30.4.18

लोहे का घर -42

आज बनारस से छपरा रूट वाले लोहे के घर में बैठे हैं। सद्भावना सही समय पर चल रही है। इस रूट में भीख मांगने वाले बहुत मिलते हैं। अभी औड़िहार नहीं आया और चार भिखारी एक एक कर आ चुके। एक दोनों हाथ से लूला था, दूसरा रोनी सूरत लिए लंगड़ा कर चल रहा था, तीसरा अंधा था और चौथी एक महिला थी जिसके गोद में बच्चा था। मैंने किसी को कुछ नहीं दिया। जैसे रोज रोज समाचार देख/पढ़ कर व्यक्ति कठुआ जा रहा है वैसे रोज रोज के रेल सफर ने मुझे निर्मोही बना दिया है। अंधे लूले भिखारी को देख कर भी दया नहीं आती। लगता है कोई गिरोह है जो इनसे यह काम करा रहा है।
(पांचवी अंधी प्रौढ़ भिखारिन पूरे राग से भीख मांगते हुए गुजरी। उसके साथ अल्मूनियम का कटोरा पकड़े १० वर्षीय अबोध बालिका थी।)
कल युग ने कलियुग जल्दी ला दिया। आम आदमी के लिए महानगरों में अपने भी अजनबी की तरह कन्नी काट जाते हैं, छोटे शहरों में अजनबी भी ऐसे मिलते हैं जैसे पुरानी जान पहचान हो। शायद यही कारण है कि बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहर मुझे अधिक अच्छे लगने लगे हैं। लोहे के घर में बैठते ही गाजीपुर, बलिया, छपरा के लोग बड़े प्रेम से घुलमिल जाते हैं। बोली मीठी और मीठी होती चली जाती है।
पकौड़ा स्टेशन (औड़िहार) आया और चला गया। यात्री बड़े चाव से पकौड़ी खा रहे हैं। इस ओर के यात्री भी जानते हैं कि यहां पकौड़ा मिलता है और पकौड़ी बेचने वाले भी जानते हैं कि चाहे बेसन में आटा मिलाकर खिला दो, लोग खरीदेंगे जरूर।
इधर खेतों के वही दृश्य हैं जो बनारस जौनपुर मार्ग के हैं। कहीं खेत साफ हो चुके हैं तो कहीं गेहूं के ढेर के ढेर रखे हुए हैं। कहीं कहीं कटाई भी नहीं हुई है। धूप तेज है। कभी घने वृक्ष की छांह पकड़े डोरी से बंधे चौपाए दिख जाते हैं।
इस रूट में लोकल वेंडर भी खूब चढ़ते हैं। कोई चना भूजा चटनी बेच रहा है, कोई आइस्क्रीम बेच रहा है, कोई पानी बेच रहा है तो कोई लठ्ठा नमकीन। बारी-बारी से वेंडर भांति-भांति की आवाजें निकालते हुए आ जा रहे हैं। ताली पीटने वालों का दल भी गुजर चुका। अभी तक ट्रेन किसी क्रासिंग की वजह से नहीं रुकी, चलती चली जा रही है। गाजीपुर आ गया।
एक भीड़ का छोटा सा रेला चढ़ा है। किसी के पास रिजर्व बर्थ नहीं है। सभी साधिकार एक दूसरे को घिसका कर बैठ रहे हैं। थोड़ी देर की किच किच है, कोई लफड़ा नहीं है। सभी समायोजित हो गए। घर ने नए सदस्यों को अपना लिया। कुछ देर बाद आपस में बातें होंगी। अभी चढ़ी महिला की गोदी से उतर एक बच्चा अपने पापा से उनके मोबाइल के लिए छइला रहा है। पापा से मोबाइल छीन कर उन्हीं की गोदी में बैठ गेम खेल रहा है। पापा खिसिया रहे हैं.."साला आइसन मोबाइल आ गइल बा नू...!"
गाजीपुर से चली है ट्रेन। नए वेंडर और नए गले के नए सुर... समोसा गरम ताजा गरम खाइए भाई! गरम नहीं, पैसा नहीं। चssइया! चाय चाय। चाय पियो। ओए! ककरी। दस में दू गो। अलग अलग वेंडर, अलग अलग आवाजें। इन आवाजों के बीच किसी बच्चे के रोने की आवाज। एक बात नोटिस कर रहा हूं। अभी तक कहीं से कोई राजनैतिक बहस नहीं सुनाई पड़ी। देश की चिंता में कोई दुबला नहीं हो रहा है। सभी आम आदमी हैं, अपनी अपनी चिंता में डूबे हुए। 
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एक लड़की एक रजिस्टर लेकर चल रही है लोहे के घर में। बोल रही है..."मेरे पापा को लकवा मार दिया है, सिर्फ दो चार रुपया दे दो।" और कोई दया नहीं कर रहा, मै भी नहीं।
एक महिला एक जवान लड़की के साथ चलती है। कहती है..."बिटिया की शादी करनी है, दो चार रुपया दे दो।" और कोई दया नहीं कर रहा, मै भी नहीं।
एक अंधी भिखारिन एक मासूम लड़की के साथ पूरे राग से भीख मांगते हुए जा रही है। कटोरा बिटिया के हाथ में है। कोई दया नहीं कर रहा, मैं भी नहीं।
कितना निर्दयी समय है! कोई दुखियों पर दया नहीं करता, मैं भी नहीं।
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बाप का नया चप्पल पहन कर लड़का लोहे के घर के गेट में बैठा था। कुछ देर बाद मुंह बनाकर आया..
पापा!
का है बे?

एक चप्पल गिर गया! 

तब हम का करें? नंगे पैर चलना धूप में।
मेरा नहीं, आपका।
मेरा!!! मेरा नया चप्पल पहन कर गेट में क्यों बैठा था बे? बुड़बक साला। सात सौ में खरीदे थे। अब हम इसका क्या करें?(चप्पल हाथ में उठा कर।) रुको! बताते हैं। .और लड़का दूसरी बोगी में भाग गया।
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4 comments:

  1. लोहे का घर और उसमें निस्पृह से दिखते मगर मन में मनन करते आप साकार हैं जैसे !
    लोहे के घर में भी कितने रोचक दृश्य!

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  3. रोचकता से पूर्ण

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