18.9.20

मदारी मुक्त बन्दर

गंगा उफान पर है

डूब चुकी हैं पंचगंगा घाट की सभी मढ़ियाँ

नहीं जा सकते 

एक घाट से दूसरे घाट तक

श्रीमठ के पास

सीढ़ियों पर बैठ

जहाँ टकरा रही थीं

गंगा की लहरें

कई लोग एक साथ कर रहे थे

पितरों को तर्पण

मन्त्र पढ़ रहा था, ऊपर बैठा पण्डा

बीच-बीच में निर्देश देता..

जनेऊ

गले में माला कर लीजिए,

अपसव्य होइए!

जनेऊ

बाएँ कन्धे पर,

सव्य होइए!

जनेऊ दाएँ कन्धे पर,

राजघाट पुल की ओर अर्घ्य दीजिए,

रामनगर की ओर अर्घ्य दीजिए,

अपना गोत्र बोलिए,

पितरों को याद कीजिए....


मैं भी गया था

तर्पण देने

ढूँढ रहा था 

अपने पण्डित जी को

मुझसे पहले

पण्डित जी ने मुझे देख लिया

हाथों से इशारा किया..

वहाँ बैठिए जजमान,

गंगा स्नान कीजिए,

अर्घ्य दीजिए.....


तभी एक बंदर

किसी की पोटली से

एक आलू निकालकर भागा

पण्डे ने डांटा

मगर यह वाला बन्दर

मदारी मुक्त था, स्वतन्त्र था

आलू मुँह में दबाए

चढ़ता चला गया

घाट की सीढ़ियां!

...................

2.8.20

लोहे का घर



वो धूप है कि खेत में आदमी, पँछी या जानवर कोई नज़र नहीं आ रहा। दूर झुग्गी में बेना डुलाती दादी और आम की छाँव में जुगाली करती भैंस दिखी थी बस्स। खेत सूने हैं। गाँव का श्रम शहर में घूमने नहीं, मजूरी करने गया होगा। शहरी पहाड़ ढूँढ रहे होंगे। पहाड़ी कारों के काफिले से काले हो रहे हिमालय को देख रहा होगा। सुरुज नारायण मस्ती में हैं..भागो-भागो, कहाँ तक भागोगे?
...................

#फिफ्टी की जिस बोगी में जहाँ बैठा था वहाँ भीड़ बहुत थी। वैष्णव देवी और बाघा बार्डर के दर्शन कर खुशी-खुशी लौट रहा था एक बिहारी परिवार। वे मैथली में बोल रहे थे। उनके साथ बच्चे और बूढ़ी दादी भी थी।
उनकी एक समस्या थी..पानी। गर्मी से बेहाल प्यासे बच्चों और बूढी दादी के लिए पानी। इतने पैसे वाले भी नहीं थे कि सबके लिए बिसलरी की बोतल खरीद सकते। हिम्मत कर के महिला ने एक बोतल 20 रुपये में खरीदी और बच्चों की प्यास बुझाई। अभी और भी प्यासे थे।
हर स्टेशन पर पानी के लिए महिला का उतरना और #्रेन की सीटी की आवाज पर भाग कर खाली बोतल हिलाते हुए मायूस लौटना देखा न जाता। महिला के साथ उनका पति और दूसरे युवा भी थे मगर उन्हें कोई फर्क नहीं! नई मिल्छे हेने पानी..ऐसा ही कुछ बोल कर अपनी औरत को भी मना कर रहा था जाने से। मैंने जब समझाया कि इधर छोटे-छोटे टेसन पर ट्रेन अधिक देर नहीं रुकती। बनारस पहुंच कर ले लेना। वहाँ आराम से मिल जाएगा तो वह बात समझ कर आराम से बैठ गई। पति समझाये तो महिलाएं बात जल्दी नहीं समझतीं। कोई और वही बात कह दे तो झट्ट से समझ मे आ जाता है। 
उफ्फ! ये गर्मी और ये प्यास। घबड़ा कर उठा और दूसरी बोगी में घूमने लगा। दूसरी में भीड़ कम थी। खाली थे बर्थ। एक खिड़की से झाँका तो मस्ती से डूब रहे थे सुरुज नरायण। गर्मी, प्यास और पानी की समस्या के असली मुजलिम तो यही हैं! मैंने प्रमाम किया और एक तस्वीर हींच ली। ताकि जब सूर्यदेव पर मुकदमा चले तो सबूत दिखाने के वक्त काम आये।
......................

तू फिर कब चलेगा #escalator#कैंट स्टेशन #वाराणसी के प्लेटफॉर्म नम्बर 9 के बाहर जब तू बन कर तैयार हुआ था, कितने खुश थे मेरे घुटने! एक दिन सुबह जब मैं #ट्रेन पकड़ने आया तब तू चल रहा था! मैंने खड़े-खड़े हवा में तैर कर चढ़ी थीं पूरी सीढ़ियां। कितना धन्यवाद दिया था #रेलवे को! भले रोज लेट चलाता है ट्रेन मगर विकास का काम भी हो रहा है। सज्ज हो रहे हैं प्लेटफॉर्म। सुविधाएँ बढ़ रही हैं। लेट की तकलीफ चुनाव तक कौन याद करता है! चुनाव के समय तो काम बोलता है।
हाय! वो दिन था और आज का दिन। महीना, महीनों में बदल रहे हैं। क्या बनाने वाला इसमें प्राण फूँकना भूल गया? क्या इसकी सीढ़ियों को किसी देवता के चरण रज की दरकार है? आखिर तू कब तक हाथी के दांत की तरह मुँह चिढ़ाता रहेगा? देख! यह आदमी तेरी सीढ़ियों पर अपने दम पर चलकर तेरी नपुंसकता का मजाक उड़ा रहा है! मुझसे तेरी बेइज्जती देखी नहीं जाती। तू कब चलेगा मेरे escalator?
......................




27.7.20

अँधेरा

लाइट चली गई है। मैं अँधरे में हूँ। ऐसा लगता है जैसे मैं ही अँधेरे में हूँ और सबके पास रोशनी है! पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा होगा! केवल मैं ही अँधेरे में हूँ! फिर सोचता हूँ... जब मैंअँधरे में हूँ तो पूरा शहर भला कैसे उजाले में होगा? जब मैं अँधेरे में हूँ तो शहर भी अँधरे में होगा, देश भी अँधेरे में होगा। लाइट का क्या है, आ जाएगी लेकिन यह जो अँधेरा है, बढ़ता जा रहा है। 

कल तक मौत अजनबी लगती थी क्योंकि अजनबियों के मरने की खबरें आ रही थीं। अब लगता है, जानी पहचानी है, क्योंकि अपनो के मरने की खबरें आ रही हैं। बढ़ती जा रही है, कोरोना से संक्रमित हुए लोगों की संख्या। पहले शहर अछूता था अब मोहल्ले भी अछूते नहीं रहे। यह कौन जानता था कि यम भैंस पर नहीं, अपनों के कंधे पर बैठकर आएगा!

वे, जिहोने खरीद लिए हैं रोशनी के चराग, उन्होंने ही, हाँ, उन्होंने ही कैद कर लिया है खुद को एक सुरक्षा चक्र में। खरीद लिए हैं डॉक्टर। खरीद लिए हैं अस्पताल। वैसे ही जैसे खरीद ली हैं.. खबरें। हम जिंदा हैं तो सिर्फ इसलिए कि व्यस्त हैं यमदूत। जिन्हें उठाना था, उठा नहीं पाते। जिनकी बारी नहीं थी, उन्हें लादे चले जा रहे हैं। हम खुश किस्मत हैं कि कहीं, कोई हमसे ज्यादा बदनसीब है। व्यस्त हैं यमराज शायद इसीलिए जीवित हैं हम भी। थक जाएं या हो जाए उनका कोटा पूरा तो शायद बच जांय हम भी, रोशनी वालों की तरह।  अभी तो मैं अँधेरे में हूँ। ऐसा लगता है जैसे मैं ही अँधेरे में हूँ और सबके पास रोशनी है!

25.7.20

बनारस में नागपंचमी

छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो। नागपंचमी के दिन, इसी नारे के शोर से, हम बच्चों की नींद टूटती। ऊँघते, आँखें मलते, घर के बरामदे में खड़े हो, नीचे झाँकते.. गली के चबूतरे पर कुछ किशोर, नाना प्रकार के नागों की तस्वीरों की दुकान सजाए बैठे हैं! मन ललचता, तब तक दूसरे बच्चों का एक झुण्ड, घर के किवाड़ खटखटाता और द्वार खुलते ही धड़धड़ा कर, घर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, ऊपर बैठके के बाहर खड़ा हो जाता! पिताजी तैयार रहते। कुछ सिक्के निकाल कर बच्चों को देते। वे पैर छू कर, पैसे मुठ्ठी में पकड़े, जोर-शोर से नीचे उतरते, चले जाते। गली में आकर फिर नारा लगाते...छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।

माँ, नाग की तस्वीरें, घर के दरवाजों पर, गाय के गोबर से चिपकातीं, नाग देवता की पूजा करतीं, खीर-पूड़ी पकातीं और हम बच्चे नहा धो कर प्रेम से खाते। 

हमारा मन भी करता था लेकिन हम ब्राह्मण के बच्चे थे। हमें नाग बेचने और घर-घर घूमकर पैसे इकठ्ठे करने का अधिकार नहीं था। यह अलग बात है कि पिताजी से नजरें बचा कर, यादवों/मल्लाहों के बच्चों के झुण्ड में शामिल हो, हमने भी नारे लगाए थे...छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।

सुबह से शाम तक बीन बजाते, सपेरे आते। उनकी पेटियों में कई प्रकार के सर्प होते। फन वाले, बिना फन वाले, काले, भूरे, गेहुएँ, एक मुँह वाले और दो मुँह वाले भी! गली के घरों से निकल, माँएं, सांपों को दूध पिलातीं, धान का लावा चढ़ातीं, पैसे चढ़ातीं। सपेरे भी खुश, माँ भी खुश और हम बच्चे भी खुश। बड़े खुशनुमा माहौल से शुरू होता था, नागपंचमी का त्योहार। 

बनारस की तंग गलियों के बीच तिराहों में, जहाँ चौड़ी जगह मिलती, जगह, जगह, महुवर खेले जाते। महुवर देखने के लिए भारी भीड़ जुटती। घरों की छतों, बरामदे की खिड़कियों यहाँ तक कि छज्जों पर खड़े होकर भी लोग महुवर देखते। 

एक मदारी एक हाथ में धरती से थोड़ी धूल उठाता और मंत्र पढ़ते हुए, होठों को हिलाते/बुदबुदाते हुए, दूसरे मदारी के चारों ओर गोल-गोल घूमता। दूसरा मदारी बड़े जोश और दर्प के साथ, दोनों गाल गुब्बारे की तरह फुलाते/पचकाते हुए, बीन बजाता। बड़े बाँके अंदाज में, घनी जटाओं को, कभी इधर, कभी उधर, दोनो कंधों पर झटकता। मंत्र पढ़ने वाला मदारी भयानक मुँह बनाए, लाल-लाल आंखों से बीन बजाने वाले को घूरता, गोल-गोल घूम कर पीछा करता और अचानक, पूरी शक्ति से, जमीन से उठाए धूल के कण दूसरे मदारी को एक हाथ लहराते हुए मारता। 

अरे! यह क्या!!! बीन बजाने वाले की बीन बजनी कैसे रुक गई? उसके मुँह से तो खून भी निकल रहा है! बीन मुँह में अटक गया है!!! निकालने का प्रयास करता है, निकाल ही नहीं पा रहा। चारों ओर गोल-गोल खड़ी भीड़ शोर मचाती..मर गयल रे! अब मर जाई। खून फेंकता हौ..!!!

यही क्रम दिनभर चलता रहता। कभी एक मदारी गिर कर तड़पता कभी दूसरा मदारी। खेल इतना जीवंत होता कि अमिताभ बच्चन या दिलीप कुमार भी फेल।  एकदम सच्चे लगते, मदारियों के घात/प्रतिघात। हम बच्चे, कभी उधर, कभी इधर, मीलों दौड़ते/भागते रहते गलियों में। कभी सुनते वहाँ का महुवर बढ़िया है, कभी सुनते वहाँ का तो और भी बढ़िया है! 

दिन ढलने के बाद भी खतम नहीं होता था बनारस में नागपंचमी का उत्सव। शाम होते-होते, जमा होने लगते थे पहलवान अखाड़ों में। बच्चों/किशोरों/युवाओं के डंबल, क्लब, जिम्नास्टिक और मलखम्भ के करतब तो होते ही,  बड़े पहलवान भी कुश्ती, जोड़ी या गदा घुमाने की प्रतियोगिताओं में भाग लेते। 

कब सुबह होती और कब शाम ढल जाती, पता ही नहीं चलता। घर से खाना खा कर निकले या दोस्तों को बुलाने गए और समझदार माताओं ने जबरी बिठाकर खाना खिला दिया तो ठीक वरना भूखे प्यासे पागलों की तरह दौड़ते/भगते कब बीत जाता, पता ही नहीं चलता था, नागपंचमी का त्योहार। 

कल रात, फेसबुक चलाते हुए किसी पोस्ट से पता चला कि आज नागपंचमी है! आज घर के बाहर, घर में भी, घोर सन्नाटा है मगर सुबह से कानों में गूँज रहा है बस एक ही नारा....छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।

7.7.20

शुभ/अशुभ

बिल्ली ने
दो बच्चे दिए बारिश में
भगा दिया था
दिन में
फिर आकर, रो रहे हैं
रात में

खाली नहीं है शायद
किसी के घर/आँगन का कोई कोना
आ गए हैं
मेरे ही चहारदीवारी के भीतर
रो रहे हैं,
मेरे ही कपारे पर!

बिल्ली को
ऐसा क्यूँ लगता है?
कॉलोनी में
मैं ही सबसे बड़ा दयालू हूँ!

सुनता आया हूँ...
बिल्ली का रोना अशुभ होता है
रोते को चुप कराने की क्षमता न हो तो
आसान है
उसे मारकर भगा देना
लेकिन जैसे ही भगाना चाहता हूँ
पूछती हैं
अँधेरे में चमकती ऑंखें...
चली तो जाऊँ लेकिन इतना बता दो,
किसका रोना शुभ होता है?
..................…................

20.6.20

चीनियाँ बदाम

वे पहले बहुत हँसमुख थे, अब मास्क मुख हो गए हैं। जब तक उनकी झील सी गहरी आँखों में न झाँको, पहचान में ही नहीं आते। बारिश में भीगते हुए, पुलिया पर बैठकर, चीनियाँ बदाम फोड़ रहे थे!

मैने पूछा..पगला गए हैं का शर्मा जी! बारिश में भींगकर कोई मूँगफली खाता है?  

वे क्रोध से आँखें तरेर कर बोले..आपको नहीं न मालूम की जहाँ हमारे सैनिक शहीद हुए हैं, वहाँ कितनी ठंड पड़ती है!

मूँगफली से शहीदों का क्या संबंध? 

ई मूँगफली नहीं, चीनियाँ बदाम है। एक दाना तोड़ते हैं तो ऐसी फिलिंग आती है जैसे चीनियों की खोपड़िया फोड़ रहे हैं! 

मैं गम्भीर हो गया। सचमुच पगला गए हैं शर्माजी! चीनियाँ बादाम को भी चीनियों से जोड़ दिए! 

अपना मोबाइल तो नहीं फोड़ दिए?

मोबाइल क्यों फोड़ेंगे? बुड़बक हैं का? लेकिन तय कर लिए हैं.. चीन का कोई समान नहीं खरीदना है तो नहीं खरीदना है।

तब चीनियाँ बदाम क्यों खरीदे?

ई त हमरे देश की खेती है। इसका नाम चीनियाँ पड़ा तो जरूर इसमें चीन की कोई बात होगी। देखिए! जैसे चीनी नाटे-छोटे, गोल मटोल होते हैं, वैसे ही होते हैं इसके दाने। शायद इसीलिए...

नहीं भाई शर्मा जी! यह बादाम की एक प्रजाति है। अब यह तो हमको भी नहीं पता कि इसका का नाम चीनियाँ क्यों पड़ा लेकिन इतना जानते हैं कि इससे चीन का कोई लेना देना नहीं है। चीन से हम भी नाराज हैं, शहीदों की याद में हम भी दुखी हैं लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हम बारिश में भीग कर चीनियाँ बदाम फोड़कर समझें कि हमने चीनियों की खोपड़ी फोड़ दी! यह तो पागलपन हुआ।

तब का करें? इस उमर में बंदूक लेकर लद्दाख जाएं?

नहीं.... धैर्य बनाइए और अपने देश के प्रधानमंत्री पर भरोसा कीजिए। वो जो करने को कहें वही कीजिए। अभी तो आप घर जाइए और कोरोना से बचिए। जान है तो जहान है।

आप तो भक्त हैं। आप तो वही करेंगे जो मोदी जी कहेंगे!

अरे भाई! मोदी जी देश के प्रधानमंत्री हैं। किसी देश का प्रधानमंत्री जब बोलता है तो उसके शब्दों में देश के विशेषज्ञों, विद्वान सलाहकारों के विचार शामिल होते हैं। वह सबसे सलाह लेकर ही कुछ बोलता है। हमें चुनावी भाषण और आपातकाल में दिए गए भाषणों में फर्क करना सीखना चाहिए और संकट के समय उनकी कही हर बात माननी चाहिए। इसी में देश की और सभी की भलाई है। जैसे नदी की धार में, नाव पर बैठे यात्री माझी की बात न मानें और उठकर अपने मन से इधर-उधर चलने/बैठने लगें तो नाव पलट जाती है वैसे ही संकट के समय देश के प्रधानमंत्री की सलाह मानने में ही भलाई है। नाव किनारे लग जाय तो फिर गलतियाँ गिनाकर उसे दिनभर कोसते रहना। 

शर्मा जी को मेरी बात समझ में आ गई। वे पुलिया से उतरकर घर चले गए। पता नहीं विरोधियों को यह बात कब समझ में आएगी! 
..............

14.6.20

जब भी मिलता है सम्मान...

जब भी
मिलता है सम्मान
कहता
भीतर का इंसान
तूने
रूप बनाया है!
तूने
झूठ सुनाया है!
दिल में खंजर रख कर सबको
गले लगाया है।

जब भी मिलता है सम्मान.....

तेरा
होता है सब काम
बाबू
करते सभी सलाम
तूने
चाय पिलाया है
तूने
पान खिलाया है
सूटकेस में गड्डी भर-भर,
घर पहुँचाया है।

जब भी मिलता है सम्मान....

तेरा
जगमग है दिनमान
चाहे
डगमग हिंदुस्तान
मंदी में भी तेरी चउचक
चलती है दुकान!

जब भी मिलता है सम्मान....

तूने
ग़दर मचाया है
तूने
शहर जलाया है
धर्म, जाति के नाम पे सबको
खूब लड़ाया है।

जब भी मिलता है सम्मान.....
....@देवेन्द्र पाण्डेय।

28.5.20

लोहे के घर की खिड़की से

लोहे के घर की खिड़की से
बगुलों को
भैंस की पीठ पर बैठ
कथा बाँचते देखा।

धूप में धरती को
गोल-गोल नाचते देखा।

घर में लोग बातें कर रहे थे...
किसने कितना खाया?
हमने तो बस फसल कटे खेत में
भैस, बकरियों को
आम आदमी के साथ भटकते देखा।

खिड़की से बाहर चिड़ियों को
दाने-दाने के लिए,
चोंच लड़ाते देखा।

सूखी लकड़ियाँ बीनती,
माँ के साथ कन्धे से कन्धा मिलाये भागती
छोरियाँ देखीं। 

गोहरी पाथती,
पशुओं को सानी-पानी देती,
घास का बोझ उठाये
खेत की मेढ़ पर
सधे कदमों से चलती
ग्रामीण महिलायें देखीं।

लोहे के घर की खिड़की से
तुमने क्या देखा यह तुम जानो, 
हमने तो
गन्दे सूअर के पीछे शोर मचा कर भागते
आदमी के बच्चे देखे।
............

24.5.20

बच्चे

रोटी पर बैठकर
उड़े थे
कोरोना खा गया रोटी
पैदल हो गए
सभी बच्चे

तलाश थी
ट्रेन की, बस की
कुचले गए
पटरी पर, सड़क पर

हम
धृतराष्ट्र की तरह
अंधे नहीं थे
देखते रहे दूरदर्शन
देखते-देखते
मर गए
कई बच्चे!

शहर से
पहुँचे हैं घर
बीमार हैं, लाचार हैं
जागते/सोते
देखते हैं स्वप्न...
रोटी का सहारा हो तो
उड़ चलें
फिर एक बार
यहाँ तो
डर है! नफरत है!
कैसे रहें?
..........

20.5.20

बह रही उल्टी नदी.....


तुम नदी की धार के संग हो रहे थे
फेंककर पतवार भी तुम सो रहे थे।

बह रही उल्टी नदी, अब क्या करोगे?
क्या नदी के धार में   तुम फिर बहोगे?

चढ़ नहीं सकती पहाड़ों पर नदी
है   बहुत  लाचार देखो यह सदी।

डूब जाएंगे सभी घर, खेत, आंगन
या तड़प, दम तोड़ देगी खुद अभागन!

किंतु सोचो तुम भला अब क्या करोगे?
बच गए जो भाग्य से क्या फिर बहोगे?

बहना पड़े गर धार में, इतना करो तुम
पतवार भी यूँ भूलकर मत फेंकना तुम

फिर नदी उल्टी बही तो, लड़ सकोगे
जब तलक है प्राण, आगे बढ़ सकोगे।
..............

18.5.20

दृष्टि

हम सभी को मिली है
दृष्टि संजय की!
देख सकते हैं दशा
कुरुक्षेत्र की।

धृतराष्ट्र बन पूछते
कितने मरे?
आज तक घायल हुए
कितने बताओ?

चल रहे हैं सड़क पर
मजदूर सारे
लड़ रहे हैं निहत्थे
क्रूर पल से।

ठीक है किंतु अब तुम
यह बताओ?
क्या कोई, अपना/सगा
घायल पड़ा है?

दूर है काल फिर तो
भय नहीं है
दृष्टि बदलो अब जरा
गाना सुनाओ।

14.5.20

कविता सुनाने का नशा

एक बनारसी कवि ने दो बनारसी कवियों का एक मजेदार किंतु सत्य किस्सा सुनाया। जिसे मैं अपने शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूँ। दोनो कवि मुफलिसी में जीवन गुजारते लेकिन कविता के लिए जान देते। एक दिन एक कवि ने रात्रि में 10 बजे दूसरे कवि का दरवाजा खटखटाया...

कवि जी हैं? कवि जी छंद रच रहे थे, अचकचा कर द्वार खोला तो सामने दर्पण में अपनी छवि की तरह दूसरे मित्र कवि को खड़ा पाया। चौंक कर बोले...इस समय ! यहाँ!!! आइए, आइए, भीतर आइए, बाहर क्यों खड़े हैं? 

कवि जी कमरे में घुसते ही बोले..एक नई कविता लिखी थी, सोचा सुना ही दूँ। गलत समय आ गया, आपको कोई एतराज तो नहीं? 

आतिथेय ने अतिथि से कहा..नहीं, नहीं, एतराज कैसा! आपने तो मेरी मुश्किल आसान कर दी। मैं अभी छंद पूरा करते-करते सोच रहा था.. श्रीमती जी तो कविता के नाम से चिढ़ती हैं, किसे सुनाऊँ?  तभी किस्मत से आप आ गए। शीतल जल पिलाता हूँ, आप अपनी कविता प्रारम्भ कीजिए।

अतिथि कवि प्रसन्न हो कविता सुनाने लगे और आतिथेय वाह! वाह! करने लगे। इधर कविता समाप्त हुई, उधर कवि जी के सब्र का बांध टूटा...आपने बहुत अच्छी कविता सुनाई अब मेरा छंद सुनिए। प्रशंसा से मुग्ध मेहमान जी ने कहा..हां, हां, सुनाइए। मेजबान कवि जी ने अपना ताजा छंद सुनाया और मेहमान कवि जी ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करी।

कविता सुनने सुनाने का यह दौर लम्बा चला। रात्रि के डेढ़ बजे गए। दूसरे कमरे से रह-रह कर श्रीमती जी के गुर्राने और बाउजी के नींद में खर्राने की आवाजें साफ सुनाई पड़ रही थीं। तभी मेहमान कवि जी ने डरते-डरते फरमाइश की...एक कप चाय मिल जाती तो....मजा आ जाता, नहीं? मेजबान मांग सुन, मन ही मन थर्राए..घर में न दूध न चायपत्ती। होती भी तो सर फोड़ देतीं श्रीमती जी। प्रत्यक्ष में हकलाए...हां, हां, क्यों नहीं, लेकिन श्रीमती जी तो सो चुकी लगती हैं। चलिए, बाहर चाय पिलाते हैं आपको। 

मेहमान जी बोले..रहने दीजिए, जब घर मे नहीं मिल रही तो इतनी रात में बाहर कहाँ मिलेगी? 

मेजबान कवि जी ताव खा गए..मिलेगी कैसे नहीं! आपने चाय पीने की इच्छा प्रकट की तो हम आपको चाय पिलाए बिना जाने कैसे दे सकते हैं! चलिए, घर से बाहर निकलिए तो सही।

दोनो कवि मित्र रात्रि के टेढ़ बजे सड़क की खाक छानते, चाय की दुकान ढूँढते, सुनते/सुनाते चले जा रहे थे। कहीं दुकान खुली होती तब न चाय मिलती। रथयात्रा से साजन सिनेमा हॉल तक (लगभग 2 किमी) चले आये, चाय नहीं मिली। मेहमान निराश हो बोले..मैं तो पहिले ही कह रहा था, चाय नहीं मिलेगी। मेजबान बोले..कैसे नहीं मिलेगी? चलिए, कैंट रेलवे स्टेशन तक चलते हैं, वहाँ तो रात भर दुकानें खुली रहती हैं। 

रेलवे स्टेशन लगभग 4 किमी दूर था लेकिन वे चलते रहे। आगे चौराहे पर पुलिस की जीप रात्रि गश्त में निकली थी। दरोगा जी ने देखा..दो दुबले-पतले सात जनम के भूखे युवक, बिखरे बाल, बढ़ी दाढ़ी-मूँछें, लहराते, गाते चले जा रहे हैं! रोककर पूछा...शराब पी रखी है? कहाँ जा रहे हो इतनी रात को? कवियों को गुस्सा आ गया। राष्ट्र चिंतकों का यह अपमान! घोर कलियुग है। गुर्राकर बोले..हम कवि हैं। कविता सुनाकर थक गए तो चाय पीने स्टेशन जा रहे हैं। आपको हमसे तमीज से बात करनी चाहिए। दरोगा जी को गुस्सा आ गया। सिपाहियों से कहा..पकड़कर गाड़ी में बिठाओ, दोनो को। एक रात बन्द रहेंगे हवालात में तो रात में घूमना भूल जाएंगे।

कवि विरोध करते रहे लेकिन भारत मे पुलिस से बड़ा कौन है? दोनो को गाड़ी में बिठाया और 10 किमी दूर मडुआडीह स्टेशन के पास उतारते हुए दरोगा जी बोले..कवि हो इसलिए छोड़े दे रहे हैं, कवि न होते तो जेल में बन्द कर देते। जाओ! सुबह तक चाय जरूर मिल जाएगी। पी कर ही घर जाना। 

दोनो खिसियाए, मुँह लटकाए, दरोगा जी को कोसते, घर की ओर पैदल ही चलने लगे। दोनो मित्रों को घर पहुँचने में भोर हो गया लेकिन मानना पड़ेगा कि चाय पीकर ही एक दूसरे को गुडबाय कहा।

12.5.20

खुश रहिए, मस्त रहिए

हँसाना पहले भी
आसान नहीं हुआ करता था
फिर भी लोग
हँसते थे, हँसाते थे।

अब तो
और भी कठिन हो गया है
दिन ब दिन
बढ़ती जा रही है
दुखियारों की संख्या
और हँसाने वाले, रोने लगे हैं
खुद ही।

फिर भी,
यह जानते हुए भी कि
कम ही होते हैं
जान से ज्यादा
चाहने वाले दुनियाँ में
जब तक
जान में जान है
खुश रहिए, मस्त रहिए
मरना तो है ही
एक दिन
नहीं आया, कोई यहाँ
अमर होकर।
...............

11.5.20

मन बेचैन

मध्य रात्रि का समय है
जारी है बारिश की टिप-टिप
सावन भादों की नहीं
जेठ की बारिश है
अभी तीन दिन पहले ही थी
वैशाख पूर्णिमा।

रात को
आँधी आई थी
रह रह चमक रही है बिजली
गरज रहे हैं बादल
जारी है बूँदा-बाँदी
घण्टों से गुल है
बिजली
ताकत भर जलकर
खतम हो चुका है
इनवर्टर भी
बाहर/भीतर अँधेरा है
घुप्प अँधेरा।

नींद नहीं आ रही
बाहर
झरते हुए पानी का संगीत है,
हवा से लहराते
वृक्षों की शाखों का शोर है
भीतर
गहरा सन्नाटा है
रह रह
खुली खिड़की से आकर
मुझे छू कर
अंधेरे में गुम हो जाते हैं
ठंडी हवा के झोंके।

क्या करूँ?
मोबाइल में बैटरी तो है
नई फिल्म देखना शुरू करूँ?
मित्रों के फेसबुक/वाट्सएप स्टेटस पढूँ?
कितना पढूँ?
कोरोना का अपडेट तो देख लिया
कितना देखूँ?

मन कर रहा है
उठकर
बाँसुरी बजाऊँ!
नहीं,
बवाल हो जाएगा
जग जाएंगे
गहरी नींद में सोए
घर/पड़ोस के
सभी भूत।

जब मेरे पास कोई समाधान नहीं है तो
आप क्या बताएंगे कि मैं
क्या करूँ? 😢

सोचता हूँ
वो बड़ी खोपड़ी वाला चाणक्य
पूरे मगध की नींद उड़ाकर
कैसे सो पाता था
गहरी नींद!
..............

बकवास कविता

चलो!
हम लिखें, तुम लिखो, सब लिखें
बकवास कविता।

पहलवान सर माथे पर
निर्बल दूर भगाएं।
नेता जी की चरण वंदना
साथी को लतियाएँ

लिखो!
अपना चरित्र/आचरण
सतियानास कविता
चलो!
हम लिखें, तुम लिखो, सब लिखें
बकवास कविता।

एक झलक दिखला दिए
समझ गए होगे
अपना कुकर्म अपने को
खूब पता होगा

बताओ!
झूठ/मक्कारी अपनी
लतखोर कविता
चलो!
हम लिखें, तुम लिखो, सब लिखें
बकवास कविता।
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मनहूसियत

नीले आकाश में
टँगा है
गुमसुम आधा चाँद,
चिपके हैं
टिमटिमाते कुछ तारे।

धरती में
चाँद/तारों की तरह गुमसुम
खड़े हैं
कदम्ब, अशोक, आम और..
दूसरे वृक्ष

मेरे आसपास
चाँद, तारों और वृक्षों की तरह
खामोश हैं
मनुष्यों के कई घर

इन्ही घरों के बीच
एक घर की छत पर
मध्यरात्रि में
घूम रहा था
मैं भी
खामोशी से
इस उम्मीद के साथ
कि बहेगी
शीतल पुरवाई
लहराकर झूमेंगी
वृक्षों की शाखें
बादलों से करेंगे आँख मिचौली
चाँद/तारे भी

हाय!
ऐसा कुछ नहीं हुआ
थककर
आज फिर पकड़ लिया बिस्तर
खैर...
कल फिर सुबह होगी
देखेंगे..
कबतक छाई रहती है
धरा में
यह मनहूसियत!

रोटी और नींद

औरंगाबाद की घटना सुनी तो पहले लगा, कहीं चलते-चलते हारकर सामूहिक आत्महत्या तो नहीं कर लिया मजदूरों ने! फिर पता चला नहीं, थककर चूर हो गए थे और सो गए थे रेलवे ट्रैक पर। इस घटना से नींद की गहराई का पता चलता है। कितनी गहरी हो सकती है नींद! रेलवे ट्रैक पर भी आ सकती है ! मालगाड़ी की आवाज से भी नहीं टूटती। ट्रैक पर रोटियाँ बिखरीं थीं मतलब उस दिन दुर्भाग्य से पेट भर गया होगा मजदूरों का। भूखे होते तो शायद नहीं आती इतनी गहरी नींद। किसे पता था कि पेट का भरा होना भी, मौत का कारण हो सकता है!

कभी हमको भी आती थी नींद। सोए रहते थे बरामदे में और आतिशबाजी करते हुए संकरी गली से गुजर जाती थी पूरी बारात लेकिन नहीं टूटती थी नींद। वो बचपन के दिन थे। वो दिनभर खेलते रहने के बाद की थकान थी। यह दिनभर रेलवे ट्रैक पर पैदल चलने की थकान है। बहुत फर्क है दोनो थकान में लेकिन नींद में कोई फर्क नहीं। घर में सोए हो तो गली से, गुजर जाती है पूरी बारात, ट्रैक पर सोए हो तो तुम्हें चीरकर, फाड़ते हुए, गुजर सकती है मालगाड़ी।

मजदूरों की नींद नहीं टूटी लेकिन उनके मरने के बाद जाग गई सरकारें। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। अक्सर, हादसों के बाद ही, टूटती है, सरकारों की नींद। विशाखापत्तनम में जागी, औरंगाबाद में जागी और आगे न जाने कितनी बार हमको/आपको आएगी नींद और न जाने कितनी बार जागेंगी सरकारें! 

नींद बड़ी जालिम चीज है। हमारी हो, सरकारों की हो या दूसरे जिम्मेदारों की, जब-जब पेट भरेगा, आएगी जरूर। भूखे को नहीं आती। भूख, भोजन और नींद का आपस मे बड़ा गहरा गठजोड़ है। श्रमिक को थकान लगती है, भूख लगती है और रोटी मिल जाय तो नींद भी लगती है। जैसे रोटी जरूरी है, नींद भी जरूरी है। नींद न लगे तो श्रमिक नहीं कर पाता श्रम। अपने और अपने परिवार की रोटी और नींद से अधिक कुछ सोच भी नहीं पता श्रमिक। सोच ही नहीं पाता तो चाहेगा क्या! मालिक को श्रम चाहिए तो इतना तो करना पड़ेगा। श्रम के बदले, श्रमिकों के लिए रोटी और नींद की व्यवस्था तो करनी पड़ेगी।

रोटी और नींद की व्यवस्था होती तो वह घर नहीं जाता। वह अपने उसी गाँव में वापस जाना चाहता है जहाँ उसके पास काम नहीं है लेकिन उम्मीद है कि वहाँ अपने लोग हैं। आधी रोटी खा कर भी आधी रोटी खिलाएंगे। बहुत खुशी से नहीं जा रहा है घर। तुम्हारा धंधा बन्द हो गया, तुम्हें काम नहीं चाहिए तो छीन ली तुमने उसकी रोटी। दुखी होकर जा रहा है। पैदल जा रहा है। रेलवे ट्रैक पर जा रहा है। जब रोटी मिलती है तो इतनी ताकत भी नहीं बचती कि सोने के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना ढूँढ सके। जहाँ है, वहीं सो जा रहा है। सड़क है तो सड़क पर, रेलवे ट्रैक है तो रेलवे ट्रैक पर। हम उनकी तरह थके नहीं हैं, हमारा पेट भरा है और हमको बुद्धि भी आती है कि उन्हें रेलवे ट्रैक पर नहीं सोना चाहिए था। वे थके हैं, भूखे हैं तो जहाँ रोटी मिलेगी, वहीं सो जाएंगे। वे नहीं जागे लेकिन हे मालिक! अब तुम जाग जाओ। रोटी नहीं दे सकते तो सुरक्षित घर तक पहुँचाओ। मत भूलो कि कल फिर सूरज निकलेगा, कल फिर खुलेंगे कारखाने और कल फिर तुम्हें इनकी आवश्यकता पड़ेगी।
...@देवेन्द्र पाण्डेय।

1.5.20

मजदूर एकता एक भद्दा मजाक है।

हम
नारे लगाते रहे..
'कर्मचारी एकता जिंदाबाद'
'इंकलाब जिंदाबाद'
'दुनियाँ के मजदूरों एक हो'

वे समझाते रहे...
तुम हिन्दू हो
मुस्लिम हो
अगड़े हो
पिछड़े हो
दलित हो
अतिदलित हो...।

हम चीखते..
हम मजदूर हैं!
वे कहते...
हां, हां,
हम तुम्हारे सेवक हैं!!!

उनमें
सेवक बनने
और सच्चा, सबसे अच्छा,
दिखने की होड़ लग गई

वे रोटी फेंकते
हम
खाने के साथ साथ
गिनते भी...
किसे अधिक मिला, किसे कम!

अब हम
सिर्फ मजदूर नहीं हैं
हिन्दू हैं
मुस्लिम हैं
अगड़े हैं
पिछड़े हैं
दलित हैं
अतिदलित हैं और
मजदूर एकता!
एक भद्दा मजाक है।

22.4.20

माटी के प्याले रख दे...

छत पर माटी के प्याले रख दे
पानी, चोंच भर, निवाले रख दे।

भूखे हैं, गली के कुत्ते भी
खा जाएंगे, गोरे/काले, रख दे ।

जाने कौन, काम आ जाए सफर में!
कूड़ेदानी में, मन के जाले रख दे।

मिलेगा छाँव भी, यूँ ही, चलते-चलते
दो घड़ी रुक, पैरों के छाले रख दे।

जानता हूँ, तू भी, परेशां है बहुत
अपने होठों पे, कोरोना के, ताले रख दे।

9.4.20

अछूत

खबरों में सुना
एक देश में एक आदमी मर गया
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा
मरने वाला वैसे ही मरा था जैसे
मरता है कोई आदमी

कुछ दिनों बाद सुना
दूसरे देश में
एक और आदमी मर गया
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा
मरने वाला वैसे ही मरा था जैसे
मरता है कोई आदमी

कुछ दिनों बाद सुना
एक और देश में, एक और आदमी मर गया!
यह सुनकर मैं झुँझला गया
आखिर
आदमी के मरने से
यह दुनियाँ
इतनी हैरान/परेशान क्यों है?
हाइलाइट क्यों हो रही हैं
आदमी के मरने की खबरें?
आदमी तो
मरने के लिए पैदा ही होता है
कौन सी बड़ी बात हो गई जो
आदमी मर गया?

पढा तो चौंक गया..
अलग-अलग देशों में
एक ही रोग से
मर रहे हैं आदमी
और किसी देश के पास नहीं है
रोग की दवा!

तब भी मुझे
कोई फर्क नहीं पड़ा
आखिर मेरे देश में तो अबतक
कोई नहीं मरा!

आखिर
वह मनहूस दिन भी आया जब
आदमी से आदमी तक होता हुआ
रोग का वायरस
मेरे देश में आ गया!

फिर भी मैं
तनिक न घबड़ाया
मरने वाला
मेरे देश का जरूर था लेकिन
मेरे राज्य का नहीं था, मेरे शहर का नहीं था,
उससे मेरा
दूर-दूर तक
कोई रिश्ता/नाता न था,
कोई यारी/दोस्ती
नहीं थी
मरने वाला
आदमी था
फकत एक आदमी

धीरे-धीरे
रोग ने
मेरे राज्य में, मेरे शहर में
कदम बढ़ाना शुरू किया
परेशान तो तब जाकर हुआ जब
मेरे राजा ने
मेरे घर के सामने
एक लक्ष्मण रेखा खींच दी और कहा..
तुम्हें
घर में ही रहना है
यह छूत का रोग है
एक दूसरे को
छूने से ही नहीं, उसके छुए हुए को,
छूने से भी, फैलता है!

अब मैं
मरने से अधिक
इस बात से परेशान हूँ
कि गलती से कहीं
अछूत न हो जाऊँ!

वैसे तो
अस्पृश्यता के खिलाफ
बहुत बार बोला
लेकिन अछूत होना
इतना पीड़ादायक होता है
यह अब जाकर
समझ में आया।
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23.3.20

लोहे का घर और कोरोना

आज बन्द हो गया लोहे का घर। ऐसा दिन भी आएगा, यह किसी ट्रेन ने नहीं सोचा होगा! कई बार तुम ठहर गए, हम ठहर गए लेकिन नहीं रुकीं फोटटी नाइन, फिफ्टी डाउन, एस. जे. वी. पैसिंजर, दून, किसान, ताप्ती या बेगमपुरा। 

'चलती का नाम गाड़ी' है तो गाड़ी के रुकने का मतलब जीवन का ठहर जाना भी है। आज ठहर गया है लोहे का घर, ठहर गए हैं हम और जहाँ का तहाँ, ठहर गया है देश भी। 

एक दिन जीवन में, यम सभी के पास आता है लेकिन आने से पहले डुगडुगी बजाता है... आ रहा हूँ मैं! ऐसे सामूहिक रूप से सबकी छाती में, एक साथ मूँग दलते हुए नहीं आता। थोड़ी आँखों की रोशनी छीनता है, थोड़ी बालों की कालिमा लूटता है, दो चार दाँत तोड़ता है कहने का मतलब संभलने का पूरा मौका देता है मगर ऐसे, सभी के सर पर, एक साथ मृदंग नहीं बजाता। 

बहुरूपिया है यमराज। तरह-तरह के भेष बदल कर आता है। भैंसा वाला भेष तो सिर्फ चित्रों में देखा है। आंधी, तूफान, बादल, बिजुली, अच्छर-मच्छर बनते कई बार देखा। कभी आदमी बनकर नहीं आया था इस बार आदमी बनकर आया है। डेंगू से खतरनाक है आदमी में प्रवेश कर चुका कोरोना। पहचान में नहीं आता। मच्छर नहीं है कि फ्लीट छिड़क कर साफ कर दिया जाय, आदमी है। आदमी भाई भी है, बन्धु भी। परिवार का अंग भी, जीवन साथी भी। कैसे पहचानें कौन शत्रु है? कौन मित्र? बचें या बचाएँ? भागें तो कैसे भागें? लड़ें तो कैसे लड़ें? बस एक ही उपाय है खुद को काल न बनने दें। कोरोना को अपने भीतर प्रवेश ही न करने दें। अपने साथ साथ, परिवार और देश को भी बचाएँ। हम यह कर सकते हैं।

आज क्रोध में है लोहे का घर। बोल दिया है लोहे के घर ने..जाओ! नहीं ले जाते तुम्हें। अपने-अपने घरों में कैद हो जाओ। खुद को कोरोनटाइन करो, फिर आना। ऐसे यात्रियों की कल्पना भी नहीं की होगी लोहे के घर ने। बहुत दुखी हुआ होगा जब पता चला होगा कि आदमी में प्रवेश कर चुका है राक्षस। खुद ही मारने लगा है, एक दूसरे को।  

शुक्र है कि पटरी से उतरी नहीं है गाड़ी सिर्फ थमे हैं चक्के। हम संभले तो फिर चलने लगेगी ट्रेनें। गुलजार होगा मेरा और आपका भी, लोहे का घर।

15.3.20

लोहे का घर 58

04-03-2020

आज नॉन स्टॉप ताप्ती मिल गई जफराबाद में। हिजड़ों के एक दल ने ताली पीटकर रोकवा दिया, वरवा यहाँ, जफराबाद में, इसका स्टॉपेज नहीं है। रेलवे कर्मचारी हरा झण्डा दिखा रहा है, सिग्नल ग्रीन बता रहा है मगर आय-हाय, ट्रेन रुक गई।  सही समय से होती तो निकल जाती 4 से पहले, लेट थी तो मिल गई 5 के बाद भी। बहुत शुभ होता है हिजड़ों को देखना। ये दिख गईं तो समझो ट्रेन मिल गई। 

ट्रेन लेट होने से दुखी यात्रियों के बीच हमने हँसते हुए एक डिब्बे में प्रवेश किया। हमारा इरादा किसी के जख्मों पर नमक छिड़कने का नहीं था लेकिन अनजाने में छिड़का गया होगा। ऐसा होता है। किसी की किस्मत फूटती है तो किसी का भाग्योदय होता है। धरती के सभी जीव कभी एक साथ खुश हो ही नहीं सकते। कोई खुश होगा तो कोई दुखी हो रहा होगा। यहाँ दिन ढल रहा है, कहीं दिन निकल रहा होगा। 

लोहे के इस घर में जहाँ मैं बैठा हूँ, एक खुशहाल परिवार है। तीन महिलाएँ हैं, एक पुरुष और एक गोदी का बच्चा। यही बच्चा खुशी का कारण है। कभी किसी की गोदी में, कभी किसी की गोदी में, लगातार किसी न किसी की गोदी में खेल रहा है। एक संभालता है तो बाकी उसका नाम ले ले पुकारते हैं.... पीहू..पीहू। इस परिवार के ऊपर खुशियों की बारिश हो रही है। कभी कोई हँस रहा है, कभी कोई। अपनी खुशी खुद महसूस नहीं होती। ये भी नहीं जान पा रहे होंगे कि ये कितने खुश हैं! 

आगे, इसी बोगी में, कुछ अभागे आपस में झगड़ रहे हैं। जोर शोर से बहस कर रहे हैं। बहस करते-करते मारा मारी न कर लें! नहीं, हिन्दू/मुसलमान नहीं हैं। आपके दिमाग में तो बस्स...। सभी एक ही धर्म के हैं। अहंकार और लालच किसी में, कभी भी सवार हो सकता है।

जनार्दन प्रसाद जी भी आ गए। बहुत बुजुर्ग हैं। जौनपुर के रहने वाले हैं। घूम-घूम कर लोहे के घर में पुरानी किताबें बेचते हैं। अभी भी आपकी ये किताबें बिक जाती हैं? पूछने पर मुस्कुरा कर, आत्मविश्वास से कहते हैं.. इतनी बिक जाती है कि पेट भर जाता है। ईमानदारी से मेहनत किया जाय तो कुछ भी करो, भगवान खाने भर को दे देता है। किसी से कुछ मांगना नहीं पड़ता।
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14-02-2020

लोहे के घर में गोधूली की बेला है। खिड़कियों के रास्ते ट्रेन की बोगियाँ में घुस कर, नृत्य कर रही हैं, डूबते  सूर्य की किरणें। पल-पल डूब रहा है सूरज, पल-पल स्थान बदल रही हैं किरणें।

मेरे सामने के मिडिल बर्थ में लेट कर अनवरत फोन में किसी से बात कर रहा है एक युवा। नीचे मेरे सामने वाली लोअर बर्थ पर लेटी हैं एक महिला, शायद लड़के की माँ हैं।। साइड अपर बर्थ में अपने पापा के साथ खेल रहा है, एक बच्चा। 

मेरे दाहिनी ओर बैठी हैं एक साध्वी महिला, बायीं ओर एक साधू वेश में है आदमी! मैने साध्वी महिला को छोड़ किसी से कोई बात नहीं की है इसलिए इनके बारे में कुछ नहीं जानता। साध्वी से पूछा..अयोध्या से आ रही हैं? उन्होंने 'हाँ' कहा। कहाँ जा रही हैं? उन्होंने बताया..मुगलसराय। कोई और साथ मे है? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने अपने दाहिने हाथ की तर्जनी को ऊपर हवा में दिखाते हुए प्रश्न से ही दिया...उसके अलावा कौन साथी है? मैने समझदार मनुष्य की तरह मुंडी हिलाकर उनकी बात का समर्थन किया...कोई नहीं।

बगल के साइड लोअर बर्थ में दो महिलाएं और एक युवा बैठे हैं जो निरन्तर खिड़की से बाहर झाँक कर खेतों का नजारा ले रहे हैं। ये ऊपर बैठे पिता पुत्र के साथ हैं। 

सूरज अब डूब चुका है। बनारस आने ही वाला है। यात्रियों में हलचल है। जिन्हें बनारस उतरना है, वे समान सहित दरवाजे पर जा कर जमने लगे हैं। 

धड़ धड़ाम छन की आवाज के साथ ऊपर से एक झोला गिरा फर्श पर। एक बोतल टूट गया। बोतल से निकल कर घी फर्श में फैलने लगा। घी की सुगंध मुझ तक भी आने लगी। वाह! गाँव का देसी घी है! 

हाय! अरे! कैसे गिर गया? की आवाजों के साथ एक लड़का उठकर संभालने लगा बोतल। ऊपर-ऊपर का उठाकर रखने लगा दूसरे बर्तन में, अधिकांश बरबाद हो गया। हाथों से फर्श पर गिरा घी, काछ-काछ कर साफ करने लगी एक महिला। किसी ने कहा..फर्श का मत उठाओ। उसने कहा...उठा के फेंक दें, कोई फिसल कर गिर गया तो? गाँव के आम आदमी। कितने सरल! कितने समझदार! 

बनारस प्लेटफॉर्म पर रेंगने लगी ट्रेन। चलते हैं, आज इतना ही।
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13-02-2020

ट्रेन की बर्थ पर लेटा आलसी, चलती ट्रेन को देख खुश होता है... मैं भाग रहा हूँ! मोबाइल में स्पीड चेक करता है...100, 102, 103...। मन ही मन सोचता है... मैं कितने स्पीड से भाग रहा हूँ! 

ट्रेन रुक जाती है। रुकी रहती है। देर तक नहीं चलती! वह बेचैनी से कछुए की तरह सर निकाल कर,इधर-उधर देखता है... बहुत से लोग हैं! मन ही मन बड़बड़ाता है... जो गति सबकी, वो गति अपनी! मैं कर ही क्या सकता हूँ? इंजन तो नहीं बन जाऊंगा न?

ट्रेन चल रही है। आलसी के तानों से अनजान, टेसन-टेसन सिगनल देखती, पटरी-पटरी दौड़ रही है। ट्रेन चल रही है। ट्रेन में आलसी के अलावा भी बहुत से लोग हैं। कुछ विद्यार्थी हैं जो कहीं से परीक्षा देकर लौटे हैं। आपस मे एक एक प्रश्न पर डिसकस कर रहे हैं।कुछ कर्मचारी हैं जो काम से लौटकर घर जा रहे हैं। कुछ परिवार के साथ हैं, कुछ दोस्तों के साथ और कुछ अभागे अकेले भी चल रहे हैं। ट्रेन चल रही है।

मेरे सामने एक युवा परिवार है जिनके पास बहुत से सामान  हैं।  बगल में कुछ लोग देश की चिंता कर रहे हैं। देश चल रहा है। ट्रेन में लेटा आलसी कहता है... मैं भाग रहा हूँ!  ट्रेन अपनी रफ्तार से चल रही है। तब भी चलती थी जब हम और आप नहीं थे। तब भी चलेगी जब हम और आप नहीं होंगे। #ट्रेन पटरी पर चल रही है।
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06-02-2020

किसान आज लेट आई। जफराबाद में इसका 6.37P.M. समय है, 7.10 में आई। खाली-खाली है बोगियाँ। साइड लोअर बर्थ में मस्त लेट कर सामने का नजारा ले रहा हूँ। सामने एक अकेला परिवार है। और कोई दूसरे यात्री नहीं हैं। एक जोड़ा और दो छोटे बच्चे। एक गोदी का बच्चा दूसरी हंसती-खेलती 4 या 5 साल की चंचला। बच्ची हँसती हुई पास आई...

क्या नाम है तुम्हारा? 
उसने बड़ी अदा से बताया..ईरम नाज़! 
उसने नाम न बताया होता तो पता ही नहीं चलता कि यह मुस्लिम परिवार है। न अम्मू के चेहरे पर बुर्का न अब्बू की लंबी दाड़ी! बिलकुल वैसे ही जैसे कोई दूबे जी का परिवार!!! 
तुम्हारे भाई का क्या नाम है? 
अल्बी हसन! 
उससे बात नहीं करती? 
सो रहा है।

मोबाइल से खेल रही है ईरम। अम्मू की गोदी में सोया हुआ है अल्बी हसन। अब्बू जमा रहे हैं लोअर बर्थ में अपना बिस्तर। शाम के 8 बजा चाहते हैं। लोहे के घर में शाम ढलने के बाद करने को कुछ रह भी नहीं जाता। जो अपने पास खाने-पीने का सामान है उसे खाओ और लेटे रहो।

युवा अब्बू ने जमा दिया है बर्थ। मोहतरमा लेट गईं छोटे नवाब को रजाई में लेकर। अब बचे अब्बू और शरारती ईरम। यह अभी कर रही है कूद-फांद। अब्बू दूसरे लोअर बर्थ में भी जमा रहे हैं चादर। लोई ओढ़ा कर लिटा दिए हैं बिटिया को। लोई के भीतर मोबाइल चला रही है ईरम। अच्छे पति और अच्छे पिता की तरह सबको लेटा कर खाली बची बर्थ पर खामोशी से बैठे हैं अब्बू।

मर्द कितना त्याग करता है! भरी जवानी में बंजारों सा जीवन जीता है!!! अकेले जाग कर सफर करता है और अपने परिवार को चैन की नींद सुलाता है। किसी दुष्ट ने तीन तलाक दिया तो लोग उसी को दृष्टांत बनाते हैं! जमाने भर के मर्दों का त्याग उनको दिखाई नहीं देता।

ईरम ने फेंक दिया है चादर! उठकर बैठ गई है। अब्बू से बतिया रही है। अब्बू मोबाइल में कोई वीडियो देख रहे हैं, वह भी मोबाइल में झाँक रही है। नानी के घर से दादा के घर में जा रही है। बहुत खुश है ईरम। हे ईश्वर! इसकी खुशी बनाए रखना। इन्हें समाचार चैनलों, शाहीन बाग और दूसरे सभी राजनैतिक षड्यंत्रों से दूर रखना। 
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05-02-2020

फिफ्टी अपनी पूरी रफ्तार में भाग रही है। जलालगंज का पुल इसकी रफ्तार से थरथरा कर पीछे छूट चुका है। मेरे सामने साइड लोअर की खिड़की के पास बैठी महिला पॉकेट बुक की तरह मोबाइल खोल कर कुछ देखने मे डूबी है। एक सफाई कर्मी फर्श पर गिरे मूंगफली के छिलकों को देख झुंझलाता हुआ बड़बड़ा रहा है.. मूंगफली खाइए, खाने को मना नहीं है लेकिन इस तरह छिलके मत छींटीए! खामोश हैं चिकने घड़े। सफाई कर्मी फर्श साफ कर जा चुका है।

सुरुज नरायण अब डूबना ही चाहते हैं। बाहर खेतों में बिखरे पड़े हैं खिले सरसों के टुकड़े। हर दो मिनट बाद दिख ही जाते हैं सरसों के फूल। खालिसपुर में 5 मिनट पहले ही आकर खड़ी हो गई है फिफ्टी। स्टेशन के बाहर गाजर बेच रहा है ठेले वाला। हरे मटर, मसालेदार चने बेच रहे हैं वेंडर। यह ट्रेन सबको सहारा देती है। हर छोटे स्टेशनों पर रुकती है। यात्री भी बड़े फुरसत में रहते हैं। कोई मोबाइल में जोर-जोर से बजा कर समाचार सुन भी रहा है, सुना भी रहा है। वही शाहीन बाग, वही हिन्दू/मुस्लिम। किसी को सुनने में कोई रुचि नहीं। वही पागल अकेले सुन रहा है और सुना रहा है। पागल को कौन कहे कि कान में ईयर फोन लगा कर सुनो? 

ट्रेन अब फिर चलने लगी। खुली खिड़कियों से आने लगी ठंडी हवा। आजकल दिनभर धूप और सुबह-शाम खूब चलती है ठंडी हवा। अभी अंधेरा नहीं हुआ है। बन्द होने लगे खिड़कियों के शीशे। सामने बैठा एक किशोर धीमी आवाज में, मोबाइल में गाने बजा कर सुन रहा है। आगे के लोअर बर्थ में दो महिलाएं अखबार में लाई फैलाकर खाने में मस्त हैं। 

अपर बर्थ में ऊपर एक जोड़ा एक लोई ओढ़े आपस में गड्डमड्ड एक दूसरे को निहार रहा है। धीरे-धीरे बतिया रहा है। रह-रह दांत दिखा रहा है। उनकी बातें सुनाई नहीं पड़ रहीं। अनुमान लगा सकते हैं कि दोनो के बीच रोचक बातें चल रही होंगी। मेरे बगल में बैठा एक लड़का बोतल निकाल कर पानी लेने गया था, नहीं मिला। उसका मोबाइल भी डिस्चार्ज हो चुका है, खिसिया रहा है। सफर में मोबाइल डिस्चार्ज हो जाय तो बड़ी खीस पड़ती है। लखनऊ से एग्जाम देकर लौटे हैं बिहारी लड़के। भोजपुरी में यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और जाने क्या-क्या बड़बड़ा रहे हैं। 

अब बाबतपुर में रुकी है ट्रेन। इसको 7 बजे पहुंचना है बनारस। अभी इसके पास बहुत समय है। इस स्टेशन में हवाई अड्डे के दूसरे छोर पर ठंडी बियर और अंग्रेजी शराब की दुकानें हैं। दुकानों के आसपास अंडों के ठेले लगे हैं। दुकानों के बल्ब जल चुके हैं। अपनी ट्रेन यहाँ से भी आगे बढ़ चुकी है। 

अब बाहर अँधेरा हो चुका है। लोहे के घर में जल चुकी हैं लाइटें। नीचे बैठे किशोर आपस मे नेवी के एग्जाम में आए पेपर के प्रश्न डिसकस कर रहे हैं। गूगल सर्च कर रहे हैं। सही उत्तर ढूँढ कर एक दूसरे को पागल कह रहे हैं। सही हल करने वाला खुश है। गलत हल करने वाला बड़बड़ा रहा है.. नामे ना सुनले रहलीं, का मतलब बा? ऊपर बैठा जोड़ा, चार आंखों से एक मोबाइल में घुसा पड़ा है। अब पूरे स्पीड से भाग रही है फिफ्टी डाउन।
......................

24-01-2020

आज बहुत दिनों के बाद सुबह सबेरे धूप ने खिड़कियों से झाँका है लोहे के घर में।  कई दिनों से यह हो रहा था कि अँधेरे-अँधेरे निकलते, कोहरा-कोहरा चलते और उजाला होते-होते पहुँच जाते थे काम पर। 

इधर हम दफ्तर पहुँच कर अपने दड़बे में घुसे, उधर खबर आई कि बाहर निकली है जाड़े की धूप। 

हाय! पहले प्यार की तरह प्यारी होती है जाड़े की धूप। हम हाथ सेंक भी नहीं पाते कि गुम हो जाती है। 

जाड़े की धूप से लव होता है, मैरिज नहीं होती। मैरिज तो गर्मी की धूप से कुबूल करना पड़ता है। 

जाड़े की धूप पड़ोसी की बीबी-सी, सोन चिरैया! कभी हाथ नहीं आती।
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08-01-2020

बाहर मौसम सर्द है, लोहे के घर में भीड़ है। भीड़ में गर्मी का एहसास होता है। गर्मी चढ़ जाय तो प्यादा भी आऊँ-बाऊँ बकने लगता है लेकिन यहाँ की भीड़ का नजारा अलग है। यह दिल्ली में जमा भीड़ नहीं है। यह एक नाव में सफर करने वाले यात्रियों सरीखी भीड़ है, जहाँ सभी को मजबूरी में संतुलन बनाए रखना है। जरा सा संतुलन बिगड़ा कि गई भैंस पानी में। थोड़े से ना नुकुर के बाद सभी खड़े यात्री एडजस्ट हो चुके हैं। कोई ऊपर चढ़ कर, सामानों के बीच, बैठ चुका है, कोई जरा सा तशरीफ़ टिकाए, बैठे-बैठे झूल रहा है। एक बुजुर्ग जोड़े को हम पर भी दया आ गई और उन्होंने सहृदयता दिखाते हुए हमें भी पास बिठा लिया है। इतनी जगह मिल गई कि बैठ कर आराम से लिखा जा सकता है।

बुजुर्ग दम्पत्ती जौनपुर से ही चढ़े हैं। यहीं के निवासी हैं। अवधी बोल रहे हैं। बुजुर्ग इतने हैं कि इनको यात्रा करते देख आश्चर्य हो रहा है। हावड़ा तक जाएंगे। कोई और साथी है? पूछने पर बताया..नहीं और कोई नहीं है। मुझे और आश्चर्य हुआ...हावड़ा तक अकेले! लड़के के पास जा रहे हैं क्या? नहीं... गंगा सागर जा रहे हैं। कार्तिक पूर्णिमा को गङ्गा सागर में स्नान करना है! यह और भी चौंकाने वाली बात थी। अधिक पूछने पर बताया कि कलकत्ता में लड़का रहता है, वह आ जाएगा। गङ्गा सागर करा कर ट्रेन में बिठा देगा। यह मेरे लिए राहत देने वाली बात थी। यह संभव है। फिर भी इस जाड़े में, ट्रेन के स्लीपर बोगी में इतनी लंबी यात्रा, इन बुजुर्ग दम्पत्ती के लिए साहसिक यात्रा है। धार्मिक व्यक्ति साहसी होता है, इसमें कोई शक नहीं। 

आज का मौसम खराब है। वर्षा हो रही है और ठंडी हवा भी चल रही है। यह अपनी फिफ्टी डाउन है। जौनपुर से बनारस 56 किमी की दूरी के बीच 5 स्टॉपेज है। हर स्टेशन पर लोकल ट्रेन की तरह यात्री चढ़ते/उतरते रहते हैं।   वेंडर भी माहौल को खुशनुमा/जीवंत बनाए रखते हैं। अभी पानी वाला गया ...पानी-पानी कहते हुए तो अभी चाय वाला चीख रहा है... चाय-चाय। गुटखा बेचने वाले भी चढ़ जाते हैं और हरा मटर बेचने वाले भी। जाड़े का समय है। स्लीपर बोगी में समान से ज्यादा, कम्बल/चादर ओढ़े यात्री हैं। मफलर/टोपी पहने, कम्बल ओढ़े अपने में गड्डमड्ड हैं यात्री। बुजर्ग ने पानी खरीदा और चाय भी मांगने लगे। वेंडर के पास एक ही कप चाय थी। चाय पकड़ा कर बुजुर्ग से बोला..ला, पी ला, एक्के कप अहै, चा खतम होई गए, पैसा जिन दिया! पी ला। यह उदारता कम ही देखने को मिलती है। 

बुजुर्ग धोती-कुर्ता पहने हैं और शाल ओढ़े हैं। सामने बैठी महिला ने कहा...मोजा पहिन ला। बुढ़ऊ बोले..हमें ठंडी ना लगी। हम माटी में नङ्गे पाँव घूमे वाला मनई हई। हमार चिंता जिन करा। दूसरी महिला ने कहा...नीचे इनर पहने होंगे। तब तक बूढ़ा बोलीं..ना, खाली धोती पहिने हैन। बुढ़ऊ मुस्कुरा दिए। 

ट्रेन वीरापट्टी में रुकी है। यहाँ इसका स्टेशन नहीं है। जहाँ स्टेशन नहीं है, वहाँ भी रुक सकती है। गाड़ी जब तक चलती रहती है, लोग निश्चिंत रहते हैं। रुकती है तो बेचैन हो जाते हैं। कोई उतर कर सिगनल देखने लगता है, कोई बड़बड़ाने लगता है..अभी यहाँ क्यों रुकी है? जब तक पटरी पर चलती रहती है गाड़ी, घर के सभी सदस्य निश्चिंत रहते हैं। रुकी नहीं कि इंजन को कोसने लगते हैं! उसकी भी कोई मजबूरी होगी, नहीं समझते। अधिक देर रुकी तो निर्ममता की हदें भी पार कर देते हैं। घर हो या लोहे का घर हो, सदस्यों का व्यवहार एक जैसा होता है।

दो यात्री लूडो खेल रहे थे। एक हिजड़ा आकर एक से चपक गया..हाय!हाय! दे दो,  आज जाऊँगी नहीं। जब असली छक्का आ गया तो क्या पासा फेंक कर छक्का मांग रहे हो?

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03-01-2020

ताप्ती आज लेट क्या हुई, रोज के यात्रियों की बाँछें खिल गईं। शाम पाँच बजे ऑफिस से छूटे सवा पाँच तक आ गई। किसी की फूटी किस्मत, किसी का चमका भाग्य। थोड़ी दूर  धीमी रफ्तार से चलने के बाद अब इसकी रफ्तार तेज हुई है। आगे-आगे फिफ्टी चल रही है। रोज के यात्रियों में कौतूहल है कि फिफ्टी को पीटेगी या पीछे-पीछे चलेगी। खालिसपुर में देर से खड़ी है। उसका बनारस पहुंचने का समय 6.55 है। वो आज बिफोर चल रही है। ताप्ती का समय 5.30 है। ताप्ती आज लेट चल रही है। जौनपुर से बनारस के बीच में ताप्ती का कोई ठहराव नहीं है, फिफ्टी 4 स्थान पर रुकती है।

खालिसपुर आ गया। फिफ्टी खड़ी रह गई। ताप्ती आगे बढ़ गई। ताप्ती में बैठे रोज के यात्रियों में खुशी की लहर दौड़ गई। फिफ्टी के यात्री मायूस हुए होंगे...बेकार जल्दीबाजी किए, ताप्ती पकड़े होते तो अच्छा होता। 

इन्ही छोटी-छोटी बातों में कभी खुश, कभी दुखी होकर कटता है रोज के यात्रियों का सफर। 

आमने-सामने चार लड़कियाँ बैठी हैं। चारों बनारस जा रही हैं परीक्षा देने। चिड़ियों की तरह चहक रही हैं। छोटे-छोटे कस्बेनुमा शहरों से बड़े शहर की यात्रा आराम से तय कर रही हैं। इन्होंने पढ़ना ही नहीं सीखा, परीक्षा देना और सफल होना भी सीख लिया है। लड़कों की तरह बाजार पर मोहताज नहीं हैं। खाना बनाना भी जानती हैं, टिफिन भी रखती हैं और चाव से मिल बाँट कर खाना भी जानती हैं। बड़े-बड़े विषयों पर आराम-आराम से बतिया भी रही हैं। महानगरी में मेट्रो/बस से सफर करने वाली लड़कियों से जरा हट के है छोटे-छोटे कस्बों से निकल बड़े शहरों में परीक्षा देने जाती लड़कियाँ। लोहे के घर में सफर करो तो पता चलता है.. मेरा देश बदल रहा है।

बनारस के आउटर पर देर से खड़ी है ताप्ती। रोज के यात्री ट्रेन को छोड़कर, पैदल ही स्टेशन की ओर जा रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे जिस्म को कोमा में छोड़, मंजिल की ओर, उड़ जाती हैं आत्माएँ।
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01-01-2020

फिफ्टी डाउन आज लेट चल रही है। अभी बनारस पहुँच जाना था, जौनपुर से चली है। ट्रेन में काम भर की भीड़ है। अधिकतर पंजाब से चले, हावड़ा तक जाने वाले, बंगाली यात्री हैं। ट्रेन भी इनके धैर्य की परीक्षा ले रहा है। 

रोज की अपेक्षा आज ठंड कम है लेकिन बन्द हैं खिड़कियों के शीशे। हम लोअर बर्थ में बैठे हैं, बायीं ओर की छहों बर्थ पर एक परिवार का साम्राज्य है। चार महिलाएँ और दो किशोर हैं। नमकीन का बड़ा थैला खुला और एक महिला सबको नमकीन बांट रही हैं। आमी खाबो ना, आमी खाबो ना के बाद भी महिला सबको जबरी नमकीन परोस रही है। एक किशोर बड़े से पाव (ब्रेड) को टुकड़े-टुकड़े तोड़ कर प्रेम से खा रहा है। उसकी गोद मे सर रख कर एक महिला लेटी है। वह लेटे-लेटे नमकीन का फांका लगा रही है। ऊपर बर्थ पर लेटी महिलाएं भी उठ कर बैठ गई हैं और हाथ नीचे बढ़ा कर नमकीन ले रही हैं। एक गमछा टँगा है ऊपरी बर्थ के सिक्कड़ से, नीचे खूब सामान फैला है। नीचे बर्थ में एक बच्चा भी लेटा है, जो गहरी नींद सो रहा है। अब नमकीन खतम हो चुकी है और सभी हाथ नचा-नचा कर बोल रहे हैं। इतनी जल्दी-जल्दी बोल रहे हैं कि उनकी हँसी के अलावा कुछ समझ में नहीं आ रहा। सभी खुश हैं, लोहे के घर में।

मेरे बगल में बैठा एक जोड़ा बीच में ही खालिसपुर उतरेगा। पंजाब में मोटर लाइन में काम करता है। पत्नी को बच्चा होने वाला है। इसीलिए घर जा रहा है। मैने पूछा..घर छोड़, पंजाब में क्यों रहते हैं, कमाई अच्छी होती है क्या? बोला..काम भर हो जाता है। हम लोग चार भाई हैं न, दूर रहते हैं तो आपस मे प्रेम बना रहता है। आज हम आ रहे हैं तो गाड़ी लेकर हमे लेने, स्टेशन में आया है। कब तक रहेंगे पूछने पर बोला..अब बच्चा हो जाएगा तभी जाएंगे। 

खालिसपुर आ गया। उतर गया जोड़ा। ट्रेन 2 मिनट रुक कर चल दी। बर्थ और खाली हो गया।  रोज के यात्री बगल में आ कर बैठ गए। 

दाहिनी तरफ भी सामने एक भरा पूरा बंगाली परिवार है। उनकी एक लोअर बर्थ, इधर मेरे सामने भी खाली पड़ी है। मेरे सामने की मिडिल बर्थ खोलकर एक युवक लेटा हुआ है। उस परिवार में कन्टोपा पहने एक बुजुर्ग उधर बैठे हैं। कोई इधर के खाली बर्थ में लेटना चाहता है तो कटहे सुग्गे की तरह चीखते हैं.. "मेरी बर्थ है, अभी हम लेटेंगे!" जौनपर से बोल रहे हैं 'अभी हम लेटेंगे' लेकिन लेट नहीं रहे हैं। सहयात्री ने कहा..हमें बनारस ही जाना है लेकिन वो बोल रहे हैं... अभी हम लेटेंगे! अब बनारस करीब आ रहा है, वे वहीं बैठे अपने नाती से बतिया रहे हैं। शायद सोच रहे हों कि यह सोए तो हम सोएं।  बर्थ का भी मोह है, नाती से बतियाने का भी मोह है। मोह छूटे नहीं छूटता, यही जिंदगी है। बर्थ जौनपुर से ही उनकी प्रतीक्षा में, खाली-खाली चल रही है।

बाएं वाले परिवार से जोर का ठहाका उठा है। महिलाओं ने कोई बढ़िया मजाक किया होगा! दाएं वाला परिवार बच्चे की तोतली जुबान पर मस्त है। हम बीच में सबको देख रहे हैं। हमारी ट्रेन बाबतपुर में खड़ी है। रोज के यात्रियों की बेचैनी बढ़ रही है। रात हो गई अभी यहीं अटके हैं। दूर के यात्री जानते हैं कि पूरी रात इसी ट्रेन में गुजारनी है, इसलिए चैन से हैं। बेचैनी मंजिल पास आने पर अधिक बढ़ती है। मंजिल दूर हो तो सफर का मजा आता है।
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21.1.20

अचानक से नहीं मरेगा आदमी

आदमी के मरने से पहले
पढ़ना छोड़ देंगे लोग
कविताएँ
खरीदना छोड़ देंगे
उपन्यास
सुन ही नहीं पाएंगे
गीत
शोर लगने लगेगा
संगीत
अखबार के पृष्ठों से
गुम हो जाएगा
खेल समाचार,
कार्टून का कोना और
व्यंग्यालेख!

टी.वी. में
लोकप्रिय नहीं रह जाएंगे
मनोरंजन के चैनल
लोग देखेंगे
सिर्फ समाचार
फ्लॉप होने लगेंगे
प्रेम कहानियों वाले फ़िल्म
सुपर हिट होने लगेंगे
युद्ध और हिंसा की कहानियाँ
गुम हो जाएंगे
मास्टर हवेली राम,
नीम का पेड़,
नित नए बनेंगे
सेक्स और अपराध वाले
सीरियल

अचानक से नहीं मरेगा आदमी
उससे पहले
गुम हो जाएंगे
इंसानियत के सभी चिन्ह!
अभी तो लोग
पढ़ते हैं
कविताएँ
सुनते हैं
गीत
लगता है
पुस्तकों का बहुत बड़ा मेला।
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