20.10.20

हमारा कुछ न बिगड़ेगा

धीरे-धीरे
कम हो रहा था
नदी का पानी

नदी में
डूब कर गोता लगाने वाले हों या 
एक अंजुरी पानी निकाल कर
तृप्त हो जाने वाले,
सभी परेशान थे..
बहुत कम हो चुका है
नदी का पानी!

बात राजा तक गई
जाँच बैठी
नदी से ही पूछा गया...
पानी क्यों कम हुआ?

नदी ने 
राजा को देखा 
कुछ बोलने के लिए होंठ थरथराए पर...
सहम कर सिल गए!

राजा ने
नदी किनारे
सिपाही तैनात कर दिए
बोला..
अब देखें
कैसे कम होता है
नदी का पानी?

हाय!
नहीं रुका
पानी का घटना 
नदी 
सूखने के कगार तक पहुँच गई
एक दिन
हकीकत जानने के लिए
साधारण ग्रामीण का भेष बना कर
राजा स्वयं 
नदी के किनारे घूमने लगा

अरे! यह क्या!!!
सिपाही मेंढक को क्यों मार रहे हैं?
सुनो भैया!
आप राजा के आदमी होकर
इन निरीह मेढकों को क्यों मार रहे हो?
सिपाही बोले...
ये मेंढक
नदी का पानी पी कर भाग रहे थे!

देखो!
ये जब भी फुदकते हैं
दो बूंद पानी
झर ही जाता है!!!

राजा ने
प्रत्यक्ष देखा था
शक की कोई गुंजाइश नहीं थी
मेंढकों का अपराध 
सिद्ध हो चुका था।

सजा के तौर पर
मेंढक के पैरों में कील ठोंककर
उसका कलेजा निकाला जाना था
यह सब सुनकर
बिलों में छुपे साँप
बाहर निकल आए और..
तट किनारे खड़े
बरगदी वृक्ष की शाखों पर चढ़कर
कानों में
राजा का फैसला सुनाने लगे

खबर सुनकर
बरगद हँसने लगा...
यही होता आ रहा है सदियों से
हमारा कुछ न बिगड़ेगा
तुम सब निश्चिंत रहो।
..................

12.10.20

मुझे आकाश चाहिए

तुम

हवा, जल और धरती का प्रलोभन देते हो

इन पर तो मेरा 

जन्मसिद्ध अधिकार है!


तुमने

सजा रखे हैं 

रंग बिरंगे पिजड़े

और चाहते हो

दाना-पानी के बदले

अपने पंख 

तुम्हारे हवाले कर दूँ?


अपने सभी पिजड़े हटा दो,

मेरे पंख मुझे लौटा दो

मुझे आकाश चाहिए।

18.9.20

मदारी मुक्त बन्दर

गंगा उफान पर है

डूब चुकी हैं पंचगंगा घाट की सभी मढ़ियाँ

नहीं जा सकते 

एक घाट से दूसरे घाट तक

श्रीमठ के पास

सीढ़ियों पर बैठ

जहाँ टकरा रही थीं

गंगा की लहरें

कई लोग एक साथ कर रहे थे

पितरों को तर्पण

मन्त्र पढ़ रहा था, ऊपर बैठा पण्डा

बीच-बीच में निर्देश देता..

जनेऊ

गले में माला कर लीजिए,

अपसव्य होइए!

जनेऊ

बाएँ कन्धे पर,

सव्य होइए!

जनेऊ दाएँ कन्धे पर,

राजघाट पुल की ओर अर्घ्य दीजिए,

रामनगर की ओर अर्घ्य दीजिए,

अपना गोत्र बोलिए,

पितरों को याद कीजिए....


मैं भी गया था

तर्पण देने

ढूँढ रहा था 

अपने पण्डित जी को

मुझसे पहले

पण्डित जी ने मुझे देख लिया

हाथों से इशारा किया..

वहाँ बैठिए जजमान,

गंगा स्नान कीजिए,

अर्घ्य दीजिए.....


तभी एक बंदर

किसी की पोटली से

एक आलू निकालकर भागा

पण्डे ने डांटा

मगर यह वाला बन्दर

मदारी मुक्त था, स्वतन्त्र था

आलू मुँह में दबाए

चढ़ता चला गया

घाट की सीढ़ियां!

...................

2.8.20

लोहे का घर



वो धूप है कि खेत में आदमी, पँछी या जानवर कोई नज़र नहीं आ रहा। दूर झुग्गी में बेना डुलाती दादी और आम की छाँव में जुगाली करती भैंस दिखी थी बस्स। खेत सूने हैं। गाँव का श्रम शहर में घूमने नहीं, मजूरी करने गया होगा। शहरी पहाड़ ढूँढ रहे होंगे। पहाड़ी कारों के काफिले से काले हो रहे हिमालय को देख रहा होगा। सुरुज नारायण मस्ती में हैं..भागो-भागो, कहाँ तक भागोगे?
...................

#फिफ्टी की जिस बोगी में जहाँ बैठा था वहाँ भीड़ बहुत थी। वैष्णव देवी और बाघा बार्डर के दर्शन कर खुशी-खुशी लौट रहा था एक बिहारी परिवार। वे मैथली में बोल रहे थे। उनके साथ बच्चे और बूढ़ी दादी भी थी।
उनकी एक समस्या थी..पानी। गर्मी से बेहाल प्यासे बच्चों और बूढी दादी के लिए पानी। इतने पैसे वाले भी नहीं थे कि सबके लिए बिसलरी की बोतल खरीद सकते। हिम्मत कर के महिला ने एक बोतल 20 रुपये में खरीदी और बच्चों की प्यास बुझाई। अभी और भी प्यासे थे।
हर स्टेशन पर पानी के लिए महिला का उतरना और #्रेन की सीटी की आवाज पर भाग कर खाली बोतल हिलाते हुए मायूस लौटना देखा न जाता। महिला के साथ उनका पति और दूसरे युवा भी थे मगर उन्हें कोई फर्क नहीं! नई मिल्छे हेने पानी..ऐसा ही कुछ बोल कर अपनी औरत को भी मना कर रहा था जाने से। मैंने जब समझाया कि इधर छोटे-छोटे टेसन पर ट्रेन अधिक देर नहीं रुकती। बनारस पहुंच कर ले लेना। वहाँ आराम से मिल जाएगा तो वह बात समझ कर आराम से बैठ गई। पति समझाये तो महिलाएं बात जल्दी नहीं समझतीं। कोई और वही बात कह दे तो झट्ट से समझ मे आ जाता है। 
उफ्फ! ये गर्मी और ये प्यास। घबड़ा कर उठा और दूसरी बोगी में घूमने लगा। दूसरी में भीड़ कम थी। खाली थे बर्थ। एक खिड़की से झाँका तो मस्ती से डूब रहे थे सुरुज नरायण। गर्मी, प्यास और पानी की समस्या के असली मुजलिम तो यही हैं! मैंने प्रमाम किया और एक तस्वीर हींच ली। ताकि जब सूर्यदेव पर मुकदमा चले तो सबूत दिखाने के वक्त काम आये।
......................

तू फिर कब चलेगा #escalator#कैंट स्टेशन #वाराणसी के प्लेटफॉर्म नम्बर 9 के बाहर जब तू बन कर तैयार हुआ था, कितने खुश थे मेरे घुटने! एक दिन सुबह जब मैं #ट्रेन पकड़ने आया तब तू चल रहा था! मैंने खड़े-खड़े हवा में तैर कर चढ़ी थीं पूरी सीढ़ियां। कितना धन्यवाद दिया था #रेलवे को! भले रोज लेट चलाता है ट्रेन मगर विकास का काम भी हो रहा है। सज्ज हो रहे हैं प्लेटफॉर्म। सुविधाएँ बढ़ रही हैं। लेट की तकलीफ चुनाव तक कौन याद करता है! चुनाव के समय तो काम बोलता है।
हाय! वो दिन था और आज का दिन। महीना, महीनों में बदल रहे हैं। क्या बनाने वाला इसमें प्राण फूँकना भूल गया? क्या इसकी सीढ़ियों को किसी देवता के चरण रज की दरकार है? आखिर तू कब तक हाथी के दांत की तरह मुँह चिढ़ाता रहेगा? देख! यह आदमी तेरी सीढ़ियों पर अपने दम पर चलकर तेरी नपुंसकता का मजाक उड़ा रहा है! मुझसे तेरी बेइज्जती देखी नहीं जाती। तू कब चलेगा मेरे escalator?
......................




27.7.20

अँधेरा

लाइट चली गई है। मैं अँधरे में हूँ। ऐसा लगता है जैसे मैं ही अँधेरे में हूँ और सबके पास रोशनी है! पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा होगा! केवल मैं ही अँधेरे में हूँ! फिर सोचता हूँ... जब मैंअँधरे में हूँ तो पूरा शहर भला कैसे उजाले में होगा? जब मैं अँधेरे में हूँ तो शहर भी अँधरे में होगा, देश भी अँधेरे में होगा। लाइट का क्या है, आ जाएगी लेकिन यह जो अँधेरा है, बढ़ता जा रहा है। 

कल तक मौत अजनबी लगती थी क्योंकि अजनबियों के मरने की खबरें आ रही थीं। अब लगता है, जानी पहचानी है, क्योंकि अपनो के मरने की खबरें आ रही हैं। बढ़ती जा रही है, कोरोना से संक्रमित हुए लोगों की संख्या। पहले शहर अछूता था अब मोहल्ले भी अछूते नहीं रहे। यह कौन जानता था कि यम भैंस पर नहीं, अपनों के कंधे पर बैठकर आएगा!

वे, जिहोने खरीद लिए हैं रोशनी के चराग, उन्होंने ही, हाँ, उन्होंने ही कैद कर लिया है खुद को एक सुरक्षा चक्र में। खरीद लिए हैं डॉक्टर। खरीद लिए हैं अस्पताल। वैसे ही जैसे खरीद ली हैं.. खबरें। हम जिंदा हैं तो सिर्फ इसलिए कि व्यस्त हैं यमदूत। जिन्हें उठाना था, उठा नहीं पाते। जिनकी बारी नहीं थी, उन्हें लादे चले जा रहे हैं। हम खुश किस्मत हैं कि कहीं, कोई हमसे ज्यादा बदनसीब है। व्यस्त हैं यमराज शायद इसीलिए जीवित हैं हम भी। थक जाएं या हो जाए उनका कोटा पूरा तो शायद बच जांय हम भी, रोशनी वालों की तरह।  अभी तो मैं अँधेरे में हूँ। ऐसा लगता है जैसे मैं ही अँधेरे में हूँ और सबके पास रोशनी है!

25.7.20

बनारस में नागपंचमी

छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो। नागपंचमी के दिन, इसी नारे के शोर से, हम बच्चों की नींद टूटती। ऊँघते, आँखें मलते, घर के बरामदे में खड़े हो, नीचे झाँकते.. गली के चबूतरे पर कुछ किशोर, नाना प्रकार के नागों की तस्वीरों की दुकान सजाए बैठे हैं! मन ललचता, तब तक दूसरे बच्चों का एक झुण्ड, घर के किवाड़ खटखटाता और द्वार खुलते ही धड़धड़ा कर, घर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, ऊपर बैठके के बाहर खड़ा हो जाता! पिताजी तैयार रहते। कुछ सिक्के निकाल कर बच्चों को देते। वे पैर छू कर, पैसे मुठ्ठी में पकड़े, जोर-शोर से नीचे उतरते, चले जाते। गली में आकर फिर नारा लगाते...छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।

माँ, नाग की तस्वीरें, घर के दरवाजों पर, गाय के गोबर से चिपकातीं, नाग देवता की पूजा करतीं, खीर-पूड़ी पकातीं और हम बच्चे नहा धो कर प्रेम से खाते। 

हमारा मन भी करता था लेकिन हम ब्राह्मण के बच्चे थे। हमें नाग बेचने और घर-घर घूमकर पैसे इकठ्ठे करने का अधिकार नहीं था। यह अलग बात है कि पिताजी से नजरें बचा कर, यादवों/मल्लाहों के बच्चों के झुण्ड में शामिल हो, हमने भी नारे लगाए थे...छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।

सुबह से शाम तक बीन बजाते, सपेरे आते। उनकी पेटियों में कई प्रकार के सर्प होते। फन वाले, बिना फन वाले, काले, भूरे, गेहुएँ, एक मुँह वाले और दो मुँह वाले भी! गली के घरों से निकल, माँएं, सांपों को दूध पिलातीं, धान का लावा चढ़ातीं, पैसे चढ़ातीं। सपेरे भी खुश, माँ भी खुश और हम बच्चे भी खुश। बड़े खुशनुमा माहौल से शुरू होता था, नागपंचमी का त्योहार। 

बनारस की तंग गलियों के बीच तिराहों में, जहाँ चौड़ी जगह मिलती, जगह, जगह, महुवर खेले जाते। महुवर देखने के लिए भारी भीड़ जुटती। घरों की छतों, बरामदे की खिड़कियों यहाँ तक कि छज्जों पर खड़े होकर भी लोग महुवर देखते। 

एक मदारी एक हाथ में धरती से थोड़ी धूल उठाता और मंत्र पढ़ते हुए, होठों को हिलाते/बुदबुदाते हुए, दूसरे मदारी के चारों ओर गोल-गोल घूमता। दूसरा मदारी बड़े जोश और दर्प के साथ, दोनों गाल गुब्बारे की तरह फुलाते/पचकाते हुए, बीन बजाता। बड़े बाँके अंदाज में, घनी जटाओं को, कभी इधर, कभी उधर, दोनो कंधों पर झटकता। मंत्र पढ़ने वाला मदारी भयानक मुँह बनाए, लाल-लाल आंखों से बीन बजाने वाले को घूरता, गोल-गोल घूम कर पीछा करता और अचानक, पूरी शक्ति से, जमीन से उठाए धूल के कण दूसरे मदारी को एक हाथ लहराते हुए मारता। 

अरे! यह क्या!!! बीन बजाने वाले की बीन बजनी कैसे रुक गई? उसके मुँह से तो खून भी निकल रहा है! बीन मुँह में अटक गया है!!! निकालने का प्रयास करता है, निकाल ही नहीं पा रहा। चारों ओर गोल-गोल खड़ी भीड़ शोर मचाती..मर गयल रे! अब मर जाई। खून फेंकता हौ..!!!

यही क्रम दिनभर चलता रहता। कभी एक मदारी गिर कर तड़पता कभी दूसरा मदारी। खेल इतना जीवंत होता कि अमिताभ बच्चन या दिलीप कुमार भी फेल।  एकदम सच्चे लगते, मदारियों के घात/प्रतिघात। हम बच्चे, कभी उधर, कभी इधर, मीलों दौड़ते/भागते रहते गलियों में। कभी सुनते वहाँ का महुवर बढ़िया है, कभी सुनते वहाँ का तो और भी बढ़िया है! 

दिन ढलने के बाद भी खतम नहीं होता था बनारस में नागपंचमी का उत्सव। शाम होते-होते, जमा होने लगते थे पहलवान अखाड़ों में। बच्चों/किशोरों/युवाओं के डंबल, क्लब, जिम्नास्टिक और मलखम्भ के करतब तो होते ही,  बड़े पहलवान भी कुश्ती, जोड़ी या गदा घुमाने की प्रतियोगिताओं में भाग लेते। 

कब सुबह होती और कब शाम ढल जाती, पता ही नहीं चलता। घर से खाना खा कर निकले या दोस्तों को बुलाने गए और समझदार माताओं ने जबरी बिठाकर खाना खिला दिया तो ठीक वरना भूखे प्यासे पागलों की तरह दौड़ते/भगते कब बीत जाता, पता ही नहीं चलता था, नागपंचमी का त्योहार। 

कल रात, फेसबुक चलाते हुए किसी पोस्ट से पता चला कि आज नागपंचमी है! आज घर के बाहर, घर में भी, घोर सन्नाटा है मगर सुबह से कानों में गूँज रहा है बस एक ही नारा....छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।

7.7.20

शुभ/अशुभ

बिल्ली ने
दो बच्चे दिए बारिश में
भगा दिया था
दिन में
फिर आकर, रो रहे हैं
रात में

खाली नहीं है शायद
किसी के घर/आँगन का कोई कोना
आ गए हैं
मेरे ही चहारदीवारी के भीतर
रो रहे हैं,
मेरे ही कपारे पर!

बिल्ली को
ऐसा क्यूँ लगता है?
कॉलोनी में
मैं ही सबसे बड़ा दयालू हूँ!

सुनता आया हूँ...
बिल्ली का रोना अशुभ होता है
रोते को चुप कराने की क्षमता न हो तो
आसान है
उसे मारकर भगा देना
लेकिन जैसे ही भगाना चाहता हूँ
पूछती हैं
अँधेरे में चमकती ऑंखें...
चली तो जाऊँ लेकिन इतना बता दो,
किसका रोना शुभ होता है?
..................…................