25.9.16

सुबह की बातें


खामोश हैं, वृक्ष सभी। आंगन में झरे नहीं हैं एक भी पत्ते। चल रही सांसें बता रही हैं कि हवा है। शिकायत के स्वर में चहक रहे हैं पंछी। अखबार वाला दे गया है अखबार। देर से खुली है नींद। दिल में उतर रहा है शुभ प्रभात.

अपने कॉलोनी में अशोक, कदम्ब और सागवान के वृक्ष लगे हैं. घर में प्रवेश द्वार की ओर अशोक, नीबू, बेला के अलावा एक गुड़हल का बूढा पौधा है जो अब फैलकर छत में भी पत्ते गिराने लगा है. वृक्ष अच्छे लगते हैं मगर इससे झरने वाले पत्ते अच्छे नहीं लगते. घर की तो जैसे तैसे सफाई हो जाती है मगर घर से बाहर कालोनी में रोज-रोज साफ़ करना संभव नहीं.कोई सफाई कर्मी कालोनी में नहीं आता. पहले कूड़ा उठने वाला आता था एक महीने से वो भी नहीं आ रहा. मैंने जमादार से एक झाड़ू बनवाई है. जब मैं झाड़ू लगाता हूँ तो अगल-बगल के लोग ललचाई नज़रों से मेरी झाड़ू को देखते हैं मगर कोई झाड़ू के लिए पैसे खर्च करना नहीं चाहता. कोई छोटी झाड़ू डंडे में बांध कर चलाता है तो कोई दस मिनट झाडू लगाने के बाद कमर पकड़ कर बैठ जाता है.कालोनी में झाड़ू लगाने वाले सेवानिवृत्त बुजुर्ग लोग हैं. किसी युवा के पास इस बेकार के काम के लिए फुर्सत नहीं है. आज छुट्टी थी तो सोचा स्वछता अभियान चलाया जाय.

एक घंटे पसीना बहाकर घर और आसपास के इलाकों की सफाई कर दरवाजे पर खडा ही हुआ था कि हवाओं को शरारत सूझी. झाड़ू लगाने तक तो शांत थे, सफाई होते ही तेज-तेज बहने लगे. सूखे पत्तों के ढेर उड़ने लगे. नए पत्ते झमाझम झरने लगे. दस मिनट में ही कालोनी की सड़क फिर वैसी हो गई जैसी झाड़ू लगाने से पहले थी. जब हवाएं प्रतिकूल हो जांये तो आपकी मेहनत का यूं ही कबाड़ा हो जाता है. झाड़ू लगाने से अच्छा है फेसबुक का मजा लिया जाय और बढ़िया-बढ़िया आदर्श बघारा जाय. :


बैठा हूँ धमेख स्तूप-सारनाथ के सामने लोहे की लम्बी कुर्सी पर। पसीना बहाने के बाद अब एहसास हो रहा है कि हवा बह रही है। घने नीम के वृक्षों से स्तूप और स्तूप से वृक्षों पर बैठ छुपन-छुपाई खेलते, गाते दूसरे पंछियों की तरह गा रहे हैं कौए भी।मार्निंग वाक करने वाले जा चुके हैं घूम-घाम कर। अब गाजे-बाजे के साथ आ रहे हैं बुदध के भक्त और स्कूल से भाग कर आये कमसिन जोड़े। सभी प्रेम में है। मुझसे 5-5 फीट की दूरी पर, अगल-बगल बेंच पर दोनो तरफ बैठे हैं एक-एक जोड़े। उनकी तस्वीरें खींचना अच्छी बात नहीं लेकिन शब्द चित्र तो उतार ही सकता हूँ। वे भी निश्चिंत प्रेमालाप कर रहे हैं। खुश हैं कि बुढ्ढा समझदार है, हमारी फोटो नहीं खींच रहा।
बायीं ओर का जोड़ा ठीक-ठाक है, दोनो बालिक हैं। सामान्य कपड़ों मे हैं। कुछ खा-पी रहे हैं। मुझे इनसे कोई परेशानी नहीं। परेशानी दाहिनी ओर बैठे जोड़े से है। दाहिनी ओर बैठा लड़का सामान्य ड्रेस मे है लेकिन लड़की स्कूल ड्रेस में! समस्या उनके प्रेम से नहीं, स्कूल के ड्रेस मे है। कालेज भी नहीं, स्कूल ड्रेस में!!! मुझे लगता है यह अपराध है। अपने साथ, अपने घर वालों के साथ और स्कूल के साथ भी। इस अपराध को रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?

सन्डे के दिन मॉर्निंग वॉक के बाद फुर्सत में जब नीम के पेड़ के नीचे बैठता हूँ तो ऊपर शाख पर बैठे तोते मुझे खूब मन की बात सुनाते हैं। मुझे उनकी बातें टांय-टांय के सिवा कुछ समझ में नहीं आती। मैं तोतों को अपने पैरों के छाले दिखाता हूँ। वे देखा, अनदेखा कर उड़ जाते हैं। वे हरदम इतनी ऊँचाई से उड़ते हैं कि मेरे छाले देख ही नहीं पाते। मैं सोचता हूँ जब मेरे छाले नहीं देख पाते तो उनके कैसे देख पाएंगे जो पत्थर तोड़ते हैं!

पंछियों को पहचानता नहीं हूँ। इनको सुनता खूब हूँ, देखता भी हूँ मगर इनको इनके नाम से नहीं जानता। मोर की चीख, कोयल की कूक, कौए की काँव-काँव, बुलबुल का चहकना, तोते की टें, टें, कबूतरों की गुटर-गूँ और गौरैया की चहचहाहट तो समझता हूँ मगर इनके अलावा बहुत से पंछी हैं जिनके गीत तो सुनता हूँ, नाम नहीं जानता। नाम का न जानना मेरे आनंद लेने में कोई समस्या नहीं है। आनन्द लेने के मामले में मैं बहुत स्वार्थी रहा हूँ। कभी नाम जानने का प्रयास ही नहीं किया बस गुपचुप इन पंछियों के संगीत सुनता रहा। यही कारण है कि आज तक मैं इन पंछियों का नाम नहीं जान पाया। समस्या अभिव्यक्ति में है। आनंद देने में है।

शायद अपने पूर्वांचल में पंछियों के सबसे अधिक मुखर होने का यही मौसम है। भोर में...मतलब भोरिये में..लगभग 4 बजे के आस-पास..एक चिड़िया मेरे इकलौते आम की डाली पर बैठ कर सुरीले, तीखे स्वर में चीखती है। तब तक चीखती है जब तक मैं जाग न जाऊँ! जाग कर मैं उसी को सुनता रहता हूँ। कभी सोने का मन हो तो भगा कर फिर लेटा हूँ। वह फिर चीखी है..तब तक जब तक अजोर न हो जाय! मैं उसका नाम नहीं जानता। जानता तो बस एक वाक्य लिखता और आप समझ जाते कि मैं किस चिड़िया की बात कर रहा हूँ!

सारनाथ पार्क में मोर और कोयल के साथ संगत करती है एक चिड़िया। ऐसा लगता है जैसे जलतरंग बजा रहा है कोई! एक दूसरी प्रजाति वीणा की झंकार की तरह टुन टुनुन टुनुन ..की तान छेड़ती है। अब मुझे इन पंछियों के नाम मालूम होते तो आपको बताने में सरलता होती। फलाँ चिड़िया ने राग मल्हार गाया, फलाँ ने राग ...अरे! बाप रे!!! मुझे तो राग के नाम का भी ज्ञान नहीं। :(

कई बार और मजेदार बात हुई है। मॉर्निंग वॉक के समय पंछियों को खूब बोलते हुये सुन मैंने राह चलते ग्रामीण से पूछा है-दद्दा बतावा! आज चिरई एतना काहे गात हइन ? दद्दा ने जवाब दिया है-गात ना हइन। पियासल हइन, चीखत हइन! अब आप बताइये, कवियों के कलरव गीत पर अकस्मात सन्देह होगा या नहीं?
मिर्जा कहते हैं -पण्डित जी मैं आपको फूलों, पत्तियों और वृक्षों के नाम बताता हूँ, बाकी आपका काम है। अधिक पूछने पर बनारसी संस्कार दिखाते हुये झल्लाने लगते हैं-देखा! ....मत चाटा। ई नाम में का रख्खल हौ? मजा ला। कवि क ..आंट मत बना।
बड़ी समस्या है। अब मान लीजिये मुझे सबका नाम पता होता और लिख भी देता तो क्या आप समझ पाते कि मैं किस पंछी की बात कर रहा हूँ?। घने नीम के नीचे लेटना ही सुखद है, यहाँ तो नीम के कई वृक्ष हैं। दायें बाएं, दूर और दूर। नीम की शाख में तोतों के झुण्ड के झुण्ड तंय-टांय कर रहे हैं। 
सतियानास! धमेख स्तूप के पीछे बने जैन मंदिर से लाऊड स्पीकर से भजन बजने लगा! उनका ईश्वर प्रसन्न हो रहा होगा लेकिन मेरे आनंद में अब खलल पहुँच रहा है। सवा सतियानास! पीछे बुध्द मंदिर से भी लाउडस्पीकर बजने लगा! बुद्धम शरणम् गच्छामी! जय हो... बुद्ध कितने प्रसन्न हो रहे होंगे! 

24.9.16

लोहे का घर-20


एक झपकी सी लगी थी लोहे के घर में। बर्फिली पहाड़ियों से दिखते कास के फूल लहुलुहान हो गये थे सहसा! आ गया होऊँ जैसे युद्ध के मैदान में। नहीं, शामिल नहीं था किसी आत्मघाती दस्ते में। ऐसे दस्ते बनाने की मनाही है अपने देश में। पार कर रहा था पाक अधिकृत कश्मीर का आखिरी दर्रा अकेले ही। खलबली थी पाक खेमे में। ये कौन कर रहा है बमों की बारिश! बह रही थी खून की नदी। कर रहा था मेघ गर्जन। बिछी थी पाकिस्तानी सैनिकों की लाशें। गिन रहा था पागलों सा...एक हजार, दो हजार, तीन हजार.......सोलह हजार, सत्रह हजार..बस्स!!! इतने ही थे तुम्हारे? बहुत उछल रहे थे सत्रह को मारकर! आओ...और आओ...अब तो शुरू हो चुका है युद्ध।
विपरीत दिशा से आ रही दूसरे #ट्रेन की चीखती क्रासिंग से ध्यान भंग हुआ। धत्त! यह तो पागलपन है। कैसे-कैसे सपने आने लगे हैं दिन में भी! मिर्जा! ये कहाँ आ गये हम? कब आयेगा अपना पड़ाव?

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एक झोले में सब कुछ है। अपड़ा-कपड़ा, भगवान और दूसरे झोले में पानी का जग, खाने का सामान। उम्र 75 साल, भेष साध्वी का। जौनपुर से चढ़ी हैं, काशी जाना है। कहीं रामायण से आ रही हैं। शरीर कमजोर नहीं है, तनकर बैठी हैं। 14 बरस से छोड़ दी हैं घर-द्वार। बोले जा रही हैं...जब नहीं रहे भतार तो साथ हैं भरतार। वही भरता है, वही तार से तार जोड़ता है। पूछता हूँ...बीमार पड़ गईं तो? तपाक से दाहिने हाथ की तरजनी ऊपर कर बोलती हैं... वो नहीं है? वो नहीं देखेगा? मरने से पहिले हमको चारपाई पर रखेगा? बीमार करेगा तो कहाँ रहेगा? करेगा न कुछ व्यवस्था। पूर्ण आत्म विश्वास से भरी सुना रही हैं शिव भजन...आदि शंभु स्वरुप मुनीवर, चंद्र शीश जटा धरम....।
कोई नहीं है साथ, कोई नहीं घर बार, साथ है तो ईश्वर के प्रति गहरी आस्था, भक्ति और इसी के प्रभाव से दमकता, चमकता चेहरा। 'लोहे का घर' रोज कुछ नया दिखाता है, रोज कुछ नया सुनाता है।

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हवा में ठंडक है। गोधुली बेला में लोहे के घर की खिड़की से दिख रहे हैं झूमते आम्र वृक्ष। एक लड़का तेज साइकिल चलाकर भागा जा रहा है पगडंडी-पगडंडी। रोज के यात्री खुश हैं कि लेट है फरक्का। बोगी में भीड़ नहीं है। तेजी से बदल रहे हैं दृष्य। कुछ बड़े हो गये हैं धान। अभी उन्होने नहीं पहनी हैं बालियाँ। बरगद की जटा पकड़ कर झूल रहे हैं गांव के किशोर। धीमी हो रही #ट्रेन। लम्बे सरपत और फूले कास के बीच साइकिल के पीछे भाई को बिठा चली जा रही है सांवरी। आ गया जफराबाद। यहाँ भी खड़े हैं रोज के यात्री।
पानी वाले बादलों से घिरा है आकाश। दूर कहीं हो रही होगी बारिश। फिर रफ्तार पकड़ रही है अपनी ट्रेन। बूँदा-बांदी, झमा झम बारिश में बदल गयी सहसा! बंद हो गयीं घर की खिड़कियाँ। शीशे पर रेंगने लगीं बूँदें। अब मजा नहीं दे रही बारिश। बंद हो गई हैं लोहे के घर की खिड़कियाँ। घर मे उमस है, खेतों में जश्न मना रहे हैं कौए। भीतर लोग संभावित भारत पाकिस्तान युद्ध की कर रहे हैं चर्चा। कोई कह रहा है-होगा, कोई कह रहा है-कभी नहीं होगा। बाहर मस्त हैं परिंदे। लहलहा रही है धान की फसल। युद्ध चाहने वाले नहीं जानते कि शीशे पर तेजी से रेंग रही पानी के बुल्लों सी पल में मिट जायेंगी लाखों जिंदगी।
अब रूक चुकी है बारिश। खुल गयी हैं घर की खिड़कियाँ। अंधेरा ओढ़कर सोने के मूड में आ रही है धरती। परिंदे लौट चुके हैं अपने-अपने घंरौंदे में। सुखा रहे होंगे पंख। पटरी पर भाग रही है अपनी ट्रेन। हमारे खेतों को, परिंदों को एटमी हथियारों की नजर न लगे।
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पटरी पर भागता लोहे का घर। बिन जाली की आपात कालीन खिड़की। तेज हवा से फरफर उड़तीं मेरी जुल्फें। काश! तुम होती मेरी सीट पर और सामने बैठा मैं तुमहें निहारता रहता। बाहर अंधेरा है, न चाँद न चाँदनी। दूर कंकरीट के घरों में जुगनू की तरह टिमटिमाते बल्ब ही दिखाई दे रहे हैं। भीतर, बोगी में, बैठे-बैठे ऊँघ रहे हैं दो थकेमांदे।
चीखती, चिल्लाती रूक गयी ट्रेन। किसी ने चेन पुलिंग की है। पहले से 11 घंटे लेट है। किसी का करम फूटा, किसी का सोया भाग्य जगा। सही होती तो अपने को कहाँ मिल पाती! अब इस पिटी#ट्रेन के साथ इतनी छेड़-छाड़! यह अच्छी बात नहीं। फिर रफ्तार पकड़ लिया। शायद कह रही है-मेरी चाल तो यह है, मुँएं चलने दें तब न!
फिर चेन पुलिंग! यह तो हद है यार। कोई है? अरे! इस ट्रेन का नाम 'सदभावना' है। इसके साथ इतनी दुर्भावना क्यों? नान स्टाप को बार-बार स्टाप क्यों करते हो भाई? इस नीति से तो कोई सरकार अच्छे दिन नहीं ला सकती।
दफ्तर से लौटता, ट्रेन में बैठे-बैठे ऊँघता, थका-मांदा प्राणी ट्रेन रूकने पर चौंक कर जागता, कुछ भुनभुनाता, इधर-उधर देखता फिर ऊँघने लगता है। मुझे इनमें साक्षात #प्रभु के दर्शन हो रहे हैं। जागो सरकार! जागो। ट्रेन पर चल रही है मगर सबकुछ ठीक ठाक नहीं घट रहा। शरारती तत्व बार-बार चेन पुलिंग कर रहे हैं।
अच्छे भले रोमांटिक मूड का सतियानास कर दिया इस ट्रेन ने।

17.9.16

राजनीति

मिर्जा को शिकायत है कि हम राजनीति पर नहीं लिखते! मैं पूछता हूँ- राजनीति में लिखने लायक शेष बचा ही क्या है ? कीचड़ में कंकड़ फेकना और एक दूसरे के मुख पर उछालने की उमर नहीं रही। बचपन में करते थे लंठई मगर इतनी तो तब भी न होती थी।

अपने पास न बड़ा कुनबा, न धार्मिक कट्टरता, न जातिवादी मानसिकता, न आम आदमी सरीखी खास बनने की भूख और न पैसा ! राजनीति में जाने के एक भी गुण नहीं। जहाँ जा ही नहीं सकते उसके बारे में क्या लिखना! मेरे लिखने से किसी का ह्रदय परिवर्तित  हो जाये, कठिन तप करके  इतनी योग्यता भी नहीं .  फिर लिखना ही क्यों? जो विषय अपना नहीं उस पर दिमाग क्यों चलाना? सुबह किसी निर्णय से प्रभावित होकर कुछ लिख दिया, शाम को निर्णय वापस! लिखा हुआ गुण, गोबर हो गया! क्या फायदा?

मेरे इतना कहने पर भी मिर्जा मानता नहीं, कुनमुना कर एक शब्द हवा में उछालता  है....समाजवाद ? मैं कहता हूँ-चुप कर मिर्जा! मरवायेगा क्या? हम अमर नहीं, मर सकते हैं। समाजवाद कभी साकार न होने वाला वह सपना है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हर युवा को झकझोरता रहेगा, बुढ्ढे कहते रहेंगे कि समाजवाद की बड़ी लड़ाई उन्होंने ही लड़ी थी. अब आज के युवकों में वो बात कहाँ! और पीढ़ी दर पीढ़ी राजनेता समाजवाद के तवे को गर्म करते रहेंगे, इस पर अपने घर की रोटियाँ सेंकते रहंगे। न पूँजीवादियों की कमी होगी देश में न समाजवादियों की। पुरानी शराब नई बोतल में आती रहेगी। 

मिर्जा! मुझे रहने दे। मुझे उगते सूरज और चहचहाते पंछियों की बात करने दे, सफर का आनंद लेने दे। मंजिलें उनको मुबारक जो राज करते देश में। मुझे गोबर पाथती महिला, पशुओं के चारे के लिए सर पर बोझ ढोती घसियारिन, स्कूल जाते बच्चे और मजदूरी करते, काम पर जाते लोगों में विश्वकर्मा भगवान की एक झलक देख लेने दे। अपने जीवन संघर्ष के बाद शेष बचे दो पल इन्हीं सब में गुजर जाने दे। व्यक्ति के गुणों में राजनीति एक चमत्कार है। इससे बनती देश की सरकार है। इसे दूर से नमस्कार करने में भलाई है मिर्जा, चल!  यहाँ से निकल। इनकी नजर पड़ गई तो तू  गोल, हम लम्बे हो जायेंगे।

13.9.16

कुम्हार


कुल्हड़ हैं,
पुरुवे हैं,
दिये भी हैं
लोग
मिट्टी से
जुड़े भी हैं

अभी है
बनारस की मस्ती
अभी है
कुम्हारों की बस्ती.

श्रम कठिन,
सिमटता बाजार है
गरदन में
लटकती तलवार है
फैलते शहर,
सिमटते खेत,
गायब हो रही मिट्टी
मिट्टी ही
कच्चा माल है
अब इनका
बुरा हाल है
यही
विश्वकर्मा हैं,
यही
मजदूर हैं
सुख-सुविधाओं  से
कोसों दूर हैं

मेरे सामने
इक दरकता पुल है,
आ रही
अंधी गाड़ी है
और
कुछ कर न पाने की
लाचारी है.

अभी तो...
कुल्हड़ हैं,
पुरुवे हैं,
दिये भी हैं
लोग
मिट्टी से
जुड़े भी हैं.
....................

11.9.16

मैं न देखता तो....

एक चिड़िया बैठी
नीम की शाख पर
झर गया
एक पत्ता
न चिड़िया चहकी
न आवाज हुई
मैं न देखता तो
पता ही नहीं चलता
आप न पढ़ते तो
जान ही नहीं पाते
एक गिलहरी
ढूंढ रही है
डस्टबीन में
खाना
कुछ पा लिया है उसने
मुँह में दबाकर
भाग गई
खामोशी से
मैं न देखता तो
पता ही नहीं चलता
आप न पढ़ते तो
जान ही नहीं पाते
छांह
रेंगने लगी घांस पर
भाग रहा है
आकाश में
बादल का एक टुकड़ा
मैं न देखता तो
पता ही नहीं चलता
आप न पढ़ते तो
जान ही नहीं पाते
नंगे पांव
दौड़ती आई
एक बच्ची
बैठ गयी बेंच पर
देखने लगी
आँखें फाड़कर
तार पर बैठी चिड़िया को
चमकने लगा
उसका चेहरा
गजब थी
उसके चेहरे की
खुशी!
मैं न देखता तो
पता ही नहीं चलता
आप न पढ़ते तो
जान ही नहीं पाते
.........

9.9.16

लोहे का घर -19


लिटा कर अपने बर्थ में कहता है लोहे का घर-थके हो, आराम करो। खुशी न दे सको जमाने को तो दर्द के किस्से भी नहीं कहते।
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इंजन मजबूत हो, पटरियाँ सलामत तो तूफान से भी नहीं डरता। अंधेरे में भी चलता, प्यार से सुलाता, झूला झुलाता है 'लोहे का घर'। थके हो तो सो जाओ, ताकत है तो आपस में खूब बहस करो और मूड है तो जुड़ जाओ आभासी दुनियाँ से। जो मर्जी सो करो यह घर ऐसा, जिसमे नहीं कोई घर वाली, नहीं कोई घर वाला। कंकरीट का नहीं लोहे का है। यहाँ टिकट है तो कोई तंग नहीं करता।
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चलते-चलते धीमी हो रही है #ट्रेन की स्पीड। पटरियों की खटर-पटर सुनाई पड़ रही है। शायद कोई स्टेशन आने वाला है। यह सुपर फास्ट है, छोटे-मोटे टेसन को अंगूठा दिखाने के लिए धीमी होती है, ग्रीन सिगनल पाते ही हवा से बातें करने लगती है। रूकना तो कोई नहीं चाहता छोटे स्टेशनो पर मगर सब सुपर फास्ट नहीं होते । बहुतों की जिंदगी पैसिंजर की तरह रेंगने मे ही कट जाती है।
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कुछ दिनो की उमस भरी गर्मी के बाद मौसम सुहाना है। टिप-टिप बारिश का आनंद लेते हुए आ गये अपने 'लोहे के घर' में। पैसिंजर #sjv 50 मिनट विलम्ब से छूटी कैंट स्टेशन से। पूरी#ट्रेन में बिखरे हैं मूंगफली के छिलके। इसमे बैठो तो भारत के मिजाज का पता चलता है। दो बर्थ को अखबार से साफ कर बैठ गये रोज के यात्री। गमछा खुल गया। जम गई तास की चौकड़ी। #समय और #स्वच्छता ठेंगे पर। न तुम सुधरो न हम सुधरेंगे।
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खेत तो खेत स्टेशन भी डूबा है अंधेरे में! #ट्रेन चली तो किसी ने कहा -जफराबाद था। जफर आबाद कब हुआ भाई! दो गज जमी न मिल सकी....।
सत्तर साल की आजादी के बाद भी अंधेरे मे डूबे स्टेशन दिख ही जाते हैं। सारी रौशनी बड़े शहरों ने हड़प ली है शायद।
अंग्रेजों के जमाने का है जलाल गंज का पुल लेकिन थरथराता नहीं है। धड़धड़ा कर गुजर जाता है लोहे का घर। थोड़ी रौशनी है जलालगंज स्टेशन में। कोई अंधेरे मे डूबा, कहीं थोड़ी रौशनी और कोई रोशनी से चकाचौंध! बड़ी बेइंसाफी है यह। समाजवाद के झुनझुने मालगाड़ी पर लदे हैं क्या भाई! #किसान फिर अंधेरे में।
अब रफ्तार पकड़ी है ट्रेन ने। पटरियाँ बदलती है तो ऐसा लगता है जैसे झूला झुला रही है। घर के भीतर रौशनी है। रौशनी मे दिख रहे हैं ऊंघते, मुर्झाये हुए चेहरे। पता नहीं कौन सी मंजिल है सबकी! सफर में दुखी हैं, मंजिल पर पहुँच कर क्या उखाड़ लेंगे! इनसे तो बाहर का अंधेरा ही भला। दूर दिखते टिमटिमाते दिए ही भले। अंधेरों से जूझती जुगनू की रौशनी अच्छी।
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लोहे के घर मे सुबह-सुबह, बैठे-बैठे सोते हुए आदमी को देख मन कैसा तो बेचैन हो गया। लगा कि गलत सीट पर बैठ गये। तभी संजय जी का फोन आया-आवा गुरू! डाक्टर साहब क वीडियो चालू हौ।
एस-2 मे बैठे हैं डाक्टर साहब। लोअर बर्थ में स्पीकर से मोबाइल टिकाये बजा रहे हैं पुराने फिल्मी गीत। आवाज दे कहाँ है, दुनियाँ मेरी जवाँ है। ....ले के पहला-पहला प्यार, भर के आँखों में खुमार, जादू नगरी से आया है कोई जादूगर...।
बाहर हरी-भरी थरती, पटरी पर चलता लोहे का घर और भीतर डाक्टर साहब का मस्त वीडियो। स्पीकर और फोन इतना बढ़िया कि लग रहा घर मे टी.वी देख रहा हूँ। कहाँ वह मनहूस सोता हुआ आदमी, कहाँ ये मस्ती बिखरते डाक्टर साहब!
दरअसल सभी तरह के लोग होते हैं दुनियाँ में, बात सिर्फ इतनी सी है कि आप किसके पास बैठे हैं!।
बज रहा है गीत.....
सब कुछ सीखा हमने ना सिखी होशियारी, सच है दुनियाँ वालों हम हैं अनाड़ी।
सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है....अकड़ किस बात की प्यारे, खुदा के पास जाना है।...
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बाहर वही अंधेरा, भीतर वही शोर। पटरी पर भागता 'लोहे का घर', घर जाते रोज के यात्री। कोई काहू मे मगन, कोई काहू मे मगन। कोई मोबाइल नेटवर्क मे व्यस्त, कोई फालतू की नोंक झोंक मे। कोई-कोई कान मे तार ठूँस देख रहा है फिलिम।
जलालगंज स्टेशन पर रुकी है #ट्रेन। स्टेशन में भी अंधेरा है। क्यों रूकी थी, नहीं पता। रूकी थी तो दुखी थे, चलने पर खुश हुए सभी। जिंदगी की गाड़ी भी जब रूकती है तो घबड़ा जाता है आदमी। समस्या खतम होते ही प्रसन्न हो जाता है। जितनी बड़ी समस्या, उतनी बड़ी खुशी। बड़े सुख की चाहत हो तो बड़े दु:ख को सहने के लिए कलेजा मजबूत करना होता है। यही नहीं कर पाता आम आदमी। पैसिंजर की तरह जो रेंग कर चलते हैं, बार-बार दुखी होते हैं। सुपर फास्ट वालों की जिंदगी में ठहराव की दूरी थोड़ी लम्बी होती है।
यात्री अब थोड़ी बेचैनी मे हैं। जो खुशी ट्रेन पकड़ते समय इनके चेहरों पर थी, खत्म हो चुकी है। अब व्यग्रता है। घर जल्दी पहुँचने की बेचैनी है। मंजिल पास आने का एहसास हो चुका है। आपस की हँसी-ठिठोली खतम हो चुकी है। घर के काम याद आ रहे हैं। आफिस की चिंता से मुक्त हुए अभी बहुत समय नहीं बीता कि घर की चिंता सवार हो गई! खुशी, पटरी के उस पार बिजली के तार पर बैठी शरारती चिड़िया की तरह, पल में ओझल हो जाती है। जिंदगी की ट्रेन/ खुशी के प्लेटफार्म पर/ अधिक देर रूक ही नहीं पाती है।
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30.8.16

शाम जब बारिश हुई....

शाम जब बारिश हुई
झम झमा झम - झम झमा झम -झम झमा झम - झम।
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा
ओढ़ कर छतरी चला था
मैं न भीगा।
भीगीं सड़कें, भीगीं गलियाँ, पेंड़-पौधे, सबके घर आंगन
और वह भी, था नहीं, जिसका जरा भी, भीगने का मन
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा
ओढ़ कर छतरी चला था
मैं न भीगा।
चाहता था भीग जाऊँ------
झर रही हर बूँद की स्वर लहरियों में डूब जाऊँ----
टरटराऊँ
फुदक उछलूँ
खेत की नव-क्यारियों में
कुहुक-कुहकूँ बन के कोयल
आम की नव-डालियों में
झूम कर नाचूँ कि जैसे नाचते हैं मोर वन में
दौड़ जाऊँ
तोड़ लाऊँ
एक बादल
औ. निचोड़ूँ सर पे अपने
भीग जाऊँ
डूब जाऊँ---
हाय लेकिन मैं न भीगा।
ओढ़कर छतरी चला था
मोह में मैं पड़ा था
मुझसे मेरा मैं बड़ा था
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा।
सोचता ही रह गया
देखता ही रह गया
फेंकनी थी छतरिया
ओढ़ता ही रह गया
शाम जब बारिश हुई
प्रेम की बारिश हुई
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा
एक समुंदर बह रहा था
एक कतरा पी न पाया
उम्र लम्बी चाहता था
एक लम्हा जी न पाया
चाहता था युगों से
प्रेम की बरसात हो
भीग जाऊँ-डूब जाऊँ
और प्रीतम साथ हों
हाय लेकिन मैं न भीगा।
ओढ़कर छतरी चला था
मोह में मैं पड़ा था
मुझसे मेरा मैं बड़ा था
मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा।
सोचता ही रह गया
देखता ही रह गया
फेंकनी थी छतरिया
ओढ़ता ही रह गया
शाम जब बारिश हुई
प्रेम की बारिश हुई
झम झमा झम - झम झमा झम - झम झमा झम - झम।
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http://kavita.hindyugm.com/2008/07/blog-post_6702.html वो भी क्या जमाना था जब हिन्द युग्म में अपनी कवितायेँ भेजते थे.