21.1.19

खिचड़ी


हमारे देश मे दरवाजा बंद करना कभी सुहागरात की निशानी होती थी, अब स्वच्छता अभियान की पहचान है। इसके लिए आदरणीय अमित सर और दूरदर्शन के शुक्रगुजार हैं। खाना खाते समय टी वी खोलकर दूरदर्शन का समाचार देखने वालों के सामने कभी-कभी बड़ी असहज स्थिति आ जाती है। इधर एक कौर मुँह में डाला नहीं कि अमित जी चीखते हुए चले आते हैं..

झाड़ी के पीछे, पेड़ के नीचे, दबा के आजू, पटरी के बाजू, करते हो तुम पेट हल्का, ना शौचालय, ना है नलका। फैल गई बीमारी चारों ओर, इसीलिए बॉस! शट द डोर!!  दरवाजा बंद करो..दरवाजा बंद। दरवाजा बंद तो बीमारी बन्द। साथ साथ लोटा/बोतल लेकर खेत मे शौच के लिए जा रहे एक-एक व्यक्ति को बुलाकर शौचालय में भेजते हैं और दरवाजा बंद करते हैं।

यह सब देखकर कल सुबह आप फिर खेत मे निपटने जाते हैं या शौचालय में जाकर दरवाजा बंद करते हैं यह तो बाद की बात है फिलवक्त या तो खाना बंद कीजिए या टी.वी बन्द। 

एक जमाना था जब मध्यम वर्गीय परिवार में, घर के किसी सदस्य ने भी, कई बार दरवाजा बंद किया तो बाकी सदस्य यह मान लेते थे कि आज खाने में मूंग के दाल की पतली खिचड़ी ही मिलेगी। अब परिवार हम दो, हमारे दो तक सीमित हुआ।आर्थिक जीवन स्तर में सुधार आया तो यह हुआ कि जो बार-बार दरवाजा बंद करता है, खिचड़ी वही खाए। बाकी लोग क्यों कष्ट सहें?  

आम आदमी के स्टेटस के साथ, खिचड़ी का भी स्तर सुधर गया। अब खिचड़ी मूंग के दाल वाली, पतली न होकर, तरह तरह के मेवा मसाले वाली पकवान हो गई! कई परिवारों में तो हर शनिवार को खिचड़ी ही बनती है। मकर संक्रांति के दिन बनने वाली उड़द की काली दाल वाली खिचड़ी का तो कहना ही क्या! इसे तो इसके यारों के साथ खाया जाता है। लोकोक्ति भी प्रसिद्ध है.. दही, पापड़, घी, अचार, खिचड़ी के हैं चार यार। 

खिचड़ी भारतीय जीवन में रचा बसा वह पकवान है जिसने कई सामाजिक, राजनैतिक मुहावरे दिए। जब कोई गृहणी खाना देने में देर कर रही हो तो पतिदेव झट से तंज कसते हैं.. बीरबल की खिचड़ी बन रही है! भले उन्हें इसका ज्ञान न हो कि वे जिस बीरबल की खिचड़ी का नाम ले रहे हैं वह खिचड़ी बीरबल ने राजा अकबर को सबक सिखाने के लिए पकाई थी। हुआ यह था कि गरीब गंगाराम दस स्वर्ण मुद्रा के लालच में रात भर ठंडे पानी में खड़ा रहा और राजा ने यह कहकर ईनाम देने से इनकार कर दिया कि उसे दूर जल रहे दिए से गर्मी मिल रही थी! बीरबल ने भी अपने भोजन की हाँडी आग से काफी ऊँचाई पर टांग दी और यह कहा कि जब दिए से गंगाराम को गर्मी मिल सकती है तो आग से ऊँची रखी हाँडी को क्यों नहीं मिलेगी? जब खिचड़ी पकेगी तब दरबार मे आएंगे। अकबर को गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गरीब गंगाराम को दस स्वर्ण मुद्राएँ देना स्वीकार किया। तभी से बीरबल की खिचड़ी वाला मुहावरा चलन में आ गया। अब भोजन मिलने में देर हो तो बजाय तंज कसने के पतियों को यह समझना चाहिए कि जरूर उन्होंने अपनी श्रीमती जी से किया कोई वादा पूरा नहीं किया है जिससे खाना देर से पक रहा है। :)

भारत की राजनीति में भी जब किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता और कई पार्टियाँ मिल कर सरकार बनाती हैं तो अखबार वाले झट से यह हेड लाइन लगा देते हैं.. किसी दल को बहुमत नहीं, अब बनेगी खिचड़ी सरकार! मतलब जब देश के विकास का दरवाजा बार-बार बन्द होने लगता है, देश का हाजमा खराब हो जाता है, तब उसे खिचड़ी सरकार से काम चलाना पड़ता है। देश में जब खिचड़ी सरकार बनती है तो उसके चारों यार खूब रँगबाजी करते हैं। काली उड़द की खिचड़ी में दही, पापड़, घी, अचार रंग जमाते हैं तो खिचड़ी सरकार में सरकार नेपथ्य में चली जाती है, यार मौज उड़ाने लगते हैं! देश में पूर्ण बहुमत की सरकार है तो समझना चाहिए कि देश का स्वास्थ्य अच्छा है। खिचड़ी सरकार है मतलब देश बीमार चल रहा है। पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए चाहे जितनी बड़ी हाँडी चढ़ाकर मनो खिचड़ी पकाओ लेकिन यह नौबत न आने दो कि देश को खिचड़ी सरकार मिले। देश अब फिर बीमार हुआ तो स्वस्थ होने में वर्षों लग जाएंगे।
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13.1.19

ये पतंगें

तेरी नीयत
तेरे मंझे
तू ही जाने
मैं साथ रहना चाहता हूँ
इन पतंगों के!
ये पतंगें
बादलों में
धूप लिखना चाहती हैं।

आकाश में
छाई है बदली,
हो रही है
हल्की-फुल्की
बूंदाबांदी
और फिर
बह रही
कातिल हवाएं!
प्रतिकूल हैं
रंग सारे
मगर फिर भी
ये पतंगें
बादलों को चीरकर
किरण लिखना चाहती हैं।

ये पतंगें
बादलों में
धूप लिखना चाहती हैं।

ये पतंगें
हौसलों की बातियाँ हैं,
ये पतंगें
इस धरा की थातियाँ हैं,
ये पतंगें
आग की चिंगारियाँ हैं।
चलो साथी!
साथ दें
इन पतंगों का
ये पतंगें
इस धरा में
सुबह लिखना चाहती हैं।


31.12.18

इक्कीसवीं सदी का टीन एज

अफसोस मत कर
इक्कीसवीं सदी
अभी अपने
टीन एज के
आखिरी साल में
प्रवेश कर रही है
और हम
पचपन पार हो गए!

अफसोस मत कर
चाँद पर घर बनाने और
उड़ने वाले जूते/जैकेट
खरीदने से पहले
हम स्वर्ग सिधार जाएंगे।

अफ़सोस मत कर
नहीं खत्म हुए
जम्मू कश्मीर से आतंकवादी,
संसार से परमाणु हथियार और
नहीं मिटी अपने देश से
गरीबी।

अफसोस मत कर
इक्कीसवीं सदी ने
अपने टीन एज में ही
खूब सहे हैं
जाति और साम्प्रदायिकता के दंश,
नहीं बन सका अभी तक
अयोध्या में भव्य राम मंदिर और
नहीं आया
भारत में रामराज्य।

खुश हो
कि सभी झंझावात सह कर भी
सलामत रख सके हम
खुद को,
खुश हो
कि अभीतक
गलत काम करना
निंदनीय है समाज में,
अच्छे काम की
आज भी होती है
भूरी-भूरी प्रशंसा,
खुश हो
कि स्मार्ट हो गए हम भी
इक्कीसवीं सदी में
स्मार्टफोन खरीद कर
और खुश होने की सबसे बड़ी बात यह
कि नहीं रहना पड़ा हमें
बीसवीं सदी के
टीन-एज में
जब देश गुलाम था।

भाग्यशाली हैं हम
आजाद मुल्क में पैदा हुए,
बनाते रहे
अपनी सरकार और
अक्षिसाक्षी रहे
इक्कीसवीं सदी के
टीन-एज के।
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30.12.18

जाड़े की धूप

आज मैंने भी तुमसे खूब प्यार किया
आज तुमने भी मेरा खूब साथ दिया।

छत पर चढ़ा तो झट से लिपट गई मुझसे
थोड़ा ठहरा तो जी भर के मुझे गर्म किया।

पँछी आते हैं, चुगते हैं औ चहकते भी हैं!
एक छुट्टी में, हमने भी ये महसूस किया।

पत्नी ने पाल रख्खे हैं गमलों में कई पौधे
इक गुलाब को हँसकर मैंने आदाब किया।

इस घाट से उस घाट तक चला शाम तलक
आज घण्टों माँ गङ्गा का दीदार किया।

एक कुतिया ने मढ़ी में जने थे कई पिल्ले
कुछ मूर्तियाँ थीं, झुककर, नमस्कार किया।

जाड़े की धूप! तू साए की तरह थी दिनभर
आज तुमने भी मुझसे खूब प्यार किया।
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बच्चे और गुब्बारे

एक बच्चा
सांता बनकर
गुब्बारे बांटता है।
एक बच्चा
गुब्बारे पा कर
खुश होता है।
हमारे देश में
तीसरा बच्चा भी रहता है
जो न गुब्बारे बांटता है न गुब्बारे पाता है
शाम की रोटी के लिए
दिनभर गुब्बारे बेचता है।

हे सांता!
तुम उस तीसरे बच्चे तक पहुँच सको
यही शुभकामना है।
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22.12.18

ओ दिसम्बर! (5)

जानता हूँ
जाते जाते
अनगिन जादू दिखलाएगा
हिम शिखरों से
झौआ भर-भर
बादल, कोहरा
ले आएगा

अभी तो मफलर जैकेट से ही
काम चल रहा अपना
दिन में खिलती धूप गुनगुनी
समय कट रहा अपना
कल जब बादल घिर आएँगे
लकड़ी जलवाएगा।

जानता हूँ
जाते जाते
अनगिन जादू दिखलाएगा।

अभी तो जाड़ा मस्त गुलाबी
मन चाहा बाजार
सुबह मलइयो, दिन अमरूदी,
शाम मूँगफली यार!
बर्फीली बारिश में क्या
मदिरा मिलवाएगा?

जानता हूँ
जाते जाते
अनगिन जादू दिखलाएगा।

ओ दिसम्बर!
बहुत बड़ा जादूगर लेकिन
तू भी है लाचार
नई हवा की लटक रही है
तुझ पर भी तलवार
क्या गोरी से फिर छत पर
स्वेटर बुनवाएगा?
क्या अचार के मर्तबान को
धूप दिखा पाएगा?

जानता हूँ
जाते जाते
अनगिन जादू दिखलाएगा।
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17.12.18

लालची आतंकवादी और सहिष्णु भारतीय

सुबह उठा तो देखा.. 
मच्छरदानी के भीतर 
एक मच्छर! 
मेरा खून पीकर मोटाया हुआ, 
करिया लाल

मारने के लिए हाथ उठाया तो 
ठहर गया
रात भर का साफ़ हाथ 
सुबह 
अपने ही खून से गन्दा हो?
यह अच्छी बात नहीं। 

सोचा, उड़ा दूँ!
मगर वो खून पीकर 
इतना भारी हो चुका था क़ि 
गिरकर 
बिस्तर पर बैठ गया! 
मैं जैसे चाहूँ वैसे मारूं 
धीरे-धीरे 
मुझे उस पर दया आने लगी! 
आखिर 
इसके रगों में अपना ही खून था!!! 

मैंने उसे 
हौले से मुठ्ठी में बंद किया और 
बाहर उड़ा दिया। 

इस तरह 
वह लालची अतंकवादी 
और मैं 
सहिष्णु भारतीय 
बना रहा।
..........