21.4.19

बनारस की गलियाँ-6

ढूँढ रहा था अपने ही शहर की गलियों में भटकते हुए बचपन का कोई मित्र जिसके साथ खेले थे हमने आइस-पाइस, विष-अमृत या लीलो लीलो पहाड़िया. हार कर बैठ गया पान की एक दुकान के सामने चबूतरे पर. बड़ी देर बाद एक बुढ्ढा नजर आया. बाल सफ़ेद लेकिन चेहरे में वही चमक. ध्यान से देखा तो वही बचानू था! जोर से आवाज लगाई..अबे! बचनुआँsss! पहिचान नहीं रहे हो का भो@#..वाले?

वह लपकते हुए पास आया..अच्छा तो तुम हो! हम कहे कौन मादर..@# आ गया..भो@#..का जो हमको इस नाम से पुकार रहा है..बचनुआँ! एक टीलाई(चपत) देंगे बु@# के ...इत्ते बड़े हो गए मगर ..अबे..बचनुआँ! बड़े हो गए हो अब..यहाँ हमारी इज्जत है. चलो! घर चलो..चाय पिलायें.

तुम्हारे बाल तो सरफ के झाग की तरह सफ़ेद हो गये बे!

तुम्हारे कौन काले हैं? हमरी तरह डाई लगाना छोड़ दो फिर पूरी लुंगी खुल के हाथ में आ जावेगी!

और बताओ..गंगारेडियो कैसी है?

हा हा हा ...गंगा रेडियो के दूकान में तुम न घंटों खड़े रहते थे बे? कि आयेगी रेडियो बनवाने. 

बैंड बज गया तुम्हारा?

नहीं यार! शादिये नहीं किये!! तुम कर के कितना झां$ उखाड़ लिए?

शादी नहीं किये! पक्के मजनू निकले!!!

नहीं ...वो बात नहीं है भो..#$ के ...मन ही नहीं हुआ....चुप करो.. फालतू की बात मत करो..लो चाय पीयो! आया करो कभी इधर..तुम्हारे मकान का तो काया पलट हो गया है. और तुमको पता है? राजनाथ मर गया.

ओह..! तब तो शतरंज की अड़ी लौ@ लग गई होगी?

शतरंज! अब किसको फुरसत है शतरंज खेलने की? किसी के पास इतना समय है क्या भो...? तुम खेलते हो अब भी?

नहीं ...सब छुट गया. अब जो भी समय मिला फेसबुक में लिख-पढ़ लिया बस्स!

और बताओ? वो तुम्हारी काव्य गोष्ठी? अभी भी च्यूतियापा करते हो!

भक भो#@ के! कविताई तुमको च्यूतियापा लगती है? जितनी समस्या आज बढ़ी है न! वह सब शतरंज न खेलने और साहित्य से दूर रहने के कारण बढ़ी है. सब खाली निन्यानबे के चक्कर में भाग रहे हैं.

उसमें समय बहुत बरबाद होता है ..तुम मानो या न मानो.

समय! अब जो आज के लौंडे चौबीसों घंटा फेसबुक और वाट्सएप में गां@ मराते हैं ..वह क्या है? समय बरबाद नहीं होता? समय तो रजा वही समय है..हमने सिर्फ इस्तेमाल करने का तरीका बदल दिया है. पान खिलाओ!

चलो पान खिलाते हैं...आया करो कभी-कभी ..अच्छा लगा.

आयेंगे...आना ही पड़ेगा..पता तो करना ही है कि बचानू के गंगा रेडियो का क्या हुआ...!

चुप बे!...पान जमाओ...उसका नाम अब दुबारा मत लेना ...जय राम जी की।

20.4.19

बनारस की गलियाँ-5

गली में भीड़ देख
ठिठक जाते थे कदम
घुसकर
झाँकते थे हम भी

चबूतरे पर
बिछी होती थी
शतरंज की बाजी
खेलने वाले तो
दो ही होते थे
चाल बताने वाले होते थे
कई।

हर मोहल्ले में थीं
दो/चार
चाय और पान की दुकानें
दुकानों के पास
चबूतरों पर
सजती थीं अड़ियाँ
होती थीं
खेल, फ़िल्म, नाटक, संगीत, साहित्य और..
देश की राजनीति पर
चर्चा।

अब
चबूतरे भले उतने ही हों
कुछ बढ़ ही गई हैं
चाय/पान की दुकानें
अड़ियाँ भी जमती हैं कहीं-कहीं
मगर नहीं दिखती
शतरंज के बाजियाँ,
नहीं होती
खेल, फ़िल्म, नाटक, संगीत या साहित्य पर चर्चा
आम मध्यम वर्गीय
नहीं देख पाते
मॉल में जाकर
फिलिम,
डाउन लोड कर के या मांग कर
देख लेते हैं
मोबाइल में ही।

आज के किसी गायक या संगीत पर
तारीफ या आलोचना के लिए
आम आदमी के पास
कुछ नही है
बहस का विषय
नहीं बन पाती किसी लेखक की नई पुस्तक
बहस होती है तो सिर्फ
राजनीति पर

लोगों के पास
समय का अभाव है
खर्च बढ़ गया है,
कमाने की होड़ है
बताने के लिए तो
आज भी
बहुत कुछ है,
कम है तो
सुनने/सहने की क्षमता
आज भी
वैसी ही हैं
बनारस की गलियाँ
लेकिन
अब वैसा नहीं रहा
गलियों का मिजाज।
......................

बनारस की गलियाँ-4 (प्रभु दर्शन)

सोम से रवि तक
अलग-अलग
सभी भगवानों के दिन निर्धारित हैं।

जब हम छोटे थे
जाते थे समय निकाल
निर्धारित वार
निर्धारित भगवान के दरबार

सोमवार-विश्वनाथ जी,
मंगलवार-संकटमोचन,
बुद्धवार-बड़ा गणेश,
बी वार-बृहस्पति भगवान,
शुक्रवार-संकठा जी,
शनिवार-शनिदेव,
रविवार-काशी के कोतवाल, भैरोनाथ के मंदिर।

कहना न होगा
इस तरह
भगवान के दर्शन करने में
रोज खाते थे
भीड़ का धक्का!

धक्के खाते-खाते एक दिन
भगवान जी ने ही बुद्धि दी..
भक्त!
रोज भीड़ में
क्यों लाइन लगाते हो?
खाली समय आया करो
मेरे दर्शन
आराम से पाया करो
मुझे भी अच्छा लगेगा,
तुम्हारा भी
कीमती समय बचेगा।

बस,
फिर क्या था!
मैने
मन्दिर जाने का क्रम बदल दिया
जो दिन
जिस मन्दिर के लिए निर्धारित था,
उस दिन
उस मंदिर में जाना छोड़ दिया!

अब रोज
आराम-आराम से
भगवान जी के दर्शन होने लगे
हम भगवान जी से और...
भगवान जी
हमसे खुश रहने लगे।

सोचता हूँ
यही आइडिया
आधुनिक भगवान जी पर लागू करूँ
जब वे
कुर्सी पर विराजमान न हों
उनके दर्शन
कर लिया करूँ
जैसे-जैसे
उनके दिन फिरेंगे
वैसे-वैसे
वे हम पर भी
कृपा करेंगे
प्राचीन भगवान जी के दिन
भले कभी न बदलें
आधुनिक भगवान जी के दिन
बदलते रहेंगे
कोई भक्त
हमेशा किसी एक से
कभी सन्तुष्ट
रह नहीं सकता।
...................

19.4.19

बनारस की गलियाँ-3

चबूतरे पर बैठे होते थे
प्याऊ
बड़े-से मिट्टी के घड़े में लेकर
ठंडा-ठंडा पानी
पेट भर पीते थे हम
होने पर कभी दे भी देेते थे
एक पइसा, दो पइसा या फिर पूरे पाँच पैसे भी
लेकिन नहीं माँगता था कभी
अपने मुँह से
एक पइसा भी
प्याऊ!

गर्मी की दोपहरी में
बनारस की गली में।
.........................

सहमकर
चढ़ जाते हैं चबूतरे पर
बच्चों के साथ बड़े भी
जब सांड़ दौड़ाता है
गाय को।

छुट्टे घूमते हैं सांड़
तो खूँटे से बंधी नहीं होती
गाय भी
बनारस की गलियों में।
.......


बनारस की गलियाँ-2

ढेरा सारा
दाल-भात, साग-सब्जी खाकर
मस्त सांड़-सा
खिड़की के पास
पसर जाता था तोंदियल
भरता रहता था
जोर-जोर खर्राटे
पास बैठी उसकी पत्नी
निरीह गाय-सी
घुमाती रहती थी
गोल-गोल
घिर्रीदार हाथ का पंखा

पर्दा हटाकर
खिड़की से घर में
झांकना चाहता था
पूरा शहर
झांक पाते थे मगर
कुछ मेरी ही उम्र के
शरारती बच्चे

गर्मी की दोपहरी में
बनारस की गली में।
...............

बनारस की गलियाँ-1

उस गली से
लगते थे नारे..
दो बैलों की जोड़ी है
एक अंधा एक कोढ़ी है।

इस गली से
लगते थे नारे...
जिस दिये में तेल नही है
वह दिया बेकार है।

पता नहीं
वे गर्मियों के दिन थे या जाड़े के
पर याद है
हम भी
निकलते थे घर से
इन्कलाब जिंदाबाद को
तीन क्लास जिंदाबाद कहते हुए
बनारस की गली में।
............................

9.4.19

कबूतर और सरकारी कार्यालय

खिड़की के रास्ते
कमरे में
आ ही जाते हैं
कबूतर
मैने इन्हें कई बार कहा..
कहाँ तुम शांति के प्रतीक,
कहाँ यह सरकारी कार्यालय!
यहाँ मत आओ।

तुम चाहे 
जितने भी निर्बल वर्ग के हो,
इसमें तुम्हारा 
कोई स्थान नहीं!
प्राकृतिक संसाधनों पर
हम मनुष्यों का 
हो चुका है 
सम्पूर्ण कब्जा,
आरक्षण के साथ
हो चुका है
दाने-दाने का
बंटवारा,
तुम्हारा कोई बिल
बकाया हो ही नहीं सकता
यहाँ मत आओ।

यह सरकारी कार्यालय है
यहाँ
पर कतरने के 
मौजूद हैं
सभी सामान
छत पर टँगा हुआ पँखा,
तुम्हें दिखाई नहीं देता?
आवाजें
तुम्हें
भयभीत नहीं करतीं?
जा सकती है जान भी,
यहाँ मत आओ।

इन फाइलों में
चोंच गड़ा-गड़ा कर
पस्त हो जाते हैं मनुष्य भी
तुम्हारी क्या औकात?
तुम्हारी तो
निकल जाती है बीट भी!
यहाँ मत आओ।

दाना चुगे बिना.
व्यर्थ में,
कितने मरे?
इसका कोई आंकड़ा
किसी फ़ाइल में
मौजूद नहीं है
बस इतना जानता हूँ
शायद
असहाय मनुष्यों को भी
कार्यालय की 
सीढ़ियाँ चढ़ते देख
कबूतर 
अपने पँखों पर इतराते/
ललच जाते हैं!
खिड़की के रास्ते
कमरे में
आ ही जाते हैं।
...............