10.9.19

अधिकार और कर्तव्य

सरकारी नौकरों को
काम के बदले
वेतन दिया जाता है
लेकिन वे
इससे संतुष्ट नहीं होते
अधिकार ढूँढते हैं!
जबकि
उनके हिस्से की
कानूनी वसीयत में,
अधिकार शब्द
होता ही नहीं,
दायित्व होता है।

कुछ तो
बड़े खुशफहमी में जीते हैं
दायित्व को,
अधिकार की शराब में
घोलकर पीते हैं।

ज्यों-ज्यों
दायित्व बढ़ता जाता है
त्यों-त्यों
अधिकार का नशा
चढ़ता जाता है।

सरकारी दफ्तर के
चतुर्थ श्रेणी महोदय भी
जब अपने सारे अधिकार जता कर
तृप्त हो जाते हैं
तभी फरियादी की मुलाकात
बड़े साहब से
करवाते हैं।

बड़े साहब मतलब
बड़े अधिकारी
जब वे
अपने सारे अधिकार आजमा कर
असहाय हो जाते हैं
तभी कृपा कर
फरियाद को पँख लगाते हैं
सुनहरी कलम से
प्रार्थना पत्र पर
अपनी 'चिड़िया' बिठाते हैं।

साहब की चिड़िया
बैठते ही
फरियाद को पँख लग जाता है,
उड़ने लगता है!
उड़ते-उड़ते
बड़े बाबू के टेबल पर जाकर
बैठ जाता है।

बड़े बाबू भी
कर्तव्य को अधिकार समझते हैं
अपनी चिड़िया बिठाने से पहले
फरियादी का
इन्तजार करते हैं!

धीरे-धीरे
पूरा दफ्तर
जब अपने-अपने हिस्से के
अधिकार के नशे का
सेवन कर लेता है
तब जाकर
फरियादी को
(हौसला शेष रहा तो)
अपना अधिकार
मिल पाता है।

अधिकार का नशा
शराब से खतरनाक होता है
शराब तो
पीने वाले को ही नुकसान पहुंचाती है
लेकिन अधिकार
कभी-कभी
फरियादी को भी
मौत के घाट उतार देता है।

अधिकार के नशे की लत
बड़ी भयानक होती है
उतरती तभी है
जब
उम्र निकल जाती है
या नौकरी
छूट जाती है।

दायित्व से
जान पहचान हो,
दोस्ती हो,
तो कुर्सी से उतरने के बाद भी
व्यक्ति
अकेला नहीं होता
उसके पास
असंख्य
तृप्त फरियादियों की
दुआएँ होती हैं
जमीन पर पैदल चलता है
तो भी लोग
झुककर
दुआ-सलाम करते हैं
राम-राम करते हैं
पीठ पीछे
चर्चा आम करते हैं..
बड़ा अच्छा अधिकारी था।
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1 comment:

  1. Wow such great and effective guide
    Thanks for sharing such valuable information with us.
    BhojpuriSong.IN

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