4.2.18

लोहे का घर-36

ठंडी में बेगमपुरा मिली। और सभी ट्रेनें अत्यधिक लेट हैं। यह भी अपने समय के अनुसार अत्यधिक लेट है मगर रोज के यात्रियों के समय पर है। नेट में ट्रेनों का समय देख सभी अपने-अपने दड़बे से निकल सीटी स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर जमा हो गए। प्लेटफार्म के बाहर नगर पालिका ने आज गीली लकड़ी रख छोड़ी थी। आग पकड़ नहीं रही थी इसलिए सभी प्लेटफार्म पर ही खड़े होकर हंसी ठिठोली कर रहे थे। आते आते एक घंटे देरी से आई। तब तक सभी कुम्भ मेले में बिछुड़ें भाइयों की तरह जमा हो गए।
६ बजे के आसपास ट्रेन झटके देते हुए चली तो किसी ने कहा..बेगमपुरा झटका दे रही है। वो कहना चाह रहे थे ट्रेन बेगमपुरा झटका दे कर चल रही है मगर इससे ध्वन्यार्थ निकल रहा था..बेगम पूरा झटका दे रही है! लोग खुश हो गए। उनको लगा किसी की बेगम झटका दे रही है। अपनी झटका दे तो दुखी, दूसरे की दे तो खुश! इससे यह अर्थ लगाया जा सकता है कि प्रायः सभी की बेगम झटका देती है।
अब हवा से बातें कर रही है ट्रेन। इसको बनारस ही रुकना है तो जल्दी पहुंचा देगी। खाली खाली हैं इसकी सभी बोगियां। दूर से आ रहा परिवार बच्चों के साथ कहीं कहीं सिकुड़ कर बैठा दिख रहा है। पीछे कोई मोबाइल में पुराना गाना बजा रहा है.…ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं, हम क्या करें?
चेन पुलिंग के बाद थोड़ी देर रुक कर फिर चल दी। रुकने के बाद जब चलती है तो झटके देती है। यह इस ट्रेन की कोई बीमारी लगती है। सभी की अपनी अपनी बीमारियां होती है। किसी को बिला वजह हंसने की बीमारी होती है तो किसी को बोलते रहने की। कोई गुमसुम बैठा सोचता रहता है तो कोई मोबाइल में लिखता रहता है।
फिर रुक गई। मंजिल के करीब आ कर रुकना भी झटके देना है। शायद रुक कर फोन में अपनी सहेलियों से बतिया रही होगी..हाय फिफ्टी! कहां मर गई? तुम्हारे आशिक सब मुझी में चढ़े हैं। दून भी नजर नहीं आती। गोदिया भी लेट है। उधर से दून, फिफ्टी चिचिया रही होंगी.. तुम्हीं कौन सी सही हो? जाना था दिन में, जा रही हो शाम ढले। आज मेरे आशिकों को भी झेल लो। लोग तुम्हें झटके वाली बेगम कह रहे हैं!
अब फिर हवा से बातें कर रही है ट्रेन। मारे गुस्से के झटके भी खूब दे रही है। सकुशल पहुंचा दे तो गनीमत।
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कोहरे से डूबे प्लेटफार्म में सुबह शाम जब ट्रेन लेट हो जाय तो एक स्थान पर बैठ कर ट्रेन की प्रतीक्षा करने के बजाय वॉक करना ज्यादा फायदमंद है। कभी मार्निंग वॉक, कभी इवनिंग वॉक। रोज के यात्रियों को घर पहुंच कर पत्नी/बच्चों से टॉक करने का समय तो मिलता नहीं, वॉक कब करेंगे? उनके लिए ट्रेन की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म पर या जब ट्रेन आउटर पर रुकी हो तो उतर कर पैदल ही घर जाने की सुविधा रेलवे मुफ्त में प्रदान करती है। आप इन अवसरों का लाभ न उठाएं तो कोई क्या कर सकता है?
अब घने कोहरे वाला वह समय आ गया है जब आप रेलवे के किसी भी समय संकेत पर भरोसा नहीं कर सकते। कल वाली ट्रेन 5 किमी दूर हो तो आप यह मत मान लीजिए कि वह साइकिल की चाल से ही सही आधे घंटे में आ जाएगी। 5 मिनट में भी आ सकती है, दो घंटे भी लगा सकती है। आपको ट्रेन की आवश्यकता है, ट्रेन को आपकी नहीं। पकड़ने वाले को होशियार हो, बताए गए समय पर तैयार रहना होगा। बुद्धिमानी इसी में है कि सफ़र के दौरान आपके पास कम से कम सामान हो ताकि आप मजे मजे में घूम सकें।
प्लेटफॉर्म में घूमते समय कहीं आप को पीने के पानी की टोंटी खुली दिखे और पत्नी के बूंद बूंद पानी बचाओ अभियान से प्रेरित हो टोंटी बन्द करने के लिए लपकते हैं तो जरा ठहरिए! टोंटी, टूटी भी हो सकती है और एक जोरदार फव्वारे से आप भींग भी सकते हैं! एक अकेले आप ही जागरूक नागरिक नहीं हैं, कई इस राह से गुजरे और यह जानकर नल बन्द करने का प्रयास नहीं किया कि यह टूटी हुई है। बन्द कीजिए मगर खूब सावधानी से।
कहीं कर्मचारी प्लेटफॉर्म पर चूना लगाते दिखें तो समझ जाइए आज किसी अधिकारी का दौरा है। कई काम इसीलिए पेंडिंग में डाले जाते हैं कि जब अधिकारी का दौरा पड़ेगा तब वे क्या करेंगे? वह अधिकारी क्या जिसके आने पर बेहतरीन काम न हो! पेंडिंग वर्क अधिकारी को जनता की नजर में ऊंचा उठाने के अवसर होते हैं। जो कर्मचारी अपने अधिकारी से प्यार करते हैं वे हमेशा इन दुर्लभ अवसरों के निर्माण के लिए काम पेंडिंग में डाले रहते हैं। समय आने पर अधिकारी को काम कराने और कर्मचारियों पर अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए कार्यवाही करने की धमकी देते हुए कृपा करने का शुभ अवसर हाथ लगता है। कार्यवाही करते हुए किसी को निलंबित वगैरह कर दिया तो फिर कर्मचारी यूनियन को वह काम मिल जाता है जिसके कारण संघटन का अस्तित्व है। 'अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है' जैसे मनोहारी गीत सुनाई पड़ते हैं। अधिकारी को भी यूनियन से वार्ता करने और समस्या हल करने का बड़ा अवसर हाथ लगता है। सेवानिवृत्ति के समय दिए जाने विदाई भाषण में अधिकारी के द्वारा किए गए इन्हीं अच्छे कार्यों की चर्चा होती है। आप प्लेटफॉर्म पर टूटे नल के बहते हुए पानी से परेशान हैं मगर यह नहीं जानते की यह कितनों के लिए कितना लाभकारी है!
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सुबह वाली साबरमती दिन ढले आई है। खाली खाली बोगियां हैं। सामने लोअर बर्थ पर बैठा एक आम आदमी पॉलीथीन से निकाल निकाल आलू की भुजिया के साथ सूखी रोटी बड़े प्रेम से गटक रहा है। सफ़र से मटमैला हो चुका सफेद धोती कुर्ता पहने है। कुर्ते के भीतर स्वेटर है। सर पर टोपी है, पैर में कपड़े का जूता मोजा। कुर्ते की जेब से चश्मे की खोली झांक रही है। खाने में तल्लीन है। कभी कभी चाट भी लेता है हाथों की उंगलियां। सोचता हूं कितनी स्वादिष्ट होंगी इसकी रोटियां भला! जो इत्ते प्रेम से खा रहा है।
अब उठा है, खाली पॉलीथीन फेंकने और हाथ धोने। अरे! धो धा के पॉलीथीन ले आया वापस। बड़े करीने से रख दिया अपने झोले में। शाल से मुंह पोछा और सिरहाने रखकर लेट गया। अब हाथों से बने ऊन के दस्ताने पहन रहा है। निश्चिंत और बेफिक्री से लेटा है। पलकें मूंदे कुछ सोच रहा होगा। कुछ पूछकर क्या डिस्टर्ब किया जाय! सोने दिया जाय इसे चैन से। भारत का असली आम आदमी तो यही लगता है।
बोगी में अपने आस पास कोई नहीं। साथी संजय जी हैं मगर वे लेट कर मोबाइल में कोई फिलिम देख रहे हैं। आगे पीछे से कुछ आवाजें आ रही हैं। भोजपुरी में कोई बतिया रहा है.. नाही त अइसन बा बहिनी न! गड़िया लेट बा। हमे देर होई पूजा उजा कर के बइठा। हलो हालो.. कट गए फोनिया।
ट्रेन आराम आराम से चल रही है। जौनपुर के बाद अगला स्टेशन बनारस ही है मगर बार बार रुक कर चल रही है। इस रूट में लेट होने की वजह से शाम के समय सुल्तानपुर और फैजाबाद दोनों मार्ग से आने वाली कई ट्रेनें आगे पीछे चलती हैं। दून, जम्मूतवी, मरुधर सभी इसी समय पीछे पीछे चल रही हैं।
दो दिन की छुट्टी के बाद आज दफ्तर खुला भी तो मकर संक्रांति के दिन। कौन खिचड़ी! कैसी खिचड़ी! सब मज़ा छुट्टी में ही ले लिए। छुट्टी न हो तो कोई त्योहार पण्डित जी के हिसाब से नहीं मनता। अब तो लोग बड्डे पार्टी या वैवाहिक साल गिरह भी छुट्टी के दिन ट्रांसफर कर मना लेते हैं। कल मौनी अमावस्या है, मौन हो कर नहा लेंगे।
लोअर बर्थ पर लेटे आम आदमी ने पूरा शाल ओढ़ लिया है। सर ढक लिया है लेकिन शाल के बाहर कपड़े के जूते मोजे झांक रहे हैैं। जूता नहीं उतारा है। अनुभवी लगता है। जूता उतार लेता तो इत्ते चैन से नहीं सो पाता। अब ठीक है। जूते की भी चिंता नहीं और शाल के छोटे होने की वजह से पूरे पैर न ढक पाने का मलाल भी नहीं। जितनी चादर हो उतना ही पैर पसारना चाहिए वाले मुहावरे में एक लाइन जोड़ देनी चाहिए। चादर छोटी हो तो सर ढक कर, जूता पहन कर सोना चाहिए। आम आदमी चैन से जीने के लिए कितना जुगत लगाता है!
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दौड़ते भागते दून पकड़ी, हांफते हांफते सुन रहा था...
आजा मैं तो मिटा हूं तेरे प्यार में, तुझको पुकारे मेरा प्यार
इतने दिनों तक इतने दुखों को कोई सह न सकेगा
दोनों जहां की भेंट चढ़ा दी मैंने प्यार में तेरे
आजा तुझको पुकारे मेरा प्यार।

यह गीत ट्रेन नहीं गा रही थी, कोई मोबाइल में बजा रहा था। रात के सन्नाटे में बांसुरी पर जब यह गीत सुनाई पड़ता है तो अच्छे अच्छे पाषाण हृदय व्यक्ति की नींद भी उचट जाती है। नील कमल, मो. रफी साहब के बाद मुकेश का गाया दूसरा गीत बजने लगा...
मालिक ने बनाया इंशा को इंसान मोहब्बत कर बैठा
वो ऊपर बैठा क्या जाने, इंसानों पर क्या गुजरी है!

गाना सुनते सुनते जफराबाद आ गया और जफराबाद से चढ़े शिवकुमार भाई। शिव कुमार भाई के हाथों में गरमा गरम पकौड़े का थैला! पकौड़े खाते खाते सुन रहे सभी...
हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते
यहां दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते
तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला।
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बिछौना धरती को कर के अरे आकाश ओढ़ ले
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तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला।

जलाल गंज का पुल थरथराया है। दून हवा से बातें कर रही है। स्टेशन आ गया। कुछ वेंडरों के चढ़ने से थोड़ा शोर उठ्ठा..फिर वही खामोश पटरियों पर चलने से हुई खटर पटर और नया गीत...
जिंदगी तू ही बता, तेरा इरादा क्या है?
लोहे के घर का मौसम बड़ा सुहाना था कि किसी ने चेन पुलिंग कर दी। यकबयक माहौल बदल गया। मोबाइल पर गीत बजाने वाले ने अपनी मोबाइल बन्द कर दी। सामने साइड लोअर बर्थ पर बैठी कन्या बेचैनी से उठते हुए घरवालों से फोन पर बतियाने लगी...अभी ट्रेन रुकी है। अभी बाबतपुर भी नहीं पहुंची। पीछे से तरह तरह की आवाजें आनी शुरू हो गई। रोना धोना शुरू हो गया। चेन पुलिंग करने वालों को लोग कोसने लगे, देर होने के लिए ट्रेन को गरियाने लगे।
जीवन के सफ़र में यही सब तो होता है। अच्छी भली चल रही गाड़ी कब पटरी से उतर जाए और सुहाना सफ़र कब चीख पुकार में बदल जाए कोई ठीक नहीं। जिंदगी कुछ समय के लिए ठहर सी जाती है मगर हमेशा ठहरी नहीं रहती। यह गाड़ी भी चलेगी और मौसम फिर ठीक लगने लगेगा। जिन्हे रोज सफ़र में चलना है, वे भला इस छोटे मोटे ठहराव से क्यों विचलित हों! डरें वो, जिनकी जड़ें हैं बरगदी। अधर में लटके हुए को क्या फिकर?
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आज ओस का शोर था बनारस के भोर में। सुबह ५ बजे रजाई से निकल पलकें झपकाते गेट का ताला खोलने गए तो लगा जैसे बारिश हो रही हो। कदंब के ओस नहाए पत्तों से निरंतर टप टप झरती बूंदें बारिश का एहसास करा रही थीं। कुछ देर खड़ा सुनता रहा जलतरंग। पलकें खुलीं तो खुली की खुली रह गईं.. बाहर घना कोहरा था।
मौसम कितना भी प्रतिकूल हो बस नहा कर बाइक चलाते हुए स्टेशन में आओ और लोहे के घर में बैठने का सौभाग्य मिले तो सब कष्ट दूर हो जाता है। तकलीफ तब होती है जब भागते हुए आओ और सामने से ट्रेन निकल जाय या फिर घंटों खड़े रह कर प्रतीक्षा करते रहो मगर ट्रेन न आए। आज का दिन कल की तरह मनहूस नहीं है। कल छूट गई थी, आज मिल गई। आज पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी।
कोहरे से डूबे खेतों में प्लास्टिक की बोतल झूलती हुए चल रही दिख रही है। अभी भी खुले में शौच का क्रेज बरकरार है। लोग खुद भले खुले में शौच करें अपने बच्चों के लिए शौचालय बनाएं और प्रयोग करने की सलाह दें तो धीरे धीरे यह प्रथा खतम होगी।
बनारसियों में तो बहरी अलंग का इतना तगड़ा क्रेज हुआ करता था कि यहां के रईस अपनी नाव लेकर गंगा उस पार जाते और उस पार खुले में शौच करते। आज भी कुछ लोग यह शौक रखते हैं। गंगा पार खुले में निपटना, साफा - पानी (कपड़े धोना) लगाना, गंगा स्नान करना, भांग बूटी छानना और हर हर महादेव का नारा लगाते हुए बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने के बाद कचौड़ी जिलेबी खाना यहां के लोगों का शौक हुआ करता। मौसम इस शौक के आड़े न आ पाता। नहीं सुबह तो शाम गए मगर दिन में एक बार तो जरूर गंगा पार गए। भयानक बाढ़ के समय में भी जाने वाले उस पार निपटने जाते भले पानी से डूबे खेतों में निपटने के लिए जमीन न मिले और पेड़ में चढ़कर निपटना पड़े लेकिन खुले में शौच का शौक जरूर पूरा करते। नई पीढ़ी को यह कोरा गप्प लग सकता है मगर यह हकीकत है।
धीरे धीरे चल रही है ट्रेन। कोहरे से डूबे बरगद के वृक्ष के नीचे एक आदमी खैनी रगड़ते हुए साइकिल सवार को रोककर बात कर रहा है। शीशे चढ़े ट्रेन की खिड़की से देखने पर वृक्ष, कोहरा और दो प्राणी ही दिख रहे थे। बिजली के तार बैठी एक चिड़िया भी दिख गई। पगडंडी पर एक बाइक की हेड लाइट दिखी। अरहर, सरसों के खेत कोहरे में डूबे हैं, नहीं दिख रहे। बड़े और घने वृक्ष ही दिखते हैं।
लोहे के घर में बैठे लोग अखबार पढ़ चुके। किसी किसी की मोबाइल घन घना उठती है। आम आदमी के रिंग टोन भी अजीब अजीब बजते हैं। किसी ने गायत्री मंत्र लगा रखा है तो किसी ने फिलिम का गाना। अधिकारियों की रिंग टोन बस धीरे से टिन टिन करती है और वे फोन उठा कर जोर से गरजते हैं...अभी तक सोए हो?
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दिन ढले देर शाम प्लेटफार्म पर खड़े खड़े जाने वाली का हारन सुनाई पड़ता है तो भी लगता है अपनी वाली आ रही है! अपनी वाली बेगमपुरा है जो रुकने के बाद, चलने से पहले झटके देती है। आज आने से पहले भी खूब झटके दिए, बैठने के बाद तो झटके दे ही रही है। साथी कहते हैं, इसमें यही एक बुराई है। स्पीड बढ़ाना हो तो भी एक जोर का झटका लगता है। हारन भी ऐसे बजा रही है जैसे ठंड के मारे सियार रोता है.. हों sss। जब अपने रंग चलती है तो क्या पूछना! मस्त चाल है। ऐसे ही चलती रही तो एक घंटे में बनारस पहुंचा देगी, बस आगे कोई माल न हो। लोहे का घर माल गाड़ी के कारण ही लेट हो जाता है। जैसे हर पुरुष की तरक्की के पीछे किसी महिला का हाथ होता है वैसे ही हर लेट ट्रेन के आगे एक माल गाड़ी होती है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि अपनी वाली को कोई माल न मिले। वरना हारन बजाती, झटके देती उसी के पीछे पीछे रेंगती रहेगी।
खाली खाली है ट्रेन की बोगी। लोहे के घर में जो हैं वे सभी एक एक बर्थ पकड़ कर लेटे हुए हैं। कुछ दूर के यात्री कुछ पास के। दूर वाले बैठे बैठे थक गए होंगे, पास वाले मेरी तरह दिनभर काम कर के। थके मांदे बिचारे घर पहुंच कर लड़ी जाने वाली कुश्ती से पहले थोड़ा कमर सीधी कर लेना चाहते होंगे।
घूम कर दूसरी बोगियां का हाल चाल ले लिया। कहीं कोई पहचाने चेहरे नहीं दिखे। इतनी रात को कोई अभागा ही सफ़र करता है इस जाड़े में। किस्मत वालों को तो मनमाफिक हमसफ़र समय से मिल गया और अब तो वे खा पी कर दुबक चुके होंगे घर में। अपने आगे वाली बर्थ पर अपने पूर्वांचल के लोग बैठे लगते हैं। जैसे ही ट्रेन रुकती और झटके देती है एक जोर की गाली देते हैं ट्रेन को। रोका कंट्रोलर ने मां बहन की गाली पाए बिचारी ट्रेन! यह भी कोई बात हुई? पता नहीं कब सभ्य होंगे लोग! इन लंठों को उनके हाल पर छोड़ दूर से आ रहे भारत के और यात्रियों का हाल लिखता हूं।
मिडिल बर्थ में तीन बच्चे धमाल मचाए हैं। बाबूजी बच्चों के नीचे आराम से सो रहे हैं। माताजी बारी बारी से यशोदा माता की तरह तीनों को पूड़ी खिलाने के बाद पानी पिला रही हैं। शरारती बच्चे कान्हा की तरह एक दूसरे के पीछे छुप रहे हैं और पानी पीने से बच रहे हैं।
खिड़कियों के शीशे ठंड के कारण बन्द हैं। दोनों खिड़कियों के बीच वाले टेबल पर झोले से भरा बैग रखा है। बैग पर हाथ सर और गाल सटाए गुमसुम बैठे आते जाते लोगों को टुकुर टुकुर देख रहे हैं माँ बेटे।
एक साइड लोअर बर्थ पर पाँच बच्चियाँ एक दूसरे से सट कर बैठी न जाने किस बात पर खिलखिला रही हैं! पल भर के लिए चुप होती हैं फिर कोई कुछ बोलता है फिर छूटने लगते हैं हँसी के फव्वारे। ईश्वर इन्हें बुरी नजर से बचाए, खुश रहें जीवन भर।
एक साइड अपर बर्थ पर एक गुड़िया सी खूबसूरत बच्ची कम्बल ओढ़ अधलेटी कोई पत्रिका पढ़ रही है। चेहरे के भाव रिसर्च स्कॉलर की तरह गंभीर।
हैं न कितने प्यारे प्यारे लोग? हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती। अपने घर में सभी प्रकार के लोग रहते हैं। लोहे का घर हमारा देश ही तो है।
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बेगमपुरा हवा से बातें कर रही है। एक छक्का ताली बजाते हुए गुजरा है। उसके साथी आ रहे होंगे पीछे पीछे। रोज के यात्रियों को देख छक्के की ताली रुक गई। किसी ने कहा..सब स्टाफ के लोग हैं! एक के आगे ताली पीटते हुए बड़बड़ाया...जा! तेरी नौकरी छूट जाय। उसने हंस कर कहा..मिलने तो दो, मिलने के बाद किसकी छूटी है!
किसी ने चेन खींच दिया लगता है। वैक्यूम खुला छोड़ कर भाग गया। कोई उठा है बन्द करने। रुकी है ट्रेन। जो खींच कर उतरा होगा, वह भी ट्रेन लेट होने के लिए रेलवे को कोस रहा होगा। बैठने वाले तो कोस ही रहे हैं। जहां रुकी है, आस पास कोई स्टेशन नहीं दिख रहा। अंधेरे में डूबे खेत हैं। खाली खाली है इस ट्रेन की बोगियां। जम्मू से चली है और आखिरी स्टेशन बनारस है। अंत आते आते आदमी हो या ट्रेन, सभी रुक रुक कर हांफने लगते हैं।
ट्रेन यात्रा में सिंदबाद की साहसिक यात्राओं वाली कथा पढ़ने और धैर्य न खोने की सलाह देता रहता हूं मगर साथियों की बेचैनी कभी कम नहीं होती। अरे क्या जरूरत है ट्रेन में बैठते ही पत्नी से बात करने और शाम का प्रोग्राम बनाने की? उधर वो तैयार होने की घोषणा कर रही हैं और इधर जनाब पन्द्रह बीस मिनट में पहुंच जाने का आश्वासन दे रहे हैं। ट्रेन अभी तीस किलोमीटर दूर है। आज पिटाओगे बच्चू। अभी बेगमपुरा का नाम बिगाड़ कर ..बेगम पूरा बेवफा हो गई! कह रहे हो न? जब घर पहुंचोगे तब तक बेगम तुम्हीं को पूरा बेवफा सिद्ध कर देंगी। क्या जरूरत थी ट्रेन में चढ़कर किसी को पहुंचने का समय देना! भारतीय रेल के भरोसे पत्नी से घर पहुंचने का वादा!!! यह बेवकूफी नहीं तो और क्या है? बीबी क्या तुम्हारी बॉस है जो बहाना सुनकर सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ देगी?
अब चली है। चलती है तो उतनी ही मस्ती से चलती है जितने इत्मीनान से रुकती है। लगता है बन्दा आज पिटने से बच जाएगा।
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भण्डारी स्टेशन में इत्मीनान से खड़ी है #दून और बेचैनी से बैठे हैं यात्री। भीड़ नहीं है इस बोगी में। बगल के साइड लोअर बर्थ पर बैठा एक रसियन जोड़ा बेचैन है। उनका कहना है..it's not possible in Rasia. Four hours late... it's too much! चैन से बैठे हैं बनारसी। सामने बर्थ पर अखबार में लाई चना बिछाकर आराम आराम से खाए जा रहे हैं। मेरे बगल में बैठा हरिद्वार से चला अकेला आदमी भी कुछ निकाल निकाल कर खाए जा रहा है। रसियन जोड़ा आपस में नहीं बतिया रहा है, दोनों अपनी अपनी मोबाइल में जुटे हुए हैं। लड़की का ब्लू जीन बाएं घुटने से फटा हुआ है। जब वह पलेठी मार कर बैठती है तो घुटना छलक कर बाहर आ जाना चाहता है। जब वह टांगे फैलाती है तो चुपचाप सो रहता है। लड़का काली जीन और काली फुल टी शर्ट पहने है। गले में एक तुलसी की माला भी है। हरिद्वार से लिया जान पड़ता है। बनारस घूमेगा तो और भी माला पहनेगा। कोई टोपी भी पहना सकता है, कोई मामा भी बना सकता है। बनारस में बड़े बड़े विद्वान रहते हैं।
ट्रेन देर से रुकी होने से बेचैन हो लड़का प्लेटफॉर्म पर टहल कर एक पानी की बोतल कीन लाया है। अब दोनो हाथ साफ कर बिस्कुट खा रहे हैं। हम होते तो लप्प से खा लेते, ये सावधानी बरतते हैं, हाथों में लोशन लगा कर साफ़ करने के बाद ही खाते हैं।
आधे घंटे से अधिक रुकने के बाद ट्रेन फ़ाइनली चल ही दी। ट्रेन के चलने मात्र से चहकने लगे सभी यात्री। भारतीय रेल सुख देना जानती है। अब सभी के अच्छे पल आ गए, पटरी पर चल रही है ट्रेन।
सामने बैठ कर लाई चना खाने वाले खा पी कर अपने अपने धंधे में लग गए। मेरी तरह मोबाइल में कुछ कर रहे हैं। रसियन जोड़ा भी पानी पी कर अपने-अपने धंधे में लग गए। मोबाइल में कुछ कर रहे हैं। बोगी में आगे एक परिवार के बतियाने कि आवाजें आ रही हैं। उनके पास आभासी दुनियां से परे अपनी दुनियां भी है।
ताली बजाकर पैसा मांगने वाले हिजड़ों का दल आया है बोगी में। हम लोगों को पहचानता है। रसियन जोड़े के सामने देर तक ताली पीटता रहा। वे नो नो कहते रहे। ये क्यों नो नो? करते रहे। अंत में थक कर आगे बढ़ गए। विदेशी अभ्यस्त लगते हैं कि भारतीय रेल में मांगने वाले चढ़ते हैं। इनको देखते ही नो नो ही कहना है।
अभी एक स्टेशन आगे बढ़ी है ट्रेन। जफराबाद से कुछ और लोग चढ़े हैं। वे लेट ट्रेन में चढ़ पाने से खुश हैं। लेट न होती तो न मिलती। ट्रेन का लेट होना लोगों को जितना दुःख पहुंचाता है, उतने ही लोगों को खुश भी कर देता है। अब सभी मना रहे हैं कि ट्रेन तेज चले और जल्दी से बनारस पहुंचा दे।
मोबाइल और नेट वर्क ने लोगों की बेचैनी को और कम कर दिया है। शायद इसीलिए प्लेटफार्म पर फ्री वाई फाई और रंगीन टेलीविजन की व्यवस्था है कि ट्रेन की प्रतीक्षा में लोग क्रोध न करें। जैसे घरेलू समस्या से घबडा कर घर का मुखिया शराब या दूसरे नशे में खुद को झोंक कर गम कम करता है वैसे ही अफीम के नशे की तरह आभासी दुनियां में खोए लोग अपना गुस्सा, अपनी बेचैनी, अपना दर्द भुलाए रखते हैं। दुष्यंत कुमार ने शायद इसी खतरे को भांप लिखा था...
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन, आग जलनी चाहिए।

अब लोगों को क्रोध तो आता है लेकिन समाज की बुराइयों को सुधार करने के लिए नहीं। लोग किसी धार्मिक मुद्दे पर गरीबों की झोपड़ी जलाने के लिए तो एक हो सकते हैं लेकिन ट्रेन लेट होने या सड़कों के गढ्ढे पाटने के लिए आंदोलन नहीं कर सकते। अपना गुस्सा आभासी दुनियां में उतारे या फिर कोई बढ़िया मूवी देख ली बस हो गया। कॉलोनी में जा कर पड़ोसी से पूछो.. शर्मा जी कहां रहते हैं? तो जवाब मिलता है.. कौन शर्माजी? मैं नहीं जानता। जब भीतर से पत्नी चीखती है..अरे! चिंटू के पापा.. वही तो शर्मा जी हैं! तब जा कर होश आता है..ओह, अच्छा! कहने का मतलब यह कि लोग खुद से और अपने पास पड़ोस से कटे कटे रहने के आदी हो चुके हैं।
बोगी में आगे की ओर बैठे परिवार का शरारती बच्चा खूब उधम मचा रहा है। सर पर टोपी और नन्हें नन्हें पैरों में कपड़े के जूते पहन रखे हैं उसने। बार बार बर्थ पर लेटी मोटी अम्मा के पेट पर चढ़ता है और सर्र से फिसल कर फर्श पर गिर जाता है। उसको इसमें खूब मज़ा आ रहा है। अब रसियन लड़की के साथ खेल रहा है। उसे भी खूब मज़ा आ रहा है। प्रेम देश और भाषा का मोहताज नहीं होता।
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सरदार जी परेशान हैं। उनकी नीचे वाली बर्थ रिजर्व है लेकिन ऊपर वाले और मिडिल वाले भी नीचे बैठे हैं। दोनों समझा रहे हैं..
सुबह का समय है, हम कहां बैठेंगे?
तुम्हारी ऊपर की है, तुम ऊपर जाओ। तुम्हारी बीच वाली है, तुम बीच में जाओ। हमको दूर जाना है हम सो जाएंगे।
आपको सोना है तो ऊपर जा कर सो जाइए।
हम ऊपर क्यों जाएं? हमारी नीचे वाली है।
हमने समझाया सरदार जी! ऊपर वाले और बीच वाले को आप दिन में बैठने से मना नहीं कर सकते। यह नियम है।
सरदार जी को बात समझ में नहीं आ रही। वे लगातार बोलते रहे हैं और अपर, मिडिल वाले हंसते हुए बैठे हुए हैं। हम ही अपनी बोगी बदल लेते हैं।
जब बर्थ पहले से रिजर्व हो तो सफ़र में साथी कैसे मिलें यह आपकी किस्मत पर निर्भर करता है। साथी अच्छे मिलें तो सफ़र सुहाना, साथी झगड़ालू मिले तो सफ़र दुखदाई होता है। 
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28.1.18

बजट

सभी अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से बजट बनाते हैं। सरकार और व्यापारी साल भर का, आम आदमी महीने भर का और गरीब आदमी का बजट रोज बनता/बिगड़ता है। सरकारें घाटे का बजट बना कर भी विकास का घोड़ा दौड़ा सकती है लेकिन आम आदमी घाटे का बजट बनाकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है। आम आदमी को सीख दी जाती है कि जितनी चादर हो, उतना ही पैर फैलाओ लेकिन सरकारों को अधिकार होता है कि मनमर्जी पैर फैलाओ। चादर छोटी पड़े तो देश/विदेश जहां देखो वहीं चादर फैलाओ। आम आदमी दूसरों के आगे चादर फैलाते-फैलाते शर्म के मारे धरती पर गड़ने लगता है और जिस दिन चादर फट जाती है, आत्महत्या कर लेता है। गरीब के पास न आय न बजट। रोज कुआं खोदो, पानी पियो। न खोद पाओ, भूखे ही सो जाओ। गरीब माल्या बनकर, बैंक से कर्ज लेकर चादर ओढ़ते हुए विदेश नहीं भाग सकता।

बजट का आधार आय है। आय नहीं तो व्यय नहीं और बिना आय व्यय के बजट कैसा? बजट बनाने के लिए आपको मालूम होना होता है कि रुपया कहां से और कितना आएगा? तभी आप व्यय की भी सोच सकते हैं। जिसके पास आय नहीं वह क्या बजट बनाएगा? नंगा नहाएगा क्या, निचोड़ेगा क्या? पकौड़ी बेचना भी रोजगार है। पकौड़ी बेचने वाला भी बजट बनाता है लेकिन उसका बजट रोज बनता/बिगड़ता है। सरकार का बजट बिगड़ने से सरकार भूखी नहीं सोती, घाटे के बजट से काम चला लेती है लेकिन जिस दिन पकौड़ी वाले का बजट बिगड़ जाता है उसे भूखे ही सोना पड़ता है। हम अपने बच्चों के लिए उस रोजगार का ख्वाब देखते हैं जिसमें उन्हें कभी भूखा न सोना पड़े। सरकार कहती है रोजगार दे दिया न? बस! अब जियादे चूं चपड़ मत करो। जब सरकार की दलील को मीडिया समझ गई तो आम आदमी की क्या औकात है! हां जी, हां जी कहना है।

जाड़े के समय एक दिन मैंने लोहे के घर में एक आदमी को चादर ओढ़ने का प्रयास करते हुए देखा था। पैर ढकता तो मुंह खुला रह जाता, मुंह ढंकता तो पैर खुला रह जाता। जाड़ा इतना कि पैर और मुंह दोनो ढकना जरूरी। अब वह क्या करे? कब तक पैर सिकोड़ता रहे? उसने एक उपाय निकाला। जूता मोजा पहन कर, मुंह ढक कर सो गया। चादर का एक सिरा मुंह को ढके था, दूसरा मोजे तक फैला हुआ था। आम आदमी ऐसे ही बजट बनाता है।

सरकार की आय का मुख्य श्रोत तमाम प्रकार के कर होते हैं जो भिखारी से लेकर अरबपति तक को देने होते हैं। किसी से सीधे टैक्स लिया जाता है किसी से घुमाकर। जो सीधे दे ही नहीं सकता उससे घुमाकर लिया जाता है। जो सीधे दे सकता है उससे सीधे भी लिया जाता है, घुमाकर भी। हर प्रकार से वसूली के बाद सरकार के पास जनता के विकास के लिए खर्च करने की ताकत आ जाती है। अखबार में पूरा हिसाब ग्राफ देकर समझा दिया जाता है। रुपया आए कहां से? रुपया जाए तक? सब लिख्खा होता है। जो समझ में न आए वह घाटा होता है और यह घाटे की भरपाई कैसे होगी आम जनता यही नहीं समझ पाती। काश कि हम भी अपने घर में घाटे का बजट पेश कर खुश हो पाते!

सरकारें पांच साल के लिए चुनी जाती हैं इसलिए पांच बार बजट बनाती है। पहले साल उसे चुनाव की चिंता नहीं होती है इसलिए कठोर बजट बनाती है। जनता नाराज हो तो हो.. ठेंगे से! टैक्स के रूप में इत्ता वसूल लो कि पिछली सरकार ने ठीक चुनाव से पहले जो जाते जाते मुफ्त गिफ्ट वितरण और कर्ज माफी वाला मनमोहक बजट किया था और जिसके कारण गाड़ी पटरी से उतर गई थी वह संभल जाय। फिर हर साल धीरे धीरे अपनी महाजनी सूरत को मनमोहक बनाती जाती है। चुनाव के साल तो धन ऐसे लुटाती है जैसे कहीं से कोई गड़ा खजाना हाथ लग गया हो। अर्थशास्त्रियों ने चेताया तो टका सा जवाब.. सरकार में फिर चुन कर आने दो सब घाटा पहली बजट में ही पूरा कर लेंगे। मतलब वही काम करती है जो पिछली सरकार ने किया था मगर इसका अंदाज अलग होता है। नई सरकार नए अंदाज में आम आदमी की पूंछ उठाती है। जनता नई सरकार के जमाने में नए अंदाज में, पहले धीरे धीरे फिर फुग्गा फाड़कर रोती है।

देश का कोई आदमी ऐसा नहीं है जो टैक्स न देता हो। भिखारी भीख मांग कर एक किलो आंटा खरीदता है तो उस आंटे पर भी टैक्स चुका रहा होता है। मजदूर अपनी मजदूरी से आयकर दे रहा होता है। शेष बचे धन की हर खरीददारी में अप्रत्यक्ष कर दे ही रहा होता है। किसान लाभ कमाता ही नहीं तो सीधे कर कैसे देता! वह तो अन्नदाता शब्द सुनकर ही अपने सभी गम भूल जाता है। आम आदमी का काम सरकार को तमाम प्रकार के कर देकर बजट बनाने में सहयोग करना है। आम आदमी क्या बजट बनाएगा! बजट बनाना तो बड़े लोगों का काम है। 

नदी की व्यथा

जब कोई ट्रेन 
हवा से बातें करते हुए
पुल पार करती है
बहुत शोर करता है
पुल
शांत दिखती है
नदी।

आदमियों को
लोहे के घर में बैठ
बिना छुए
ऊपर ऊपर से 
यूं जाते देख
दुख तो होता होगा नदी को?
क्या जाने
कितना रोई हो
जब बन रहा था
पुल!

किसी के
चन्द सिक्के फेंक देने से
खुश हो जाती होगी?

हमारे सिक्कों का 
कर पाती प्रयोग
तो सबसे पहले
तोड़ देती
बांध
फिर तोड़ती पुल
और अंत में
अधिक क्रोध करती तो
बहा कर ले जाती
पूरा गांव।
.... देवेन्द्र पाण्डेय।

23.1.18

बसंत

ठंड की चादर ओढ़
दाहिने हाथ की अनामिका में
अदृश्य हो जाने वाले है राजकुमार की
जादुई अंगूठी पहन कर
चुपके से धरती पर आता है
बसंत
तुमको भला कैसे दिखता?

नहीं
कैलेंडर गलत थोड़ी न है
पत्रा देख कर ही हुई थी
मां शारदे की पूजा
चौराहे पर
रखी जा रही थी
होलिका
शहरों की छतों पर
पीली साड़ी पहन
सेल्फी ले रही थीं महिलाएं

तुम
रोज की तरह
परेशान हाल
थके मांदे घर आए
तुमको भला कैसे दिखता?

परेशान न हो
ठंड की चादर हटेगी
प्रहलाद के विश्वास के आगे
होलिका का घमंड
जल कर
ख़ाक हो जाएगा
अपने आप
फिसल कर गिर जाएगी
बसंत की उंगली से
जादुई अंगूठी

अभी तो
धरती की सुंदरता देख
खुद ही मगन है!
तुमको भला कैसे दिखता?
..... देवेन्द्र पाण्डेय।

20.1.18

लोकतंत्र का बसंत

काशी में मराठी भाषा का एक कथन मुहावरे की तरह प्रयोग होता रहा है.. "काशी मधे दोन पण्डित, मी अन माझा भाऊ! अनखिन सगड़े शूंठया मांसह।" जजमान को लुभाने के लिए कोई पण्डित कहता है.. काशी में दो ही पण्डित हैं, एक हम और दूसरा हमारा भाई। बाकी सभी मूर्ख मानव हैं। ऐसे ही हमारे देश के लोकतंत्र में भी दो संत पाए जाते हैं। एक अ संत दूसरा ब संत। बाकी रही विद्वान जनता जिनकी गलतियों के कारण ही दोनों संत निरंतर मोटाते रहते हैं। इसे यूं समझा जाय कि लोकतंत्र एक बड़ा सा घर है जिसमें अ संत और ब संत दो भाई रहते हैं। जहां असंत है, वहीं बसंत है। जनता जजमान की तरह कभी इनसे छली जाती है कभी उनसे।

जनता अपना काम लेकर कभी अ संत के पास जाती है कभी ब संत के पास। अ संत के पास जाने वाली जनता समझती है कि अ संत ही उसके घर में बसंत ला सकता है। ब संत के पास जाने वाली जनता समझती है कि अ संत तो इसका भाई ही है, वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा ब संत ने चाहा तो मेरे घर भी बसंत आ ही जाएगा।

भारत का लोकतंत्र एक बहुत बड़ा घर है। इसके चार बड़े बड़े खंबे हैं। ये खंबे इतने मजबूत हैं कि अ संत और ब संत के हरदम बसंत मनाने के बावजूद भी ज्यों का त्यों मजबूत बना हुए हैं। कभी कोई खंबा अ संत की कारगुज़ारियों से कराहता है, कभी कोई खंबा ब संत की कारगुज़ारियों से लेकिन मुश्किल वक़्त में बाकियों के सहारे चारों खंबे मजबूती से लोकतंत्र को टिकाए रखते हैं।

पहले हमारे देश में बहुत से संत रहते थे। कोई अ संत और ब संत नहीं था। भारत का लोकतंत्र उन्हीं संतों की तपस्या का परिणाम है। अब इसमें संत के बेटों अ संत और ब संत का राज चलता है। बारी बारी से दोनों बसंत मनाते हैं और जनता कभी इनकी जय जयकार करती है, कभी उनकी।

प्रकृति का बसंत हर साल आता है। वीरों का बसंत तब आता है जब उन्हें युद्ध के मैदान में जौहर दिखाने का अवसर मिलता है। विद्यार्थी तब बसंत मनाते हैं जब परीक्षा में पास होते हैं। लेखकों का बसंत उनकी नई पुस्तक के लोकार्पण के दिन होता है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र का बसंत पॉच साल में एक बार आता है जब देश में चुनाव होते हैं। प्रकृति का बसंत तो पतझड़ के बाद आता है मगर लोकतंत्र में पतझड़ और बसंत दोनो साथ साथ आते हैं। जो पार्टी हारती है उसके पतझड़ के दिन शुरू हो जाते हैं, जो जीत जाती है उनके पत्ते लहलहाने लगते हैं। इस प्रक्रिया को संत और असंत दोनों लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत मानते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिस देश में चुनाव ही नहीं होते उस देश का राजा तानाशाह हो सकता है लेकिन लोकतंत्र में भी हारने वाला, शासक दल को तानाशाह घोषित करवाने में लगा रहता है। लोकतंत्र के चारों खंबों पर बारी बारी से पोस्टर चस्पा किए जाते हैं.. लोकतंत्र खतरे में है!

भारत का लोकतंत्र जितना ताकतवर माना जाता है उतना ही कमजोर भी होता है। जरा सी कुछ बात हुई कि खतरे में पड़ जाता है। लोकतंत्र न हुआ भारतीयों का कमजोर अंग हो गया जो हर बात पर फटने लगता है! लोकतंत्र के खतरे में पड़ने का ज्ञान विपक्ष को ही होता है। सत्ता पक्ष तो हमेशा सुदृढ़ लोकतंत्र का ढिंढोरा ही पीटता पाया जाता है। सत्ता पक्ष लोकतंत्र का बसंतोत्सव मनाता है तो विपक्ष लोकतंत्र के पतझड़ की तरह झड़ता रहता है। लोकतंत्र के चारों खंबे जब जब अपना दुखड़ा रोते हैं, विपक्ष तपाक से उनके सुर में सुर मिलाते हुए जनता को भड़काता फिरता है.. लोकतंत्र खतरे में है! विपक्ष की आदत दूसरे के फटे में टांग अड़ाने की है और सत्ता पक्ष सूई धागा लेकर आम जनता के फटे को सीने के लिए दौड़ता भागता दिखने की कोशिश करता है।

विपक्ष का मजबूत होना अच्छे लोकतंत्र की निशानी माना जाता है। अभी भारत में विपक्ष कमजोर है शायद इसीलिए लोकतंत्र बार बार खतरे में पड़ रहा है। विपक्ष तगड़ा हुआ तो सत्ता कमजोर पड़ने लगती है। चुनाव के समय अपने दम पर सरकार बना लेने का दावा करने वाली पार्टियां गणित कमजोर पड़ने पर विपक्षी पार्टियों को तोड़ती मेल जोल करती दिखने लगती है। सरकार बनने के बाद शेष बची हुई पार्टियां विपक्ष में आ जाती हैं और आपस में मिलकर तगड़ा विपक्ष बनने का प्रयास करती हैं। बड़े दंभ से कहती हैं.. आपस में मेल जोल न होई त चली का?

आम आदमी जिसकी पहुंच रोटी, कपड़ा और मकान के आगे सुबह के अखबार/शाम के टीवी तक है वे तो 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन ही लोकतंत्र का बसंतोत्सव मना कर खुश हो लेते हैं। हम भी न अ संत हैं न ब संत। थोड़ा लिखना पढ़ना जान गए हैं। लोकतंत्र के बसंतोत्सव से दो चार फ़ूल मिल गए इसी में खुश हैं। हम भी बस यही मंगल कामना कर सकते हैं कि हमारे महान संतों की घनघोर तपस्या से जो यह लोकतंत्र की बगिया खिली है इसमें से एकाध फूल उन अभागों को भी मिले जिन्हे आजतक पतझड़ और कांटों के सिवा कुछ भी नसीब नहीं हुआ।

14.1.18

पुस्तक मेला और साहित्यकार

एक बार बलिया के पशु मेले में गए थे, एक बार दिल्ली के पुस्तक मेले में। दोनों मेले में बहुत भीड़ आई थी। जैसे पशु मेले में लोग पशु खरीदने कम, देखने अधिक आए थे वैसे ही पुस्तक मेले में भी लोग पुस्तक खरीदने कम, देखने अधिक आए थे। दर्शकों के अलावा दोनों जगह मालिकों की भीड़ थी। कहीं पशु मालिक कहीं पुस्तक मालिक। जैसे पुस्तकों के मालिक केवल लेखक नहीं, प्रकाशक भी होते हैं वैसे ही पशुओं के मालिक भी अपने अपने पशुओं को एक स्थान पर सुपुर्द किए दे रहे जो उन्हें सजा कर बेच रहा था। जैसे पशु मेले में अपना कोई पशु नहीं था वैसे ही पुस्तक मेले में भी अपनी लिखी कोई पुस्तक नहीं थी। दोनो मेले में एक ही प्रश्न देर तक मेरा पीछा करते रहे..आपकी कहां है?

आदमी अपने अनुभवों से ही कुछ सीखता है। यदि आपका थोपड़ा पशु मालिक या लेखक की तरह हो तो आप को दोनो ही मेले में नहीं जाना चाहिए। पशु मेले में जाएं तो आपके हाथ में लंबा पगहा हो और पीछे कोई दुधारू गाय लचक लचक कर चल रही हो। बिना पशु वाले किसान की पशु मेले में और बिना पुस्तक वाले लेखक की पुस्तक मेले में कोई इज्जत नहीं होती। पुस्तक मेले में तब तक न जाएं जब तक आपकी कोई पुस्तक प्रकाशित न हो चुकी हो। बिना अपनी पुस्तक लिए गए तो फिर आप दुकान-दुकान घूम कर पुस्तक खरीदते ही रह जाओगे, बेचने का सुख नहीं मिलेगा।

ईश्वर जानता है कि जो सुख ज्ञान देने में है वह लेने में कत्तई नहीं है। जेब खाली कर ज्ञान वही खरीद सकता है जिसका पेट भरा हुआ हो और घर में खजाना गड़ा हुआ हो। ज्ञान तो धीरे से चुरा लेने की चीज है। लाइब्रेरी में गए और नोट बना लिए। एक पुस्तक इशू कराए दूसरी दबा कर निकल लिए। पढ़ने लिखने वाले चेहरे से शरीफ दिखते हैं इसलिए इनकी चोरी कम पकड़ में आ पाती है। धरा भी गए तो पकड़ने वाले भी पढ़ने लिखने वाले होते हैं, जल्दी से माफी मिल जाती है। अब एक मल्लाह, दूसरे मल्लाह से क्या पार उतरवाई लेगा? लेखक बिरादरी राजनेताओं की तरह कृतघ्न थोड़ी न होती है कि मौका पाते ही विरोधियों के पीछे सी.बी.आई छोड़ दे! लेखक की चोरी पकड़ी भी गई तो भले उपेक्षा का शिकार हो जाय, सजा नहीं पाता।

पुस्तक मेले में घूमने आए लोग सभी स्टाल में जाकर सभी प्रकार की पुस्तकें ऐसे पलटते हैं जैसे सत्य की खोज में निकला फकीर ज्ञान तलाशने के लिए जंगल जंगल भटक रहा हो ! अंत में खरीदते वही दो चार पुस्तकें हैं जिनके लेखकों के नाम अपने पाठ्य पुस्तक से उन्होंने सुन रखे हैं। सब पलटने के बाद मासूमियत से पूछते हैं.. मुंशी प्रेम चंद की गबन है? दुकानदार भी आदतन उस कोने की तरफ इशारा करता है जिधर उसकी टाइप के लोग अधिक आये हैं और जहाँ अधिक भीड़ है। इस प्रश्न पर दुकानदार अधिक झल्लाते पाए जाते हैं.. दो बैलों की जोड़ी है? गनीमत है यह नहीं कहते..दो बैलों की जोड़ी लेनी हो तो पशु मेले में जाओ, यहां क्यों घूम रहे हो?

पहले लेखक बनने और एक पुस्तक छपवाने के लिए भूखे पेट रहकर किसी बड़े साहित्यकार के दरबार में वर्षों खुद को तपाना और लेखक सिद्ध करना पड़ता था। प्रतिष्ठित साहित्यकार का आशीर्वाद मिलने के बाद ही कोई प्रकाशक किसी नए लेखक की कोई पुस्तक छापने की हिम्मत जुटा पाता था। अंतर्जाल के प्रचलन और आभासी दुनियां ने इस पूरे पटल को ही बदल कर रख दिया है। सभी की डायरियां अब ब्लॉग/फेसबुक में लिखी जाने लगी हैं। जेब में पैसा हो, प्रशंसक हों तो आप सीधे प्रकाशक से बात कर सकते हैं.. कित्ता लोगे? और कित्ती दोगे? पुस्तक न बिकनी है न रायल्टी मिलनी है. यह बात आप भी जानते हैं, प्रकाशक भी। एकमुश्त सौदा तय हो जाता है। इत्ती लेंगे और प्रकाशन के बाद इत्ती पुस्तकें देंगे। आपको लेखक बन ख्याति अर्जित करनी है, अगले को प्रकाशक बन पैसा कमाना है। ख्याति और पैसे के इसी सुखद संजोग ने पाठक शून्यता के हाहाकारी जुग में भी चमत्कारिक ढ़ंग से नए लेखकों और प्रकाशकों की नई पौध का सृजन किया है। पुस्तक मेला और कुछ नहीं छुट्टे शब्दों की भीड़ है जो पशुओं की तरह अपने अपने मालिकों के साथ पुस्तक रूपी पगहे में बंधी कुछ पाने की लालसा लिए एक स्थान पर जमा होती है। इस भीड़ में कोई निराला, कोई धूमिल कोई गालिब अपने झोले में अपनी पांडुलिपी दबाए भूखे पेट, प्रकाशक-प्रकाशक घूम रहा हो तो भला उसे कौन पहचानेगा? यह दौर लेखक बन कर नाम कमाने का है तो यह दौर अच्छे लेखकों के बिना प्रकाशित हुए गुम हो जाने का भी है।

7.1.18

लोहे का घर-35

लोहे के घर में तास खेलने वालों की मंडली में एक सदस्य कम था और तीन साथियों ने मुझे खेल से जोड़ लिया। उधर कलकत्ता जा रहे बंगाली परिवार के बच्चों का झुंड शोर मचा रहा था, इधर मेरे बगल में बैठकर कनाडा से भारत दर्शन के लिए आईं एक गोरी मेम पुस्तक पढ़ रही थीं। मेरा ध्यान कभी बच्चों पर, कभी बगल में बैठी गोरी मेम पर और कभी उसके हाथ की पुस्तक पर जा रहा था। जाहिर है खेल में ध्यान न होने के कारण हम हारे जा रहे थे। यह दून एक्सप्रेस थी।

पार्टनर चीख रहा था..का गुरु ई का चलला?
मैं गोरी से बात कर रहा था... यू केम फ्रॉम देहरादून?
महिला भी मुस्कुरा कर जवाब दे रही थीं.. नो फ्रॉम हरिद्वार।
पार्टनर फिर चीखा..हार गइला! ला, फेंटा।

मैं तास फेंटते हुए महिला को टूटी फूटी अंग्रेजी में खेल के बारे में समझा रहा था.. दिस इज दहला पकड़! दहला मिंस टेन। देयर इज फ़ोर टेंस इन कार्ड। हू कैच मोर देन टू, दे विंस।

गोरी ऐसे चमक के ओ येस! हूं..कर रही थी जैसे सब समझ गई हो। फिर उसने कुछ फ्रेंच नाम गिनाए तास के खेल के। मुझे वे नाम ऊटपटांग लगे। मैंने मुस्कुरा कर कहा..नो नो आई डोंट नो। मैं सोच रहा था कि समीर भाई साहब को फोन लगा कर पूछूं कि क्या कनाडा में फ्रेंच बोली जाती है? या यह महिला फ्रांस से आई है? फिर उसकी पुस्तक के बारे में जानना चाहा। उसने पुस्तक दिखाई। वह एक फ्रेंच भाषा में लिखी महात्मा गांधी जी के दक्षिणी अफ्रीका के संघर्ष के बारे में पहला गिरमिटिया टाइप कोई पुस्तक थी। शायद महिला भारत भ्रमण के दौरान गांधी जी को पढ़कर भारत के बारे में जानने का प्रयास कर रही थी।

हम दूसरा गेम भी हार गए। मेरा पार्टनर मुंह बना रहा था और विरोधी मस्त हो रहे थे।

अकेली महिला बनारस जा रही थी, जहां उसके मित्र उसका इंतज़ार कर रहे थे। मैंने महिला को बनारस के घाटों, सारनाथ के बारे में जानकारी दी और सूर्योदय के समय नाव में घूमने की सलाह भी दी। वह मेरी बात समझ भी रही थी या खाली-पीली मुस्कुरा कर हां हूं कर रही थी यह तो वही जाने लेकिन हम लगातार हारे जा रहे थे। जब अपने ऊपर कोट चढ़ता तो हम प्रसन्न होते कि चलो अब पार्टनर पीसेगा और हमें केवल पत्ते फेंकने पड़ेंगे!

यह बहुत देर नहीं चलना था और नहीं चला। खेल बन्द हुआ और हमने महिला को पुस्तक पढ़ने की सलाह देते हुए अपनी मोबाइल निकाल ही ली। जैसे ही बनारस का आउटर आया कौन, मित्र कौन गोरी! ट्रेन को कोमा में छोड़ हमने घर जाने के लिए ११ नंबर की बस पकड़ ली।

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जाड़े में अदरक का क्रेज भांप कर लोहे के घर में वेंडर आवाज लगाते हैं..चाय बोलिए चाय, अदरक वाली चाय। पता नहीं कैसी होती है लेकिन एक बात तो पक्की है कि दूध, चायपत्ती चाहे जैसी हो, अदरक जरूर होती होगी चाय में।

अपनी फोट्टी की प्रतीक्षा में कोहरे में डूबे कैंट प्लेटफार्म पर खड़े खड़े कुछ मजेदार एनाउंसमेंट सुनाई पड़ रहे थे। फिफ्टी डाउन के प्लेटफॉर्म नंबर ६ पर आने का संकेत हो चुका है, यात्री गण ध्यान दें यह गाड़ी १ जनवरी की है! अब एक बार यह गाड़ी १ जनवरी की बताने के बाद टेप चालू हो गया। फिफ्टी डाउन के आने का संकेत हो चुका है, यह गाड़ी प्लेटफॉर्म नंबर....। अब १ जनवरी नहीं बोल रहा। जिसने सुना उसका भला, जिसने नहीं सुना, उसकी किस्मत। ट्रेन में दोनों नंबर लिखे होते हैं। २०४९ के समय २०५० आ जाए तो हड़बड़ी में लोग बिना इंजन देखे एक के बदले दूसरे में बैठे भी पाए जाते हैं। ऐसे लेट लतीफी के मौसम में एक एनाउंसमेंट यह भी होना चाहिए कि यात्री दिशा का ज्ञान रखें कि उन्हें किधर जाना है और इंजन का रुख किस ओर है! ऐसी एक दो ट्रेनें और आईं जो १ जनवरी की थी। शुक्र है कोई पिछले साल की नहीं थी। हमने यह नहीं सुना कि यह गाड़ी पिछले साल की है।

खैर अपनी फोट्टी आई, सभी यात्री उतर गए, सभी रोज के यात्री इत्मीनान से बैठ गए तब ध्यान आया कि एक भारी सूटकेस तो नीचे पड़ा हुआ है! शोर हुआ..यह किसका है? कौन इतना बड़ा बैग लेकर जौनपुर जा रहा है? पता चला किसी का नहीं है! हम में से एक दौड़ कर बाहर गया और चिल्ला कर पूछने लगा..किसी का बैग छूटा है? ट्रेन छूटने वाली थी तभी एक यात्री भागा भागा आया….मेरा एक सूटकेस छूटा है। सूटकेस उतार कर उसने इतनी बार थैंक्यू बोला कि क्या कहा जाय! अपनी आत्मा भी संतुष्ट हुई।

पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी और दिख रहे हैं कोहरे मे डूबे सरसों के खेत। कथरी ओढ़ कर बैठी एक काली गाय आराम आराम से मुंह चला रही दिखी थी अभी। लोहे के घर में बैठे यात्री भी मुंह चला रहे हैं लेकिन ये बतिया रहे हैं वो खाना पचा रही थी। कड़ाकी ठंड में खिड़की खोल कर फोटू खींचना संभव नहीं है। हम इच्छा भी करें तो दूसरे चीखने लगते हैं... तोहें फोटू खींचे के होय त दरवज्जे पे चल जा! नहीं त बइठ जा लोहे के घर के छत पर!!!

जलालपुर का पुल थरथराया है। कोहरे की चादर ओढ़ इत्मीनान से सोई है सई नदी।
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ठंड के थपेड़े कह रहे हैं..आज तो मैं और मैं ही हूं। स्टेशन के बाहर कुछ लोग सूखी लकड़ियां जलाने का प्रयास कर रहे थे। आग जली तो लपटें ऊपर तक उठने लगीं। आग देख भीड़ जुटने लगी। देखते ही देखते अच्छी खासी भीड़ आग के पास गोलाकार खड़ी हो गई। ऊपर आकाश में पीला चांद और नीचे आग की लपटें। ठंडी हवा दुम दबाकर भाग खड़ी हुई। जब तक #ट्रेन नहीं आ गई हम उसी भीड़ में खड़े कभी आग की लपटों को, कभी चांद को देखते रहे।
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स्टेशन के बाहर अलाव जलाने की व्यवस्था है। सूखी लकड़ियां गिरा कर चली जाती है नगर पालिका। पहले आग तापते हुए लोगों को देखकर लगता था..क्या फालतू वक़्त जाया कर रहे हैं लोग! लेकिन ट्रेन की प्रतीक्षा में आग प्राण दायिनी है। जैसे ही उठती हैं लपटें आग के इर्द गिर्द गोलाकार जमा हो जाती है भीड़। भीड़ में शामिल रहते हैं ट्रेन की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म पर जमे यात्री, सवारी की प्रतीक्षा में खड़े ऑटो ड्राइवर, रिक्शे वाले और भी आस पास खाली बैठे गुमटी/ठेले वाले। खड़े खड़े लोग आपस में बतीयाते भी हैं।
कब तक जलती है आग?
पूरी रात!
रात में तो भीड़ नहीं होती होगी?
रात में तो और भीड़ रहती है। कोई प्लेटफार्म पर थोड़ी न बैठता है, सब यहीं जमा हो जाते हैं।

बीच बीच में अपने स्तर का हल्का फुल्का मजाक करते प्रसन्नता से आग तापते हैं सभी। किसी ट्रेन के आने का संकेत होता है, कुछ भीड़ छटती है। थोड़ी ही देर में नई ट्रेन का समय होता है, नई भीड़ जुड़ती है। मरुधर के आने का समय हुआ, हम भी चढ़ गए लोहे के घर में।
ख़ाली ख़ाली है इस ट्रेन की भी बोगियां। जोधपुर से चलकर बनारस जाने वाली ट्रेन है। पीछे से किसी यात्री के बड़बड़ाने की आवाज सुनाई पड़ रही है...१२ घंटे लेट हो गई! अब कर लो बात। इस कोहरे में पहुंच रहे हैं, यही क्या कम है? लेट न होती तो हम क्या करते? इन्हीं लेट ट्रेनों का ही तो सहारा है। शुक्र है भगवान का कि इस जाड़े में अपनी वाली के साथ सभी की लेट चलती है। घर से एक यात्री के भागवान का फोन आ रहा है। कितनी मासूमियत से दिलासा दे रहे हैं कि अब पहुंचने ही वाले हैं! ये सोच रहे हैं कि घर में इनकी चिंता हो रही है। जबकी रजाई में दुबकी महिला की चिंता यह होगी कि मुसीबत कब घर आने वाली है! खैर! जिस भाव से भी हो, चिंता तो है। शुभ शुभ, अच्छा अच्छा सोचना चाहिए। नकारात्मक सोच से तो सफ़र और भी दुश्वार लगने लगता है।
ट्रेन की रफ्तार धीमी है। आराम आराम से रुक रुक कर चल रही है। यात्रियों को चाहे जितनी जल्दी हो, अपनी पटरी नहीं छोड़ती ट्रेन। सिगनल और नियम कानून का पूरा ध्यान रखती है। जरा सी चूक हुई नहीं कि लोहे के घर से भगवान के घर जाने में देर नहीं होगी। बड़ा विशाल और बहुत कठिन लगता है रेलवे का परिचालन। बैठे बैठे हम चाहे जितनी आलोचना कर लें लेकिन इनकी समस्या और इनकी कठिनाइयां तो ये ही बेहतर समझ सकते हैं।
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लोहे के घर में एक गोल मटोल सुमुखी मोहतरमा फोन से बातें कर रही हैं। स्वेटर शाल से पूरा बदन ढका हुआ लेकिन मुखड़ा पूनम के चांद-सा खुला-खुला। बातों से पता चल रहा है कि यह अपने ससुराल जा रही हैं। खूब बातूनी लगती हैं। साथ में एक सहयोगी है। काम करने वाली लगती है जिसे यह बहन बता रही हैं। फोन में किसी को बता रही हैं...अम्मी खाना बनाकर टिफिन में दी है। सास दुष्ट है जो बार बार मायके भगा देती है। कहती है… अपने पति को भी लेकर जा, भाग यहां से!
तब आप फिर भी अकेली ससुराल जा रही हैं! डर नहीं लगता?
नहीं, अब तो कोर्ट से आदेश हो गया है ना। रहने के लिए घर में एक कमरा और दस हजार रुपया हर महीने देने का आदेश हो गया है। अब नहीं भगा सकतीं।
पति तो आप के साथ हैं न! फिर क्या चिंता?
नहींss अभी सास ने भड़का कर अपने साथ मिला लिया है ।
इतने गंभीर विषय पर साथ बैठे एक रोज के यात्री से खूब हंस-हंस कर बातें कर रही हैं!
अब कितने दिनों के लिए बनारस जा रही हैं?
अब अपने मर्जी के मालिक हो चुके हैं, जब चाहे जाओ/आओ। मेरी सास और खाला बहुत परेशान करती थीं। इसीलिए कोर्ट जाना पड़ा।
अब आप क्या चाहती हैं?
हर लड़की सुकून चाहती है। लड़ाई झगड़ा कोई नहीं चाहता। सास और खाला हर वक्त परेशान करती थीं और घर से भगा देती थीं।
मित्र को खूब मज़ा आ रहा है बातें करने में..
तीन तलाक पर आपकी क्या राय है?
अच्छा है। एक जगह से पास हुआ है, एक से नहीं। जब दोनों जगह से पास होगा तब न कानून बनेगा? पास हो जाएगा एक दिन। ऐसे खाविंद को सजा मिलनी ही चाहिए। आखिर लड़की घर मां/बाप छोड़ कर आती है। उसके साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।
इतनी परेशानियों के बाद भी आप खूब स्वस्थ हैं!
मोहतरमा खुल कर हंसते हुए बोलीं...अरे! हम मोटी नहीं है। खून कम होने से शरीर फ़ूल गया है।
मुझसे रहा नहीं गया, बोल ही पड़ा..अरे! अापको मोटी किसने कहा?
हंसते और हाथ से इशारा करते हुए..भाई साहब ने। मैं खूब समझती हूं। जो भी मुझे देखता है मोटी समझता है लेकिन मैं मोटी नहीं हूं, खून कम होने से शरीर फ़ूल गया है। शादी से पहले खूब पतली दुबली थी। वैसे आप लोग कहां जा रहे?
मैं फिर बोल पड़ा...हम आपके ससुराल वाले हैं।
मोहतरमा हंसते हुए कहने लगीं...तब आप लोग हमारी किसी बात का बुरा मत मानिएगा। हमको बोलने की आदत है।
नहीं, नहीं बुरा क्या मानना! हम लोगों का आज का सफ़र आपकी बातों से ही कट गया।
शाम का समय, लोहे के घर की खिड़कियों से सुर सुर सुर सुर आती कटीली हवा और अजनबी महिला की रोचक बातें। इस महिला के कारण ससुराल वालों का जीना हराम है या ससुराल वालों ने इसका जीना हराम कर रखा है यह तो ऊपर वाला ही बेहतर जानता होगा मगर एक बात तो तय है कि लड़की को ससुराल में प्यार और सम्मान मिले तो वो बिला वजह मुसीबत क्यों मोल लेगी? सुख से रहना कौन नहीं चाहता? और अकेली महिला के लिए पहले तो गुजारा भत्ता की लड़ाई जीतना कठिन है फिर जीतने के बाद गुजारा भत्ता और उसी घर में एक कमरा लेकर रह पाना हैरतअंगेज करने वाला साहस है। यह सबके वश की बात तो नहीं लगती।
पुराने सामाजिक गठबंधन तेजी से टूटते प्रतीत हो रहे हैैं। कोई किसी की अधीनता स्वीकार करना नहीं चाहता मगर दोनों एक दूसरे को गुलाम बनाए रखना भी चाहते हैं। अब नारी किसी हालत में पराधीनता स्वीकार नहीं करना चाहती, अब पुरुष भी सहमा-सहमा सा दिखता है।
ये वैवाहिक संबंध एक ऐसी अबूझ पहेली है जिसे समझ लेने का दावा हर कोई करता दिखता है मगर समझ कोई नहीं पाता। इसमें कोई एक फार्मूला लागू ही नहीं हो सकता। हर जोड़े के अपने अपने नगमें, अपने अपने पेंच - ओ - खम हैं। कभी- कभी तो शतरंज के खेल से प्रतीत होते हैं वैवाहिक संबंध! जिसमें खेल तो शतरंज का ही चल रहा होता है मगर हर खेल दूसरे से जुदा, हर चाल नई होती है। जैसे शुरुआती चालों के बाद दो खेल कभी एक से नहीं खेले गए वैसे ही सुहागरात तो सबने मनाए लेकिन लिखने वाले ने सभी की कहानियां अलग-अलग लिख दीं!