3.10.13

सनातन काल यात्री कौन...?




सनातन काल यात्री कौन? ट्रेन, उसमें बैठे लोग, या फिर दूर वो ढलता सूरज।  पैदल और साइकिल सवार की दूरी इतनी कम है कि इन्हे यात्री के बदले कामकाजी कहना ठीक होगा। ट्रेन में बैठे लोगों के भी अपने-अपने स्टेशन हैं, दूरी निर्धारित हैं। ये अपनी दूरी के यात्री हैं। ट्रेन भी अपनी निर्धारित दूरी तय करने के बाद रूक जायेगी, पलटेगी और फिर वहीं के लिए चलना शुरू कर देगी जहाँ से आई है। रूकने के बावजूद ट्रेन की यात्रा भी निरंतर जारी रहती है। बावजूद इसके ट्रेन स्वयम् यात्रा नहीं करती, लोगों को उनकी मनमर्जी के मुताबिक लाती, ले जाती है। सूरज कभी नहीं रूकता। चलता रहता है। असली यात्री तो यही लगता है। सनातन काल यात्री।

इन सब के अतिरिक्त दूसरे यात्री भी हैं जो दिखलाई नहीं पड़ते। वह है-आत्मा। सुना है प्रत्येक मनुष्य के भीतर आत्मा रहती है। शरीर ऐसे बदलती है जैसे मनुष्य कपड़े। एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा....। सिर्फ सुना है। देखा नहीं, जाना नहीं। गीता में पढ़ा है। विज्ञान ने सिद्ध नहीं किया। जो विज्ञान सिद्ध न कर पाये वह असत्य है ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। कई बातें मनुष्य के ज्ञान के परे होती हैं। जिसे अधिसंख्य स्वीकार करते हैं उसे सही मान लिया जाता है। भले ही वह सही न हो। ऐसी बातें तब तक सही मानी जाती हैं जब तक गलत सिद्ध न हो जांय। धरती को भी पहले चपटी कहा जाता था। बाद में ज्ञान हुआ धरती चपटी नहीं गोल है। आत्मा के होने और मनुष्य के मरने के बाद भी जीवित रहने की बात अभी तक गलत नहीं सिद्ध हुई। यदि सही है तो यह आत्मा ही सनातन काल यात्री हुई।

सूरज दिन में दिखलाई पड़ता है। जब नहीं दिखलाई पड़ता, रात होती है। विज्ञान ने सिद्ध किया कि जब यहाँ नहीं दिखलाई पड़ता तो वहाँ दिखलाई पड़ता है। पृथ्वी गोल है। वह सूरज के चक्कर लगाती रहती है। दिन और रात भी इसी के कारण होता है। आत्मा दिखलाई नहीं पड़ती।  अब प्रश्न यह उठता है कि  जो दिखलाई न पड़े उसे यात्री कैसे कहा जाय? सूरज ही यात्री-सा दिखता है। आत्मा ?  पता नहीं निरंतर यात्रा करती भी है या नहीं! सुना है मोक्ष भी प्राप्त करती है! मोक्ष प्राप्त करने के बाद उसकी यात्रा समाप्त हो जाती है। जिसकी यात्रा समाप्त हो जाय वह सनातन यात्री कैसा ? हम सूरज और आत्मा को भूल स्वयम् को ही यात्री मान बैठते हैं। अभी तो यात्री बनने के लिए इन्हीं में संघर्ष छिड़ा हुआ है!

प्रश्न उठता है मोक्ष के लिए प्रयास कौन करता है?  क्या यह आत्मा का प्रयास है मैने तो मनुष्य को ही प्रयास करते अनुभव किया है। जीवन के दुखों से घबड़ाकर प्रार्थना करता रहता है- हे ईश्वर! आपकी कृपा हो तो इस रोज-रोज के फेरे से मुक्ति मिले। सुनता है.. काशी में मरने से, मणीकर्णिका में फुँकाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रयास करता है कि काशी में मरें ताकि मोक्ष की प्राप्ति हो। दुर्भाग्य से कहीँ और मरा तो उसके परिजन लाद-फाँद कर ले आते हैं उनकी अस्थियों को कलश में सहेजकर। विसर्जित करते हैं गंगा में..मेरे प्रियजन की आत्मा को मोक्ष मिले। मैने भी विसर्जित किये हैं अपने माता-पिता के 'अस्थिकलश सबकी इच्छानुसार, गंगा में। प्रश्न उठता है कि क्या यह मोझ आत्मा चाहती है या मनुष्य के मन की बेचैनी मात्र है! आत्मा, यात्रा से इतना घबराती क्यों है? निरंतर यात्रा करती है,घबराती भी रहती है! क्या पड़ी है आत्मा को घबराने की? क्या यह भी यात्रा हमारी तरह मजबूरी में करती है? हर वक्त मोक्ष की कामना करते हुए यात्राएँ करती रहती है! मुझे लगता है यह मनुष्य के मन की उकताहट है। यात्रा से थक जाने, मुश्किलों से घबराने का उसका स्वभाव मात्र है।



अहो भाग्य मानुष तन पावा! यह कौन कहता है ? बुद्धि कहती है ! फिर बुद्धू की तरह मोक्ष की कामना क्यों करती है ? आत्मा के लिए!  आत्मा की चिंता उसे क्यों होने लगी? वह होता कौन है आत्मा की चिंता करने वाला? वस्त्र क्या जिस्म की चिंता करते हैं ?  जिस्म जीर्णशीर्ण हुआ तो मनुष्य घबराये आत्मा क्यों घबराती है ? उसके लिए तो तैयार हैं कई नये जिस्म!  जहाँ मर्जी वहाँ चला जाये। वैसे ही जैसे कई ट्रेन हैं, चाहे जिसमें बैठकर यात्रा करे। यहाँ सीट न मिले तो दूसरे में टिकट बुक करा ले। यात्रा से घबराने का स्वभाव आत्मा का नहीं लगता। आत्मा तो बेखौफ होकर यात्रा करती रह सकती है। मोझ क्यों चाहेगी? सूरज तो कभी नहीं घबराता! कहीं सूरज ने भी यात्रा से घबराकर मोक्ष की कामना कर ली तो!! अब आप क्यों घबराने लगे?  आप भी मोक्ष ही चाहते हैं न! एक बार सूरज को मोक्ष मिले तो न रहे बांस न बजे बासुंरी। आत्मा को भी मोक्ष मिल जाये, मनुष्य को भी । मगर इस मोक्ष की कल्पना से भी रूह काँप जाती है! रूह यानि की आत्मा !!! सभी कांपते रहते हैं तो फिर सनातन यात्री कौन ? 


एक और चक्कर है। सूरज यात्री-सा दिखता है इसलिए कि हम निरंतर पृथ्वी से उसे उगते-ढलते देखते रहते हैं। मगर असल यात्री तो पृथ्वी है! यह वैसे ही है जैसे ट्रेन की खिड़की से बाहर देखने पर स्थिर पेड़-पौधे पीछे भागते हुए दिखते हैं। इस दृष्टि से देखा जाय तो फिर सनातन कालयात्री तो यह पृथ्वी ही हुई! पृथ्वी के अलावा और भी ग्रह हैं, चाँद-तारे हैं जो सूरज की परिक्रमा करते रहते हैं। तो फिर सनातन काल यात्री कौन ? क्यों न संपूर्ण प्रकृति को ही सनातन काल यात्री मान लिया जाय ?
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24 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार - 04/10/2013 को
    कण कण में बसी है माँ
    - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः29
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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  2. बेहद गहन और सारगर्भित विचार....
    बस मुझे एक बात सही नहीं लगी कि आपने आत्मा के अलावा सूर्य को सनातन कालयात्री माना ,जबकि सूर्य स्थिर है यात्री तो पृथ्वी हुई जिसके भ्रमण से दिन रात हुए....
    कृपया अन्यथा न लें.
    सादर
    अनु

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    1. यह बात भी सही है। सूरज उगता-ढलता दिखता है मगर असल यात्री तो पृथ्वी है!

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    2. आपके कमेंट के बाद आलेख में थोड़ा सुधार करते हुए एक पैरा और जोड़ दिया है। कमी बताने के लिए आपका आभार।

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    3. और भी निखर गया लेख .......
      बहुत सुन्दर !!
      अनु

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  3. प्रकृति चले दिन रात, समझते हम हैं राही,
    ढोती सृष्टि विराट, समझते हम हैं वाही।

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  4. यह एक चलते मुसाफिर का काल चिंतन है :-)

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  5. सूर्य भी सनातन यात्री है क्योंकि वह भी ब्रह्माण्ड में चक्कर काट रहे है वह एक जगह स्थिर नहीं ,ग्रह जरुर उसके चक्कर काट रहे है l
    नवीनतम पोस्ट मिट्टी का खिलौना !
    नई पोस्ट साधू या शैतान

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  6. जब सत्य का पता नहीं होता तो अनेक प्रश्न मन में आते रहते हैं,और मन ही उत्तर देने को आतुर हो उठता है.

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  7. बधाई ब्लॉगर मित्र ..सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगों की सूची में आपका ब्लॉग भी शामिल है |
    http://www.indiantopblogs.com/p/hindi-blog-directory.html

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  8. सुंदर चिंतन.

    रामराम.

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  9. सबके ह्रदय की बात..

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  10. यह बेचैन नहीं परिपक्व आत्मा का चिन्तन है।

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  11. ये शरीर मेरा है इस हाथ में चेतना मेरी है आँख में दृष्टि मेरी है कान में श्रवण मेरा है लेकिन मैं शरीर ,हाथ ,आँख , कान आदि नहीं हूँ। चेतन ऊर्जा कहते हैं मुझे। चेतनत्व छोड़ मैं चिरंतन काल से यात्रा कर रहीं हूँ। परमात्मा मुझसे सीनिअर नहीं है। दोनों सनातन हैं आत्मा ,परमात्मा और हाँ माया (परमात्मा की मैटीरियल एनर्जी )भी सनातन है। प्रलय के समय परमात्मा की यह शक्ति परमात्मा में ही समा जाता है। तीनों में से कोई किसी को नष्ट नहीं कर सकता। यात्रा ही सत्य है सनातन है यात्रा यानी स्थिति परिवर्तन काल के स्थान के सापेक्ष गति ही सनातन हैं यहाँ निरपेक्ष कुछ भी नहीं है। भले परमात्मा सब कारणों का कारण है और उसका कोई कारण नहीं है लेकिन निरपेक्ष वह भी नहीं है केयर टेकर है अकाउनटैंट है हमारे कर्मों का। अवतार लेता है जब जब पृथ्वी पर अनर्थ बढ़ता है तब तब उसका अवतरण होता है।

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    1. सुंदर प्रतिक्रिया के लिए आभार सर जी। मोक्ष की कामना कौन करता है?

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  12. सतत चलता रहे सनातन काल यात्री

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  13. प्रकृति ही है सनातन रूप बदल कर !
    सुविचारित चिंतन !

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  14. गहन चिंतन और एक अनुत्तरिय प्रश्न।

    मोक्ष की कामना किसकी है शरीर की या आत्मा की ??? ……

    मेरा मानना तो यही है की मोक्ष की कामना आत्मा की है क्योंकि आत्मा पर जन्मों के कर्म के बंधन है, मोह माया शरीर की मृत्यु के साथ भी मिट नहीं पाती ये जो मन है यही संग्रह का भंडार है अतृप्त और अधूरी इच्छाएं मन एक जन्म से दूसरे जन्म तक लेकर चलता है मन एक सूक्ष्म शरीर है जो इस स्थूल शरीर के मिट जाने के बाद भी आत्मा के साथ बना रहता है जिसके कारण ही आत्मा चक्र में लौट-लौट कर आती रहती है । इस मन और इस सूक्ष्म शरीर की बनावट को समझना और आत्मा को इससे मुक्त कर लेना ही मोक्ष है क्योंकि फिर आत्मा और परमात्मा के बीच कोई दूरी नहीं रहती ये मन ही है जो इनके बीच में आता है |

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  15. सब कुछ गडबड झाला है ... जीवन क्या है .. यात्रा क्या है यात्री कौन .. क्या सोचना ... जब तक सास है तभी तक तो जीवन अहि ओर ऐसी सोचें भी हैं ...

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  16. बड़े विद्वानों की बड़ी बातें. हमें तो इस विषय पर न कुछ कहते बनता है न चुप रहते.

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  17. सहयात्री हैं सब
    अनजान होकर भी चिर परिचित
    मौन यात्रा
    आत्मिक मंथन
    सूर्योदय और सूर्यास्त
    सब साथ साथ
    जहाँ तक साथ है
    एक रिश्ता है ... जिसे भी सनातन मान लें

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