8.5.16

लोहे का घर -15


लोहे के घर के जनरल डिब्बे में बैठा हूँ। यात्रा रोज से लम्बी है। भीड़ बहुत है, यात्री रंग-बिरंगे। पश्चिम की खिड़की के पास साइड सिंगल सीट मिल गई है इसलिए कोई फर्क नहीं कि कितनी भीड़ है। एक छोकरा ककड़ी बेचने आया है। 5 रुपये में 1 ककड़ी बेच रहा है। 1 खरीद कर आधी खाई, आधी फेंक दी। स्वादहीन ककड़ी!
शाम के 5 बज रहे हैं। खेतों में धूप चारों खाने चित्त पसरी हुई है। धरती को तपा-तपा कर थक चुकी हो जैसे। लम्बी दिख रही हैं घने वृक्षों की परछाइयाँ। पूरब दिसा में बैठे यात्रियों से जाते-जाते भी छेड़छाड़ कर रही है। आम के नीचे खड़े कुछ लड़के टिकोरे तोड़ने के लिए आम पर पत्थर बरसाते दिखे। वृक्षों को प्यार करने का फल ऐसे ही मिलता है। कभी काटे जाते हैं, कभी जलाये जाते है और फलदार हुये तो पत्थर खाते हैं। अपने स्वभाव से सभी लाचार हैं। प्यार करने वाले प्यार करना नहीं छोड़ते, फल लूटने वाले फल लूटना नहीं छोड़ते।
पटरी से कुछ दूरी पर खेतों में ईंटों के भट्टे दिख रहे हैं। धरती की छाती पर गड़ी ऊंची-ऊंची चिमनियाँ। खेतों पर कंकरीट के जंगल उगाने के लिये बीज, मेरा मतलब ईंटें यहीं बनती हैं। लोहे के घर की खिड़की से जितनी तेजी से दृश्य बदलते हैं, उतनी तेजी से बदलते हैं मन के भाव लेकिन उँगलियाँ मोबाइल पर उतनी तेजी से नहीं चलतीं। कुछ बकरियाँ चर रहीं थी अभी, कुछ लड़के डंडे ले भाग रहे थे एक प्लास्टिक की गेंद के पीछे। एक ट्रेन‬ खड़ी थी प्लेटफॉर्म पर। उससे बिना बात किये, पटरियाँ बदलते हुये, अकड़ जमाती निकल गई अपनी वाली। एक चिड़िया उड़ रही थी और दूसरी गुमसुम बैठी थी बिजली के तार पर।
परछाइयाँ अब और लम्बी हो रही हैं। पूरब की खिड़की से ताक-झाँक मचाने वाली धूप गुम हो चुकी है। सुंदर नीली साड़ी और लाल लिपिस्टक वाली गोरी महिला भी देख रही है खिड़की के बाहर। सोच भी रही होगी कुछ मगर लिख नहीं रही। लिखने में देखने का मजा जाता रहता है। घर में थर्राहट हुई, एक नाला गुजरा है अभी। एक जगह खेत की मिट्टी नम दिखी। एक पुरुष और एक महिला मिलकर मिट्टी में कुछ कर रहे थे। ट्रेन की रफ़्तार तेज है। आँखें दूर तक साफ़ नहीं देख पातीं।

ट्रेन बहुत देर से रुकी है। रुकी है तो रुकी है। बिना प्लेटफॉर्म के रुकती है, यह तो प्लेटफॉर्म पर रुकी है! मनमर्जी नहीं कर सकती। सिग्नल के इशारों की गुलाम है। मनमर्जी कर सकती तो शायद इसका नाम ट्रेन न होकर आवारा साँड़ होता। सदैव अनुशासन में रहना है और मालिक के इशारों पर चलना है तभी इसका नाम ट्रेन‬ हुआ। बगल में दूसरी आकर खड़ी हुई। अब यह चल दी! प्लेटफॉर्म है या ट्रेनों का किसन कन्हैया!!!
अभी अन्धेरा नहीं हुआ लेकिन अब धूप जा चुकी है। लोगों के घरों की मुंडेर से क्या, लोहे के घर की खिड़की से दिखने वाले दूर क्षितिज से भी गुम हो चुकी है। ऐसे गुम हुई जैसे किसी राजनैतिक पार्टी का सिंघासन छिन गया हो! अभी अँधेरा नहीं हुआ। दिन भर धरती पर राज करने का असर है। अन्धेरा आते-आते आएगा, उजाला जाते-जाते जायेगा। मस्त हैं घर के यात्री। अभी पटरी पर दौड़ रही है ‪#‎ट्रेन‬
अब अंधेरा हो चुका है। बलिया से चली गोदिया औड़िहार से आगे बढ़ चुकी है। अभी अढ़ाई घण्टे हुये, इतनी ही और बाकी है। सीधे नहीं जायेगी बनारस, घूमकर जौनपुर जायेगी और फिर वहाँ से बनारस। पहले जब बलिया से बनारस जाता-आता था तो इसका जौनपुर जाना बहुत खलता था। अब जौनपुर से जाना पड़ता है बनारस तो यही साथ देती है। वक्त के साथ अवसर भी प्रतिकूल से अनुकूल हो जाते हैं!
यात्री बदल चुके हैं। एक ग्रामीण महिला झोले से बड़ी-सी लिट्टी निकालकर खा रही है। अखबार में लपेट कर एक उसने अपनी बिटिया को भी दिया है। वो भी धीरे-धीरे, कुटुर-कुटुर खा रही है। दोनों माँ-बेटी एक दूसरे को देख रहे हैं और गंभीरता से लिट्टी खा रहे हैं। सुबह के भूखे लगते हैं। चेहरे पर खुशी का नामो निशान नहीं दिखता। एक खतम कर दिया, पानी पीया, अब दूसरी खा रहे हैं। इनकी भूख किसी नेता के भूख की तरह नहीं है। होती तो चेहरे में कुटिल ही सही, थोड़ी-सी मुस्कान होती। यह तो ग्रामीण महिला की भूख है। हाड़ तोड़ श्रम के बाद पेट की अंतड़ियों को मरोड़ कर निकली भूख। इससे चेहरे में मुस्कान नहीं आती, सन्तोष का भाव जगता है। अब दोनों खा चुके। एक अजीब-सी शांति है चेहरे पर, एक अजीब-सी चमक है आँखों में। ‪#‎ट्रेन‬ के लम्बे सफ़र की थकान कम करने वाली चमक।
भंडारी स्टेशन से चल चुकी है ‪#‎ट्रेन‬। अब बनारस पहुँच कर हर हर महादेव कहना बाकी है। 15 मिनट रुकी थी। टहलते हुये जनरल बोगी से उतर कर स्लीपर में आ गया। सोचा था बहुत लिख चुके अब स्लीपर में चलकर लेटेंगे मगर यहाँ तो पहले से ही हमसे भी अधिक थके, मांदे दिख रहे हैं! भीड़-भाड़ वाले जनरल बोगी से उतरकर, मरघटी सन्नाटे वाले भंडारी स्टेशन के प्लेटफॉर्म में चहल कदमी करता हुआ जब स्लीपर में चढ़ा तो यहाँ का माहौल ऐसा था जैसे किसी गरीब के घर से मध्यम वर्गीय जमात में आ गया होऊँ! साइड अपर बर्थ पर बैठी दो छोटी बच्चियाँ वेंडर को देख, फ्रूटी-फ्रूटी चीख रही थीं, साइड लोअर बर्थ में बैठा एक आदमी टिफिन कर रहा था और सामने एक आदमी ऑफिस की आधी फाइलें निपटा कर सोया लग रहा है। आधी इसलिये कि बीच-बीच में एक आँख खोलकर अपना बैग देख लेता है। मेरे अगल-बगल बैठे दो आदमी कभी लोहे के घर की खिड़की से अन्धेरा, कभी भीतर का उजाला बांच रहे हैं।
टिफिन खा चुकने वाला यात्री अब अपनी मोबाइल से अच्छे पति की तरह पत्नी से टिफिन की तारीफ़ कर रहा है, साइड अपर बर्थ की बच्चियाँ फ्रूटी की दोनों खाली बोतलें आपस में टकरा रही हैं और आधी फाइल निपटा कर सोने वाले ने दो बार करवटें बदली हैं। लोहे के इस वाले घर का माहौल थोड़े सन्तुष्ट घरों के माहौल जैसा है। ट्रेन पूरी रफ़्तार से भाग रही है पटरियों पर।

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (09-05-2016) को "सब कुछ उसी माँ का" (चर्चा अंक-2337) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत बढ़िया पोस्ट ...

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  4. देवेन्द्र जी आपने बहुत ही मनमोहक तरीके से अपनी यात्रा में बिताए हुए पलो को दर्शाया है कि किस प्रकार से आम आदमी अपनी जिंदगी को जी रहा है आपका ये अनुभव बहुत ही अच्छा लगा आप अपने और भी अनुभवों को शब्दनगरी पर भी लिख सकते है .....

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