27.12.09

कमरे की खिड़कियाँ खुली रखना......


आज रविवार है, नववर्ष के पूर्व का अंतिम रविवार। सिगरेट के आखिरी कश सा प्यारा... अंतिम रविवार। मैं आज आप सभी को नववर्ष की बधाई देता हूँ। वर्ष दो हजार दस आप सभी के लिए मंगलमय हो। आप सभी ने मेरे पिछले रविवारीय पोस्ट "यह गहरी झील की नावें....." को सराहा, इसके लिए मैं सभी का शुक्रिया अदा करता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप सभी का स्नेह नववर्ष में भी मुझे मिलता रहेगा । प्रस्तुत है आज की पोस्ट:-


बधाई देने....


प्रथम मास के

प्रथम दिवस की

उषा किरण बन

मैं आउंगा बधाई देने नए वर्ष की

तुम अपने कमरे की खिड़कियाँ खुली रखना।



हौले से आ जाउंगा तुम्हारी खिड़कियों से

तुम्हारी उंनिदी पलकों को सहलाकर

चूमकर अधरों को

फैल जाउंगा तुम्हारे कानों तक

तुम अपनी बाहें फैलाकर मेरा एहसास करना

मैं धूप बन लिपट जाउंगा

तुम्हारे संपूर्ण अंग से

तुम देर तक पीते रहना मुझे

चाय की चुश्कियों में............


मैं आउंगा बधाई देने नए वर्ष की

तुम अपने कमरे की खिड़कियाँ खुली रखना।

20.12.09

ये गहरी झील की नावें .......


आज रविवार है, कविता पोस्ट करने का दिन। आलोचना के प्रस्ताव में आप सभी की प्रतिक्रिया बेहद रोचक रही। यह बात सच है कि बहुत से लोग मात्र कविता का आनंद लेते हैं, कविता की समीक्षा या आलोचना करना विद्वानों का काम है। यह बात भी समझ में आ गई कि मेरी तरह बहुत से कवि भावों की अभिव्यक्ति को ही सर्वोपरी मानते हैं भाषा-व्याकरण के विद्वान नहीं हैं लेकिन यह बात भी सत्य है कि अपने को कविता जैसी लगती है वैसी ही प्रतिक्रिया होनी चाहिए। हम एक दूसरे को उनकी त्रुटियाँ का ग्यान, स्वस्थ मन से कराते रहें तो मेरी समझ से सभी का भला होगा। यह भी जरूरी नहीं कि कमियाँ बताने वाला सही ही हो. वह, उस समय उसे जैसा लगता है, वैसा लिख रहा होता है, इसमें किसी को बुरा भी नहीं मानना चाहिए। बहरहाल मेरा एक उद्देश्य आप सभी से संवाद कायम करना भी था जिसमें मैं पूर्णतया सफल हूँ तथा आपकी प्रतिक्रियाओं से अति उत्साहित भी .

आज एक गीत पोस्ट करने का मन है। मैं एक बार 'नेपाल' के खूबसूरत पहाड़ी पर्यटन स्थल 'पोखरा' गया था। वहाँ की सुंदरता ने मुझे मोहित कर दिया। सभी का वर्णन करने लगूँ तो यह पोस्ट अधिक लम्बी हो जाएगी। वहाँ हरी-भरी पहाड़ियाँ तो हैं ही कंचनजंगा की खूबसूरत हिम-श्रृंखलाओं से घिरी इस पहाड़ी घाटी में तीन खूबसूरत झीलें भी हैं। बनारस की गंगा नदी में नाव चलाने वाले बनारसी ने जब वहाँ के 'फेवा ताल' में अपनी नैया चलाई तो मन में कुछ ऐसे भाव जगे कि गीतकार न होते हुए भी इस गीत ने जन्म ले लिया। प्रस्तुत है गीत...........



ये गहरी झील की नावें....



ये गहरी झील की नावें
नदी की धार क्या जानें !

रहती हैं ये पहरों में,
डरती हैं ये लहरों से।
उछलती हैं किनारों में,
थिरकती हैं हवाओं से।

जो आशिक हैं किनारों के
भला मझधार क्या जाने !

वो गिरना तुंग शिखरों से,
अज़ब का दौड़ मैदानी।
फ़ना होना समन्दर में,
गज़ब का प्रेम हैरानी।

ये ठहरे नीर की नावें
नदी का प्यार क्या जानें !

अगर है मौत रूकना तो,
बहना ही तो जीवन है।
यदि हों शूल भी पथ में,
चलना ही तो जीवन है।

जो डरते हैं खड़े हो कर
भला संसार क्या जाने !

ये गहरी झील की नावें
नदी की धार क्या जानें !

13.12.09

"दंश"

आज रविवार है कविता पोस्ट करने का दिन। आपकी प्रशंसा से अभिभूत हूँ। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि एक भी टिप्पणी आलोचनात्मक समीक्षा के रूप में सामने नहीं आई। यह संभव नहीं लगता कि मैने इतनी सारी कविताएँ पोस्ट कीं उनमें कहीं कोई त्रुटि न हो । भाषा की अग्यानता, टंकण संबधी त्रुटियाँ या वैचारिक मतभेद.... कुछ तो अवश्य होंगे। मात्र प्रशंसा के पीछे ब्लागर्स बंधुओं का यह भय भी हो सकता है कि यदि आलोचना करी तो फिर यह मेरे ब्लाग में नहीं आएगा या यह मेरी आलोचना शुरू कर देगा लेकिन मैं आप सभी को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि अपनी कमियाँ जानकर मेरा आपके प्रति स्नेह और भी बढ़ेगा। मैं गज़ल नहीं लिख पाता लेकिन आपकी प्रशंसा के कारण एक शेर अनायास जेहन में उतर गया-
यूँ तो चढ़ाइए ना चने की झाड़ पर
सर जमीन पर हो पैर आसमान पर
कहने का मतलब यह नहीं कि कल से मेरी निंदा करना शुरू कर दीजिए लेकिन यह अवश्य चाहता हूँ कि मेरी कमियाँ उजागर हों और मैं कुछ और सीख सकूं। इतिहास साक्षी है कि स्वस्थ आलोचना से कवि का सदैव भला ही हुआ है। यदि आपको मेरी बातें अच्छी न लगीं हों तो इसके लिए क्षमा चाहता हूँ ।
आपका ज्यादा समय नष्ट किया अतः कविता की भूमिका में न जाते हुए प्रस्तुत है आज की कविता जिसका शीर्षक है--

"दंश"
गली के मोड़ पर
उजा़ले में
कुतिया ने बच्चे दिए
जाड़े में

एक-दो नहीं पूरे सात
ठंड से बचाती रही वह उन्हें
पूरी रात
सबके सब सुंदर प्यारे थे
माँ की आँखों के तारे थे
सुबह तक एक खो चुका था
शायद अल्लाह का प्यारा हो चुका था

बचे छः
सह गयी वह
कष्ट दुःसह।

कोई पास से गुजरता तो गुर्राती
दिन भर यहाँ-वहाँ छुपाती
फिर आती हाड़ कंपा देने वाली काली रात
बच्चों को चिपकाती अपने स्तन से
सारी रात
उफ !
रात भर उसका रोना
मुश्किल था हमारा सोना

सुबह तक एक और खो चुका था
शायद किसी का हो चुका था

यमराज ले जाए या आदमी
बच्चे गुम हो रहे थे
कुतिया को गिनती नहीं आती
पर इतना जानती
कि बच्चे
कम हो रहे थे

कातर निगाहों से
उन्हीं से मदद की उम्मीद करती
जो अब
हल्की गुर्राहट से भी डरने लगे हैं
हाथों में डंड़ौकी ले
घरों से निकलने लगे हैं।

दिन गुजरते जाते हैं
एक-एक कर पिल्ले गुम होते जाते हैं।

एक दिन बर्तन माजने वाली बताती है-
कुतिया का सिर्फ एक पिल्ला बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा....!

मेरी पत्नी पूछती है-
पिल्ले को छोड़, तू बता
तेरा छोटू आज काम पर क्यों नहीं आया ?
वह बताती है-
उसका बाप उसे मुम्बई ले गया है
वहाँ एक बहुत बड़ा साहब रहता है
अब वह वहीं रहेगा
एक हैजा से मर गया
दूसरा अपने से भाग गया
यही बचा था
इसे भी इसका बाप ले गया
कहते-कहते उसकी आँखें डबडबा गईं।

मैने सुना
बर्तन मांजते-मांजते

बीच-बीच में बड़बड़ाती जाती है-

कुतिया का सिर्फ एक बच्चा बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा..!

मैने महसूस किया
एक वफादारी
दूसरे निर्धनता का दंश
झेल रहे हैं।

6.12.09

लिंग भेद


हमारे एक मित्र हैं यादव जी
बड़े दुःखी थे
पूछा तो बोले-
सुबह-सुबह मन हो गया कड़वा
बहू को लड़की हुई भैंस को 'पड़वा'।

मैने कहा-
अरे, यह तो पूरा मामला ही उलट गया
लगता है 'शनीचर' आपसे लिपट गया !
फिर बात बनाई
कोई बात नहीं
लड़का-लड़की एक समान होते हैं
समझो 'ल‌क्ष्मी' आई।

सुनते ही यादव जी तड़पकर बोले-
अंधेर है अंधेर !
लड़की को लक्ष्मी कहें
तो पड़वा को क्या कहेंगे ?
कुबेर !

पंडि जी-
झूठ कब तक समझाइयेगा
हकीकत कब बताइयेगा ?

आज जब कन्या का पिता
अपनी पुत्री के लिए वर ढूंढने निकलता है
तो
वर का घर "दुकान"
वर का पिता "दुकानदार"
वर "मंहगे सामान" होते हैं
कैसे कह दूँ कि लड़का-लड़की एक समान होते हैं।

आपने जीवन भर
लड़की को लक्ष्मी
लड़के को खर्चीला बताया
मगर जब भी
अपने घर का आर्थिक-चिट्ठा बनाया
पुत्री को दायित्व व पुत्र को
संपत्ति पक्ष में ही दिखाया।

मैने कहा-
ठीक कहते हैं यादव जी
पाने की हवश और खोने के भय ने
ऐसे समाज का निर्माण कर दिया है
जहाँ-

बेटे
'पपलू' बन आते हैं जीवन में
बेटियाँ
बेड़ियाँ बन जती हैं पाँव में
भैंस को मिल जाती है जाड़े की धूप
पड़वा ठिठुरता है दिन भर छाँव में।
इक्कीसवीं सदी का भारत आज भी
बहरा है शहर में
गूँगा है गाँव में।
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पड़वा- भैंस का नर बच्चा ।
पपलू- ताश के एक खेल का सबसे कीमती पत्ता.

29.11.09

चिड़िया

आज रविवार है। कविता पोस्ट करने का दिन। पिछली कविता नारी क्रंदन को जो स्नेह मिला इसके लिए मैं सभी का आभारी हूँ। आज जो कविता पोस्ट करने जा रहा हूँ वह इसके पूर्व हिन्द युग्म में प्रकाशित हो चुकी है । इसकी आलोचना भी हुई है लेकित मुझे इतनी प्रिय है कि इसे मैं अपने ब्लाग पर प्रकाशित करने का मोह नहीं छोड़ पा रहा हूँ। मुझे लगा कि बेचैन आत्मा के जन्म के बाद मुझे पाठकों का एक नया समूह मिला है जिन्हें यह कविता अवश्य पढ़ाई जानी जानी चाहिए। प्रस्तुत है कविता जिसका शीर्षक है-चिड़िया।
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चिड़ि़या उडी
उसके पीछे दूसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे तीसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे चौथी चिड़िया उड़ी
और देखते ही देखते पूरा गांव कौआ हो गया।

कौआ करे कांव-कांव ।
जाग गया पूरा गांव ।

जाग गया तो जान गया
जान गया तो मान गया
कि जो स्थिति कल थी वह आज नहीं है
अब चिड़िया पढ़-लिख चुकी हैं
किसी के आसरे की मोहताज नहीं है ।

अब आप नहीं कैद कर सकते इन्हें किसी पिंजडे़ में
ये सीख चुकी हैं उड़ने की कला
जान चुकी हैं तोड़ना रिश्तों के जाल
अब नहीं फंसा सकता इन्हें कोई बहेलिया
प्रेम के झूठे दाने फेंक कर
ये समझ चुकी हैं बहेलिये की हर इक चाल
कैद हैं तो सिर्फ इसलिये कि प्यार करती हैं तुमसे ।
तुम इसे
इनकी नादानी समझने की भूल मत करना ।
इन्हें बढ़ने दो,
इन्हें पढ़ने दो,
इन्हें उड़ने दो,
इन्हें जानने दो हर उस बात को जिन्हें जानने का इन्हें पूरा हक़ है ।

ये जानना चाहती हैं
कि क्यों समझा जाता है इन्हें 'पराया धन' ?
क्यों होती हैं ये पिता के घर में 'मेहमान' ?
क्यों करते हैं पिता 'कन्या दान' ?
क्यों अपने ही घर की दहलीज़ पर दस्तक के लिए
मांगी जाती है 'दहेज' ?
क्यों करते हैं लोग इन्हें अपनाने से 'परहेज' ?

इन्हें जानने दो हर उस बात को
जिन्हें जानने का इन्हे पूरा हक है ।

रोकना चाहते हो,
बांधना चाहते हो,
पाना चाहते हो,
कौओं की तरह चीखना नहीं,
चिड़ियों की तरह चहचहाना चाहते हो....
तो सिर्फ एक काम करो
इन्हें प्यार करो।
इतना प्यार करो कि ये जान जायँ
कि तुम इनसे प्यार करते हो !

फिर देखना...
तुम्हारा गांव, तुम्हारा घर, तुम्हारा आंगन,
खुशियों से चहचहा उठेगा।




22.11.09

नारी क्रंदन

आज रविवार है। कविता पोस्ट करने का दिन। पिछली कविता "आज वे...... " में जो स्नेह मिला उसके लिए मैं सभी का आभारी हूँ। विशेषकर उन टिप्पणियों का जो मेरी कविता के शब्द-शब्द को आत्मसात करने के पश्चात ह्रदय से बाहर आई हैं। विशेष रूप से दो टिप्पणियों की चर्चा करना चाहूँगा ....आदरणीय अपनत्व जी, आपने जिस एक वाक्य का समर्थन नहीं किया वह मैं बिना लिखे भी समझ सकता हूँ। जैसा आपने आगे लिखा ..कि सभी की अपनी-अपनी राय है.. यही बात सही है। अभिव्यक्ति के लिए मात्र बिंब का ही सहारा लिया गया है। श्री बृज मोहन श्रीवास्तव जी ने जिस प्रकार व्याख्यात्मक टिप्पणी करी है उसने भी मुझे रोमांचित किया है।

पिछली बार की गंभीर कविता के पश्चात इस बार मेरा मन एक हल्की-फुल्की कविता पोस्ट करने का हो रहा है। जब मैने "मेरी श्रीमती" पोस्ट की तो बहुत से पाठकों ने इस प्रकार संवेदना प्रकट किया मानों मैं कोई पत्नी शोषित पुरूष हूँ। नीलम जी तो मानों तलवार लेकर भाजने लगीं। इसी नारी-विमर्श को ही आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है हास्य-व्यंग्य विधा पर आधारित कविता - नारी क्रंदन।
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तुम सैंया 'यू०पी०' की बिजली
मैं 'नरक पालिका' की टोंटी
तुम मनमर्जी चल देते हो
मैं टप-टप नीर बहाती हूँ

तुम सैंया सरकारी बाबू
मैं हूँ भारत की जनता सी
तुम रोज देर से आते हो
मैं भूखी ही सो जाती हूँ

तुम अच्छे खासे नेता हो
मैं भोली-भाली वोटर हूँ
तुम झूठ बोलते रहते हो
मैं कलियों सी खिल जाती हूँ

तुम छुट्टे सांड़ बनारस के
मैं खूँटे पर की गैया हूँ
तुम हो प्रतीक आजादी के
मैं प्रश्न-चिन्ह बन जाती हूँ

जब मैं आई थी धरती पर
माँ तड़प रही थीं तानों में
इक सर्पदंश था सीने में
मैं बीन बनी थी कानों में

जब तुम आए थे धरती पर
तब गूँज रही शहनाई थी
माँ झूम रही थी खुशियों में
तुम झूल रहे थे बाहों में

जब से धरती पर हुआ जनम
खुशियाँ तेरी मेरे हैं गम
तुम दमके हो मोती बनकर
मैं छलकी हूँ आंसू बनकर

मैं अब भी अबला नारी को
लुटते जलते ही पाती हूँ
दिल नफरत से भर जाता है
बस जल-भुन कर रह जाती हूँ

अब नहीं-नहीं हे पती देव
अब आगे लक्ष्मण रेखा है
तुमने अब तक शायद केवल
बिजली गिरते ही देखा है

जो बुझ न सके इंसानों से
मैं प्रलयकारिणी दंगा हूँ
अच्छा है भ्रम बना रहे
तुम परमेश्वर मैं गंगा हूँ

15.11.09

आज वे.....

आज रविवार है और छोटे से 'ब्लाग अनुभव' के बाद मैंने यह निश्चय किया है कि मैं प्रत्येक रविवार को एक रचना पोस्ट करूँ ताकि पाठकों को भी मालूम हो कि रविवार को 'बेचैन आत्मा' अपनी 'नई बेचैनी' के साथ उपश्थित होगा।

चलते-फिरते सामान्य आदमियों से जब भय लगने लगता है तो मन करता है कि कोई बेचैन आत्मा मिले जिससे मन की बेचैनी कही जा सके, जिसके मन की बेचैनी सुनी जा सके और क्षमा करें चाहे वे खुद को किसी नाम से पुकारें मुझे तो सभी ब्लागर अपनी तरह 'बेचैन आत्मा' ही नज़र आते हैं।

आज मैं 'पिता' और 'माँ' के क्रम में उन अनाम पिताओं-माताओं की बात करना चाहता हूँ जिन्होंने मुझे तो नहीं जना लेकिन जिन्हें देखकर मेरे मन में गहरी पीड़ा होती है और उन कपूतों पर गहरा क्षोभ जिन्होंने उन्हें घर से निकाल कर एक वृद्धाश्रम के कमरे में मरने के लिए छोड़ दिया। यह कविता ऐसे ही एक वृद्धाश्रम से आकर बेचैन हुए मन की उपज है। प्रस्तुत है कविता जिसका शीर्षक है- 'आज वे' ।
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आज वे
आश्रम के कमरों में
मानवता की खूँटी से
लटके हुए हैं
ज्यों लटकते हैं घड़े
नदी तट पर
पीपल की शाख से
माटी के ।

एक दिन वे थे
जो देते गंगाजल
एक दिन ये हैं
जो मारते पत्थर
दर्द से जब तड़पते हैं
एक-दूजे से कहते हैं
अपने सिक्के ही खोटे हैं
रिश्ते
जाली के ।

थे जिनके
कई दीवाने
थे जिनके
कई अफ़साने
आज
दर-ब-दर भटकते हैं
सबकी आँखों में
खटकते हैं
अब न मय न मयखाने
होंठ प्यासे हैं
साकी के ।

धूप से बचे
छाँव में जले
कहीं ज़मी नहीं
पाँव के तले
नई हवा में
जोर इतना था
निवाले उड़ गए
थाली के ।

क्या कहें!
क्यों कहें!!
किससे कहें!!!

ज़ख्म गहरे हैं
माली के ।

8.11.09

विश्वास

यह एक सच्ची घटना पर आधारित है। इसे आप संस्मरण कह सकते हैं।

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मैं
एक अदद पत्नी और तीन बच्चों के साथ
झांसी 'प्लेटफॉर्म' पर खड़ा था
भीड़ अधिक थी
खतरा बड़ा था
मेरे पास कुछ ज्यादा ही सामान था
जो कुली मिला वह भी एक बूढ़ा मुसलमान था !
पचास रूपये में ट्रेन में चढ़ाने का सौदा तय था
मगर मन में एक अनजाना सा भय था

रेल के आते ही आ गया रेला
भागम-भाग, ठेलम-ठेला
कुली ने फुर्ती से
पहले पत्नी-बच्चों को
फिर मुझे
यूँ सामान सहित ट्रेन में धकेला
मानों मै भी हूँ
कोई सामान जैसा
फिर जोर की आवाज लगाई
साहब पैसा !!

मैं चीखा-
बच्चे कहाँ हैं ?
वह बोला-
ट्रेन के अंदर !
बच्चों की अम्मा कहाँ है ?
ट्रेन के अंदर !!
मेरा सामान कहाँ है ?
कुली झल्लाया-
आपका सामान आपके पास है
और आप भी हैं ट्रेन के अंदर !!!
मेरा पैसा दीजिए
फुर्सत में
सबको ढूँढ लीजिए।

तभी बीबी-बच्चों की आवाज कान में आई
मेरी भी जान में जान आई
जेब टटोला
बस् सौ का नोट था
बोला-
सौ का नोट है
पचास रूपये दो
वह भीड़ में चीखा-
नोट दीजिए आपके पैसे लौटा दुँगा
मैने कहा-ये लो।
उसने सौ का नोट लिया
और गायब हो गया
मैं मन मसोस कर
अपना सामान और जहान समेटने लगा

सोंचा
मेरी ही गलती थी
पचास का छुट्टा रखता
तो धोखा नहीं खाता
आज के ज़माने में
किस पर यकीन किया जाय !
यह क्या कम है
कि मेरा सभी सामान सही-सलामत है !!

सीटी बजी
ट्रेन पटरी पर सरकने लगी
सह यात्रियों की हंसी
मुझे और भी चुभने लगी
हें ..हें...हें... आप भी कमाल करते हैं !
ऐसे लोगों पर भी विश्वास करते हैं !!

तभी खिड़की से
एक मुठ्ठी भीतर घुसी
कान में हाँफती आवाज आई
साहब
आपका पैसा
फुटकर मिलने में देर हो गई थी...
मैने जल्दी से नोट लपका
और खिड़की के बाहर झाँक कर देखने लगा.....

प्लेटफॉर्म पर
दूर पीछे छूटते ''ईमान'' के चेहरे पर
गज़ब की मुस्कान थी !
उसके दोनो हाथ
खुदा की शुक्रिया में उठे थे
मानों कह रहे हों
हे खुदा
तू बड़ा नेक है
तूने मुझे
बेइमान होने से बचा दिया

हम
बहुत देर तक
पचास रूपये के नोट को देखते रहे

मेरे क्षुद्र मन और सहयात्रियों के चेहरे की हालत
देखने लायक थी।

पचास रूपये का नोट तो कहीं खर्च हो गया
मगर आज भी
मैं अपनी मुठ्ठी में
विश्वास और भाईचारे की
उस गर्मी को महसूस करता हूँ
जो उस गरीब ने
नोट में लपेटकर मुझे लौटाया था

जिसे
जीवन की आपाधापी में
सहयात्री
गुम होना बताते हैं।



3.11.09

मेरी श्रीमती


गंभीर कविताएँ पढ़कर भारी हुए मन को हल्का करने के लिए प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य विधा पर एक कविता जिसका शीर्षक है -मेरी श्रीमती।

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प्रश्न-पत्र गढ़ती रहती है
वह मुझसे लड़ती रहती है।

मुन्ना क्यों कमजोर हो गया ?
शानू को कितना बुखार है ?
राशन पानी खतम हो गया
अब किसका कितना उधार है ?

दफ्तर से जब घर जाता हूँ
वह मुझको पढ़ती रहती है।

सब्जी लाए भूल गए क्या ?
चीनी लाए भूल गए क्या ?
आंटा चक्की से लाना था
खाली आए भूल गए क्या !


मुख बोफोर्स बनाकर मुझ पर
बम-गोले जड़ती रहती है।

प्रश्नों से जब घबड़ाता हूँ
कहता अभी थका-मांदा हूँ
कहती कैसे थक सकते हो
तुम नर हो, मैं ही मादा हूँ !

मुझको ही झुकना पड़ता है
वह हरदम चढ़ती रहती है।

पूरे घर की प्राण वही है
हाँ मेरी भी शान वही है
हीरो-होण्डा दिल की धड़कन
चेहरे की मुस्कान वही है

बनके सतरंगी रंगोली
आँगन में कढ़ती रहती है।

प्रश्न-पत्र गढ़ती रहती है
वह मुझसे लड़ती रहती है।

29.10.09

माँ

रोज की तरह
छत की मुंडेर पर
धोती फैलाकर
किसी कोने में खुद को निचोड़ती
बच्चों की चिंता में
दिनभर
सूखती रहती है माँ।


हवा के झोंके से गिरकर
घर की बाहरी दीवार पर गड़े

खूँटे से अटकी धोती सी लहराती
बच्चों के प्यार में
दिनभर
झूलती रहती है माँ।


शाम ढले
आसमान से उतरकर धोती में लिपटते
अंधेरों को झाड़ती
तारों की पोटली बनाकर
सीढ़ियाँ उतरती
देर तक
हाँफती रहती है माँ।

चुनती है जितना
उतना ही रोती
गमों के सागर में
यादों के मोती
जाने क्या बोलती
न जागी न सोती
रातभर
भींगती रहती है माँ।
--------------------देवेन्द्र कुमार पाण्डेय।

21.10.09

पिता

चिड़ियाँ चहचहाती हैं
फूल खिलते हैं
सूरज निकलता है
बच्चे जगते हैं
बच्चों के खेल खिलौने होते हैं
मुठ्ठी में दिन
आँखों में
कई सपने होते हैं
पिता जब साथ होते हैं


पिता जब नहीं होते
चिड़ियाँ चीखतीं हैं
फूल चिढ़ाते हैं
खेल खिलौने कुछ नहीं रहते
सपने
धूप में झुलस जाते हैं
बच्चे
मुँह अंधेरे
काम पर निकल जाते हैं
सूरज पीठ-पीठ ढोते
शाम ढले
थककर सो जाते हैं।


पिता जब होते हैं
तितलियाँ
उँगलियों में ठिठक जाती हैं
मेढक
हाथों में ठहर जाते हैं 

मछलियाँ पैरों तले गुदगुदाती हैं
भौंरे कानों में सरगोशी से
गुनगुनाते हैं
इस उम्र के
अनोखे जोश होते हैं
हाथ डैने

पैर खरगोश होते हैं
पिता जब साथ होते हैं।

पिता जब नहीं रहते
जीवन के सब रंग
तेजी से बदल जाते हैं
तितलियाँ, मेढक, मछलियाँ, भौंरे
सभी होते हैं
इस मोड़ पर
बचपने

कहीं खो जाते हैं।
जिंदगी हाथ से

रेत की तरह फिसल जाती है
पिता जब नहीं रहते
उनकी बहुत याद आती है।


पिता के होने और न होने में
एक फर्क यह भी होता है कि
पिता जब साथ होते हैं
समझ् में नहीं आते
जब नहीं होते
महान होते हैं।
--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

11.10.09

वज़न


बचपन में 'कागज की नाव'
लड़कपन में 'तास के महल'
ज़वानी में 'बालू के घर'
हमने भी बनाए हैं
इनके डूबने, गिरने, या ढह जाने का दर्द
हमें भी हुआ है
राह चलते ठोकरें हमने भी खाई हैं
मगर नहीं आया
कभी कोई 'शक्तिमान'
मेरी पीठ थपथपाने
लोगों ने उड़ाया है मेरा भी मजाक
मगर नहीं आया कभी
किसी दूसरे ग्रह का प्राणी
करने मुझ पर 'जादू'
मेरे घर में भी बहुत सी मकड़ियाँ हैं
मगर नहीं काटा मुझे
कभी किसी मकड़ी ने
नहीं बनाया मुझे
'स्पाइडर मैन'

और अब मैं जान गया हूँजीवन
दूसरों की शक्तियों के सहारे नहीं चलता।


हम
जितने हल्के होते जाएंगे
उतने बिखरते चले जाएंगे

धरती पर टिक रहने के लिए जरूरी है
वज़नी होना
और मैं
यह भी जान गया हूँ
कि मनुष्य का वज़नी होना
'गुरूत्वाकर्षण' के सिध्दांत पर नहीं
बल्कि चरित्र के उस
'गुरू-आकर्षण' के सिध्दांत पर निर्भर करता है
जिसके बल पर
'इंद्र' का आसन भी
पत्ते की तरह कांपने लगता है।

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9.10.09

आभार

अभी तक तो अंतर्जाल में मात्र हिंद युग्म के लिए ही लिखता था। 'देखा देखी पाप, देखा देखी पुण्य' मैंने भी एक ब्लॉग बना लिया। पाठकों की प्रतिक्रियाओं से उत्साहित हूँ । मेरा प्रयास होगा कि प्रतिसप्ताह कम से कम एक रचना अवश्य पोस्ट करुँ। आशा है आप सभी का सहयोग मिलता रहेगा।

सादर
देवेन्द्र पाण्डेय ।

मेरी बातों से बोझिल हुए मन को पुनः तरोताजा करने के लिए प्रस्तुत हैं दो दोहे :-

कर्जा इतना लीजिये, सब कर्जा चुक जाय
दर्जा झूठे शख्स का, कभी न मिलने पाय।

चमड़ी से चाँदी झरे, दमड़ी एक न जाय
मीठी वाणी बोलिए, देनदार फँस जाय।



6.10.09

देवता

नारदः
नारायण ! नारायण !

विष्णुः
कहिए मुनिवर क्या समाचार है ?

नारदः
आप तो अंतर्यामी हैं प्रभो !

विष्णुः
हस्तिनापुर का क्या हाल है ?


नारदः
कैसी हस्तिनापुर प्रभु ?
पृथ्वी में कोई हस्तिनापुर नहीं है।
लगता है आप नींद में थे।
विष्णुः
हाँ, जरा आँख लग गई थी। क्या प्रहर हुआ ?

नारदः
सदियाँ गुजर गईं।
भरतवंशियों के देश भारत वर्ष में मुगलों का साम्राज्य है।
आप पूछ रहे हैं क्या प्रहर हुआ !
अनर्थ हो चुका है प्रभु।

विष्णुः
शांत मुनिवर ! शांत ! मैं जरा ध्यान लगाता हूँ।

नारदः
नारायण ! नारायण !
बहुत लम्बा ध्यान लगा लिया आपने।
अब जागिए प्रभु !
क्या देखा आपने ?

विष्णुः
शांत मुनिवर।
बड़ा ही रोमांचक दृश्य था।
आपने नाहक मेरा ध्यान भंग कर दिया।
भारतवर्ष में मुगलों का नहीं अब अंग्रेजों का साम्राज्य है।
गाँधी मेरी प्रेरणा से अंग्रेजों से संघर्ष कर रहे हैं।

नारदः
आपकी प्रेरणा से !
आपने प्रेरणा कब दी प्रभु ?
आप तो ध्यान मग्न थे !

विष्णुः
मुनिवर,
मैनें जो उपदेश महाभारत के समय अर्जुन को दिए थे,
उसे भरतवंशियों ने मंत्र बना लिया है। जिसे वे गीता कहते हैं ।
उसी से प्रेरित होकर गाँधी संघर्ष कर रहे हैं।
कितने समझदार हैं मनुष्य !
जानते हैं कि मैं बार-बार अवतार नहीं लुंगा।

नारदः

किन्तु प्रभु..........

विष्णुः
शांत मुनिवर !
मुझे ध्यान लगाने दीजिए।
बड़ा ही रोमांचक दृश्य है।

नारदः
नारायण ! नारायण !
जागिए प्रभु !
मैं स्वयम् धरती का भ्रमण कर आया हूँ ।
सर्वत्र हाहाकार मचा है।
लोग एक-दूसरे के रक्त के प्यासे हो चुके हैं ।
जागिए प्रभु।

विष्णुः
शांत मुनिवर, शांत !
आप बार-बार मेरा ध्यान भंग क्यों कर देते हैं ?
कितना रोमांचक दृश्य था !
मनुष्य अद्भुत हथियारों से लड़ रहे हैं !
ऐसे हथियारों की तो मैने कल्पना भी नहीं की थी।
मेरा सुदर्शन जब तक एक एक सर काटेगा
तब तक लाखों मनुष्य क्षण भर में कालकवलित हो चुके होंगे।
आहा ! कैसा अद्भुत प्राणी है मनुष्य !


नारदः
नारायण ! नारायण !
यह आपको क्या हो गया है प्रभु ?
आप तो मनुष्यों का गुणगान कर रहे हैं !
नैतिकता का सर्वत्र पतन हो चुका है।
लोग भांति-भांति की व्याधियों से ग्रस्त हैं।
सर्वत्र दुर्योधन की सत्ता है ।
पाण्डवों का नामोंनिशान मिट चुका है
और आप कह रहे हैं
कैसा अद्भुत प्राणी है मनुष्य !

विष्णुः
कैसी नैतिकता मुनिवर ?
यह तो मतों पर निर्भर करता है।
यह तो एक विचार है।
जिस विचार को मानने वाले अधिसंख्य होंगे
वही विचार सर्वोत्तम कहलाएगा।
यही युग धर्म है।
एक समय धरती पर सत्य के मानने वालों का बहुमत था।
मैंने अवसर देख कर अवतार लिया और उनका देवता बन बैठा।
आज तो असत्य को मानने वालों का बहुमत है।
मेरे सत्य के उपदेश व्यर्थ हैं।
मेरे विचार अब रूढ़ीवादी मूर्खों की श्रेणी में गिने जाएंगे।
नारदः
नारायण ! नारायण !
आप पुन्हः अवतार लीजिए प्रभु।
पृथ्वी की रक्षा कीजिए प्रभु।

विष्णुः
शांत मुनिवर ! शांत !
मेरे अवतार लेने पर तुम्हें और भी कष्ट होगा।
लेकिन तुम्हारा विचार उच्चकोटि का है।
यही अवसर है।
मुझे अवश्य अवतार लेना चाहिए।
किन्तु अब मैं
पाण्डवों की ओर से युध्य नहीं करूँगा।
मैं मूर्ख नहीं हूँ।
अब तो मैं
कौरवों की ओर से युध्य कर
नैतिकता वादी मनुष्यों का सफाया करूँगा।
ताकि पृथ्वी पर मेरी जय जयकार होती रहे।
यह तो बहुमत का गणित है
और मुझे
देवता के पद पर बने रहना रहना है।

नारदः
नारायण ! नारायण !
आपने तो मेरी आँखें खोल दीं प्रभु।
चिर निंद्रा में तो मैं ही सो रहा था।
आपकी जय हो !
आपकी जय हो !
आपकी जय हो !

4.10.09

सफेद कबूतर

घर की छत पर
बैठे थे
कई सफेद कबूतर
सबने सब मौसम देखे थे
सबके सब बेदम भूखे थे
घर में एक कमरा था
कमरे में अन्न की गठरी थी
मगर कमरा, कमरा क्या था
काज़ल की कोठरी थी।

एक से रहा न गया
कमरे में गया
अपनी भूख मिटाई
और लौट आया
सबने देखा तो देखते ही रह गये
आपस में कहने लगे
हम सफेद कबूतरों में यह काला कहाँ से आ गया!
सबने चीखा-
चोर!-चोर!
काला कबूतर दूर नील गगन में उड़ गया।

कुछ समय पश्चात
दूसरे से भी न रहा गया
वही भी कमरे में गया
अपनी भूख मिटाई
और लौट आया
सबने चीखा-
चोर!-चोर!
काला कबूतर दूर नील गगन में उड़ गया।

धीरे-धीरे
सफेद कबूतरों का संख्या बल घट गया
नील गगन
काले कबूतरों से पट गया।

एक समय ऐसा भी आया
जब काले कबूतर
घर की छत पर
लौट-लौट आने लगे
सफेद कबूतर
या तो कमरे में
या नील गगन में
उड़-उड़ जाने लगे।

जिन्होंने
कमरे में जाना स्वीकार नहीं किया
भागना स्वीकार नहीं किया
वे
कवि, गुरू, या दार्शनिक हो गये
सबको समझाने लगे-
कमरे में अन्न की गठरी है
मगर रूको
कमरा, कमरा नहीं
काज़ल की कोठरी है।

किसी ने सुना
किसी ने नहीं सुना
किसी किसी ने
सुना अनसुना कर दिया
मगर उनमें
कुछ चालाक ऐसे भी थे
जिन्होंने विशेष परिधान बना लिए
कमरे में जाकर भी
हंस की तरह
उजले के उजले रह गए

बात मामूली नहीं
संगीन है
उन्हीं की जिन्दगी
बेहद रंगीन है

उनके लिए
हर तरफ मजा ही मजा है
वे ही तय करते हैं
किसकी क्या सजा है
उनका
बड़ा ऊँचा जज़्बा है
जी हाँ
आज घर में
उन्हीं का कब्जा है।
जी हाँ
आज घर में
उन्हीं का कब्जा है।

(....यह कविता हिन्दयुग्म में प्रकाशित है।)

26.9.09

फाइलें

फाइलें

टेबुल पर

बैठी नहीं रहतीं

आधिकारियों के घर भी

आया जाया करती हैं।

अलमारियों में जब ये बंद रहती हैं

अक्सर आपस में

बतियाया करती हैं।


एक पतली फाइल ने मोटी से कहा-

"यह क्या हाल बना रक्खा है, कुछ लेती क्यों नहीं !

धीरे-धीरे रंग-रूप खोती जा रही हो

देखती नहीं,

रोज मोटी होती जा रही हो।

मोटी फाइल ने एक लम्बी सांस ली और कहा-

"ठीक कहती हो बहन

मैं जिसकी फाइल हूँ

वह बी०पी०एल० कार्डधारी

एक गरीब किसान है

आर्थिक रूप से भरे विकलांग हो

किंतु विचारों से

आजादी से पहले वाला

वही सच्चा हिन्दुस्तान है।

धीरे-धीरे

कागजों से पट गई हूँ मैं

देखती नहीं कितनी

फट गई हूँ मै।


तुम बताओ

तुम कैसे इतनी फिट रहती हो ?

सर्दी-गर्मी सभी सह लेती हो

हर मौसम में

क्लीनचिट रहती हो!


पतली फाइल बोली-

मैं जिसकी फाइल हूँ

वह बुध्दी से वणिक

कर्म से गुंडा

भेष से नेता

ह्रदय का शैतान है

उसकी मुट्ठी में देश का वर्तमान है

वह आजादी से पहले वाला हिन्दुस्तान नहीं

आज का भारत महान है।


मैं भींषण गर्मी में 'सावन की हरियाली' हूँ

घने बरसात में 'फील-गुड' की छतरी हूँ

कड़ाकी ठंड में 'जाड़े की धूप' हूँ।


मैं भूखे कौए की काँव-काँव नहीं

तृप्त कोयल की मीठी तान हूँ

मैं टेबुल पर बैठी नहीं रहती

क्योंकि मैं ही तो सबकी

आन-बान-शान हूँ।

18.9.09

वणिकोपदेश

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
जरूरत से ज्यादा कहीं जल न जाए।

मुद्रा पे हरदम बको ध्यान रखना
करो काग चेष्टा कि कैसे कमायें
बनो अल्पहारी रहे श्वान निंद्रा
फितरत यही हो कि कैसे बचाएं

पूजा करो पर रहे ध्यान इतना
दुकनियाँ से ग्राहक कहीं टल न जाए।

दिखो सत्यवादी रहो मिथ्याचारी
प्रतिष्ठा उन्हीं की जो हैं भ्रष्टाचारी
'लल्लू' कहेगा तुम्हे यह ज़माना
जो कलियुग में रक्खोगे ईमानदारी।

मिलावट करो पर रहे ध्यान इतना
खाते ही कोई कहीं मर न जाए।

नेता से सीखो मुखौटे पहनना
गिरगिट से सीखो सदा रंग बदलना
पंडित के उपदेश सुनते ही क्यों हो
ज्ञानी मनुज से सदा बच के रहना।

करो पाप लेकिन घडा भी बड़ा हो
मरने से पहले कहीं भर न जाए।





13.9.09

आदमी


श्मशान में
एक पीपल के पेड़ की डाल पर
दो आत्माएँ
गले में बाहें डाले बैठी हुई थीं
पास ही
एक गरीब और एक अमीर आदमी की चिताएँ जल रहीं थीं
उनमें से एक ने दूसरे से कहा-
"हमें बहोत दिनों तक अलग रहना पड़ा"
दूसरे ने कहा-
"हाँ यार, आदमी जो बन गये थे।"