29.8.18

परिंदे

दिन के शोर में
गुम हो गए
भोर के प्रश्न
अपने-अपने
घोसलों से निकल
फुदकते रहे
परिंदे।

शाम की शिकायत
सुनते सुनते
रात बहरी हो गई
बोलते-बोलते
गहरी नींद सो गए
थके-मांदे
परिंदे।

परिंदों में
काले भी थे
सफेद भी
कबूतर भी थे
गिद्ध भी
लेकिन
सब में एक समानता थी
सभी परिंदे थे
और..
सभी के प्रश्न/
सभी की शिकायतें
सिर्फ पेट भर
भोजन के लिए थीं।
......

28.8.18

हे कृष्ण!

कभी
बीनता था झाँवाँ 
रेल पटरियों के किनारे
सजाता था पहाड़ 
मनाता था
कृष्ण जन्माष्टमी
आज
बैठा हूँ ट्रेन में
देख रहा हूँ
गिट्टी गिट्टी
रेल की पटरियाँ
न बचपन
न साथी,
न भाप के ईंजन
न कोयला,
न झाँवाँ
न पहले जैसा मन।

दौड़ती भागती
बिछी बिछाई पटरी पर
चल रही है 
अपनी गाड़ी।

हे कृष्ण!
इस बार आना तो
आने से पहले
दे जाना
थोड़े बुरादे
थोड़े इरादे
थोड़े खिलौने
छोटा सा पहाड़ 
और...
थोड़ा सा बचपन।
....

27.8.18

लोहे का घर - 48 (यम की आहट)

वे पतंजलि आश्रम हरिद्वार से अपने घर आरा लौट रहे थे। लगभग मेरी ही उम्र के थे लेकिन बीमारी ने उन्हें जीर्ण शीर्ण बना दिया था।  पेशाब की थैली में कैंसर था। कमर में दर्द था, अधिक देर तक बैठ नहीं पाते थे। बात करते करते बताने लगे कि तीन महीने पहले हम भी आपकी तरह ही स्वस्थ थे! शुरू शुरू में पेशाब में जलन होती थी लेकिन ध्यान नहीं दिया। दूध पीते, मंठा खाते लेकिन आराम नहीं हुआ। जांच कराए तो कैंसर निकला। दवाई खा रहे हैं। बेटा नहीं माना तो हरिद्वार चले गए। एक माह की दवाई लिए हैं। फायदा होगा तो फिर जाएंगे। पतंजलि आश्रम में तीन दिन रहना, खाना बिल्कुल मुफ्त। खाना बढ़िया मिलता है। सिर्फ दवाई का पैसा देना पड़ा। शुरू में लापरवाही किए वरना  तबियत इतनी जल्दी इतनी खराब नहीं होती।  

मैंने उन्हें अपनी एक कविता सुनाई। जिसका आशय भाव यह था कि यमराज एक झटके में किसी को नहीं ले जाता।  आने से पहले कई बार चेतावनी देता है। पहले बालों की कालिमा, आंखों की रोशनी, दांतों की शक्ति छीन लेता है फिर भी न संभले तभी लेे जाता है। हम अक्सर लापरवाही करते हैं। 

वे उठ कर बैठ गए। सही कह रहे हैं। यही बात हमारे आरा जिले के ओझा जी गा कर सुनाते हैं..

अंखिया के जोत नरमाइल हो, पाकल कपरा के बार
जिंदगी के जेल से बुझाता अब, बेल हाइहें हमार।

मैंने उन्हें आश्वासन दिया..दवाई करेंगे तो ठीक हो जाएंगे। 
ओझा जी गायक हैं। किसी का लिखा गाते होंगे। जिसने भी लिखा उनको नमन। उन्होंने भी वही बात कही जो मैं सुना रहा था। 

सफ़र में अनजान व्यक्तियों से दिल के तार कभी यूं भी जुड़ जाते हैं।

25.8.18

लोहे का घर -47(एक प्रेम कथा)

फिफ्टी डाउन अपने सही समय पर चल रही थी। हम जहां बैठे थे वहीं एक युवा परिवार सफ़र कर रहा था। बीमार सी दिखने वाली पत्नी, तीन छोटे-छोटे मैले कुचैले वस्त्र पहने बच्चों को बमुश्किल संभाल पा रही थी। हर साल प्रकाशित होने कैलेंडर की तरह तीनों आपस में एक-एक वर्ष से बड़े छोटे होंगे। गोदी का बच्चा मां का दूध पी रहा था और बड़ी दो बेटियां बारी-बारी से खिड़की झांक रही थीं। हालांकि गोदी वाले बच्चे के सर के बाल भी लड़कियों की तरह बड़े-बड़े थे तो हमें लगा वह भी लड़की है! तभी  मेरे बगल में बैठे उनके जनक ने हंसते हुए गर्व से कहा..यह लरका है। मुंडन कराने जा रहे हैं बक्सर। देवी को बकरा चढ़ाएंगे। उधर ऐसी मानता है।

मैंने उसका उत्साह बढ़ाया..कोई बात नहीं जी! आपकी कहानी भी मेरी तरह है। पुत्र की कामना में कितने लोग पांच छः लड़कियां पैदा करते हैं, आपको तो भगवान ने दो के बाद ही पुत्र दे दिया। हमारी भी दो लड़कियां ऐसे ही एक के बाद एक हुईं। सब भगवान की कृपा है। हां, तीसरा बच्चा हमें पॉच साल बाद हुआ लेकिन यहां आपने थोड़ी जल्दी कर दी। आगे क्या इरादा है? 

वो खुलकर हंसने लगा। अब हमारे बीच से अपरिचितों वाला शील संकोच गायब हो चुका था। उसने अपनी राम कहानी सुनानी शुरु की और मैं दम साधे सुनता रहा.. 

मेरा नाम अजय है। भभुआ, बिहार का रहने वाला हूं। लुधियाना में सिलाई का काम करता था। साल २०१० की बात है। घर में शादी तय हो गई थी। पन्द्रह दिन बाद शादी/गौना था। मैं अपनी शादी के लिए घर जाने की तैयारी में था कि सिलाई के काम से हिमाचल जाना पड़ गया। लौटकर आया तो वहीं बुरी तरह फंस गया। 

अरे! क्या हुआ?

मेरे जिगरी दोस्त ने दगा दे दिया जी। मेरे नाम से एक सरदार जी से पचास हजार कर्जा ले लिया और सब पैसा लेकर फरार हो गया। मेरी मोटर सायकिल भी ले गया। लौटकर लुधियाना आया तो सब कुछ लुट चुका था। सरदार जी ने मुझे पाया और मैं फंस गया। 

शादी करने घर नहीं गए?

कैसे जाता? वो तो सरदार जी का भला हो कि उसने काम करने दिया और पैसा चुकाने का मौका दे दिया। 

फिर शादी ?

शादी टूट गई जी। पिताजी को शादी के लिए लिया पैसा भी लौटाना पड़ा। जब मैं घर गया ही नहीं, कोई खबर ही नहीं दिया तो घर वाले क्या करते? मेरे कठिन वक़्त में इसने (पत्नी को दिखाकर) बड़ा सहारा दिया!!!

तो! आप लोगों ने लव मैरेज की है? कितना पढ़े हैं आप लोग?

मैं तो अनपढ़ हूं जी, ये बी. ए. पास है!

अब चौंकने की बारी मेरी थी। इसीलिए इनका ये हाल किया आपने? एक के बाद एक तीन बच्चे! शरीर देख रहे हैं? फिर मैंने पत्नी की ओर रुख किया..और आपने क्या देख कर इनसे शादी की? 

बस हो गया जी। ये हमारी दुकान में आती थीं, धीरे धीरे हो गया। मैंने इनके खाने में कोई कमी नहीं करी। पूछिए इनसे.. मांस, मछली..जो यह कहे लाया कि नहीं? खाती ही नहीं है तो क्या करें? पत्नी भी अब खुल कर बतियाने लगी थीं.. दिमागी टेंशन से। इनको क्रोध बहुत आता है। अजय हंसकर कहने लगा.. क्रोध क्यों आता है, किस बात पर आता है? पूछिए ? खाना ही नहीं खाती। 

अब घर जा रहे हैं? घर वालों ने स्वीकार कर लिया? 

शुरु शुरु में तो बहुत दिक्कत हुई। घर से भी गए, ससुराल से भी गए। न इनका कोई, न मेरा। लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो गया। बक्सर में इनके पिताजी ने एक घर दिया है, वहीं जा रहे हैं। बकरा चढ़ाना है, लड़के का मुंडन है। अपने घर वालों को भी वहीं बुलाएंगे। काम मिला तो लुधियाना से कपड़ा लाकर वहीं सिलाई करेंगे। नहीं मिला तो फिर लुधियाना चले जाएंगे।

मुझे किसी से उसकी जाति पूछना असभ्यता लगती है, इसीलिए नहीं पूछा। बस इतना ही कहा..सब ठीक हो गया, अब धीरे धीरे और अच्छा होगा। आप बस एक काम करना। इनकी हालत देख रहे हो न? अब बच्चे पैदा मत करना। जितनी जल्दी हो, अपनी नसबंदी करा लो। अब अगर बच्चा हुआ तो यह नहीं बचेंगी। फिर तुम्हारे इन बच्चों का क्या होगा? स्वस्थ रहीं तो पढ़ी लिखी हैं, सभी बच्चों को पढ़ाकर बड़ा आदमी बना देगी। 

उसने मुझे दिल से आश्वासन दिया.. अबकी जाड़े में जरूर करा लुंगा।

मैंने भी उन्हें दिल से आशीर्वाद दिया.. ईश्वर तुम लोगों को सदा खुश रखे। 

मन तो कर रहा था इनका साथ न छूटे लेकिन #ट्रेन बनारस पहुंचने वाली थी, मुझे उतरना था। मैंने उन्हें फिर एक बार भरपूर निगाहों से देखा और हाथ हिलाकर अपनी राह पकड़ ली।

24.8.18

सत्ता

चांद
दिन में
कोई प्रश्न नहीं करता
सूरज से
जानता है
सही वह
जिसके पास है
सत्ता।

सूरज
रात में 
चांद पर रोशनी लुटा कर 
मौन हो जाता है
जानता है
सही वह
जिसके पास है
सत्ता।

आम आदमी 
चिड़ियों की तरह
चहचहाता है..
वो देखो
चांद डूबा,
वो देखो
सूर्य निकला!
वो देखो
सूर्य डूबा
वो देखो
चांद निकला!
......

17.8.18

अमर अटल

कल शाम लोहे के घर में किसी ने बताया कि अब अधिकृत सूचना आ गई ..अटल जी नहीं रहे। सफ़र में लिखने की आदत है। लिखना चाहा, लिख नहीं पाया।  सिर्फ उनका समाचार लेता, याद करता रह गया।

एक होता है मृत्यु का अंदेशा, एक होती है डाक्टर द्वारा अधिकृत घोषणा। दोनों के दरमियान जो लम्हें गुजरते हैं वो बड़ी बेचैनी, बड़ी लाचारगी से भरे होते हैं। दिमाग कहता है कि अब हमारा प्रिय हमसे बिछुड़ जाएगा और दिल कहता है.. काश! कि यह फिर बोलने लगे!!! जब हमारे वश में कुछ नहीं रहता हम ईश्वर की शरण जाते हैं.. हे ईश्वर! बचा लो। हाय! ईश्वर भी इस मामले में कुछ नहीं कर सकता। जब मृत्यु की घोषणा होती है तब जाकर होता है एहसास..मृत्यु अटल है। 

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हमारे पास कभी नहीं होते मगर कोई हल्का सा भी तार छेड़ दे तो उनकी याद दिल दिमाग में छाने लगती है। न उनके चरण छूने का सौभाग्य मिलता है, न कंधा देने का। न लाभ पक्ष में दिखते हैं, न हानी में लेकिन जीवन के चिट्ठे  में हमेशा संपत्ति की तरह जड़े रहते हैं। उनके बिना अपना जीवन चिठ्ठा अधूरा अधूरा रहता है। कुछ ऐसे ही थे/हैं अटल जी।  

जब से होश संभाला हम उनकी मुखरता को सुनते, चरित्र को गुनते रहे। अचरज होता कि राजनीति में भी कोई व्यक्ति इतनी ईमानदारी से मनुष्य बने रहकर भी, शिखर तक पहुंच सकता है! विरोध कर के भी कोई कैसे विरोधियों का दिल जीत सकता है!!!  जब तक मौन रहे तो लगता.. काश! बोल पाते। अब बिन बोले चले गए तो यह भी लगता है .. अच्छा ही हुआ कि उन्हें कुछ बोलना नहीं पड़ा। बोलने की शक्ति होती और उन्हें कोई चुप कराने का प्रयास करता तो अच्छा नहीं लगता। 

कविता प्रेमी होने के कारण भी अटल जी हमें प्रिय थे। साहित्य जगत ने भले उन्हें बड़ा गीतकार न माना हो लेकिन उनके गीत हारे हुए मन को नई उर्जा और राष्ट्र प्रेम की भावना जगाने में समर्थ हैं। एक राष्ट्रप्रेमी गीत रचेगा तो उसके गीतों में राष्ट्र प्रेम की गूंज सुनाई तो देगी ही। एक मानवता वादी गीत रचेगा तो विरोधी विरोध भूल संमोहित हो सुनेंगे ही। 

गीत के अलावा जो सबसे प्रिय था वह था उनका ओजस्वी भाषण। संसद हो या सड़क, कोई समारोह हो या कोई चुनावी सभा, अटल जी के भाषण सबको चित्त करते हुए भी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन कभी नहीं करते थे। उनके मुख से कभी कोई ऐसा शब्द नहीं सुना कि जिससे कोई आहत हुआ हो। पटकनी खा कर छटपटाने वाला भी दिल से उनका मुरीद ही हुआ। 

हो गई अधिकृत घोषणा... नहीं रहे अटल। उनके घर पर शव के अंतिम दर्शन का तांता लगा है। अब विनम्र श्रद्धांजलि देने के सिवा अपने वश में और है ही क्या! यह सत्य है कि मृत्यु अटल है लेकिन यह भी सत्य है कि अटल जी अमर हैं। जैसे इंकलाब जिंदाबाद वैसे अटल जी जिंदाबाद।

विनम्र श्रद्धांजलि

8.8.18

फेसबुक में पुस्तक चर्चा-4(श्री गंगा शरण सिंह)

कुछ मित्रों के आग्रह पर पढ़ी हुई किताबों की इस सूची पर अरसे से काम जारी था। लगभग पच्चीस वर्षों की पाठकीय यात्रा को एक जगह सहेजना थोड़ा सा कठिन था, नामुमकिन नहीं। पुस्तकों के नाम स्मृतियों के हिसाब से साझा किए गए हैं। कृपया इन्हें किसी गुणवत्ता क्रम के आधार पर न लिया जाय। यहाँ तक कि मूल हिन्दी और अनूदित किताबें एक साथ ही शामिल हैं। अमृता प्रीतम और प्रेमचंद को जान बूझकर इस सूची से बाहर रखा है, क्योंकि उनकी प्रिय रचनाओं की संख्या बहुत बहुत ज्यादा है।

कृपया ये भी ध्यान रखा जाय कि यह मात्र उन पुस्तकों के नाम हैं जो हमारी सीमित बुद्धि तक पहुँच सकीं और आज तक स्मृतियों में सुरक्षित हैं।

Manish Vaidya जी, आपने उस दिन मेरी लिस्ट की बात की थी तो लीजिये आज उपन्यास विधा की पहली किस्त हाज़िर है☺

प्रतिभा राय : द्रौपदी, अरण्य

शिवाजी सावंत : मृत्युंजय, छावा

वी.एस. खाण्डेकर : ययाति

विश्वास पाटिल : पानीपत, महानायक

रणजीत देसाई : स्वामी, श्रीमान योगी

ओम शिवराज- धर्म विजय

निर्मल वर्मा : वे दिन, अंतिम अरण्य

धर्मवीर भारती- सूरज का सातवाँ घोड़ा

शानी : काला जल

अमृतलाल नागर : नाच्यो बहुत गोपाल, मानस का हंस, खंजन नयन, बूँद और समुद्र, पीढ़ियाँ

रामदरश मिश्र : जल टूटता हुआ

फणीश्वरनाथ रेणु : मैला आँचल , परती परिकथा, जुलूस

हजारी प्रसाद द्विवेदी: बाणभट्ट की आत्मकथा, पुनर्नवा, चारु चंद्र लेख

जगदीश चंद्र - आधा पुल, कभी न छोड़ें खेत

हिमांशु जोशी : छाया मत छूना मन , कगार की आग, अरण्य, महासागर

संजीव : सूत्रधार, सर्कस, पाँव तले की दूब,फाँस

शिव प्रसाद सिंह : नीला चाँद, गली आगे मुड़ती है, अलग अलग वैतरणी

आचार्य चतुरसेन : सोमनाथ, वैशाली की नगरवधू, वयं रक्षामः

विमल मित्र: मुजरिम हाज़िर, साहब बीबी गुलाम, बेगम मेरी विश्वास, खरीदी कौड़ियों के मोल

आशापूर्णा देवी : प्रथम प्रतिश्रुति, सुवर्णलता, बकुल कथा, प्रारब्ध, न जाने कहाँ कहाँ, अविनश्वर

पद्मा सचदेव- अब न बनेगी देहरी

अखिलन- चित्रप्रिया

उग्र- जीजी जी

हरिशंकर परसाई- रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज

चंद्रकांता- अपने अपने कोणार्क

ऊषा प्रियंवदा : पचपन खंभे लाल दीवारें

तकषि शिवशंकर पिल्लै : मछुआरे

पन्नालाल पटेल : जीवन एक नाटक, जीवी

केशुभाई देसाई - मैडम , धर्मयुद्ध

दिनकर जोशी- श्याम तुम एक बार फिर आ जाते

कुर्तुल ऐन हैदर- निशान्त के सहयात्री

इंतज़ार हुसैन: बस्ती

चित्रा मुद्गल : आँवा

मन्नू भंडारी- आपका बंटी, महाभोज

राही मासूम रज़ा: ओस की बूँद, नीम का पेड़

भीष्म साहनी : तमस

भगवती चरण वर्मा- चित्रलेखा, सबहिं नचावत राम गोसाई, सामर्थ्य और सीमा, भूले बिसरे चित्र

केशव प्रसाद मिश्र- कोहबर की शर्त

यशपाल : झूठा सच, तेरी मेरी उसकी बात, दिव्या

एक इंच मुस्कान- राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी

मैत्रेयी पुष्पा : इदन्नमम

मृदुला गर्ग : अनित्य

सुरेन्द्र वर्मा : मुझे चाँद चाहिये

शिवमूर्ति- तर्पण

स्वयं प्रकाश: बीच में विनय

कामतानाथ: पिघलेगी बर्फ़

भैरवप्रसाद गुप्त: गंगा मैया

कमलेश्वर : समुद्र में खोया हुआ आदमी, कितने पाकिस्तान

मिथिलेश्वर : सुरंग में सुबह, प्रेम न बाड़ी ऊपजै, युद्धस्थल

हृदयेश: शब्द भी हत्या करते हैं, चार दरवेश

वीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य : मृत्युंजय, पाखी घोड़ा

गोपीनाथ मोहंती: माटी मटाल, परजा

के.शिवराम कारंत: मूकज्जी

विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय: चंद्र पहाड़

कृष्णा सोबती : समय सरगम

गोविन्द मिश्र : पाँच आंगनों वाला घर

अज्ञेय : नदी के द्वीप, शेखर एक जीवनी, अपने अपने अजनबी

राजेन्द्र यादव : सारा आकाश

रांगेय राघव : कब तक पुकारूँ,
आग की प्यास

वीरेंद्र जैन: डूब

भीमसेन त्यागी: जमीन

जयनन्दन : श्रम एव जयते

नागार्जुन- बाबा बटेसरनाथ, बलचनमा, वरुण के बेटे,

अब्दुल बिस्मिल्लाह- झीनी झीनी बीनी चदरिया, समर शेष है

पंकज विष्ट- उस चिड़िया का नाम

सुभाष पंत: सुबह का भूला

वेद राही- अंधी सुरंग

राजेन्द्र सिंह बेदी: एक चादर मैली सी

मोहन राकेश: अंधेरे बंद कमरे

नरेन्द्र कोहली : न भूतो न भविष्यति, राम कथा, साथ सहा गया दुख, क्षमा करना जिज्जी

ताराशंकर बंद्योपाध्याय: गणदेवता, हँसली बाँक की उपकथा

चाणक्य सेन : मुख्यमंत्री, ये दिन वे दिन

महाश्वेता देवी : जंगल के दावेदार, हजार चौरासी की माँ

सूर्यबाला- मेरे संधिपत्र, दीक्षान्त, अग्निपंखी, सुबह के इंतज़ार तक

संजना कौल : पाषाण युग

दौड़- ममता कालिया

रस कपूर- आनंद शर्मा

भगवान चंद्र घोष : कर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

यू आर अनंतमूर्ति : संस्कार

कोई तो- विष्णु प्रभाकर

श्रीलाल शुक्ल : विश्रामपुर का संत, राग दरबारी

अमरकांत : इन्हीं हथियारों से, सुन्नर पाण्डे की पतोह

वृंदावनलाल वर्मा : गढ़कुण्डार

उषाकिरण खान : भामती

ज्ञानप्रकाश विवेक : गली नम्बर तेरह, चाय का दूसरा कप, डरी हुई लड़की, आखेट , तलघर

अशोक भौमिक :
मोनालिसा हँस रही थी
शिप्रा एक नदी का नाम है

श्रीनरेश मेहता-
यह पथ बन्धु था , उत्तर कथा, प्रथम फाल्गुन

शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' : बहती गंगा

गुरदयाल सिंह : मढ़ी का दीवा,
परसा

भैरप्पा: गोधूलि, पर्व

जसबीर भुल्लर: मुहूर्त

जीतेन्द्र भाटिया: प्रत्यक्षदर्शी

मधु काँकरिया ,: सूखते चिनार,
हम यहाँ थे

कमलाकांत त्रिपाठी : पाही घर,
बेदखल

पहाड़- निलय उपाध्याय

काले कोस- प्रमोद त्रिवेदी

विनोद कुमार श्रीवास्तव : वजह बेगानगी नहीं मालूम

काशीनाथ सिंह: रेहन पर रग्घू

धीरेन्द्र अस्थाना: देश निकाला

ऋता शुक्ल: अग्निपर्व

प्रियंवद : वे वहाँ क़ैद हैं,
धर्मस्थल

भालचन्द्र जोशी: प्रार्थना में पहाड़

और ये कुछ किताबें उन नए रचनाकारों की जिन्होंने पिछले पौने दशक में अपना स्थान बनाया है।

रणेन्द्र: ग्लोबल गाँव के देवता

संजय कुन्दन : टूटने के बाद

पी.अशोक कुमार: जिगरी

रत्नेश्वर सिंह: रेखना मेरी जान

सत्यनारायण पटेल: गाँव भीतर गाँव

मुकेश दुबे: अन्नदाता

रेत - भगवानदास मोरवाल

डार्क हॉर्स - नीलोत्पल मृणाल

लाल लकीर - हृदयेश जोशी

अकाल में उत्सव- पंकज सुबीर

प्रज्ञा: तक्सीम

उपन्यासों के बाद कहानी संग्रहों की सूची हाज़िर हैं। कहानियों के साथ बड़ा घालमेल होता है। किसी लेखक के दस कहानी संग्रह खरीदें तो उनमें से चार पाँच कहानियाँ हर संग्रह में मौजूद रहती हैं। इस दोहराव की समस्या से बहुत कम लेखक बच पाते हैं।
धर्मवीर भारती : बंद गली का आख़िरी मकान
हृदयेश : जीवन राग
विष्णु प्रभाकर : धरती अब भी घूम रही है
शिवप्रसाद सिंह: सुनो परीक्षित सुनो
संजीव : सागर सीमांत
निर्मल वर्मा : परिन्दे, कव्वे और काला पानी
ऊषा प्रियंवदा: ज़िन्दगी और गुलाब के फूल, कितना बड़ा झूठ
नासिरा शर्मा : गूँगा आसमान
कृष्णा सोबती: बादलों के घेरे
अखिलेश : शापग्रस्त, आदमी नहीं टूटता
मन्नू भण्डारी : यही सच है
मिथिलेश्वर : चल खुसरो घर आपने
कमलेश्वर : खोई हुई दिशाएँ, राजा निरबंसिया, माँस का दरिया
पन्नालाल पटेल : गूँगे सुर बाँसुरी के
विजयदान देथा : छब्बीस कहानियाँ, त्रिकोण, त्रिवेणी
नरेन्द्र कोहली: मेरा साथी कोई नहीं
भीष्म साहनी : चीलें
अज्ञेय: जयदोल, आदम की डायरी
श्रीनरेश मेहता: जलसाघर
शिवानी: भैरवी, चल खुसरो घर आपने, चिरस्वयंवरा
उदय प्रकाश: तिरिछ, दरियाई घोड़ा, वॉरेन हेस्टिंग्स का सांड, मोहनदास, पीली छतरी वाली लड़की, और अंत में प्रार्थना, दत्तात्रेय के दुख,
अशोक भौमिक : आइस पाइस
ज्ञान प्रकाश विवेक : मुसाफ़िर खाना, सेवानगर कहाँ है, शिकारगाह
राजेन्द्र श्रीवास्तव : कोई तकलीफ़ नहीं
भालचन्द्र जोशी : पालवा, पहाड़ों पर रात, हत्या की पावन इच्छाएँ
मनीष वैद्य : टुकड़े टुकड़े धूप, फुगाटी का जूता
विद्यासागर नौटियाल : मेरी कथा यात्रा
शेखर जोशी : डांगरी वाले,
मालती जोशी : स्नेहबन्ध, दर्द का रिश्ता, विश्वासगाथा, न ज़मीं अपनी न फ़लक़ अपना, परख
सूर्यबाला : एक टुकड़ा कस्तूरी, गौरा गुनवंती
सुधा अरोड़ा : काँसे का गिलास, रहोगी तुम वही, अन्नपूर्णा मंडल की आख़िरी चिट्ठी
उषा भटनागर : ये दिन वे दिन, बरगद की छाँव में
इंदिरा गोस्वामी : लाल नदी
रामकुमार सिंह: भोभर और अन्य कहानियाँ
मोहन राकेश : बिना हाड़ माँस का आदमी
अनिल यादव : क्योंकि नगरवधुएँ अखबार नहीं पढ़तीं
जयंत पवार : फ़ीनिक्स की राख से उगा मोर
ओमा शर्मा : कारोबार
अवधेश प्रीत : कोहरे में कंदील
शिवमूर्ति : केशर कस्तूरी
पंकज सुबीर : चोपड़े की चुड़ैलें, कसाब.गाँधी@यरवदा.इन
सत्यनारायण पटेल: लाल छीट वाली लूगड़ी का सपना
गौतम राजऋषि : हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज़
वन्दना गुप्ता: बुरी औरत हूँ मैं
वन्दना अवस्थी दुबे : बातों वाली गली
डॉ फ़तेह सिंह भाटी : पसरती ठण्ड
राजकमल से आने वाली प्रतिनिधि कहानियों और नेशनल बुक ट्रस्ट की संकलित कहानियों की श्रृंखला बहुत उपयोगी है। जो नए पाठक मित्र अपने प्रिय लेखकों की चुनिंदा कहानियाँ पढ़ना चाहें वे इन श्रृंखलाओं से लाभान्वित हो सकते हैं।

आत्म कथ्य, डायरी, संस्मरण आदि विधाएँ पाठकों में बेहद लोकप्रिय हैं। अपने प्रिय लेखकों के जीवन और उनके व्यक्तित्व को समझने के इच्छुक पाठक इन विधाओं की किताबों को बड़े चाव से पढ़ते हैं।
आज प्रस्तुत है आत्मकथा / आत्मकथ्य / और डायरी विधा की चंद किताबों के नाम। संस्मरणात्मक आख्यानों की खेप अगली बार....
उग्र : अपनी खबर
मन्नू भंडारी : एक कहानी यह भी
ओम प्रकाश वाल्मीकि : जूठन
अजित कौर : खानाबदोश
कुंदनिका कपाड़िया : दीवारों के पार आकाश
भीष्म साहनी : आज के अतीत
स्वदेश दीपक : मैंने माण्डू नहीं देखा
पद्मा सचदेव : बूँद बावड़ी
अमृता प्रीतम : रसीदी टिकट
मिथिलेश्वर : पानी बीच मीन पियासी, कहाँ तक कहें युगों की बात, जाग चेत कछु करौ उपायी
मोहनलाल भास्कर : मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था
कलाम साहब : अग्नि की उड़ान
बच्चन जी : दशद्वार से सोपान तक, क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर
मुक्तिबोध : एक साहित्यिक की डायरी
अखिलेश : वह जो यथार्थ था
कर्तार सिंह दुग्गल : किस पहिं खोलऊँ गंठड़ी
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : अस्ति और भवति
अमृतलाल नागर : टुकड़े टुकड़े दास्तान
निदा नवाज़ : सिसकियाँ लेता स्वर्ग
शचीन्द्रनाथ सान्याल : बन्दी जीवन
भगवतीचरण वर्मा : धुप्पल
यशपाल : सिंहावलोकन
निर्मला जैन : जमाने में हम
तुलसीराम : मुर्दहिया, मणिकर्णिका
लालबहादुर वर्मा : जीवन प्रवाह में बहते हुए
कमलेश्वर : जो मैंने जिया, यादों के चिराग, जलती हुई नदी
गुरदयाल सिंह : क्या जानूँ मैं कौन
धीरेन्द्र अस्थाना : ज़िन्दगी का क्या किया
राम विलास शर्मा : अपनी धरती अपने लोग
मुनव्वर राना : मीर आके लौट गया
सुषम बेदी : आरोह अवरोह
किशोर साहू : मेरी आत्मकथा
नरेन्द्र कोहली : आत्मस्वीकृति
लक्ष्मण माने : पराया
रवि बाबू : मेरी आत्मकथा
रमणिका गुप्ता- हादसे, आपहुदरी
मंटो: मीनाबाजार
इस्मत चुगताई: कागज़ी है पैरहन
खुशवंत सिंह : सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत
प्रभा खेतान: अन्या से अनन्या
राजेन्द्र यादव : मुड़ मुड़ के देखता हूँ
मैत्रेयी पुष्पा: कस्तूरी कुंडल बसे
कौशल्या बैसन्त्री: दोहरा अभिशाप
............................

स्मृति आख्यान या संस्मरण प्रिय गद्य विधाएँ हैं। इस विधा की पुस्तकों की खोज बरसों से जारी है और इस पागलपन के परिणामस्वरूप जिन पुस्तकों से जान पहचान हुई , ये चौथी क़िस्त उन्हीं पर आधारित है

अशोक भौमिक : जीवनपुरहाट जंक्शन
ज्ञान प्रकाश विवेक : कम आवाज़ों का शहर
अमृतलाल नागर : जिनके साथ जिया
विमल मित्र : बिछड़े सभी बारी बारी
हरिशंकर परसाई : जाने पहचाने लोग
कमलेश्वर : अपनी निगाह में
विष्णु प्रभाकर : समांतर रेखाएँ, मेरे संस्मरण
शिवाजी सावंत: ऐसे लोग ऐसी बातें
देवेन मेवाड़ी: मेरी यादों का पहाड़
महादेवी वर्मा : पथ के साथी, मेरा भाई, काल के हस्ताक्षर, चरैवेति, मरण सागर पारे, स्मृति की रेखाएँ, सुनहुँ तात यह अकथ कहानी
शेखर जोशी: स्मृति में रहे वे
हृदयेश: स्मृतियों के साक्ष्य
अमृता प्रीतम : उनके हस्ताक्षर, एक थी सारा, काया के दामन में
निर्मल वर्मा : सर्जना पथ के सहयात्री
स्वयं प्रकाश : हमसफ़र नामा
निदा फ़ाज़ली : तमाशा मेरे आगे, चेहरे
आलोक भट्टाचार्य : पथ के दीप
विश्वनाथ त्रिपाठी : गंगा स्नान करने चलोगे, व्योमकेश दरवेश, गुरुजी की खेती बारी
काशीनाथ सिंह : घर का जोगी जोगड़ा, याद हो के न याद हो
विश्वनाथ मुखर्जी : बना रहे बनारस
शिव वर्मा : संस्मृतियाँ
धर्मवीर भारती : कुछ चेहरे कुछ चिंतन
पुष्पा भारती : यादें यादें और यादें
पंकज बिष्ट : शब्दों के लोग
पद्मा सचदेव : इन बिन, बारहदरी
गुलज़ार : पिछले पन्ने
कन्हैया लाल नंदन : कहना ज़रूरी था, मैं था और मेरा आकाश
प्रयाग शुक्ल : स्मृतियाँ बहुतेरी
विश्वनाथ त्रिपाठी: नंगातलाई का गाँव
चित्रा मुद्गल : अपरिहार्य कुछ
कुसुम खेमानी : कुछ रेत, कुछ सीपियाँ...
भगवानदास मोरवाल : पकी जेठ का गुलमोहर

5.8.18

चिड़िया

तिनका-तिनका बटोरकर
एक अच्छा सा घंरोदा बनाने का खयाल
हर चिड़िया करती है

आँधियों में पंख फैलाकर
सूरज को
चोंच में दबा लेना चाहती है

उषा की पहली किरण
उसे उत्साहित करती है तो
दोपहर की चमक
संवेदनशील

मेरे आंगन से
अपना महल उठाते हुए
बच्चों के सुख की चिंता होती है

सुबह के गीत गाती है,
ओस में नहाती है,
धूप में कपड़े निचोड़कर
बच्चों से ठिठोली करती है

दिन ढले
अपने आप से सशंकित,
घर लौटना चाहती है

चोंच से फिसलकर
पीला सूरज
समुद्र में डूबने लगता है
उस वक़्त वह
बहुत चीखती है

रोज एक सूरज उगता,
एक डूब जाता है
सुबह शाम का यह अंतराल
उसके संघर्ष की कहानी कहता है

सूरज को चोंच में दबाने का खयाल
वह नहीं छो़ड़ पाती
अंधेरे में चोंच गड़ाना
उसे पसंद नहीं।
..................

फेसबुक में पुस्तक चर्चा-3

Nivedita Srivastava
1 hr
पसन्दीदा किताबों की बात चल रही है ... और सच बोलूँ तो आजतक कोई किताब मुझे ऐसी मिली ही नहीं जिसको मैं एकदम ही नापसन्द कर सकी होऊं । हर किताब ,या कह लूँ कि हर अक्षर ही मुझे कुछ न कुछ सिखा गया है - कभी दुलरा कर तो कभी धमका कर 😊
जिन लेखकों को ज्यादा पढ़ा है वो हैं सर्व श्री अमृतलाल नागरजी ,बच्चनजी ,अमृताप्रीतम ,शिवानी ,शरतचन्द्र ,बंकिमचन्द्र ,रविन्द्र नाथ टैगोर ,नरेंद्र कोहली ,देवकीनंदन खत्री ,इस्मत चुगताई ,कमला दास ,शौकत थानवी ,मनोहर श्याम जोशी ,भगवतीचरण वर्मा ,राजकृष्ण मिश्र ..... 
सब को सिर्फ पढा ही नहीं ,मन में कुछ न कुछ गढ़ा भी है ... 🙏
स्त्री चरित्र का सबसे अच्छा निरूपण अमृतलाल नागर जी के उपन्यास "सुहाग के नूपुर" में मिला था । परन्तु वो चित्रण या विश्लेषण मानवीय अधिक लगा ,जो सहज भाव से बह निकला था । 
जब #भगवतीचरण #वर्मा जी का उपन्यास "रेखा" पढ़ा तब समझ मे आया कि किसी पात्र का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कैसे किया जाता है और दिल से उस लेखनी को नमन किया कि लेखन में सम्वेदनशीलता कैसे बरकरार रखी जा सकती है । रेखा अपने गुरु प्रभाशंकर , जिनके निर्देशन में थीसिस लिख रही होती है ,से विवाह कर लेती है । वय का ,परिपक्वता का ,परिवेश का अंतर वैवाहिक जीवन मे कितने विकार ला सकता है और इस विकार का अंत कितना पीड़ादायक हो सकता है , ये इसमें बेहद शालीन रूप से वर्णित है । रेखा की जिस सोच से एक पल को वितृष्णा होती है अगले ही पल वो उस की विवशता दिखा सहज कर जाती है । प्रभाशंकर के अपनी इतनी कम उम्र की शिष्या से विवाह जहाँ एक रोष जगाता है ,वहीं एक सामान्य मानवीय प्रकृति भी लगती है । मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से पढ़ें चाहे सिर्फ पढ़ने के लिये ही पढ़ें ,भगवतीचरण जी की लेखनी अपना लोहा मनवा ही लेती है ।
दूसरी किताब #राजकृष्ण #मिश्र जी की है "दारुलशफा" .... इस को पढ़ते हुए राजनीति के विविध दुरूह दाँव - पेच दिखते हैं । दलबदलू सदस्य हों या सदस्य विरोध न कर पाएं इसलिए उनको रास्ते से हटाना हो ,या अंतिम पल में सियासती लाभ के लिये बदलते चेहरे ... सब एकदम सजीव वर्णन लगता है । इन सभी घटनाओं की सहज स्वीकार्यता ही लेखक की सफलता है ।
दोनों ही किताबें एकदम अलग मूड की हैं ,पर पढ़ने के बाद ठगे गए कि अनुभूति नहीं होती ,अपितु ठगे रह गए लगता है !
आज के लिये मैं जिनको टैग करने जा रही हूँ ,जानती हूँ उनके पास समय का अभाव रहता है ,पर उनकी पसंद को पढ़ना जानना अपनेआप में किसी पुरस्कार से कम नहीं होगा ... इसलिए आज मैं उनको ही टैग करूँगी बेशक जब भी फुर्सत पाएं तब वो लिखें ... इतनी बातों से ये अंदाजा तो हो ही गया होगा कि इतने अधिकार से और धमका के मैं किसको बुलाऊंगी ... जी हाँ आइये सलिल वर्मा भइया 🙏


बचपन से ही पुस्तकों से गहरा नाता रहा है। शुरुआत हुई चंदामामा, मधु मुस्कान, चम्पक, नंदन, पराग आदि से। बचपन के उपहार थे पंचतंत्र की कहानियाँ और नैतिक शिक्षा की कहानियाँ। ये पुस्तक पाकर बाल मन रमता गया इन किताबों की अनोखी दुनिया में। इसके बाद रामचरित मानस, श्रीमद्भगवद्गीता, सरिता, गृहशोभा, सहेली जैसी पुस्तकों ने जीवन को राह दी। 
उसके बाद सिलसिला मुंशी प्रेमचंद, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र, बंकिमचंद्र,हजारी प्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती जैसे अपने समय के ख्यातिमान साहित्यकारों से उनकी कृतियों द्वारा पहचान हुई और अपनापन बढ़ता ही गया। यूँ कहूँ कि मेरे लिए एक सच्ची सखा हैं पुस्तकें।

पुस्तकों से पहचान और जानकारी की अनूठी श्रृंखला में जब @ वाणी जी, Sangita Asthanaसंगीता अस्थाना दी, वंदना अवस्थी दुबेवंदना दी, Sadhana Vaidसाधना दी ने मुझे आवाज़ दी तो याद आए मुंशी प्रेमचंद और उनका उपन्यास "गोदान,"
यूँ तो मुंशी प्रेमचंद की प्रत्येक रचना जन-जीवन का आईना है, परन्तु मुझे उनमे से सबसे अधिक प्रिय है ‘गोदान’.... गोदान हिंदी साहित्य की एक अमूल्य निधि है। वर्षों पुराना होने के बावजूद इस उपन्यास की मौजूदा समय में भी अपनी अद्भुत प्रासंगिकता के साथ महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसे पढ़ते हुए महसूस होता है मानो हमारी अपनी ही या हमारे आसपास घटित घटना हो।
गोदान को प्रेमचन्द का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास के साथ - साथ सर्वोत्तम कृति भी माना जाता है। इसका प्रकाशन १९३६ ई० में हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई द्वारा किया गया था।
भारतीय ग्राम्य समाज एवं परिवेश के सजीव चित्रण के अतिरिक्त नगरों के समाज और उनकी समस्याओं का उन्होंने बहुत मार्मिक चित्रण किया है। प्रेमचंद के लेखन में शहरी, कस्बाई और ठेठ देहाती जीवन के सजीव हो उठता है। 
कहानी होरी और धनिया नामक एक कृषि दम्पति के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती हैं। किसी भी ग्रामीण की भाँति होरी की भी हार्दिक अभिलाषा है, कि उसके पास भी एक पालतू गाय हो और वह गौमाता की सेवा करे। इसके लिए किये गए होरी के प्रयासों से आरम्भ होकर यह कहानी कई सामजिक कुरीतियों पर कुठाराघात करती हुई आगे बढ़ती है। गोदान ज़मींदारों और स्थानीय साहूकारों के हाथों गरीब किसानो का शोषण और उनके अत्याचार की सजीव व्याख्या है। भारतीय जन-जीवन का खूबसूरत चित्रण, समाज के विभिन्न वर्गों की समस्याओं के प्रति लेखक का प्रगतिशील दृष्टिकोण एवं किसानों की दयनीय अवस्था का ऐसा मार्मिक वर्णन पढ़ना ही अपने आप में एक अनूठा अनुभव है । इसी के साथ ही शहरीकरण और नवीन शिक्षित वर्ग की एक कथा इस ग्रामीण कथा के साथ चलती है। कहानी में शहरी युवा नायकों के मनोभाव और अपने उत्तरदायित्वों के प्रति कर्तव्यबोध होने तक की उनकी यात्रा दर्शायी गयी है। कहानी का अंत दुखद है और पाठकों के मन में कई सवाल छोड़ जाता है।

गोदान ना सिर्फ एक उम्दा एवं संवेदनशील कहानी पढ़ने के शौक के रूप में पढ़ी जा सकती है अपितु दूसरी ओर इसमें विकसित की गयी विचारधाराएं, नीतियाँ एवं आदर्श भी स्वतः ही मन पर गहरी छाप छोड़ने में सक्षम है । 
किसानों की जो दशा उस ब्रिटिश काल में थी आज विकास के इतने वर्षों बाद भी हमारे कृषिप्रधान देश का अन्नदाता उन्ही समस्याओं से जूझ रहा है ......! आज भी महाराष्ट्र, बुंदेलखंड , आँध्रप्रदेश के किसानो के पास आत्महत्या ही अंतिम विकल्प क्यों है ......?
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पुस्तक श्रृंखला- तीसरा दिन।
आज चर्चा करूंगी बलवंत सिंह के उपन्यास "चक पीरां का जस्सा" और कृष्णचन्दर के "दादर पुल के बच्चे" की।
बलवंत सिंह हिंदी-उर्दू के महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक हैं। चक पीरां का जस्सा 1977 में प्रकाशित हुआ, और बलवंत सिंह के श्रेष्ठ उपन्यासों में गिना गया। उपन्यास साढ़े चार सौ पृष्ठों का है इसमें बारह अध्याय हैं।उपन्यास का हर अध्याय पंजाब के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि वारिस शाह की हीर के उद्धरण से शुरू होता है।
’चक्का पीरां का जस्सा‘ उपन्यास में बलवंत सिंह की कथाशैली अपने सबसे प्रभावी रूप में व्यक्त हुई है। उपन्यास की कथा पंजाब की पृष्ठभूमि पर ही है– पंजाब के गांवों के धाकड़ व बलशाली जाटों का अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन, लेकिन बलवंत सिंह साधारण लगने वाली कथा को भी अपनी कथाशैली द्वारा चमत्कारिक रूप से आकर्षक बना कर प्रस्तुत करते हैं, जो इस उपन्यास में भी हुआ है।
उपन्यास में चाचे -भतीजे के परस्पर प्रेम व घृणा तथा भतीजे जस्से की अपनी प्रेमकथा को बयान किया गया हैं।
’चक्क पीरां का जस्सा‘ की कथा में गज़ब प्रवाह हैं। पूरे उपन्यास में शहर का कोई चित्र नहीं, सिर्फ़ ज़िक्र है। उपन्यास में ग्रामीण परिवेश का ही चित्रण है। 80-85 साल पहले गांवों में विधवा विवाह करवाना एक बड़े सामाजिक मूल्य को स्थापित करना है, जो उन सामंतवादी मूल्यों को चकनाचूर करता है, जो स्त्री को केवल चारदीवारी में बंद देखना चाहते है।
कुल मिलाकर ’चक्क पीरां का जस्सा‘ उपन्यास में बलवंत सिंह अपनी रोमांटिक उपन्यासों की परंपरा का श्रेष्ठ रूप व्यक्त करने में सफल हुए हैं। 
दूसरा उपन्यास है, कृष्णचन्दर का दादर पुल के बच्चे। छोटा सा उपन्यास है, लेकिन बहुत बड़ा ज़िक्र है। इस उपन्यास में दादर पुल पर भीख मांगने वाले बच्चों की कथा है। उपन्यास में मुम्बई में भिखारियों के गिरोह का वर्णन है । वे किस तरह बच्चों को पकड़ते हैं और उनसे भीख मंगवाते हैं । उपन्यास में फंतासी है कि भगवान खुद एक बच्चा बन कर मुम्बई आते हैं और लेखक जो कि एक बच्चा है उसके दोस्त बन जाते हैं । फिर दोनो मिलकर बच्चों से भीख माँगने का धन्धा करवाने वाले गिरोह का पता लगाते हैं लेकिन दोनो ही पकड़े जाते हैं और जब उन्हे पता चलता है कि एक को लंगड़ा और दूसरे को अन्धा बनाकर भीख माँगने के लिये तैयार किया जा रहा है , वे वहाँ से निकलते हैं । बच्चा तो भाग निकलता है लेकिन भगवान पकड़े जाते हैं । उपन्यास का अंत लेखक के इस वाक्य से होता है.. “ एक दिन मैने देखा कि भगवान अन्धे बच्चे के रूप में दादर पुल पर भीख माँग रहे हैं । इतना शानदार अंत बहुत कम पढ़ा-देखा। 
दोनों उपन्यास हिंदी साहित्य में अपना ऊंचा स्थान रखते हैं, कहीं मिलें, तो ज़रूर पढ़ें। कड़ी को आगे बढाने के लिए मैं RN Sharma और Sandhya Sharma को नामांकित करती हूँ।
इमरान अंसारी
3 hrs
फेसबुक पर इधर कुछ पोस्टों में साहित्यिक किताबों के बारे में पढ़ने को मिला। इसी क्रम में श्रीमती #Sandhya Sharma जी ने मुझे भी इस श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिए टैग किया है, जिसके लिए मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ।
यूँ तो किताबों का बहुत शौक है या यूं कहें कि रसिया हूँ। 9 कक्षा से जब कहानी, उपन्यास पढ़ने शुरू किए तो वो सिलसिला अब तक जारी है और आगे भी जारी रहेगा। इस वक्फे में बेशुमार किताबें पढ़ी हैं, कई ने बहुत मुतासिर किया, इस छोटी सी पोस्ट में सबका ज़िक्र मुमकिन भी नहीं। कुछ लेखक, जिनकी लेखनी का अंदाज़ मुझे बहुत पसंद है उनके नाम हैं- मुंशी प्रेमचंद, कृश्न चन्दर, इस्मत चुगतई, राही मासूम रज़ा, मनोहर श्याम जोशी, सुरेंद्र मोहन पाठक, श्रीलाल शुक्ल, उदय प्रकाश आदि। ख्याल रहे इसमें शायरों को शामिल नही किया है, वो लिस्ट भी बहुत लंबी है।
इतने लेखकों की बहुत सी किताबों का ज़िक्र यहां संभव नहीं, मुंशी जी को छोड़ा है क्योंकि उनकी तो हर कहानी, हर उपन्यास लाजवाब है। उसके अलावा जो दो किताबें मुझे बहुत पसंद हैं वो हैं #कसप और #राग_दरबारी 
दोनों ही किताबें #साहित्य_अकादमी से सम्मानित हैं।

#कसप उत्तरांचल की आंचलिकता को समेटे एक बेहतरीन प्रेमकथा है, जिसमें कई उतार-चढ़ाव हैं, उम्र के साथ बदलती मनोदशाएं, संवेदनाए और आकांक्षाओं को अपनी हास्य मिश्रित लेखनी से उकेरते हुए मनोहर श्याम जोशी ने गज़ब ढाया है। आप एक बार इसे शुरू करेंगे तो छोड़ने का मन नहीं करेगा।
दूसरी किताब #राग_दरबारी मुझे नहीं लगता किसी परिचय की मोहताज है। इससे बेहतर व्यंग्यात्मक उपन्यास दूसरा नहीं मिल सकता। उत्तर प्रदेश के एक गाँव की कहानी में पूरे देश के सिस्टम पर इतना तीखा और हास्यात्मक व्यंग्य आपको अंत तक इस किताब को पढ़ने को मजबूर करता है।
इसके अलावा ढेरों किताबें ज़िक्र के काबिल हैं- मसलन सुरेन्द्र मोहन पाठक, राही, इस्मत की कोई भी किताब किसी दर्जे दूसरी से कम नहीं। तो दोस्तों पढ़ते रहिए और यकीन मानिए कि 'किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं'

Devendra Kumar Pandey · 
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का मूल बंगाली भाषा में लिखा और सच्चिदानंद हीरानन्द वात्सायन अज्ञेय द्वारा अनूदित उपन्यास है। मेरे लिए दोनों नाम ही इतने भारी कि पढ़ने से पहले कई बार पुस्तक को हाथों में ले सहलाता रहा। पृष्ठ दर पृष्ठ रोचकता बढ़ती गई। लगभग 100 वर्षों पूर्व रचित इस उपन्यास की पृष्ठभूमि कोलकाता शहर के इर्द-गिर्द घूमती रहती है।
इस उपन्यास के मुख्य पात्र गोरा, विनय, सुचरिता,ललिता, परेश बाबू, पानू बाबू और मां आनंदमयी हैं। इन पात्रों के बीच अनवरत जारी बौद्धिक विमर्श के माध्यम से गुरुदेव ने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त ब्रह्म समाज और हिंदू समाज के बीच के द्वंद को और पूरे भारतवर्ष में व्याप्त धार्मिक और जातिगत अंतर्विरोधों को न केवल उकेरा है अपितु संपूर्ण भारतीय दर्शन क्या होना चाहिए की आधारशिला भी रखी है।
तत्कालीन शहरी बुद्धिजीवी ब्रह्म समाज और हिंदू समाज के द्वंद में उलझा हुआ था वहीं ग्रामीण समाज अपने छोटे-छोटे जातीय समूहों के रूढ़िगत आचार विचार में जकड़ा हुआ था। यह समाज बाल विवाह, विधवा प्रताड़ना, छुआछूत जैसी अनगिन बुराइयों से ग्रस्त था।
परेश बाबू और उनकी दो लड़कियां सुचरिता और ललिता ब्रह्म समाजी थे तो गोरा और विनय हिन्दू समाजी। पानू बाबू कट्टर ब्रह्म समाजी थे और परेश बाबू की बड़ी पुत्री सुचरिता से विवाह के आकांक्षी। गोरा हिंदू संस्कृति और समाज के लिए मर मिटने वाला तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष से प्रेम करने वाला था। विनय और ललिता आपस में प्रेम करते थे लेकिन हिंदू और ब्रह्म समाजी होने के कारण दोनों का किसी सामाजिक रीति रिवाज से विवाह संभव न था। सुचरिता ब्रह्म समाजी थी, पानु बाबू से विवाह के लिए सहमति भी दे चुकी थी लेकिन गोरा का हिंदू होते हुए भी भारत वर्ष से प्रेम उसे आकर्षित करता था। परेश बाबू ब्रह्म समाजी होते हुए भी सत्य के पक्षधर थे। गोरा और विनय के बीच गहरी मित्रता थी। गोरा की मां आनंदमयी विनय से पुत्रवत ने स्नेह रखती थी। एक ही घर में गोरा के पिता कट्टर हिंदू आचार विचार वाले, मां आनंदमयी स्वतंत्र विचारों वाली और गोरा भारतीय संस्कृति का रक्षक होने के कारण अलग-अलग कमरों में अपने अपने आचार विचार के साथ रहते थे।
इस उपन्यास में इन पात्रों के अलावा और भी कई पात्र हैं मगर पूरा उपन्यास इन्हीं मुख्य पात्रों के बीच घूमता रहता है। इन पात्रों के बीच होने वाले वाद विवाद के माध्यम से गुरुदेव ने तत्कालीन धर्म और जाति के समाज का जो चित्र खींचा है उसे पढ़कर यह सहज ही समझा जा सकता है कि भारतीय स्वतंत्रता का संघर्ष कितना कठिन रहा होगा!
उपन्यास के अंत में मुख्य पात्र गोरा को जब यह ज्ञान होता है कि न उसकी मां है, न बाप है, न देश है, न जाती है, न नाम, न गोत्र, न देवता। वह तो संपूर्ण नकार है! वह तो एक आयरिश बाप और गोरी मेम का पुत्र गोरा है तो उसके पैरों के तले से जमीन खिसक जाती है। उपन्यास की खासियत यही है कि इतना बड़ा वज्राघात होने पर भी वह टूटता नहीं है बल्कि सत्य जानकर अपने जीवन भर के द्वंद से मुक्त हो संपूर्ण भारत वर्ष से प्रेम करने का संकल्प लेता है। वह कहता है.. "आज मैं सारे भारतवर्ष का हूं। मेरे भीतर हिंदू, मुसलमान, ख्रिस्तान, किसी समाज के प्रति कोई विरोध नहीं है। इस भारतवर्ष में सबका अन्न मेरा अन्न है, सबकी जात मेरी जात है।" परेश बाबू के माध्यम से गुरुदेव कहते हैं.. "जब हम सत्य को पाते हैं तो वह अपने सारे अभाव और अपूर्णता के बावजूद हमारी आत्मा को तृप्त करता है, उसे झूठे उपकरणों से सजाने की इच्छा तक नहीं होती।"
कहना न होगा कि अपने इस उपन्यास के माध्यम से धर्म और जाति के नाम पर बटे गुलाम भारतीय समाज को एक करने के लिए नायाब बीज मंत्र दिया था जो आज भी प्रासंगिक और मनन करने योग्य है।