22.1.17

दल बदल या दिलबदल

बीहड़ में किसी डाकू का दिल बड़े गिरोह पर आ जाय और वह लूट में अधिक हिस्से के लोभ में अपना दल बदल कर बड़े गिरोह में शामिल हो जाय तो किसी को कोई अचरज नहीं होता। जंगल का अपना क़ानून होता है। ताकत की सत्ता होती है। अस्तित्व का संघर्ष होता है। सत्ता की छाया में अधिक माल लूटने या जान बचाने के लिये डकैत दल बदलते रहते हैं। आश्चर्य तब होता है जब किसी लोकतांत्रिक देश में जन सेवा के लिये काम करने वाले नेता जी का दिल एन चुनाव के समय बड़े गिरोह पर आ जाता है और वे झट से अपना दल बदल कर दूसरे दल में शामिल ही नहीं हो जाते बल्कि चुनाव लड़ने का टिकट भी पा जाते हैं!

दल बदलू के दल बदलने से दोनों दलों के वे कार्यकर्ता खुद को दल दल में फँसा समझते हैं जिन्होंने उनसे उम्मीदें पाल रखी थीं। सामान्य को पूछता ही कौन है? दलबदलू कोई साधारण तो होता नहीं। वही हो सकता है जिसके पास जन बल और धन बल दोनों हो। इन बादशाली दलबदलुओं के अपना दिल बदलने से ये नरक में नहीं जाते बल्कि इनके इस आचरण से कितने स्वर्ग में जाने की तैयारी करने लग जाते हैं!

दिल दोनों तरफ टूटते हैं। जिस दल में थे उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि अब अपनी ताकत और कम हो गई। जिस दल में गये उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि जीवन भर मेहनत हमने किया और जब हाथ सफाई का मौका मिला तो टिकट कोई बाहरी ले उड़ा! ये उस मजनू की तरह मायूस होते हैं जो लड़की पटाये और उसका टिकट छीन कर फिलिम दिखाने कोई और ले कर चला जाया! कुछ दिन तक तो 'दिल के टुकड़े हजार हुए। कोई यहां गिरा, कोई वहाँ गिरा।' वाला हाल होता है, इरोध-विरोध होता है फिर 'हरि इच्छा' बलवान की तरह 'हाई कमान बलवान' मान कर सभी अपने पार्टी में ही अपने विलेन की जय जयकार करने लगते हैं!

प्रश्न उठता है कि आदमी दिल बदलता ही क्यों है?

कंजूस की पत्नी डाक्टर से मन्नत कर अपने पति का दिल धोखे से बदल दे और राजा का दिल लगवा दे। बाद में जब राजा उसे बेगम समझ कर रोज शाही कबाब बनाने का हुक्म देने लगे तब जा कर पत्नी को एहसास हो कि इससे अच्छा तो अपना कंजूस पति ही था!

किसी लड़की का दिल अपने रामू को छोड़ सलमान खान पर आ जाय और बाद में पता चले कि सलमान तो पहले से बहुतों का दिल तोड़ चुका है!

अच्छी भली पत्नी छोड़ कोई अधेड़ पड़ोस के लड़के से पूछे-भाभी जी घर पर हैं? और घर से पहलवान भैया निकलकर उसका सर तोड़ दें!

कोई चमचा, चम्मच की तरह एक अधिकारी के जाते ही नये वाले अधिकारी से तुरंत घुल मिल जाय और उनके प्याली में भी पुराने की तरह फिट बैठे!

ये सब बातें तो आम आदमी के लिए पुरानी सामान्य घटनाएं हैं। सब चलता है। यही दुनियाँ है, यहाँ यही होता है, मान कर हँसते हुए स्वीकार कर लेता है। मगर किसी सिद्धांत की दुहाई देने वाले का दिल, किसी दूसरे उस सिद्धान्त की दुहाई देने वाले दल पर आ जाय जिसकी जीवन भर बुराई करके नेता बना है तो दोनों दलों के अलावा जन सामान्य का भी दिल टूटना स्वाभाविक है।

एक प्रश्न के बाद कई प्रश्न उठते हैं। आखिर नेता जी ने अपना दिल क्यों बदला ? क्या सत्ता की चौकीदारी में ही होशियारी है? सत्ता सुख के सामने सब सुख ओछे हैं? क्या सिद्धांत, सत्ता प्राप्त करने की अलग-अलग सीढ़ियाँ हैं जिसमे पीढी दर पीढ़ी चढ़ती-उतराती रहती है? क्या सेवा भाव इतना प्रबल होता है कि आदमी मुँह मांगे भाव में उसे खरीद लेना चाहता है। अंत में यह कि यदि देश में इतने सारे सेवक हैं तो आम आदमी इतना दुखी क्यों है?

सिद्धार्थ ने आम आदमी के दुःख दूर करने के लिए सत्ता सुख का त्याग किया और नेता जी आम आदमी का दुःख दूर करने के लिये सत्ता पाना चाहते हैं! दोनों में सही कौन? वो जो बुद्ध बन गये या वो जो राजा बनना चाहते हैं?

19.1.17

किताबें और मेले

क्या पाण्डे जी! विश्व पुस्तक मेला लगा था दिल्ली में, गये नहीं?
हाँ मिर्जा, नहीं गये। टिकट नहीं था।
आप कहते तो टिकट कटा देता आपका। दिल्ली कौन दूर है?
ट्रेन के टिकट की बात नहीं कर रहा मिर्जा, मैं पुस्तक मेला के टिकट की बात कर रहा हूँ! पुस्तक मेले में वही लेखक जाता है जिसकी एकाध पुस्तक छप चुकी हो। बिना पुस्तक छपे मेले में जाना वइसे ही है जैसे बिना टिकट ट्रेन पर चढ़ना। तुम्हें क्या पता? बिना पुस्तक वाला कवि मेले में बिना पूँछ वाले बन्दर की तरह कितना शरमाता रहता है!
एक साल हम भी गये थे मिर्जा, मेले में। बहुत से बिछुड़े भाई एक साथ मिल गये। किसी के हाथ में पुस्तक, किसी के बैग में पुस्तक, किसी का झोला भरा हुआ तो किसी का बोरा बंधा हुआ और हम खाली हाथ! मारे शरम के जमीन पर गड़े जा रहे थे, कोई देख कर पहचान न ले।
तब! फिर का हुआ?
का होना था मिर्जा! वही हुआ जिसका डर था। हम सोच ही रहे थे कि फूट लें यहाँ से तभी एक मित्र ने पीछे से आ कर टी.टी. की तरह पीठ में धौल जमा ही दिया-कैसे हैं पाण्डे जी? आपकी कौन सी पुस्तक आई इस बार? फिर बिना उत्तर सुने पकड़ कर एक कोने में ले गया जहां कम भीड़ थी। वहाँ मेले में बिछुड़े सभी भाई मौजूद थे। सभी से मेऱा परिचय कराते हुए बोलने लगा-इनसे मिलिये! यही बेचैन आत्मा हैं। इत्तफाक की बात थी मिर्जा! सभी मुझसे तपाक से हँसते हुये मिले! किसी ने मुझे शर्मिंदा नहीं किया!! मुझे उसी पल विश्वास हो गया कि इंसानियत कहानियों में ही नहीं, लेखकों में भी पाई जाती है! सभी मुझे प्रोत्साहित करते रहे-अगली बार मेले में आपकी पुस्तक भी आ ही जानी चाहिये।
तब! इतने अच्छे मित्र हैं तब क्यों नहीं गये मेले में?
कहाँ कोई पुस्तक छपी मिर्जा! हर बार कोई प्रोत्साहित थोड़ी न करता है। इस बार जाता तो तंज कसता-पूरी जिंदगी फेसबुक में ही गुजार दोगे क्या!
तो क्या खाली लेखक ही जाते हैं पुस्तक मेले में! पाठक कोई नहीं जाता?
वही पाठक, वही लेखक मिर्जा! यूँ समझो सभी पाठक, सभी लेखक।
इनके अलावा?
लेखक को हरदम झाँसा देते रहने वाला प्रकाशक, देखा-देखी पढ़ाकू दिखने वाले नये लड़के, बड़े लेखकों के बीच घुसकर एल्फी-सेल्फी खिंचा कर फेसबुक में चस्पा करने वाले और इस तरह हमेशा आत्ममुग्ध रहने वाले नये लेखक और लेखकों को विद्वान समझ कर चाय-पानी कराते रहने वाले उनके मित्र। इन्ही सब की चौकड़ी दिन भर हुँकार-फुँकार करती रहती है मिर्जा।
मतलब गाँव के मेले की तरह कोई मजा नहीं होता मेले में?
देश-शहर-गाँव सब पुस्तक में घुस जाता है मिर्जा! तुमने देखा है न गाँव का मेला? जिस बच्चे की उमर गुब्बारा फुलाने की होती है, वही गुब्बारा बेच रहा होता है! कितनी सूनी रहती हैं हरी चूड़ी बेचने वाली गुलाबो की आँखें! यही हाल विद्वत समाज का है। जिसके पास पैसा है वह हर साल पुस्तक छपवा सकता है। प्रकाशक किसी गरीब की पुस्तक नहीं छापता। बड़े-बड़े लेखकों की तमाम उम्र फकीरी में कट गई। जब स्वर्गवासी हुए, लोगों ने तारीफ करी तभी प्रकाशक उनके घर गया। बुद्धिजीवियों की दुनियाँ और जालिम है मिर्जा, कत्ल करते हैं और खून का एक धब्बा नहीं दिखता।
सही बात है गुरु! एक बार हमने भी एक कवि समेलन कराया था। बड़े लिफ़ाफ़े के लिये सब कवि झगड़ने लगे थे आपस में! किसी तरह बीच-बचाव किया और अपनी जेब से पइसा लगा कर मामला रफा-दफा किया।
तब मेला एकदम बेकार चीज है?
नहीं मिर्जा! यह नहीं कह रहा। मेला तो मेला है, मजा ही मजा है। जइसे गरीब को मेले से ही रोटी मिलती है वइसे बुद्धिजीवी को मेले से ही खुराक मिलती है। जेब में पैसा हो, फालतू समय हो और लिखने-पढ़ने का शौक हो तो मेले से बढ़कर और दूसरी अच्छी जगह कौन है साहित्य के मनोरोगियों के लिये! सोने में सुहागा-अपनी तरह दूसरे और रोगी भी मिल जाते हैं ओने-कोने, शब्दों के चाट-पकौड़े चखते हुए! कवि को कवयित्री मिल जाती हैं, कवयित्री को कवि मिल जाते हैं। आलोचकों को कवि-कवयित्री के रूप में जुगाली करने के लिए आलू-चना दोनों मिल जाते हैं। प्रकाशकों के पुराने अंडे बिक जाते हैं, नये मुर्गे मिल जाते हैं। इससे अच्छा और क्या हो सकता है भला!
एक ताजा शेर सुनो मिर्जा-
मृत्यु लोक के लेखकों की उल्टी-पल्टी गई बहुत 
अधिक बिकी इस बार भी स्वर्गीय की पुस्तक।
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15.1.17

सत्य


देखो! सुनो! समझो! तब बोलो।
बोलो तो..
जोर-जोर से बोलो
पूरे आत्मविश्वास से बोलो
दो चार और सुनें कि तुमने
क्या देखा? क्या सुना? और क्या समझा?
विचलित मत होना
जब वे बोलें
चिल्लाने मत लगना..
झूठ! झूठ!
तुम गलत! तुम गलत!
मैं सही! मैं सही!
ध्यान से सुनना
उन्होंने क्या बोला
और समझना
कि यह
उनका देखा, उनका सुना और उनका समझा सत्य है।
सत्य
सभी के लिये
कभी एक सा नहीं होता
सभी की
अपनी नज़र, अपनी शक्ति और अपनी समझ होती है
इसीलिये सभी के
अपने-अपने सच होते हैं।
सभी के सत्य एक होते तो
सभी
वृक्ष न बन गये होते!

8.1.17

लोहे का घर-25


'हाय! ललमुँही, आज तो बड़ी रफ्तार से चल रही हो!' 40 मिनट में जौनपुर से खालिसपुर आ गई!!!'..हवा ने ट्रेन को छेड़ा।
दून ने लम्बी सीटी बजाई और खालिसपुर से भी चल दी। 'चुप री पगली हवा! बहुत लेट हो चुकी हूँ पहले से ही। कुछ तो समय कवर करने दे। मुझे जौनपुर दिन में 2 बजे ही पहुँचना था, शाम हो गई। तुम्हें पता है? जौनपुर से एक बेचैन आत्मा चढ़ता है। लेट हुआ और किसी ने जरा भी कोसा/गाली दिया नहीं कि झट से लिखकर फेसबुक में छाप देता है।
अच्छा! बड़ा बदमास है तब तो! एक दिन गिरा क्यों नहीं देती?
अरे! वो अकेला थोड़ी न मरेगा। वो नहीं तो कोई और लिखेगा। किसी का मुँह थोड़ी न बंद कर सकते हैं। कुछ झूठ तो लिखता नहीं। किसी की आलोचना से घबराकर और गलत काम नहीं करना चाहिए। खुद को सुधारना ही सबसे बढ़िया विकल्प है। आलोचना करने वाला तुहारा शत्रु नहीं, सदैव मित्र होता है।
वाह री ललमुँही! बड़ी ज्ञानी बन गई हो नये साल में!!!
मैं तो हमेशा से ज्ञानी हूँ पगली हवा! सब मुसीबत तेरे और कंट्रोलर के कारण है।
मेरे! अब मैंने क्या किया?
तू ही तो हिमालय से लाती है ठंडी हवा और घना कोहरा। तेरे कारण न मुझे कुछ दिखाई देता है और न कंट्रोलर को। भागूँ तो कैसे भागूँ?
दूसरे पर आरोप मढ़ने को कह दो। अब यहाँ वीरापट्टी में क्यों खड़ी हो गई? यहाँ तो तेरा स्टापेज नहीं है। घना कोहरा भी नहीं है!
देखती नहीं सिगनल लाल है! मेरी सारी तेजी बेकार कर दिया इस स्टेशन मास्टर ने। वो भी क्या करे! कंट्रोलर ने सिग्नल ही नहीं दिया होगा। चाय पीने चला गया होगा। देख! सिग्नल ग्रीन हो गया। अब मुझे बातों में मत उलझा। तुझसे बतियाने के चक्कर में सिग्नल दिखाई नहीं दिया तो नाहक मारा जाएगा एक एक बेचैन आत्मा. 
..............................
तेरा नाम #दून किसने रख दिया लालमुँही! तू तो खून कर देगी कितनों का। आज फिर लेट!!! बेचैन आत्मा छोड़ेगा नहीं। मैंने उसे टेशन पर देखा था। काँधे पर झोला लटकाये, मूँगफली फोड़ रहा था और तुम्हारा मजाक उड़ा रहा था।
अच्छा! क्या कह रहा था?
मुझसे तो कुछ नहीं मगर अपने साथियों से कह रहा था कि इससे अच्छी तो #गोदिया है। राइट टाइम है और आगे चलकर दून को पीटेगी। तुम गोदिया से पिटाओगी क्या जानेमन?
मुझे बनारस तक 4 स्टेशन रुकना है और वो नान स्टॉप #ट्रेन है, इसलिये ऐसा बोल रहा होगा मगर उसके आने में तो अभी 30 मिनट देर है! तब तक तो मैं पहले पहुँच जाऊँगी बनारस। लो! अभी #जफराबाद से चली हूँ और किसी ने मेरी चेन खींच ली!!! यही हाल रहा तो मैं क्या कर सकती हूँ भला! पहले चेन छुड़ाऊँ फिर चलूँ।
तू तो आज गई काम से।
चेनपुलिंग के बाद रुकी दून ने जोर की सीटी बजाई और हवा से बातें करते हुये कहा-चुप रे पागल हवा! उसे मेरे ऊपर भरोसा ही नहीं तो क्यों बैठता है मेरी गोदी में? चले जाना था न अपनी गोदिया के पास।
वो तो नहीं मान रहा था दुन्नी! उसके दोस्तों ने यह कहते हुए बिठा दिया कि गोदिया राइट टाइम है लेकिन आधे घण्टे में तू बहुत आगे ले जाएगी और रुकने के बाद भी पहले पहुँचेगी बनारस।
छुक छुक छुक उसके दोस्त ज्यादा समझदार हैं। अब कोई चेन पुंलिंग न करे तो मैं अभी भी गोदिया को क्रास न होने दूँ। जा! ज़रा देख कर बता तो, गोदिया अब जौनपुर पहुँची की नहीं?
ठीक है। बताता हूँ। तू ज़रा संभलकर चल। आगे जलालगंज का पुल आने वाला है।
उधर हवा, गोदिया का हाल लेने गई और इधर दून ने अपनी चाल से जलालगंज पुल को थरथरा दिया। अंग्रेजों के जमाने का मजबूत पुल काँप सा गया। आगे दून धीरे हो, जलालगंज में मात्र एक मिनट के लिये रुकी फिर हारन जोर की सीटी मार पटरियों पर दौड़ने हुये भुनभुनाने लगी-'पता नहीं हवा कहाँ मर गया! नाम हवा और चाल कछुए जैसी।' दून अभी बड़बड़ा ही रही थी कि हवा ने पीछे से उड़ते हुए आकर ट्रेन के कान में कहा- गोदिया सही समय पर छूट गई जौनपुर से। तू अपनी चाल बढ़ा, वरना आगे तुझे रोक देगा स्टेटशन मास्टर और तू खड़ी-खड़ी सीटी बजाती रह जायेगी।
ओह! मैं तेज दौड़ने के सिवा और अधिक कर भी क्या सकती हूँ भला!!! आगे कंट्रोलर की मर्जी। हानी, लाभ, जीवन, मरण, यश , अपयश, सब कंट्रोलर के हाथ है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। मेऱा काम बस कंट्रोलर की इच्छानुसार रुकना या पटरी पर चलते चले जाना है। जा! देख तो जरा। बेचैन सो गया या मोबाइल में उँगलियाँ चला रहा है?
उसके दोस्त तो ऊपर बर्थ में चैन से सो रहे हैं लेकिन वो जब से बैठा है, कुछ न कुछ लिखे जा रहा है।
इसीलिये तो उसका नाम बेचैनआत्मा है। सबका मन बेचैन होता है, इसकी तो आत्मा भी बेचैन है! इसके अलावा किसी की आत्मा बेचैन हो ही नहीं सकती दुनिया में।
तू क्यों खालिसपुर में ही खड़ी हो गई? यहीं पिटायेगी क्या गोदिया से!
चलती हूँ। हरा सिगनल हो गया। कहीं बेचैन आत्मा हमारी-तुम्हारी सब बातें तो नहीं सुन लेता!
मैं क्या जानू? अब यह मत कहना कि क्या लिखा है, पढ़ कर आ। मुझे दो पायों की बातें समझ में नहीं आती। दुनियाँ में जहाँ भी जाती हूँ, इनकी चाल-ढाल, भाषा-बोली में गहरी भिन्नता है।
यहाँ, लोहे के घर में बैठा, सुन रहा हूँ ट्रेन और ठंडी हवा की गरमा गरम बहस। अपने घर में टी.वी. के सामने बैठ कर टी.वी. एंकर और बुद्धिजीवियों की राजनैतिक काँव-काँव सुनने से तो अच्छा है इनकी बातें सुनना। उसी टाइप के कुछ लोग यहाँ इसी बोगी में आगे बैठकर झगड़ रहे हैं। उनके झगड़ने की आवाजें यहाँ तक आ रही हैं। बड़ी देर से रुकी है #बाबतपुर में बेचारी दून। गोदिया से पिटने ही वाली है। सुनना बंद कर दिया है अब मैंने हवा से इसकी बातें। आ रही है गोदिया जोर से हारन बजाते हुये। धक्क! से बैठ गया दून के साथ मेरे साथियों का भी दिल।

यू पी रोडवेज की बस यात्राएँ

कोहरा घना है। सड़क पर चमक रही हैं वाहनों की आँखें। छोटे कस्बे में रुकती है बस। दिखते हैं शाल, स्वेटर, मफ़लर या कम्बल ओढ़े आम आदमी। सुनाई पड़ती है आग तापते, चाय की चुस्की लेते या खैनी रगड़ते लोगों की हँसी-ठिठोली। एक बैल वाली 5-6 गाड़ियों का काफिला देखा। बोरा या कथरी ओढ़े ग्रामीण हाँक रहे थे बैल। जा रहे होंगे मंडी या लौट रहे होंगे समान उतारकर मंडी से।
ठंडा देख आज बैठ गए रहिशों की तरह ए. सी. बस में। यहाँ बैठ ग्रामीण अधिक परेशान दिखाई देते हैं! यू. पी. रोडवेज की ए. सी. बस है। सामान्य बसों का किराया 61 रूपया तो इसका 155. बहुत बड़ी खाई है आम और ख़ास में! इसे पाटना सम्भव नहीं दिखता। इस खाई को पाटने की आम जन की इच्छा, ख़ास बनते ही गुम हो जाती है।
इस बस में मिनरल वाटर भी मिलता है। आगे बैठी लड़की का बॉटल दो बार गिर चुका है। गिरकर बॉटल प्लास्टिक की कालीन पर बायें से दायें, दायें से बायें बार-बार लहराता रहा। लड़की उसे देखती रही। फाइनली उसने झुककर उठा ही लिया। आस-पास बैठे यात्रियों का कौतूहल शांत हुआ और वे पहले की तरह गरदन सीट से सटा कर बैठ गये।
ए.सी ट्रेन की बोगी की तरह ए.सी रोडवेज के यात्री भी धीर-गंभीर हो बैठते हैं। हँसने का समय और स्थान निर्धारित रहता है। आम आदमी की तरह सस्ती नहीं होती इनकी हँसी।
.....................

कोहरा छंटा नहीं है। आराम-आराम से चल रही है अपनी बस। जल रही हैं सड़क की दूसरी पटरी से आते वाहनों की आँखें। बाबतपुर हवाई अड्डे से पहले की सड़क पर काम चल रहा है। ओवर ब्रिज बन रहा है जहॉं से गुजरेगी रिंग रोड। हो रहे हैं विकास के काम।
अन्तरिक्ष यात्री की तरह लग रहे हैं जैकेट, हेलमेट पहने मोटर साइकिल चलाते लोग। इन्हें देख धोखा हुआ कि देश चाँद पर पहुँच गया है क्या! उदास चेहरा लिए गुजरा मफ़लर से कान बाँधे, दोनों हैंडिल में बड़े-बड़े झोले लटकाये, झुककर साइकिल चलाता आदमी। इसे देख भरम जाता रहा। हम उसी भारत में हैं जहां पैदा हुये थे।
एक किशोर दिखा। बिना मफ़लर लगाये, कंधे के साथ सर भी बायें-दायें झटकते, गुनगुनाते, मटकते हुए जा रहा था। ग्रामीण इलाके का है, जाड़े के कारण स्कूल बंदी का मजा ले रहा है। शहर के छोरे तो मम्मी की गोदी में सो रहे होंगे अभी। एक साइकिल चलाती दो बहनें दिखीं। पीछे कैरियर में छोटी थी, बड़ी साइकिल चला रही थी।
और भी बहुत कुछ दिखा जो आप हमेशा देखते हैं। मैंने कुछ नया नहीँ देखा। कोहरे के कारण लेट चल रही है ट्रेन। आज जिंदगी सड़क पर है।
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यू पी रोडवेज की नई बस है। इसमें गाना भी बजता है! स्पीकर लाउड है। ड्राइवर, कंडक्टर को शायद पहली बार लाउड स्पीकर वाली बस मिली है। फुल्ल भैल्यूम में सबसे बेकार वाला गाना बज रहा है। मैंने हल्ला मचाया तो ड्राइवर ने बंद ही कर दिया। सभी यात्री खुश हो गये-हाँ, हाँ बंद कर दो। मुझे एहसास हुआ लोग शान्ति चाहते हैं लेकिन इसके लिये भी विरोध नहीं कर पाते। बिना माँगे कुछ नहीं मिलता, खामोशी भी नहीं।
अब बस फाइनली रोडवेज से बाहर निकल कर सड़क पर दौड़ने लगी। हल्की-हल्की उछल रही है। अभी शहर है, शहर से बाहर निकलेगी तो पेट भर उछलेगी। इतना भी उछल सकती है कि मोबाइल छूट जाये हाथ से और लिखा हुआ पोस्ट ही न हो।
टिकट बोलिये भाई, टिकट! लिखने में कंडक्टर डिस्टर्ब कर रहा है। बोलिये भाई! मैंने बोल दिया-टिकट! और लिखता रहा। कंडक्टर मुझसे शरीफ है। प्यार से फिर बोला-टिकट भाई! कटा ही लेता हूँ टिकट। इतने शरीफ कंडक्टर कहाँ मिलते हैं!
बस अब शहर से बाहर निकल रही है। खुशी से उछल रही है। एक बार बाहर झाँकता हूँ, कन्फर्म करता हूँ, जौनपुर ही जा रही है या कहीं इलाहाबाद वाली में बैठ गया! रस्ता जाना पहचाना है। जौनपुर ही जा रही है। कितना आसान है सही और गलत रास्ते को पहचानना! जाना पहचाना है तो सही, अनजाना है तो गलत। सही गलत रास्ते का यह फर्क वास्तविक जीवन में भी कर पाते तो कितना अच्छा होता! मंजिल श्योर-शाट मिल ही जाती। मगर हाय! ऐसा होता नहीं। भगवान का कंडक्टर यमराज जब बिना पूछे जिंदगी का टिकट काट देता है तब समझ में आता है कि जिंदगी भर जिस रास्ते पर चले वो तो गलत था!
सफर में ऐसे बहुत से यात्री मिलते हैं जो गलत #ट्रेन में बैठ जाते हैं। रोज के यात्री उन्हें सही रास्ता दिखाते हैं। कुछ बात मान कर अगले स्टेशन पर उतर जाते हैं और लौटकर सही ट्रेन पकड़ लेते हैं, कुछ टी.टी. से कन्फर्म करने जाते हैं। टी.टी. हड़काते है-आप विदाउट टिकट हैं, पहले फाइन भरिये! असल जिंदगी में भी यही होता है। सही रास्ता दिखाने वाले मिलते हैं मगर हम अपने मन से ही कन्फर्म करते हैं और मन की ही करते चले जाते हैं। कई बार फाइन भरते हैं मगर अंत तक नहीं सुधरते। अंत में जब यम सवार हो जाता है सर पर और कहता है-टिकट बोलिये,टिकट! तब जा कर होश आता है।
अब बस खुशी के मारे अधिक उछल रही है। मेऱा मतलब शहर से बहुत बाहर निकल चुकी है। एक दिन ऐसा भी आयेगा जब रँगी-पुती गढ्ढा मुक्त सड़क की होर्डिंग नहीं दिखेगी और सड़क वास्तव में गढ्ढा मुक्त होगी। खूब हो रहे हैं यू पी में विकास के काम।
...........

आराम-आराम से यूपी रोडवेज की बस पकड़ लिये हैं। पुराना गाना धीरे-धीरे बज रहा है। ड्राइवर समझदार लगता है। कभी कंडक्टर समझदार मिलता है , कभी ड्राइवर। दफ्तर में जैसे कभी अधिकारी समझदार मिलते हैं, कभी कर्मचारी। दोनों समझदार, दयावान मिल जांय, यह किस्मत की बात है।
हवा में आज भी ठंड है। अपनी बस खुशी-खुशी, उछल-उछल कर चल रही है। मैं दोनों हाथों से मोबाइल पकड़,संभल-संभल कर लिख रहा हूँ। माननीय अखिलेश जी के जमाने की नई बस है। अभी इसके शीशे पूरी तरह से बंद हो जाते हैं। ठंडी हवा भीतर नहीं आ रही। बाहर सरसों के फूलों से छेड़खानी कर रही है। अज्ञेय जी ने इन्हीं सरसों के खेतों को देखकर शेखर एक जीवनी में लिखा था-बाड़े पर पोस्ते, खेत फुली कुसुम्मी। पीली चोली वाली री! दे जा एक चुम्मी!
नया साल अभी शुरू हुआ है। अभी इसने नये सवाल नहीं उठाये। अभी उलझी है पुराने सवालों में। नये सवाल आने से पहले के पलों का भरपूर आनंद लीजिये। शेष तो रोज की दिनचर्या है, जैसे जीते थे, वैसे जीयेंगे। शुभ दिन।

चुनाव और दंगल

"चुनाव और दंगल" विषय सुनते ही #मिर्जा की ऑंखें भर आईं। मुश्किल से मुँह खोल पाया और भर्राई आवाज में बोल पड़ा-सब आपस में गड्डमगड्ड हौ पाण्डे! पहिले दंगा भयल रहल फिन चुनाव। एहर चुनाव क घोषणा भयल ओहर दँगा शुरू। कब्बो चुनाव के बादो दँगा भयल। अउर कब्बो-कब्बो त वोटिंग अउर दंगा दुन्नो साथे-साथ चलल। ई दंगा में सब बहुत नँगा हो जाला पाण्डे! हमार केतना नुकसान भयल.....
मुझे बीच में मिर्जा को रोकना पड़ा-चुप पागल! अब एक्को शब्द बोलबे त धकेल देब यहीं छत से, गिर जइबा नीचे। हम कहत हई 'दंगल' अउर तू सुनत हउआ 'दँगा'! पचासे ग्राम में जै श्री राम हो गइला!
मिर्जा को गहरा संतोष हुआ- हाँ, यह विषय ठीक है। चुनाव में दंगल हो, दँगा कभी नहीं होना चाहिये। फिर हँस कर बोला -ई बात पे एक पैग अउर पिलाव! बढ़िया बात हौ..चुनाव और दंगल! लेकिन न जाने काहे, हमें लगत हौ दंगल शब्द क चुनाव तू हमें च्यूतिया बनाये बदे करत हउआ! ऊ कउन चुनाव हौ पाण्डे जेहमें कत्तो दंगा ना भयल? जब-जव चुनाव क तारीख़ नजीक आवला लगेला कि दँगा होखे वाला...
मुझे बीच में ही मिर्जा को टोकना पड़ा। कहीं फिर अतीत में न चला जाय...
तोहें याद हौ मिर्जा?-दो बैलों की जोड़ी है, एक अंधा एक कोढ़ी है।
तोहे याद हौ पाण्डे?- जिस दिये में तेल नहीं है, वो दिया बेकार है।
गली-गली में शोर है, इंदिरा गांधी....है।
समग्र क्रान्ति अब नारा है, हिंदुस्तान हमारा है।
राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।
घाँस कपार लेहलन सारे! हमने ठहाके लगाते हुए एक दूसरे को देखा-कितनी बार उम्मीदें जुटाईं लोगों ने और न जाने कितनी बार लोगों का विश्वास टूटा!!!
मिर्जा! तुम हँसी-हँसी में बड़ी गम्भीर बात बोल जाते हो! धीरे-धीरे नारे का स्तर भी गिरा है न?
मिर्जा खिसियाकर पूछते हैं-अच्छा! कौन सी वह अच्छी बात है जिसका स्तर बढ़ा है?
चुनाव में कहॉं-कहाँ दंगल होता है पता है? शुरुआत उस घर से होता है जिस घर के लोग चुनाव लड़ते हैं फिर शहर में होता है। फिर देखते ही देखते गली-मोहल्ले घर-घर में दंगल होने लगता है।
ये पार्टियाँ तो देश सेवा के लिये बनी हैं न मिर्जा?
दंगल के शोर से सेवा होता है पाण्डे? सेवा का इरादा तो बुद्ध ने किया था। राज पाट छोड़ निकल पड़े थे चुपचाप जंगल में। ये चुनाव का दंगल तो राज-पाट पाने के लिये है।

सुबह की बातें -4


शाम के शोर से 
भोर का मौन अच्छा है 
शाम महबूबा है मेरी,
भोर 
एक मासूम बच्चा है
शब्दों का खजाना था 
शाम के पास 
एक भी याद नहीं 
रात के बाद 
भोर 
बोलता कुछ नहीं 
मगर सुनता हूँ 
खुद ब खुद 
अभिव्यक्त होता है 
चहक लूँ 
मन ही मन 
पंछियों के जगने से पहले 
अभी अँधेरा है, 
जाग लूँ थोड़ा
उजाला देख लूँ 
अजोर से पहले.

वृक्षों का माथा चाट
पत्ती-पत्ती रेंगती, 
टप्प से धरती पर कूद-कूद 
गायब हो रही थीं 
शरारती ओस की बूदें! 
पँछी खामोश थे,
गेट के ताले ठंडे 
कुछ देर स्तब्ध खड़ा 
भोर को सुनता रहा 
फिर भागकर 
रजाई में दुबक गया।

जारी है 
ओस की टिप-टिप.
छाया है कोहरा
चुप हैं पँछी
गूँज रहा है
भोर का मौन

नहीं है मेरे पास
एक भी
मेऱा पढ़ाया पालतू तोता
होता भी तो
'गोपी-कृष्ण कहो' नहीं कहता
मौन हो
राधे-राधे
सुनता रहता।

उठो न! 
सुनो न! 
धरती पर जल तरंग बजा रही हैं 
ओस की बूँदें!!! 
सुन रहे हैं पँछी 
दुबक कर 
अपने-अपने घोंसलों में
मौन मुखर है 
चहुँ ओर
आओ! 
आँखें बंद कर बैठो यहाँ, 
शाल ओढ़कर 
ना ना 
कुछ ना कहो।
भोर के अजोर तक 
सुनती रहो...
कितना मधुर है मौन का संगीत! 
इन पंछियों की तरह सशंकित होकर मत देखो! 
ऑंखें बंद कर विश्वास से सुनो..
ऐसे ही होता है 
अन्धकार के बाद 
रोज सबेरा।
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