14.4.17

माझी के पतवार

बच्चों की चाँद-चाँदनी 
लहर-लहर संसार 
हाथों के गट्टे सहलाते 
माझी के पतवार.

चाँद पी गया दूध!


घने वृक्ष की छाँव क्या करे?
मन बैसाखी धूप!
सूखी रोटी कैसे खायें?
चाँद पी गया दूध!


4.4.17

श्री दिगम्बर जैन मंदिर-सारनाथ



मंदिर के दरवाजों में लिखे दोहे भावनाएं हैं जिन्हें पढ़ना और समझना आनन्द दायक है.


अनित्य भावना 

राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असबार.
मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार.. 

अनित्य यानि अस्थिर, चंचल, छणिक, परिवर्तनशील, विनाशी, संसार की हर वस्तु, हर नाता रिश्ता, हमारा शरीर, आयु, रूप-लावण्य, वैभव, परिग्रह, सत्ता-अधिकार सबकुछ एक न एक दिन जाने वाला है. जन्म के साथ मरण, यौवन के साथ बुढ़ापा, सुख के साथ दुःख, लक्ष्मी के साथ दारिद्रय लगा हुआ है. कोई अपने को कितना ही बचाने का प्रयास करे, विनाश से, क्षीणता से, बच नहीं सकता. सबको एक दिन जाना ही है.

अशरण भावना 

दल-बल देवी देवता, मात पिता परिवार 
मरती बिरियाँ जीव को, कोई न राखनहार 

अशरण अर्थात असुरक्षा, असहायता, निरीहता. मनुष्य समझता है कि उसका ज्ञान, उसकी विद्याएँ, उसका वैभव, उसकी प्रतिष्ठा, ये सब उसके रक्षक-पोषक हैं. इसलिए वह इन चीजों के प्रति मोहित होता है, संचय करता है. किन्तु वास्तविकता यह है कि अंतिम समय आने पर कोई रक्षा नहीं कर सकता. आज तक कोई किसी को बचा नहीं सका. जो मरणधर्मा है, वह बच नहीं सकता. 

धर्म भावना  
जाचै सुरतरु देय सुख, चिंतत चिंता रैन
बिना जाचै बिन चिन्तये, धर्म सकल सुख दैन  

कल्पवृक्ष तो याचना करने पर सुख की सामग्री देते हैं, लेकिन धर्म तो ऐसा कल्पवृक्ष है कि बिना याचना के ही परमसुख प्राप्त होता है.

19.2.17

प्रेम

खामोश हो गईं
शाख पर बैठीं
चिड़ियाँ

शरमा कर
सिंदूरी हो गई
सरसों के पीले फूलों पर
दिनभर खेलती
धूप

आपस में नहीं मिलते
चाँद और सूरज
सुबह औ शाम
मगर दिखता है
धरती पर
प्रेम ।

सुबह की बातें-5

यूँ तो मॉर्निंग रोज ही गुड होती है लेकिन नौकर की मॉर्निंग तभी गुड होती है जब नौकरी से छुट्टी का दिन हो और लगे आज तो हम अपने मर्जी के मालिक हैं। कैमरा लेकर, मोबाइल छोड़ कर सुबह ही घर से निकलने के बाद हरे-भरे निछद्द्म वातावरण में अकेले घूमते हुए एहसास होता है कि हम भी इसी स्वतंत्र प्रकृति के अंग हैं। दौड़ने, हाँफने, टहलने के बाद थक कर सारनाथ के खंडहर वाले पार्क में घने नीम वृक्षों के नीचे किसी बेंच्च पर बेफिक्र हो बैठकर घण्टों प्रकृति का नजारा लेना, आनन्द दायक है।
खण्डहर के एक कोने में वेलेंटाइन जोड़े हीरो-हीरोइन की तरह फोटू हिंचा रहे थे। तैयारी से आये लगते थे। कपड़े बदलते और नए कपड़े में नई तस्वीरें खिंचाते। मैं उन्हें देखने में मशगूल था और सोच ही रहा था कि इनमें वेलेंटाइन वाली नेचुरल फीलिंग नहीं है भले ही ये फेसबुक में फोटो चिपकाएं तो बड़े रोमांटिक जोड़े नजर आएं कि तोतों के जोड़े नीम की शाख पर टाँय-टाँय करने लगे। उनके टाँय-टाँय से ध्यान भंग हुआ और उन्हें ही देखने लगा। एक लहराती, पतली शाख पकड़ कर झूलने और कलाबाजी खाते हुए टाँय-टाँय करने लगा और दूसरा उसे देख कर टाँय-टाँय करने लगा। दोनों में कौन तोता, कौन तोती ये अपने पल्ले नहीं पड़ा लेकिन असली वेलेंटाइन जोड़े लग रहे थे। बगल में खड़ा एक थाई जोड़ा चिंग-मिंग, चियाऊं-मियाऊं कर रहा था लेकिन जैसे टाँय-टाँय का मतलब नहीं समझा वैसे चियाऊं-मियाऊं भी नहीं समझा।
एक गिलहरी मेरे कदमों के पास से कुछ मुँह में दबा कर भाग गई और सरपट दौड़ती, अपने साथी के बगल में बैठ दोनों हाथों से पकड़ कर खाने लगी। इन्हें देख एक बात समझ में आती है कि खाने के मामले में ये कभी एक-दूसरे को कुछ शेयर नहीं करते। इस मामले में मनुष्य इनसे श्रेष्ठ प्राणी हैं।
एक थाई बच्चा लॉन में ही एक ओर खड़ा होकर, हिलते हुए बनारसी अंदाज में सू-सू करने लगा! उसकी मम्मी दौड़ते हुए आईं और उसे चपत लगाते हुए डाँट कर सभ्यता सिखाने लगी। अपने साथियों के बीच मम्मी शर्मसार होते हुए चीं-चां और अपने साथियों के बीच बच्चा हीरो बना ही-ही कर रहा था।
पौधों में बसन्ती बहार थी। भौरे गुनगुना रहे थे। दो सहेलियाँ बड़ी अदा से एक दूसरे की तस्वीरें खींच रहीं थीं। रह रह कर गेट की तरफ उचक/मचल कर देखतीं फिर फोटो खिंचाने में मशगूल हो जातीं। शायद उन्हें किसी की प्रतीक्षा थी।
धमेख स्तुप से नीम की शाख तक कबूतरों, कौओं और तोतों का आना-जारी था। मृगों के झुण्ड वैसे ही घास के लालच में बाउंड्री के उस पार ललचाई नजरों से टुकुर-टुकुर ताक रहे थे। मोर के इर्द-गिर्द मोरनियां न जाने क्या चुग रहीं थीं। एक कौआ एक हिरन की पीठ की सवारी कर रहा था। कौए तो कौए हैं कहीं भी बैठ जाते हैं। इनके लिये क्या हिरन, क्या भैंस! क्या संसद भवन, क्या गांधी जी की मूर्ती!!!

लोहे का घर - 26

नींद से जाग कर/करवट बदल फिर सो गया/ लोहे के घर में/ खर्राटे भरता आदमी. भीड़ नहीं है ट्रेन में/ जौनपुर पहुँचने वाली है किसान. मजे-मजे में सुन रहे थे सभी रोज के यात्री उसके खर्राटे. तास खेलने वाले खर्राटे के सुर से सुर मिलाकर जोर से पटकते हैं अपने पत्ते..हूँssss!/ अखबार पढ़ने वाले सांस से सांस मिलाकर/ ऊंची-नीची करते अपनी गरदन/ मोबाइल में वीडियो देखने वालों पर छाने लगा है खर्राटे का नशा. वे भी सो गये टाँगे फैलाकर. वह अभी और खर्राटे भरता लेकिन जगा दिया अपने अजीब स्वर से वेंडरों ने...हरी मटर ईss/ मटर बोलो, मटर/ ताजा पानी, मैंगो जूस/ कॉफी, चाय, गुटका बोलोsss/ चईया! अभी और खर्राटे भरता मगर जाग कर सोचने लगा/ खर्राटे भरता हुआ आदमी. एक बात समझ में आई/ सुर से सुर मिलाने से अच्छा है अजीब आवाजें निकालना/ अजीब आवाजों से/ खर्राटे भरने वाला आदमी क्या/ नींद से जाग सकती है देश की सरकार भी!
..................
जिनका सफ़र लम्बा होता है वे ट्रेन में खर्राटे भरते हैं। जिनका जितना छोटा, वे उतने बेचैन। गोदिया नामक लोहे के इस घर में बेचैन भी हैं और खर्राटे भरने वाले भी। कुछ कम्बल ओढ़ कर खामोशी से लेटे हैं अपनी बर्थ पर, कुछ लेटे-लेटे चला रहे हैं मोबाइल में उँगलियाँ और कुछ तो इतने खामोश हैं कि हिलाने के बाद ही इनके होने का एहसास हो पायेगा।
रात के खर्राटे और सुबह के खर्राटे में बड़ा फर्क होता है। रात में कोई खर्राटे भरे तो लगता है यह उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। सुबह-सुबह नहा-धो कर, दौड़ते-भागते ट्रेन पकड़े और सामने की बर्थ से लगातार जोर-शोर से खर्राटे की आवाज अनवरत आती रहे तब? तब आपका मन क्या करेगा? या तो आप भाग कर दूसरी बोगी में बैठ जायेंगे या खर्राटे भरने वाले के ऊपर अपनी बोतल का पानी छिड़कर जगा देंगे। क्या करेंगे यह आपकी ताकत और सहन शक्ति पर निर्भर करता है। 
.................
डबल बेड नहीं होता लोहे के घर में। लोअर बर्थ ही दिन में गप्प लड़ाने वालों की अड़ी, रात में सिंगल बेड बन जाती है। जव तक जगे हो चाहे जितना चोंच लड़ाओ मगर रात में सिंगल ही रहो। सिंगल बेड ही ठीक है लोहे के घर में। बे दर औ दीवार के कई घर साथ चलते हैं, डबल हो गया तो बवाल हो जायेगा!

मरूधर हवा से बातें कर रही है। यात्री आपस में खुशी का इजहार कर रहे हैं। रोज के यात्रियों को दफ्तर छोड़ने के बाद राइट टाइम पर मिली लेकिन अपने समय के अनुसार बहुत लेट है। समय के मामले में कितनों की किस्मत फूटी तब जा कर हम सौभग्यशाली बने। यही होता है। किस्मत का कटु सत्य यही है। किसी की अपने आप नहीं जगती। किसी की फूटती है तो किसी की जगती है। किस्मत से मिली खुशी मजा तो खूब देती है मगर श्रम अर्जित सुख वाला स्थाई भाव नहीं होता। आज है, कल गुम।

पीछे अड़ी जमी है। जोरदार बहस हो रही है। देश की चिंता हो रही है। शिक्षा के स्तर से लेकर चुनाव की बातें हो रही हैं। चुनाव ड्यूटी और निलंबन की बातें हो रही हैं। फुर्सत के समय लोहे के घर की अड़ी से बढ़िया कोई दूसरा स्थान नहीं होता देश की चिंता के लिये। जब कोई काम न कर पाओ तब देश की चिंता करो। नेता से लेकर अधिकारी तक की कमियाँ गिनाओ। खुद को छोड़ सब में झँकों। प्रचलित दूसरी अड़ियों की तरह लोहे के घर की अड़ी में देश की चिंता करने के लिए बढ़िया टॉनिक नहीं मिल पाता। चाय, पान, बीड़ी-सिगरेट, भांग या शराब नहीं मिल पाता। लोग होश में बहस करते हैं इसलिये जोर से शोर भले कर लें, आपस में हाथापाई नहीं करते। बहस गम्भीर हो जाए तो बात का रुख बदल कर देश की चिंता छोड़ अपनी चिंता करने लगते हैं। बात ठहाकों में समाप्त हो जाती है।

अभी सुबह शाम चकाचक ठंड है। बंद हैं लोहे के घर के शीशे। दिन में कड़क धूप है। जैकेट-मफ़लर उतरे, रात में छोड़नी, सुबह ढूँढ कर ओढ़नी पड़े रजाई तब समझो कि बसन्त आया। धूल उड़ाती बहने लगी हवा तब समझो बसन्त आया। अभी तो बसन्त का आउटर आया है। अपनी ट्रेन भी आउटर पर खड़ी है। बनारस घूमने आये एक विदेशी यात्री ने मुझसे हाथ मिलाकर 'थैंक यू' बोला और गेट पर जा कर खड़ा हो गया। किसी कन्या के हाथ की तरह कोमल था उसका हाथ! सोंच रहा हूँ उसने मुझे थैंक यू क्यों बोला? कहीं इसलिए तो नहीं कि मैं चुपचाप मोबाइल पर लिखता रहा और उसे डिस्टर्ब नहीं किया!
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गोदिया हवा से बातें कर रही है। शादी का मौसम है इसलिए भीड़-भाड़ है ट्रेन में। एक परिवार कई बच्चों के साथ जौनपुर में चढ़ा था। सभी बदहवास से थे। पुरुष बर्थ तलाश रहा था तो महिला सामान और बच्चों की गिनती कर रही थी। सामान की गिनती पूरी हुई तो बच्चों की शुरू हुई। अचानक से चीखने लगी-राहुल! राहुल! ...अरे! राहुल नहीं आया!!! ट्रेन चल दी, राहुल नहीं आया! भयाक्रांत महिला रुआंसी हो चुकी थी कि राहुल की आवाज आई-मम्मी! मैं यहाँ हूँ। अगले ही पल भय क्रोध में बदल गया-साथ क्यों नहीं रहता? राहुल हँसते हुए बोला-यहीं तो था! तब तक पुरुष ने पुरुषार्थ किया-बर्थ मिल गई, आगे है, चलो! सब चलो-चलो कहते हुए आगे बढ़ गये। उनके जाने के बाद आस-पास बैठे यात्री अपना-अपना विचार रखने लगे...घबराहट हो ही जाती है..कितना सामान था!..बच्चे भी बहुत थे..सामान मिलाने के बाद ही बच्चों पर ध्यान गया..आदमी के चिंता ना रहल, मेहरारू ढेर घबड़ा गयल..लोग बहुत जल्दी घबड़ा जाते हैं..।
गोदिया अभी भी हवा से बातें कर रही है। जौनपुर से बनारस नॉन स्टाप है। कोई स्टेशन आता है तो पटरियों से खट-पट करती है। कोई पुल आता है तो थर्रा देती है। कभी धीमें, कभी तेज मगर लगातार हवा से बातें कर रही है गोदिया। लोहे के घर के बाहर बहुत बड़ी दुनियाँ है। सफर में ही आसान लगती है जिंदगी। पड़ाव आया नहीं कि कई जरूरी काम याद आ जाते हैं। 

हमारा बसन्त

न आम में बौर आया, न गेहूँ की बालियों ने बसन्ती हवा में चुम्मा-चुम्मी शुरू करी, न धूल उड़े शोखी से और न पत्ते ही झरे शाख से! अभी तो कोहरा टपकता है पात से। सुबह जब उठ कर ताला खोलने जाता हूँ गेट का तो टप-टप टपकते ओस को सुन लगता है कहीं बारिश तो नहीं हो रही! कहाँ है बसन्त? कवियों के बौराने से बसन्त नहीं आता। बसन्त आता है तो हवा गाने लगती है, कोयल कूकने लगती है और पत्थर भी बौराने लगते हैं। अभी तो चुनाव आया है। जो जीतेगा बसन्त तो सबसे पहले उसी के घर आयेगा। आम को तो बस बदलते दाम देखने हैं। अभी जो परिवर्तन के लिए उत्साहित हैं वे बाद में समझेंगे कि रहनुमा बदलने से दुश्वारियाँ नहीं जातीं। मालिक भेड़-बकरी का सदियों से कसाई है। कहॉ है बसन्त?

द़फ्तर जाते हुए रेल की पटरियों पर भागते लोहे के घर की खिड़की से बाहर देखता हूँ अरहर और सरसों के खेत पीले-पीले फूल! क्या यही बसंत है? भीतर सामने बैठी दो चोटियों वाली सांवली लड़की दरवाजे पर खड़े लड़कों की बातें सुनकर लज़ाते हुए हौले से मुस्कुरा देती है। लड़के कूदने की हद तक उछलते हुए शोर मचाते हैं! क्या यही बसंत है?

अपने वज़न से चौगुना बोझ उठाये भागती, लोहे के घर में चढ़कर देर तक हाँफती, प्रौढ़ महिला को अपनी सीट पर बिठाकर दरवाजे पर खड़े-खड़े सुर्ती रगड़ते मजदूर के चेहरे को चूमने लगती हैं सूरज की किरणें! क्या यही बसंत है?

अंधे भिखारी की डफ़ली पर जल्दी-जल्दी थिरकने लगती हैं उँगलियाँ। होठों से कुछ और तेज़ फूटने लगते हैं फागुन के गीत। झोली में जाता है, हथेली का सिक्का। क्या यही बसंत है?

द़फ्तर से लौटते हुए लोहे के घर से मुक्ति की प्रतीक्षा में टेसन-टेसन अंधेरे में झाँकते नेट पर दूसरे शहर की चाल जांचते मोबाइल में बच्चों का हालचाल लेते पत्नी को जल्दी आने का आश्वासन देते मंजिल पर पहुँचते ही अज़नबी की तरह साथियों से बिछड़ते, हर्ष से उछलते, थके-मादे कामगार। क्या यही बसंत है?

पहले बसन्त आता था और बसन्त के बाद फागुन आता था। बसन्त और फागुन के मिलन का सुखद परिणाम यह हुआ कि हमारे नौजवानों को प्यार सिखाने वेलेंटाइन आ गया! प्यार तो हम पहले भी करते थे मगर गुलाब पेश करते बहुत झिझकते थे। कितने फूल किताबों में मुर्झा गए। कितने शादी के बाद किताबों में दुश्मन के हाथ लगे। जब से वेलेन्टाइन की शुरुआत हुई गुलाब क्या खुल्लम खुल्ला गुलदस्ता पकड़ाये जाने लगे! बसन्त पंचमी के दिन माँ सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त कर पढ़ाई में जुटने के बजाय लड़के वेलेंटाइन के इन्तजार में दंड पेलने लगे। लड़के तो लड़के उनके पिताजी भी बेचैन आत्मा का गीत गुनगुनाने लगे-"बिसरल बसन्त अब त राजा आयल वेलेंटाइन! आन क लागे सोन चिरैया, आपन लागे डाइन!!"

अभी तो कड़ाकी ठंड है। सुबह गेट खोलो तो बसन्त के बदले देसी कुत्तों के पिल्ले भीतर झांकते हुए पूछते हैं-मैं आऊँ? मैं आऊँ? अभी तो खूब हैं लेकिन कड़ाकी ठंड में पैदा हुए कुत्ते के दर्जन भर पिल्ले बसन्त आने तक दो या तीन ही दिखते हैं। जैसे आम आदमी को बसन्त नसीब नहीं होता वइसे ही सभी पिल्लों को बसन्त नसीब नहीं होता। जिन्दा रहते तो गली में निकलना और भी कठिन हो जाता। प्रकृति को इससे कोई मतलब नहीं। कोशिश करो तो छप्पर फाड़ कर देती है। कहती है-पाल सको तो पालो वरना हम तो उसी मिट्टी से नये खिलौने गढ़ देंगे! शायद इसी को महसूस कर नारा बना होगा-दो या तीन बच्चे, होते हैं घर में अच्छे। बाद में सरकार को इससे भी कठिनाई महसूस हुई तो नारा दिया-हम दो, हमारे दो। नहीं माने तो परमाणु बम हइये है। कोई #ट्रम्प चाल चलेंगे और साफ़ हो जाएंगे दोनों तरफ के आम आदमी। फिर आराम से मजे लेंगें ख़ास, बसन्त का। हमारा बसन्त तो बाबाजी का घण्टा!
.

3.2.17

पचपन साल का आदमी

वरिष्ठ नागरिक होने
और
रिटायर्ड होने की
निर्धारित उम्र
साठ साल होती है
साठ से
पाँच ही कम होता है
पचपन साल का आदमी

समा जाते हैं
हाथ की पाँच उँगलियों में
ख़ास होते हैं
ये पाँच साल
फैले तो जिंदगी
रेत की तरह फिसलती,
भिखारी-सी लगे
जुड़े तो
मुठ्ठी बन जाय!

कभी
अँगूठा या तर्जनी मत दिखाना!
पचपन साल का आदमी
तुम्हारा
अँगूठा देखता है तो
चबा लेता है
अपनी ही चारों उँगलियाँ
तुम्हारी
तर्जनी देखता है तो
गुस्से से पटक देता है
अपने ही मेज पर
मुठ्ठी!

अकेले में
नींद से पहले
छाती पर मूँग की तरह
सोती हैं उँगलियाँ...
अब पाँच साल ही बचे
करनी है
बिटिया की शादी
अब पाँच साल ही बचे
लड़के को
नहीं मिली नौकरी
अब पाँच साल ही बचे
लदा है माथे पर
ढेर सारा कर्ज

कभी अखबार से
कभी
नई सरकार के बजट से
करता है उम्मीद
ढूंढता है...
शादी के रिश्ते,
नौकरी के विज्ञापन,
आयकर में छूट,
युवाओं के लिये रोजगार,
होम लोन की ब्याज दर
और....
पत्नी को खुश करने के लिये
कोई अच्छी खबर

नहीं होती उसके पास
बच्चे की तरह
पूरी धरती
युवा की तरह
पूरा आकाश
या फिर
वरिष्ठ नागरिकों की तरह
जिंदगी का
कोई एक
निर्धारित कोना

सोम से शनि तक
काम से जूझता
बीच-बीच में
ज्ञान बघारता
हा-हा, ही -ही करता
खुद को सही
दूसरों को
गलत कहता
झूठी हँसी हँसता
कभी घर
कभी दफ्तर
सर पर उठाये
देर तक
हाँफता रहता है
पचपन साल का आदमी।

1.2.17

बसंत

माचिस ढूँढ कर रखना
उजाले में
सुना है
भड़क कर जलती है
लौ
बुझने से पहले

हौसला
बचा कर रखना
अँधेरे में
यूँ ही
डराती रहती हैं
काली रातें
सुबह से पहले
सांसें
चलती रहें
ठंडी हवा में भी
सुना है
बर्फ बन
भहरा कर गिरता है
जाड़ा
बसंत से पहले।
….......................

29.1.17

बजट देश का बनाम घर का

बच्चों बताओ! बजट कौन बनाता है? कक्षा के सभी बच्चों ने उत्तर दिया-वित्त मंत्री । मगर एक ने हाथ उठा कर कहा-गृह मंत्री! उत्तर सुनते ही गुरूजी म्यान से बाहर! गृह मंत्री वाला जवाब उनकी कुंजी में नहीं था जिससे वो पढ़ाते थे और न उस तंत्र के पास था जिसने उन्हें गुरूजी बनाया था। सजा सुना दिया-दोनों हाथ उठाकर बेंच्च पर खड़े हो जाओ! लड़का विरोध में उस रिक्शे वाले की तरह हकलाने लगा जिसकी हवा बीच सड़क सिपाही निकाल दे-म..म..गर गुरूजी.. मैं..मैं..स..ही..। बच्चों के ठहाकों के बीच गुरूजी दारोगा की तरह गर्जे-चोप्प! कक्षा में ठहाके लगा रहे बच्चे गुरूजी का असली रूप देख, सहम कर चुप हो गये। कुछ देर बाद फिर खुसुर-पुसुर शुरू हुई। मॉनीटर ने खड़े होकर अनुरोध किया-'उसका जवाब तो सुन लीजिये गुरु जी!' दूसरे बच्चों में उम्मीद की किरण जागी। गुरूजी ने दोनों हाथ हवा में लहराया। बायें से मानीटर को बिठाया और दायें से लड़के को बोलने के लिये ललकारा-बक्को!
लड़के ने उत्तर दिया -देश का बजट कौन बनाता है यह तो सभी जानते हैं मगर घर का बजट गृह मंत्री बनाती हैं। यह बात मुझे पिताजी ने बताई थी। गलत है क्या सर? लड़के की मासूमियत ने गुरूजी के हृदय को छीलकर मुलायम कर दिया। हँसते हुए कहा-बैठो-बैठो। कक्षा में गुरूजी का और घर में बाउजी का हँसना माहौल को खुशनुमा बनाता है। गुरूजी की एक हंसी पर सभी मुर्झाये फूल झूम कर खिल उठे।
बच्चों की ये बातें तो मजाक में कही गयीं मगर इन बातों से एक बात यह समझ में आती है कि देश का बजट देश के वित्त मंत्री और घर का बजट घर की मालकिन बनाती हैं. साधारण शब्दों में कहें तो बजट का अर्थ होने वाली आय और किये जाने वाले खर्चों का पूर्वानुमान है. देश का बजट साल में एक बार और घर का बजट हर माह बनता है. यह पति के आय और गृहणी की कुशलता पर निर्भर करता है. जैसे भ्रष्टाचारी काला धन विदेशों में या पाताल खातों में जमा करते हैं वैसे ही महिलायें हर माह होने वाले आय का पहला हिस्सा गुप्त पोटली में जमा करती हैं और घर में आने वाले किसी बड़े आफत के समय साक्षात लक्ष्मी बन मुस्कुराते हुए प्रकट होती हैं! यह गुण भ्रष्ट नेताओं में नहीं पाया जाता. देश पर आने वाले आफत के समय ये बगलें झाँकने लगते हैं. छापे के समय ही इनकी कलई खुल पाती है. घर के बजट में महिलाओं का ध्यान सबसे पहले घर में राशन-पानी भरने में लगा रहता है. बच्चों की आवश्यकताओं के बाद उन पर ध्यान जाता है जिसके कठिन श्रम से प्रति माह घर में पैसा आता है. अक्सर वहां तक आते-आते धन ख़तम हो जाता है. बजट बनाने वाले के हिस्से में तो कुछ भी नहीं बचता. वे अपनी जरूरतों के लिए अतिरिक्त धन की मांग करती हैं और इन्हें नेताओं की तरह आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता. देश का बजट बनाने वाले भी इसी त्याग की भावना से देश का बजट बनायें तो कितना अच्छा हो!
देश का बजट बनाते समय सिर्फ पूर्वानुमान ही नहीं बल्कि लक्ष्य और उद्देश्य को भी ध्यान में रखना होता है. जिसे परफार्मेंस बजट या निष्पादन बजट कहते हैं. जनता का पैसा जनता के विकास में इस प्रकार लगाना कि देश के हित के साथ-साथ चुनाव के पूर्व किये गए वादे पूरे होते दिखाई दें यह वित्त मंत्री की आर्थिक नहीं राजनैतिक कुशलता पर भी निर्भर करता है. जनता से घुमा फिर कर कई प्रकार से टैक्स के रूप में लिए गए धन को देश हित में खर्च करना होता है. 'तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे है मेरा!' वाले भाव में वित्तीय और राजनैतिक कुशलता झलके तो विपक्ष भले कोसे मगर पार्टी के लोग खुश हो जाते हैं. बजट के प्राविधान के साथ इसको क्रियान्वयन की व्यस्था भी पारदर्शी होनी चाहिये.अक्सर देखा गया है कि आम आदमी तक आते-आते उनके लिए आवंटित धन चुक जाता है. दुष्यंत कुमार ने इस दर्द को कुछ यूं बयां किया है.."यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ, मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा!"
जैसे ही बजट की घोषणा होती है लम्बे बजट की मोटी-मोटी बातें जानकर सरकार के पक्षकार वाह! वाह! तो विरोधी हाय! हाय! करने लगते हैं. सरकार कितना ही अच्छा बजट पेश करे विरोधी को हाय-हाय करना है. विरोधी जब सरकार में आ जाते हैं तो लोगों के रोल बदल जाते हैं. हाय-हाय करने वाले वाह-वाह और वाह-वाह करने वाले हाय-हाय करने लगते हैं. सरकारी कर्मचारियों की नजर आयकर में मिलने वाले छूट पर होती है. सरकारी कर्मचारी हर साल चाहते हैं कि उनकी आय अधिक से अधिक बढ़े और आयकर कम से कम लिया जाय. हर साल आय में वृद्धि होती है और हर साल छूट की दर बढ़ती जाती है. सरकारें भी जीत कर आने के शुरू के वर्षों में अंगूठा दिखाने और मुँह चिढ़ाने वाला और चुनाव वर्ष से ठीक पहले आय में अधिक छूट देते हुए लोक लुभावन बजट पेश करती है.
आजकल आभासी दुनियाँ का बाजार प्रिंट मीडिया से तेज खबर देता है. इन पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं. अभी कुछ दिन पहले वाट्स एप में, आयकर में भारी छूट का मैसेज आया। पढ़ते ही लगा कि कोई #मामा बना रहा है। सरकार और इतनी उदार! कभी हो ही नहीं सकता। फिर याद आया कि 5 राज्यों में चुनाव होने वाला है, कौन जाने खबर सच ही हो! मन लड्डू बनाता, दिमाग फोड़ देता। हकीकत तो बजट आने के बाद ही पता चलेगा कि सच क्या है मग़र जिसने भी यह हवा उड़ाई है वो बड़ा शातिर है। सरकार के विरुद्ध राजनीति कर रहा है। इससे कम छूट मिला तो सरकार छूट देने के बाद भी आलोचना का शिकार होगी कि क्या देने वाले थे, क्या दिये! छूट मिला ही नहीं तो और बुरा होगा! आरोप लगते देर नहीं- सरकार तो बड़ी जालसाज निकली! ये भी कोई बजट है! 

22.1.17

दल बदल या दिलबदल

बीहड़ में किसी डाकू का दिल बड़े गिरोह पर आ जाय और वह लूट में अधिक हिस्से के लोभ में अपना दल बदल कर बड़े गिरोह में शामिल हो जाय तो किसी को कोई अचरज नहीं होता। जंगल का अपना क़ानून होता है। ताकत की सत्ता होती है। अस्तित्व का संघर्ष होता है। सत्ता की छाया में अधिक माल लूटने या जान बचाने के लिये डकैत दल बदलते रहते हैं। आश्चर्य तब होता है जब किसी लोकतांत्रिक देश में जन सेवा के लिये काम करने वाले नेता जी का दिल एन चुनाव के समय बड़े गिरोह पर आ जाता है और वे झट से अपना दल बदल कर दूसरे दल में शामिल ही नहीं हो जाते बल्कि चुनाव लड़ने का टिकट भी पा जाते हैं!

दल बदलू के दल बदलने से दोनों दलों के वे कार्यकर्ता खुद को दल दल में फँसा समझते हैं जिन्होंने उनसे उम्मीदें पाल रखी थीं। सामान्य को पूछता ही कौन है? दलबदलू कोई साधारण तो होता नहीं। वही हो सकता है जिसके पास जन बल और धन बल दोनों हो। इन बादशाली दलबदलुओं के अपना दिल बदलने से ये नरक में नहीं जाते बल्कि इनके इस आचरण से कितने स्वर्ग में जाने की तैयारी करने लग जाते हैं!

दिल दोनों तरफ टूटते हैं। जिस दल में थे उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि अब अपनी ताकत और कम हो गई। जिस दल में गये उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि जीवन भर मेहनत हमने किया और जब हाथ सफाई का मौका मिला तो टिकट कोई बाहरी ले उड़ा! ये उस मजनू की तरह मायूस होते हैं जो लड़की पटाये और उसका टिकट छीन कर फिलिम दिखाने कोई और ले कर चला जाया! कुछ दिन तक तो 'दिल के टुकड़े हजार हुए। कोई यहां गिरा, कोई वहाँ गिरा।' वाला हाल होता है, इरोध-विरोध होता है फिर 'हरि इच्छा' बलवान की तरह 'हाई कमान बलवान' मान कर सभी अपने पार्टी में ही अपने विलेन की जय जयकार करने लगते हैं!

प्रश्न उठता है कि आदमी दिल बदलता ही क्यों है?

कंजूस की पत्नी डाक्टर से मन्नत कर अपने पति का दिल धोखे से बदल दे और राजा का दिल लगवा दे। बाद में जब राजा उसे बेगम समझ कर रोज शाही कबाब बनाने का हुक्म देने लगे तब जा कर पत्नी को एहसास हो कि इससे अच्छा तो अपना कंजूस पति ही था!

किसी लड़की का दिल अपने रामू को छोड़ सलमान खान पर आ जाय और बाद में पता चले कि सलमान तो पहले से बहुतों का दिल तोड़ चुका है!

अच्छी भली पत्नी छोड़ कोई अधेड़ पड़ोस के लड़के से पूछे-भाभी जी घर पर हैं? और घर से पहलवान भैया निकलकर उसका सर तोड़ दें!

कोई चमचा, चम्मच की तरह एक अधिकारी के जाते ही नये वाले अधिकारी से तुरंत घुल मिल जाय और उनके प्याली में भी पुराने की तरह फिट बैठे!

ये सब बातें तो आम आदमी के लिए पुरानी सामान्य घटनाएं हैं। सब चलता है। यही दुनियाँ है, यहाँ यही होता है, मान कर हँसते हुए स्वीकार कर लेता है। मगर किसी सिद्धांत की दुहाई देने वाले का दिल, किसी दूसरे उस सिद्धान्त की दुहाई देने वाले दल पर आ जाय जिसकी जीवन भर बुराई करके नेता बना है तो दोनों दलों के अलावा जन सामान्य का भी दिल टूटना स्वाभाविक है।

एक प्रश्न के बाद कई प्रश्न उठते हैं। आखिर नेता जी ने अपना दिल क्यों बदला ? क्या सत्ता की चौकीदारी में ही होशियारी है? सत्ता सुख के सामने सब सुख ओछे हैं? क्या सिद्धांत, सत्ता प्राप्त करने की अलग-अलग सीढ़ियाँ हैं जिसमे पीढी दर पीढ़ी चढ़ती-उतराती रहती है? क्या सेवा भाव इतना प्रबल होता है कि आदमी मुँह मांगे भाव में उसे खरीद लेना चाहता है। अंत में यह कि यदि देश में इतने सारे सेवक हैं तो आम आदमी इतना दुखी क्यों है?

सिद्धार्थ ने आम आदमी के दुःख दूर करने के लिए सत्ता सुख का त्याग किया और नेता जी आम आदमी का दुःख दूर करने के लिये सत्ता पाना चाहते हैं! दोनों में सही कौन? वो जो बुद्ध बन गये या वो जो राजा बनना चाहते हैं?

19.1.17

किताबें और मेले

क्या पाण्डे जी! विश्व पुस्तक मेला लगा था दिल्ली में, गये नहीं?
हाँ मिर्जा, नहीं गये। टिकट नहीं था।
आप कहते तो टिकट कटा देता आपका। दिल्ली कौन दूर है?
ट्रेन के टिकट की बात नहीं कर रहा मिर्जा, मैं पुस्तक मेला के टिकट की बात कर रहा हूँ! पुस्तक मेले में वही लेखक जाता है जिसकी एकाध पुस्तक छप चुकी हो। बिना पुस्तक छपे मेले में जाना वइसे ही है जैसे बिना टिकट ट्रेन पर चढ़ना। तुम्हें क्या पता? बिना पुस्तक वाला कवि मेले में बिना पूँछ वाले बन्दर की तरह कितना शरमाता रहता है!
एक साल हम भी गये थे मिर्जा, मेले में। बहुत से बिछुड़े भाई एक साथ मिल गये। किसी के हाथ में पुस्तक, किसी के बैग में पुस्तक, किसी का झोला भरा हुआ तो किसी का बोरा बंधा हुआ और हम खाली हाथ! मारे शरम के जमीन पर गड़े जा रहे थे, कोई देख कर पहचान न ले।
तब! फिर का हुआ?
का होना था मिर्जा! वही हुआ जिसका डर था। हम सोच ही रहे थे कि फूट लें यहाँ से तभी एक मित्र ने पीछे से आ कर टी.टी. की तरह पीठ में धौल जमा ही दिया-कैसे हैं पाण्डे जी? आपकी कौन सी पुस्तक आई इस बार? फिर बिना उत्तर सुने पकड़ कर एक कोने में ले गया जहां कम भीड़ थी। वहाँ मेले में बिछुड़े सभी भाई मौजूद थे। सभी से मेऱा परिचय कराते हुए बोलने लगा-इनसे मिलिये! यही बेचैन आत्मा हैं। इत्तफाक की बात थी मिर्जा! सभी मुझसे तपाक से हँसते हुये मिले! किसी ने मुझे शर्मिंदा नहीं किया!! मुझे उसी पल विश्वास हो गया कि इंसानियत कहानियों में ही नहीं, लेखकों में भी पाई जाती है! सभी मुझे प्रोत्साहित करते रहे-अगली बार मेले में आपकी पुस्तक भी आ ही जानी चाहिये।
तब! इतने अच्छे मित्र हैं तब क्यों नहीं गये मेले में?
कहाँ कोई पुस्तक छपी मिर्जा! हर बार कोई प्रोत्साहित थोड़ी न करता है। इस बार जाता तो तंज कसता-पूरी जिंदगी फेसबुक में ही गुजार दोगे क्या!
तो क्या खाली लेखक ही जाते हैं पुस्तक मेले में! पाठक कोई नहीं जाता?
वही पाठक, वही लेखक मिर्जा! यूँ समझो सभी पाठक, सभी लेखक।
इनके अलावा?
लेखक को हरदम झाँसा देते रहने वाला प्रकाशक, देखा-देखी पढ़ाकू दिखने वाले नये लड़के, बड़े लेखकों के बीच घुसकर एल्फी-सेल्फी खिंचा कर फेसबुक में चस्पा करने वाले और इस तरह हमेशा आत्ममुग्ध रहने वाले नये लेखक और लेखकों को विद्वान समझ कर चाय-पानी कराते रहने वाले उनके मित्र। इन्ही सब की चौकड़ी दिन भर हुँकार-फुँकार करती रहती है मिर्जा।
मतलब गाँव के मेले की तरह कोई मजा नहीं होता मेले में?
देश-शहर-गाँव सब पुस्तक में घुस जाता है मिर्जा! तुमने देखा है न गाँव का मेला? जिस बच्चे की उमर गुब्बारा फुलाने की होती है, वही गुब्बारा बेच रहा होता है! कितनी सूनी रहती हैं हरी चूड़ी बेचने वाली गुलाबो की आँखें! यही हाल विद्वत समाज का है। जिसके पास पैसा है वह हर साल पुस्तक छपवा सकता है। प्रकाशक किसी गरीब की पुस्तक नहीं छापता। बड़े-बड़े लेखकों की तमाम उम्र फकीरी में कट गई। जब स्वर्गवासी हुए, लोगों ने तारीफ करी तभी प्रकाशक उनके घर गया। बुद्धिजीवियों की दुनियाँ और जालिम है मिर्जा, कत्ल करते हैं और खून का एक धब्बा नहीं दिखता।
सही बात है गुरु! एक बार हमने भी एक कवि समेलन कराया था। बड़े लिफ़ाफ़े के लिये सब कवि झगड़ने लगे थे आपस में! किसी तरह बीच-बचाव किया और अपनी जेब से पइसा लगा कर मामला रफा-दफा किया।
तब मेला एकदम बेकार चीज है?
नहीं मिर्जा! यह नहीं कह रहा। मेला तो मेला है, मजा ही मजा है। जइसे गरीब को मेले से ही रोटी मिलती है वइसे बुद्धिजीवी को मेले से ही खुराक मिलती है। जेब में पैसा हो, फालतू समय हो और लिखने-पढ़ने का शौक हो तो मेले से बढ़कर और दूसरी अच्छी जगह कौन है साहित्य के मनोरोगियों के लिये! सोने में सुहागा-अपनी तरह दूसरे और रोगी भी मिल जाते हैं ओने-कोने, शब्दों के चाट-पकौड़े चखते हुए! कवि को कवयित्री मिल जाती हैं, कवयित्री को कवि मिल जाते हैं। आलोचकों को कवि-कवयित्री के रूप में जुगाली करने के लिए आलू-चना दोनों मिल जाते हैं। प्रकाशकों के पुराने अंडे बिक जाते हैं, नये मुर्गे मिल जाते हैं। इससे अच्छा और क्या हो सकता है भला!
एक ताजा शेर सुनो मिर्जा-
मृत्यु लोक के लेखकों की उल्टी-पल्टी गई बहुत 
अधिक बिकी इस बार भी स्वर्गीय की पुस्तक।
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15.1.17

सत्य


देखो! सुनो! समझो! तब बोलो।
बोलो तो..
जोर-जोर से बोलो
पूरे आत्मविश्वास से बोलो
दो चार और सुनें कि तुमने
क्या देखा? क्या सुना? और क्या समझा?
विचलित मत होना
जब वे बोलें
चिल्लाने मत लगना..
झूठ! झूठ!
तुम गलत! तुम गलत!
मैं सही! मैं सही!
ध्यान से सुनना
उन्होंने क्या बोला
और समझना
कि यह
उनका देखा, उनका सुना और उनका समझा सत्य है।
सत्य
सभी के लिये
कभी एक सा नहीं होता
सभी की
अपनी नज़र, अपनी शक्ति और अपनी समझ होती है
इसीलिये सभी के
अपने-अपने सच होते हैं।
सभी के सत्य एक होते तो
सभी
वृक्ष न बन गये होते!

8.1.17

लोहे का घर-25


'हाय! ललमुँही, आज तो बड़ी रफ्तार से चल रही हो!' 40 मिनट में जौनपुर से खालिसपुर आ गई!!!'..हवा ने ट्रेन को छेड़ा।
दून ने लम्बी सीटी बजाई और खालिसपुर से भी चल दी। 'चुप री पगली हवा! बहुत लेट हो चुकी हूँ पहले से ही। कुछ तो समय कवर करने दे। मुझे जौनपुर दिन में 2 बजे ही पहुँचना था, शाम हो गई। तुम्हें पता है? जौनपुर से एक बेचैन आत्मा चढ़ता है। लेट हुआ और किसी ने जरा भी कोसा/गाली दिया नहीं कि झट से लिखकर फेसबुक में छाप देता है।
अच्छा! बड़ा बदमास है तब तो! एक दिन गिरा क्यों नहीं देती?
अरे! वो अकेला थोड़ी न मरेगा। वो नहीं तो कोई और लिखेगा। किसी का मुँह थोड़ी न बंद कर सकते हैं। कुछ झूठ तो लिखता नहीं। किसी की आलोचना से घबराकर और गलत काम नहीं करना चाहिए। खुद को सुधारना ही सबसे बढ़िया विकल्प है। आलोचना करने वाला तुहारा शत्रु नहीं, सदैव मित्र होता है।
वाह री ललमुँही! बड़ी ज्ञानी बन गई हो नये साल में!!!
मैं तो हमेशा से ज्ञानी हूँ पगली हवा! सब मुसीबत तेरे और कंट्रोलर के कारण है।
मेरे! अब मैंने क्या किया?
तू ही तो हिमालय से लाती है ठंडी हवा और घना कोहरा। तेरे कारण न मुझे कुछ दिखाई देता है और न कंट्रोलर को। भागूँ तो कैसे भागूँ?
दूसरे पर आरोप मढ़ने को कह दो। अब यहाँ वीरापट्टी में क्यों खड़ी हो गई? यहाँ तो तेरा स्टापेज नहीं है। घना कोहरा भी नहीं है!
देखती नहीं सिगनल लाल है! मेरी सारी तेजी बेकार कर दिया इस स्टेशन मास्टर ने। वो भी क्या करे! कंट्रोलर ने सिग्नल ही नहीं दिया होगा। चाय पीने चला गया होगा। देख! सिग्नल ग्रीन हो गया। अब मुझे बातों में मत उलझा। तुझसे बतियाने के चक्कर में सिग्नल दिखाई नहीं दिया तो नाहक मारा जाएगा एक एक बेचैन आत्मा. 
..............................
तेरा नाम #दून किसने रख दिया लालमुँही! तू तो खून कर देगी कितनों का। आज फिर लेट!!! बेचैन आत्मा छोड़ेगा नहीं। मैंने उसे टेशन पर देखा था। काँधे पर झोला लटकाये, मूँगफली फोड़ रहा था और तुम्हारा मजाक उड़ा रहा था।
अच्छा! क्या कह रहा था?
मुझसे तो कुछ नहीं मगर अपने साथियों से कह रहा था कि इससे अच्छी तो #गोदिया है। राइट टाइम है और आगे चलकर दून को पीटेगी। तुम गोदिया से पिटाओगी क्या जानेमन?
मुझे बनारस तक 4 स्टेशन रुकना है और वो नान स्टॉप #ट्रेन है, इसलिये ऐसा बोल रहा होगा मगर उसके आने में तो अभी 30 मिनट देर है! तब तक तो मैं पहले पहुँच जाऊँगी बनारस। लो! अभी #जफराबाद से चली हूँ और किसी ने मेरी चेन खींच ली!!! यही हाल रहा तो मैं क्या कर सकती हूँ भला! पहले चेन छुड़ाऊँ फिर चलूँ।
तू तो आज गई काम से।
चेनपुलिंग के बाद रुकी दून ने जोर की सीटी बजाई और हवा से बातें करते हुये कहा-चुप रे पागल हवा! उसे मेरे ऊपर भरोसा ही नहीं तो क्यों बैठता है मेरी गोदी में? चले जाना था न अपनी गोदिया के पास।
वो तो नहीं मान रहा था दुन्नी! उसके दोस्तों ने यह कहते हुए बिठा दिया कि गोदिया राइट टाइम है लेकिन आधे घण्टे में तू बहुत आगे ले जाएगी और रुकने के बाद भी पहले पहुँचेगी बनारस।
छुक छुक छुक उसके दोस्त ज्यादा समझदार हैं। अब कोई चेन पुंलिंग न करे तो मैं अभी भी गोदिया को क्रास न होने दूँ। जा! ज़रा देख कर बता तो, गोदिया अब जौनपुर पहुँची की नहीं?
ठीक है। बताता हूँ। तू ज़रा संभलकर चल। आगे जलालगंज का पुल आने वाला है।
उधर हवा, गोदिया का हाल लेने गई और इधर दून ने अपनी चाल से जलालगंज पुल को थरथरा दिया। अंग्रेजों के जमाने का मजबूत पुल काँप सा गया। आगे दून धीरे हो, जलालगंज में मात्र एक मिनट के लिये रुकी फिर हारन जोर की सीटी मार पटरियों पर दौड़ने हुये भुनभुनाने लगी-'पता नहीं हवा कहाँ मर गया! नाम हवा और चाल कछुए जैसी।' दून अभी बड़बड़ा ही रही थी कि हवा ने पीछे से उड़ते हुए आकर ट्रेन के कान में कहा- गोदिया सही समय पर छूट गई जौनपुर से। तू अपनी चाल बढ़ा, वरना आगे तुझे रोक देगा स्टेटशन मास्टर और तू खड़ी-खड़ी सीटी बजाती रह जायेगी।
ओह! मैं तेज दौड़ने के सिवा और अधिक कर भी क्या सकती हूँ भला!!! आगे कंट्रोलर की मर्जी। हानी, लाभ, जीवन, मरण, यश , अपयश, सब कंट्रोलर के हाथ है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। मेऱा काम बस कंट्रोलर की इच्छानुसार रुकना या पटरी पर चलते चले जाना है। जा! देख तो जरा। बेचैन सो गया या मोबाइल में उँगलियाँ चला रहा है?
उसके दोस्त तो ऊपर बर्थ में चैन से सो रहे हैं लेकिन वो जब से बैठा है, कुछ न कुछ लिखे जा रहा है।
इसीलिये तो उसका नाम बेचैनआत्मा है। सबका मन बेचैन होता है, इसकी तो आत्मा भी बेचैन है! इसके अलावा किसी की आत्मा बेचैन हो ही नहीं सकती दुनिया में।
तू क्यों खालिसपुर में ही खड़ी हो गई? यहीं पिटायेगी क्या गोदिया से!
चलती हूँ। हरा सिगनल हो गया। कहीं बेचैन आत्मा हमारी-तुम्हारी सब बातें तो नहीं सुन लेता!
मैं क्या जानू? अब यह मत कहना कि क्या लिखा है, पढ़ कर आ। मुझे दो पायों की बातें समझ में नहीं आती। दुनियाँ में जहाँ भी जाती हूँ, इनकी चाल-ढाल, भाषा-बोली में गहरी भिन्नता है।
यहाँ, लोहे के घर में बैठा, सुन रहा हूँ ट्रेन और ठंडी हवा की गरमा गरम बहस। अपने घर में टी.वी. के सामने बैठ कर टी.वी. एंकर और बुद्धिजीवियों की राजनैतिक काँव-काँव सुनने से तो अच्छा है इनकी बातें सुनना। उसी टाइप के कुछ लोग यहाँ इसी बोगी में आगे बैठकर झगड़ रहे हैं। उनके झगड़ने की आवाजें यहाँ तक आ रही हैं। बड़ी देर से रुकी है #बाबतपुर में बेचारी दून। गोदिया से पिटने ही वाली है। सुनना बंद कर दिया है अब मैंने हवा से इसकी बातें। आ रही है गोदिया जोर से हारन बजाते हुये। धक्क! से बैठ गया दून के साथ मेरे साथियों का भी दिल।

यू पी रोडवेज की बस यात्राएँ

कोहरा घना है। सड़क पर चमक रही हैं वाहनों की आँखें। छोटे कस्बे में रुकती है बस। दिखते हैं शाल, स्वेटर, मफ़लर या कम्बल ओढ़े आम आदमी। सुनाई पड़ती है आग तापते, चाय की चुस्की लेते या खैनी रगड़ते लोगों की हँसी-ठिठोली। एक बैल वाली 5-6 गाड़ियों का काफिला देखा। बोरा या कथरी ओढ़े ग्रामीण हाँक रहे थे बैल। जा रहे होंगे मंडी या लौट रहे होंगे समान उतारकर मंडी से।
ठंडा देख आज बैठ गए रहिशों की तरह ए. सी. बस में। यहाँ बैठ ग्रामीण अधिक परेशान दिखाई देते हैं! यू. पी. रोडवेज की ए. सी. बस है। सामान्य बसों का किराया 61 रूपया तो इसका 155. बहुत बड़ी खाई है आम और ख़ास में! इसे पाटना सम्भव नहीं दिखता। इस खाई को पाटने की आम जन की इच्छा, ख़ास बनते ही गुम हो जाती है।
इस बस में मिनरल वाटर भी मिलता है। आगे बैठी लड़की का बॉटल दो बार गिर चुका है। गिरकर बॉटल प्लास्टिक की कालीन पर बायें से दायें, दायें से बायें बार-बार लहराता रहा। लड़की उसे देखती रही। फाइनली उसने झुककर उठा ही लिया। आस-पास बैठे यात्रियों का कौतूहल शांत हुआ और वे पहले की तरह गरदन सीट से सटा कर बैठ गये।
ए.सी ट्रेन की बोगी की तरह ए.सी रोडवेज के यात्री भी धीर-गंभीर हो बैठते हैं। हँसने का समय और स्थान निर्धारित रहता है। आम आदमी की तरह सस्ती नहीं होती इनकी हँसी।
.....................

कोहरा छंटा नहीं है। आराम-आराम से चल रही है अपनी बस। जल रही हैं सड़क की दूसरी पटरी से आते वाहनों की आँखें। बाबतपुर हवाई अड्डे से पहले की सड़क पर काम चल रहा है। ओवर ब्रिज बन रहा है जहॉं से गुजरेगी रिंग रोड। हो रहे हैं विकास के काम।
अन्तरिक्ष यात्री की तरह लग रहे हैं जैकेट, हेलमेट पहने मोटर साइकिल चलाते लोग। इन्हें देख धोखा हुआ कि देश चाँद पर पहुँच गया है क्या! उदास चेहरा लिए गुजरा मफ़लर से कान बाँधे, दोनों हैंडिल में बड़े-बड़े झोले लटकाये, झुककर साइकिल चलाता आदमी। इसे देख भरम जाता रहा। हम उसी भारत में हैं जहां पैदा हुये थे।
एक किशोर दिखा। बिना मफ़लर लगाये, कंधे के साथ सर भी बायें-दायें झटकते, गुनगुनाते, मटकते हुए जा रहा था। ग्रामीण इलाके का है, जाड़े के कारण स्कूल बंदी का मजा ले रहा है। शहर के छोरे तो मम्मी की गोदी में सो रहे होंगे अभी। एक साइकिल चलाती दो बहनें दिखीं। पीछे कैरियर में छोटी थी, बड़ी साइकिल चला रही थी।
और भी बहुत कुछ दिखा जो आप हमेशा देखते हैं। मैंने कुछ नया नहीँ देखा। कोहरे के कारण लेट चल रही है ट्रेन। आज जिंदगी सड़क पर है।
........................

यू पी रोडवेज की नई बस है। इसमें गाना भी बजता है! स्पीकर लाउड है। ड्राइवर, कंडक्टर को शायद पहली बार लाउड स्पीकर वाली बस मिली है। फुल्ल भैल्यूम में सबसे बेकार वाला गाना बज रहा है। मैंने हल्ला मचाया तो ड्राइवर ने बंद ही कर दिया। सभी यात्री खुश हो गये-हाँ, हाँ बंद कर दो। मुझे एहसास हुआ लोग शान्ति चाहते हैं लेकिन इसके लिये भी विरोध नहीं कर पाते। बिना माँगे कुछ नहीं मिलता, खामोशी भी नहीं।
अब बस फाइनली रोडवेज से बाहर निकल कर सड़क पर दौड़ने लगी। हल्की-हल्की उछल रही है। अभी शहर है, शहर से बाहर निकलेगी तो पेट भर उछलेगी। इतना भी उछल सकती है कि मोबाइल छूट जाये हाथ से और लिखा हुआ पोस्ट ही न हो।
टिकट बोलिये भाई, टिकट! लिखने में कंडक्टर डिस्टर्ब कर रहा है। बोलिये भाई! मैंने बोल दिया-टिकट! और लिखता रहा। कंडक्टर मुझसे शरीफ है। प्यार से फिर बोला-टिकट भाई! कटा ही लेता हूँ टिकट। इतने शरीफ कंडक्टर कहाँ मिलते हैं!
बस अब शहर से बाहर निकल रही है। खुशी से उछल रही है। एक बार बाहर झाँकता हूँ, कन्फर्म करता हूँ, जौनपुर ही जा रही है या कहीं इलाहाबाद वाली में बैठ गया! रस्ता जाना पहचाना है। जौनपुर ही जा रही है। कितना आसान है सही और गलत रास्ते को पहचानना! जाना पहचाना है तो सही, अनजाना है तो गलत। सही गलत रास्ते का यह फर्क वास्तविक जीवन में भी कर पाते तो कितना अच्छा होता! मंजिल श्योर-शाट मिल ही जाती। मगर हाय! ऐसा होता नहीं। भगवान का कंडक्टर यमराज जब बिना पूछे जिंदगी का टिकट काट देता है तब समझ में आता है कि जिंदगी भर जिस रास्ते पर चले वो तो गलत था!
सफर में ऐसे बहुत से यात्री मिलते हैं जो गलत #ट्रेन में बैठ जाते हैं। रोज के यात्री उन्हें सही रास्ता दिखाते हैं। कुछ बात मान कर अगले स्टेशन पर उतर जाते हैं और लौटकर सही ट्रेन पकड़ लेते हैं, कुछ टी.टी. से कन्फर्म करने जाते हैं। टी.टी. हड़काते है-आप विदाउट टिकट हैं, पहले फाइन भरिये! असल जिंदगी में भी यही होता है। सही रास्ता दिखाने वाले मिलते हैं मगर हम अपने मन से ही कन्फर्म करते हैं और मन की ही करते चले जाते हैं। कई बार फाइन भरते हैं मगर अंत तक नहीं सुधरते। अंत में जब यम सवार हो जाता है सर पर और कहता है-टिकट बोलिये,टिकट! तब जा कर होश आता है।
अब बस खुशी के मारे अधिक उछल रही है। मेऱा मतलब शहर से बहुत बाहर निकल चुकी है। एक दिन ऐसा भी आयेगा जब रँगी-पुती गढ्ढा मुक्त सड़क की होर्डिंग नहीं दिखेगी और सड़क वास्तव में गढ्ढा मुक्त होगी। खूब हो रहे हैं यू पी में विकास के काम।
...........

आराम-आराम से यूपी रोडवेज की बस पकड़ लिये हैं। पुराना गाना धीरे-धीरे बज रहा है। ड्राइवर समझदार लगता है। कभी कंडक्टर समझदार मिलता है , कभी ड्राइवर। दफ्तर में जैसे कभी अधिकारी समझदार मिलते हैं, कभी कर्मचारी। दोनों समझदार, दयावान मिल जांय, यह किस्मत की बात है।
हवा में आज भी ठंड है। अपनी बस खुशी-खुशी, उछल-उछल कर चल रही है। मैं दोनों हाथों से मोबाइल पकड़,संभल-संभल कर लिख रहा हूँ। माननीय अखिलेश जी के जमाने की नई बस है। अभी इसके शीशे पूरी तरह से बंद हो जाते हैं। ठंडी हवा भीतर नहीं आ रही। बाहर सरसों के फूलों से छेड़खानी कर रही है। अज्ञेय जी ने इन्हीं सरसों के खेतों को देखकर शेखर एक जीवनी में लिखा था-बाड़े पर पोस्ते, खेत फुली कुसुम्मी। पीली चोली वाली री! दे जा एक चुम्मी!
नया साल अभी शुरू हुआ है। अभी इसने नये सवाल नहीं उठाये। अभी उलझी है पुराने सवालों में। नये सवाल आने से पहले के पलों का भरपूर आनंद लीजिये। शेष तो रोज की दिनचर्या है, जैसे जीते थे, वैसे जीयेंगे। शुभ दिन।

चुनाव और दंगल

"चुनाव और दंगल" विषय सुनते ही #मिर्जा की ऑंखें भर आईं। मुश्किल से मुँह खोल पाया और भर्राई आवाज में बोल पड़ा-सब आपस में गड्डमगड्ड हौ पाण्डे! पहिले दंगा भयल रहल फिन चुनाव। एहर चुनाव क घोषणा भयल ओहर दँगा शुरू। कब्बो चुनाव के बादो दँगा भयल। अउर कब्बो-कब्बो त वोटिंग अउर दंगा दुन्नो साथे-साथ चलल। ई दंगा में सब बहुत नँगा हो जाला पाण्डे! हमार केतना नुकसान भयल.....
मुझे बीच में मिर्जा को रोकना पड़ा-चुप पागल! अब एक्को शब्द बोलबे त धकेल देब यहीं छत से, गिर जइबा नीचे। हम कहत हई 'दंगल' अउर तू सुनत हउआ 'दँगा'! पचासे ग्राम में जै श्री राम हो गइला!
मिर्जा को गहरा संतोष हुआ- हाँ, यह विषय ठीक है। चुनाव में दंगल हो, दँगा कभी नहीं होना चाहिये। फिर हँस कर बोला -ई बात पे एक पैग अउर पिलाव! बढ़िया बात हौ..चुनाव और दंगल! लेकिन न जाने काहे, हमें लगत हौ दंगल शब्द क चुनाव तू हमें च्यूतिया बनाये बदे करत हउआ! ऊ कउन चुनाव हौ पाण्डे जेहमें कत्तो दंगा ना भयल? जब-जव चुनाव क तारीख़ नजीक आवला लगेला कि दँगा होखे वाला...
मुझे बीच में ही मिर्जा को टोकना पड़ा। कहीं फिर अतीत में न चला जाय...
तोहें याद हौ मिर्जा?-दो बैलों की जोड़ी है, एक अंधा एक कोढ़ी है।
तोहे याद हौ पाण्डे?- जिस दिये में तेल नहीं है, वो दिया बेकार है।
गली-गली में शोर है, इंदिरा गांधी....है।
समग्र क्रान्ति अब नारा है, हिंदुस्तान हमारा है।
राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।
घाँस कपार लेहलन सारे! हमने ठहाके लगाते हुए एक दूसरे को देखा-कितनी बार उम्मीदें जुटाईं लोगों ने और न जाने कितनी बार लोगों का विश्वास टूटा!!!
मिर्जा! तुम हँसी-हँसी में बड़ी गम्भीर बात बोल जाते हो! धीरे-धीरे नारे का स्तर भी गिरा है न?
मिर्जा खिसियाकर पूछते हैं-अच्छा! कौन सी वह अच्छी बात है जिसका स्तर बढ़ा है?
चुनाव में कहॉं-कहाँ दंगल होता है पता है? शुरुआत उस घर से होता है जिस घर के लोग चुनाव लड़ते हैं फिर शहर में होता है। फिर देखते ही देखते गली-मोहल्ले घर-घर में दंगल होने लगता है।
ये पार्टियाँ तो देश सेवा के लिये बनी हैं न मिर्जा?
दंगल के शोर से सेवा होता है पाण्डे? सेवा का इरादा तो बुद्ध ने किया था। राज पाट छोड़ निकल पड़े थे चुपचाप जंगल में। ये चुनाव का दंगल तो राज-पाट पाने के लिये है।

सुबह की बातें -4


शाम के शोर से 
भोर का मौन अच्छा है 
शाम महबूबा है मेरी,
भोर 
एक मासूम बच्चा है
शब्दों का खजाना था 
शाम के पास 
एक भी याद नहीं 
रात के बाद 
भोर 
बोलता कुछ नहीं 
मगर सुनता हूँ 
खुद ब खुद 
अभिव्यक्त होता है 
चहक लूँ 
मन ही मन 
पंछियों के जगने से पहले 
अभी अँधेरा है, 
जाग लूँ थोड़ा
उजाला देख लूँ 
अजोर से पहले.

वृक्षों का माथा चाट
पत्ती-पत्ती रेंगती, 
टप्प से धरती पर कूद-कूद 
गायब हो रही थीं 
शरारती ओस की बूदें! 
पँछी खामोश थे,
गेट के ताले ठंडे 
कुछ देर स्तब्ध खड़ा 
भोर को सुनता रहा 
फिर भागकर 
रजाई में दुबक गया।

जारी है 
ओस की टिप-टिप.
छाया है कोहरा
चुप हैं पँछी
गूँज रहा है
भोर का मौन

नहीं है मेरे पास
एक भी
मेऱा पढ़ाया पालतू तोता
होता भी तो
'गोपी-कृष्ण कहो' नहीं कहता
मौन हो
राधे-राधे
सुनता रहता।

उठो न! 
सुनो न! 
धरती पर जल तरंग बजा रही हैं 
ओस की बूँदें!!! 
सुन रहे हैं पँछी 
दुबक कर 
अपने-अपने घोंसलों में
मौन मुखर है 
चहुँ ओर
आओ! 
आँखें बंद कर बैठो यहाँ, 
शाल ओढ़कर 
ना ना 
कुछ ना कहो।
भोर के अजोर तक 
सुनती रहो...
कितना मधुर है मौन का संगीत! 
इन पंछियों की तरह सशंकित होकर मत देखो! 
ऑंखें बंद कर विश्वास से सुनो..
ऐसे ही होता है 
अन्धकार के बाद 
रोज सबेरा।
........