21.9.19

लोहे का घर-57

पहले सुबह होती थी, शाम होती थी, अब लोहे के घर में, पूरी रात होती है। वे दिन, रोज वाले थे। ये रातें, साप्ताहिक हैं। बनारस से जौनपुर की तुलना में, बनारस से लखनऊ की दूरी लंबी है। रोज आना जाना सम्भव नहीं है। ये रास्ते सुबह/शाम नहीं, पूरी रात निगल जाते हैं और उफ्फ तक नहीं करते!

लखनऊ छपरा एक्सप्रेस है। लखनऊ से रात 9 के आसपास चलती है और सुबह 6 के बाद पहुंचाती है। छः घण्टे का सफर 9 घण्टे में पूरा करती है। इतना मार्जिन समय है कि लगभग समय से चलती और समय पर ही पहुंचाती है। पटरियों की खटर पटर का शोर, एक्सप्रेस ट्रेन की तरह तेज नहीं सुनाई पड़ता। झूला झुलाते, रुकते-रुकाते, आराम-आराम से चलती है यह ट्रेन।

अच्छा है। जितने समय में पहुंचा सको, पब्लिक को उतना ही समय बताओ। ये क्या कि बताया पाँच घण्टा और पहुँचाया 9 घण्टे में। इस ट्रेन के लिए रेलवे की यह इमानदारी,
काबिलेतारीफ है। 6 घण्टे के सफर को 9 घण्टा बताती है और 9 घण्टे में पहुँचा भी देती है। सोते-सोते सफर कट जाय तो इससे बड़ा भाग्य और कहाँ! इसीलिए मैं इस ट्रेन से आना/जाना पसंद करता हूँ। सोना ही तो है, घर में सोओ या लोहे के घर में। 

स्लीपर बोगी है। साप्ताहिक यात्रा में ए.सी. बोगी अधिक खर्चीली है। अभी मौसम अनुकूल है, अधिक गर्मी/सर्दी हुई तो देखा जाएगा। वैसे आप इसे मध्यम वर्गीय कृपण सोच कहने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन जितना सहन हो सके उतना मौसम के साथ रहना, हर दृष्टि से अच्छा है। 

जहाँ लाभ है वहीं, स्लीपर में चलने के नुकसान भी हैं। स्लीपर में ही चलने का परिणाम था कि एक दिन, पाण्डे जी का दाहिने पैर का चप्पल गुम हो गया था और बाएँ पैर के चप्पल को पहने, लंगड़ाते-लंगड़ाते घर पहुँचे थे। इस उम्मीद में कि आते/जाते कभी दाएँ पैर का चप्पल किसी पटरी के किनारे पड़ा मिल गया तो उठाकर ले आएंगे और बाएँ पैर के चप्पल के बगल में रखकर उससे बोलेंगे..लो! अब जोड़े से रहो, खुश रहो, मस्त रहो। हाय! बाएँ पैर का चप्पल आज भी अपने साथी की प्रतीक्षा कर रहा है। ए. सी. बोगी में, स्लीपर बोगी की तरह, छोटे स्तर की चोरियाँ नहीं होतीं, वहाँ अक्सर ऊँचे लोग ही सफर कर पाते हैं!

ऊँचे लोगों की बात चली तो बाबाओं की याद हो आई। आजकल बाबाओं की चर्चा फिर सुर्खियों में है। ये बाबा बड़े कृपालू होते हैं। अपनी ख्याति बनाए रखने के लिए समय-समय पर अपना डंडा/झण्डा गाड़ कर, फहरा ही देते हैं। बाबा के पकड़े जाने की खबर सुनकर मैने अपने एक ब्राह्मण मित्र से कहा..क्या बाबा! यह क्या हो रहा है? (इधर पूर्वान्चल में ब्राह्मणों को बाबा कहने का चलन है।) मित्र नाराज हो कर बोले..जेतना धरइले हौउवन ओहमें केहू बाबा ना हौ, सब नकली बाबा हैं। 

ट्रेन आराम-आराम से चल रही है। अगल बगल के लोग अपने विद्वता का खजाना चुक जाने के बाद, अपने-अपने सिंगल बर्थ में लेट चुके हैं। बोगी में बाथरूम/दरवाजे के पास का एक बल्ब जल रहा है, शेष पूरी बोगी के बल्ब बुझाए जा चुके हैं। थोड़ी देर पहले दो सुरक्षाकर्मी तहकीकात करते हुए गुजरे थे। उनको इस प्रकार सचेत होकर ड्यूटी करते देख मन प्रसन्न हो गया। सरकार को मध्यमवर्गीय बोगियाँ के यात्रियों की भी चिंता है। इससे यह उम्मीद जग गयी कि यह चिंता एक दिन जनरल बोगी तक भी पहुँचेगी। भले अपने पालतू कुत्ते, बकरियों या सायकिल के साथ हों, आखिर जनरल बोगी में भी  मनुष्य ही सफर करते हैं। वे भी इसी देश के प्राणी हैं। यह देश उनका भी है।

यात्रा में एक और मजेदार घटना घटी। रात के बारह बजे के बाद जब हम सो गए तो एक झगड़े के शोर से नींद टूट गई। ट्रेन अयोध्या में रुकी हुई थी। यहाँ से चार यात्री चढ़े थे। यात्रियों में एक महिला, दो प्रौढ़ और एक युवा था। युवक ने बाल मुड़ा रखा था और सफेद धोती/कुर्ता पहने था। सीधे सादे, ब्राह्मण परिवार के दिखने वाले ये लोग मेरे लोअर बर्थ के ऊपर 'अपर बर्थ' वाले यात्री से झगड़ रहे थे...यह मेरी बर्थ है, उठो! ऊपर सोया यात्री चार लोगों द्वारा अचानक कोचे जाने पर बेहद घबराया/झल्लाया हुआ था... नहीं, यह मेरी ही बर्थ है। यह देखो, टिकट! S4 59. मेरा टिकट भी देखो..S4, 59,60,61,62। झगड़ा बढ़ता जा रहा था। 

दोनो पार्टी एक ही बर्थ के लिए झगड़ रही थीं, दोनो का दावा था कि यह बर्थ मेरी है! दोनो टिकट होने का दावा भी कर रहे थे!!! रेलवे से ऐसी गलती कभी हो ही नहीं सकती कि एक ही बर्थ के दो कन्फर्म बर्थ रिजर्व कर दे! पहले तो झगड़ा सुनता रहा, फिर झल्ला कर बोला..आप लोग शांत हो जाइए, ऐसा हो ही नहीं सकता, अपना- टिकट दिखाइए! दोनो के पास वाकई इसी ट्रेन नम्बर, इसी कोच और इसी बर्थ का टिकट था! यह कैसे सम्भव है? अपनी बुद्धि भी एक पल के लिए चकराई फिर PNR NO. चेक करने लगा।

उफ्फ! मौके पर नेट भी काम नहीं करता। मैं बोला..ऐसा हो नहीं सकता, नेट काम नहीं कर रहा नहीं तो मैं बता देता कि यह किसका बर्थ है आप लोग टी. टी. को बोलाइये, आपस में मत झगड़िए, टी.टी. के पास चार्ट होता है, बात साफ हो जाएगी। इतने में सुरक्षाकर्मी टी.टी. को ले आया।

टी.टी. चार्ट देखकर बताया कि यह बर्थ उसी यात्री की है जो पहले से सो रहा था। उसे बर्थ दिलाकर टी.टी. ने अयोध्या से चढ़े यात्री से पूछा..आप ने कोई टिकट कैंसिल कराया है?  युवा बोला..हाँ, कराया है, लेकिन मेरा 6 बर्थ था, दो कैंसिल कराया, चार तो होनी चाहिए न? उसने झोले से और टिकट निकाला। टी.टी. ने समझाया..वो वाली बर्थ कैंसिल हुई है, जिसके लिए आप झगड़ रहे थे। आपकी ये , ये, ये और ये वाली चार बर्थ है। जाइए! अपनी बर्थ पर सोइये। 

मामला हल होने पर सभी यात्री हँसने लगे और फिर बाद का सफर आराम से कट गया। 

15.9.19

बारिश

आज बादल घिर रहे हैं
खूब  बारिश हो रही है
शाम तक सूखा था मौसम
रात बारिश हो रही है।

एक घर था हमारा
गङ्गा किनारे, संकरी गलियाँ
तल का कमरा राम जी का
मध्य में माता पिता थे
छत में था एक कमरा
जिसमें रहते पाँच भाई
और इक छोटी बहन भी
जब भी होती तेज बारिश
काँपता था दिल सभी का
ज्यों टपकता छत से पानी
खींच लेते आगे चौकी
बौछार आती खिड़कियों से
खींच लेते पीछे चौकी
तेज होती और बारिश
छत टपकता बीच से भी
अब कहाँ जाते बताओ?
इधर जाते, उधर जाते
भीगकर पुस्तक बचाते

फिर ये बादल घिर रहे हैं
खूब  बारिश हो रही है
शाम तक सूखा था मौसम
रात बारिश हो रही है।

है यहाँ लाचार बारिश
मजबूत है अपना ठिकाना
वातानुकूलित कोठरी है
है असम्भव छू के जाना

मन मगर बेचैन मेरा
घिर रहा यादों का डेरा
तेज होती और बारिश
याद आता घर वो मेरा

हम नहीं रहते वहाँ पर
घर मगर वैसे बहुत हैं
निश्चिंत हैं हम बारिशों से
काँपने वाले बहुत हैं

काश!सबके पक्के घर हों
काश सब खुशियाँ मनाएँ
घिर के आए जब बदरिया
नाचें, कूदें, झूमें, गाएँ।

आज बादल घिर रहे हैं
खूब  बारिश हो रही है
शाम तक सूखा था मौसम
रात बारिश हो रही है।
...........................


10.9.19

अधिकार और कर्तव्य

सरकारी नौकरों को
काम के बदले
वेतन दिया जाता है
लेकिन वे
इससे संतुष्ट नहीं होते
अधिकार ढूँढते हैं!
जबकि
उनके हिस्से की
कानूनी वसीयत में,
अधिकार शब्द
होता ही नहीं,
दायित्व होता है।

कुछ तो
बड़े खुशफहमी में जीते हैं
दायित्व को,
अधिकार की शराब में
घोलकर पीते हैं।

ज्यों-ज्यों
दायित्व बढ़ता जाता है
त्यों-त्यों
अधिकार का नशा
चढ़ता जाता है।

सरकारी दफ्तर के
चतुर्थ श्रेणी महोदय भी
जब अपने सारे अधिकार जता कर
तृप्त हो जाते हैं
तभी फरियादी की मुलाकात
बड़े साहब से
करवाते हैं।

बड़े साहब मतलब
बड़े अधिकारी
जब वे
अपने सारे अधिकार आजमा कर
असहाय हो जाते हैं
तभी कृपा कर
फरियाद को पँख लगाते हैं
सुनहरी कलम से
प्रार्थना पत्र पर
अपनी 'चिड़िया' बिठाते हैं।

साहब की चिड़िया
बैठते ही
फरियाद को पँख लग जाता है,
उड़ने लगता है!
उड़ते-उड़ते
बड़े बाबू के टेबल पर जाकर
बैठ जाता है।

बड़े बाबू भी
कर्तव्य को अधिकार समझते हैं
अपनी चिड़िया बिठाने से पहले
फरियादी का
इन्तजार करते हैं!

धीरे-धीरे
पूरा दफ्तर
जब अपने-अपने हिस्से के
अधिकार के नशे का
सेवन कर लेता है
तब जाकर
फरियादी को
(हौसला शेष रहा तो)
अपना अधिकार
मिल पाता है।

अधिकार का नशा
शराब से खतरनाक होता है
शराब तो
पीने वाले को ही नुकसान पहुंचाती है
लेकिन अधिकार
कभी-कभी
फरियादी को भी
मौत के घाट उतार देता है।

अधिकार के नशे की लत
बड़ी भयानक होती है
उतरती तभी है
जब
उम्र निकल जाती है
या नौकरी
छूट जाती है।

दायित्व से
जान पहचान हो,
दोस्ती हो,
तो कुर्सी से उतरने के बाद भी
व्यक्ति
अकेला नहीं होता
उसके पास
असंख्य
तृप्त फरियादियों की
दुआएँ होती हैं
जमीन पर पैदल चलता है
तो भी लोग
झुककर
दुआ-सलाम करते हैं
राम-राम करते हैं
पीठ पीछे
चर्चा आम करते हैं..
बड़ा अच्छा अधिकारी था।
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18.8.19

लोहे का घर-56

पाण्डे जी का चप्पल
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जैसे सभी के पास होता है, ट्रेन में चढ़ने समय पाण्डे जी के पास भी एक जोड़ी चप्पल था। चढ़े तो अपनी बर्थ पर किसी को सोया देख, प्रेम से पूछे.…भाई साहब! क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ? वह शख्स पाण्डे जी की तरह शरीफ नहीं था। हाथ नचाते हुए, मुँह घुमाकर बोला...यहाँ जगह नहीं है, आगे बढ़ो! अब पाण्डे जी को भी गुस्सा आ गया और जोर से बोले..यह मेरी बर्थ है। अब वह आदमी एकदम से सीरियस हो गया! समझ गया कि मुसीबत आ गई है। थोड़ा सिकुड़ते हुए बोला..बैठ जाइए। एक तो रात साढ़े ग्यारह बजे आने वाली ट्रेन तीन घण्टे लेट, रात ढाई बजे आई उप्पर से यह आदमी! पाण्डे जी और जोर से बोले...पहले आप पूरी तरह से उठ जाइए और कोई दूसरी खाली जगह तलाशिए। शोर सुनकर दूसरे यात्रियों की  नींद डिस्टर्ब हो रही थी। तरह-तरह की आवाजें आने लगीं..

अरे भाई साहब! जब यह आपकी बर्थ नहीं है तो उठ क्यों नहीं जाते?, अजीब आदमी है! शराफत से बोलो तो कोई समझता ही नहीं! आदि आदि।

परिस्थियाँ अपने प्रतिकूल पा कर वह आदमी खिसियाते/ बड़बड़ाते हुए उठा..अब साठ किमी बाकी था, लीजिए अपनी सीट, हम खड़े-खड़े चले जाएंगे। पाण्डे जी भी बड़बड़ाये... बड़ी कृपा है आपकी जो इतनी जल्दी समझ गए। सहयात्री भी बड़बड़ाए..अब सो जाइए आप भी, हमको भी सोने दीजिए।
घण्टों प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की प्रतीक्षा से थके मादे पाण्डेजी को जैसे ही बर्थ मिली, झोला बगल में दबा कर, गहरी नींद सो गए।

सुबह उठकर जब बाथरूम जाने के लिए चप्पल ढूँढने लगे तो चप्पल गायब! वह यात्री भी नहीं दिखा जिससे झड़प हुई थी। इधर-उधर निगाहें दौड़ाई तो देखा, 4,5 बर्थ आगे बाएँ पैर का चप्पल अकेले बिसुक रहा है! विश्वास जगा, एक है तो दूसरा कहाँ जाएगा!!! एक चप्पल कोई पहन कर थोड़ी न ले जाएगा, भूल से पहनकर चला गया हो तो भी उसका तो होगा, कम से कम नङ्गे पाँव घर तो नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन हाय! पाण्डेजी पूरी बोगी क्या, अगल बगल की सभी बोगियाँ छान आये, दाहिने पैर के चप्पल को नहीं मिलना था, नहीं मिला। कूड़े बीनने वाले किशोर को भी प्रलोभन दिया...मेरा एक चप्पल नहीं मिल रहा, ढूँढ दो तो तुम्हें ईनाम देंगे। लड़के ने बाएँ पैर के चप्पल को गौर से देखा और खून जलाया..ई त एकदम नया लगत हौ! फिर बिजली की फुर्ती से कोना-कोना ढूँढा और दस मिनट में अपना फैसला सुना दिया...चप्पल ट्रेन में नहीं है, किसी ने जानबूझ कर बाहर फेंक दिया है।

लोहे का घर-55

क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ?
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न जाने कौन टेसन उतरेगा, बनारस से चढ़ा, पैसिंजर ट्रेन के बाथरूम में घुस कर, सफर कर रहा देसी कुत्ता! सौ/दो सौ किमी की यात्रा के बाद जब वह उतरेगा ट्रेन से तो उस पर कितना भौंकेंगे अनजान शहर के कुत्ते! क्या जी पायेगा चैन से? क्या हो जाएगी वहाँ के कुत्तों से दोस्ती? क्या मान लेंगे वे इसे अपना साथी? और क्या लौट कर देख पायेगा कभी अपनी जन्म भूमि? कैसे पहचानेगा वह, कौन सी है, बनारस जाने वाली ट्रेन?

मन में, ढेर सारे प्रश्न लेकर, देर तक देखता रहा मैं उसको। उतारना चाहा तो भौंकने लगा! जैसे पूछ रहा हो..तुम क्या सही ट्रेन में बैठे हो? 

अब मैं वाकई सोच रहा हूँ..क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ? अपने हक की रोटी के लिए क्या मुझे कभी नहीं करना पड़ा संघर्ष? क्या कोई, कभी, मुझे काटने नहीं दौड़ा? क्या इस ट्रेन में चढ़ने से पहले मेरे पास कई विकल्प थे? क्या मैं खूब सोच समझ कर चढ़ा हूँ इस ट्रेन में या जो ट्रेन मिली, उसी पर चढ़ गया? क्या मुझे अपनी मंजिल का ज्ञान है? क्या बहुत बड़ा फर्क है उस कुत्ते में और मुझ में? या सिर्फ इतना कि वह कुत्ता है इसलिए पैसिंजर ट्रेन के बाथरूम में, बिना टिकट , सफर कर रहा है और मैं मनुष्य हूँ, इसलिए टिकट कटा कर सीट पर बैठा हूँ। वह गलत दिसा में जा रहा है तो क्या मेरा मार्ग सही है? मैने उसे सही रास्ता दिखाने का प्रयास किया तो वह मुझ पर भौंका! क्या कोई मुझे सही राह दिखाता है तो मैं चुपचाप मान लेता हूँ? क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ?

14.7.19

न बिकने वाले घोड़े

वह अस्तबल नहीं, देश का जाना माना, एक प्राइवेट प्रशिक्षण संस्थान था जहाँ देश भर से घोड़े उच्च शिक्षा के लिए आते। संस्थान में कई घोड़े थे। मालिक चाहता कि सभी घोड़े और तेज दौड़ें. और तेज..और तेज। इस 'और' की हवस को पाने के लिए वह अनजाने में ही घोड़ों के प्रति क्रूर होता चला गया। धीरे-धीरे घोड़े भी मालिक के स्वभाव से अभ्यस्त हो गये। दौड़ने का उत्साह जाता रहा।  प्रभु से प्रार्थना करने लगे कि हे प्रभु! कोई सौदागर भेज दे तो इस मालिक से जान बचे। मालिक भी सोचने लगा कि घोड़े अच्छे दामों में बिकें तो संस्थान का और नाम हो, अगले साल सीजन में, और अच्छे घोड़े मिलें, और कमाई हो।

प्रशिक्षण की अवधी समाप्त होने से पहले ही संस्थान में व्यापारी आने लगे। मालिक घोड़ों की पीठ थपथपाता और व्यापारियों से अपने घोड़ों की खूब तारीफ करता मगर सौदागर बार-बार यही कहता---मुझे घोड़े तो दिखाओ! तुमने तो इस अस्तबल में गधे पाल रखे हैं!!!

व्यौपारी, खूब जांच परख कर, घुड़दौड़ के बाद, चैम्पियन घोड़ों पर, गधे का दाम लगाते। घोड़े सोचते..बच्चू! चलो ठीक है, आज तुम्हारी बारी है, कल जब हम बड़े रेस में दौड़ेंगे तो कोई और व्यापारी मिलेगा जो हमारी सही कीमत समझेगा। जो घोड़े बिक जाते वे कुलाँचे भरते हुए पार्टी करते, जो नहीं बिक पाते मायूस हो जाते। न बिकने वाले घोड़े सोचते.. घर वालों ने हमारी पढ़ाई में सब कुछ दांव पर लगा दिया, अब घर किस मुँह से जांय? घर वाले भी कहते..और प्रयास करो, सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी। 

देश में बढ़ रही हैं कम्पनियाँ, बढ़ रहे हैं प्रशिक्षण संस्थान और बढ़ रहे हैं न बिकने वाले घोड़े। घोड़ों पर दाम लगाने की जिन पर जिम्मेदारी है वे सदियों से यही समझ रहे हैं कि देश में व्यापार बढ़ रहा है। देश हमारे भाषणों से खूब तरक्की कर रहा है।

न बिकने वाले घोड़े, गले में प्रशिक्षण प्राप्त होने का पट्टा बांधे, शहर-शहर, सड़क-सड़क, मारे-मारे फिरते हैं। हर वर्ष बढ़ रही है इनकी संख्या। मुझे डर है कि ऐसे ही बढ़ती रही इनकी संख्या तो एक दिन ये जान जाएंगे कि हम गधे या घोड़े नहीं हैं। हम भी व्यौपारियों की तरह, प्रशिक्षकों की तरह, अधिकारियों की तरह, नेताओं की तरह एक आम इंसान हैं और हमें भी, भर पेट रोटी खा कर, जीने का अधिकार है। जिस दिन जान जाएंगे वे दरवाजे तोड़ कर घुसेंगे जरूर..व्यापारियों के घरों में, जिम्मेदारों के सदन में और अगर संतुलन अधिक गड़बड़ाया तो हमारे/आपके घरों में भी। 

12.7.19

लोहे का घर-54

ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। उस प्लेटफॉर्म पर रुकी थी जहाँ उसे नहीं रुकना चाहिए। ऐसे रुकी थी जैसे पढ़ाई पूरी करने के बाद, नौकरी की तलाश में, अनचाहे प्लेटफार्म पर, कोई युवा रुक जाता है। ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। मैं बाहर उतरकर देखने लगा..माजरा क्या है? कब होगा हरा सिगनल?

मेरे इस प्रश्न का  उत्तर किसी के पास नहीं था। अनिर्धारित प्लेटफॉर्म पर रुकी ट्रेन कब चलेगी? यह एक यक्ष प्रश्न है। जैसे बेरोजगार युवक को नहीं पता होता कि उसे कब नौकरी मिलेगी? वैसे ही ट्रेन के यात्रियों को भी नहीं पता होता कि लाल सिगनल कब हरा होगा? रुकने का समय पता हो तो यात्री उतने समय का सदुपयोग कर लेंगे। आसान हुआ तो सड़क मार्ग से जल्दी घर पहुँच जाएंगे। चाय नाश्ता कर लेंगे, कोई पिकनिक स्थल हुआ तो घूम आएंगे। जो मर्जी सो कर लेंगे। उन्हें ऐसा नहीं लगेगा कि हम कहाँ कैद हो गए! कितने यात्री तो ऐसे भी होते हैं जिन्हें आगे, मात्र 6 किमी की दूरी पर, निर्धारित प्लेटफार्म से दूसरी ट्रेन पकड़नी है। पता हो, एक घण्टा नहीं जाएगी तो 6 किमी कोई रिक्शा ही पकड़कर  पहुँच जाय। बहुत समय हो तो कहीं खेत में घुसकर पकड़म पकड़ाई ही खेल लें! लेकिन इधर रिक्शे में बैठे, उधर ट्रेन चल दी तो? शायद रेलवे वाले जानते हैं कि आम आदमी के पास बरबाद करने के लिए खूब समय होता है। बेरोजगार को मालूम हो कि जो फॉर्म वह भर रहा है, उसका परिणाम बुढ़ौती में आएगा तो वह फॉर्म भरे ही क्यों? मनमर्जी रोकें मगर रेलवे को यात्रियों को बताने की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि ट्रेन जब तक रुकी रहे, लोग अपने सुविधानुसार समय का सदुपयोग कर लें। जैसे ट्रेन के आने/जाने की घोषणा करते हैं वैसे ही यह भी घोषणा करवा दें...यात्रीगण कृपया ध्यान दें! ट्रेन नम्बर 13484 शिवपुर स्टेशन पर एक घण्टे आराम की मुद्रा में खड़ी रहेगी, यात्रियों को हुई असुविधा के लिए खेद है। 

ट्रेन से उतरकर पटरी-पटरी आगे बढ़ने लगा। इंजन के पास, जनरल बोगी के बाहर बहुत अधिक भीड़ थी। खीरा वाले, आइसक्रीम वाले, लस्सी वाले, पकौड़ी वाले, ठंडा पानी/मैंगोजूस वाले, गुटखा/पान वाले सभी तैनात थे। ऐसा लग रहा था जैसे गांव का कोई मेला लगा है! पास जाकर खीरे वाले से पूछा..क्या बात है? उस बोगी के सामने इतनी भीड़ क्यों लगी है? खीरे वाले ने जो जवाब दिया वह चौंकाने वाला था...एक मिली के लइका भयल हौ! (एक महिला को पुत्र पैदा हुआ है)! मुझे लगा, मुझे अपने यक्ष प्रश्न का उत्तर मिल गया। गम्भीर हो कर बोला..अच्छा! तभी ट्रेन इतने देर से रुकी है? दुकानदार झल्ला गया...नाहीं मालिक! ट्रेन रुकल हौ, एहसे ओहके यहीं लइका हो गयल। ( नहीं भाई! ट्रेन रुकी है, इसलिए महिला को यहीं लड़का हो गया!) मैं सोचने लगा..ट्रेन घंटों से न रुकी होती तो शायद महिला को अस्पताल में बच्चा होता। तब? क्या वह स्वस्थ है? तभी लोकल ग्रामीण महिलाओं का दल आता दिखा। उन्होने घोषणा किया.. जच्चा/बच्चा दोनो स्वस्थ हैं। जो-जो जरूरी काम था हम लोगों ने बोगी में चढ़ कर पूरा कर दिया! 

ग़ज़ब का देश है यह! ऐसा केवल भारत में ही सम्भव होगा। ट्रेन इतनी लेट हुई कि रास्ते में ही महिला को लड़का हो गया! और ट्रेन कब तक रुकेगी नहीं पता लेकिन लोकल ग्रामीण महिलाएं ट्रेन में चढ़कर सकुशल डिलीवरी करा कर उतर भी गईं! मैने लस्सी पी, पान खाया और अपना माथा पकड़ कर बगल के एसी कोच में घुस गया। यहाँ का नजारा एकदम भिन्न! यहाँ किसी को कोई फिकर नहीं! किसी को कुछ पता नहीं कि बगल की बोगी में एक महिला ने बच्चा जना! सभी अपने अपने मोबाइल में डूबे हुए! यह तो वही बात हुई कि घर में कोई बीमार पड़े और बीमार को पड़ोसी अस्पताल ले जांय लेकिन घर वालों को पता ही न हो! बहुत देर बाद एक ने मोबाइल से गरदन निकालकर पूछा...यह कौन सा स्टेशन है?