17.12.18

लालची आतंकवादी और सहिष्णु भारतीय

सुबह उठा तो देखा.. 
मच्छरदानी के भीतर 
एक मच्छर! 
मेरा खून पीकर मोटाया हुआ, 
करिया लाल

मारने के लिए हाथ उठाया तो 
ठहर गया
रात भर का साफ़ हाथ 
सुबह 
अपने ही खून से गन्दा हो?
यह अच्छी बात नहीं। 

सोचा, उड़ा दूँ!
मगर वो खून पीकर 
इतना भारी हो चुका था क़ि 
गिरकर 
बिस्तर पर बैठ गया! 
मैं जैसे चाहूँ वैसे मारूं 
धीरे-धीरे 
मुझे उस पर दया आने लगी! 
आखिर 
इसके रगों में अपना ही खून था!!! 

मैंने उसे 
हौले से मुठ्ठी में बंद किया और 
बाहर उड़ा दिया। 

इस तरह 
वह लालची अतंकवादी 
और मैं 
सहिष्णु भारतीय 
बना रहा।
..........

16.12.18

नीम

मैं तो 
नीम हूँ
सात गाँव का
हकीम हूँ।

कोई न काटे तो
सदियों जवान रहता हूँ
पतझड़ में
कपड़े बदलता रहता हूँ।

भारत और उसके पड़ोसी देशों में
खिलता/हँसता रहता हूँ
अधिक ठंडे देशों में
मुरझा जाता हूँ
अब दूर देश के विदेशी भी
मुझे चाहने लगे हैं
मुझे लगा कर
स्वास्थ्य सुख लेने लगे हैं।

चर्म रोग हो
मेरे छाल का लेप लगा लो,
दाँत चमकाने हों या
मसूड़े स्वस्थ रखने हों
टहनियाँ तोड़ कर
दातून कर लो,
मेरी पत्तियों को
उबालकर नहा लो
अपने घाव
ठीक कर लो,
मेरी नींबोली के तेल से
मालिश कर लो,
मधुमेह की दवा हूँ,
हवा को शुद्ध रखता हूँ
कड़वा हूँ पर
नख से शिख तक
लाभकारी हूँ।

जिसने मुझे पहचाना
मेरी छाँव तले बैठकर
खूब मजा काटा,
जिसने नहीं जाना
दो गज जमीन के लिए
उखाड़ कर
खेत में मिला दिया।

मैं तो
नीम हूँ
सात गाँव का
हकीम हूँ।
............

भेड़

एक दिन ऐसा हुआ
गड़रिया और भेड़ों के झुण्ड को देख
मेरा मन भी
भेड़ बनने को हुआ!

कूद गया लोहे के घर से
झुण्ड में शामिल हो 
भेड़ बन गया
एक बूढ़े भेड़ ने
मेरी यह हरकत देख ली!
धीरे से कान में पूछा..
उस झुण्ड से, इस झुण्ड में, क्यों आये हो?
पहले तो सकपकाया
फिर सम्भल कर बोला..
मुझे तुम्हारा नेता, अपने नेता से, अच्छा लगा।

बूढ़े ने हँसकर कहा..
वो तो ठीक है 
मगर यहाँ सभी
एक ही विचारधारा के हैं
इसलिए
झुण्ड में हैं
तुमको परेशानी होगी
मैंने सुना है
मनुष्यों का चित्त बड़ा चंचल होता है।

मैंने कहा..
वहाँ भी खतरा बढ़ गया है
तुम लोग 
हमेशा झुण्ड में चलते हो
शायद यहाँ
सुकून हो।

एक दिन 
मैंने महसूस किया
एक भेड़ 
जो गड़रिये से कुछ शिकायत कर रहा था
गुम था! 
मैंने बूढ़े को
प्रश्नवाचक निगाहों से देखा!
बूढ़े भेड़ के मुखड़े पर
एक कुटिल मुस्कान थी।
............

14.12.18

ओ दिसम्बर! (4)

ओ दिसम्बर!
जब से तू आया है 
सुरुज नारायण
बड़ी देर से
निकल रहे हैं,
बिस्तर में ही 
आ जाती है
अदरक वाली चाय।

घर से निकलो
चौरस्ते पर, रस्ता रोके
हलवाई की
गरम कड़ाही!

सुबह-सबेरे
छन छन छन छन
नाच रही है
फुली कचौड़ी
औ शीरे में
मार के डुबकी
निकल रही है
लाल जलेबी

लोहे के घर में बैठो तो
रस्ते-रस्ते
सरसों के फूल बिछे हैं
अन्तरिक्ष के यात्री जैसे
सभी पुराने 
यार दिखे हैं!

घर लौटो तो
खुशबू-खुशबू
महका-महका
आँगन मिलता,
रात की रानी
दरवज्जे पर ही
बड़े प्यार से
हाय!
बोलती।

ओ दिसम्बर!
जब से तू आया है
नीम अँधेरे
एक पियाली
चुपके-चुपके
छलक रही है,
मेरे दिल में
नए वर्ष की, नई जनवरी
उतर रही है।
.... 

3.12.18

ओ दिसम्बर!-3

लोहे के घर की शाम 
ठंडी हो चली है
अच्छी नहीं लगती
खिड़कियों से आती
सुरसुरी हवा
पाँच बजते ही
ढलने लगता है सूरज
छोटी हो चली है
गोधूलि बेला।

हवा में तैर रही है
कोहरे की
एक लंबी रेखा,
पगडण्डी-पगडण्डी
सर पर बोझा लादे
चली जा रही 
एक घसियारिन,
खेत-खेत
भागा जा रहा 
लँगड़ा कुत्ता,
धुएँ से लिपटी
छोटी सी 
इक लपट दिखी थी,
किसी कामगार का
चूल्हा जला होगा।

थरथराई है
पूरी ट्रेन
काँप गया होगा
सई नदी का पुल
प्यार या दर्द
इक तरफा नहीं होता
हम जिस तरफ होते हैं
महसूस
वही होता है।

ओ दिसम्बर!
तेरे आते ही
छाने लगे हैं कोहरे
अंधियारे में
एक अंगीठी 
सुलग रही है
मेरे मन में
नए वर्ष की
नई जनवरी
उतर रही है।
............

ओ दिसम्बर!-2

ओ दिसम्बर!
जब से तू आया है
यादों की
गठरी लाया है।

देर शाम 
मेरी गली में 
फेरे वाला
आवाज लगाता..
चिनियाँ बादाम, गज़क!

सुबह सबेरे 
मेरी गली में
फेरी वाला
आवाज लगाता..
मलइयो है!

पापा सुना, अनसुना कर दें
अम्मा 
कहाँ चुप रह पातीं!
ओने कोने
ढूँढ-ढाँढ कर
थोड़े से सिक्के ले आतीं

कोई रोको!
फेरी वाला
आँखों से ओझल न होवे
कोई गीनो
सिक्के सारे
कुल जमा, कितने हो जाते?

हम बच्चे
चहक-चहक कर खाते
माँ बस 
झगड़े सुलझाती थीं।

ओ दिसम्बर!
जब से तू आया है
यादों की भारी गठरी
फिर खुलने को
मचल रही है!
मेरे मन में
नए वर्ष की
नई जनवरी
उतर रही है।
........

ओ दिसम्बर! -1

ओ दिसम्बर!
तेरे आने की आहट
आने लगी है।

सुबह-शाम 
गिरने लगे हैं
लोहे के घर की खिड़कियों के शीशे
धान कट चुके
खेतों में
बैलों की तरह
दौड़ रहे हैं ट्रैक्टर 
दिखते हैं
सरसों के फूलों भरे चकत्ते,
जुते खेत की सूखी मिट्टी पर 
जीभ लपलपाते/
टुकुर-टुकुर ताकते
कुत्ते,
खिली हुई है 
जाड़े की धूप।

ओ दिसम्बर!
आओ!
स्वागत है
तेरे आने से
अंधियारे की सूखी लकड़ी
फिर जलने को 
मचल रही है
मेरे मन में नए वर्ष की
नई जनवरी
उतर रही है।
...........

28.11.18

लोहे का घर {ककरी/पेहटा}

दून में आज ग़ज़ब की भीड़ है। इसके चार घंटे पहले और दो घंटे बाद तक दूसरी बनारस जाने वाली कोई ट्रेन नहीं है। दिन में आने वाली दून, शाम छः बजे के बाद जफराबाद स्टेशन पर आई है। अपने को बैठने के लिए दरवाजे के पास वाली खिड़की मिल गई है। रोज का चलन भले खराब हो, अभी इसकी चाल मस्त है। 

जफराबाद एक महत्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित प्लेटफॉर्म है। यहां से पांचों दिशाओं में ट्रेने आती/जाती हैं। यहां से अयोध्या, छपरा, सुल्तानपुर, इलाहाबाद और बनारस जाया जा सकता है। यहां से जौनपुर कचहरी मात्र ४-५ किमी की दूरी पर है। इतना महत्वपूर्ण स्टेशन होने के बाद भी कस्बाई स्टेशन होने के कारण उपेक्षित है। जौनपुर से यहां आने वाली सड़क की हालत बड़ी जर्जर है। गिने न जा सकने वाले गढ्ढे हैं। गढ्ढे इतने गहरे और बड़े नहीं हैं कि ऑटो इसमें चल ही न सकें मगर इतने जरूर हैं कि अगर ऑटो वाला संभाल कर न चलाए तो गाड़ी उलट सकती है।

चार प्लेटफॉर्म वाले इस स्टेशन पर दोनों तरफ छोटी छोटी गुमटियों वाली कई दुकाने हैं। जिसमें चाय, पान, पकौड़े, बाटी और चाट बिकते हैं। एकाध पक्की दुकान भी है जिसमें खोए की बर्फी, बेसन के लडडू और दूसरी रोजमर्रा के जरूरतों की चीजें मिलती हैं। सभी दुकानें स्थानीय गांव वालों की हैं। इन दुकानों का चलना रोज आने जाने वाले यात्रियों पर अधिक निर्भर करता है। ट्रेन लेट हो गई तो रोज के भूखे यात्री ताजा छन रही पकौड़ियों, आलू बड़े और ब्रेड पकौड़ों पर टूट पड़ते हैं। कभी कभी तो दुकानदार का सामान चुक जाता है और उसे कहना पड़ता है.. ख़तम हो गयल साहेब!

आज भी जाफराबाद स्टेशन पर वैसी ही भीड़ थी। आने जाने वाली गाड़ियों का तांता लगा था और बनारस जाने वाली दून टेढ़ घंटे से अगले स्टेशन भंडारी पर अपनी बारी की प्रतीक्षा में रुकी पड़ी थी। पकौड़ी और बड़े उड़ाने के बाद हम प्लेटफॉर्म पर खड़े ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी आदिवासी जैसे दिखाई पड़ने वाले बिहारियों की भीड़ दिखाई पड़ी। सभी के पास दो दो, चार चार सीमेंट वाले बोरे भरे पड़े थे। हमने पूछा..

इसमें क्या है? आप लोग कहां से आ रहे हो और कहां जा रहे हो? 

वे बोले.. इसमें ककरी है साहेब! भुट्टे के खेतों में पाया जाता है। इसको यहां आप लोग नहीं खाते। हम लोगों को मुफ्त में मिल जाती है। खाली बीनने में मेहनत लगता है। इसका बीज नहीं खाते। बीज निकाल कर फेंक देते हैं। इधर इसे पेहटा भी बोलते हैं। 

क्या करते हो इनका?

खाते हैं। अपने घर ले जा कर काटेंगे और धूप में सुखा देंगे। फिर यह पूरे साल खाने के काम आता है। इसको तेल में तलकर पापड़ की तरह खा सकते हैं और सब्जी भी बना सकते हैं। 

कैसे जाओगे?

पैसेंजर मिलेगी साहेब। अभी बनारस जाएंगे फिर भोर में पैसेंजर मिल जाएगी.. आसनसोल!

सिर्फ यही बीनने यहां आए थे या कोई और काम था?

इसीलिए साल में एक बार आते साहेब! और कोई दूसरा काम नहीं। 

मैंने देखा इनके पास इन बोरों के सिवा कोई दूसरा सामान न था। इनमें पुरुष भी थे और महिलाएं भी। हां, बच्चे नहीं दिखे। ये सिर्फ इधर मुफ्त मिलने वाली ककरी के लिए इतनी दूर से चलकर आए थे। भारतीय रेल न होती, सस्ते भाड़े वाली पैसेंजर ट्रेनें न होतीं तो शायद उनका यहां आना और इस तरह बोरों में भरकर खाद्य पदार्थ जुटाना संभव न था। वाकई पैसेंजर ट्रेनें इन मेहनतकश गरीबों के लिए जीवन रेखा का काम करती हैं।

30.10.18

किछौछा शरीफ

गोधूली बेला थी। दून अपने निर्धारित समय से लेट थी मगर अपने काम से छुट्टी के बाद अनुकूल समय पर मिल गई थी और हवा से बातें कर रही थी। हमेशा की तरह खाली खिड़की ढूंढ कर मैं खिड़की के पास बैठ चुका था और खिड़की से बाहर का नजारा लेने में मशगूल था। सई नदी के ऊपर से जब ट्रेन गुजरी तो नदी के रेतीले किनारे के पास एक नाव पर निगाहें एक पल के लिए ठिठक गईं। हाय! क्या सुंदर दृश्य था!!! मेरे मोबाइल का कैमरा ऑन होता तो खींच लेता। ट्रेन भी आज कुछ ज्यादा ही तेज चल रही है। मन मसोस कर अपने आस पास देखने लगा।
मेरा ध्यान मेरे बगल में बैठे एक युवक पर गया जो लगातार अपने दो शरारती बच्चों को बड़े प्रेम से संभाल रहा था और उनके झगड़े सुलझा रहा था। उसकी पत्नी सामने के बर्थ पर लेटी थीं। मैंने आदतन अपनी पूछताछ शुरु की...
लगता है दूर जाना जाना है?
हां, जहां तक यह ट्रेन जाएगी.. हावड़ा।
कहां से आ रहे हैं?
अम्बेडकर नगर से चढ़े हैं।
कौन कौन सी बर्थ है आपकी?
यही आमने सामने दो और उधर दो और..
अच्छा! तो कई लोग हैं?
हां, दस बारह लोग हैं।
इतने में सामने लेटी उनकी श्रीमती जी का गर्जन सुनाई पड़ा..झूठ क्यों बोलते हो? कुल छः लोग तो हैं हम लोग! युवक ने बात संभाली..वैसे तो छः लोग हैं बाकी और भी लोग चढ़े हैं। सांवली महिला अब उठ कर बैठ चुकी थीं.. उनसे हमसे क्या मतलब? हम लोगों की कुल छः बर्थ है भाई साहब। इनके बड़े भाई, भाभी बगल में हैं, मेरी बहन है और बच्चे हैं।
मुझे महिला के भोलपन पर आंनद आने लगा। जिन्हें मैं पहले कर्कश समझ रहा था वो तो बड़ी हंसमुख और सीधी सादी निकली! अब वो चहक कर मुझसे बतियाने लगीं और उनके श्रीमान बच्चे संभालते हुए बस हां में हां मिलाने भर के रह गए।
तो आप लोगों का घर अम्बेडकर नगर है और आप लोग कलकत्ता में किसी कम्पनी में काम करते हैं?
नहीं भाई! हम लोगों का घर, दुकान और काम सब कलकत्ता में है। हम लोग किछौछा शरीफ गए थे।
क्या? की छौ छा ?? ये कहां है?
अरे! आप यहीं के हो कर किछौछा शरीफ नहीं जानते! तभी एक दूसरे यात्री ने समझाया कि यह अम्बेडकर नगर रेलवे स्टेशन से २५ किमी की दूरी पर एक छोटा सा कस्बा है, जहां किछौछा शरीफ की दरगाह है। बिलकुल अजमेर शरीफ की तरह!
मेरे लिए यह एकदम नई बात थी। अजमेर शरीफ का नाम तो सुना था लेकिन अयोध्या के इतने पास स्थित इस दरगाह से बिलकुल अपरिचित था। गूगल सर्च किया तो यह जानकारी हाथ लगी...
किछौछा शरीफ प्रसिद्ध सूफी संत सय्यद मखदूम अशरफ जहांगीर अशरफी की दरगाह के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म ईरान में सेमनान में हुआ था और विशेष रूप से चिश्ती पद्धति को आगे बढ़ाने में उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। इन संत ने बहुत यात्राएं की और लोगों तक शान्ति का सन्देश पहुँचाया। किछौछा दरगाह शरीफ एक छोटी पहाड़ी पर बना है, जो कि एक ताल से घिरा हुआ है। सम्पूर्ण परिसर संगमरमर, टाइल्स और कांच से सजाया गया है। साल भर हजारों की तादाद में श्रद्धालु भारत और दुनिया भर से इस दरगाह पर आते हैं। यहां एक तालाब है। जिसका पानी अमृत के समान है!
पढ़कर मैंने ऐसे एक लंबी सांस ली मानो मैं वाकई महामूर्ख हूं। कलकत्ते से आकर लोग यहां अपनी मन्नते पूरी होने पर चादर चढ़ा कर वापस भी लौट रहे हैं और मुझे यहीं पास के जिले का होकर भी कुछ नहीं पता! पहले पता होता तो न जाने कितने दबे अरमान वक़्त के पैरों तले बेरहमी से कुचले जाने से पहले ही पूरे हो जाते!!!
महिला चहक रही थीं...वहां तो हर समय हजारों की भीड़ रहती है। परिवार है न भाई साहब, परिवार में किसी न किसी को कोई न कोई कष्ट तो होता रहता है। वहां जाने पर सब कष्ट दूर हो जाता है।
मैंने महिला के पति से पूछा..आप क्यों गए थे? क्या मन्नत मांगी थी? पूरी हुई?
पूरी हुई न! तभी तो चादर चढ़ाने गए थे। दरअसल इनको दिमागी बीमारी थी!!!
अब मेरा दिमाग घूम गया। मैं इतनी देर से एक ऐसी महिला से बातें कर रहा हूं जिनका दिमाग खराब था और अब किछौछा शरीफ की दरगाह में मन्नत मांगने से ठीक हो चुका है। अब मैं खूब ध्यान से उसकी हर हरकतों पर गौर करने लगा। पहली बार बात शुरू करते हुए इनका पति से गरजना..हम लोग छः हैं, झूठ क्यों बोल रहे हैं? फिर मुझे मीठी बोली से समझाना/चहकना। महिला अनवरत जारी थी....
अब हम ठीक हैं भाई साहब। कलकत्ते में कालीघाट के पास अपना घर है। इनकी किराने की दुकान है। बहुत बड़ा है हमारा परिवार। ये लोग चार भाई हैं। सभी एक ही घर में रहते हैं। सबके पास अलग अलग कमरा है। हमने अपने बारे में इत्ता सब बताया अब आप अपने बारे में बताइए?
मैं देर तक उन्हें अपने और बनारस के बारे में बताता रहा। आश्चर्य यह लगा कि उन्हें बनारस के बारे में कुछ नहीं पता था! वैसे ही जैसे मुझे किछौछा शरीफ की दरगाह के बारे में कुछ नहीं पता था। 

28.10.18

पटाखे

जिसे देखते ही पूरे शरीर मे उत्तेजना बढ़ जाती है उस माल का नाम पटाखा माल है। जो आँच दिखाते ही धड़ाम से फूट जाय, जिसके फूटने पर आपका मन आंनद से भर जय तो समझो वही पटाखा माल है। आँच दिखाते-दिखाते आपकी पूरी बत्ती जल जाय और धड़ाम की आवाज भी कानों में न सुनाई पड़े तो समझो वो पटाखा नहीं, फुस्सी माल है। पटाखा देखने और पाने के लिए बाजार में घूमना पड़ता है। माल ही माल को खींचता है। इसलिए पटाखा प्राप्त करने के लिए जेब में माल लेकर बाजार में घूमना पड़ता है। अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण पटाखे मॉल में नहीं बिकते, तंग गलियों में या सड़कों के किनारे पटरी पर सज्ज होकर बिकने के लिए आते हैं। पटाखे खरीदते समय अपनी जेब के साथ अपनी उम्र और क्षमता का भी ध्यान रखना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि पटाखा खरिदा आपने, घर लेकर गए और छुड़ाने के लिए मोहल्ले के लड़कों को बुलाना पड़ा!

हर चीज का एक समय होता है। उम्र के किसी पड़ाव पर जो चीज अच्छी लगती है, समय बीत जाने के बाद वही चीज बेकार लगने लगती है। पटाखों का भी यही हाल है। चुटपुटिया छुड़ाते समय काँपने वाली उँगलियाँ आड़ू बम के धमाकों से भी संतुष्ट नहीं होती। किशोर से जवान हुए तो चाहते हैं कि आड़ू बम में आग लगाने से पहले उसे किसी पुराने टीन के कनस्टर से ढक दिया जाय ताकि धमाके के साथ टीन के परखच्चे उड़ जांय! तंग गलियों के छत पर खड़े होकर, बम को हाथ से पकड़ कर, सुतली में आग लगाकर, नीचे फेंकने में जो मजा है वह बुढ्ढों की तरह पुराने अखबार के ऊपर बम रखकर, अखबार में आग लगाकर, कान में उँगलियाँ घुसेड़ कर, चार हाथ पीछे भागने में कहाँ! 

जैसे पटाखे छुड़ाने में आनन्द की एक उम्र होती है वैसे ही पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी त्योहारों में प्रदूषण की चिंता करने का शुभ मुहूरत होता है। धर्मनिरपेक्ष समय मे फैलने वाले प्रदूषणों पर पर्यावरण की चिंता का असर नक्कार खाने में तूती की आवाज की तरह सुनी, अनसुनी रह जाती है इसलिए त्योहारों के समय आवाज बुलंद करनी चाहिए। भले रोज मुर्गा उड़ाते हों लेकिन जब बकरीद का समय आये तो बकरों की कुर्बानी पर टेसुए बहाना सबसे मुफीद होता है। भले एक पौधा न रोपे हों, होली में होलिका दहन के लिए सजाए वृक्षों की डाल पर छाती फाड़ने में चैन आता है। यह और कुछ नहीं, दूसरे के फटे में उँगली करने का हम भारतीयों का पुराना स्वभाव है। स्वच्छता के नाम पर अपना कूड़ा या चूहेदानी में फंसा चूहा जब तक पड़ोसी के दरवाजे पर छोड़ नहीं आते हमारी आत्मा को सुकून नहीं मिलता।

सुंदर लाल बहुगुणा गंगा पर टिहरी बांध का विरोध करते रहे, कोई फर्क नहीं पड़ा। सरकारें गंगा पर बांध भी बनाती रही और सफाई के नाम पर गंगा में हाथ भी धोती रही। न बाँध रुका, न गंगा का पानी ही साफ हुआ। गंगा को मुक्त कर दो तो गंगा की धार स्वयं अपनी सफाई के साथ आपके पाप भी बहा ले जाने में समर्थ है। हम व्यवस्था पर व्यंग्य क्या खाक करेंगे? व्यवस्था सदैव हमारा ही मजाक उड़ाती रहती है और हम सब चुपचाप सहने के आदी हो चुके हैं। जान्ह्वी स्वयं मुक्तिदायिनी, पाप हारिणी हैं और हम उस पर बांध बांध कर उसी की सफाई करने में लगे हैं! गंगा में बांध बांधने से प्रदूषण नहीं होता, दिवाली में पटाखे छुड़ाने से प्रदूषण फैलता है।  

सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना कि दो घण्टे पटाखे छुड़ाने से इतना प्रदूषण नहीं होगा कि समाज सहन न कर सके। हम पूछते हैं कि आज के मंहगाई के जमाने में किस आम आदमी की इतनी हैसियत है कि वह दो घण्टे से ज्यादा पटाखे छुड़ा सके? हमने तो अपने जुनूनी समय मे भी एकाध घण्टे से ज्यादा पटाखे नहीं छुड़ाए! हां, पहले लोग 'मजा लेना है जीने का तो कम कम, धीरे धीरे पी' वाले अंदाज में रुक रुक कर पटाखे छुड़ाते थे, अब वही पटाखे दो घण्टे में ही सारे छुड़ा दिए जाएंगे। पहले मुकाबला चलता था। पड़ोस के भोनू की रॉकेट हवा में उड़ी तो ध्यान से देखा जाता था कि वह कितना ऊपर उड़ा और हवा में कितनी जोर से फटा! फिर उसके मुकाबले अपना दो आवाजा छोड़ा जाता। नीचे भोनू के कान के पर्दे भी फटें और दूर ऊपर जा कर इतनी जोर से फटे की नीचे भोनू की छाती फटी की फटी रह जाय।  

हिन्दुओं की बात करते हो तो हिंदुओं के पटाखे छुड़ाने का एक निर्धारित समय होता है। बदमाश लौंडों की बात छोड़ दो तो लक्ष्मी पूजा समाप्त होने से पहले हिन्दू स्वयं धमाके नहीं चाहते। डरते हैं कि कहीं शोर शराबे से उल्लू डर कर भाग न जांय। वे तभी पटाखे छुड़ाते हैं जब आरती समाप्त होने के बाद दिए भी जला कर खाली हो चुके होते हैं। धनी माने जाने वाले परिवारों के लिए भी पटाखे छुड़ाने के लिए दो घंटे बहुत हैं। अब समय में लफड़ा हो सकता है। पण्डित जी यदि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित समय शाम आठ बजे से पहले पूजा समाप्त कर दें तब तो ठीक लेकिन यदि पूजा कराते कराते रात के दस बजा दिए तो गए पटाखे पानी में! गुस्से में पटाखे यदि पण्डित जी के सर पर फूटे तो और भी लंबे समय के लिए जेल जाना पड़ सकता है। माननीय न्यायालय के इस आदेश से प्रदूषण कितना कम होगा यह तो कह नहीं सकते लेकिन इतना तय है कि पटाखे छुड़ाने वाले घर के गैंग का ध्यान हर समय लक्ष्मी जी के बजाय घड़ी पर ही टिका रहेगा।

22.10.18

वृन्दावन ...लोहे के घर से एक संस्मरण

कोटा पटना का लेट होने का कोटा अभी पूरा नहीं हुआ है। लेट, और लेट, और और लेट होती चली जा रही है।  कोटा से चलकर रात में आनी थी मथुरा, भोर में आई। सुबह, दिन में बदलने जा रहा है लेकिन यह रुक रुक, छुक छुक चल रही है। भाप का इंजन होता तो इसकी छुक छुक कर्ण प्रिय होती। बिजली का इंजन है, छुक छुक इलेक्ट्रिक शॉक की तरह झटके दे रही है। दिन में पहुंचना था बनारस। अब लगता है, कल भोर में पहुंचेगे। 

मथुरा आने का पारिवारिक कारण था। अवसर मिला तो वृन्दावन और आगरा घूम लिए। अवसरवादी तो सभी होते हैं लेकिन आम आदमी सबसे बड़ा अवसरवादी होता है। अपनी छोटी छोटी पहुंच में छोटे छोटे अवसर तलाशता है। पैर फिसलने से नदी में गिर गया तो नहाकर, हर हर गंगे कहते हुए, मुस्कुराते हुए बाहर निकलता है। ताकि आप समझें कि वह गिरा नहीं था, पुण्य बटोर रहा था। यही हाल अपना है। पारिवारिक मिलना जुलना भी हो गया, घुमाई भी हो गई।

आगरा और वृन्दावन की तुलना में वृन्दावन ने अधिक आनंद दिया। वृन्दावन का माहौल ही राधे राधे है। जिस गली या सड़क से गुजरो.. राधे राधे। खुली नालियों वाली गन्दी गली से गुजरो या चमचमाती सड़कों से हर तरफ कृष्ण की भक्ति और संगीत का माहौल। गली के एक घर से आते संगीत की धुन मध्यम पड़ी तो दूसरे घर से उठता भजन सुनाई पड़ने लगा। कहीं नृत्य का अभ्यास हो रहा है तो कहीं हारमोनियम, झांझ और ढोलक की ताल में राधे राधे। 

वृन्दावन में घूमने की शुरुआत निधि वन से हुई। इसके बारे में कई प्रकार की रहस्यमयी बातें सुन रखी हैँ। इसके हजारों वृक्ष रात के समय गोपियाँ बन जाती हैं! कृष्ण स्वयं रात के समय रासलीला रचाते हैं। दिन डूबते ही आज भी मन्दिर बन्द कर दिया जाता है। रात के समय मन्दिर प्रवेश की इजाजत किसी को नहीं है। इन सुनी सुनाई बातों से उलट, तुलसी के पौधे जैसे दिखने वाली घनी झाड़ियों के इस छोटे से वन में राधे कृष्ण की मूर्तियाँ विद्यमान थीं। वन में बन्दर और मंदिर में पुजारी अपने पेट के जुगाड़ के लिए भक्तों को आसभरी निगाहों से देखते मिले। दोनो के लालच में गहरी समानता दिखी। भक्तों की आस्था जितनी प्रबल, इनका लोभ भी उतना ही उच्चकोटि का। पुजारियों और बंदरों में फर्क सिर्फ इतना था कि बन्दर चना मिलने ही भाग कर, किसी कोने में दुबक थैला कुतरने लगते, पुजारी चादर में नोट सजा कर और और की जुगत भिड़ाते। बन्दर सामने आ कर मांगते,  पुजारी मुख खोल कर नहीं मांगते पर कैसे और मिले इसकी नई नई तरकीबें सजाते।

इन सबसे अलग आने वाले भक्तों में गजब की आस्था दिखी! कोई ताली पीट पीट ठुमकते, कोई हाथ कमर हिलाकर नृत्य करने लगते। सब तरफ राधे कृष्ण का माहौल। आप में जरा भी आस्था हो तो वहाँ का माहौल ही ऐसा है कि आप भक्ति में डूबे बिना नहीं रह सकते। मैं कौतूहल से सबको देखता रहा। सब से अधिक कौतूलह तो मुझे निधि वन के पौधों को देख कर हुआ। खोखले और अष्टवक्री इन पौधों के पत्ते इतने हरे भरे कैसे हैं! इसमें इतना जीवन और इतनी ऊर्जा कैसे है!!! कौन सी निधि इसमें समाई है कि इसका नाम निधि वन पड़ा?


निधि वन बाहर निकले तो एक पुरुवा स्वादिष्ट लस्सी पी कर थकान मिटाई। दुकानदार खरीदने पर ही पानी देता था। लोग पानी के अभाव में, लस्सी पी कर पुरुवा फेंक दे रहे थे। मैंने दुकानदार को एक बनारसी उपदेश पिलाया। तुम पानी नहीं पिलाते हो, लोग पुरुवे के साथ पुरुवे मे चिपका दही भी फेंक रहे हैं। यह गो रस का अपमान है! तुम्हेँ पानी की व्यवस्था करनी चाहिए। ताकि लोग पुरुवे में घोलकर पानी के साथ दही भी पी जांय। उसने मेरी बात स्वीकार नहीं करी तो नकारा भी नहीं। सिर्फ इतना कहा.. आपकी यह बात अलग है! 

वहाँ से निकल बांके बिहारी मंदिर के लिए चला। संकरी गलियाँ और अपार भीड़। दोनो तरफ सजे भांति भांति के दुकान। मैं गलियों का वीडियो बनाने लगा। एक राधे कृष्ण की तस्वीरों के दुकानदार ने वीडियो बनाने से रोक दिया। मैंने कहा..इससे तो तुम्हारा प्रचार ही होगा। तुम्हें क्या तकलीफ है? उसने भी मेरी बात स्वीकार तो नहीँ किया लेकिन नकारा भी नहीँ। वीडियो बनाने से रोकते हुए सिर्फ इतना कहा.. आपकी यह बात अलग है! 

इन दो दुकानदारों से मैंने यह नसीहत सीखी कि जब कोई आपको सत्य का उपदेश देने लगे तो आप उसकी बात शालीनता से, बिना नकारे हुए कैसे काट सकते हैं! आपको सिर्फ इतना कहना होगा.. आपकी यह बात अलग है!!! हम पान सुर्ती खाते हैँ। कोई मना करेगा। जहर खाने का भय दिखाएगा। अवगुन गिनाएगा तो कह देंगे..आपकी यह बात अलग है! 

बाँके बिहारी मंदिर के चारों तरफ घुसने और निकलने के दरवाजे हैं। मन्दिर में प्रवेश करते ही अपार भीड़ और आस्था के महासागर से सामना हुआ। बेचैन मन, आस्था के सागर से उठने वाली लहरों में, डूबने उतराने लगा। जब आप भीड़ से घिर गए हों तो खुद के बचाव का सबसे सरल उपाय यह है कि आप संघर्ष करने के बजाय भीड़ का हिस्सा बन जाओ। जिधर भीड़ ले जाये, उधर चलते चले जाओ। जो भीड़ करे, वही करते चले जाओ। मैं भी भीड़ की तरह राधे-राधे गाते हुए थिरकने लगा और देखते ही देखते मेरी नैया भी पार हो गई। मतलब बाँके बिहारी के दर्शनोपरांत मन्दिर से बाहर आ गया। बाहर निकल कर कुछ पल आनन्द की अनुभूति में डूबा रहा फिर दूसरे ही पल चप्पल ढूंढने के लिए बाहर की भीड़ से संघर्ष करता रहा। चप्पल उतारा एक गेट में, निकला किसी दूसरे अजनबी गेट से। अब ऐसे में संघर्ष के अलावा चारा क्या था! जब बात अपने पर आती है तो तटस्थ रहने वालों को भी भीड़ से संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष किया और संघर्ष का परिणाम सुखद रहा। मुझे मेरा वही पुराना, बिना पलिस का अधमरा चप्पल एक गेट के कोने में उदास पड़ा मिल गया।

एक इच्छा के पूर्ण होते ही दूसरी इच्छा जागने लगती है। जो पूर्ण हुई उसका जश्न मनाना भूल, मन दूसरे के लिए बेचैन हो उठता है। बाँके बिहारी मंदिर से निकलते ही श्री कृष्ण जन्मस्थली के दर्शन की इच्छा हुई। श्री कृष्ण जन्मस्थली की व्यस्था टंच थी। शाम के नौ बजे का समय था। सौभाग्य से यह भगवान कृष्ण की आरती का समय था। मंदिर के ऊपर बने राधे कृष्ण की भव्य छवि की आरती शुरू ही हो रही थी। भक्त भजन गाते हुए थिरक रहे थे। मन्दिर का प्रांगण खूब बड़ा था। स्थान की तुलना में भीड़ अधिक नहीं थी। शांति और प्रेम का माहौल था। हम भी भक्तों में शामिल हो थिरकने लगे। राधे कृष्ण, राधे कृष्ण जपते हुए सुंदर वस्त्राभूषण से सज्जित, राधे कृष्ण की मनोहर छवि का दर्शन करने लगे। सामने दीवारों पर सुंदरता का वर्णन करते कई छंद अंकित थे। स्वभावतः छंद पढ़ते हुए मूर्तियों की सुंदरता का छंद से मिलान करते रहे। जितने सुंदर छंद, उतनी भव्य मूर्तियों की सजावट। मन आनन्द में ऐसा डूबा कि कब आरती खत्म हुई पता ही नहीं चला। वहाँ से निकल नीचे जन्मस्थली का भी दर्शन किया। जन्मस्थली की दीवारें किसी तानाशाह के जेल की तरह ही लग रहीं थीं। सामने चबूतरे पर लड्डू गोपाल की बाल छवि की तस्वीरें, फूल माला के साथ सजा कर रखी हुई थी। एक पुजारी मन्दिर की साफ़ सफाई कर रहे थे। इस मंदिर के किसी पुजारी के चेहरे पर लोभ नहीं दिखा, सभी कृष्ण भक्ति के प्रेम में डूबे मिले। 

रात भर की भारतीय रेलवे की सुखद यात्रा(जिससे सभी पूर्व परिचित हैं।) और दिन भर की अपनी बेचैनी से अर्जित भगदौड़ ने शरीर को इतना थका दिया था कि फिर कुछ देखने की इच्छा नहीँ हुई। कब पड़ाव पहुंचा, कब भोजन किया और गहरी नींद में सो गया, पता ही नहीं चला। 

अपने पास छुट्टी के फ़क़त दो दिन थे और बहुत कुछ देखना बाकी था। मथुरा से साठ किमी दूर, आगरा का ताज महल भी देखना था। आदतन भोर में नींद खुल गई। अपने साथ सो रहे साथी भाई को जगाया और उन्हें प्रातः भ्रमण के लिए राजी कर लिया। एक दिन पहले की भागदौड़ से वे भी थके थे और सोना चाहते थे। टालने का प्रयास किया लेकिन मेरा मूड देख कर झट पट तैयार भी हो गए। नेट में तलाश किया शहर में सबसे बढ़िया उद्यान कहाँ है? नेट ने चार किलो मीटर दूर शहीद भगत सिंह पार्क का नाम सुझाया। देखा नहीं था इसलिए एक ऑटो पर बैठ गया। मन में प्रेम मन्दिर, वृन्दावन देखने की इच्छा भी दबी हुई थी। आदतन ऑटो वाले से बात चीत शुरू कर दी। उसने बताया कि इस समय प्रेम मन्दिर खुला मिलेगा। मथुरा में जहाँ ठहरे थे वहाँ से वृन्दावन लगभग 14 किमी दूर था। थोड़े मोल भाव के बाद ले जाने और ले आने का भाड़ा तय हो गया और हम पहुँच गए प्रेम मंदिर।

ईश्वर अनुकूल होता है तो सब सही सही घटता चला जाता है। हमने प्रातः साढ़े पाँच बजे मंदिर में प्रवेश किया और वहाँ जाने के बाद पता चला कि ठीक साढ़े पाँच से साढ़े छः तक मंदिर खुला रहता है। यह प्रातः परिक्रमा का समय था। सुफेद संगमरमर से बना बड़ा भव्य मंदिर है प्रेम मंदिर। बनाने वाले ने वाकई इसे बड़े प्रेम से बनाया है। इसको देखने से ही पता चलता है कि इसके निर्माण में तन, मन और धन तीनो मुक्त हस्त से लुटाए गए हैं। मंदिर बिजली के प्रकाश से जगमगा रहा था। विशाल प्रांगण के चारों ओर भगवान कृष्ण की लीलाओं की लगभग सभी छवियाँ, सुंदर कलाकृतियों से सजाई गई थीं। जिधर नजरें जातीं, उधर की ओर मुँह कर ठिठक कर खड़े के खड़े रह जाते। विशाल चबूतरे के बीचों बीच बने संगमरमर के भव्य मंदिर की शोभा देखते ही बनती थी। उसी समय जगत गुरु कृपालु महाराज की तस्वीर सजा कर भक्त नाचते गाते राधे कृष्ण, राधे कृष्ण का जाप करते गए मंदिर की परिक्रमा कर रहे थे। हम भी मंदिर में प्रवेश करना भूल, मंदिर की परिक्रमा करने लगे। मंदिर की दीवारों पर भी कृष्ण लीला की मनोहारी छवियाँ उकेरी गईं थीं। छवियों में लाइटिंग की भी व्यवस्था थी। भोर का समय था। अभी सूर्योदय नहीं हुआ था। 

मंदिर के भीतर की एक परिक्रमा करते करते मंदिर के कपाट बंद हो गए। पुरुष और महिलाएं अलग अलग पंक्तिबद्ध हो बैठ कर भजन कर रहे थे। मंदिर में भीड़ नहीं थी। लग रहा था कि ये रोज आने वाले नियमित भक्त हैं जो भोर में ही स्नान, ध्यान के बाद, ललाट पर चंदन सजा कर, साफ सुथरे वस्त्रों से सज्ज होकर यहाँ विराजमान होते हैं। कुछ कुँआरी कन्याएं भी मीरा की तरह कृष्ण भक्ति में लीन दिखीं। प्रेम मंदिर का पूरा वातावरण कृष्ण प्रेम में पूरी तरह डूबा हुआ था। हम कभी मंदिर की सुंदरता में डूबते तो कभी भक्तों के भक्ति भाव में। प्रेम मंदिर के कण कण से प्रेम और प्रेम ही छलक रहा था। 

प्रेम मंदिर से लौटकर शहीद भगत सिंह उद्यान में घूमने लगे। सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। घूमते घूमते घर से बेटियों का फोन आ गया..हम लोग तैयार हैं। आगरा नहीं चलना?

18.10.18

जब जागो तभी सबेरा

आप मुर्गे की बांग से जागते होंगे, हमको तो पड़ोस की जूली जगाती है! जूली का मालिक भोर में चार बजे ही निकल जाता है मॉर्निंग वॉक पर। जूली की मालकिन अपने पति देव के जाने के बाद, गेट बाहर से उटका कर, देर तक कॉलोनी में टहलती रहती हैं और जूली बन्द गेट के भीतर से मालकिन को देख देख कूकियाती रहती है। जूली की कुकियाहट को सुन, दूसरे पड़ोसी का शेरू ताल से ताल मिलाने की तर्ज पर, तीसरे मंजिल की छत से भौंकना शुरू करता है। इधर जूली बोली कुई, उधर शेरू बोला.. भौं! 

पूरे कॉलोनी में भौं-भौं, कुई-कुई की आवाजें गूँजने लगती हैं। शायद इनके शोर से ही कदम्ब की शाख पर बैठे पंछियों की नींद खुल जाती है और वे भी बीच-बीच में चहकने लगते हैं। भौं-भौं, कुई-कुई के शोर से जब अपनी नींद उचटती है तो सुबह के साढ़े चार के आस पास का समय होता है। अपना एलार्म बाद में बजता है, जूली पहले बोलती है। भौंकती है, इसलिए नहीं लिख रहा कि लोग बच्चों से भी जियादा अपने  पालतू जानवरों से  मुहब्बत करते हैं। भले कुत्ते/कुतियों के भौंकने से हमारी नींद समय से पहले उचट जाय, मुहब्बत का सम्मान करना हमारा फर्ज बनता है। 

कुछ लोग घोड़े बेच कर सोते हैं। कुत्ते लाख भौंकते रहें न उनकी नींद टूटती है, न ही मुंगेरी लाल के ख्वाब टूटते हैं। उनका सबेरा सूर्योदय से नहीं, बिस्तर छोड़ने से शुरू होता है। हम जब मॉर्निंग वॉक से लौट रहे होते हैं, वे जम्हाई लेकर चाय पी रहे होते हैं। भले मुहावरे का अर्थ न मालूम हो लेकिन बेशर्मों की तरह हँसते हुए कहते हैं.. जब जागो तभी सबेरा। लोग बिस्तर से उठ कर चाय पीने को ही सबेरा मान बैठते हैं। 

जागना तो तब होता है जब मन का अंधकार दूर हो। जब अंतर्मन में प्रकाश की किरणें फूटें, अपनी गलती का एहसास हो और मन बुरे कर्म छोड़, सत्कर्मों की तरफ लग जाय। तब कहो.. जब जागे तभी सबेरा। यह क्या कि सूरज चढ़ जाने पर बिस्तर छोड़े, चाय पीते हुए फेसबुक/वाट्सएप में गुडमार्निंग स्टेटस अपडेट/फारवर्ड किए और हंसते हुए बोल पड़े.. जब जागो तभी सबेरा! चुनाव परिणाम से पहले जब सरकार नहीं जगती तो आम आदमी एक रात के बाद कैसे जाग सकता है!

पता नहीं आपको अनुभव हुआ है या नहीं, हमको तो हुआ है। भागती कारें गढ्ढे उगलती हैँ! जब हम चार पहिए के पीछे अपनी बाइक दौड़ाते हुए ट्रेन पकड़ने के लिए फुल स्पीड में भाग रहे होते हैं, अचानक कार के नीचे से गढ्ढा निकलता है और अपनी बाइक एक हाथ ऊपर उछल पड़ती है! चार पहिए वाला अपने चारों पहियों को सड़क के बीच मे नरक पालिका द्वारा सजाकर रखे हुए गढ्ढे से बचाकर आगे निकलता है और पीछे चलने वाले बाइक सवार को गढ्ढा तब दिखता है जब बाइक से उछलकर गिरने से बच जाता है। सुबह भले घर से हनुमान चालीसा पढ़कर निकला हो, भगवान को याद करते हुए अंग्रेजी में कहता है.. थैंक्स गॉड! 

अब आम आदमी सड़क पर मिलने वाले ऐसे गढ्ढों के लिए सरकार को नहीं कोसता। सम्भावित दुर्घटना के लिए अपनी गलती मानता है कि उसे अपनी बाइक चार पहिए से इतनी दूरी बनाकर चलानी चाहिए कि जब कारें गढ्ढे छोड़ें तो समय रहते दिख जाए। जब जागो तभी सबेरा की तर्ज पर, कुछ देर तक मैं भी नींद से जाग कर चलता हूँ। फिर भूल जाता हूँ कि नुझे कार से दूरी बनाकर चलना चाहिए। सरकारें हों या कारें, आम आदमी को कभी भी गढ्ढे में धकेल सकती हैं। 

ऐसा ही होता है। एक दिन नहीं, हर दिन होता है। हम रोज जागते और हर रोज सो जाते हैं। कई बार तो दिन के चौबीस घण्टों में बार-बार जागते और बार-बार सो जाते हैं। जब जब गढ्ढे में गिरते हैं, थैंक्स गॉड बोलते हैं लेकिन न सोना छोड़ते हैं न गढ्ढे में गिरना। जीतने के बाद सरकारें सो जाती हैं, गढ्ढे से बचने के बाद आम आदमी सो जाते हैं। सरकार जागती हैं जब सत्ता चली जाती है। बाइक सवार जागता है जब दुर्घटना हो जाती है। कोमा से निकलने के बाद दोनों के मुख से एक मासूम प्रश्न प्रस्फुटित होता है.. मेरी क्या गलती थी? सरकारें आत्म मंथन के बाद निष्कर्ष निकालती है..विपक्ष का दुष्प्रचार हमारे काम पर भारी पड़ा। आम आदमी निष्कर्ष निकालता है..यदि सड़क में गढ्ढा न होता तो वह कभी नहीं गिरता। दोनो दर्द तक जागने के बाद, फिर गहरी नींद में सो जाते हैं। सरकार हो या आम आदमी, दोनो जागें भी तो कैसे? नींद से जगाने वालों को सभी भूनकर खा जाना पसंद करते हैं।  

आपकी नींद का मुझे नहीं पता लेकिन अपनी नींद तो पड़ोस की जूली के कुकियाने  से खुलती है।
..............

26.9.18

लोहे का घर

तेरा घर
खूब बड़ा होगा,
मेरा घर
खूब लंबा है।

तेरे घर की खिड़की का
आकार बड़ा होगा,
मेरे घर की खिड़की का
आकाश बड़ा है।

तेरे दृश्यों की 
इक सीमा होगी
मेरे दृश्य
पल-पल बदलते रहते हैं।

तेरा घर
थिर, जड़ सा
मेरा घर
नित चंचल, चेतन है।

मेरे घर में
अंधे, लूले, लंगड़े
भिखारी रहते हैं
छोटे-छोटे
व्योपारी रहते हैं
हर साइज के बच्चे,
स्त्री, पुरुष,
हिजड़े भी रहते हैं।

तेरा घर
पटरी से उतरता भी होगा
मेरा घर हरदम
पटरी पर चलता है
तेरे घर में
तेरा परिवार ही 
रहता होगा
मेरे घर में
पूरा भारत रहता है।
........

21.9.18

बेटियों को पढ़ाने से पहले...


बेटियों को पढ़ाने से पहले
सोच लो तुम
पढ़ गयीं तो
ज्ञान की बातें करेंगी रोज तुमसे
सुन सकोगे?

सूर्य को देवता कहते हो तुम तो
आग का गोला कहेंगी!
मान लोगे? 

चांद को देवता कहते हो तुम तो
धरती का पुछल्ला कहेंगी!
मान लोगे?

तुम कहोगे
हम सवर्ण!
ढूंढकर पात्र को ही
दान देंगे!
वे कहेंगी
आदमी तो आदमी है
क्या है हिन्दू, क्या है मुस्लिम
शूद्र औ ब्राह्मणों में फ़र्क क्या है?
मान लोगे?

भारत का संविधान
हमने भी पढ़ा है
दान का अधिकार तुमको
किसने दिया है?
क्या तुम्हारी संपत्ति हैं हम?
मान लोगे?

हो गई शादी तो पति की
हर बात को स्वीकार वे कैसे करेंगी?
व्रत धरो, पूजा करो,
हम परमेश्वर! मालिक तुम्हारे!
क्या सहज ही मान लेंगी?
या कहेंगी..
मूर्ख हो तुम!
हक यह तुमको किसने दिया है?
मित्र बन कर रह सको तो रह लो वरना
तलाक देती हूं तुम्हें,
राह कोई और देखो!
साथ फिर भी बेटियों का
दे सकोगे?

बेटियों को पढ़ाने से पहले
मजबूत कर लो अपना कलेजा
खोल लो
आंखें भी अपनी
सोच लो
जान जाएंगी बड़ी होकर
बेटियां
सत्य क्या, अधिकार क्या है!

बेटियों को पढ़ाने से पहले
धर्म और जाति की
दीवारें गिरा दो
पीढ़ियों से आ रही
कुरीतियां मिटा दो
आदमी को बाटने वाले सभी
नारे मिटा दो

तोड़ना चाहते हो कफ़स को
तो पहले
इस धरा से प्रदूषण मिटा दो

छूटते ही कैद से
क्या रुकेंगी?
पंख उनको मिल गए तो
क्या थमेंगी?
नई हवा में झुलस कर
जब गिरेंगी
दर्द उनका फिर भला
कैसे सहोगे?

बेटियों को पढ़ाने से पहले
सोच लो तुम
ज्ञान की बातें करेंगी रोज तुमसे
सुन सकोगे?
.............


29.8.18

परिंदे

दिन के शोर में
गुम हो गए
भोर के प्रश्न
अपने-अपने
घोसलों से निकल
फुदकते रहे
परिंदे।

शाम की शिकायत
सुनते सुनते
रात बहरी हो गई
बोलते-बोलते
गहरी नींद सो गए
थके-मांदे
परिंदे।

परिंदों में
काले भी थे
सफेद भी
कबूतर भी थे
गिद्ध भी
लेकिन
सब में एक समानता थी
सभी परिंदे थे
और..
सभी के प्रश्न/
सभी की शिकायतें
सिर्फ पेट भर
भोजन के लिए थीं।
......

28.8.18

हे कृष्ण!

कभी
बीनता था झाँवाँ 
रेल पटरियों के किनारे
सजाता था पहाड़ 
मनाता था
कृष्ण जन्माष्टमी
आज
बैठा हूँ ट्रेन में
देख रहा हूँ
गिट्टी गिट्टी
रेल की पटरियाँ
न बचपन
न साथी,
न भाप के ईंजन
न कोयला,
न झाँवाँ
न पहले जैसा मन।

दौड़ती भागती
बिछी बिछाई पटरी पर
चल रही है 
अपनी गाड़ी।

हे कृष्ण!
इस बार आना तो
आने से पहले
दे जाना
थोड़े बुरादे
थोड़े इरादे
थोड़े खिलौने
छोटा सा पहाड़ 
और...
थोड़ा सा बचपन।
....

27.8.18

लोहे का घर - 48 (यम की आहट)

वे पतंजलि आश्रम हरिद्वार से अपने घर आरा लौट रहे थे। लगभग मेरी ही उम्र के थे लेकिन बीमारी ने उन्हें जीर्ण शीर्ण बना दिया था।  पेशाब की थैली में कैंसर था। कमर में दर्द था, अधिक देर तक बैठ नहीं पाते थे। बात करते करते बताने लगे कि तीन महीने पहले हम भी आपकी तरह ही स्वस्थ थे! शुरू शुरू में पेशाब में जलन होती थी लेकिन ध्यान नहीं दिया। दूध पीते, मंठा खाते लेकिन आराम नहीं हुआ। जांच कराए तो कैंसर निकला। दवाई खा रहे हैं। बेटा नहीं माना तो हरिद्वार चले गए। एक माह की दवाई लिए हैं। फायदा होगा तो फिर जाएंगे। पतंजलि आश्रम में तीन दिन रहना, खाना बिल्कुल मुफ्त। खाना बढ़िया मिलता है। सिर्फ दवाई का पैसा देना पड़ा। शुरू में लापरवाही किए वरना  तबियत इतनी जल्दी इतनी खराब नहीं होती।  

मैंने उन्हें अपनी एक कविता सुनाई। जिसका आशय भाव यह था कि यमराज एक झटके में किसी को नहीं ले जाता।  आने से पहले कई बार चेतावनी देता है। पहले बालों की कालिमा, आंखों की रोशनी, दांतों की शक्ति छीन लेता है फिर भी न संभले तभी लेे जाता है। हम अक्सर लापरवाही करते हैं। 

वे उठ कर बैठ गए। सही कह रहे हैं। यही बात हमारे आरा जिले के ओझा जी गा कर सुनाते हैं..

अंखिया के जोत नरमाइल हो, पाकल कपरा के बार
जिंदगी के जेल से बुझाता अब, बेल हाइहें हमार।

मैंने उन्हें आश्वासन दिया..दवाई करेंगे तो ठीक हो जाएंगे। 
ओझा जी गायक हैं। किसी का लिखा गाते होंगे। जिसने भी लिखा उनको नमन। उन्होंने भी वही बात कही जो मैं सुना रहा था। 

सफ़र में अनजान व्यक्तियों से दिल के तार कभी यूं भी जुड़ जाते हैं।

25.8.18

लोहे का घर -47(एक प्रेम कथा)

फिफ्टी डाउन अपने सही समय पर चल रही थी। हम जहां बैठे थे वहीं एक युवा परिवार सफ़र कर रहा था। बीमार सी दिखने वाली पत्नी, तीन छोटे-छोटे मैले कुचैले वस्त्र पहने बच्चों को बमुश्किल संभाल पा रही थी। हर साल प्रकाशित होने कैलेंडर की तरह तीनों आपस में एक-एक वर्ष से बड़े छोटे होंगे। गोदी का बच्चा मां का दूध पी रहा था और बड़ी दो बेटियां बारी-बारी से खिड़की झांक रही थीं। हालांकि गोदी वाले बच्चे के सर के बाल भी लड़कियों की तरह बड़े-बड़े थे तो हमें लगा वह भी लड़की है! तभी  मेरे बगल में बैठे उनके जनक ने हंसते हुए गर्व से कहा..यह लरका है। मुंडन कराने जा रहे हैं बक्सर। देवी को बकरा चढ़ाएंगे। उधर ऐसी मानता है।

मैंने उसका उत्साह बढ़ाया..कोई बात नहीं जी! आपकी कहानी भी मेरी तरह है। पुत्र की कामना में कितने लोग पांच छः लड़कियां पैदा करते हैं, आपको तो भगवान ने दो के बाद ही पुत्र दे दिया। हमारी भी दो लड़कियां ऐसे ही एक के बाद एक हुईं। सब भगवान की कृपा है। हां, तीसरा बच्चा हमें पॉच साल बाद हुआ लेकिन यहां आपने थोड़ी जल्दी कर दी। आगे क्या इरादा है? 

वो खुलकर हंसने लगा। अब हमारे बीच से अपरिचितों वाला शील संकोच गायब हो चुका था। उसने अपनी राम कहानी सुनानी शुरु की और मैं दम साधे सुनता रहा.. 

मेरा नाम अजय है। भभुआ, बिहार का रहने वाला हूं। लुधियाना में सिलाई का काम करता था। साल २०१० की बात है। घर में शादी तय हो गई थी। पन्द्रह दिन बाद शादी/गौना था। मैं अपनी शादी के लिए घर जाने की तैयारी में था कि सिलाई के काम से हिमाचल जाना पड़ गया। लौटकर आया तो वहीं बुरी तरह फंस गया। 

अरे! क्या हुआ?

मेरे जिगरी दोस्त ने दगा दे दिया जी। मेरे नाम से एक सरदार जी से पचास हजार कर्जा ले लिया और सब पैसा लेकर फरार हो गया। मेरी मोटर सायकिल भी ले गया। लौटकर लुधियाना आया तो सब कुछ लुट चुका था। सरदार जी ने मुझे पाया और मैं फंस गया। 

शादी करने घर नहीं गए?

कैसे जाता? वो तो सरदार जी का भला हो कि उसने काम करने दिया और पैसा चुकाने का मौका दे दिया। 

फिर शादी ?

शादी टूट गई जी। पिताजी को शादी के लिए लिया पैसा भी लौटाना पड़ा। जब मैं घर गया ही नहीं, कोई खबर ही नहीं दिया तो घर वाले क्या करते? मेरे कठिन वक़्त में इसने (पत्नी को दिखाकर) बड़ा सहारा दिया!!!

तो! आप लोगों ने लव मैरेज की है? कितना पढ़े हैं आप लोग?

मैं तो अनपढ़ हूं जी, ये बी. ए. पास है!

अब चौंकने की बारी मेरी थी। इसीलिए इनका ये हाल किया आपने? एक के बाद एक तीन बच्चे! शरीर देख रहे हैं? फिर मैंने पत्नी की ओर रुख किया..और आपने क्या देख कर इनसे शादी की? 

बस हो गया जी। ये हमारी दुकान में आती थीं, धीरे धीरे हो गया। मैंने इनके खाने में कोई कमी नहीं करी। पूछिए इनसे.. मांस, मछली..जो यह कहे लाया कि नहीं? खाती ही नहीं है तो क्या करें? पत्नी भी अब खुल कर बतियाने लगी थीं.. दिमागी टेंशन से। इनको क्रोध बहुत आता है। अजय हंसकर कहने लगा.. क्रोध क्यों आता है, किस बात पर आता है? पूछिए ? खाना ही नहीं खाती। 

अब घर जा रहे हैं? घर वालों ने स्वीकार कर लिया? 

शुरु शुरु में तो बहुत दिक्कत हुई। घर से भी गए, ससुराल से भी गए। न इनका कोई, न मेरा। लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो गया। बक्सर में इनके पिताजी ने एक घर दिया है, वहीं जा रहे हैं। बकरा चढ़ाना है, लड़के का मुंडन है। अपने घर वालों को भी वहीं बुलाएंगे। काम मिला तो लुधियाना से कपड़ा लाकर वहीं सिलाई करेंगे। नहीं मिला तो फिर लुधियाना चले जाएंगे।

मुझे किसी से उसकी जाति पूछना असभ्यता लगती है, इसीलिए नहीं पूछा। बस इतना ही कहा..सब ठीक हो गया, अब धीरे धीरे और अच्छा होगा। आप बस एक काम करना। इनकी हालत देख रहे हो न? अब बच्चे पैदा मत करना। जितनी जल्दी हो, अपनी नसबंदी करा लो। अब अगर बच्चा हुआ तो यह नहीं बचेंगी। फिर तुम्हारे इन बच्चों का क्या होगा? स्वस्थ रहीं तो पढ़ी लिखी हैं, सभी बच्चों को पढ़ाकर बड़ा आदमी बना देगी। 

उसने मुझे दिल से आश्वासन दिया.. अबकी जाड़े में जरूर करा लुंगा।

मैंने भी उन्हें दिल से आशीर्वाद दिया.. ईश्वर तुम लोगों को सदा खुश रखे। 

मन तो कर रहा था इनका साथ न छूटे लेकिन #ट्रेन बनारस पहुंचने वाली थी, मुझे उतरना था। मैंने उन्हें फिर एक बार भरपूर निगाहों से देखा और हाथ हिलाकर अपनी राह पकड़ ली।

24.8.18

सत्ता

चांद
दिन में
कोई प्रश्न नहीं करता
सूरज से
जानता है
सही वह
जिसके पास है
सत्ता।

सूरज
रात में 
चांद पर रोशनी लुटा कर 
मौन हो जाता है
जानता है
सही वह
जिसके पास है
सत्ता।

आम आदमी 
चिड़ियों की तरह
चहचहाता है..
वो देखो
चांद डूबा,
वो देखो
सूर्य निकला!
वो देखो
सूर्य डूबा
वो देखो
चांद निकला!
......

17.8.18

अमर अटल

कल शाम लोहे के घर में किसी ने बताया कि अब अधिकृत सूचना आ गई ..अटल जी नहीं रहे। सफ़र में लिखने की आदत है। लिखना चाहा, लिख नहीं पाया।  सिर्फ उनका समाचार लेता, याद करता रह गया।

एक होता है मृत्यु का अंदेशा, एक होती है डाक्टर द्वारा अधिकृत घोषणा। दोनों के दरमियान जो लम्हें गुजरते हैं वो बड़ी बेचैनी, बड़ी लाचारगी से भरे होते हैं। दिमाग कहता है कि अब हमारा प्रिय हमसे बिछुड़ जाएगा और दिल कहता है.. काश! कि यह फिर बोलने लगे!!! जब हमारे वश में कुछ नहीं रहता हम ईश्वर की शरण जाते हैं.. हे ईश्वर! बचा लो। हाय! ईश्वर भी इस मामले में कुछ नहीं कर सकता। जब मृत्यु की घोषणा होती है तब जाकर होता है एहसास..मृत्यु अटल है। 

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हमारे पास कभी नहीं होते मगर कोई हल्का सा भी तार छेड़ दे तो उनकी याद दिल दिमाग में छाने लगती है। न उनके चरण छूने का सौभाग्य मिलता है, न कंधा देने का। न लाभ पक्ष में दिखते हैं, न हानी में लेकिन जीवन के चिट्ठे  में हमेशा संपत्ति की तरह जड़े रहते हैं। उनके बिना अपना जीवन चिठ्ठा अधूरा अधूरा रहता है। कुछ ऐसे ही थे/हैं अटल जी।  

जब से होश संभाला हम उनकी मुखरता को सुनते, चरित्र को गुनते रहे। अचरज होता कि राजनीति में भी कोई व्यक्ति इतनी ईमानदारी से मनुष्य बने रहकर भी, शिखर तक पहुंच सकता है! विरोध कर के भी कोई कैसे विरोधियों का दिल जीत सकता है!!!  जब तक मौन रहे तो लगता.. काश! बोल पाते। अब बिन बोले चले गए तो यह भी लगता है .. अच्छा ही हुआ कि उन्हें कुछ बोलना नहीं पड़ा। बोलने की शक्ति होती और उन्हें कोई चुप कराने का प्रयास करता तो अच्छा नहीं लगता। 

कविता प्रेमी होने के कारण भी अटल जी हमें प्रिय थे। साहित्य जगत ने भले उन्हें बड़ा गीतकार न माना हो लेकिन उनके गीत हारे हुए मन को नई उर्जा और राष्ट्र प्रेम की भावना जगाने में समर्थ हैं। एक राष्ट्रप्रेमी गीत रचेगा तो उसके गीतों में राष्ट्र प्रेम की गूंज सुनाई तो देगी ही। एक मानवता वादी गीत रचेगा तो विरोधी विरोध भूल संमोहित हो सुनेंगे ही। 

गीत के अलावा जो सबसे प्रिय था वह था उनका ओजस्वी भाषण। संसद हो या सड़क, कोई समारोह हो या कोई चुनावी सभा, अटल जी के भाषण सबको चित्त करते हुए भी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन कभी नहीं करते थे। उनके मुख से कभी कोई ऐसा शब्द नहीं सुना कि जिससे कोई आहत हुआ हो। पटकनी खा कर छटपटाने वाला भी दिल से उनका मुरीद ही हुआ। 

हो गई अधिकृत घोषणा... नहीं रहे अटल। उनके घर पर शव के अंतिम दर्शन का तांता लगा है। अब विनम्र श्रद्धांजलि देने के सिवा अपने वश में और है ही क्या! यह सत्य है कि मृत्यु अटल है लेकिन यह भी सत्य है कि अटल जी अमर हैं। जैसे इंकलाब जिंदाबाद वैसे अटल जी जिंदाबाद।

विनम्र श्रद्धांजलि

8.8.18

फेसबुक में पुस्तक चर्चा-4(श्री गंगा शरण सिंह)

कुछ मित्रों के आग्रह पर पढ़ी हुई किताबों की इस सूची पर अरसे से काम जारी था। लगभग पच्चीस वर्षों की पाठकीय यात्रा को एक जगह सहेजना थोड़ा सा कठिन था, नामुमकिन नहीं। पुस्तकों के नाम स्मृतियों के हिसाब से साझा किए गए हैं। कृपया इन्हें किसी गुणवत्ता क्रम के आधार पर न लिया जाय। यहाँ तक कि मूल हिन्दी और अनूदित किताबें एक साथ ही शामिल हैं। अमृता प्रीतम और प्रेमचंद को जान बूझकर इस सूची से बाहर रखा है, क्योंकि उनकी प्रिय रचनाओं की संख्या बहुत बहुत ज्यादा है।

कृपया ये भी ध्यान रखा जाय कि यह मात्र उन पुस्तकों के नाम हैं जो हमारी सीमित बुद्धि तक पहुँच सकीं और आज तक स्मृतियों में सुरक्षित हैं।

Manish Vaidya जी, आपने उस दिन मेरी लिस्ट की बात की थी तो लीजिये आज उपन्यास विधा की पहली किस्त हाज़िर है☺

प्रतिभा राय : द्रौपदी, अरण्य

शिवाजी सावंत : मृत्युंजय, छावा

वी.एस. खाण्डेकर : ययाति

विश्वास पाटिल : पानीपत, महानायक

रणजीत देसाई : स्वामी, श्रीमान योगी

ओम शिवराज- धर्म विजय

निर्मल वर्मा : वे दिन, अंतिम अरण्य

धर्मवीर भारती- सूरज का सातवाँ घोड़ा

शानी : काला जल

अमृतलाल नागर : नाच्यो बहुत गोपाल, मानस का हंस, खंजन नयन, बूँद और समुद्र, पीढ़ियाँ

रामदरश मिश्र : जल टूटता हुआ

फणीश्वरनाथ रेणु : मैला आँचल , परती परिकथा, जुलूस

हजारी प्रसाद द्विवेदी: बाणभट्ट की आत्मकथा, पुनर्नवा, चारु चंद्र लेख

जगदीश चंद्र - आधा पुल, कभी न छोड़ें खेत

हिमांशु जोशी : छाया मत छूना मन , कगार की आग, अरण्य, महासागर

संजीव : सूत्रधार, सर्कस, पाँव तले की दूब,फाँस

शिव प्रसाद सिंह : नीला चाँद, गली आगे मुड़ती है, अलग अलग वैतरणी

आचार्य चतुरसेन : सोमनाथ, वैशाली की नगरवधू, वयं रक्षामः

विमल मित्र: मुजरिम हाज़िर, साहब बीबी गुलाम, बेगम मेरी विश्वास, खरीदी कौड़ियों के मोल

आशापूर्णा देवी : प्रथम प्रतिश्रुति, सुवर्णलता, बकुल कथा, प्रारब्ध, न जाने कहाँ कहाँ, अविनश्वर

पद्मा सचदेव- अब न बनेगी देहरी

अखिलन- चित्रप्रिया

उग्र- जीजी जी

हरिशंकर परसाई- रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज

चंद्रकांता- अपने अपने कोणार्क

ऊषा प्रियंवदा : पचपन खंभे लाल दीवारें

तकषि शिवशंकर पिल्लै : मछुआरे

पन्नालाल पटेल : जीवन एक नाटक, जीवी

केशुभाई देसाई - मैडम , धर्मयुद्ध

दिनकर जोशी- श्याम तुम एक बार फिर आ जाते

कुर्तुल ऐन हैदर- निशान्त के सहयात्री

इंतज़ार हुसैन: बस्ती

चित्रा मुद्गल : आँवा

मन्नू भंडारी- आपका बंटी, महाभोज

राही मासूम रज़ा: ओस की बूँद, नीम का पेड़

भीष्म साहनी : तमस

भगवती चरण वर्मा- चित्रलेखा, सबहिं नचावत राम गोसाई, सामर्थ्य और सीमा, भूले बिसरे चित्र

केशव प्रसाद मिश्र- कोहबर की शर्त

यशपाल : झूठा सच, तेरी मेरी उसकी बात, दिव्या

एक इंच मुस्कान- राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी

मैत्रेयी पुष्पा : इदन्नमम

मृदुला गर्ग : अनित्य

सुरेन्द्र वर्मा : मुझे चाँद चाहिये

शिवमूर्ति- तर्पण

स्वयं प्रकाश: बीच में विनय

कामतानाथ: पिघलेगी बर्फ़

भैरवप्रसाद गुप्त: गंगा मैया

कमलेश्वर : समुद्र में खोया हुआ आदमी, कितने पाकिस्तान

मिथिलेश्वर : सुरंग में सुबह, प्रेम न बाड़ी ऊपजै, युद्धस्थल

हृदयेश: शब्द भी हत्या करते हैं, चार दरवेश

वीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य : मृत्युंजय, पाखी घोड़ा

गोपीनाथ मोहंती: माटी मटाल, परजा

के.शिवराम कारंत: मूकज्जी

विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय: चंद्र पहाड़

कृष्णा सोबती : समय सरगम

गोविन्द मिश्र : पाँच आंगनों वाला घर

अज्ञेय : नदी के द्वीप, शेखर एक जीवनी, अपने अपने अजनबी

राजेन्द्र यादव : सारा आकाश

रांगेय राघव : कब तक पुकारूँ,
आग की प्यास

वीरेंद्र जैन: डूब

भीमसेन त्यागी: जमीन

जयनन्दन : श्रम एव जयते

नागार्जुन- बाबा बटेसरनाथ, बलचनमा, वरुण के बेटे,

अब्दुल बिस्मिल्लाह- झीनी झीनी बीनी चदरिया, समर शेष है

पंकज विष्ट- उस चिड़िया का नाम

सुभाष पंत: सुबह का भूला

वेद राही- अंधी सुरंग

राजेन्द्र सिंह बेदी: एक चादर मैली सी

मोहन राकेश: अंधेरे बंद कमरे

नरेन्द्र कोहली : न भूतो न भविष्यति, राम कथा, साथ सहा गया दुख, क्षमा करना जिज्जी

ताराशंकर बंद्योपाध्याय: गणदेवता, हँसली बाँक की उपकथा

चाणक्य सेन : मुख्यमंत्री, ये दिन वे दिन

महाश्वेता देवी : जंगल के दावेदार, हजार चौरासी की माँ

सूर्यबाला- मेरे संधिपत्र, दीक्षान्त, अग्निपंखी, सुबह के इंतज़ार तक

संजना कौल : पाषाण युग

दौड़- ममता कालिया

रस कपूर- आनंद शर्मा

भगवान चंद्र घोष : कर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

यू आर अनंतमूर्ति : संस्कार

कोई तो- विष्णु प्रभाकर

श्रीलाल शुक्ल : विश्रामपुर का संत, राग दरबारी

अमरकांत : इन्हीं हथियारों से, सुन्नर पाण्डे की पतोह

वृंदावनलाल वर्मा : गढ़कुण्डार

उषाकिरण खान : भामती

ज्ञानप्रकाश विवेक : गली नम्बर तेरह, चाय का दूसरा कप, डरी हुई लड़की, आखेट , तलघर

अशोक भौमिक :
मोनालिसा हँस रही थी
शिप्रा एक नदी का नाम है

श्रीनरेश मेहता-
यह पथ बन्धु था , उत्तर कथा, प्रथम फाल्गुन

शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' : बहती गंगा

गुरदयाल सिंह : मढ़ी का दीवा,
परसा

भैरप्पा: गोधूलि, पर्व

जसबीर भुल्लर: मुहूर्त

जीतेन्द्र भाटिया: प्रत्यक्षदर्शी

मधु काँकरिया ,: सूखते चिनार,
हम यहाँ थे

कमलाकांत त्रिपाठी : पाही घर,
बेदखल

पहाड़- निलय उपाध्याय

काले कोस- प्रमोद त्रिवेदी

विनोद कुमार श्रीवास्तव : वजह बेगानगी नहीं मालूम

काशीनाथ सिंह: रेहन पर रग्घू

धीरेन्द्र अस्थाना: देश निकाला

ऋता शुक्ल: अग्निपर्व

प्रियंवद : वे वहाँ क़ैद हैं,
धर्मस्थल

भालचन्द्र जोशी: प्रार्थना में पहाड़

और ये कुछ किताबें उन नए रचनाकारों की जिन्होंने पिछले पौने दशक में अपना स्थान बनाया है।

रणेन्द्र: ग्लोबल गाँव के देवता

संजय कुन्दन : टूटने के बाद

पी.अशोक कुमार: जिगरी

रत्नेश्वर सिंह: रेखना मेरी जान

सत्यनारायण पटेल: गाँव भीतर गाँव

मुकेश दुबे: अन्नदाता

रेत - भगवानदास मोरवाल

डार्क हॉर्स - नीलोत्पल मृणाल

लाल लकीर - हृदयेश जोशी

अकाल में उत्सव- पंकज सुबीर

प्रज्ञा: तक्सीम

उपन्यासों के बाद कहानी संग्रहों की सूची हाज़िर हैं। कहानियों के साथ बड़ा घालमेल होता है। किसी लेखक के दस कहानी संग्रह खरीदें तो उनमें से चार पाँच कहानियाँ हर संग्रह में मौजूद रहती हैं। इस दोहराव की समस्या से बहुत कम लेखक बच पाते हैं।
धर्मवीर भारती : बंद गली का आख़िरी मकान
हृदयेश : जीवन राग
विष्णु प्रभाकर : धरती अब भी घूम रही है
शिवप्रसाद सिंह: सुनो परीक्षित सुनो
संजीव : सागर सीमांत
निर्मल वर्मा : परिन्दे, कव्वे और काला पानी
ऊषा प्रियंवदा: ज़िन्दगी और गुलाब के फूल, कितना बड़ा झूठ
नासिरा शर्मा : गूँगा आसमान
कृष्णा सोबती: बादलों के घेरे
अखिलेश : शापग्रस्त, आदमी नहीं टूटता
मन्नू भण्डारी : यही सच है
मिथिलेश्वर : चल खुसरो घर आपने
कमलेश्वर : खोई हुई दिशाएँ, राजा निरबंसिया, माँस का दरिया
पन्नालाल पटेल : गूँगे सुर बाँसुरी के
विजयदान देथा : छब्बीस कहानियाँ, त्रिकोण, त्रिवेणी
नरेन्द्र कोहली: मेरा साथी कोई नहीं
भीष्म साहनी : चीलें
अज्ञेय: जयदोल, आदम की डायरी
श्रीनरेश मेहता: जलसाघर
शिवानी: भैरवी, चल खुसरो घर आपने, चिरस्वयंवरा
उदय प्रकाश: तिरिछ, दरियाई घोड़ा, वॉरेन हेस्टिंग्स का सांड, मोहनदास, पीली छतरी वाली लड़की, और अंत में प्रार्थना, दत्तात्रेय के दुख,
अशोक भौमिक : आइस पाइस
ज्ञान प्रकाश विवेक : मुसाफ़िर खाना, सेवानगर कहाँ है, शिकारगाह
राजेन्द्र श्रीवास्तव : कोई तकलीफ़ नहीं
भालचन्द्र जोशी : पालवा, पहाड़ों पर रात, हत्या की पावन इच्छाएँ
मनीष वैद्य : टुकड़े टुकड़े धूप, फुगाटी का जूता
विद्यासागर नौटियाल : मेरी कथा यात्रा
शेखर जोशी : डांगरी वाले,
मालती जोशी : स्नेहबन्ध, दर्द का रिश्ता, विश्वासगाथा, न ज़मीं अपनी न फ़लक़ अपना, परख
सूर्यबाला : एक टुकड़ा कस्तूरी, गौरा गुनवंती
सुधा अरोड़ा : काँसे का गिलास, रहोगी तुम वही, अन्नपूर्णा मंडल की आख़िरी चिट्ठी
उषा भटनागर : ये दिन वे दिन, बरगद की छाँव में
इंदिरा गोस्वामी : लाल नदी
रामकुमार सिंह: भोभर और अन्य कहानियाँ
मोहन राकेश : बिना हाड़ माँस का आदमी
अनिल यादव : क्योंकि नगरवधुएँ अखबार नहीं पढ़तीं
जयंत पवार : फ़ीनिक्स की राख से उगा मोर
ओमा शर्मा : कारोबार
अवधेश प्रीत : कोहरे में कंदील
शिवमूर्ति : केशर कस्तूरी
पंकज सुबीर : चोपड़े की चुड़ैलें, कसाब.गाँधी@यरवदा.इन
सत्यनारायण पटेल: लाल छीट वाली लूगड़ी का सपना
गौतम राजऋषि : हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज़
वन्दना गुप्ता: बुरी औरत हूँ मैं
वन्दना अवस्थी दुबे : बातों वाली गली
डॉ फ़तेह सिंह भाटी : पसरती ठण्ड
राजकमल से आने वाली प्रतिनिधि कहानियों और नेशनल बुक ट्रस्ट की संकलित कहानियों की श्रृंखला बहुत उपयोगी है। जो नए पाठक मित्र अपने प्रिय लेखकों की चुनिंदा कहानियाँ पढ़ना चाहें वे इन श्रृंखलाओं से लाभान्वित हो सकते हैं।

आत्म कथ्य, डायरी, संस्मरण आदि विधाएँ पाठकों में बेहद लोकप्रिय हैं। अपने प्रिय लेखकों के जीवन और उनके व्यक्तित्व को समझने के इच्छुक पाठक इन विधाओं की किताबों को बड़े चाव से पढ़ते हैं।
आज प्रस्तुत है आत्मकथा / आत्मकथ्य / और डायरी विधा की चंद किताबों के नाम। संस्मरणात्मक आख्यानों की खेप अगली बार....
उग्र : अपनी खबर
मन्नू भंडारी : एक कहानी यह भी
ओम प्रकाश वाल्मीकि : जूठन
अजित कौर : खानाबदोश
कुंदनिका कपाड़िया : दीवारों के पार आकाश
भीष्म साहनी : आज के अतीत
स्वदेश दीपक : मैंने माण्डू नहीं देखा
पद्मा सचदेव : बूँद बावड़ी
अमृता प्रीतम : रसीदी टिकट
मिथिलेश्वर : पानी बीच मीन पियासी, कहाँ तक कहें युगों की बात, जाग चेत कछु करौ उपायी
मोहनलाल भास्कर : मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था
कलाम साहब : अग्नि की उड़ान
बच्चन जी : दशद्वार से सोपान तक, क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर
मुक्तिबोध : एक साहित्यिक की डायरी
अखिलेश : वह जो यथार्थ था
कर्तार सिंह दुग्गल : किस पहिं खोलऊँ गंठड़ी
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : अस्ति और भवति
अमृतलाल नागर : टुकड़े टुकड़े दास्तान
निदा नवाज़ : सिसकियाँ लेता स्वर्ग
शचीन्द्रनाथ सान्याल : बन्दी जीवन
भगवतीचरण वर्मा : धुप्पल
यशपाल : सिंहावलोकन
निर्मला जैन : जमाने में हम
तुलसीराम : मुर्दहिया, मणिकर्णिका
लालबहादुर वर्मा : जीवन प्रवाह में बहते हुए
कमलेश्वर : जो मैंने जिया, यादों के चिराग, जलती हुई नदी
गुरदयाल सिंह : क्या जानूँ मैं कौन
धीरेन्द्र अस्थाना : ज़िन्दगी का क्या किया
राम विलास शर्मा : अपनी धरती अपने लोग
मुनव्वर राना : मीर आके लौट गया
सुषम बेदी : आरोह अवरोह
किशोर साहू : मेरी आत्मकथा
नरेन्द्र कोहली : आत्मस्वीकृति
लक्ष्मण माने : पराया
रवि बाबू : मेरी आत्मकथा
रमणिका गुप्ता- हादसे, आपहुदरी
मंटो: मीनाबाजार
इस्मत चुगताई: कागज़ी है पैरहन
खुशवंत सिंह : सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत
प्रभा खेतान: अन्या से अनन्या
राजेन्द्र यादव : मुड़ मुड़ के देखता हूँ
मैत्रेयी पुष्पा: कस्तूरी कुंडल बसे
कौशल्या बैसन्त्री: दोहरा अभिशाप
............................

स्मृति आख्यान या संस्मरण प्रिय गद्य विधाएँ हैं। इस विधा की पुस्तकों की खोज बरसों से जारी है और इस पागलपन के परिणामस्वरूप जिन पुस्तकों से जान पहचान हुई , ये चौथी क़िस्त उन्हीं पर आधारित है

अशोक भौमिक : जीवनपुरहाट जंक्शन
ज्ञान प्रकाश विवेक : कम आवाज़ों का शहर
अमृतलाल नागर : जिनके साथ जिया
विमल मित्र : बिछड़े सभी बारी बारी
हरिशंकर परसाई : जाने पहचाने लोग
कमलेश्वर : अपनी निगाह में
विष्णु प्रभाकर : समांतर रेखाएँ, मेरे संस्मरण
शिवाजी सावंत: ऐसे लोग ऐसी बातें
देवेन मेवाड़ी: मेरी यादों का पहाड़
महादेवी वर्मा : पथ के साथी, मेरा भाई, काल के हस्ताक्षर, चरैवेति, मरण सागर पारे, स्मृति की रेखाएँ, सुनहुँ तात यह अकथ कहानी
शेखर जोशी: स्मृति में रहे वे
हृदयेश: स्मृतियों के साक्ष्य
अमृता प्रीतम : उनके हस्ताक्षर, एक थी सारा, काया के दामन में
निर्मल वर्मा : सर्जना पथ के सहयात्री
स्वयं प्रकाश : हमसफ़र नामा
निदा फ़ाज़ली : तमाशा मेरे आगे, चेहरे
आलोक भट्टाचार्य : पथ के दीप
विश्वनाथ त्रिपाठी : गंगा स्नान करने चलोगे, व्योमकेश दरवेश, गुरुजी की खेती बारी
काशीनाथ सिंह : घर का जोगी जोगड़ा, याद हो के न याद हो
विश्वनाथ मुखर्जी : बना रहे बनारस
शिव वर्मा : संस्मृतियाँ
धर्मवीर भारती : कुछ चेहरे कुछ चिंतन
पुष्पा भारती : यादें यादें और यादें
पंकज बिष्ट : शब्दों के लोग
पद्मा सचदेव : इन बिन, बारहदरी
गुलज़ार : पिछले पन्ने
कन्हैया लाल नंदन : कहना ज़रूरी था, मैं था और मेरा आकाश
प्रयाग शुक्ल : स्मृतियाँ बहुतेरी
विश्वनाथ त्रिपाठी: नंगातलाई का गाँव
चित्रा मुद्गल : अपरिहार्य कुछ
कुसुम खेमानी : कुछ रेत, कुछ सीपियाँ...
भगवानदास मोरवाल : पकी जेठ का गुलमोहर