9.5.15

अब भला क्यों सजन, धूप में!

आग लगती है ठन्डी हवा
तुम कहाँ हो? सजन, धूप में

हर तरफ बिछ रही चांदनी
चल रहा हूँ सजन, धूप में

मेरे पलकों ने बादल बुने
लो सजन ओढ़ लो, धूप में

बन के बदरी अगर तू चले
फिर घनी छाँव है, धूप में

दिन ढला, साँझ दीपक जले
अब कहाँ हो? सजन, धूप में

जाने कब से खड़ा द्वार पर
अब भला क्यों सजन, धूप में!

11 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-05-2015) को "सिर्फ माँ ही...." {चर्चा अंक - 1971} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

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  2. सुन्दर रचना

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  3. इतनी बेहतरीन प्रस्तुति में भला कोई कैसे धूप में
    आभार

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  4. बहुत सुन्दर..

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  5. कोमल भावनाओं से बुनी कविता..

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  6. बहुत खूब .. पलकों से बुने बादल तो उम्र भर ओढ़ लें सजन ...
    लाजवाब है हर छंद ...

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  7. बहुत सुंदर प्रस्तुति आदरणीय

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  8. बहुत ही शानदार और सुंदर प्रस्‍तुति।

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  9. बहुत सुन्दर .... हाल दिल ...

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