र नहीं। फिक्र कर के भी क्या कर लेंगे? दूसरा कोई विकल्प नहीं। सुबह सही समय आ कर ट्रेन पकड़ लिए आगे कब पहुंचाना है #रेल जाने।

#शिवपुर स्टेशन में पहले से खड़ी कई मालगाड़ियों के बीच सीटी बजाते हुए आकर खड़ी हो गई अपनी पैसेंजर। हाय हैलो के बाद पैसिंजर ने माल से चुटकी ली..बहुत माल काट रही हो आजकल! हर वक़्त मेरा रास्ता छेककर खड़ी हो जाती हो!!! #मालगाड़ी ठसक के साथ बोली..'तुम बे टिकट यात्रियों को ढोने वाली पैसेंजर को पूछता ही कौन है? सरकार उसी को प्यार करती है, जो उसे कमा कर देता है। हम माल कमाते हैं, तुम घाटे का #बजट बनाती हो।' दुखी पैसिंजर ने एक लंबी सांस ली और कहा.. हमारी यह हालत तुम्हारे उसी सरकार ने किया है। कोई टिकट चेक करने ही नहीं आता तो लोग क्या करें? अब तो वे भी बिना टिकट चलने लगे हैं जो पहले नियमित टिकट लेते थे। उन्हें लगता है हमी टिकट लेने की बेवकूफी क्यों करें? काफी देर तक माल गाड़ियों से बतियाने के बाद पैसिजर ने एक लंबी सीटी मारी और सबको बाय-बाय करती चल दी।

आज #धूप तेज है। पटरी के किनारे-किनारे फैले कंकरीट के जंगल धूप से नहाए हुए हैं। अब हवा से बातें करते हुए ग्रामीण इलाके में दौड़ रही है अपनी पैसिंजर। सूख कर बंजर हो चुकी है खेतों की मिट्टी। मानसून आने की देरी से परेशान हो चुके हैं सभी।

खरगोश की तरह फुदकते हुए अगले स्टेशन #बीरापट्टी में फिर इत्मीनान से रुक गई है ट्रेन। यात्री बाहर निकल कर गप्प लड़ा रहे हैं। कोई कह रहा है.. एहसे बढ़िया त पइदले पहुंच गयल होइत जौनपुर। कोई कह रहा है.. पैसिंजर न हौ, मालगाड़ी से भी बेकार। यह सब सुन खिसिया रही है मालगाड़ी.. रोकता कंट्रोलर है, लोग गाली हमको देते हैं! करे कोई, भरे कोई!!! किसी दिन क्रासिंग तोड़ कर चल दुंगी तब समझेंगे हमको गाली देने वाले।

सुबह इतना समय लेकर चलते हैं कि एकाध घंटे की देरी से नहीं घबराते रोज के यात्री। देर सबेर दस बजे तक पहुंच ही जाएंगे। लेकिन आज कुछ ज्यादा ही देर कर रही है अपनी पैसेंजर। अब तो मस्ती से तास खेलने में मशगूल साथियों के बीच भी घबराहट झलक रही है। चाल चलते हुए खूब ताकत से पत्ते पटकते हुए भुनभुना रहे हैं..चल रेे!
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आज #योगा दिवस है। अपनी साइकिलिंग और रनिंग तो भोर में ही हो गई। एक घंटे का योगा कैंट प्लेटफॉर्म पर पैसेंजर ट्रेन में हो गया। एक घंटे नहीं चली #SJV #पैसिंजर। प्लेटफार्म पर आए तो पता चला ब्लॉक लगा है।

अभी रेलवे का सूचना तंत्र इतना विकसित नहीं हो पाया है कि वह ट्रेन के स्टार्ट होने में विलम्ब की सूचना नेट पर डाल पाए या घोषणा ही कर दे। सहनशील भारत के सहनशील यात्री निर्धारित समय पर प्लेटफॉर्म में आते हैं और धैर्य के साथ ट्रेन में बैठ कर चलने की प्रतीक्षा करते हैं। शायद यह तकनीक बाइसवीं शताब्दी में विकसित हो और लोगों को अनावश्यक प्लेटफॉर्म पर बैठ कर ट्रेन की प्रतीक्षा न करनी पड़े।

कैंट से ६ किमी चलकर अगले स्टेशन शिवपुर में फिर इत्मीनान से रुकी है ट्रेन। कब तक रुकी रहेगी? इस प्रश्न का उत्तर #उत्तर_रेलवे के पास नहीं है। पैसिंजर में बैठ कर ट्रक के पीछे लिखी इबारत याद कर रहा हूं.. समय मिलने पर पास दिया जाएगा।

आज भीड़ भी नहीं है पैसिंजर ट्रेन में। या तो रोज रोज के ब्लॉक से तंग आकर लोग नहीं आए या आज घर बैठ कर योगा कर रहे हैं। हम भी ट्रेन में सभी प्रकार का योग आसन कर चुके। दांत किटकिटाओ आसन, हवा में मुठ्ठी लहराओ आसन, लंबी सांस खींच कर हवा में गुस्सा बाहर फेंको आसन आदि सब कर चुके। अब इंजन के आगे खड़े हो रेलवे की पटरी पर शीर्षासन या #थ्री_इडियट की तरह पैंट खोल कर .. सरकार! तुसी ग्रेट हो!!! कहना ही शेष बचा है।

खाली खाली बोगी में खिड़की के पास एक जोड़ा है, पास ही उनका बच्चा खेल रहा है। महिला का पति महिला की गोदी में सर रखकर इत्मीनान से लेटा हुआ है। ट्रेन चलने या न चलने की उसको कोई फिकर नहीं है। शायद सोच रहा है..

ट्रेन चले न चले हमको क्या फिकर!
तेरी गोदी में सर है, जन्नत यहीं है।

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आज शाम ५.२० तक सिटी स्टेशन जौनपुर से फरक्का पकड़ कर बहुत खुश थे। आज जल्दी पहुंच जाएंगे घर, देखेंगे फुटबाल मैच। हाय! लगभग ५ किमी चलकर रुक गई #ट्रेन। कुछ समय बाद पता चला ट्रेन का इंजन खराब है। रोज के यात्री उतर कर पटरी पटरी पैदल ही चले जा रहे अगले स्टेशन #जफराबाद। हम भी उतर कर चल दिए। जफराबाद स्टेशन पर दूसरे रूट से आने वाली थी #दून

लगभग २ किमी चलकर जब जफराबाद पहुंचे तब पता चला किसी रूट से कोई ट्रेन नहीं आ सकती। इंजन खराब होने से फरक्का ऐसे मोड़ पर रुकी है कि उसने दोनों #रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया है। न अप में न डाउन में कोई ट्रेन तब तक नहीं जा सकती जब तक नया इंजन आ कर इसे ले न जाय।

जफराबाद स्टेशन में कुंभ मेले में बिछुड़े हुए सभी भाई बहन इकठ्ठा जमा थे। कुछ घबरा कर सड़क मार्ग पकड़ लिए मगर अधिकांश डटे हुए अपने-अपने अंदाज में समय काट रहे थे। पकौड़ी वाले की पकौड़ी, चाट वाले की चाट सब एक ही झटके में ख़तम।

छोटा सा कस्बाई स्टेशन है जफराबाद। यहां गांव वाले छोटी मोटी दुकाने चलाते हैं। इन्हें क्या पता कि आज इंजन खराब हो जाएगा और उनके चाट पकौड़े इतनी जल्दी बिक जाएंगे! अब माल हो तब न सप्लाई हो, सब दुकान बन्द कर चल दिए घर। जिसे चाट पकौड़े नहीं मिले उसने बिस्कुट और सड़क पर लगे #चापाकल के पानी से अपनी प्यास बुझाई। अंधेरे स्टेशन में पूरे दो घंटे गुजारने के बाद फरक्का में नया इंजन लगा और खराब इंजन से गठ जोड़ कर आ गई फरक्का।

जहां बैठे हैं वहां एक बातूनी महिला, एक गुपचुप रहने वाली पौढ़ महिला, एक अंग्रेजी पत्रिका फैलाकर खिड़की से बाहर अंधेरा झांकने वाली सुमुखी कन्या, एक युवक और कुछ बच्चे बैठे हैं। अपने बैंक मैनेजर साहब भी जगह बनाकर किसी तरह तशरीफ रख पाए और धीरे धीरे फैलकर बैठ गए। सुमूखी कन्या और युवक मुस्लिम हैं। बातूनी और गुपचुप रहने वाली महिला हिन्दू। सभी को भूख लगी है। फरक्का में डिम भात बिकता है। हिन्दू महिला डिम भात नहीं खाएंगी। वैसे खाती हैं लेकिन आज बृहस्पति वार है इसलिए नहीं खाएंगी। मुस्लिम सूमुखी कन्या खाती है, कोई वार का परहेज नहीं। प्रौढ़ गुपचुप महिला खिड़की के पास सर रख कर सो रही है, बच्चे अपने में मगन हैं।

अलग धर्म और क्षेत्र के लोग इकट्ठे एक ही कमरे नुमा बोगी में आस पास बैठ कर अपने अपने रीति रिवाजों की चर्चा करते हुए प्रेम से हंस बोल रहे हैं। यह सिर्फ और सिर्फ लोहे के घर में ही हो सकता है। कंकरीट के जंगल वाले अपने घर में तो बड़ी ऊंची ऊंची दीवारें हैं।
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लगता है इंद्रदेव ने पुकार सुन ली। कल शाम जब ऑफिस से निकलने को हुए तो जौनपुर में झमाझम बारिश शुरू हो गई। भीगते भागते ट्रेन पकड़े और सफ़र में ही कपड़े सुखा लिए। यह तो अच्छा हुआ कि बनारस में बारिश नहीं हो रही थी और दुबारा नहीं भीगना पड़ा।

आज सुबह बिजली कड़कने की तेज आवाज से नींद खुली तो देखा घनघोर बारिश। धीरे धीरे तैयारी करते रहे। जब तक तैयार हुए बारिश भी रुक गई। बाइक से स्टेशन आए और लोहे के घर में बैठते ही फिर बारिश शुरू।
अनवरत टिप टिप टिप टिप बारिश हो रही है। #SJV #पैसिंजर रुक रुक कर चल रही है। पहले चलकर यार्ड में रुकी फिर शिवपुर और अब वीरापट्टी। ४५ मिनट में लगभग १२ किमी चल चुकी। कुल ५६ किमी चलना है और उम्मीद है तीन घंटे में दस बजे तक पहुंचा ही देगी।

एक मालगाड़ी आकर रुकी। थोड़ी देर के लिए मेंढकों की टर टराहट नहीं सुनाई पड़ी, मालगाड़ी के रुकते ही शोर थमा और वही टर टराहट फिर शुरू।

पैसिंजर हवा से बातें कर रही है। लोहे के घर की खिड़की से आने वाली बारिश की फुहार से तंग होकर यात्रियों ने खिड़की का शीशा गिरा दिया है। खिड़की के राड पर अनवरत बारिश की बूंदें बनतीं और टप्प से गिर जाती हैं। बूंदों के बनने और गिरने का सिलसिला जारी है। रोज के यात्री चिड़ियों की तरह चहक रहे हैं। आगे बैंक वाले हैं तो उनकी बातों में बैंक के रोज के काम की समस्याओं की चर्चा है। कोई बैंकर लोन न चुकाने वाले ग्राहक को डांट रहा है..न बैंक आते हो, न फोन उठाते हो, क्या इरादा है? ऐसे ही हर विभाग के लोग अपनी अपनी गोलबंदी कर अपने अपने कामों के हिसाब से चर्चा में मशगूल हैं। भयंकर गर्मी के बाद की बारिश से सभी के चेहरे खिले हुए हैं।

एक वेंडर गरम गरम हरा मटर बेच कर गया है। मेरे सामने बैठे तीन बच्चों ने अपने पापा से जिद करके एक एक दोना मटर खरिदवा लिया है और बड़े चाव से खा कर रहे हैं। मटर खा कर दोना खिड़की के बाहर फेंक चुके अब मूंगफली के लिए ललच रहे हैं। पापा ने एक पुड़िया मूंगफली भी खरीदी है। अब पापा के साथ सभी बच्चे मूंगफली खा रहे हैं। बच्चों की अम्मा का मुंह किसी बात पर अब भी सूजा हुआ है। वे गाल फुलाए, पलकें बन्द किए, बर्थ में सर पीछे टिकाए ऊंघ रही हैं। शायद घर से निकलते वक़्त देरी के लिए उनके पति देव ने उनको सबके सामने डांट दिया था! अच्छी बात यह है कि सभी स्वच्छता के प्रति जागरूक हैं और मूंगफली के छिलके खिड़की से बाहर फेंक रहे हैं। अभी भी साफ़ है लोहे के घर का यह कमरा।

खेतों में जगह जगह पानी लग चुका है। वृक्षों की रंगत लौट आई है। धूल धूसरित रहने वाले पत्ते नहा कर हरे भरे लग रहे हैं। इधर थमी हुई है बारिश। खिड़कियों के शीशे अब ऊपर उठ चुके हैं। इधर बारिश कम हुई लगती है। खेतों में पानी कम दिख रहे हैं। सूर्य की कुछ किरणें बादलों को चीर कर घर में घुसने में सफल हो रही हैं। जारी है धूप और बादलों का संघर्ष।

त्रिलोचन महादेव स्टेशन पर रुकी हुई है अपनी पैसिंजर। बच्चों का परिवार यहीं उतर कर पटरी पटरी, पैदल पैदल चला जा रहा है। थोड़ी थोड़ी दूरी के यात्रियों के लिए सस्ता और आराम दायक होता है पैसिंजर का सफर। ग्रामीण अल्प आय वर्ग के लिए लाइफ लाइन होती हैं पैसिंजर ट्रेनें। निर्धनों से प्यार करने वाली सरकारों को बुलेट के साथ पैसिंजर ट्रेन चलाने पर भी जोर देना चाहिए। 
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बारिश गुम है। झम्म से आई थी एक दिन और जुताई के बाद साफ़ हो गए, खेतों पर जमे घास। अब जुते खेतों की मिट्टी सूख कर ढेले-ढेले बिखरी पड़ी है जिन पर रस्क करतीं सूर्य किरणें बादलों उपहास का उड़ा रही हैं। एक चौकोर टुकड़े में बड़े हो रहे धान के बीजों को झमाझम बारिश की प्रतीक्षा है। गोधूली बेला है। हवा से बातें करती पटरी पर भाग रही है अपनी #ट्रेन

लोहे के घर की स्लीपर बोगी में भीड़ है। इसी भीड़ में सामने के बर्थ पर जगह बनाकर बड़े प्रेम से आलू पूड़ी खा रहे हैं एक प्रौढ़ दंपत्ति। विशाल काया के मालिक हैं दोनों। महिला ने बांए जांघ पर, बाएं हाथ से संभाला हुआ हुआ है एक बड़ा सा पानी का बोतल और दाएं हाथ से तोड़ तोड़ उदरस्थ करती जा रही हैं पूडियां। पुरुष बाएं हाथ में पकड़े है पूडी और दाएं हाथ से मुंह में ठूंसे जा रहा है बड़े बड़े ग्रास। दोनों सामने सामने बैठ कर, जल्दी जल्दी निपटा रहे हैं खाने का काम। जल्द ही समाप्त हो गईं घर से लाई सभी पुड़ियां। अब बारी बारी स्टील के एक ग्लास से दोनों पी रहे हैं पानी।

लोहे के घर में और भी यात्री हैं। कुछ युवा, कुछ प्रौढ़, कुछ बुढढे और कुछ महिलाएं। युवाओं के कान में तार ठूंसे हैं और हाथ में मोबाइल है। एक महिला साइड अपर बर्थ पर आराम से लेटी हैं। कुछ खिड़की झांक रहे हैं, कुछ बैठे बैठे ऊंघ रहे हैं। बनारस उतरने वाले यात्रियों में हलचल है। एक स्टेशन पहले ही सामान उठा कर जमा कर रहे हैं दरवाजे पर। जिन्हें दूर जाना है वे खाली जगह पा थोड़ा और फैलकर बैठ रहे हैं।

अधिक जगह मिलने से खुश हैं, पूड़ी खा कर भारी हुए प्रौढ़ दंपत्ति। उन्हें क्या पता कि और भीड़ चढ़ेगी बनारस स्टेशन पर, थोड़ा और सिकुड़ कर बैठना पड़ेगा आगे।
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दुर्जन पर उपदेश का प्रभाव नहीं पड़ता। बबूल के जंगल पर बदलते मौसम का कोई प्रभाव नहीं है। ये पहले की तरह कटीले हैं। भीषण गर्मी के बाद बारिश के मौसम ने हमें जरूर राहत पहुंचाई है। बारिश हो नहीं रही है लेकिन जारी है आकाश में बादलों की आवाजाही। बबूल के जंगल से आगे बढ़ चुकी है ट्रेन। खिड़कियों से मस्त आ रही है हवा।

कैंट स्टेशन के प्लेटफार्म से खरीद कर पापा लाए थे अमरूद। दादा जी के पास उछल-उछल खा रहे हैं बच्चे।
बच्चों की मां एक प्लास्टिक के प्लेट में खा रही हैं नमकीन। मसालेदार हरा चना लेकर चलती ट्रेन में दौड़ते हुए चढ़ा है वेंडर। दादा जी के डांटने के बाद भी जिद कर के बच्चों ने खरीदवा ही लिया चने के दोने। अब लकड़ी के चम्मच से निकाल निकाल बड़े चाव से खा रहे हैं मसालेदार हरा मटर।


अभी प्यासे लेकिन हरे भरे दिख रहे हैं खेत। धूप नहीं है तो गोल बना कर खेतों के बीच बकरियों के झुंड की तरह बैठे हैं बच्चे भी। एक चिड़िया तेज गति से ट्रेन के साथ उड़ रही थी। लग रहा था जैसे कंपटीशन कर रही हो! शायद हराकर सबक सिखाती रहती हो रोज सुस्त चाल चलने वाली ट्रेनों को। यह वाली ट्रेन चिड़िया की उड़ान से तेज निकली। चूं चूं करती पिछड़ गई चिड़िया। कहीं किसी कोने में बैठे कछुए ने देख लिया होगा तो चिड़िया का मजाक उड़ाता होगा.. मैं हरा देता हूं ट्रेन को और तुम हार गई!!!
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सुबह की धूप तेज है। सही समय पर चल रही है फोट्टी नाइन। जम चुकी है तास की अड़ी। उज्जर गमछे में फेंके जा रहे हैं राजा, रानी, इक्के। कोई पत्ता कलर बन जाता है और सभी पर जमाता है रंग। आरक्षण या ऊँची जाति का तमगा मिल गया हो जैसे! दुक्की से कट जाता है इक्का!!!

ट्रेन हवा से बातें कर रही है। पटरी के उस पार धूप से चमकती उखड़ी-उखड़ी सड़क और सड़क के उस पार दूर दूर तक फैले खेत। खेतों में कहीं बारिश का जमा पानी, कहीं बंजर धरती। कहीं सब्जी, कहीं धान के बीज। मेढ़-मेढ़ धूप में दौड़ते नन्हें गदेले। खेतों के बीच खड़ा सूखा युग्लिप्टस का वृक्ष। धूप में चुंधियाई आंखों से आकाश में बादल निहारता बूढ़ा किसान। युग्लिप्टस और किसान में साम्य ढूंढता हूं। किसान में जीवन शेष है। माथे पर घास का बोझ लादे जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाती महिलाएं। पल- पल बदलते हैं दृश्य लोहे के घर में।
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सुबह फोट्टी नाइन अप, शाम फिफ्टी डाउन। हावड़ा अमृतसर एक्सप्रेस। सही समय पर चले तो रोज के यात्रियों के यह ट्रेन सबसे सूट करती है। सुबह दस से पहले पहुंचा देती है जौनपुर और शाम साढ़े पांच से छः बजे के बीच वापसी में मिल जाती है। आज अप, डाउन दोनों सही समय पर मिली। ट्रेन का सही समय पर चलना बड़ा सुकून देता है रोज के यात्रियों को।

काम भर की भीड़ है। बैठने भर की जगह है। हर बार खिड़की वाली सीट नहीं मिलती। खिड़की वाली सीट पर स्लीव लेस पीला सूट पहने एक युवती चाय बिस्कुट सुडुक रही है। बगल में टी शर्ट और जींस पहने बैठा उसका साथी भी साथ दे रहा है। चाय खत्म हुई अब युवक कहीं चला गया है। युवती पूरी टांगे फैलाए, कान में तार ठूंसे खिड़की की तरफ पीठ कर के मोबाइल में बातें कर रही है। मेरे बगल में बैठा एक आदमी लगातार मोबाइल में किसी से बातें कर रहा है। एक से बात खतम होती है तो दूसरे को मिलाने लगता है। जब से अन लिमिटेड कॉल का दौर शुरू हुआ लोग फालतू समय का उपयोग मित्रों से बात करने में करने लगे हैं। अपने व्यस्त समय में फोन आया तो जल्दी उठाते नहीं।

सामने के साइड लोअर में बच्चों और महिलाओं का दूसरा परिवार है। सभी पलेठी मार कर खिड़की से बाहर देख रहे हैं। बाहर के दृश्य देख बच्चे प्रश्न करते हैं और महिलाएं बताती जाती हैं। साइड अपर बर्थ उनके सामानों से भरा पड़ा है। अजीब अजीब आवाजें निकालते हुए वेंडर चाय, हरा मटर, मैंगो जूस और पानी बेच रहे हैं। बच्चे वेंडरों की आवाजें दोहराते हैं और हंसते हैं..च ई य्या!

खिड़की के बाहर का संसार अभी मन मोहक है। गोधूली की बेला है। खेत चर कर चौपाए घरों की ओर लौट रहे हैं। एक खेत में चार देसी कुत्ते भी आराम फरमाते दिखे। शायद ये आपस में बैठ कर यह तय कर रहे थे कि गांव में किसकी झोपड़ी से पहले धुआं निकलेगा? जिस घर से धुआं उठता दिखलाई पड़े, उधर ही कूच किया जाय! रोटी वहीं पहले मिलेगी।

एक खेत में आग जलता दिखा। ये खेत पर पड़े भूंसे ऐसे ही फूंक दे रहे होंगे। कौन काटे?, कौन भूसा तैयार करे?, कहां रख्खे? जितने का भूसा नहीं, उतना तो समय और श्रम बेकार। बारिश भी तो सर पर है। खेत तैयार नहीं किया तो धान की बोआई कहां होगी?

एक खेत पर झुंड से छूटी बकरी बड़ी तेज मिमियां रही थी। शायद खेलने में भटक गई हो। जैसे शहर में कोई अकेली बच्ची साथियों से छूट जाय और रोने लगे! वैसे ही चीख रही थी, खेत में अकेली छूटी बकरी। बकरी को नहीं पता होगा कि जमाना खराब आ गया है। लेकिन फिर भी रास्ता भटकी बच्ची की तरह चीख रही थी बार-बार।

अब दिन पूरी तरह ढल रहा है। रोशनी कम हो रही है और अंधेरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। बाहर जब कुछ नहीं दिखेगा, लोहे के घर में भीतर की लाइट जलेगी। अभी बाहर धुंधुलकी रौशनी है, अभी भीतर पूरा अंधेरा नहीं हुआ। हमारा हाल भी लोहे के घर वाला है। जब तक बाहर दिखता है, बाहर ही देखते रहते हैं। बाहर से झटका लगे तो भीतर के उजाले की तलाश प्रारंभ हो। अप्प दीपो भव: ऐसे ही थोड़ी न कहा होगा बुद्ध ने। 
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लगता है पानी बरसेगा...

लगता है पानी बरसेगा, बदरी छाई है।

ठहर ठहर टपके है
पानी
कभी भाप उठता
उमस भरा मौसम है,
कौआ
कांव-कांव करता
लगता है पानी बरसेगा, बिल्ली आई है।

घिर घिर आए काले बादल
मन दादुर सा उछला
उड़ उड़ जाए काले बादल
दिल विरहन सा बैठा
लगता है आंखें बरसेंगी, ठोकर खाई है।

धूप छांव की आंख मिचौली
रास नहीं आती
अपने आंगन बारिश वाली
रात नहीं आती

लगता है किस्मत ने थाली, फिर सरकाई  है। 

1.7.18

ब्लॉगरों साथ एक काल्पनिक रेल यात्रा

सुपर फास्ट #ट्रेन की ए सी बोगी है। कहां से चली? कहां जाएगी? कुछ नहीं पता। बस इतना पता है कि लगातार चल रही है। स्टेशन आते हैं, यात्री चढ़ते/उतरते हैं, ट्रेन चलती रहती है लगातार। 

अपनी बर्थ साइड अपर है। यहां से सातों बर्थ पर बैठे यात्रियों की कारगुज़ारियों का नजारा लिया जा सकता है। सुबह के आठ बज रहे हैं। सामने के दोनों मिडिल बर्थ को गिराकर दो दो महिलाएं सामने सामने बैठी, अपने अपने मोबाइल पर कुछ लिख पढ़ रही हैं। एक छोटी बच्ची चारों के सामने कभी योगा करती है, कभी अपनी नानी के कहने पर कोई गीत गाने लगती है। मैं गहरी नींद में सोया था लेकिन बच्ची की खटर पटर से अपनी नींद उचट गई है और उंनीदी पलकों से लिखने का प्रयास कर रहा हूं। मेरे सामने के दोनो अपर और नीचे के एक साइड लोअर बर्थ पर तीन पुरुष यात्री सफेद चादर ओढ़े खर्राटे भर रह रहे हैं। 

चारों महिलाएं आपस में बातें कर रही हैं...

ये पुरुष सोते ही खर्राटे भरने लगते हैं! 
और जगते हैं तो मानते भी नहीं।
जब कुछ लिखने का मन करती हूं, खर्राटों से ध्यान भटक जाता है। /
एक बढ़िया कविता है, सुनोगी?
तीनों महिलाएं चहकने लगीं.. सुनाइए! सुनाइए न दीदी!!!

कविता का शीर्षक है.. #अनकही
वह कहता था, 
वह सुनती थी,
जारी था
कहने, सुनने का खेल
......
अरे! यह कविता तो मैंने पढ़ी है। Sharad Kokas की कविता है। 
मैंने भी पढ़ी है, वाकई बहुत अच्छी कविता है।
सदियों से महिलाओं पर हो रहे शोषण को कितने सरल शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है!
अंत में कवि ने क्या कमाल किया है..
उसके हाथ कभी नहीं लगी वह पर्ची 
जिसमें लिखा था..कहो!

सही बात है।
फेसबुक के अपने मित्र सूची में कई अच्छे लेखक हैं न?
तुम अभी क्या पढ़ रही हो?
मैं तो #लोहेकाघर पढ़ रही हूं.. #मायरा! गिर जाओगी। चलो बैठो शांति से। हो गया योगा। ट्रेन में शीर्षासन नहीं करते।

मयरा! लोहे का घर! शरद काेकास!!! अब मेरी नींद पूरी तरह उचट चुकी थी। अचकचा कर उठ कर बैठ गया। नीचे बैठी चारों महिलाओं को आंखें फाड़ कर देखने लगा..अर्चना चावजी, वंदना अवस्थी दुबे, Rashmi Prabha दी, Usha Kiran ओह! माई गॉड! ये क्या देख रहा हूं मैं!!!

वो दाएं ऊपर बर्थ पर नाक पर चश्मा चढ़ाए, सीने में खुली किताब धरे, खर्राटे भर रहे सलिल भैय्या! बाएं Taau Rampuria!! ये नीचे किसका झोला टंगा है? इसमें तो किताबें ही किताबें रखी हैं! ये किसके मुखड़े पर मूर्खता का सौन्दर्य बिखरा पड़ा है? कहीं ये अपने अनूप शुक्ल तो नहीं! हां, हां वही हैं कितने जोरदार खर्राटे! क्या मैं ब्लॉगरों की किसी बारात में सफ़र कर रहा हूं? 

उस तरफ, रामचरित्र मानस के कथाकार DrArvind Mishra जी एक झौआ आम की टोकरी खोले किसे आम पकड़ा रहे हैं? इधर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी दोनों हाथों से आम चूस कर गुठली खिड़की से बाहर फेंकते उधर मिश्रा जी दूसरा आम लिए तैयार..यह और मीठा है! सिद्धार्थ सर मना कर रहे हैं.. अरे नहीं, बहुत हो गया। 

उनके सामने, बगल के साइड लोअर पर गले में कैमरा लटकाए टी एस दराल जी किसकी फोटू खींच रहे हैं? उधर वो कौन बोल रहा है...एक लाइन लिख दिया, पोस्ट कर लेने दो। जानते हो? मैं एक लाइन ही लिखता हूं। संतोष त्रिवेदी की तरह बड़े बड़े पोस्ट नहीं लिखता। ये तो Ali सा हैं! Rajesh Utsahi जी भी उनके हां में हां मिला रहे हैं.. मैं भी लघुकथा लिखता हूं। आजकल चौपाल लगाता हूं। कविता भी लिखता हूं तो छोटी छोटी। 

ये कौन सी ट्रेन है? कहां से चला हूं? कहां जा रहा हूं? यह कौन सा स्टेशन है? ये कौन दो आदमी चढ़े हैं? एक के हाथ में कार्टून के कैनवास, दूसरे के हाथ में कैमरा! ये तो Kajal Kumar और सफेद घर के मालिक Satish Pancham लगते हैं! ये हो क्या रहा है? ट्रेन चल चुकी।  वो कौन दौड़ा भागा चला अा रहा है! ये तो मैराथन Satish Saxena लगते हैं। ये हो क्या रहा है!!! कोई बताएगा मुझे? ये हम कहां जा रहे हैं?

16.6.18

व्यंग्य क्षणिकाएं

अपराधी कौन ?
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नदियाँ 
सूखती हैं 
समुंदर के प्यार में 
समुंदर प्यार करता तो
नदियां
पहाड़ चढ़ जातीं!

किसी नदी की मृत्यु के लिए
कोई मनुष्य
जिम्मेदार नहीं।
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खिलाड़ी 
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दर्शकों को लगा
और रेफरी का भी यही निर्णय था
कि ड्रा पर समाप्त हुई
शतरंज की यह बाजी
लेकिन खिलाड़ियों के चेहरे पर
एक कुटिल मुस्कान है
दोनो के
अर्जित अंकों में
मनोवांछित उछाल आया है।
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पानी 
.........

पानी होता
पानी पी कर
गाली देते!

हम प्यासे
कुआं बेपानी,
कितना रोएं?
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चाल
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चाल तो 
अच्छी चली थी 
यार मैंने
मोहरे खाते मलाई! 
क्या पता था।
....................

धूप 
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बादलों से 
धूप को 
यूं ना डराओ

धूप पल में 
बादलों को 
चीरती है।
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डांस इंडिया डांस


प्रोफेसर साहब का डांस बढ़िया था लेकिन उनकी डांस पार्टनर कोलंबिया वाली शकीरा होती तो और भी मजा आता! क्यों? मेरा इतना कहना था कि शादी में रुमाल को बीन बनाकर नागिन डांस करने वाला मोटुआ भी सुबह सबेरे मार्निंग वॉक के बाद पार्क के चबूतरे पर बैठ पेट फुलाने/पचकाने की क्रिया को बीच में ही रोक, दोनों हाथ नचाकर कहने लगा..'डांस तो हमने भी किए शादी में बहुत, सबकी किस्मत कहां वायरल होना! स्टेज मिला न किसी ने डांस का वीडियो बनाया और न ही हम वायरल हुए। यदि तुमने ध्यान दिया होता तो आज प्रोफेसर साहब नहीं, गोविंदा के साथ फोटू हम खिंचा रहे होते!' उसकी बातों को सुनकर लगा कि अब जल्दी ही बहुत से डांस वीडियो यूट्यूब में आने ही वाले हैं।

सुसुप्तावस्था को प्राप्त बुद्धिजीवियों को छोड़ वह कौन है जो बारात में झन्नाटेदार संगीत सुन कर भी नहीं थिरकता? थिरकते सभी हैं। किसी का मन थिरकता है, किसी के कदम थिरकते हैं। कोई संकोच में गोल भीड़ के पीछे खड़ा थिरकते कदम के साथ ताली बजा बजा कर मुंडी हिलाता है, कोई आगे बढ़ हौसला अफजाई करते हुए यह सोच कर रुका रहता है कि कोई शिफारिश करे तो हम भी डांस में कूद पड़ें। किसी किसी बारात में तो बाकायदा मित्रों को डांस शक्ति वर्धक पेय पिलाया जाता है कि डांस करने वालों का संकोच जाता रहे और वे शील तोड़ कर थिरकने लगें। डांस वृद्धि पेय पान के बाद तो मुर्दे में भी जान आ जाती है। बुजुर्ग भी लौंडों की तरह कमर हिला हिला कर उछलने लगते हैं।

यदि आपकी सांस जल्दी न उखड़ती हो तो जितना आसान दण्ड पेलना है उतना ही आसान डांस करना है। आधुनिक डांस तो और भी आसान। क्या जरूरत है वही स्टेप किये जांय जो गोविंदा ने किए थे! एक संतुलन बनाकर हाथ, पैर, कमर, मुंडी मतलब शरीर के सभी अंगों को जितना बाएं हिलाइए उतना दाएं हिलाइए। ब्रेक कर के हिलाइए तो ब्रेक डांस, लगातार हिलाइए तो फास्ट डांस। शकीरा की तरह कमर को लट्टू बनाकर नचाने के लिए तो ईश्वर की कृपा चाहिए लेकिन स्टेमना बनाइए तो गोविंदा और प्रभु देवा की क्रेक/ब्रेक डांस तो कर ही सकते हैं। रोज घर/दफ्तर में किसी न किसी के इशारे पर नाचते ही हैं, थोड़ा अपने मन से भी नाच लीजिए।

डांस से ध्यान का मार्ग ओशो ने सिखाया है। इससे अच्छा सदा हीट और फिट रहने का कोई दूसरा तरीका संसार में है ही नहीं। इस तरीके को अपना कर आप भी प्रोफेसर साहब की तरह सुपर हिट हो सकते हैं। रोज शाम टी.वी. खोलकर मीडिया के इशारे पर नाचना बन्द कीजिए और ओशो के बताए तरीके अपनाकर नृत्य कीजिए। ओशो ने ज्ञान प्राप्ति के बहुत से तरीके बताए लेकिन हम संभोग से समाधी को पकड़ कर लटक गए! डांस बहुतों ने किए वायरल हुए प्रोफेसर साहब! हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने भी फिट इंडिया का नारा दिया है। इस नारे के साथ उन्होंने देश की नाचने का एक और अवसर प्रदान किया है। नहीं ओशो के तो अपने प्रिय नेता के इस नए दांव पर नाचिए। जीना है तो इनके/उनके इशारे पर नाचना तो पड़ेगा ही। थोड़ा समय निकाल कर अपनी इच्छा से भी नाच लें। हो सकता है आपका डांस नृत्य में बदल जाय और आप पर कृष्ण की कृपा हो जाय। कृष्ण ने आपका नृत्य देख लिया तो भव सागर से पार लगने में किंचित मात्र की देर नहीं लगेगी।

लोहे का घर-45

दून में भीड़ है आज। पुरुलिया जिले के यात्रियों के जत्थे के बीच बैठा हूं। इनकी भाषा बांग्ला है। ये हरिद्वार, बद्रीनाथ, गंगोत्री, जमुनोत्री की तीर्थ यात्रा के बाद वापस अपने घर जा रहे हैं। इनके ग्रुप में लगभग पचास यात्री हैं। वेशभूषा और खान पान से गरीब मध्यमवर्गीय दिखते हैं। धार्मिक तीर्थ यात्रा का मोह इनसे यात्राएं करवाती हैं। मेरे बगल और सामने के बर्थ में पुरुष और साइड लोअर बर्थ पर दो महिलाएं हैं। खिड़की के पास एक प्लास्टिक का बोतल रखा है जिसमें चने भीग कर फूल चुके हैं। एक स्टील का बड़ा सा कटोरा है जिसमें सत्तू घोल कर महिलाएं खा रही थीं। बड़े बोतल में पानी रखा है जो प्लेटफॉर्म की टोंटी से भर कर लाया गया है। मिनरल वाटर नहीं है। इनके पास बैठ कर थोड़ी ही देर में घुलमिल गया। ट्रेन की लेट लतीफी से दुखी नहीं लग रहे थे। कहने लगे वो पहाड़ की १३०० फिट गहरी खाई की तुलना में ये यात्रा बड़े सुकून वाली है। सही है.. इतनी कठिन यात्रा के बाद इन्हें रेल की यात्रा सुख पहुंचा रही है। बड़े श्रम के बाद छोटा श्रम सुख की अनुभूति कराता है।

पहली बार उन्होंने पुरुलिया का नाम लिया तो मैं समझा नहीं। मैंने पूछा.. आपके जिले में खास क्या है? एक ने याद दिलाया.. जहां आसमान से हथियारों की बारिश हुई थी। ओह! तो ये आधुनिक भारत के सबसे रहस्यमय कांड, पुरुलिया हथियार कांड वाले जिले के लोग हैं!! मैंने हंस कर पूछा.. एकाध ए के ४७ रायफल छुपाए कि नहीं? उसने भी हंस कर जवाब दिया.. सब काम आ गए।

आंखों के आगे १७ दिसम्बर १९९५ के भयानक हथियार कांड के चर्चे नाचने लगे। मैंने उस वक़्त एक लाइन लिखी थी...कफ़न ओढ़ कर सोने की आदत डालो, अब तो बरसने लगे हैं हथियार। गूगल सर्च किया तो घटना के कई समाचार मिले...

(18 दिसंबर, 1995 को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया कस्बे के ग्रामीण सुबह-सबेरे जागने के बाद रोजमर्रा की तरह अपने खेतों की ओर जा रहे थे. इस दौरान उन्हें अचानक जमीन पर कुछ बक्से दिखाई दिए. जब इन बक्सों को खोला गया तो ग्रामीणों की आखें खुली की खुली रह गईं. इनमें भारी मात्रा में बंदूकें, गोलियां, रॉकेट लांचर और हथगोले जैसे हथियार भरे हुए थे. जितने विस्फोटक ये हथियार थे यह खबर भी उतने ही विस्फोटक तरीके से देशभर में फैल गई. यह इतनी बड़ी घटना थी कि सरकार को इस मामले में तुरंत ही देश के सामने नतीजे पेश करने थे. सरकार के लिए यह राहत की बात थी कि जांच एजेंसियों को चार दिन बाद ही एक बड़ी सफलता मिल गई. 21 दिसंबर को भारतीय उड्डयन अधिकारियों ने थाईलैंड से कराची जा रहे एक ‘संदिग्ध’ एयरक्राफ्ट को मुंबई के ऊपर उड़ते वक्त ट्रैक किया और उसे नीचे उतरने पर मजबूर कर दिया. इस जहाज में सवार लोगों से पूछताछ के बाद पता चला कि पुरुलिया हथियार कांड के तार इसी एयरक्राफ्ट और इसमें सवार लोगों से जुड़े हैं.

जांच एजेंसियों के मुताबिक ‘एन्तोनोव-26’ नाम के इस रूसी एयरक्राफ्ट ने ही 17 दिसंबर, 1995 की रात को पुरुलिया कस्बे में हथियार गिराए थे. पैराशूटों की मदद से गिराए गए उन बक्सों में बुल्गारिया में बनी 300 एके 47 और एके 56 राइफलें, लगभग 15,000 राउंड गोलियां (कुछ मीडिया रिपोर्टें राइफलों और गोलियों की संख्या इससे कहीं ज्यादा बताती हैं), आधा दर्जन रॉकेट लांचर, हथगोले, पिस्तौलें और अंधेरे में देखने वाले उपकरण शामिल थे. ‘एन्तोनोव-26’ में मौजूद एक ब्रिटिश हथियार एजेंट पीटर ब्लीच और चालक दल के छह सदस्यों को फौरन गिरफ्तार करके उनके खिलाफ जांच शुरू कर दी गई. लेकिन इस कांड का असली सूत्रधार बताया जाने वाला किम डेवी, आश्चर्यजनक रूप से हवाई अड्डे से बच निकलने और अपने मूल देश डेनमार्क पहुंचने में कामयाब हो गया.)

आगे अधिक जानकारी आप खुद गूगल सर्च कर के पढ़ सकते हैं। कभी कांग्रेस पर, कभी आंनद मार्गियों पर इस काण्ड के आरोप लगे। जिसकी गुत्थी आजतक नहीं सुलझ पाई है। यह आज भी रहस्यमय बना हुआ है। इसके किस्से आज भी रोचक और विस्मयकारी हैं। एक विदेशी एयर क्राफ्ट भारतीय रडार की आंखों में आए बिना कैसे इत्ते हथियार गिराकर सकुशल वापस भी चला गया! यह समझ से परे है।

कहीं बारिश हुई होगी, आज हवा में गर्मी नहीं है। अपने अपने अंदाज में समय काट रहे हैं यात्री। ट्रेन रोज की तरह ही स्टेशन स्टेशन रुकते हुए चल रही है। आज लोहे के घर ने पुरुलिया हथियार कांड की याद ताजा कर दी।

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आज अपने इलाके में मौसम की पहली बारिश हुई है। गरम पकौड़े खा कर ट्रेन में बैठे हैं। बोगी में काम चलाऊ भीड़ है। बाहर खेतों की मिट्टी गीली है। गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू लिए खिड़की से ठंडी हवा आ रही है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि लोहे के घर का मौसम आज सुहाना है।

गांव के लड़के कटाई के बाद खाली पड़े खेत को मैदान बनाकर क्रिकेट खेल रहे हैं। कहीं चर रहे हैं चौपाए कहीं बकरियों के झुंड को हांकती हंसती/कूदती चली जा रही हैं बच्चियां और कहीं पंछियों के झुंड इत उत उड़ उड़ आ/जा रहे हैं। एक्सप्रेस ट्रेन है, हर स्टेशन पर धीमी हो रही है मगर अभी तक कहीं रुकी नहीं है।

हम कंकरीट के तपे जंगल में रहने वाले शहरी जैसे पहली बारिश देख उछल पड़ते हैं वैसी खुशी नहीं दिख रही गांवों में। खेत कटे हैं, अभी जुताई हुई नहीं है, ग्रामीण शायद तौल रहे हैं बादलों का वज़न। जानते हैं कल फिर निकलेगी चिलचिलाती धूप। ये वो बादल नहीं हैं जिनसे तपी धरती की प्यास बुझ सके। कहीं कहीं खेतों में चिड़ियों के चोंच भर जो पानी लगा है इससे तो काम बनने वाला नहीं।
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आज मौसम गर्म है। शाम के ६ बजा चाहते हैं और धूप अपने शबाब पर है। तपा हुआ है लोहे का घर। मेरे पास दो नन्हीं बच्चियों वाला एक जोड़ा बैठा है। इंदौर से पटना जा रहे हैं। पटना में घर है। घर में शादी पड़ी है। युवक इंदौर में किसी दवा कम्पनी में काम करता है। युवती बच्चे संभालती है। गरीब मध्यम वर्गीय परिवार है। इंदौर के काम से तो लड़का खुश है लेकिन आने जाने से हलकान। एक बड़ा सा नया पैकेट कीन कर ले जा रहा है। शायद शादी का गिफ्ट है। दोनों बच्चियां घुटनों के बल बैठ, एक एक खिड़की की रॉड पकड़ कर बाहर हर पल बदलने वाले दृश्यों को देखने में मगन हैं। छोटकी कभी ठुनकते हुए मां की गोदी में समा जाती है, कभी फिर खिड़की के बाहर झांकने लगती है।

बाहर का संसार बच्चियों के लिए नया है। ये देख रही हैं हरे वृक्ष, सूखे खेत, चौपाए, क्रिकेट खेलते बच्चे, नदी, नाले, पुल और अनवरत साथ साथ चलने वाली पटरियां। जितना ज्ञान इन्हें पूरे साल स्कूल की किताबों में पढ़कर नहीं मिला होगा उतना ये एक रेल यात्रा से सीख पा रही होंगी। पूछती हैं पापा से.. ऊ का है? पापा गोदी में ले समझाते हैं.. ताड़ का पेड़ है।

साइड लोअर में दो लड़के, आधे बैठे, आधे लेटे, मोबाइल में डूबे हैं। ऊपर के बर्थ पर भी लोग हैं। ट्रेन को जौनपुर से बनारस के बीच कहीं नहीं रुकना चाहिए मगर यह हर स्टेशन और स्टेशन से पहले आउटर पर भी पैसिंजर की तरह रुक रुक कर चल रही है। हर स्टेशन पर मालगाड़ियां दिखती हैं। रुके स्टशन पर, बाहर निकल कर यात्री भर रहे हैं बोतल में पानी। प्लेटफॉर्म से पानी पाना हर आम आदमी के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। पैसे वाले पन्द्रह रुपए का मिनरल वाटर बीस में खरीद कर भी प्रसन्न हैं। इतनी गर्मी में मिल रहा है, यही क्या कम है!

ट्रेन रुकी नहीं रहती। रुक रही है, रुक कर चल भी रही है। गाड़ी का पटरी पर चलना सुकून देता है। पटरी पर खड़ी हो तो बेचैनी बढ़ जाती है। पटरी से उतर जाए तो आदमी पागल हो जाता है। अभी पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी। बिक रहे हैं मैंगो शेक, बिक रहा है ठंडा पानी और बिक रहा है गरम चाय भी।

सूरज ढल चुका है, ताप बरकरार है। जैसे सख्त अधिकारी के दफ्तर से उठ जाने के बाद भी पूरे दफ्तर पर बनी हो उसकी हनक। होते-होते कम होगा ताप। चुगते-उड़ते घुस जाएंगे पंछी अपने-अपने घोसलों में। निकलते-निकलते निकलेगा चांद। यूं ही चलते-चलते पहुंच ही जाएंगे लोहे के घर के सभी यात्री अपने-अपने घर। 
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आज मौसम ठंडा है। सुबह नींद खुली तो कालोनी में जमे पानी को देख एहसास हुआ कि कल रात बारिश हुई थी। लोहे के घर में रोज के यात्री पंछियों की तरह चहक रहे हैं। कुछ अखबार पढ़ रहे हैं, कुछ बातों में मस्त हैं। वाराणसी से सुबह सात बजे चलकर सुल्तानपुर तक जाने वाली #sjv पैसिंजर बनारस से लगभग ठीक समय पर छूटी है।
आकाश में अभी भी टंगे हैं पानी वाले बादल। निकल चुके हैं मिलिट्री छावनी के बबूल के जंगल, शिवपुर स्टेशन और कंकरीट के जंगल वाले कीचड़ भरे रास्ते। #ट्रेन अब ग्रामीण इलाके से गुजर रही है। इधर भी हुई है बारिश। गीली है खेतों की मिट्टी। फावड़े और खुरपियां लेकर निकल चुके हैं किसान खेतों में। धूप भींगी बिल्ली बन बादलों के पीछे कहीं दुबकी पड़ी है।

बाबतपुर में देर से रुकी थी ट्रेन। एक हवाई जहाज लैंड किया फिर चल दी। यात्रियों में से किसी ने हवा में ट्वीट किया..आज हवाई जहाज से क्रासिंग थी!

एक पानी से बदल चुकी है खेतों की रंगत। सूखी/बंजर धरती हरी भरी लग रही है। सुंदर सुंदर मेढ़ बना रहे हैं किसान। उखड़ चुके है सूरजमुखी के पौधे। छोटे से वर्गाकार टुकड़े में रोपे जा चुके हैं धान के बीज। कहीं कहीं हो चुकी है खेतों की जुताई। मिट्टी के बड़े बड़े ढेले बिखरे पड़े हैं आयताकार टुकड़ों में। इनके बच्चे भले वर्ग और आयत के सवालों पर कक्षा में डांट सुने, ये अनपढ़ किसान वर्गाकार, आयताकार, सम और समानांतर टुकड़ों वाले खेत कितने कलाकारी से तैयार कर लेते हैं!

कहीं महिलाएं धान के बीज वाले टुकड़े के किनारे अगल बगल सट कर बैठी, काम कम बातें अधिक करती दिख रहीं हैं, कहीं चल रहे हैं खेतों में फावड़े। पहली बारिश ने जैसे जान फूंक दिया हो भगवान भरोसे जीवन यापन करने वाले प्राणियों के जीवन में! किशोरों/युवाओं की टीम भी खेतों के इर्द गिर्द मंडरा रही है। पंछी चहकने लगे हैं, नए जोश से पंख फैलाए उड़ रहे हैं बकुले और टर्राने लगे हैं दादुर भी।

सामने वाली पटरी से एक मालगाड़ी अप से डाउन की ओर पटरी खड़खड़ाते हुए गुजरी है। आतंकित हो हवा में उड़ने लगे खेतों में चैन से चुग रहे सभी पंछी। एक लंबी सीटी मार कर फिर पटरी पर चलने लगी है अपनी पैसिंजर। 
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मौसम परिवर्तन का समय है। गर्मी जा रही है, बरखा रानी आ रही है। प्राकृतिक सत्ता के इस स्थानांतरण में खूब जोर आजमाइश होती है। कभी बादल धूप को रूई का फाहा बनाकर अपने काख में दबाए उड़ने लगता है, कभी धूप बादलों को चीर, चिन्नी-चिन्नी फाड़ कर अपनी सत्ता फिर स्थापित कर लेती है। यह ताकत का खेल है। भारतीय लोकतंत्र में भी कभी कभी सत्ता हस्तानांतरण में यह खेल देखने को मिल जाता है।

गर्मी जाते-जाते बड़े बवाल काटती है। वर्षा सत्ता में काबिज होने के लिए खूब बल प्रयोग करती है। कभी आंधी, कभी ओलावृष्टि और कभी जोरदार बिजली कड़कती है। इस युद्ध में निर्दोष प्राणी नाहक मारे जाते हैं। प्रकृति का हो या मनुष्यों का, सत्ता हस्तांतरण का यह खेल आम जन के लिए बड़ी त्रासदी लेकर आता है। 


लोहे का घर-44

ढल चुके हैं सुरुज नरायण, गर्म है लोहे का घर। प्यासे हैं यात्री। व्याकुल हैं बच्चे। रुक-रुक, छुक-छुक चल रही है एक्सप्रेस #ट्रेन। बिक रहा है पानी ठंडा, मैंगो जूस, चना, खीरा। एक्सप्रेस ट्रेन पैसिंजर की तरह चले तो यात्री भले गर्म डिब्बे में आलू की तरह भुनाते चलें, लोकल वेंडरों की चांदी होती है। बिक जाता है सारा माल।
यह मध्यम वर्गीय बोगी है। न एसी न जनरल। न अमीर न गरीब.. स्लीपर बोगी। मध्यम वर्ग की पीठ पर देश की और स्लीपर बोगी पर रेल की पूरी अर्थ व्यवस्था टिकी है। इसी मध्यम वर्गीय बोगी के सहारे जलते हैं वेंडरों के घर के चूल्हे। न जनरल वाले खरीद पाते हैं, न एसी में वेंडर घुस पाते हैं। मध्यम वर्गीय बोगी के यात्री हाड़तोड़ मेहनत की कमाई से टैक्स देने के बाद जो धन बचता है उसे देश के नौनिहालों के शिक्षा/स्वास्थ्य पर दिल खोल कर खर्च करते हैं ताकि पढ़ लिख कर बच्चे बड़ी-बड़ी कंपनियों की मजूरी कर सकें।
इस बोगी के यात्री अखबार पढ़ते हैं और पन्ने-पन्ने चपोत कर/सहेज कर रखते हैं ताकि भूख लगने पर भूज़ा खा सकें। स्टील का गिलास और बड़ा सा कटोरा भी रखते हैं। टेसन-टेसन भीड़ में कूद-कूद, रगड़-झगड़ प्लास्टिक के बोतल में पानी लाते हैं और इत्ते खुश होते हैं कि जग जीत लिया! अब तो इनके पास स्मार्ट फोन भी है। फोन में नेट भी है। राह चलते भी देख सकते हैं क्रिकेट, विज्ञापन और सनीमा। ऐसे ही नहीं कहती दुनियां भारत एक बिग बाज़ार है। मै भयभीत हूं कि कहीं यह बिग बाजार ध्वस्त न हो जाय।
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सुबह सात बजे की पैसिंजर ट्रेन चलते चलते पौने आठ तक चल ही दी। फुलवरिया, मिलिट्री छावनी के बबूल के जंगल और एक करिया नाला (जिसे सभी वरुणा नदी कहते हैं।) के बाद अब शिवपुर से चली है #ट्रेन। थोड़ी देर पहले वरुणा गई है जिसके कारण रोज की तुलना में भीड़ कम है। फर्श पर बिखरे मूंगफली के छिलके और यात्रियों के चेहरे पैसेंजर ट्रेन को अलग ही पहचान देते हैं। दूर से देखो या भीतर से इसका एक अलग ही लुक है।

हवा ठंडी नहीं तो अभी गर्म भी नहीं है। खेतों में धूप अपने रंग में है। उघाड़े बदन डडौंकी से बकरियों के झुंड को हांकते मेढ़ मेढ़ जा रहे ग्रामीण की नजर पैसेंजर पर पड़ी तो जल्दी जल्दी बढ़ाने लगा अपने कदम। शायद ट्रेन को देख उसे लगा हो कि आज बहुत देर हो गई। उसे क्या पता आज ट्रेन ही लेट है। अब वह जमाना गया जब ट्रेन को देख समय का अनुमान होता था। अब यह देखना पड़ता है कि इस समय कौन कौन ट्रेन है!
अमित भैया रोज टीवी में चीखते हैं.. 'दरवाजा बन्द' लेकिन ग्रामीण अभी भी खुले में ही शौच करते पाए जाते हैं। शायद इनके पास अभी न शौचालय है न दरवाजा। चुंधियाती धूप में काली बकरियां, भैंस ग़ज़ब का कंट्रास्ट पैदा करते हैं! इक लड़की पानी मांग रही है। एक मूंगफली वाला मूंगफली बेच रहा है। कुछ यात्री मौका पा कर सो रहे हैं।

एक घना वृक्ष और उसके छांव तले भेड़ों का झुंड दिखा। प्रथम दृष्टया दूर से देखने पर लगा मैले, बड़े से चबूतरेे के ऊपर तना है वृक्ष! ध्यान से देखा तो जाना अनगिन भेड़ों का एक विशाल झुंड है जो वृक्ष की झुकी शाखाओं के तले छांव पा रही हैं। जैसे धूप में खड़े पिता ने बच्चों के ऊपर ओढ़ा रखी हो छतरी।

जलाल गंज का पुल थरथराया है। जफराबाद अब नजदीक है। आ रही है अपनी कर्मभूमि। 
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ढल रहा है सूरज। धीरे धीरे ठंडा हो रहा है लोहे का घर। अभी तो नींबू की तरह निचुड़ रहे हैं यात्री। पंक्ति बद्ध जौनपुर-वाराणसी के हर स्टेशन पर खड़ी हैं एक्सप्रेस ट्रेनें। एक आगे बढ़ती है तो उसके पीछे वाली आगे बढ़ती है। बीच बीच में सभी के तन बदन में आग लगाती, मुंह चिढ़ाती बाय बाय करती छूट जाती है मालगाड़ी। जाड़ा होता तो कोई बात नहीं, इस भयानक गर्मी में ठहरी हुई ट्रेन की बोगियों से बाहर निकल प्लेटफार्म पर आकुल व्याकुल टहल रहे हैं पुरुष। बोगी में ही चुपचाप बैठ कर पसीना बहाने के लिए अभिशप्त हैं महिलाएं और बच्चे। बीच बीच में आ रही हैं आवाजें.. पानी पानी।
जौनपुर से १४० मिनट में तय हुई है ४० किमी की दूरी! अभी बाबतपुर में खड़ी है ट्रेन। लगभग तीस मिनट हो चुके हैं। नेट पर अगली गाड़ी की पोजिशन देख रहे हैं यात्री। जब आगे वाली बढ़ती है तब खुश होते हैं। उम्मीद जगती है कि चलेगी अपनी वाली भी।


ढल रही है शाम, ठंडा हो चुका लोहे का घर और ठंडे हो चुके हैं इसके यात्री भी। भारतीयों में सहनशीलता का गुण शायद रेल में सफ़र करने से ही आया है। जो एसी में सफ़र करते हैं वे तो फिर भी ठीक हैं लेकिन जो इस गर्मी में स्लीपर और जनरल बोगी में सफर करने के लिए मजबूर हैं, उनकी दसा ठहरे हुए ट्रेन की भीड़ भरी बोगियों में अत्यन्त दुखदाई है। ट्रेन चलती रहती है तो खिड़कियों के रास्ते भीतर आती है हवा, सूखते हैं स्वेद कन। ट्रेन खड़ी हो जाती है तो सारा शरीर रोम रोम रोता है।

चली है ट्रेन। आ रही है हवा। दम घुट रहे मरीजों को मिल रहा है आक्सीजन। ले पा रहे हैं सांस और कुछ तो पिछला गम भुलाकर हंस भी रहे हैं! 

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सुबह ७ बजे वाली पैसिंजर ठीक समय से छूटी। आज मैं २ मिनट लेट हो गया। प्लेटफार्म पर पहुंचा तो उसकी पूंछ दिखाई दी। पूंछ मतलब गार्ड वाला आखिरी डिब्बा। मैंने टाटा किया, उसने बिना कुछ बोले स्पीड बढ़ा दिया। एक युवा साथी उसके पीछे पीछे दौड़ा और दौड़ा कर पकड़ लिया। चढ़ने के बाद गर्व से हाथ भी हिलाया। नहीं पकड़ पाता तो खीसिया कर लौटता। पकड़ लिया तो अकड़ दिखा रहा था। गिर जाता तो रो रहा होता। चलो अच्छा है उसकी दौड़ सफल हुई। कल मैं दस मिनट पहले आया था तब पूरे चालीस मिनट खड़ी थी। आज दो मिनट देर से आया तो चल दी! बेईमान कहीं की! अपनी गलती पर कोई क्षमा नहीं, मेरी गलती पर सजा। बड़ी अधिकारी बनती है!

ऐसा ही होता है। ट्रेन किसी की प्रतीक्षा नहीं करती। प्रतीक्षा हमेशा यात्री को करनी पड़ती है। जिस दिन ट्रेन लेट होगी यह मानकर थोड़ी सुस्ती दिखाई, वह राइट हो जाती है। यह तो अच्छा रहा कि सुबह पांच बजे वाली किसान अभी पीछे थी। पैसिंजर के छूटने के बाद उसके आने की घोषणा हो गई।

किसान की बोगियां खाली खाली हैं। इसमें नए डिब्बे लगे हैं। रंगाई पुताई भी अच्छी है। पंखे टंगे हैं, चल रहे हैं और हवा भी लग रही है। आराम से खाली बर्थ पर लेटे हैं। अब मन कह रहा है.. जो होता है, अच्छा होता है। पैसिज़र छूटी तो एक्सप्रेस मिल गई। दौड़कर पैसिंजर पकड़ने वाला मेरा लिखा पढ़ेगा तो अफसोस करेगा। नाहक दौड़ा! न दौड़ता तो एक्सप्रेस मिल जाती। एक्सप्रेस पैसिंजर को क्रास करके आगे बढ़ गई तो और भी दुखी होगा।

रेल यात्रा में ही नहीं, जीवन यात्रा में भी यही होता है। एक अवसर चूक जाने पर हम दुखी हो जाते हैं जबकि जीवन में कई अवसर और भी मिलते हैं। नौकरी खोजने वाले बेरोजगार कठिन तैयारी के बाद जो पहला अवसर मिलता है उसी को लपक लेते हैं फिर जीवन भर उसी में चिपके उलझे इस अफसोस के साथ पूरा जीवन बिता देते हैं कि थोड़ा रुक जाते तो शायद एक्सप्रेस मिल जाती। कितने तो पैसिंजर को न पकड़ पाने के गम में इतने निराश हो जाते हैं कि दूसरे अवसर का प्रयास ही नहीं कर पाते। जबकि ये जो जीवन रूपी प्लेटफार्म है उसमें अवसर रूपी कई ट्रेने गुजरती हैं। आवश्यकता है सतर्क हो प्लेटफॉर्म पर टिके रहने की। सफ़र कठिन हुआ है मगर समाप्त नहीं हुआ। आगे और भी अवसर आएंगे। हो सकता है और अच्छे अवसर मिलें। पैसिंजर छूट जाए तो एक्सप्रेस मिले। सरकार की मेहरबानी हो तो क्या जाने बुलेट ही मिल जाय! स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी ने काफी अनुभव के बाद लिखा होगा..मन का हो तो अच्छा और न हो तो और भी अच्छा।
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