18.8.17

नदी

नदी
अब वैसी नहीं रही

नदी में तैरते हैं
नोटों के बंडल, बच्चों की लाशें
गिरगिट हो चुकी है
नदी!

माझी नहीं होता
नदी की सफाई के लिए जिम्मेदार
वो तो बस्स
इस पार बैठो तो
पहुँचा देगा
उस पार

नदी
के मैली होने के लिए जिम्मेदार हैं
इसमें गोता लगाने
और
हर डुबकी के साथ
पाप कटाने वाले

पाप ऐसे कटता है?
ऐसे तो
और मैली होती है नदी।

तुम क्या करोगे मछेरे?
अपने जाल से
नदी साफ करोगे?
तुम्हारे जाल में
छोटी, बड़ी मछलियाँ फसेंगी
नदी साफ होने से रही।

नदी को साफ करना है तो
इसके प्रवाह को, अपने बन्धनों से
मुक्त कर दो
चौपायों को सुई लगाकर,  दुहना बन्द करो
जहर से
चौपाये ही नहीं मरते
मरते हैं
गिद्ध भी

नदी
तुम्हारी नीतियों के कारण मैली हुई है
नदी
तुम्हारी नीतियों के कारण
गिरगिट हुई है
अब यह तुमको तय करना है
कि अपना
हाथ साफ करना है या
साफ करनी है
नदी।

15.8.17

सृजन और संहार का मौसम

सच है
यह मौसम
सृजन और संहार का है।

खूब बारिश होती है
इस मौसम में
लहलहाने लगते हैं
सूखे/बंजर खेत
धरती में
अवतरित होते हैं
झिंगुर/मेंढक/मच्छर और..
न जाने कितने
कीट,पतंगे!

आंवला या कदम्ब के नीचे
बैठ कर देखो
हवा चली नहीं कि
टप-टप
शाख से झरते हैं
नन्हे-मुन्ने
फल।

सब
तुम्हारी तरह
नहीं कर पाते
यमुना पार
डूब जाते हैं
बीच मझदार

सच है
असफल हो जाते हैं
सभी
मानवीय प्रयास
जब
फटते हैं बादल
आती है
बाढ़।

सच है
यह मौसम
सृजन और संहार का है।

फिर?
काहे को बने हो देवता?

कान्हा! जाओ!!
अभी पैदा हुए हो
अपनी जान बचाओ
खूब रासलीला करो
मारोगे कंस को?
जीवित रहे
तो हम भी
बजा देंगे
ताली।
........

13.8.17

छेड़छाड़

शायद ही कोई पुरुष हो जिसने किसी को छेड़ा न हो। शायद ही कोई महिला हो जो किसी से छिड़ी न हो। किशोरावस्था के साथ छेड़छाड़ युग धर्म की तरह जीवन को रसीला/नशीला बनाता है। छेड़छाड़ करने वाले लेखक ही आगे चलकर व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यश प्राप्त करने के बाद भी व्यंग्यकार बाहर से जितने शरीफ भीतर से उतने बड़े छेडू किसिम के होते हैं। बाहर दाल नहीं गलती तो घर में अपनी घरानी को ही छेड़ते पाये जाते है। बात गलत लग रही हो तो बड़े-बड़े व्यंग्यकारों की हास्य के नाम पर परोसी गई व्यंग्य कविताएँ ही पढ़ लीजिये। कितने चुभते तीर छोड़े हैं इन्होंने अपनी पत्नियों पर! क्या किसी स्त्री को अपनी तुलना प्रेस वाली स्त्री से करते सुन अच्छा लगा होगा? बिजली के करेंट से तुलना करते अच्छा लगा होगा? शरीर की बनावट, मोटापा..बाप रे बाप! क्या-क्या नहीं लिखा इन व्यंग्यकारों ने! बाहर हिम्मत नहीं पड़ी तो घर में ही चढ़ाई कर ली।

महिलाएं भी अब आगे बढ़ कर व्यंग्य लिख रही हैं। कब तक छिड़ती रहतीं? उनका दर्द क्या पुरुष की कलम लिखती? महिलायें अब पलटवार कर रही हैं। वह कवि सम्मेलन सुपर हिट होता है जिसमें कोई महिला कवयित्री मंच पर खड़े होकर खुले आम मर्दों को छेड़ देती है! जिस कवि सम्मेलन में देर तक छेड़छाड़ चलती रहती है, वहाँ से दर्शक उठने का नाम ही नहीं लेते। ये शब्दों के खिलाड़ी होते हैं। लपेट कर कुछ भी कह दें, क्षम्य होता है। एंटी रोमियों के दस्ते तो नौसिखियों पर कहर ढाते हैं। पके पकाये तो छेड़छाड़ के बाद सम्मानित होते हैं।

जिंदगी के कई रंग हैं। छेड़छाड़ पर शुरू भले हो जाय, खत्म नहीं होती। जब खुद कुरुक्षेत्र में खड़ा होना पड़ता है तो हाथ-पैर फूल जाते हैं। आटे-दाल का भाव मालूम पड़ता है। कौन है अपना, कौन पराया तजबीजते-तजबीजते कृष्ण याद आने लगते हैं। कृष्ण की बांसुरी नहीं, गीता याद आती है। उपदेश सुनाई पड़ता है..हानी, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश हरि हाथ!

जीवन की विद्रूपताओं की समझ, सामाजिक और राष्ट्रीय चिंतन की ओर कब धकेल देती है पता ही नहीं चलता। मन का आक्रोश कागज में उतरने लगता है। छेड़छाड़ करने वाला, व्यंग्यकार भी बन जाता है।

छेड़छाड़ करने वाला वक्त के साथ कैसे तो बदलता जाता है! हर चीज जो उसके पहुँच से दूर होती है ढूँढ-ढूँढ कर तीर चलाता है। ना मिलने पर तंज कसता है, मिलने पर यशगान भी करता है। हारता है तो अपना गुस्सा घर पर उतारता है, जीतता है तो आरती भी उतारता है। कोई-कोई कर्म योगी हो सकता है, कितने तो भोगी बन जाते हैं। छेड़छाड़ वह गुण है जो गोपाल को #कृष्ण, लोभी को #आशाराम बना देता है।

12.7.17

अब तो दर्शन दे दे

धोबियाsss
धुल दे 
मोरी चदरिया 
मैं ना उतारूँ 
ना
एक जनम दूँ
खड़े-खड़े मोरी 
धुल दे चदरिया!

आया तेरे घाट बड़ी 
आस लगा के
जाना दरश को 
शिव की नगरिया
धुल दे चदरिया।

रंगरेजवाsss
रंग दे 
मोरी चदरिया 
मैं ना उतारूँ 
ना
एक जनम दूँ
खड़े-खड़े मोरी 
रंग दे चदरिया

जइसे उजली 
धुली धोबिया ने
वइसे प्रेम रंग 
रंग दे चदरिया 
आया तेरे घाट बड़ी 
आस लगा के
जाना दरश को 
शिव की नगरिया
रंग दे चदरिया।

भोलेsssss
अब तो दर्शन दे दे
धोबिया धुल कर साफ कियो है
प्रेम रंग रँगायो
साफ है मोरी चदरिया
भोलेsss
अब तो दर्शन दे दे।
.........

8.7.17

बरसात

उमड़-घुमड़ जब बादल गरजते हैं तो मनोवृत्ति के अनुरूप सभी के मन में अलग-अलग भाव जगते हैं। नर्तक के पैर थिरकने लगते हैं, गायक गुनगुनाने लगते हैं, शराबी शराब के लिए मचलने लगता है, शाबाबी शबाब के लिए तो कबाबी कबाब ढूँढने लगता है। सभी अपनी शक्ति के अनुरूप अपनी प्यास बुझाकर तृप्त और मगन रहते हैं लेकिन कवि? कवि एक बेचैन प्राणी होता है। किसी एक से उसकी प्यास नहीं बुझती। जिधर देखो उधर टाँग घुसाता नजर आता है। यत्र तत्र सर्वत्र बादलों के साथ मंडराना चाहता है। कवि बरसात पर कविता नहीं लिखता, खुद बरसात हुआ जाता है!

बरसात के मौसम में जब कवियों की याद आती है तो सबसे पहले उन कवियों की कविता याद आती है जिन्हें खुद कवि के मुखारविंद से सुनने का सौभाग्य मिला हो या फिर वो जिसे हम पाठ्य पुस्तक में पढ़ते, गुनते, गुनगुनाते हुए जवान हुए हों। जब बादल उमड़ते घुमड़ते हैं मुझे तो सबसे पहले स्व० कवि चकाचक बनारसी की कविता याद आती है...

बदरी के बदरा  पिछवउलस, सावन आयल का!
खटिया चौथी टांग उठउलस, सावन आयल का!!

बादल केवल घिर कर रह जाते हैं, ताकते रहो बरसते ही नहीं तो सुरेंद्र वाजपेयी के गीत की दर्द भरी एक लाइन याद आती है...

तुमने बादल को आते देखा होगा
हमने तो बादल को जाते देखा है!

बादल बरसते ही नहीं, सूखा पड़ जाता है। तो आधुनिक तुलसी दास कवि बावला किसान का दर्द सुनाते थे...
तोड़ि के पताल के आकाश में उछाल देबे
ढाल देबे पानी-पानी पूरा एक दान में।
रूठ जाये अदरा अ बदरा भी रूठ जाये
भदरा न लागे देब, खेत-खलिहान में!

कवि कहाँ नहीं पहुँचता! किसके खुशी से खुश, किसके दर्द से बेचैन नहीं होता! शायद इसीलिए कहा गया है..जहाँ न पहुँचे रवि, वहॉं पहुँचे कवि! धान रोपती महिलाओं को देखा तो गीत गाया, शराबी के पाँव फिसले तो गीत गाया। किसी ने टोका तो झल्लाया....

हम पथरे पे दूब उगाइब, तोरे बाप क का?
जामुन सालीग्राम बनाइब, तोरे बाप क का?
पूरे सावन बम बम बोलब, तोरे बाप क का?
तोता से मैना लड़वाइब, तोरे बाप क का?

रात भर उमड़ घुमड़ कर बादल बरसे। खेत मे सुबह पानी की एक बूंद नहीं दिखी! पीले मेंढक ने सर उठा कर बूढ़े झिंगुर से पूछा..

बादल गरजे
रात भर बारिश हुई
हमने देखा
तुमने देखा
सबने देखा
यार!
सब दिखता है
मगर जो दिखना चाहिये
वही नहीं दिखता
हमें कहीं वर्षा का जल नहीं दिखता?

बूढ़ा झिंगुर
हौले-हौले झिनझिनाते हुए बोला..

कुछ तो
बरगदी वृक्ष पी गये होंगे
कुछ
सापों के बिलों में घुस गया होगा
हमने
दो पायों को कहते सुना है
सरकारी अनुदान
चकाचक बरसता है
फटाफट सूख जाता है
वर्षा का जल भी
सरकारी अनुदान
हो गया होगा!

3.7.17

नाता

बाहर
लाख अँधेरा हो
उजाला है
लोहे के घर में

मौन हैं
अंधेरे में डूबे हुए खेत
हलचल है
घर में

बाहर भी
श्रमिक थे, किसान थे
जब तक
सूरज था
सूरज के डूबते ही
मौन हो गये खेत

उजाले के साथ
शोर का
अँधरे के साथ
मौन का
गहरा नाता दिखता है!

मौन थे
बुद्ध भी
जब तक अँधेरा था

अँधेरा हो
तो चुप रहना चाहिये
अँधरे में
परिंदे भी
खामोश रहते हैं
मेंढक, झिंगुर के अलावा
कोई शोर नहीं करता।

बाहर का संसार

पटरी के किनारे
मालगाड़ी से
सीमेंट की बोरियाँ उतारकर
बीड़ी, खैनी के साथ
बतकही कर रहे हैं
ढेर सारे मजदूर

चीखता है
ट्रेन का इंजन
घबरा कर उड़ते हैं
खेतों में
चुग रहे पँछी
खुश होते हैं हम
लोहे के घर की खिड़की से
इन्हें देखकर!

खेतों में
जमा हो रहा है
बारिश का पानी
किसी ने करी है गुड़ाई
कहीं जमा हैं
घास
कहीं-कहीं
दिख जाते हैं
धान के बीज वाले
चौकोर टुकड़े

बाँसवारी में
लटके हुए बांस की टहनी पकड़कर
ऊपर चढ़ने का प्रयास कर रही है
एक बकरी
बगल में
आम के पेड़ पर चढ़कर
झूला झूल रही है
एक लड़की

मेढ़-मेढ़
पुराना टायर लुढ़काता
भागा जा रहा है
एक लड़का

दूर-दूर तक फैली है
बारिश के बाद की
चटक धूप
अभी कुम्हलाए नहीं हैं
नेनुआ के पीले फूल
अभी
खिलखिला कर
हंस रहा है
सूरजमुखी

खेतों के बीच से
बिछाई जा रही है
गैस की मोटी पाइप लाइन
जिसके मुँह में
ताक/झाँक रहे हैं
गदेले
विकास की अंधेरी सुरंग का रास्ता
ये क्या जाने!
इन्हें तो मजा आ रहा है
एक कदम चढ़कर घुसने
फिर धप्प से कूद कर
ताली बजाने में

पटरी पर
चल रही मेरी गाड़ी
बैठे-बैठे देख रहा हूँ
बाहर का संसार।

2.7.17

बारिश में भीगे?

सुहानी शाम आई
मन सशंकित हो गया
तेरे शहर में
आज बारिश हुई होगी!

खुद से खपा
दिन भर का तपा
ठंडी हवाओं के स्पर्श से भी
चकरा जाता है

बारिश में भीगे?
माटी की सोंधी सुगन्ध पा आल्हादित हुए?
या तपते रहे मेरी तरह
दिन भर?

लोहे के घर की खिड़कियों से
आ रही है ठंडी हवा
घास के बोझ का गठ्ठर सर पर लादे
पगडण्डी-पगडण्डी
चल रही दो महिलाओं के साथ
दो बच्चियाँ भी हैं
बच्चियों के सर पर भी
उठा सकने वाला गठ्ठर है
चारों खुश दिख रही थीं
मन वांछित बोझ
मिल गया होगा आज! 

खुशी
ठंडी हवाओं की मोहताज थोड़ी न है 
चुहचुहाते पसीने में भी 
दिखती है हंसी!

सूखे खेत मे
दौड़ा-भागा जा रहा है
एक कुत्ता
दूर झुग्गी से
उठता धुँआ देख लिया होगा!

इधर रोशनी कम हुई
उधर जलने लगे बल्ब
निःसन्देह
धरती पर
मनुष्यों का राज है।

30.6.17

आत्महत्या

बहुत दर्द होता है
मरने से पहले
एक बार मर जाओ
तो आसान होता है जीना!

हँसो मत
अपने जीवित होने का सुबूत दो

मरने के बाद
जानते हो क्या होता है?
आदमी
ट्रेन में बैठ कर
मेरी तरह
पटरी-पटरी भागता है!

एक कदम चले बिना
मीलों की दूरी का हिसाब मांगता है

बैठे-बैठे
खिड़की से
मजदूरों, किसानों को धूप में काम करते देख
उन्हें मुर्दा
खुद को जिंदा समझता है!

बहुत आसान है
मरने के बाद
पटरी पकड़ कर
चलते चले जाना

यकीन न हो तो
मरने से पहले का दर्द
और
मरने के बाद का सुकून
उस किसान से पूछो
जिसने जीवन के बोझ से घबड़ाकर
आत्महत्या कर लिया

जीना सरल नहीं है
मरना तो और भी कठिन है
आसान है तो बस्स
मरने के बाद
जीते चले जाना

क्या कहा?
आत्महत्या करेंगे!
तब तुम
मेरी बात समझ ही नहीं पाये

आत्महत्या
वही कर पाता है
जो जीवित है।

26.6.17

लोहे का घर-27


गेंहूँ की कटाई जोरों पर है. जहाँ देखो वहीं खड़ी फसल से ज्यादा कटे ढेर दिख रहे हैं. कहीँ-कहीं दवाई भी चल रही है, कहीं पूरे साफ हैं खेत. धरती पुत्र सरसों की चादर के बाद अब गेहूं की चादर भी उतार रहे हैं. रोज नये नजारे दिखाती हैं लोहे के घर की खिड़कियाँ जारी है धूप-छाँव का खेल. पटरी पर भाग रही है अपनी #ट्रेन
.......................................

किसान में बड़ी भीड़ है। अयोध्या से राम नवमी का उत्सव मना कर लौट रहे हैं लोग। ज्यादातर यात्री बिहार के हैं। बमुश्किल बैठने की जगह मिल पाई। एक लेटे हुए सज्जन बैठ गए, एक महिला उकड़ूँ लेटी हैं। कष्ट सहकर भी बिठा लिया उन्होंने हम तीन रोज के यात्रियों को। दोनो साथी बैंक से हैं। बिहारी जैसे आप के रिजर्व सीट पर बैठ जाते हैं, वैसे प्रेम से बिठाना भी जानते हैं। इतनी सहृदयता और अधिकार आप और किसी मे कम ही पाएंगे।

बाबा जी किस्सा सुना रहे हैं। अयोध्या से लौटे हैं। काली खोह, विंध्याचल का संस्मरण सुना रहे हैं। कुछ महिलाएं, बच्चे जिनका रिजर्वेशन नहीं है, जमीन पर बैठे हैं। बाबा जी लटपटी जुबान में किस्सा सुना रहे हैं। किस्से का सार यह है कि पैसा गायब हो गया था, दर्शन करने गए थे विंदध्याचल, गमछा पहिने चंदन लगाए, कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई। आराम से दर्शन करके घर पहुँच गये। भक्त को कोई तकलीफ नहीं होती।

बोलने वाले बाबा जी अब चुप हैं। ऊपर बर्थ पर अधलेटे बाबा अपने सुफेद मूछों और दाढ़ी को सँवारकर ध्यानमग्न हैं। मूँगफली वाले की आवाज पर चौंक कर बैठे , घूरकर उसे देखे फिर ध्यानमग्न हो गये। बैंक वाले साथी लगातार आपस मे बातें कर रहे हैं। मोबाइल भी देख रहे हैं। जुटे हैं अपने-अपने काम धंदे की बातों में। मंगोजूस, पानी बेचने वाले इसी भीड़ में रास्ता बनाते आ/जा रहे हैं। #ट्रेन जलाल पुल को थर्रा कर प्लेटफॉर्म पर रुकने के लिये धीमी हो रही है। बाहर अंधेरे में दिख रहे हैं मकानों में जलते बल्ब।

जलालपुर में रुकी है ट्रेन। बगल में बैठे हुए सहृदय यात्री ने खैनी खाई। बर्थ पर लेटे बाबा ने अपनी आंखें दो मिनट के लिए खोलीं, गेरुए धोती में लिपटे एक टाँग को सीधा कर अपने बैग पर चढ़ा दिया, दूसरी टाँग मोड़कर खड़ी कर ली और एक हाथ ललाट पर रख फिर से ध्यानमग्न हो गये। बैंक वाले फोन पर पासबुक लेने की हिदायत दे रहे हैं किसी को।

पटरियों पर भागती ट्रेन हवा से बातें कर रही है। कुछ हवाओं के शरारती छोरे खिड़की से भीतर घुस कर मुझसे लिपट-लिपट भीड़ में गुम हुए जा रहे हैं। अजैब सी मुरदैनी छाई है लोहे के घर मे। जो जहाँ है, वहीं ऊँघ रहा है। एक महिला अपने बच्चे का चप्पल ढूँढ रही है। उसकी साड़ी इधर-उधर हो रही है। कोई सोया नहीं है, कोई जगा हुआ दिख भी नहीं रहा, जिस्म ढला-ढला सा लुढ़का/पसरा है लेकिन सभी के कान खरगोश और आंखें गिद्ध हैं! बाबा जी झटके से बोले-ओने होई तोहार चप्प्ल। महिला चली गई। मुर्दे जिस्मों की सनसनाहट फिर ठण्डी पड़ गई।
........................................

आज #फिफ्टी मिली। बहुत दिनों से हमारा मिलना हो नहीं रहा था। कभी वो लेट तो कभी हम अपने काम मे व्यस्त। आज मिल ही गई। बड़े चाहने वाले हैं इसके। बड़ी भीड़ है। हम भी चढ़ कर एक बोगी में बैठ ही गये। मेरे बगल वाले को थोड़ी तकलीफ हुई। पहले पलेठी मार कर ऐसे बैठा था जैसे पूड़ी आने वाली हो। अब पैर लटका कर, मुँह फेर कर बैठा है। बहुत से रोज के यात्री चढ़े हैं मगर सब इधर-जहाँ जगह मिली बैठ गए। भीड़ में भाई का ध्यान नहीं रहता, सफर की मित्रता कहाँ साथ चल पाती!

गोधुली बेला है। गाँव का सौंदर्य दिख रहा है लोहे के घर की खिड़कियों से। खेतों में दौड़ रहे हैं बच्चे। महिलाएँ गोल बनाकर बतिया रही हैं आपस मे। दिनभर की थकान दूर कर रही होंगी। चौपाये लौट रहे हैं घरों में। पंक्ति बद्ध करीने से रखे हैं गेहूँ के गठ्ठर। ग़ज़ब का ज्यामितीय अनुपात दिखता है इन गट्ठरों के रखने में भी। दूर से देख कर बता दें कि कितने ढेर हैं। शायद गेहूँ का भी सटीक अनुमान लगा लेते होंगे किसान।

पल-पल बदल रहे हैं दृश्य। मन बच्चा हो तो आनन्द की कोई सीमा नहीं, मन बूढ़ा हो तो क्या रक्खा है इसमें! यह तो रोज-रोज की बात है। जल चुके हैं लोहे के घर के बल्ब। बाहर अभी धुंधला उजाला है। गेहूँ काटने के बाद सूखी झाड़ियों में आग भी लगाते दिख रहे हैं लोग। एक ठेले में बोझ लादे जा रहा है पूरा परिवार। पीछे-पीछे दौड़ते, छोटे-छोटे बच्चों में दिख रहा है उल्लास। अब कंकरीट के घरों में भी जलते दिख रहे हैं बल्ब। तेज हवा का झोंका भीतर आ रहा है खिड़की से। आँधी नहीँ है पर क्या जाने! ऐसे ही मौके पर आती है आँधी, झरते हैं टिकोरे.

आस-पास, उदास-उदास बैठे हैं यात्री। इन्हें बस एक ही चिंता है..बनारस कब आएगा? मंजिल के चक्कर मे सफ़र का आनन्द लेना तो दूर, मन मे घबराहट का बोझ लिए चलते हैं लोग! कुछ तो 15 किमी पहले से ही समान उठा कर गेट के पास खड़े हो रहे हैं। मंजिल के करीब पहुँचते ही अजीब सी बेचैनी छा जाती है शायद। अपन तो जान ही नहीं पाये कि मंजिल कहाँ है! सही दिशा में चल रहे हैं, यह भी नहीं पता। बस इतना जानते हैं कि सुबह होती है, शाम होती है और हम खुद को सफर में पाते हैं।
........................................

कैंट प्लेटफॉर्म नंबर 9 पर, पीने के पानी के सामने रखी हैं मिट्टी की सुराहियाँ। सुराहियाँ के बगल में सुराहीदार गरदन वाली एक महिला यात्री अपने सामान के साथ बैठी हैं। गले में सोने की चेन, मंगलसूत्र। सर का घूँघट थोड़ा सरकता है तो दिखता है पीला सिंदूर। उसका पति मोबाइल में किसी से बात कर रहा है। मिट्टी की सुराहियों की तस्वीर खींचने का मन है लेकिन कहीं वो महिला ये न समझे कि ये आदमी मेरी फोटू खींच रहा है! बुरा मान जाये!!! जरा सा हट जाती तो मेऱा काम बन जाता। हाय! चल दी अपनी #फोट्टीनाइन न महिला हटी न तस्वीर हाथ आया।कैंट प्लेटफॉर्म नंबर 9 पर, पीने के पानी के सामने रखी हैं मिट्टी की सुराहियाँ। सुराहियाँ के बगल में सुराहीदार गरदन वाली एक महिला यात्री अपने सामान के साथ बैठी हैं। गले में सोने की चेन, मंगलसूत्र। सर का घूँघट थोड़ा सरकता है तो दिखता है पीला सिंदूर। उसका पति मोबाइल में किसी से बात कर रहा है। मिट्टी की सुराहियों की तस्वीर खींचने का मन है लेकिन कहीं वो महिला ये न समझे कि ये आदमी मेरी फोटू खींच रहा है! बुरा मान जाये!!! जरा सा हट जाती तो मेऱा काम बन जाता। हाय! चल दी अपनी #फोट्टीनाइन न महिला हटी न तस्वीर हाथ आया।
...............................

शाम को ट्रेन में बैठते ही एहसास हुआ, दिन भर धूप में तपा है लोहे का घर। आपको घर पहुंचने पर एहसास होता होगा कि घर मे कोई तपा-तपाया बैठा है, यहाँ तो पूरा घर ही गरम मिलता है। ए.सी. के डब्बे रोज के यात्रियों के लिए नहीं बने हैं। रोज के यात्री तो तलाश करते हैं कहाँ बैठने भर की जगह मिल जाएगी। हर #ट्रेन में बैठने के अलग-अलग नीयम-कानून हैं। किस ट्रेन में पीछे बैठने पर जगह मिलेगी, किस में आगे की बर्थ खाली होगी यह रोज के यात्री बखूबी जानते हैं। यह #फरक्का है, ईश्वर की कृपा से लगभग 5 घंटे लेट। भगवान भरोसे ही चलती है अपनी गाड़ी।

बच्चे, बूढ़े प्यास से परेशान हैं। युवाओं की बैटरी चार्ज हो तो उन्हें भूख प्यास नहीं लगती। मोबाइल में सब सुख है। फेसबुक के मित्र तरह-तरह के व्यंजन परोस ही देते हैं। भोजन की तस्वीरें देख कर फिलिम या वाट्सएप वीडियो देख सकते हैं। बच्चे प्यासे हैं। वेंडरों की चांदी है। 15 का बोतल 20 में बिक रहा है। किसी के बुरे दिन, किसी के अच्छे हो ही जाते हैं। यही प्रकृति का नीयम है।

अब बाहर अंधेरा हो चुका है। भाग रही है अपनी #ट्रेन। अंधेरे में डूबे खेतों से आ रहे हैं ठण्डी हवा के झोंके। उतरे हैं तारे जमीन पर या कंकरीट के घरों में जल रहे हैं बल्ब! तारों की तरह टिमटिमाने लगे हैं कंकरीट के घरों में जलते हुए बल्ब। गेंहूँ कटने से खाली हो चुके खेत को लड़कों ने क्रिकेट का मैदान बना लिया है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय लड़के क्रिकेट खेलते दिख ही जाते हैं। अंधेरे से पहले खूब हलचल थी खेतों में, अभी कोई नहीं दिख रहा।

अब ठंडा हो चुका है लोहे का घर। खिड़कियों से आ रहे हैं ठण्डी हवा के झोंके। ट्रेन का पँखा भी चल रहा है। एक पँखे के ऊपर किसी बच्चे का सू-सू किया हुआ पैजामा सूख रहा है। किसी पँखे के ऊपर जूता नहीं दिख रहा। इससे पता चल रहा है कि भले लेट हो लेकिन यह पैसिंजर नहीं, एक्सप्रेस ट्रेन की रिजर्व बोगी है। एक बंगाली बाबू अल्यूमूनियम के छोटे भगोने में भूजा खा रहे हैं। उनके सामने बैठा बच्चा मिरिंडा की खाली बोतल से खेल रहा है। आम आदमी के छोटे बच्चे मिरिंडा की खाली बोतल से भी कितना प्यार करते हैं!

अपनी एक्सप्रेस ट्रेन न रुकने वाले स्टेटशन पर भी रुक-रुक कर चल रही है। यात्री बेचैनी में पूछ रहे हैं-बनारस कब आएगा? मैंने एक को ढाँढस बंधाया-बनारसी दिख गये तो समझो बनारस है। ट्रेन कब पहुँचेगी यह तो ट्रेन चलाने या चलवाने वाला भी नहीं जानता।
...............................

जेठ की धूप से चौंधिया जा रही हैं लोहे के घर की आँखें। फसल काटने के बाद खेत अब हरे-भरे नहीं रहे। घने वृक्ष की छाँव तले मिमियाती बकरियों, रस्से से बंधी भैंसों और खटिया पर बैठे दद्दू को देख एक पल के लिए मन जुड़ता है फिर वही धूप का लंबा कोहराम। नहर में पानी नहीं है। छोटी नदियाँ नाले जैसी दिखती हैं। ले दे कर बचे हैं वृक्ष जिनके सहारे कट रहा है ग्रामीण जीवन। वृक्षों के बीच उग रहे कंकरीट के जंगलों को देख मन काँप जाता है। कहाँ जाएंगे यहाँ से भाग कर पँछी?

पहला दिन है। अभी हवा में जेठ वाली तपन नहीं है। छाँव में उमस नहीं है। लोहे के घर मे बैठे लोग भी ऊँघ रहे हैं। पटरी पर भाग रही है #ट्रेनजेठ की धूप से चौंधिया जा रही हैं लोहे के घर की आँखें। फसल कटने के बाद खेत अब हरे-भरे नहीं रहे। घने वृक्ष की छाँव तले मिमियाती बकरियों, रस्से से बंधी भैंसों और खटिया पर बैठे दद्दू को देख एक पल के लिए मन जुड़ता है फिर वही धूप का लंबा कोहराम। नहर में पानी नहीं है। छोटी नदियाँ नाले जैसी दिखती हैं। ले दे कर बचे हैं वृक्ष जिनके सहारे कट रहा है ग्रामीण जीवन। वृक्षों के बीच उग रहे कंकरीट के जंगलों को देख मन काँप जाता है। कहाँ जाएंगे यहाँ से भाग कर पँछी?

लोहे के घर में गाना बज रहा है...छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नयना मिलाय के...। खिड़की के बाहर नील गगन में निकल रहा है पूनम का चाँद। शोर मचाती बाजू से गुजर गई दूसरी #ट्रेन। चाँद अब पूरी तरह खिल कर मुस्कुरा रहा है। इधर शुरू हो चुका है दूसरा गीत...चोरी-चोरी कोई आये!
आने वाला है कोई टेसन। दिख रहे हैं दो पायों के अनगिन घोसले। एक सड़क गई है दूर से दूर तलक। भाग रहे हैं पहिये। थोड़ा और ऊपर आ कर ठहर सा गया है चाँद। गीत हैं कि रुकने का नाम नहीं ले रहे, सफर है कि खत्म नहीं हो रहा और ट्रेन है कि हवा से बातें कर रही है निरन्तर।
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सूरज की आग में दिन भर तपा है लोहे का घर। बैठो तो पीठ और तशरीफ़ दोनो गरम। हवा के लिए थोड़ी खुली हैं पश्चिम की खिड़कियाँ मगर जबरी घुसी जा रही है धूप। पूरब वाले मजे में हैं। देख रहे हैं लम्बी होती परछाइयाँ।
आज लोहे के घर से सूरज को डूबते हुए देखने का सौभाग्य मिला है। जाते-जाते भी बूढ़े शेर की तरह तरेर रहा है आंखें। अभी एक पल के लिए नहीं ठहरती नज़र, अभी कान्हा के गेंद सा छुपता फिरेगा घने वृक्षों के पीछे। जो उगता है, ढलता जरूर है। जवानी में भले आग उगले, ढलान पर असहाय हो ही जाता है।
अभी कुछ देर पहले एक #ट्रेन गई है आगे। इसलिए भीड़ नही है इसमें। टांगें फैलाकर लेट रहे हैं लोग। तपन से रिश्ता जोड़ो तो शीतलता गाल चूम लेती है। अब नहीं हो रहा गर्मी का एहसास। सूरज कुछ और ढला है, जिस्म कुछ और सधा है। हवा से सूख रहे हैं स्वेद कण। हमे देख ताली पीटते हुए, मुँह बनाते हुए गुजरा है हिजड़ों का दल। कहते हैं.. स्टाफ से कोई कुछ ले नहीं पाता! :}
ढलने के एहसास से क्रोध में लाल है या किसी कोयल की कूक से शर्मिंदा, नहीं जानता। बस देख रहा हूँ कि लाल होकर ढला जा रहा है सूरज। आगे-आगे पटरी पर दौड़ रही है ट्रेन, पीछे-पीछे भाग रहे हैं खेत, साथ-साथ गोल-गोल घूम रहे हैं घने वृक्ष और दूर क्षितिज में ढल रहा है सूरज। कभी इस वृक्ष के पीछे, कभी उस वृक्ष के पीछे और कभी खुले मैदान में ढलते हुए भी गुर्राने वाला..अभी डूबा नहीं हूँ!
पंछियों के पीछे चहचहाते हुए गुजरा, एक नदी मिली उसमें नहाते हुए गुजरा और देखते ही देखते दूर बादलों में कहीं ओझल हो गया! सूरज आज भी मेरी नजरों के सामने डूबते-डूबते कहीं गुम हो गया!
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बहुत दिनों के बाद समय से आई है किसान। चहक रहे हैं रोज के यात्री। सुना रहे हैं 3-4 दिनों की बस यात्रा का अनुभव। लोहे के घर की तुलना में बस एक लोहे का पिंजड़ा है। एक ऐसा पिजड़ा जिसमें ठूँस कर भर दिए गए हों कई प्रकार के परिंदे। बैठे, खड़े, गर्मी से बेहाल तड़फते हुए। लोहे के घर में सुकून है, शांति है। आमने-सामने बैठ कर आदमी की तरह बतिया रहे हैं लोग।
सूरज डूब चुका है। बीत चुकी है गोधुली बेला। अंधेरा नहीं हुआ, दिख रहे हैं खेत मगर दूर कंकरीट के जंगल मे जलने लगे हैं बल्ब। जफराबाद स्टेशन आ गया। एक पैसिंजर खड़ी है इतमिनान से। यात्री बाहर निकल कर प्लेटफॉर्म में टहलते हुए सिगनल की प्रतीक्षा कर रहे हैं। चल दी अपनी किसान।
लोहे के घर मे, मेरी तरह अपने-अपने मोबाइल में डूबे हुए हैं लोग। रोज के यात्रियों के लिए वीडियो देखने, फेसबुक अपडेट करने, वाट्स एप चलाने का यही सुनहरा समय होता है। ऑफिस में दिन भर काम करने के बाद घर पहुंचने से पहले की अंतिम ड्यूटी, बची-खुची ऊर्जा के इस्तेमाल कर लेने का गोल्डन चांस!
एक #ट्रेन गुजरी है बगल वाली पटरी से। एक शोर उठा और शांत हो गया। एक पुल से गुजरी है ट्रेन। फिर एक शोर उठा और शांत हो गया। पटरी पर चल रही गाड़ी की नियति में है शोर और हर शोर के बाद झन्नाटेदार सन्नाटा! कभी शोर से घबड़ाता है दिल, कभी सन्नाटे में डूबता है दिल। पटरी पर चलती रहती है ट्रेन। पड़ाव से पहले कोई उतरता नहीं, मंजिल से पहले खत्म नहीं होती कोई यात्रा। यात्रा खत्म हुई तो समझो उसकी मंजिल आ गई। यहीं तक चलना था उसे। यही थी उसकी मंजिल।
ट्रेन की रफ्तार से भी तेज प्रतीत हो रही है विपरीत दिसा से आ रही हवा। खिड़की में बैठे हैं तो लग रहा है जैसे साथ-साथ चल रहा है तूफान। हवा में ठंड नहीं है। कहीं बारिश हुई होती तो नमी होती हवाओं में। खालिसपुर स्टेशन में रुक गई ट्रेन। यहॉं इसका ठहराव नहीं है लेकिन रुक गई। शायद सिगनल नहीं मिला। बगल की पटरी में एक दूसरी ट्रेन आ कर एक मिनट के लिए रुकी फिर रेंगते हुए चल गई। उसके भीतर बैठे यात्री भी अपने घर के यात्रियों जैसे मायूस दिखे। कुछ बेचैनियाँ दे कर चल दी अपनी भी ट्रेन। जब गाड़ी पटरी पर भाग रही हो तब एक पल का भी ठहराव बेचैन कर देता है लोगों को।
अंधेरे में दूर पंक्ति बद्ध जलते हुए बल्ब को देख कर एहसास होता है कि कितनी तेजी से उग रहे हैं खेतों में कंकरीट के जंगल! एक दिन यह भी आएगा कि लोहे के घर की खिड़की पर बैठ कर मीलों बाद कहीं-कहीं सौभाग्य से ही दिखेंगे....खेत, अमराई, बांस की झाड़ियाँ।
सफर तो सफर है चलता रहेगा तब भी, आज की तरह। हम न होंगे लेकिन चलते रहेंगे रोज के यात्री, भागती रहेगी ट्रेन। 
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सूरज डूब गया मगर धरती अभी उसके ताप से गर्म है। बदमिजाज अधिकारी के जाने के बाद भी छाये खौप की तरह सहमे-सहमे से हैं परिंदे। खिड़की से आ रही है गर्म हवा। धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है लोहे का घर। धीरे-धीरे उतरता है किसी के ताप का खौप।
यह #डाउन की #ट्रेन है। #अप वाली एक पटरी साथ-साथ है। हम डाउन में आगे-आगे, वो अप में पीछे-पीछे। एक पटरी हमेशा साथ चलती है। हम रुकते हैं तो पटरी भी रुक जाती है, हम चलते हैं तो पटरी भी पीछे छूटती सी प्रतीत होती है। एक ट्रेन गुजरी है अभी। धूम-धडाक, हों-हां, पों-पा के बाद एक झन्नाटेदार सन्नाटा और फिर वही लोहे के घर की संतुलित खटर-पटर। फिर वही एक पटरी का साथ-साथ चलना। पास का सब पीछे छूटता हुआ, दूर का सब साथ चलता हुआ। अजीब गोलमाल है! लोहे के घर की खिड़की से बाहर ध्यान से देखो तो गोलमाल खुलता है। एहसास सा होता है कि धरती गोल है।
इन दिनों चकाचक है ठंडे पानी का कारोबार। लोहे के घर में पानी लेकर घूम रहे हैं वेंडर। स्टेशन के बाहर भुजा बेचना छोड़, भुजे वाले ने आम का पाना, नीम्बू पानी, बेल का शरबत बेचना शुरू कर दिया है।
मौसम जीवन मे सातों रंग बारी-बारी से घोलता चला जाता है। कभी जाड़ा, कभी बरसात और कभी तेज गर्मी। हम सौभाग्यशाली हैं कि ये मौसम हमें हर रंग के दर्शन कराता है। लोहे के घर की खिड़की से धरती कभी धानी, कभी सरसों, कभी हरी-भरी और कभी बंजर नज़र आती है।
चाय वाला आया है..चइया! हरा मटर वाला थोड़ी दूर है। सूईं.. भन्न से टेक ऑफ करते हुए बाबतपुर के झलर-मल्लर हवाई अड्डे से ऊपर, नील गगन में उड़कर ओझल हुआ है एक हवाई जहाज। लोहे के घर की खिड़कियाँ बच्चों की तरह अचंभित हो, चहक रही हैं।
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#आउटर किसी भी #रेलवेस्टेशन का वह बाहरी हिस्सा होता है जहाँ स्टेशन पर पहुँचने से पहले ट्रेनें रोक दी जाती हैं. बड़े स्टेशन पर तो #ट्रेन के आवागमन का इतना दबाव होता है कि शायद ही कोई ट्रेन बिना रुके प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँच पाये. दूसरे स्टेशन की बात तो अधिक नहीं जानता लेकिन बनारस कैंट स्टेशन के आउटर का तो इतना बुरा हाल है कि वे यात्री जिनके पास अधिक सामान न हो, ज्यों ही ट्रेन आउटर पर रुकती है, पैदल ही प्लेटफोर्म के लिए चल पड़ते हैं. आउटर से प्लेटफोर्म के बीच की दूरी दस मिनट की होती है. कोई निश्चित नहीं होता कि आउटर पर ट्रेन कितनी देर रुकी रहेगी! पैदल चलने में समय बचता है इसलिए उबड़-खाबड़, गिट्टी-पत्थर वाले अँधेरेे रास्ते पर चलकर भी सही, लोग पैदल ही निकल पड़ते हैं. आउटर पर खड़ी ट्रेनें लम्बे वॉक से लौटे बुजर्गों की तरह ठहर कर ग्रीन सिगनल का ध्यान करती हुई सी लगती हैं कब सिगनल मिले, कब आउटर पार हो!
कितना अच्छा हो कि आउटर से प्लेफोर्म के बीच का रास्ता सुगम और रोशनी वाला बना दिया जाय जिससे पैदल चलने वाले आराम से उतर कर प्लेटफॉर्म तक पहुँच सकें. भले प्लेफोर्म खाली हों, आउटर पर ट्रेन न रोकना या जल्दी से प्लेटफोर्म तक पहुँचाना तो संभव ही नहीं दिखता.
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लू चल रही है सुबह-सबेरे। लोहे के घर की खिड़की से आ रही है गर्म हवा। तप रही है धरती। पंछियों का नामोनिशान नहीं। सड़कों पर चल रही हैं इक्की दुक्की मोटर साइकिल। आम की घनी छाँव में जुगाली कर रही हैं भैस। बाबतपुर हवाई अड्डे की जल रही हैं बत्तियाँ। हवा से बातें कर रही है #फोटटी। पिण्डरा हॉल्ट पर एक मिनट के लिए रुकती है #ट्रेन। दिखती भुजे वाले की सूनी झोपड़ी। शाम को भूजता होगा भुजा। कहीं-कहीं दिख रहे हैं भिंडी और नेनुआ के फूल। अँधरे में जैसे जुगनू चमकते हैं, धूप में वैसे ही चमकते हैं सब्जियों के फूल! कहीं-कहीं लहलहा रहे हैं बड़े-बड़े सूरजमुखी।
रेंग रही है ट्रेन। आने वाला है खालिसपुर स्टेटशन। प्लेटफॉर्म पर नजर डालो तो धूप से चौंधिया जा रही हैं आँखे। इस प्लेटफॉर्म पर ओवरब्रिज का काम हो रहा है। प्रभु जी के राज में ट्रेने भले लेट चलें, हर प्लेटफॉर्म पर कुछ न कुछ काम होते दिख ही जाता है। ठीक भी है, ट्रेन का लेट होना किसे याद रहेगा! जनता की याददास्त कमजोर होती है। चुनाव के समय तो काम बोलता है।
लू के थपेड़े अब और तेज हो रहे हैं। सन्नाटा पसरा है खेतों में। कभी कभार दिख जाते हैं चौपाये। जितनी तेज चलती है ट्रेन, उतने तेज लगते हैं लू के थपेड़े। बारिश होगी तो मजा आएगा, अभी तो तप रहा है #लोहेकाघर
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25.6.17

वही घर है, वही माँ हैं, वही बाबूजी

लोहे के घर में
पापा
बेटे को सुला रहे हैं कंधे पर
हिल रहे हैं, हिला रहे हैं
बेटा
ले रहा है मजा
खुली आंखों से!
पापा
सोच रहे हैं
सो चुका है बेटा
लिटाना चाहते हैं बर्थ पर
बेटा हँसता है
पापा
मुस्कुराकर डाँटते हैं..
नहीं मानेगा?

धरती पर
जब तक बच्चे हैं
बचपना है
जब तक युवा हैं
जवानी है
कोई कहीं नहीं गया
वही गलियाँ हैं
वही घर है
वही
माँ हैं

वही
बाबूजी।
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होश और सन्तुलन बना कर खाली पेट जो करो वही योग है।


आसन और प्राणायाम की शिक्षा तो बचपन में उपनयन संस्कार के साथ ही मिल गई थी लेकिन महत्व तब समझ मे आया जब बाबा को टी.वी. में सिखाते हुए देखा! उस समय बाबा को देख कर लगा था...हांय! ये तो हमारे गुरुजी पहले ही बता चुके हैं!!! इसमें नया क्या है?
अंहकार को चोट लगी। गलती का एहसास हुआ, बचपन मे मिले गुरु मंत्र का महत्व समझ में आया और यह भी लगा कि हाय! हम कितने बड़े ज्ञान को भुला बैठे थे!!! हमारी थाती याद दिलाने के लिए लिए हम बाबा की इज्जत करने लगे। कुछ नए आसन सामने आए और कुछ के नए नाम सामने आए। आसन करते-करते इज्जत करने लगे, इज्जत करते-करते कभी दन्त मंजन, कभी आंटा, कभी ये, कभी वो..खरीदने लगे। खरीदते-खरीदते सुनने लगे...और यहीं गड़बड़ हो गई! योग और प्रकृति में जहाँ व्यापार और राजनीति घुस जाती है, सब नीरस लगने लगने लगता है। आनन्द जाता रहा। योग से रोग दूर होता है मगर योग ही रोग लगने लगे तब क्या हो? गुरू को शिष्य के प्रति इतनी दया तो दिखानी पड़ेगी। शिष्य आपके चरण बड़ी श्रद्धा से छूता है, उससे लाभ कमाने की कोशिश करोगे तो वह आपको व्यापारी और आपकी शिक्षा को राजनीति समझ लेगा! कहना न होगा योग से मन फिर उचट गया।
इधर फिर योग का बाजार गरम है। विश्व ने इसके महत्व को समझा है. बनारस के गंगा घाट पर अवतरित हुए योग गुरुओं से विदेशी नागरिकों को योग सिखते हुए देखा जा सकता है। इतने आसन , इतने नाम और इतने योग गुरु हैं कि सब आसन याद रखना बड़ा कठिन है। इस परेशानी से बचने के लिए अब एक शार्ट कट फार्मूला अपना लिया है..होश और संतुलन बना कर खाली पेट जो करो वही योग है। होश मतलब चैतन्य। आती-जाती सांस का एहसास, हवा के स्पर्श का एहसास, हर आहट का एहसास..जितना हो सके चिंता और चिंतन से दूर रहकर होश में रहने का प्रयास। सन्तुलन मतलब शरीर के अंग-अंग का सन्तुलन. खड़े होकर हिलाओ, बैठ कर हिलाओ, लेट कर हिलाओ..आहिस्ता-आहिस्ता.. आराम-आराम से। पेट फुलाओ/पचकाओ, हाथ उठाओ/गिराओ, सांस लो/छोड़ दो। गरदन घुमाने का मन कर रहा है, गरदन घुमाओ. जितना दायें घुमाओ, उतना बाएं घुमाओ. गोल-गोल घुमाने का मन है? गोल-गोल घुमाओ. आँखों की पुतली को घुमाना है? घुमाओ. जीभ बाहर निकालना है? निकालो. ठहाके लगाना है? लगाओ. कमर हिलाना है? हिलाओ. थक गए तो लेट जाओ. लेटे-लेटे साइकिल चलाओ. जो मन करे, वो करो. बस संतुलन बनाए रखना. जबरदस्ती मत करना. जब तक आनद आता है अपने सभी अंग को हिलाते-डुलाते रहो. आहिस्ता-आहिस्ता, धीरे-धीरे... जितना इधर करो, उतना उधर करो। जो मर्जी आये वो करो..होश और सन्तुलन बना कर खाली पेट जो करो वही योग है।

25.5.17

ड्रम के ऊपर बैठी बच्ची


लोहे के घर में
खिड़की के पास ड्रम के ऊपर बैठी बच्ची
कभी इस खिड़की से
कभी उस खिड़की से
झाँक रही है बाहर

गोधुली बेला है
तेजी से बदल रहे हैं दृश्य
चर रही हैं बकरियाँ
लड़के खेल रहे हैं क्रिकेट
आ/जा रही हैं झुग्गी-झोपड़ी

एक झोपड़ी के बाहर आंगन बुहार रही है
एक लड़की
बच्ची के दुधमुँहे भाई को सजा/सम्भाल रही है
लोहे के घर मे बैठी
माँ

मेरे आँखों के सामने
दृश्य आपस में
गड्डमड्ड होने लगे
ड्रम के ऊपर बैठी बच्ची
लड़की बन
आँगन बुहारने लगी
फिर माँ बन
बच्चा खिलाने लगी!

पटरियाँ बदलने लगी
हवा से बातें करती ट्रेन
दृश्य फिर साफ़ होने लगा
अभी भी बहुत खुश है
कभी इस खिड़की से
कभी उस खिड़की से
बाहर झाँकती
खिड़की के पास ड्रम के ऊपर बैठी बच्ची.
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14.4.17

माझी के पतवार

बच्चों की चाँद-चाँदनी 
लहर-लहर संसार 
हाथों के गट्टे सहलाते 
माझी के पतवार.

चाँद पी गया दूध!


घने वृक्ष की छाँव क्या करे?
मन बैसाखी धूप!
सूखी रोटी कैसे खायें?
चाँद पी गया दूध!


4.4.17

श्री दिगम्बर जैन मंदिर-सारनाथ



मंदिर के दरवाजों में लिखे दोहे भावनाएं हैं जिन्हें पढ़ना और समझना आनन्द दायक है.


अनित्य भावना 

राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असबार.
मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार.. 

अनित्य यानि अस्थिर, चंचल, छणिक, परिवर्तनशील, विनाशी, संसार की हर वस्तु, हर नाता रिश्ता, हमारा शरीर, आयु, रूप-लावण्य, वैभव, परिग्रह, सत्ता-अधिकार सबकुछ एक न एक दिन जाने वाला है. जन्म के साथ मरण, यौवन के साथ बुढ़ापा, सुख के साथ दुःख, लक्ष्मी के साथ दारिद्रय लगा हुआ है. कोई अपने को कितना ही बचाने का प्रयास करे, विनाश से, क्षीणता से, बच नहीं सकता. सबको एक दिन जाना ही है.

अशरण भावना 

दल-बल देवी देवता, मात पिता परिवार 
मरती बिरियाँ जीव को, कोई न राखनहार 

अशरण अर्थात असुरक्षा, असहायता, निरीहता. मनुष्य समझता है कि उसका ज्ञान, उसकी विद्याएँ, उसका वैभव, उसकी प्रतिष्ठा, ये सब उसके रक्षक-पोषक हैं. इसलिए वह इन चीजों के प्रति मोहित होता है, संचय करता है. किन्तु वास्तविकता यह है कि अंतिम समय आने पर कोई रक्षा नहीं कर सकता. आज तक कोई किसी को बचा नहीं सका. जो मरणधर्मा है, वह बच नहीं सकता. 

धर्म भावना  
जाचै सुरतरु देय सुख, चिंतत चिंता रैन
बिना जाचै बिन चिन्तये, धर्म सकल सुख दैन  

कल्पवृक्ष तो याचना करने पर सुख की सामग्री देते हैं, लेकिन धर्म तो ऐसा कल्पवृक्ष है कि बिना याचना के ही परमसुख प्राप्त होता है.

19.2.17

प्रेम

खामोश हो गईं
शाख पर बैठीं
चिड़ियाँ

शरमा कर
सिंदूरी हो गई
सरसों के पीले फूलों पर
दिनभर खेलती
धूप

आपस में नहीं मिलते
चाँद और सूरज
सुबह औ शाम
मगर दिखता है
धरती पर
प्रेम ।

सुबह की बातें-5

यूँ तो मॉर्निंग रोज ही गुड होती है लेकिन नौकर की मॉर्निंग तभी गुड होती है जब नौकरी से छुट्टी का दिन हो और लगे आज तो हम अपने मर्जी के मालिक हैं। कैमरा लेकर, मोबाइल छोड़ कर सुबह ही घर से निकलने के बाद हरे-भरे निछद्द्म वातावरण में अकेले घूमते हुए एहसास होता है कि हम भी इसी स्वतंत्र प्रकृति के अंग हैं। दौड़ने, हाँफने, टहलने के बाद थक कर सारनाथ के खंडहर वाले पार्क में घने नीम वृक्षों के नीचे किसी बेंच्च पर बेफिक्र हो बैठकर घण्टों प्रकृति का नजारा लेना, आनन्द दायक है।
खण्डहर के एक कोने में वेलेंटाइन जोड़े हीरो-हीरोइन की तरह फोटू हिंचा रहे थे। तैयारी से आये लगते थे। कपड़े बदलते और नए कपड़े में नई तस्वीरें खिंचाते। मैं उन्हें देखने में मशगूल था और सोच ही रहा था कि इनमें वेलेंटाइन वाली नेचुरल फीलिंग नहीं है भले ही ये फेसबुक में फोटो चिपकाएं तो बड़े रोमांटिक जोड़े नजर आएं कि तोतों के जोड़े नीम की शाख पर टाँय-टाँय करने लगे। उनके टाँय-टाँय से ध्यान भंग हुआ और उन्हें ही देखने लगा। एक लहराती, पतली शाख पकड़ कर झूलने और कलाबाजी खाते हुए टाँय-टाँय करने लगा और दूसरा उसे देख कर टाँय-टाँय करने लगा। दोनों में कौन तोता, कौन तोती ये अपने पल्ले नहीं पड़ा लेकिन असली वेलेंटाइन जोड़े लग रहे थे। बगल में खड़ा एक थाई जोड़ा चिंग-मिंग, चियाऊं-मियाऊं कर रहा था लेकिन जैसे टाँय-टाँय का मतलब नहीं समझा वैसे चियाऊं-मियाऊं भी नहीं समझा।
एक गिलहरी मेरे कदमों के पास से कुछ मुँह में दबा कर भाग गई और सरपट दौड़ती, अपने साथी के बगल में बैठ दोनों हाथों से पकड़ कर खाने लगी। इन्हें देख एक बात समझ में आती है कि खाने के मामले में ये कभी एक-दूसरे को कुछ शेयर नहीं करते। इस मामले में मनुष्य इनसे श्रेष्ठ प्राणी हैं।
एक थाई बच्चा लॉन में ही एक ओर खड़ा होकर, हिलते हुए बनारसी अंदाज में सू-सू करने लगा! उसकी मम्मी दौड़ते हुए आईं और उसे चपत लगाते हुए डाँट कर सभ्यता सिखाने लगी। अपने साथियों के बीच मम्मी शर्मसार होते हुए चीं-चां और अपने साथियों के बीच बच्चा हीरो बना ही-ही कर रहा था।
पौधों में बसन्ती बहार थी। भौरे गुनगुना रहे थे। दो सहेलियाँ बड़ी अदा से एक दूसरे की तस्वीरें खींच रहीं थीं। रह रह कर गेट की तरफ उचक/मचल कर देखतीं फिर फोटो खिंचाने में मशगूल हो जातीं। शायद उन्हें किसी की प्रतीक्षा थी।
धमेख स्तुप से नीम की शाख तक कबूतरों, कौओं और तोतों का आना-जारी था। मृगों के झुण्ड वैसे ही घास के लालच में बाउंड्री के उस पार ललचाई नजरों से टुकुर-टुकुर ताक रहे थे। मोर के इर्द-गिर्द मोरनियां न जाने क्या चुग रहीं थीं। एक कौआ एक हिरन की पीठ की सवारी कर रहा था। कौए तो कौए हैं कहीं भी बैठ जाते हैं। इनके लिये क्या हिरन, क्या भैंस! क्या संसद भवन, क्या गांधी जी की मूर्ती!!!

लोहे का घर - 26

नींद से जाग कर/करवट बदल फिर सो गया/ लोहे के घर में/ खर्राटे भरता आदमी. भीड़ नहीं है ट्रेन में/ जौनपुर पहुँचने वाली है किसान. मजे-मजे में सुन रहे थे सभी रोज के यात्री उसके खर्राटे. तास खेलने वाले खर्राटे के सुर से सुर मिलाकर जोर से पटकते हैं अपने पत्ते..हूँssss!/ अखबार पढ़ने वाले सांस से सांस मिलाकर/ ऊंची-नीची करते अपनी गरदन/ मोबाइल में वीडियो देखने वालों पर छाने लगा है खर्राटे का नशा. वे भी सो गये टाँगे फैलाकर. वह अभी और खर्राटे भरता लेकिन जगा दिया अपने अजीब स्वर से वेंडरों ने...हरी मटर ईss/ मटर बोलो, मटर/ ताजा पानी, मैंगो जूस/ कॉफी, चाय, गुटका बोलोsss/ चईया! अभी और खर्राटे भरता मगर जाग कर सोचने लगा/ खर्राटे भरता हुआ आदमी. एक बात समझ में आई/ सुर से सुर मिलाने से अच्छा है अजीब आवाजें निकालना/ अजीब आवाजों से/ खर्राटे भरने वाला आदमी क्या/ नींद से जाग सकती है देश की सरकार भी!
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जिनका सफ़र लम्बा होता है वे ट्रेन में खर्राटे भरते हैं। जिनका जितना छोटा, वे उतने बेचैन। गोदिया नामक लोहे के इस घर में बेचैन भी हैं और खर्राटे भरने वाले भी। कुछ कम्बल ओढ़ कर खामोशी से लेटे हैं अपनी बर्थ पर, कुछ लेटे-लेटे चला रहे हैं मोबाइल में उँगलियाँ और कुछ तो इतने खामोश हैं कि हिलाने के बाद ही इनके होने का एहसास हो पायेगा।
रात के खर्राटे और सुबह के खर्राटे में बड़ा फर्क होता है। रात में कोई खर्राटे भरे तो लगता है यह उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। सुबह-सुबह नहा-धो कर, दौड़ते-भागते ट्रेन पकड़े और सामने की बर्थ से लगातार जोर-शोर से खर्राटे की आवाज अनवरत आती रहे तब? तब आपका मन क्या करेगा? या तो आप भाग कर दूसरी बोगी में बैठ जायेंगे या खर्राटे भरने वाले के ऊपर अपनी बोतल का पानी छिड़कर जगा देंगे। क्या करेंगे यह आपकी ताकत और सहन शक्ति पर निर्भर करता है। 
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डबल बेड नहीं होता लोहे के घर में। लोअर बर्थ ही दिन में गप्प लड़ाने वालों की अड़ी, रात में सिंगल बेड बन जाती है। जव तक जगे हो चाहे जितना चोंच लड़ाओ मगर रात में सिंगल ही रहो। सिंगल बेड ही ठीक है लोहे के घर में। बे दर औ दीवार के कई घर साथ चलते हैं, डबल हो गया तो बवाल हो जायेगा!

मरूधर हवा से बातें कर रही है। यात्री आपस में खुशी का इजहार कर रहे हैं। रोज के यात्रियों को दफ्तर छोड़ने के बाद राइट टाइम पर मिली लेकिन अपने समय के अनुसार बहुत लेट है। समय के मामले में कितनों की किस्मत फूटी तब जा कर हम सौभग्यशाली बने। यही होता है। किस्मत का कटु सत्य यही है। किसी की अपने आप नहीं जगती। किसी की फूटती है तो किसी की जगती है। किस्मत से मिली खुशी मजा तो खूब देती है मगर श्रम अर्जित सुख वाला स्थाई भाव नहीं होता। आज है, कल गुम।

पीछे अड़ी जमी है। जोरदार बहस हो रही है। देश की चिंता हो रही है। शिक्षा के स्तर से लेकर चुनाव की बातें हो रही हैं। चुनाव ड्यूटी और निलंबन की बातें हो रही हैं। फुर्सत के समय लोहे के घर की अड़ी से बढ़िया कोई दूसरा स्थान नहीं होता देश की चिंता के लिये। जब कोई काम न कर पाओ तब देश की चिंता करो। नेता से लेकर अधिकारी तक की कमियाँ गिनाओ। खुद को छोड़ सब में झँकों। प्रचलित दूसरी अड़ियों की तरह लोहे के घर की अड़ी में देश की चिंता करने के लिए बढ़िया टॉनिक नहीं मिल पाता। चाय, पान, बीड़ी-सिगरेट, भांग या शराब नहीं मिल पाता। लोग होश में बहस करते हैं इसलिये जोर से शोर भले कर लें, आपस में हाथापाई नहीं करते। बहस गम्भीर हो जाए तो बात का रुख बदल कर देश की चिंता छोड़ अपनी चिंता करने लगते हैं। बात ठहाकों में समाप्त हो जाती है।

अभी सुबह शाम चकाचक ठंड है। बंद हैं लोहे के घर के शीशे। दिन में कड़क धूप है। जैकेट-मफ़लर उतरे, रात में छोड़नी, सुबह ढूँढ कर ओढ़नी पड़े रजाई तब समझो कि बसन्त आया। धूल उड़ाती बहने लगी हवा तब समझो बसन्त आया। अभी तो बसन्त का आउटर आया है। अपनी ट्रेन भी आउटर पर खड़ी है। बनारस घूमने आये एक विदेशी यात्री ने मुझसे हाथ मिलाकर 'थैंक यू' बोला और गेट पर जा कर खड़ा हो गया। किसी कन्या के हाथ की तरह कोमल था उसका हाथ! सोंच रहा हूँ उसने मुझे थैंक यू क्यों बोला? कहीं इसलिए तो नहीं कि मैं चुपचाप मोबाइल पर लिखता रहा और उसे डिस्टर्ब नहीं किया!
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गोदिया हवा से बातें कर रही है। शादी का मौसम है इसलिए भीड़-भाड़ है ट्रेन में। एक परिवार कई बच्चों के साथ जौनपुर में चढ़ा था। सभी बदहवास से थे। पुरुष बर्थ तलाश रहा था तो महिला सामान और बच्चों की गिनती कर रही थी। सामान की गिनती पूरी हुई तो बच्चों की शुरू हुई। अचानक से चीखने लगी-राहुल! राहुल! ...अरे! राहुल नहीं आया!!! ट्रेन चल दी, राहुल नहीं आया! भयाक्रांत महिला रुआंसी हो चुकी थी कि राहुल की आवाज आई-मम्मी! मैं यहाँ हूँ। अगले ही पल भय क्रोध में बदल गया-साथ क्यों नहीं रहता? राहुल हँसते हुए बोला-यहीं तो था! तब तक पुरुष ने पुरुषार्थ किया-बर्थ मिल गई, आगे है, चलो! सब चलो-चलो कहते हुए आगे बढ़ गये। उनके जाने के बाद आस-पास बैठे यात्री अपना-अपना विचार रखने लगे...घबराहट हो ही जाती है..कितना सामान था!..बच्चे भी बहुत थे..सामान मिलाने के बाद ही बच्चों पर ध्यान गया..आदमी के चिंता ना रहल, मेहरारू ढेर घबड़ा गयल..लोग बहुत जल्दी घबड़ा जाते हैं..।
गोदिया अभी भी हवा से बातें कर रही है। जौनपुर से बनारस नॉन स्टाप है। कोई स्टेशन आता है तो पटरियों से खट-पट करती है। कोई पुल आता है तो थर्रा देती है। कभी धीमें, कभी तेज मगर लगातार हवा से बातें कर रही है गोदिया। लोहे के घर के बाहर बहुत बड़ी दुनियाँ है। सफर में ही आसान लगती है जिंदगी। पड़ाव आया नहीं कि कई जरूरी काम याद आ जाते हैं। 

हमारा बसन्त

न आम में बौर आया, न गेहूँ की बालियों ने बसन्ती हवा में चुम्मा-चुम्मी शुरू करी, न धूल उड़े शोखी से और न पत्ते ही झरे शाख से! अभी तो कोहरा टपकता है पात से। सुबह जब उठ कर ताला खोलने जाता हूँ गेट का तो टप-टप टपकते ओस को सुन लगता है कहीं बारिश तो नहीं हो रही! कहाँ है बसन्त? कवियों के बौराने से बसन्त नहीं आता। बसन्त आता है तो हवा गाने लगती है, कोयल कूकने लगती है और पत्थर भी बौराने लगते हैं। अभी तो चुनाव आया है। जो जीतेगा बसन्त तो सबसे पहले उसी के घर आयेगा। आम को तो बस बदलते दाम देखने हैं। अभी जो परिवर्तन के लिए उत्साहित हैं वे बाद में समझेंगे कि रहनुमा बदलने से दुश्वारियाँ नहीं जातीं। मालिक भेड़-बकरी का सदियों से कसाई है। कहॉ है बसन्त?

द़फ्तर जाते हुए रेल की पटरियों पर भागते लोहे के घर की खिड़की से बाहर देखता हूँ अरहर और सरसों के खेत पीले-पीले फूल! क्या यही बसंत है? भीतर सामने बैठी दो चोटियों वाली सांवली लड़की दरवाजे पर खड़े लड़कों की बातें सुनकर लज़ाते हुए हौले से मुस्कुरा देती है। लड़के कूदने की हद तक उछलते हुए शोर मचाते हैं! क्या यही बसंत है?

अपने वज़न से चौगुना बोझ उठाये भागती, लोहे के घर में चढ़कर देर तक हाँफती, प्रौढ़ महिला को अपनी सीट पर बिठाकर दरवाजे पर खड़े-खड़े सुर्ती रगड़ते मजदूर के चेहरे को चूमने लगती हैं सूरज की किरणें! क्या यही बसंत है?

अंधे भिखारी की डफ़ली पर जल्दी-जल्दी थिरकने लगती हैं उँगलियाँ। होठों से कुछ और तेज़ फूटने लगते हैं फागुन के गीत। झोली में जाता है, हथेली का सिक्का। क्या यही बसंत है?

द़फ्तर से लौटते हुए लोहे के घर से मुक्ति की प्रतीक्षा में टेसन-टेसन अंधेरे में झाँकते नेट पर दूसरे शहर की चाल जांचते मोबाइल में बच्चों का हालचाल लेते पत्नी को जल्दी आने का आश्वासन देते मंजिल पर पहुँचते ही अज़नबी की तरह साथियों से बिछड़ते, हर्ष से उछलते, थके-मादे कामगार। क्या यही बसंत है?

पहले बसन्त आता था और बसन्त के बाद फागुन आता था। बसन्त और फागुन के मिलन का सुखद परिणाम यह हुआ कि हमारे नौजवानों को प्यार सिखाने वेलेंटाइन आ गया! प्यार तो हम पहले भी करते थे मगर गुलाब पेश करते बहुत झिझकते थे। कितने फूल किताबों में मुर्झा गए। कितने शादी के बाद किताबों में दुश्मन के हाथ लगे। जब से वेलेन्टाइन की शुरुआत हुई गुलाब क्या खुल्लम खुल्ला गुलदस्ता पकड़ाये जाने लगे! बसन्त पंचमी के दिन माँ सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त कर पढ़ाई में जुटने के बजाय लड़के वेलेंटाइन के इन्तजार में दंड पेलने लगे। लड़के तो लड़के उनके पिताजी भी बेचैन आत्मा का गीत गुनगुनाने लगे-"बिसरल बसन्त अब त राजा आयल वेलेंटाइन! आन क लागे सोन चिरैया, आपन लागे डाइन!!"

अभी तो कड़ाकी ठंड है। सुबह गेट खोलो तो बसन्त के बदले देसी कुत्तों के पिल्ले भीतर झांकते हुए पूछते हैं-मैं आऊँ? मैं आऊँ? अभी तो खूब हैं लेकिन कड़ाकी ठंड में पैदा हुए कुत्ते के दर्जन भर पिल्ले बसन्त आने तक दो या तीन ही दिखते हैं। जैसे आम आदमी को बसन्त नसीब नहीं होता वइसे ही सभी पिल्लों को बसन्त नसीब नहीं होता। जिन्दा रहते तो गली में निकलना और भी कठिन हो जाता। प्रकृति को इससे कोई मतलब नहीं। कोशिश करो तो छप्पर फाड़ कर देती है। कहती है-पाल सको तो पालो वरना हम तो उसी मिट्टी से नये खिलौने गढ़ देंगे! शायद इसी को महसूस कर नारा बना होगा-दो या तीन बच्चे, होते हैं घर में अच्छे। बाद में सरकार को इससे भी कठिनाई महसूस हुई तो नारा दिया-हम दो, हमारे दो। नहीं माने तो परमाणु बम हइये है। कोई #ट्रम्प चाल चलेंगे और साफ़ हो जाएंगे दोनों तरफ के आम आदमी। फिर आराम से मजे लेंगें ख़ास, बसन्त का। हमारा बसन्त तो बाबाजी का घण्टा!
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3.2.17

पचपन साल का आदमी

वरिष्ठ नागरिक होने
और
रिटायर्ड होने की
निर्धारित उम्र
साठ साल होती है
साठ से
पाँच ही कम होता है
पचपन साल का आदमी

समा जाते हैं
हाथ की पाँच उँगलियों में
ख़ास होते हैं
ये पाँच साल
फैले तो जिंदगी
रेत की तरह फिसलती,
भिखारी-सी लगे
जुड़े तो
मुठ्ठी बन जाय!

कभी
अँगूठा या तर्जनी मत दिखाना!
पचपन साल का आदमी
तुम्हारा
अँगूठा देखता है तो
चबा लेता है
अपनी ही चारों उँगलियाँ
तुम्हारी
तर्जनी देखता है तो
गुस्से से पटक देता है
अपने ही मेज पर
मुठ्ठी!

अकेले में
नींद से पहले
छाती पर मूँग की तरह
सोती हैं उँगलियाँ...
अब पाँच साल ही बचे
करनी है
बिटिया की शादी
अब पाँच साल ही बचे
लड़के को
नहीं मिली नौकरी
अब पाँच साल ही बचे
लदा है माथे पर
ढेर सारा कर्ज

कभी अखबार से
कभी
नई सरकार के बजट से
करता है उम्मीद
ढूंढता है...
शादी के रिश्ते,
नौकरी के विज्ञापन,
आयकर में छूट,
युवाओं के लिये रोजगार,
होम लोन की ब्याज दर
और....
पत्नी को खुश करने के लिये
कोई अच्छी खबर

नहीं होती उसके पास
बच्चे की तरह
पूरी धरती
युवा की तरह
पूरा आकाश
या फिर
वरिष्ठ नागरिकों की तरह
जिंदगी का
कोई एक
निर्धारित कोना

सोम से शनि तक
काम से जूझता
बीच-बीच में
ज्ञान बघारता
हा-हा, ही -ही करता
खुद को सही
दूसरों को
गलत कहता
झूठी हँसी हँसता
कभी घर
कभी दफ्तर
सर पर उठाये
देर तक
हाँफता रहता है
पचपन साल का आदमी।

1.2.17

बसंत

माचिस ढूँढ कर रखना
उजाले में
सुना है
भड़क कर जलती है
लौ
बुझने से पहले

हौसला
बचा कर रखना
अँधेरे में
यूँ ही
डराती रहती हैं
काली रातें
सुबह से पहले
सांसें
चलती रहें
ठंडी हवा में भी
सुना है
बर्फ बन
भहरा कर गिरता है
जाड़ा
बसंत से पहले।
….......................

29.1.17

बजट देश का बनाम घर का

बच्चों बताओ! बजट कौन बनाता है? कक्षा के सभी बच्चों ने उत्तर दिया-वित्त मंत्री । मगर एक ने हाथ उठा कर कहा-गृह मंत्री! उत्तर सुनते ही गुरूजी म्यान से बाहर! गृह मंत्री वाला जवाब उनकी कुंजी में नहीं था जिससे वो पढ़ाते थे और न उस तंत्र के पास था जिसने उन्हें गुरूजी बनाया था। सजा सुना दिया-दोनों हाथ उठाकर बेंच्च पर खड़े हो जाओ! लड़का विरोध में उस रिक्शे वाले की तरह हकलाने लगा जिसकी हवा बीच सड़क सिपाही निकाल दे-म..म..गर गुरूजी.. मैं..मैं..स..ही..। बच्चों के ठहाकों के बीच गुरूजी दारोगा की तरह गर्जे-चोप्प! कक्षा में ठहाके लगा रहे बच्चे गुरूजी का असली रूप देख, सहम कर चुप हो गये। कुछ देर बाद फिर खुसुर-पुसुर शुरू हुई। मॉनीटर ने खड़े होकर अनुरोध किया-'उसका जवाब तो सुन लीजिये गुरु जी!' दूसरे बच्चों में उम्मीद की किरण जागी। गुरूजी ने दोनों हाथ हवा में लहराया। बायें से मानीटर को बिठाया और दायें से लड़के को बोलने के लिये ललकारा-बक्को!
लड़के ने उत्तर दिया -देश का बजट कौन बनाता है यह तो सभी जानते हैं मगर घर का बजट गृह मंत्री बनाती हैं। यह बात मुझे पिताजी ने बताई थी। गलत है क्या सर? लड़के की मासूमियत ने गुरूजी के हृदय को छीलकर मुलायम कर दिया। हँसते हुए कहा-बैठो-बैठो। कक्षा में गुरूजी का और घर में बाउजी का हँसना माहौल को खुशनुमा बनाता है। गुरूजी की एक हंसी पर सभी मुर्झाये फूल झूम कर खिल उठे।
बच्चों की ये बातें तो मजाक में कही गयीं मगर इन बातों से एक बात यह समझ में आती है कि देश का बजट देश के वित्त मंत्री और घर का बजट घर की मालकिन बनाती हैं. साधारण शब्दों में कहें तो बजट का अर्थ होने वाली आय और किये जाने वाले खर्चों का पूर्वानुमान है. देश का बजट साल में एक बार और घर का बजट हर माह बनता है. यह पति के आय और गृहणी की कुशलता पर निर्भर करता है. जैसे भ्रष्टाचारी काला धन विदेशों में या पाताल खातों में जमा करते हैं वैसे ही महिलायें हर माह होने वाले आय का पहला हिस्सा गुप्त पोटली में जमा करती हैं और घर में आने वाले किसी बड़े आफत के समय साक्षात लक्ष्मी बन मुस्कुराते हुए प्रकट होती हैं! यह गुण भ्रष्ट नेताओं में नहीं पाया जाता. देश पर आने वाले आफत के समय ये बगलें झाँकने लगते हैं. छापे के समय ही इनकी कलई खुल पाती है. घर के बजट में महिलाओं का ध्यान सबसे पहले घर में राशन-पानी भरने में लगा रहता है. बच्चों की आवश्यकताओं के बाद उन पर ध्यान जाता है जिसके कठिन श्रम से प्रति माह घर में पैसा आता है. अक्सर वहां तक आते-आते धन ख़तम हो जाता है. बजट बनाने वाले के हिस्से में तो कुछ भी नहीं बचता. वे अपनी जरूरतों के लिए अतिरिक्त धन की मांग करती हैं और इन्हें नेताओं की तरह आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता. देश का बजट बनाने वाले भी इसी त्याग की भावना से देश का बजट बनायें तो कितना अच्छा हो!
देश का बजट बनाते समय सिर्फ पूर्वानुमान ही नहीं बल्कि लक्ष्य और उद्देश्य को भी ध्यान में रखना होता है. जिसे परफार्मेंस बजट या निष्पादन बजट कहते हैं. जनता का पैसा जनता के विकास में इस प्रकार लगाना कि देश के हित के साथ-साथ चुनाव के पूर्व किये गए वादे पूरे होते दिखाई दें यह वित्त मंत्री की आर्थिक नहीं राजनैतिक कुशलता पर भी निर्भर करता है. जनता से घुमा फिर कर कई प्रकार से टैक्स के रूप में लिए गए धन को देश हित में खर्च करना होता है. 'तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे है मेरा!' वाले भाव में वित्तीय और राजनैतिक कुशलता झलके तो विपक्ष भले कोसे मगर पार्टी के लोग खुश हो जाते हैं. बजट के प्राविधान के साथ इसको क्रियान्वयन की व्यस्था भी पारदर्शी होनी चाहिये.अक्सर देखा गया है कि आम आदमी तक आते-आते उनके लिए आवंटित धन चुक जाता है. दुष्यंत कुमार ने इस दर्द को कुछ यूं बयां किया है.."यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ, मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा!"
जैसे ही बजट की घोषणा होती है लम्बे बजट की मोटी-मोटी बातें जानकर सरकार के पक्षकार वाह! वाह! तो विरोधी हाय! हाय! करने लगते हैं. सरकार कितना ही अच्छा बजट पेश करे विरोधी को हाय-हाय करना है. विरोधी जब सरकार में आ जाते हैं तो लोगों के रोल बदल जाते हैं. हाय-हाय करने वाले वाह-वाह और वाह-वाह करने वाले हाय-हाय करने लगते हैं. सरकारी कर्मचारियों की नजर आयकर में मिलने वाले छूट पर होती है. सरकारी कर्मचारी हर साल चाहते हैं कि उनकी आय अधिक से अधिक बढ़े और आयकर कम से कम लिया जाय. हर साल आय में वृद्धि होती है और हर साल छूट की दर बढ़ती जाती है. सरकारें भी जीत कर आने के शुरू के वर्षों में अंगूठा दिखाने और मुँह चिढ़ाने वाला और चुनाव वर्ष से ठीक पहले आय में अधिक छूट देते हुए लोक लुभावन बजट पेश करती है.
आजकल आभासी दुनियाँ का बाजार प्रिंट मीडिया से तेज खबर देता है. इन पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं. अभी कुछ दिन पहले वाट्स एप में, आयकर में भारी छूट का मैसेज आया। पढ़ते ही लगा कि कोई #मामा बना रहा है। सरकार और इतनी उदार! कभी हो ही नहीं सकता। फिर याद आया कि 5 राज्यों में चुनाव होने वाला है, कौन जाने खबर सच ही हो! मन लड्डू बनाता, दिमाग फोड़ देता। हकीकत तो बजट आने के बाद ही पता चलेगा कि सच क्या है मग़र जिसने भी यह हवा उड़ाई है वो बड़ा शातिर है। सरकार के विरुद्ध राजनीति कर रहा है। इससे कम छूट मिला तो सरकार छूट देने के बाद भी आलोचना का शिकार होगी कि क्या देने वाले थे, क्या दिये! छूट मिला ही नहीं तो और बुरा होगा! आरोप लगते देर नहीं- सरकार तो बड़ी जालसाज निकली! ये भी कोई बजट है!